रविवार, 8 मार्च 2020

👉 अपने बाल-बच्चे मत बेचिए! (भाग १)

ऐसी दुर्घटनाएं सदा ही समाचार-पत्रों में इन को मिलती हैं, कि अमुक स्थान में अमुक कन्या ने, जो अत्यन्त होनहार और विवाह के समस्त गुणों से पूर्ण थी, अपने विवाह के पहले आत्महत्या करके अपने प्राण दे दिये। भावुक पाठक का हृदय इसको पढ़कर अवश्य ही व्यग्र और विह्वल हो जाता है, तथा वे इस दुर्घटना के मूल कारणों पर तरह-तरह के अनुमान करने लगते हैं। मेरी समझ में इसके वस्तुतः दो ही कारण होते हैं। एक तो उस कन्या के माँ-बाप या उसके कोई निकट सम्बन्धी उसे किसी अयोग्य पुरुष के साथ रुपये आदि लेकर विवाह करना चाहते हैं, और नहीं तो किसी लड़के का दुष्ट अभिभावक इतना अधिक द्रव्य उस लड़की के पिता भाई या उसके परिवार के और लोगों से चाहता है, जिससे कि उस कन्या के वे सम्बन्धी अत्यन्त विह्वल और व्यग्र हो जाते हैं। ऐसी अवस्था में उस बेचारी कन्या को जीवन अवश्य ही बोझ मालूम पड़ता है।

क्यों न हो-“सबसे अधिक जाति अपमाना।” नारी-जाति का यह असह्य अपमान जब उसे बर्दाश्त नहीं होता तो वह अपने प्राणों को त्याग देती है। सती ने जिस तरह अपने अपमान और क्रोध की दहन-ज्वाला से अपने पिता के यहाँ प्राण दे दिये थे, ठीक उसी तरह दो एक नहीं, अनेकों देवियाँ हमारे समाज के भयंकर अग्निकुण्ड में वर-विक्रय और कन्या-विक्रय की कुप्रथा के कारण अपने को होम कर देती हैं। कितनी ही कन्याएं आजीवन कुमारी ही रह जाती हैं। उनके अभिभावकों के पास तिलक-दहेज के लिये इतने रुपये नहीं कि जिनसे उनका विवाह कर सकें।

मेरा यह दृढ़विश्वास है कि बहुत सी कन्याएं, जिन्हें अपने भविष्य की कुछ भी चिन्ता है, इस वर-विक्रय और कन्या विक्रय की घातक कुप्रथा के कारण चिंतासागर में डूबी रहती हैं, जंगल के मृग-शावकों की तरह सदैव भयातुर बनी रहती हैं ठीक ही है, जहाँ तिलक-दहेज और कन्या-विक्रय के इतने जबर्दस्त जाल बिछे हुए हैं, वहाँ अभागी कन्या-मृग शावकों को अयोग्य वर-बधिक के जाल में फंस जाना न पड़े यही आश्चर्य है!

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 19

👉 Who Do You Worship – The Divine or the Devil?

Man misidentifies himself as the physical body. Although he has herd something like ‘he has a soul that is different from the body’ but does not quite believe it or is not even able to imagine it. If most of us were not living under this illusion about unity of the self with the living body, this land (India) of great rishis would not have become home to vast spread corruption and confusion. It was this sacred land where Lord Krishna had preached Bhagvad Gita to Arjuna and reminded him that he is not the body. As we have totally forgotten this fact and never bother to know about our own “self”, how could we know the Omnipresent Self, the God?

We are living in a state of utter ignorance and darkness. Whatever suits our deluded convictions or convinces our selfish intellect, that has become the definition of God for us. It is like considering a rope to be a snake because of lack of light. Indeed the rope resembles the shape of a snake and both would look alike if kept at a dark place. But, as we all know they are not the same. It is only our illusion because of which we might confuse one with the other. It is a pity that this is what we the ‘intelligent beings’ have done today by regarding the devil as the divine.

Its time we awaken and ponder over our reality. We should attempt to realize that – the soul is sublime; it is not perceivable by the body or the materialistic means.

📖 Akhand Jyoti, May 1940

शनिवार, 7 मार्च 2020

👉 तू ही है

मैं की भ्रान्ति से समस्त भ्रान्तियाँ पनपती हैं। जिन्हें अपने मैं पर भारी अभिमान है, उन्हें भी ठीक से नहीं पता कि आखिर यह मैं है क्या? रोगी, बीमार, अशक्त होने वाला यह शरीर मैं है? जो बचपन, यौवन और बुढ़ापे के जाने कितने रंग बदलता है। अथवा फिर वह मन है, जो विचारों और भावनाओं के ऊहापोह में पल-पल डूबता-उतराता है। अनुभवी कहते हैं कि मैं तो वह गाँठ है जो आत्मा ने प्रकृति से भ्रमवश बाँध ली है। भ्रम की इस गाँठ के कारण ही जीवन के सारे अनुभवों में भ्रम और भटकन घुल गयी है। यह गाँठ दुखती है, कसकती है, पर खुलती नहीं है। यह खुले तो तब, जब चेत हो।
    
जीवन के अनन्त-असीम प्रवाह पर इस मैं की गाँठ का बन्धन सम्पूर्ण जीवन प्रवाह में अनेकों विसंगतियाँ पैदा कर देता है। इससे व्यक्ति सत्य और स्वयं से टूट जाता है। मैं का बुद्बुदा सत्ता-प्रवाह से अपने को अलग समझ बैठता है। जबकि बुद्बुदे की कोई सत्ता नहीं है, उसका कोई केन्द्र नहीं है। वह सागर ही है, सागर ही उसका जीवन है। सागर से पृथक् सत्ता का बोध ही अज्ञान है। बुद्बुदे के मूल में भी तो सागर की अनन्त जलराशि ही है।
    
सूफी सन्तों में एक कथा कही जाती है- प्रेयसी के द्वार पर किसी ने दस्तक दी। भीतर से आवाज आयी, कौन है? जो द्वार के बाहर खड़ा था, उसने कहा, मैं हूँ। उत्तर में उसे सुनायी दिया, यह घर ‘मैं’ और ‘तू’ दो को नहीं सँभाल सकता है। और बंद द्वार बंद ही रहा। प्रेमी वन में चला गया। उसने तप किया, उपासनाएँ की, भक्ति में स्वयं को समर्पित किया। बहुत सालों बाद वह लौटा और पुनः उसने द्वार खटखटाए। दुबारा फिर वही सवाल पूछा गया- बाहर कौन है? लेकिन इस बार द्वार खुल गए, क्योंकि उसका उत्तर दूसरा था- ‘तू ही है’। यह उत्तर तू ही है, समस्त आध्यात्मिक जीवन का सार है। क्योंकि इसमें अपने क्षुद्र मैं की सर्वव्यापी परमात्मा की सत्ता में विलय की दिव्य अनुभूति है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०१

👉 आप के निमार्ण-कार्य (अन्तिम भाग)

देश के प्रति भी आपका कुछ कर्तव्य है। राष्ट्र को आपकी सेवाओं की आवश्यकता है। आज हमारे देश में उत्साह है, जनता में हलचल है, प्रत्येक हृदय में प्रेरणा है कि राष्ट्र निर्माण किया जाये। किन्तु क्या किया जाय? हम कहते हैं आपको अपनी शक्ति के अनुसार नागरिक शिक्षा, जनता को उसके अधिकार और कर्त्तव्यों की शिक्षा देना, प्रवासी भारतीय, रंग-भेद को दूर करना, नाना वादों की शिक्षा, राजनीति का ज्ञान प्रदान करना है। राष्ट्र-निर्माण का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है और समस्याएं भी गम्भीर हैं। सम्भव है आपके लिए यही क्षेत्र उपयुक्त हो।

राष्ट्र भाषा के निर्माण की समस्या यथेष्ट महत्व की है। मद्रास, बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र इत्यादि भागों में हिन्दी प्रचार का बीड़ा उठाकर आप अमर बन सकते हैं अपने समय का सदुपयोग हिन्दी के लेख, पुस्तकें लिखकर, हिन्दी में भाषण देकर, जन जागृति द्वारा, अशिक्षित जनता में ज्ञान का प्रकाश प्रदान कर अन्य भारत की 90 प्रतिशत जनता को हिन्दी बोलना लिखना सिखा सकते हैं।

हमारे देश के 75 प्रतिशत व्यक्तियों को भरपेट भोजन तक प्राप्त नहीं होता। उनके लिए उद्योग, धन्धे, घरेलू कार्य, स्त्रियों के लिए सिलाई, बुनाई, कताई, नर्सिंग अध्यापन इत्यादि की शिक्षा दे सकते हैं। जिस देश में जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही हो, तथा अस्पृश्यता हो, धर्म में मायाचार लूट-पाट चल रही हो, पंडित महन्त इत्यादि जनता को ठग रहे हों, नारियों का निरादर हो, उस देश में आपके लिए निर्माण कार्य की न्यूनता नहीं है।

अवकाश निकालिये। विद्यार्थियों को यथेष्ट समय निर्माण-कार्य के लिए प्राप्त हो सकता है, जैसे रविवार दो-दो चार-चार दिन की छुट्टियाँ, दशहरे और बड़े दिन की छुट्टियाँ, ग्रीष्मावकाश। इसी प्रकार अन्य व्यक्ति भी अपना समय निकाल कर सार्वजनिक सेवा में लगा सकते हैं। राष्ट्र निर्माण में प्रत्येक व्यक्ति को सहयोग देकर जीवन सफल करना चाहिये।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 14

बुधवार, 4 मार्च 2020

👉 Jeevan Me Sukh Chahiye जीवन में सुख चाहिए

एक व्यक्ति था. उसके पास नौकरी, घर-परिवार, रुपया-पैसा, रिश्तेदार और बच्चे सभी कुछ था। कहने का सार यह है उस व्यक्ति के पास किसी चीज़ की कोई कमी नही थी। अब जीवन है तो कुछ परेशानियां भी थी उसके जीवन में, जिससे हर पल वह जूझता ही रहता था। वह किसी भी तरह अपनी परेशानियों से मुक्ति चाहता था, कि जीवन में सुख-शांति से रह सके।

एक बार किसी ने उसे बताया की नगर सीमा पर कोई बहुत बड़े संत ठहरे हुए है, जिनके पास हर समस्या और प्रश्न का हल है। इतना सुनते ही वह व्यक्ति भागा-भागा संत की कुटिया में पहुँचा. वहाँ भीड़ बहुत होने के कारण उसकी बारी आते-आते रात हो गई। उसने संत से पूछा, बाबा, मेरे जीवन की परेशानियां कैसे ख़त्म होगी? मैं भी सुख-शांति से जीवन जीना चाहता हूँ।

संत ने कहा, ”इसका उत्तर मैं कल सुबह दूंगा। तब तक तुम एक काम करो. मेरे साथ जो ऊँटों का रखवाला आया था वो बीमार हो गया। तुम आज की रात ऊँटों की देखभाल का जिम्मा ले लो. जब यह सभी ऊँट सो जायें, तब तुम भी सो लेना।

सुबह वह व्यक्ति संत के पास पहुँचा और कहने लगा, मैं तो रात भर जगा रहा, सो ही नही पाया. कभी कोई ऊँट खड़ा हो जाता है तो कभी कोई. एक को बिठाने का प्रयास करता हूँ तो दूसरा खड़ा हो जाता है। कई ऊँट तो बैठना ही नही चाहते तो कई ऊँट थोड़ी देर में अपने आप बैठ जाते है। कुछ ऊँटों ने तो बैठने में बहुत ही समय लिया। मैं तो सारी रात भाग-दौड़ ही करता रहा।

संत ने मुस्कुराहट के साथ कहा, यही तुम्हारे कल के प्रश्नों का उत्तर है. कल पूरी रात का घटनाक्रम तुम्हारा जीवन है। अगर ऊँटों को परेशानियां मान ली जायें, तो समझना आसान होगा कि जीवन में कभी भी किसी भी क्षण सारी परेशानियां ख़त्म नही हो सकती। कुछ ना कुछ हमेशा लगा ही रहेगा. लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नही है कि हम जीवन का आनंद ही ना ले। हमें समस्याओं के बीच रहते हुए भी सुख के पल खोजने होंगे।

संत ने आगे कहा, अगर तुम्हारें जीवन में समस्याओं का ताँता लगा हुआ है तो उन्हें सुलझाने का प्रयास करना चाहिए, लेकिन हर पल उनके पीछे ही नही भागना चाहिए. ऊँटों के व्यवहार से तुम जान गये होंगे कि कुछ समस्याएं कोशिशों से ख़त्म हो जाती है, तो कुछ अपने आप सुलझ जाती है, कुछ पे कोई असर नही होगा और कुछ समय के साथ धीरे-धीरे सुलझ जाएंगी।

लेकिन इस बीच कुछ नई समस्याएं भी जन्म लेगी, जिनका सामना भी ऐसे ही करना पड़ेगा और इस तरह जीवन चलता ही रहेगा। अब यह तुम पर निर्भर करता है कि तुम इस बीच जीवन में आनंद लेते हो या समस्याओं के पीछे हैरान-परेशान व दुखी होकर भागते रहते हो।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Aanad Andar Hai



👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 3 March



👉 आप के निमार्ण-कार्य (भाग २)

आपको निम्न आदतें छोड़ देनी चाहिएं - निराशावादिता, कुढ़न, क्रोध, चुगली और ईर्ष्या। इनका आन्तरिक विष मनुष्य को कभी भी पनपने नहीं देता, समाज में निरादर होता है, आन्तरिक विद्वेष से मनुष्य निरन्तर दग्ध होता रहता है। बात को टालने की एक ऐसी गन्दी आदत है जिससे अनेक व्यक्ति अपना सब कुछ खो बैठे हैं। इनके स्थान पर सहानुभूति, आशावाद, प्रेम, सहनशीलता, संयम की आदतें लोक एवं परलोक दोनों में मनुष्य को सन्तुष्ट रखती हैं। यदि हम आत्मनिर्माण में अपना समय लगायें, तो हमारा जीवन बहुत ऊँचा उठ सकता है।

अमर आत्माओं। जीवन का, उच्च सात्विक और कलात्मक जीवन का निर्माण करो। अपना मानसिक स्तर ऊँचा उठाओ। मानसिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिए स्वाध्याय करो, अधिक से अधिक ज्ञान संचय करो। आत्मोन्नति एवं आत्मतुष्टि के लिए नियमित रीति से आध्यात्मिक ग्रन्थों का पठन-पाठन, अध्ययन, मनन, विद्वानों के सत्संग, भाषण सुनना एक चिर साधना है जिनसे लोग श्रद्धालु होते हैं, संसृति का निर्माण होता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास स्वभाव-निर्माण, चरित्र-निर्माण, सुखी जीवन-निर्माण के लिए विस्तृत कार्य क्षेत्र काम करने के लिए खाली पड़ा है।

अपने भविष्य का निर्माण स्वयं आपके हाथ में है। आज के कार्यों द्वारा आपका भविष्य निर्माण होना है। आप आज जो परिश्रम, और उद्योग कर रहे हैं, उन्हीं के बल पर भविष्य का निर्माण हो सकेगा।

समाज निर्माण कीजिए। आपके समाज में विस्तृत कार्य क्षेत्र हैं जिसमें आपके योग की आवश्यकता है। आपके समाज में इस उन्नत युग में अनमेल विवाह, बाल-विवाह, बहु-विवाह, छूत-अछूत, मजदूर और पूँजीपति, किसान और जमींदार, कृषि की उन्नति, समाज से अशिक्षा को दूर करने की असंख्य छोटी बड़ी अनेक समस्याएं फैली हुई हैं। अपनी जीविका के उपार्जन के पश्चात आप इनमें से कोई भी क्षेत्र छाँट सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 13

👉 दृश्य जीवन की अदृश्य जड़ें

दृश्य की जड़ें हमेशा अदृश्य रहती हैं। पत्तों की हरियाली और रंग-बिरंगे फूलों की खुशबू को लिए झूमते हुए पेड़ों की जड़ें हमेशा जमीन के अन्दर रहती हैं। पत्तों से छलकता पौधों का जीवन, उनकी हरियाली, चमक सभी के जीवन में आनन्द बिखेरती हैं। इनके आस-पास से जो भी गुजरता है, वही इन पौधों के जीवन संगीत को अनुभव करता है। हालांकि इस अनुभूति को पाने वालों में से शायद कुछ को ही पता हो कि इस हरियाली और खुशबू से झरने वाले आनन्द का आधार जमीन के अन्दर है। जिसे सतह से कभी देखा नहीं जा सकता।
  
यह सच तो तब पता चलता है जब कोई इन पेड़ों को, पौधों को उनकी जड़ों से अलग करता है। जड़ों से नाता टूटते ही इन पेड़-पौधों की साँसें टूट जाती हैं। उनकी चेतना और चैतन्यता समाप्त हो जाती है। जमीन से हट जाने पर यही होता है। सारा खेल जड़ों का है। न दिखने पर भी, अदृश्य रहने पर भी, जीवन का सारा रहस्य उन्हीं में है। पेड़-पौधों की ही तरह मनुष्य की भी जड़ें होती हैं। उसके दृश्य जीवन का सारा रहस्य अदृश्य में छुपा होता है। न दिखने वाले संस्कार, कर्मबीज ही जीवन के विविध शुभ-अशुभ घटनाक्रमों में प्रकट होते हैं। यूँ तो चक्र, ग्रन्थियाँ, उपत्यिकायें, ब्रह्मरन्ध्रिकाएँ कहीं ऊपर से नजर नहीं आतीं। परन्तु इन्हीं के माध्यम से हमें विराट्-ब्रह्माण्ड की अदृश्य सूक्ष्मता में व्याप्त प्राण व प्रकाश मिलता है। किसी भी कारण यदि इसमें गतिरोध आ जाए तो दृश्य जीवन का क्रम संकट में पड़ जाता है।
  
आल्वेयर कामू ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि मनुष्य जीवन की एक मात्र-महत्वपूर्ण समस्या दृश्य जीवन की अदृश्य जड़ों को न समझ पाना है। यही वजह है कि अब मनुष्य को जीवन में कोई प्रयोजन नजर नहीं आता। सब कुछ व्यर्थ और निष्प्रयोजन हो गया है। मूल जीवन स्रोत के खो जाने से यह परिणति स्वाभाविक है। समस्या का समाधान तभी सम्भव है जब इन्सान अपनी जड़ें व जमीन को पा ले। ये जड़ें आत्मा व चित्त की हैं और वह जमीन धर्म की है। ऐसा हो जाए तो मनुष्यता में फिर से फूल खिल सकते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २००

👉 इच्छा शक्ति का केन्द्रीकरण

इच्छा शक्ति का केन्द्रीकरण तथा पूरी तत्परता के साथ प्रयत्नशील रहना ही वह आधार है जिसके बल पर इच्छित उपलब्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। मनुष्य उन्हीं वस्तुओं अथवा उपलब्धियों को प्राप्त कर सकता है जिनके लिए वह आग्रहपूर्वक प्रयत्न करता है। अगर किसी लक्ष्य विशेष का निर्धारण न कर काम किया जाए तो उसका परिणाम भी शून्य या नगण्य ही रहेगा और कहना नहीं होगा कि लक्ष्य का निर्धारण तभी होता है जब मन में किसी विशिष्ट आकांक्षा का निवास हो और उसे प्राप्त करने के लिए तत्परता के स्तर की व्यग्रता हो। अनेक जीव-जंतु कीट पतंगे फूलों के आस-पास घूमते रहते हैं, पर उनमें से केवल मधुमक्खी ही शहद निकालती है, क्योंकि उसे मधु प्राप्त करने की आकांक्षा और व्यग्रता रहती है।

उस संबंध में ब्रिटेन के प्रसिद्ध विचारक कार्लायल का कथन है कि एक ही विषय पर अपनी शक्तियों को एकाग्र करने से कमजोर व्यक्ति भी बहुत कुछ कर सकता है, जबकि बलवान व्यक्ति भी यदि अपनी शक्तियों को कई दिशाओं में बिखेर देता है तो वह बलवान होते हुए भी कुछ नहीं कर सकता। एक-एक बूँद पानी अगर एक ही स्थान पर निरंतर पड़ता रहे तो कड़े-से-कड़े पत्थर में भी छेद हो जाता है लेकिन यदि पानी का बड़ा भारी बहाव भी शीघ्रतापूर्वक उसके ऊपर से निकल जाए तो उसका नाम-निशान भी उस पर नहीं दिखाई पड़ता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृ. २०

👉 Think High, Aim High

You may get clay toys with ease. But it’s not so easy to find gold. The tendencies of mind are often downwards and naturally drag it towards harmful actions and sins. However, it requires substantial efforts and zeal to carry out something worth, auspicious and beneficial. For example, the natural flow of water is from higher to lower levels, but the use of powerful pumps etc is required to take it upwards.

Sensual passions, ignorance-driven ambitions, untoward thoughts are hidden enemies that delude the mind of giving ‘pleasure’ but enslave it in a vicious trap. Likewise the gravitational force of the earth, they also have some kind of power of attraction, which pulls more and more tendencies and thoughts of similar kind.

But, the same is true of positive, sane thoughts, aspirations and determination as well; they also attract the likes and create more powerful field of attraction. Once we awaken the will and vigilance to think wisely and practice restraining the accumulated passions, we will begin to experience the transforming effects.

Unchecked accumulation of negative thoughts and vices sooner or later leads to decline, anxiety, despair and sinful sufferings. We should therefore be careful and watch and control our thoughts from this very moment.

📖 Akhand Jyoti,April 1940

मंगलवार, 3 मार्च 2020

Loose Not Your Heart (Day 1 To Day 10) | Pt Shriram Sharma Acharya



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संकल्पवान व्रतशील बनें | Sankalpvaan Vratshil Banen | Pt Shriram Sharma ...



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👉 आप के निमार्ण-कार्य (भाग १)

मानव जीवन के यापन के अनेक भेद-प्रभेद हैं। उनमें नाना प्रकार के कार्य हैं। किंतु एक तत्व प्रत्येक में एक जैसा ही मिलता है। वह है समय का सदुपयोग। कुछ का सम्पूर्ण जीवन खाने कमाने में ही व्यय होता है। कुछ आमोद-प्रमोद ओर मनोरंजन प्रधान जीवन को ही सर्वोपरि मानते हैं। किसी का समय ज्ञान की वृद्धि, वृद्धि की प्रखरता, अध्ययन और आत्मोन्नति में बीतता है।

वास्तव में हमें यह प्रतीत नहीं कि हमें क्या निर्माण कार्य करना है। जीवन तो दीर्घ है। पूर्ण जीवन में हमें कोई ऐसा महान कार्य कर डालना है कि हमारी स्मृति सदा सर्वदा के लिए अमिट बनी रहे। हम में से अधिकाँश ऐसे हैं जो कुछ करना चाहते हैं। उनके मन में लगन है, उत्साह और पर्याप्त प्रेरणा है किन्तु उन्हें निर्माण कार्यों का ज्ञान नहीं है।
निर्माण कार्य! आप गहराई से सोचिये कि संसार में करने के योग्य कितने महत्वपूर्ण कार्य आपके निमित्त रखे हैं? आप जीवन तथा समाज के जिस पक्ष की ओर जायं और निर्माण कार्य मिल जायेंगे, सर्वप्रथम आपको “स्व” अर्थात् स्वयं अपना निर्माण करना है। आप कहेंगे हम तो पहले से ही निर्मित हैं, हम अपने क्या बना सकते हैं? आपके निर्माण के लिए अत्यन्त विस्तृत क्षेत्र है।

आत्म-निर्माण में सर्वप्रथम अपने स्वभाव का निर्माण है। आपको यह देखना है कि कौन कौन-सी दुष्ट आदतें आपको छोड़नी हैं? उनके स्थान पर कौन-कौन शुभ और सात्विक आदतों का विकास करना है? अच्छी आदतों से उत्तम भाव का निर्माण होता है और मनुष्य का दृष्टिकोण बनता है। जैसा दृष्टिकोण होता है, वैसा ही आनन्द मनुष्य को प्राप्त होता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 13

👉 श्वास

श्वास की डोर से जीवन की माला गुँथी है। जिन्दगी का हर फूल इससे जुड़ा और इसी में पिरोया है। श्वासों की लय और लहरें इन्हें मुस्कराहटें देती हैं। इनमें व्यतिरेक, व्यवधान, बाधाएँ-विरोध और गतिरोध होने लगे तो सब कुछ अनायास ही मुरझाने और मरने लगता है। शरीर हो या मन दोनों ही श्वासों की लय से लयबद्ध होते हैं। इसकी लहरें ही इन्हें सींचती हैं, जीवन देती हैं। यहाँ तक कि सर्वथा मुक्त एवं सर्वव्यापी आत्मा का प्रकाश भी श्वासों की डोर के सहारे ही जीवन में उतरता है।
  
श्वासों की लय बदलते ही जीवन के रंग-रूप अनायास ही बदलने लगते हैं। क्रोध, घृणा, करुणा, वैर, राग-रोष, ईर्ष्या-अनुराग प्रकारान्तर से श्वास की लय की भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ ही हैं। यह बात कहने-सुनने की नहीं, अनुभव करने की है। यदि महीने भर की सभी भाव दशाओं एवं अवस्थाओं का चार्ट बनाया जाय तो जरूर पता चल जाएगा कि श्वास की कौन सी लय हमें शान्ति व विश्रान्ति देती है? किस लय में मौन और शान्त, सुव्यवस्थित होने का अनुभव होता है? किस लय के साथ अनायास ही जीवन में आनन्द घुलने लगता है? ध्यान और समाधि भी श्वासों की लय की परिवर्तनशीलता ही है।
  
श्वास की गति वलय को जागरूक हो परिवर्तित करने की कला ही तो प्राणायाम है। यह मानव द्वारा की गयी अब तक की सभी खोजों में महानतम है। यहाँ तक कि चाँद और मंगल ग्रह पर मनुष्य के पहुँच जाने से भी महान्। क्योंकि शरीर से मनुष्य कहीं भी जा पहुँचे, वह जस का तस रहता है। परन्तु श्वास की लय के परिवर्तन से तो उसका जीवन ही बदल जाता है। हालांकि यह लय परिवर्तन होना चाहिए आन्तरिक होशपूर्वक, जो प्राणायाम की किसी बँधी-बँधायी विधि द्वारा सम्भव नहीं है। यदि विधि ही खोजनी हो, तो प्रत्येक श्वास के साथ होशपूर्वक रहना होगा। और साथ ही श्वास-श्वास के साथ भगवन्नाम के जप का अभ्यास करना होगा। ऐसा हो तो श्वासों की लय के साथ जीवन की लय बदल जाती है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९९

👉 First Give, Then Gain

Great personalities always appeal and motivate people in their contact to give something for noble causes. They themselves sacrifice everything they had. This is what makes them great. Thorough pondering over this fact has taught me that there is no religious duty greater than giving or sacrificing (for others’ welfare), which we can do any time (provided we have the will and attitude). There is no better mode than renunciation (of selfish possessions and attachments) for elimination of evil tendencies and untoward accumulation in the mind.

If you want to acquire precious knowledge, attain people’s respect, achieve something great, then first learn to give what best you can for the society, for altruistic service. Donate your talents, intellect, time, labor, wealth, whatever potentials or resources you have for the betterment of the world…; you will get manifold of that in return… Gautam Buddha had renounced the royal throne; Gandhi had left the brilliant career, wealth, comforts… As the world has witnessed, what they were rewarded in return was indeed immeasurable,immortal…

It is worth recalling the beautiful verse of renowned poet Rabindranath Tagore here, which says – He spread his hands open and asked for something… I took out a tiny piece of grain from my bag and kept on His palm. At the end of the day, I found a golden piece of same size in my bag. I cried – why didn’t I empty my bag for Him, which would have transformed me, the poor man into a King of Wealth?

📖 Akhand Jyoti, March. 1940

👉 क्रोध के दो मिनट

एक युवक ने विवाह के बाद दो साल बाद परदेस जाकर व्यापार की इच्छा पिता से कही. पिता ने स्वीकृति दी तो वह अपनी गर्भवती को माँ-बाप के जिम्मे छोड़कर व्यापार को चला गया परदेश में मेहनत से बहुत धन कमाया. 17 वर्ष धन कमाने में बीते गए तो सन्तुष्टि हुई और वापस घर लौटने की इच्छा हुई. पत्नी को पत्र लिखकर आने की सूचना दी और जहाज में बैठ गया।

उसे जहाज में एक व्यक्ति मिला जो दुखी मन से बैठा था. सेठ ने उसकी उदासी का कारण पूछा तो उसने बताया कि इस देश में ज्ञान की कोई कद्र नही है। मैं यहां ज्ञान के सूत्र बेचने आया था पर कोई लेने को तैयार नहीं है. सेठ ने सोचा इस देश में मैने तो बहुत धन कमाया. यह तो मेरी कर्मभूमि है. इसका मान रखना चाहिए. उसने ज्ञान के सूत्र खरीदने की इच्छा जताई. उस व्यक्ति ने कहा- मेरे हर ज्ञान सूत्र की कीमत 500 स्वर्ण मुद्राएं है।

सेठ को सौदा महंगा लग तो रहा था लेकिन कर्मभूमि का मान रखने के लिए 500 मुद्राएं दे दीं. व्यक्ति ने ज्ञान का पहला सूत्र दिया- कोई भी कार्य करने से पहले दो मिनट रूककर सोच लेना. सेठ ने सूत्र अपनी किताब में लिख लिया। कई दिनों की यात्रा के बाद रात्रि के समय अपने नगर को पहुंचा. उसने सोचा इतने सालों बाद घर लौटा हूं क्यों न चुपके से बिना खबर दिए सीधे पत्नी के पास पहुंच कर उसे आश्चर्य उपहार दूं।

घर के द्वारपालों को मौन रहने का इशारा करके सीधे अपने पत्नी के कक्ष में गया तो वहां का नजारा देखकर उसके पांवों के नीचे की जमीन खिसक गई. पलंग पर उसकी पत्नी के पास एक युवक सोया हुआ था. अत्यंत क्रोध में सोचने लगा कि मैं परदेस में भी इसकी चिंता करता रहा और ये यहां अन्य पुरुष के साथ है। दोनों को जिन्दा नही छोड़ूंगा. क्रोध में तलवार निकाल ली. वार करने ही जा रहा था कि उतने में ही उसे 500 अशर्फियों से प्राप्त ज्ञान सूत्र याद आया- कोई भी कार्य करने से पहले दो मिनट सोच लेना. सोचने के लिए रूका. तलवार पीछे खींची तो एक बर्तन से टकरा गई।

बर्तन गिरा तो पत्नी की नींद खुल गई. जैसे ही उसकी नजर अपने पति पर पड़ी वह ख़ुश हो गई और बोली- आपके बिना जीवन सूना सूना था. इन्तजार में इतने वर्ष कैसे निकाले यह मैं ही जानती हूं। सेठ तो पलंग पर सोए पुरुष को देखकर कुपित था. पत्नी ने युवक को उठाने के लिए कहा- बेटा जाग. तेरे पिता आए हैं. युवक उठकर जैसे ही पिता को प्रणाम करने झुका माथे की पगड़ी गिर गई. उसके लम्बे बाल बिखर गए।

सेठ की पत्नी ने कहा- स्वामी ये आपकी बेटी है. पिता के बिना इसकी मान को कोई आंच न आए इसलिए मैंने इसे बचपन से ही पुत्र के समान ही पालन पोषण और संस्कार दिए हैं। यह सुनकर सेठ की आंखों से आंसू बह निकले. पत्नी और बेटी को गले लगाकर सोचने लगा कि यदि आज मैने उस ज्ञानसूत्र को नहीं अपनाया होता तो जल्दबाजी में कितना अनर्थ हो जाता. मेरे ही हाथों मेरा निर्दोष परिवार खत्म हो जाता।

ज्ञान का यह सूत्र उस दिन तो मुझे महंगा लग रहा था लेकिन ऐसे सूत्र के लिए तो 500 अशर्फियां बहुत कम हैं. ज्ञान अनमोल है।

 इस कथा का सार यह है कि जीवन के दो मिनट जो दुःखों से बचाकर सुख की बरसात कर सकते हैं. वे क्रोध के दो मिनट हैं।

भागवत में भी यही संदेश दिया गया है. कहा गया है कि यदि तुम्हारे काम से किसी का अपकार होता है तो उस काम को एक दिन के लिए टाल दो. यदि उपकार होता हो तो तुरंत करो ताकि कहीं उपकार का विचार न बदल जाए।

सोमवार, 2 मार्च 2020

👉 शान्त विचारों की ठोस शक्ति (अंतिम भाग)

जिस काम को मनुष्य अपने आन्तरिक मन से नहीं करना चाहता, पर दिखावे के रूप में उसे बाध्य होता है तो उसे अनेक प्रकार की रुकावटें उत्पन्न होती हैं। ये रुकावटें उसे दर्शाती हैं कि तुम्हारा आन्तरिक मन उक्त काम के प्रतिकूल है। शान्त होकर यदि मनुष्य अपनी किसी प्रकार की भूल अथवा कार्य की विफलता पर विचार करें तो वह उसका कारण अपने आप ही पावेगा। जो काम अनुद्विग्न मन होकर किया जाता है, उसमें आत्म-विश्वास रहता है और उसमें सफलता अवश्य मिलती है। शान्त मन द्वारा विचार करने से स्मृति तीव्र हो जाती है। और इन्द्रियाँ स्वस्थ हो जाती हैं।

शान्त विचारों का चेतन मन नहीं होता। शान्त विचार ही आत्मनिर्देश शक्ति हैं। इन विचारों को प्राप्त करने के लिए वैयक्तिक इच्छाओं का नियन्त्रण करना पड़ता है। जिस व्यक्ति की इच्छायें जितनी ही नियंत्रित होती हैं, जिस मनुष्य में जितनी वैराग्य की अधिकता होती है उसके शान्त विचारों की शक्ति उतनी ही अधिक प्रबल होती है। जो मनुष्य अपने भावों के वेगों को रोक लेता है वह उन वेगों की शक्ति को मानसिक शक्ति के रूप में परिणत कर लेता है। इच्छाओं की वृद्धि से इच्छा शक्ति का बल कम होता है और उसके विनाश से उसकी शक्ति बढ़ती है। इच्छाओं की वृद्धि शान्त विचारों का अन्त कर देती है जिस मनुष्य की इच्छायें जितनी ही अधिक होती हैं उसे भय, चिन्ता, सन्देह और मोह भी उतने ही अधिक होते हैं। भय, चिन्ता, सन्देह और मोह से मनुष्य की आध्यात्मिक शक्ति का ह्रास होता है। अतएव ऐसे व्यक्ति से संकल्प फलित नहीं होते। वह जो काम हाथ में लेता है उसे पूरे मन से नहीं करता। अधूरा काम अथवा आधे मन से किया गया काम कभी सफलता नहीं लाता। अधिक मन से किये गये कार्य में मनुष्य का चेतन मन से कार्य करता है पर अचेतन मन उसकी सहायता के लिये अग्रसर नहीं होता। ऐसी अवस्था में मनुष्य को शीघ्रता से थकावट आ जाती है। और वह अपने कार्य को अधूरा छोड़ने के लिये बाध्य हो जाता है।

जिस प्रकार शान्त विचार मनुष्य के स्वभाव को बदल देते हैं और संपर्क में आने वाले व्यक्तियों को प्रभावित करते हैं, उसी प्रकार दूर रहने वाले व्यक्ति के हृदय को भी प्रभावित करते हैं एकान्त में हम किसी भी व्यक्ति का चिन्तन करके उसके मन से अपने मन का सम्बन्ध जोड़ सकते हैं। ऐसा करने पर हम उससे वही विचार करवा सकते हैं जो कराना चाहते हैं। किसी व्यक्ति के प्रति नित्यप्रति हमारे हृदय में आने वाले विचार उस व्यक्ति को प्रभावित करते हैं। वह हमारे विषय में भी वैसा सोचने लगता है जैसा कि हम उसके विषय में सोचते हैं। जितना ही हम इस सिद्धान्त पर विश्वास करते हैं कि रेडियो की लहरों की भाँति विचारों की लहरें दूर-दूर के लोगों का प्रभावित करती हैं उतना ही हम प्रत्यक्ष रूप से अपने विचारों द्वारा दूसरे लोगों को प्रभावित करने में समर्थ होते हैं। दूसरों के कल्याण के विचार जितने बली होते हैं उतने अकल्याण के विचार नहीं होते अतएव कल्याण के सभी विचारों से अवश्य लाभ होता है।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 12

रविवार, 1 मार्च 2020

👉 Quest for Joy

Man wanders all the time, throughout his life, in search of joy, blissful peace, but remains dismayed and astray…. Acquisition of hoards of wealth, worldly comforts, good health, delicious food, palatial house, vehicles, servants, gorgeous cloths, beauty, beloved family, faithful friends, supporters all around, powers, prestige, name and fame, security…., and what not he looks for? People who lack in any of these strive for their possession; those, who already have, try to possess more with new passions…

This scenario is like that of the tale of the swan (flamingo), which is hunting for the pearl since Ages, but finds nothing but a drop of dew… Why? Because, it did not really search for the pearl; did not even turn his face in the direction of the grand Ocean “Mansarovar” where the pearl is hidden in the depths… It did not gather the courage and strength to fly so long… Short-sighted intellect and pleasure-hungry mind advised it – “what is the guarantee that you will find that unseen “Mansarovar”; and who knows whether there will really be any pearl and you would trace it” so it satisfied itself with the shining drops of dew; licked it and thought it has quenched the thirst…; it flew for sometime and the thirst recurred with greater intensity. The cycle continued…

This is what happens with most of us who keep searching for ‘immortal’ joy in the mirage of perishable world, keep accumulating more of what gives only a momentary pleasure but keeps us away from the sight of real bliss…

📖 Akhand Jyoti, March. 1940

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

👉 शान्त विचारों की ठोस शक्ति (भाग २)

गम्भीर परिस्थितियों में मन का शान्त रहना इस बात का प्रतीक है कि व्यक्ति को किसी भारी व्यक्ति का सहारा मिल गया है। शान्त मन रहने से प्रतिकूल परिस्थितियाँ थोड़े ही काल में अनुकूल परिस्थितियों में परिणत हो जाती हैं। शान्त लोगों की शक्ति का दूसरे लोगों के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वास्तव में हमारी ही शक्ति दूसरे की शक्ति के रूप में प्रकाशित होती है। यदि किसी व्यक्ति का निश्चय इतना दृढ़ हो कि चाहे जो परिस्थितियाँ आवें उसका निश्चय नहीं बदलेगा तो वह अवश्य ही दूसरे व्यक्तियों के विचारों को प्रभावित करने में समर्थ होगा। जितनी ही किसी व्यक्ति की मानसिक दृढ़ता होती है उसके विचार उतने ही शान्त होते हैं। और उसकी दूसरों को प्रभावित करने की शक्ति उतनी ही प्रबल होती है। शान्त विचारों का दूसरों पर और वातावरण पर प्रभाव धीरे-धीरे होता है। उद्वेगपूर्ण विचारों का प्रभाव तुरन्त होता है। हम तुरन्त होने वाले प्रभाव से विस्मित होकर यह सोच बैठते हैं कि शान्त विचार कुछ नहीं करते और उद्वेगपूर्ण विचार ही सब कुछ करते हैं। पर जिस प्रकार किसी बीज को वृक्ष रूप में परिणत होने के लिए शान्त शक्तियों को काम करने की आवश्यकता होती है, इसी प्रकार किसी विचार को फलित होने के लिए शान्त होने की आवश्यकता होती है और उसका कार्य अवश्य जगत में होता है।

शान्त विचारों से शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन हो जाते हैं। लेखक का एक मित्र 20 वर्ष का युवक हो चुका था। इस समय भी वह ऊँचाई और मोटाई में एक चौदह वर्षीय बालक के समान लगता था। उसने किसी शुभ चिन्तक के सुझाने पर नियमित रूप से व्यायाम करना प्रारम्भ किया। थोड़े ही दिनों में वह चार इंच बढ़ गया और उसका शरीर भी पुष्ट हो गया। उसकी समझ थी कि व्यायाम ने उसे बढ़ा दिया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि व्यायाम से उसे लाभ हुआ, पर उससे भी अधिक लाभ उसके निश्चय से हुआ। इस निश्चय के कारण प्रतिदिन के शान्त विचार उसकी भावना को प्रयत्न करते गये और इस प्रकार उसके शरीर में मौलिक परिवर्तन होते गये।

हम जो कुछ सोचते हैं उसका स्थायी प्रभाव हमारे ऊपर तथा दूसरों के ऊपर पड़ता है। शान्त विचार धीरे-धीरे हमारे मन को ही बदल देते हैं। जैसे हमारे मन की बनावट होती है वैसे ही हमारे कार्य होते हैं। और हमारी सफलता भी उसी प्रकार की होती है। हम अनायास ही उन कार्यों में लग जाते हैं जो हमारी प्रकृति के अनुकूल हैं, और उन कार्यों से डरते रहते हैं जो हमारी प्रकृति के प्रतिकूल हैं। अपने स्वभाव को बदलना हमारे हाथ में है। यह अपने शान्त विचारों के कारण बदला जा सकता है। स्वभाव के बदल जाने पर मनुष्य को किसी विशेष प्रकार का कार्य करना सरल हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 11

👉 आत्म विश्वास ईश्वर का अजस्र वरदान

पुलिस का सशस्त्र गारद साथ रहने पर सुरक्षा की निश्चिंतता हो जाती है और निर्भय आश्वस्त रहा जा सकता है। जिसे ईश्वर पर उसकी सर्व शक्ति सत्ता पर विश्वास है उसे किसी से भी डरना न पड़ेगा। जिसे ईश्वर पर भरोसा है और जो उसे अपने भीतर हर घड़ी विद्यमान अनुभव करता है उसे आत्म विश्वास की कमी क्यों रहेगी? ऊपर से— अपनी महानता और सम्भावना से आस्था खो बैठा उसे नास्तिक के अतिरिक्त और क्या कहा जायगा?

जो अपने ऊपर भरोसा करता है, उसी पर दूसरे भी भरोसा करते हैं। जो अपनी सहायता आप करता है, उसी की सहायता ईश्वर भी करता है। हो सकता है कि कोई निष्ठावान असफल रहा है। सम्भव है किसी कुशल किसान की फसल मारी जाय पर जिनने भी कृषि में कमाई की है उनमें से प्रत्येक को जोतने और बोने का श्रम करना पड़ा।

आत्म विश्वास ही शक्ति का स्रोत है। प्रगति के किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकना उसी के सहारे सम्भव हो सकता है। जो ईश्वर भाग्य का निर्माण करता है उसका दूसरा नाम आत्म विश्वास है। उसी की प्रेरणा से ऐसे प्रचण्ड पुरुषार्थ का उद्भव होता है। जिसके लिए दुर्गम पर्वतों को भी रास्ता देना पड़े। वस्तुतः ईश्वर का एकमात्र दिव्य उपहार जो मनुष्य को मिलता है— आत्म विश्वास ही है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जून 1974 पृष्ठ 1

👉 Rise! Have Courage

Please Note! Adversities and obstructions are there for your own good. They occur to activate your strength and trigger its constructive use. Hidden beneath them is the spring of joy. Those who have never faced any hindrances or struggled against hardships would not know the real taste of happiness and success in life. Only those who have accepted these challenges with courage and stability and conquered over against struggles in their lives are worthy of being called achievers, distinguished heroes. It is only the lives of such great people that deserve to be dignified.

So don’t loose heart. Awaken! Rise! And look at the Almighty – the Divine Light of your Life-Force. God has not sent you in human form without any purpose. He has endowed you with immense potentials; it’s your duty to make use of them. Sufferings and sorrows surface in our world only until we don’t sacrifices our narrow self-interests for greater aims in life. A sapling sprouts and a tree grows from only that seed which dissolves self-existence in the soil; flowers and fruits illustrate its accomplishments and expand its glory.

So, Be Happy and face all testing moments with smile and courage. Have unflinching faith in the eternal truth that your soul is omnipotent. This is what corresponds to having faith in God. The force of this intrinsic faith would wane out all your fears and weaknesses. Its impetus will awaken your inner strength by which you can eliminate all hindrances and win all battles of life.

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1940

👉 अद्वैत का ज्ञान - भक्ति की अनन्यता

अद्वैत का ज्ञान दरअसल अपनी आत्मा और आत्मीयता के अनन्त असीमित विस्तार का अनुभव है। ऐसा अनुभव जिसमें जड़-चेतन सभी स्वयं की आत्मचेतना में समाए नजर आते हैं। पर्वत-नदी-झरने, वृक्ष-वनस्पति, देव-दानव-मानव, पशु-पक्षी यहाँ तक कि कीट-पतंगों में अपनी ही आत्मा प्रकाशित नजर आती है। छोटे-बड़े, ऊँच-नीच, कुल-जाति यहाँ तक कि जड़-चेतन का कोई भेद यहाँ मिथ्या और मायिक अनुभव होता है। आत्मा का यह अनन्त विस्तीर्ण अनुभव ही ब्रह्म है। जिन्हें कठिन तप से यह अनुभूति मिली उन्होंने इसे अभिव्यक्त करते हुए कहा- ‘अहं ब्रह्मास्मि’।
  
परन्तु जिन्होंने तप और साधना को दरकिनार कर केवल पोथियों के पन्ने उलटे उन्होंने इस महान् अनुभव को अपने तर्कों से विकृत और भोंड़ा बना दिया। वे सब ब्रह्मास्मि को भूल अहं में अटक गए। अपनी इस भटकन को उन्होंने सही साबित करने के लिए शास्त्र रचे, तर्क जाल फैलाया। इसका प्रभाव जहाँ और जिन पर भी पड़ा उन सभी के हृदय संवेदना रस से शून्य होते गए। इससे कुछ ऐसा हो गया जैसे कि उतप्त गर्मी के दिन आते हैं और सूरज की तपन से धरती सूख जाती है और दरारें पड़ जाती है।
  
इस शुष्कता से, कण्ठ सुखाने वाली तृषा से उबरने के लिए भक्ति की वर्षा चाहिए। अद्वैत ज्ञान के अनुभव को विकृत बनाने वाले सभी प्रयासों को समाप्त करने के लिए अनन्य भक्ति चाहिए। अनन्य का अर्थ है, अन्य अन्य न रहा, अब अनन्य हो गया। कहीं कोई अब दूसरा न रहा, सभी एक हो गए। इस पथ पर चलने वाला भक्त पहले भक्ति में भीगकर स्वयं को प्रभु के साथ अनन्य अनुभव करता है। फिर वह अपने प्रियतम परमात्मा में अनन्त-अनन्त ब्रह्माण्डों की एकात्मता को अनुभव करता है। वह यह अनुभव कर लेता है कि अहंता के विसर्जित होते ही परमात्म चेतना का अद्वैत स्वतः प्रकट हो जाता है। अद्वैत की इस मिठास में उसे केवल ब्रह्मास्मि का अनुभव होता है, अहं तो यहाँ ढूँढने पर भी नहीं मिलता।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९८

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

👉 रूपान्तरण

प्रभु का स्मरण सतत् हो, उनमें समर्पण निरन्तर हो, तो जीवन में अनोखा रूपान्तरण घटित होता है। कुछ ऐसा, जैसे कि मिट्टी फूल बन जाती है और गन्दगी खाद बनकर सुगन्ध में बदल जाती है। मनुष्य के विकार भी शक्तियाँ हैं, जो प्रभु के स्मरण और प्रभु में समर्पण से रूपान्तरित हो जाती हैं। आज जो मनुष्य में पशु जैसा दिखता है, वही दिशा परिवर्तित होने से दिव्यता को उपलब्ध हो जाता है।
  
जीवन का आध्यात्मिक सच यही है कि इसमें जो अदिव्य दिखता है, वह भी बीज रूप में दिव्य है। अपने दृष्टिकोण में यदि आध्यात्मिकता आ सके तो पता चलता है कि वस्तुतः अदिव्य एवं अपवित्र कुछ भी नहीं है। सभी कुछ यहाँ दिव्य है। भेद केवल उस दिव्यता की अभिव्यक्ति के हैं।
  
भगवान् का स्मरण और भगवान् में समर्पण होने से कुछ भी घृणा, द्वेष एवं वैर योग्य नहीं रह जाता। सच तो यह है कि जो एक छोर पर पशु है, वही दूसरे छोर पर प्रभु है। पशु और प्रभु में विरोध नहीं विकास है। यह सत्य आत्मसात हो सके तो फिर आत्मदमन, उत्पीड़न और संघर्ष व्यर्थ हो जाते हैं। भला कहीं कोई अपने को टुकड़ों में तोड़कर सुखी होता है। यह तरीका आत्मशान्ति का नहीं बल्कि आत्मसन्ताप का है। इससे ज्ञान नहीं अज्ञान गहरा होता है।
  
स्वयं की चेतना के किसी अंश को नष्ट नहीं किया जा सकता। इसका दमन भी अधिक समय के लिए सम्भव नहीं है। क्योंकि जिसका दमन किया गया है, जिसे हराया गया है, उसका निरन्तर दमन करना पड़ता, उसे निरन्तर पराजित करना होता है। यह पूर्ण विजय का मार्ग का नहीं है। पूर्ण विजय का मार्ग तो रूपान्तरण है। इसमें दमन नहीं बोध है। इसमें गन्दगी को हटाना नहीं उसे खाद बनाना होता है। परमात्मा का निरन्तर स्मरण और उनमें सतत् समर्पण ही वह रसायनशास्त्र है, जिससे यह सम्भव है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९७

👉 शान्त विचारों की ठोस शक्ति (भाग १)

हमारे मन में दो प्रकार के विचार आते हैं- एक उद्वेगयुक्त और दूसरे शान्त। भय, क्रोध, शोक लोभ आदि मनोवेगों से पूरित विचार उद्वेगयुक्त विचार हैं और जिसके विचारों में मानसिक उद्वेगों का अभाव रहता है उन्हें शान्त विचार कहा जाता है। हम साधारणतः विचारों के बल को उससे सम्बन्धित उद्वेगों से ही नापते हैं। जब हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति क्रोध में आकर कोई बात कह रहा है तो हम समझते हैं कि वह व्यक्ति अवश्य ही कुछ कर दिखावेगा। पर क्रोधातुर व्यक्ति से उतना अधिक डरने का कारण नहीं जितना कि शान्त मन के व्यक्ति से डरने का कारण है। भावावेश में आने वाले व्यक्तियों के निश्चय सदा डावाँडोल रहते हैं। भावों पर विजय प्राप्त करने वाले व्यक्ति के निश्चय स्थिर रहते हैं। वह जिस काम में लग जाता है उसे पूर्ण करके दिखाता है।

उद्वेगपूर्ण विचार वैयक्तिक होते हैं उनकी मानसिक शक्ति वैयक्तिक होती है शान्त विचार वृहद मन के विचार हैं उनकी शक्ति अपरिमित होती है। मनुष्य जो निश्चय शान्त मन से करता है उसमें परमात्मा का बल रहता है और उसमें अपने आपको फलित होने की शक्ति होती है। अतएव जब कोई व्यक्ति अपने अथवा दूसरे व्यक्ति के लिये कोई निश्चय करता है और अपने निश्चय में अविश्वास नहीं करता तो निश्चय अवश्य फलित होता है। शान्त विचार सृजनात्मक और उद्वेगपूर्ण विचार प्रायः विनाशकारी होते हैं। किसी भी प्रकार के विचार में अपने आपको फलित करने की शक्ति होती है। पर यह शक्ति सन्देह के कारण नष्ट हो जाती है। जिन विचारों का हेतु वैयक्तिक होता है उनमें अनेक प्रकार के सन्देह उत्पन्न होते हैं। अतएव उनके विचार की शक्ति नष्ट हो जाती है। जब कोई मनुष्य अपने विचारों में किसी भी प्रकार का संदेह नहीं लाता तो वे विचार स्वतः ही फलित हो जाते हैं। सन्देहों को रोकने के लिए अपनी आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास होना आवश्यक है।

अपने आपकी ही अनुकूलता ईश्वर और प्रकृति की अनुकूलता के विश्वास के रूप में मनुष्य की चेतना को समक्ष आती हैं। ये भावनायें अच्छे तन-मन की अनुभूति के प्रतिभास मात्र हैं। मनुष्य अपनी आन्तरिक अनुभूति के अनुसार अनेक प्रकार की कल्पनाओं को रचता है। इन कल्पनाओं की वास्तविकता उसकी अज्ञात वास्तविक प्रेरणा पर निर्भर करती है। कल्पनायें वैसी ही आती हैं जैसी उसकी आन्तरिक प्रेरणा होती है। मनुष्य की प्रेरणा ही उसे आशावादी और निराशावादी बनाती है। अर्थात् मन का जैसा रुख रहता है उसी प्रकार की कल्पनायें मन करने लगता है। ईश्वरवादी विश्वास करने लगता है कि ईश्वर उसे आगे ले जा रहा है और जड़वादी विश्वास करने लगता है कि प्रकृति उसे आगे ले जा रही है। प्रगति और अप्रगति के सभी प्रमाण मनुष्य के रुख पर निर्भर रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 10

Q.9. What is “VAAM MARG”? (Part 9)

Ans. Yogic Sadhanas are carried out in two ways. These are designated as the ‘Dakchin Marg’ and ‘Vaam Marg’ or Tantra. References in this book pertains to the Dakchin Marg - which is the process (Sadhana) of attracting the omnipresent powers of divinity, interacting with them by developing spiritual magnetism and cultivating paranormal faculties therefrom. The Vaam Marg, on the other hand, is the technique of pulling out bio-energy from living beings and utilizing it for exercising psychic control over others and for exorcist activities.

The source of Tantrik power is not the universal divine powers, but the physical energy produced by friction of subtle particles of nature rotating around their axes at tremendous speeds. Tantriks call this energy as Durga or Kali.

In practice, the Tantrik excites the bio-energy of an animate being  by violently killing it or inflicting excruciating pain on it by extraction of flesh or blood. It is tempting for some highly egoistic and ambitious persons to acquire extraordinary powers  through Tantra, But its practise is extremely complex and dangerous. Only an extraordinarily courageous and fearless person learning under an expert can achieve success in Tantra. There are numerous instances of persons becoming mentally deranged, permanently paralysed, sick, losing power of speech, sight or hearing in course of Tantrik practices. The details of Tantra have, therefore, been kept secret and out of reach of common man. In ancient times Tantra was used for welfare activities like self-defence, espionage, treatment of terminally ill and for enhancing the intelligence quotient of mentally retarded. The practice is now extremely rare.  

Q.10. According to the Law of Karma, everyone has to face the consequences of one’s good or bad deeds. How is it then possible for Gayatri to absolve one from sins?

Ans. It has been described that Gayatri dispels the darkness of sin. It does not mean destruction of the result of sin. It means getting rid of sinful tendencies.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 90

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

I Will Use You, I Will Not Let You Sit Idle | Pt Shriram Sharma Acharya



Title

👉 आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग (अन्तिम भाग)

अधिकाँश साधक कुछ सेवा के बाद ही शीघ्र ही ईश्वर प्राप्ति के लिये अधीर हो जाते हैं यह निष्काम सेवा या कर्मयोग का लक्षण नहीं, कर्मयोगी वे हैं जो नम्रता तथा आत्मभाव से मनुष्यों की सेवा करते हैं। वही वास्तव में अखिल विश्व के नायक बन जाते हैं। सब लोग उनकी बड़ाई तथा आदर करते हैं। जितना ही आत्मभाव से सेवा करने जायें आप उतनी ही विशेष शक्ति, पौरुष, तथा योग्यता प्राप्त करेंगे। आप इसका अभ्यास करके ही स्वयं अनुभव प्राप्त करें।

जब दूसरों की भलाई करने का भाग मनुष्य का एक अंग ही बन जाता है, तब रेचक मात्र ही किसी प्रकार की कामना नहीं रह जाया करती है। उनको दूसरों की सेवा तथा भलाई करने से ही अत्यन्त आनन्द का अनुभव हुआ करता है। दृढ़ निष्काम सेवा करने से एक विचित्र प्रकार की प्रसन्नता तथा आनन्द हुआ करता है। उनको निष्काम तथा निस्वार्थ कर्म करने से आन्तरिक आध्यात्मिक शक्ति और बल होता है।

आप दूसरों की सेवा करते समय बीज या निराशा, विरक्ति तथा उदासी के भावों को कभी मन में भी न लाया करें। सेवा में ही आनन्दित होकर सेवा किया करें। दूसरों के सेवा करने के लिए सदा प्रस्तुत रहा करें। सेवा करने के अवसर को ढूँढ़ा करें। एक भी अवसर न चूके। सेवा करने का अवसर स्वयं बना दिया करें।

कर्मयोग के अभ्यास में किया गया परिश्रम कभी निष्फल नहीं होता। यह असाध्य भी नहीं है इसमें अपराध तो होता ही नहीं उल्टे इसका थोड़ा भी अभ्यास करते रहने से जन्म-मरण रूप दुःख तथा उसकी सहयोगिनी बुराइयों के ही निवृत्ति होती है। निदान “आत्मज्ञान” की प्राप्ति कर्मयोग से होती है। यहाँ अनिश्चित कुछ भी नहीं है। कर्मयोग का यह आध्यात्म अंत में आत्मानन्द को परमगति तक पहुँचा देता है।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 8

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 8)

Q.8. How is Gayatri relevant for humankind in the present times ?

Ans.  Each individual is born with certain characteristic traits and IQ., all of which can not be explained as genetic inheritance. For instance, genetics has no explanation for the rare birth of a saint, genius or an idiot in several generations of a family. It is also a fact that many of these exclusive personal traits change in course of growth of  the person from childhood to adulthood. Modern scientists generally ascribe these changes to social environment and education. The science of today is, however, unable to throw light on the reasons for presence or absence in an individual of characteristics like empathy, compassion, large-heartedness, tolerance, courage, equanimity and creativity. Nor has modern science succeeded in devising gadgets or courses for inculcating these virtues.

The spiritual masters in the East on the other hand, maintain that the Absolute Repository of all virtues, which we call as GOD, is that source from which it is possible to acquire positive traits by personal endeavour through specific Yogic exercises under the guidance of a Guru. This is the objective of all spiritual pursuits in the East.

Ever since the dawn of civilization in India, it has been emphasised that no amount of material progress in science and technology can bring about lasting happiness, peace and prosperity for humankind, unless the individual - the unit of family, society, nation and global population, is transformed by infusion of positive thinking. The so-called progress in the West is also responsible for two world wars, nuclear-proliferation, environmental pollution, disparity in living standards, conflicts, poverty and disease all-over the world.

Gayatri is a panacea for all problems - Personal, Family, Social, National or Global : The Gayatri Sadhana is a product of thousands of years of research. Following Gayatri Yoga any individual, irrespective of caste, class, colour, nationality, social status and religious  affiliation can acquire strength from the Indwelling Divinity for solving all problems of life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 89

👉 समय का सदुपयोग

हम देखते हैं, बहुत से लोग, जिनके पास काम नहीं होता या कम होता है, वे लोग फालतू के काम करते रहते हैं। कोई ताश के पत्ते खेलता है, कोई गार्डन में व्यर्थ ही इधर उधर बैठा रहता है, कोई जुआ खेलता है, कोई सिगरेट बीड़ी पीता है, कोई शराब पीता है। बस यूँ ही अनुपयोगी/व्यर्थ के कार्य करता रहता है।

जब उससे पूछा जाता है कि आप क्या कर रहे हैं? तो वह उत्तर देता है, कुछ नहीं, बस यूं ही समय काट रहे हैं. तो संसार में बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनके पास करने के लिए कोई काम नहीं है। उनके पास समय तो है, पर काम नहीं है। अब उस समय को काटने के लिए वे इधर-उधर कुछ भी करते रहते हैं।

ऐसा करने से उनका समय तो कट जाता है, परंतु समय भी बहुत खतरनाक हथियार है, बहुत तेज धार वाला है। जब मनुष्य समय को काटता है तो समय भी मनुष्य का बहुत कुछ काटता है. उसकी संपत्ति नष्ट करता है, उसका स्वास्थ्य नष्ट करता है, उसकी आयु को नष्ट करता है, और भी बहुत सारी हानियां करने के बाद ही समय कटता है।

इसलिए समय का सदुपयोग करें। खाली न बैठें। कुछ काम ढूंढें। कुछ अपने लिए करें, कुछ परिवार के लिए करें, कुछ समाज के लिए करें, कुछ राष्ट्र के लिए करें, कुछ प्राणियों की रक्षा के लिए काम करें, रोगियों विकलांगों की सहायता करें, इत्यादि। यदि आप इस प्रकार का कोई उपयोगी काम ढूंढेंगे, तो बहुत से काम मिल जाएंगे। उन कामों को करके समय का सदुपयोग करें, व्यर्थ समय को ना काटें। अन्यथा काफी सारा समय काटने के बाद आपको पता चलेगा, कि आपने समय को नहीं काटा, बल्कि समय ही आपको काट गया।

👉 संकट के क्षण

संकट के क्षण बेशकीमती हैं। जीवन में इनका महत्त्व व मोल बहुत अधिक है। इतना अधिक कि इन्हें अतिमहत्त्वपूर्ण और अनमोल कहा जा सके। जब सब कुछ व्यवस्थित होता है और कहीं कोई संकट नहीं होता, तो जीवन चेतना सुप्त व मृतप्राय हो जाती है। जब कुछ बदल नहीं रहा होता है और पुराने की पकड़ मजबूत होती है तो लगभग असम्भव हो जाता है स्वयं को बदलना। लेकिन जब हर चीज अस्त-व्यस्त होती है, जीवन में कुछ भी स्थायी, निश्चित एवं सुरक्षित नहीं होता, कोई नहीं जानता कि अगले क्षण क्या होगा? ऐसे संकट के क्षणों में जीवन स्वतन्त्र होता है परिवर्तन के लिए, रूपान्तरण के लिए।
  
संकट के बिना जीवन लगभग जेल जैसा है। जिसमें बस परम्पराओं, रीतियों, युगों पुरानी सड़-गल चुकी व्यवस्थाओं को विवशताओं के साथ निभाया जाता है। इस जेल से भाग निकलना तकरीबन असम्भव होता है। लेकिन जैसे ही संकट आया कि सब बँधी-बँधायी व्यवस्थाएँ टूट जाती हैं, विवशताओं से मुक्ति मिलती है। तनिक महसूस करें भूचाल आया हो, हर व्यवस्था बिखर चुकी हो, किसी को पता ही न हो कि पहरेदार कहाँ हैं, जेलर कहाँ है? सारे नियम टूट चुके हों, ऐसे क्षणों में कैदी अगर जरा भी सजग हो तो ये संकट के क्षण उसके लिए मोक्ष के क्षण हो सकते हैं।
  
यही वजह है कि जीवन की कारा से, प्रकृति की अर्गलाओं से, माया के बन्धनों से मोक्ष पाने की चाहत रखने वालों के जीवन में संकटों की भरमार होती है। वे भगवान् से पल प्रतिपल, प्रत्येक क्षण, घड़ी, पक्ष, मास, अयन और वर्ष संकटों का वरदान माँगते हैं। भगवान् भी अपने इन प्यारे भक्तों को उदारतापूर्वक संकटों का अनुदान देते हैं। इसी कारण तपस्वी, योगी, ज्ञानी, भक्त आदि भगवान् के जितने भी प्रियजन हैं उनके जीवन में संकट कभी भी कम नहीं पड़ते। लेकिन वे अपने तप, योग, ज्ञान एवं भक्ति से संकट के प्रत्येक क्षण को मोक्ष के क्षण में बदलते हैं। प्रत्येक संकट उनके लिए ईश्वरीय प्रकाश का द्वार होता है। भगवान् के प्रति अविचल श्रद्धा हो, जीवन के प्रति सकारात्मक भाव हो तो संकट के इन क्षणों से अधिक सुखद आध्यात्मिक साधना का सुअवसर अन्य कुछ भी नहीं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९६

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

👉 माथे का टीका

काफी समय पहले की बात है कि एक मन्दिर के बाहर बैठ कर एक भिखारी भीख माँगा करता था। (वह एक बहुत बड़े महात्मा जी का शिष्य था जो कि इक पूर्ण संत थे) उसकी उम्र कोई साठ को पार कर चुकी थी। आने जाने वाले लोग उसके आगे रक्खे हुए पात्र में कुछ न कुछ डाल जाते थे। लोग कुछ भी डाल दें, उसने कभी आँख खोल कर भी न देखा था कि किसने क्या डाला।

उसकी इसी आदत का फायदा उसके आस पास बैठे अन्य भिखारी तथा उनके बच्चे उठा लेते थे। वे उसके पात्र में से थोड़ी थोड़ी देर बाद हाथ साफ़ कर जाते थे।

कई उसे कहते भी थे कि, सोया रहेगा तो तेरा सब कुछ चोरी जाता रहेगा। वह भी इस कान से सुन कर उधर से निकाल देता था। किसी को क्या पता था कि वह प्रभु के प्यार में रंगा हुआ था। हर वक्त गुरु की याद उसे अपने में डुबाये रखती थी।

एक दिन ध्यान की अवस्था में ही उसे पता लगा कि उसकी अपनी उम्र नब्बे तक पहुंच जायेगी। यह जानकर वह बहुत उदास हो गया। जीवन इतनी कठिनाइयों से गुज़र रहा था पहले ही और ऊपर से इतनी लम्बी अपनी उम्र की जानकारी - वह सोच सोच कर परेशान रहने लग गया।

एक दिन उसे अपने गुरु की उम्र का ख्याल आया। उसे मालूम था कि गुरुदेव की उम्र पचास के आसपास थी। पर ध्यान में उसकी जानकारी में आया कि गुरुदेव तो बस दो बरस ही और रहेंगे।

गुरुदेव की पूरी उम्र की जानकारी के बाद वह और भी उदास हो गया। बार बार आँखों से बूंदे टपकने लग जाती थीं। पर उसके अपने बस में तो नही था न कुछ भी। कर भी क्या सकता था, सिवाए आंसू बहाने के।

एक दिन सुबह कोई पति पत्नी मन्दिर में आये। वे दोनों भी उसी गुरु के शिष्य थे जिसका शिष्य वह भिखारी था। वे तो नही जानते थे भिखारी को, पर भिखारी को मालूम था कि दोनों पति पत्नी भी उन्ही गुरु जी के शिष्य थे।

दोनों पति पत्नी लाइन में बैठे भिखारियों के पात्रों में कुछ न कुछ डालते हुए पास पहुंच गये। भिखारी ने दोनों हाथ जोड़ कर उन्हें ऐसे ही प्रणाम किया जैसे कोई घर में आये हुए अपने गुरु भाईओं को करता है।

भिखारी के प्रेम पूर्वक किये गये प्रणाम से वे दोनों प्रभावित हुए बिना न रह सके। भिखारी ने उन दोनों के भीतर बैठे हुए अपने गुरुदेव को प्रणाम किया था इस बात को वे जान न पाए।

उन्होंने यही समझा कि भिखारी ने उनसे कुछ अधिक की आस लगाई होगी जो इतने प्यार से नमस्कार किया है। पति ने भिखारी की तरफ देखा और बहुत प्यार से पुछा, कुछ कहना है या कुछ और अधिक चाहिए ?

भिखारी ने अपने पात्र में से एक सिक्का निकाला और उनकी तरफ बढ़ाते हुए बोला, जब गुरुदेव के दर्शन को जायो तो मेरी तरफ से ये सिक्का उनके चरणों में भेंट स्वरूप रख देना।

पति पत्नी ने एक दुसरे की तरफ देखा, उसकी श्रद्धा को देखा, पर एक सिक्का, वो भी गुरु के चरणों में! पति सोचने लगा क्या कहूँगा, कि एक सिक्का! कभी एक सिक्का गुरु को भेंट में तो शायद किसी ने नही दिया होगा, कभी नही देखा।

पति भिखारी की श्रद्धा को देखे तो कभी सिक्के को देखे। कुछ सोचते हुए पति बोला, आप इस सिक्के को अपने पास रक्खो, हम वैसे ही आपकी तरफ से उनके चरणों में रख देंगे।

नही आप इसी को रखना उनके चरणों में। भिखारी ने बहुत ही नम्रता पूर्वक और दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा। उसकी आँखों से झर झर आंसू भी निकलने लग गये।

भिखारी ने वहीं से एक कागज़ के टुकड़े को उठा कर सिक्का उसी में लपेट कर दे दिया। जब पति पत्नी चलने को तैयार हो गये तो भिखारी ने पुछा, वहाँ अब भंडारा कब होगा?भंडारा तो कल है, कल गुरुदेव का जन्म दिवस है न। भिखारी की आँखे चमक उठीं। लग रहा था कि वह भी पहुंचेगा, गुरुदेव के जन्म दिवस के अवसर पर।

दोनों पति पत्नी उसके दिए हुए सिक्के को लेकर चले गये। अगले दिन जन्म दिवस (गुरुदेव का) के उपलक्ष में आश्रम में भंडारा था। वह भिखारी भी सुबह सवेरे ही आश्रम पहुंच गया।

भंडारे के उपलक्ष में बहुत शिष्य आ रहे थे। पर भिखारी की हिम्मत न हो रही थी कि वह भी भीतर चला जाए। वह वहीं एक तरफ खड़ा हो गया कि शायद गेट पर खड़ा सेवादार उसे भी मौका दे भीतर जाने के लिए। पर सेवादार उसे बार बार वहाँ से चले जाने को कह रहा था।

दोपहर भी निकल गयी, पर उसे भीतर न जाने दिया गया। भिखारी वहाँ गेट से हट कर थोड़ी दूर जाकर एक पेड़ की छावं में खड़ा हो गया। वहीं गेट पर एक कार में से उतर कर दोनों पति पत्नी भीतर चले गये। एक तो भिखारी की हिम्मत न हुई कि उन्हें जा कर अपने सिक्के की याद दिलाते हुए कह दे कि मेरी भेंट भूल न जाना। और दूसरा वे दोनों शायद जल्दी में भी थे इस लिए जल्दी से भीतर चले गये। और भिखारी बेचारा, एक गरीबी, एक तंग हाली और फटे हुए कपड़े उसे बेबस किये हुए थे कि वह अंदर न जा सके।

दूसरी तरफ दोनों पति पत्नी गुरुदेव के सम्मुख हुए, बहुत भेंटे और उपहार थे उनके पास, गुरुदेव के चरणों में रखे। पत्नी ने कान में कुछ कहा तो पति को याद आ गया उस भिखारी की दी हुई भेंट। उसने कागज़ के टुकड़े में लिपटे हुए सिक्के को जेब में से बाहर निकाला, और अपना हाथ गुरु के चरणों की तरफ बढ़ाया ही था तो गुरुदेव आसन से उठ खड़े हुए, गुरुदेव ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाकर सिक्का अपने हाथ में ले लिया, उस भेंट को गुरुदेव ने अपने मस्तक से लगाया और पुछा, ये भेंट देने वाला कहाँ है, वो खुद क्यों नही आया ?

गुरुदेव ने अपनी आँखों को बंद कर लिया, थोड़ी ही देर में आँख खोली और कहा, वो बाहर ही बैठा है, जायो उसे भीतर ले आयो। पति बाहर गया, उसने इधर उधर देखा। उसे वहीं पेड़ की छांव में बैठा हुआ वह भिखारी नज़र आ गया।

पति भिखारी के पास गया और उसे बताया कि गुरुदेव ने उसकी भेंट को स्वीकार किया है और भीतर भी बुलाया है। भिखारी की आँखे चमक उठीं। वह उसी के साथ भीतर गया, गुरुदेव को प्रणाम किया और उसने गुरुदेव को अपनी भेंट स्वीकार करने के लिए धन्यवाद दिया।

गुरुदेव ने भी उसका हाल जाना और कहा प्रभु के घर से कुछ चाहिए तो कह दो आज मिल जायेगा। भिखारी ने दोनों हाथ जोड़े और बोला - एक भेंट और लाया हूँ आपके लिए, प्रभु के घर से यही चाहता हूँ कि वह भेंट भी स्वीकार हो जाये।

हाँ होगी, लायो कहाँ है? वह तो खाली हाथ था, उसके पास तो कुछ भी नजर न आ रहा था भेंट देने को, सभी हैरान होकर देखने लग गये कि क्या भेंट होगी!

हे गुरुदेव, मैंने तो भीख मांग कर ही गुज़ारा करना है, मैं तो इस समाज पर बोझ हूँ। इस समाज को मेरी तो कोई जरूरत ही नही है। पर हे मेरे गुरुदेव, समाज को आपकी सख्त जरूरत है, आप रहोगे, अनेकों को अपने घर वापिस ले जायोगे।

इसी लिए मेरे गुरुदेव, मैं अपनी बची हुई उम्र आपको भेंट स्वरूप दे रहा हूँ। कृपया इसे कबूल करें।" इतना कहते ही वह भिखारी गुरुदेव के चरणों पर झुका और फिर वापिस न उठा। कभी नही उठा।

वहाँ कोहराम मच गया कि ये क्या हो गया, कैसे हो गया? सभी प्रश्न वाचक नजरों से गुरुदेव की तरफ देखने लग गये। एक ने कहा,  हमने भी कई बार कईओं से कहा होगा कि भाई मेरी उम्र आपको लग जाए, पर हमारी तो कभी नही लगी। पर ये क्या, ये कैसे हो गया??

गुरुदेव ने कहा, इसकी बात सिर्फ इस लिए सुन ली गयी क्योंकि इसके माथे का टीका चमक रहा था। आपकी इस लिए नही सुनी गयी क्योंकि माथे पर लगे टीके में चमक न थी।

सभी ने उसके माथे की तरफ देखा, वहाँ तो कोई टीका न लगा था। गुरुदेव सबके मन की उलझन को समझ गये और बोले  टीका ऊपर नही, भीतर के माथे पर लगा होता है..!!

👉 प्रतिहिंसा का अन्त नहीं

👉 आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग (भाग ३)

कर्मयोगियों को सुशील, मनोहर मिलनसार प्रकृति का होना होगा। उसको पूर्ण रूप से, अनुकूलता, क्षमाशीलता, सहानुभूति करने वाला, विश्व प्रेम, दया के गुणों से युक्त रहना होगा। उनको दूसरों की चाल तथा आदतों के अनुकूल ही अपने को बनाना होगा। उनको अपने हृदय को ऐसा बनाना होगा कि सभी को अपने गले लगा सकें। उन्हें अपने मन को शाँत तथा समतुल्य रखना होगा। दूसरों को सुखी देखकर उनको प्रसन्न होना होगा। अपनी सब इन्द्रियों को अपने वश में करना होगा। अपना जीवन बहुत सादगी से व्यतीत करना होगा। उन्हें अनादर, अपकीर्ति, निन्दा, कलंक, लज्जित होना, कठोर वचन सुनना, शीत-उष्ण तथा रोगों के कष्ट को सहना होगा। उन्हें सहनशील होना होगा। उनको आप में, ईश्वर में, शास्त्रों में, अपने गुरु के वचन में पूरा विश्वास रखना होगा।

जो मनुष्य संसार की सेवा करता है वह अपनी ही सेवा करता है। जो मनुष्य दूसरों की मदद करता है वास्तव में वह अपनी ही मदद करता है। यह सदा ध्यान में रखने योग्य बात है। जब आप दूसरे व्यक्ति की सेवा करते हैं, जब आप अपने देश की सेवा करते हैं तब आप यह समझकर कि ईश्वर ने आपको सेवा द्वारा अपने को उन्नत तथा सुधारने का दुर्लभ अवसर दिया है। उस मनुष्य के आप कृतज्ञ हों जिसने आपको सेवा करने का अवसर दिया हो।

कर्मयोग ही मन को अन्तर्ज्योति तथा आत्मज्ञान की प्राप्ति का उपयुक्त पात्र बनाता है। वह हृदय को विशाल बनाकर सब प्रकार के बाधा विघ्नों को जो एकता प्राप्त करने में बाधक हुआ करते हैं, हटा देता है। कर्मयोग ही चित्त वृद्धि के लिये एक सफल साधन है।

निष्काम सेवा करने से आप अपने हृदय को पवित्र बना लेते हैं। अहंभाव, घृणा, ईर्ष्या, श्रेष्ठता का भाव और उसी प्रकार के और सब आसुरी सम्पत्ति के गुण नष्ट हो जाते हैं। नम्रता, शुद्ध प्रेम, सहानुभूति, क्षमा, दया की वृद्धि होती है। भेद-भाव मिट जाते हैं। स्वार्थपरता निर्मूल हो जाती है। आपका जीवन विस्तृत तथा उदार हो जायेगा। आप एकता का अनुभव करने लगेंगे। अन्त में आपको आत्मज्ञान प्राप्त हो जायेगा। आप सब में “एक” और “एक” में ही सबका अनुभव करने लगेंगे। आप अत्यधिक आनन्द का अनुभव करने लगेंगे। संसार कुछ भी नहीं है केवल ईश्वर की ही विभूति है। लोक सेवा ही ईश्वर की सेवा है। सेवा को ही पूजा कहते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 8

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 7)

Q.7. Why is the Sadhak advised to keep the progress in Sadhana a secret?

Ans. The purpose of keeping Sadhana secret is only to avoid the possibility of confusion because of multiple interactions with people, so that after dispelling all doubts, one holds fast to it firmly and marches ahead on the chosen path. People try to criticise, find faults and suggest new methods and create doubts in the mind of the Sadhak, if he discusses the method of his Sadhana with several persons. Everyone who is consulted will suggest something new and the Sadhak’s mind will get confused and he will lose faith. He will then change frequently his method of Sadhana and on account of doubt get deprived of its benefits. It is therefore, essential to have full faith in one’s well settled method and it should be pursued with unflinching devotion, under the guidance of an accomplished Guru.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 87

👉 लक्ष्य

क्षण भंगुर लालसाओं और उनकी तृप्ति को लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता। जो अभी हैं, अभी नहीं हैं। जिनके रंग-रूप पल-पल बदलते हैं। जिनके पूरी होने से मिलने वाली तृप्ति, नहीं पूरी होने से मिलने वाली अतृप्ति से गहरा अवसाद एवं विषाद देती है। ऐसी क्षण भंगुर माया मरीचिका भला जीवन का लक्ष्य कैसे हो सकती है। लक्ष्य को तो सदा शाश्वत्-सर्वकालिक एवं शान्तिदायक होना चाहिए।
  
महान सन्त गुरजिएफ अपने शिष्यों से कथा कहते थे- आकाश में उड़ने वाली चिड़िया को अपने से थोड़ी ही दूर एक चमकता हुआ श्वेत बादल दिखा। उसने सोचा- चलो मैं उड़कर उस बादल को छू लूँ। ऐसा सोचते हुए वह चिड़िया उस बादल को अपना लक्ष्य बनाकर अपनी पूरी क्षमता से उड़ चली। लेकिन हवाओं के साथ अठखेलियाँ करता वह बादल कभी पूर्व में जाता तो कभी पश्चिम में और कभी तो वहीं रुककर चक्कर खाते हुए चक्करों का चक्रव्यूह रचाने लगता। यही नहीं कभी वह छुपता तो कभी प्रकट हो जाता। अपनी बहुतेरी कोशिशों के बाद चिड़िया उस तक नहीं पहुँच सकी।
  
प्रयासों के इस दौर में उसने पाया कि जिस बादल के पीछे वह अपने जीवन को दाँव में लगाकर भाग रही थी, वह अचानक हवा के झोकों से छट गया है। अपने अथक प्रयत्न के परिणाम में उस चिड़िया ने देखा कि अरे! यहाँ तो कुछ भी नहीं है। इस सच को देखकर उस चिड़िया को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसके जाग्रत् हो चुके अन्तर्विवेक ने कहा; यह तो बड़ी भूल हो गयी। यदि लक्ष्य बनाना हो तो क्षण भंगुर बादलों को नहीं बल्कि पर्वत की चोटियों को बनाना चाहिए, जो शाश्वत और अनन्त है।
  
गुरजिएफ की यह बोध कथा प्रायः हम सभी के जीवन में घटित होती है। हममें से अनेक क्षण भंगुर बादलों की ही तरह क्षण भंगुर लालसाओं को लक्ष्य बनाने के भ्रम में पड़े रहते हैं। यदि वे अन्तर्विवेक के प्रकाश में देखें तो निकट ही अनादि और अनन्त परमात्मा की पर्वतमालाएँ भी हैं। जिसे जीवन का लक्ष्य बनाने से सदा-सर्वदा कृतार्थता और धन्यता ही उपलब्ध होती है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९५

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

👉 कर्ण की उदारता


👉 विरोध का सामना कैसे करें?

गंगा के तट पर एक संत अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे, तभी एक शिष्य ने पुछा, “ गुरू जी, यदि हम कुछ नया… कुछ अच्छा करना चाहते हैं पर समाज उसका विरोध करता है तो हमें क्या करना चाहिए?”

गुरु जी ने कुछ सोचा और बोले ,” इस प्रश्न का उत्तर मैं कल दूंगा।”

अगले दिन जब सभी शिष्य नदी के तट पर एकत्रित हुए तो गुरु जी बोले, “आज हम एक प्रयोग करेंगे… इन तीन मछली पकड़ने वाली डंडियों को देखो, ये एक ही लकड़ी से बनी हैं और बिलकुल एक समान हैं।”

उसके बाद गुरु जी ने उस शिष्य को आगे बुलाया जिसने कल प्रश्न किया था।गुरु जी ने निर्देश दिया - “ पुत्र, ये लो इस डंडी से मछली पकड़ो।” शिष्य ने डंडी से बंधे कांटे में आंटा लगाया और पानी में डाल दिया। फ़ौरन ही एक बड़ी मछली कांटे में आ फंसी…

गुरु जी बोले-” जल्दी…पूरी ताकत से बाहर की ओर खींचो।“ शिष्य ने ऐसा ही किया ,उधर मछली ने भी पूरी ताकत से भागने की कोशिश की…फलतः डंडी टूट गयी।
गुरु जी बोले- “कोई बात नहीं; ये दूसरी डंडी लो और पुनः प्रयास करो…।”

शिष्य ने फिर से मछली पकड़ने के लिए काँटा पानी में डाला।
इस बार जैसे ही मछली फंसी, गुरु जी बोले, “आराम से… एकदम हल्के हाथ से डंडी को खींचो।” शिष्य ने ऐसा ही किया, पर मछली ने इतनी जोर से झटका दिया कि डंडी हाथ से छूट गयी।

गुरु जी ने कहा, “ओह्हो, लगता है मछली बच निकली, चलो इस आखिरी डंडी से एक बार फिर से प्रयत्न करो।” शिष्य ने फिर वही किया। पर इस बार जैसे ही मछली फंसी गुरु जी बोले, “ सावधान! इस बार न अधिक जोर लगाओ न कम.. बस जितनी शक्ति से मछली खुद को अंदर की ओर खींचे उतनी ही शक्ति से तुम डंडी को बाहर की ओर खींचो.. कुछ ही देर में मछली थक जायेगी और तब तुम आसानी से उसे बाहर निकाल सकते हो”

शिष्य ने ऐसा ही किया और इस बार मछली पकड़ में आ गयी।
“क्या समझे आप लोग?” गुरु जी ने बोलना शुरू किया…” ये मछलियाँ उस समाज के समान हैं जो आपके कुछ करने पर आपका विरोध करता है। यदि आप इनके खिलाफ अधिक शक्ति का प्रयोग करेंगे तो आप टूट जायेंगे, यदि आप कम शक्ति का प्रयोग करेंगे तो भी वे आपको या आपकी योजनाओं को नष्ट कर देंगे… लेकिन यदि आप उतने ही बल का प्रयोग करेंगे जितने बल से वे आपका विरोध करते हैं तो धीरे-धीरे वे थक जाएंगे… हार मान लेंगे… और तब आप जीत जायेंगे… इसलिए कुछ उचित करने में जब ये समाज आपका विरोध करे तो समान बल प्रयोग का सिद्धांत अपनाइये और अपने लक्ष्य को प्राप्त कीजिये।”

👉 आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग (भाग २)

नम्र, दयालु, उपकारी और सहायक बनो। यही नहीं कि कभी-कभी यथावकाश इन गुणों का उपयोग किया जावे बल्कि सर्व काल में आपके सारे जीवन में इन्हीं गुणों का अभ्यास होना चाहिये। एक भी शब्द ऐसा मत कहो जिससे दूसरों को ठेस पहुँचे। बोलने से पहले भली प्रकार विचार करो और देख लो कि जो कुछ आप कहने लगे हो वह दूसरों के चित्त को दुखी तो नहीं करेगा-क्या वह बुद्धिसंगत मधुर सत्य तथा प्रिय तो है। पहले से ही ध्यानपूर्वक समझ लो कि आपके विचार शब्दों और कार्यों का क्या प्रभाव होगा। प्रारम्भ में आप कई बार भले ही असफल हो सकते हो परंतु यदि आप अभ्यास करते रहे तो अंतः में आप अवश्य सफल हो जाओगे।

आपको कोई काम निरुत्साह से, लापरवाही से, बेमन से नहीं करना चाहिए यदि मन की ऐसी वृत्ति रखोगे तो जल्दी उन्नति नहीं कर सकते। सम्पूर्ण चित्त, मन, बुद्धि आत्मा उस काम में लगा होना चाहिये। तभी आप उसे योग या ईश्वर पन कह सकते हो। कुछ मनुष्य हाथों से काम करते हैं और उनका मन कलकत्ते के बाजार में होता है, बुद्धि दफ्तर में होती है और आत्मा स्त्री या पुत्र में संलग्न रहती है। यह बुरी आदत है। आपको कोई भी काम हो उसे योग्य सन्तोषप्रद ढंग से करना चाहिये। आपका आदर्श यह होना चाहिये कि एक समय में एक ही काम अच्छे ढंग से किया जाये। यदि आपके गुरु मित्र आपसे तौलिया धोने को कहें तो आपको ना उन्हें बताए हुए ही उनके और कपड़ों को भी धो डालने चाहिए।

लगातार असफलता होने से आपको साहस नहीं छोड़ना चाहिए असफलता के द्वारा आपको अनुभव मिलता है। आपको वे कारण मालूम होंगे जिनसे असफलता हुई है और भविष्य में उनसे बचने के लिये सचेत रहोगे। आपको बड़ी-बड़ी होशियारी से उन कारणों से रक्षा करनी होगी। इन्हीं असफलताओं की कमजोरी में से आपको शक्ति मिलेगी। असफल होते हुए भी आपको अपने सिद्धान्त, लक्ष्य, निश्चय और साधन का दृढ़ मति होकर पालन और अनुसरण करना होगा। आप कहिये “कुछ भी हो मैं अवश्य पूरी सफलता प्राप्त करूंगा, मैं इसी जीवन में-नहीं नहीं, इसी क्षण आत्म साक्षात्कार करूंगा। कोई असफलता मेरे मार्ग में रुकावट नहीं डाल सकती।”

प्रयत्न और कोशिश आपकी ओर से होनी चाहिये भूखे मनुष्य हो आप ही खाना पड़ेगा। प्यासे को पानी पीना ही पड़ेगा। आध्यात्मिक सीढ़ी पर आपको हर एक कदम अपने अपने आप ही रखना होगा। इस बात को भली प्रकार स्मरण रखिये। साहसी बनो। यद्यपि बेरोजगार हो कुछ खाने को नहीं हो, तन पर वस्त्र भी न होवे तब भी सदा प्रसन्न रहो। आपका यथार्थ स्वभाव सच्चिदानन्द है। यह बाह्य नाशवान स्थूल शरीर तो माया का ही कार्य हैं मुस्कुराओ, सीटी बजाओ, हँसो कूदो और आनन्द में मग्न होकर नाचो।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 7

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 6)

Q.6. I have been doing Gayatri Sadhana regularly. Nevertheless, at times, I feel depressed and dissatisfied with my progress. What is the remedy?

Ans. The feelings of occasional depression, dissatisfaction with progress and momentary loss of interest are not uncommon in course of Sadhana. In order to understand this paradoxical phenomenon, it is  necessary to understand three successively higher phases of spiritual evolution. These are known as :-

(1) The Mantra Diksha or Initiation
This is the initial Kindergarten stage - the ‘Bhuha’ stage of Dikcha, in which the ‘Acharya’ - a representative of Guru, introduces the novice to the concept of Gayatri disciplines through ‘Baikhari Vani’ (by speaking). Any contemplative, spiritually- wise, high-character, talented, person may assume the charge of an ‘Acharya’. Nevertheless, this is a great responsibility, since after establishing the spiritual relationship, sins and virtues of the disciple are shared by the Guru. Since the Guru, by definition, is sinless, his displeasure on any dereliction by the devotee is quite natural. Besides, it must also be very clearly understood, that merely admission to the school of Sadhana through Mantra Dikcha is not sufficient. The devotee must persistently endeavour to qualify for the higher stages of Diksha.

(2) Agni Diksha or Pran Diksha
This is the ‘Bhuwaha’ stage of Dikcha carried out extra-sensorially, through ‘Madhyama’ and pashyanti Vani (Telepathic and soul-to-soul communication). In this case the Guru undertakes refinement and development of the Sukchma Sharir - the conscious and supra-conscious levels of mind (‘Man’: ‘Budhi’, ‘Chitta’ and ‘Ahankar’) of the devotee.

When the devotee graduates to this next higher class of ‘Agni Dikcha’, the Guru extra-sensorally transmits a part of the spiritual charge (Pran) to the devotee, from his own spiritual battery accumulated after prolonged Tapascharya.

The ‘concepts’ planted and developed during the Mantra Dikcha are now translated into ‘action’ by this new acquisition of powerful energy (Pran). At this stage, there is a great turmoil in the inner-self of the devotee, which he/ she apparently feels as a fast growing dissatisfaction with his / her progress, uneasiness and momentary depression. These external symptoms are, in fact, an indication of the churning, taking place within deeper levels of the soul.  Hence, unless the devotee feels this turmoil, it is to be assumed that the activation by the Guru has become feeble, because of some shortcomings in the devotee’s Sadhana.
    
After Agni Dikcha, the devotee becomes more enlightened and is able to discern his / her personal faults, however trivial they are. The term Agni Dikcha owes its nomenclature to the process of ‘Incineration in the inner-self by the fire of discernment’. The phenomenon is parallel to the exercise of Tapascharya for the purification of physical body.

There are three clear signs of a person undergoing Agni Dikcha. (1) A strong inclination to perform ‘Tap’ for self-purification, (2) A feeling of discontentment with one’s progress and a desire for speedy innergrowth and  (3) realisation of many shortcomings in  one’s thoughts, behaviour and nature.

Here, it must be emphasised that ‘Only that Guru can give Dikcha, who has himself earned and conserved sufficient spiritual charge by performing Tapascharya’.

(3) Pran Dikcha (‘Swaha’ stage)
This is the highest level of Dikcha in course of which the transfer of spiritual energy takes place from the soul of the Guru to the soul of the devotee. This is the process through which the Guru hands over spiritual succession to the most deserving disciple. In other words, it means appointing the spiritual successor.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 84

👉 शून्यता

मन की उठती-गिरती लहरों में अपने को ढूँढ़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन यह न मिला। विद्वानों द्वारा रचित शास्त्र पढ़े, ज्ञानियों की बातें सुनी, पर इससे भी कुछ न हुआ। बस चेतना बोझिल होती गयी, भावनाओं में भारीपन आ गया। अपने को हल्का करने के लिए यूँ ही घूमने निकला। पश्चिमोन्मुख सूरज थोड़ी देर पहले ही बादलों में छुप गया था। लेकिन रात का द्वार रोकने के लिए साँझ अभी तक ठहरी हुई थी। मैं अभी तक स्वयं की खोज कर रहा था। पर वहाँ तो एक शून्यता थी। और जहाँ शून्यता होती है, वहाँ कुछ भी नहीं होता।
  
थोड़ी ही दूर पर बैठी एक बुढ़िया प्याज छील रही थी। उसने एक बड़ी सी प्याज की गाँठ हाथ में ली और छीलने लगी। परतों पर परतें निकलती गयी। मोटी-खुरदरी परतें, फिर मुलायम-चिकनी परतें और फिर कुछ भी नहीं। प्याज छिलते-छिलते उस बुढ़िया के हाथ कुछ भी न बचा। अपनी इस स्थिति पर वह जोर से हँस दी। उसे देखकर लगा कि अपना मन भी तो कुछ ऐसा ही है। इसे उघाड़ते चलें- पहले स्थूल परतें, फिर सूक्ष्म परतें, फिर शून्य। विचार, वासनाएँ और अहंकार, फिर कुछ भी नहीं। बस शून्यता ही बची रहती है। इस शून्यता को जो उघाड़ते हैं, वही ध्यान में प्रवेश करते हैं।
  
यह ध्यान ही परिचय कराता है हमारा अपने आपसे। यह शून्य गहनता ही हमारा अपना स्वरूप है। फिर उसे आत्मा कहें या कुछ और। पर यह सच है कि विचार, वासना, अहंकार जहाँ नहीं है, वहीं वह है- ‘जो है’। पश्चिमी दुनिया के एक बड़े विचारक ने लिखा है कि जब भी मैं अपने में जाता, कोई मैं मुझे वहाँ नहीं मिलता। या तो किसी विचार से टकराव होता है या किसी वासना अथवा फिर किसी याद से। उनकी यह बात कुछ हद तक ठीक है। पर परतों से लौट आना तो भूल है। प्याज हाथ में लिया है तो पूरा ही छील लें। सारी परतें उघड़ जाने पर टकराने के लिए कुछ भी न बचेगा। बची रहेगी तो बस शून्यता। यही तो अपना परिचय है। सतह पर संसार के सब रंग हैं, परन्तु केन्द्र में शून्य नीरवता है। जहाँ स्वयं का ज्ञान, स्वयं की उपलब्धि होती है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९४

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...