मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

👉 संकट के क्षण

संकट के क्षण बेशकीमती हैं। जीवन में इनका महत्त्व व मोल बहुत अधिक है। इतना अधिक कि इन्हें अतिमहत्त्वपूर्ण और अनमोल कहा जा सके। जब सब कुछ व्यवस्थित होता है और कहीं कोई संकट नहीं होता, तो जीवन चेतना सुप्त व मृतप्राय हो जाती है। जब कुछ बदल नहीं रहा होता है और पुराने की पकड़ मजबूत होती है तो लगभग असम्भव हो जाता है स्वयं को बदलना। लेकिन जब हर चीज अस्त-व्यस्त होती है, जीवन में कुछ भी स्थायी, निश्चित एवं सुरक्षित नहीं होता, कोई नहीं जानता कि अगले क्षण क्या होगा? ऐसे संकट के क्षणों में जीवन स्वतन्त्र होता है परिवर्तन के लिए, रूपान्तरण के लिए।
  
संकट के बिना जीवन लगभग जेल जैसा है। जिसमें बस परम्पराओं, रीतियों, युगों पुरानी सड़-गल चुकी व्यवस्थाओं को विवशताओं के साथ निभाया जाता है। इस जेल से भाग निकलना तकरीबन असम्भव होता है। लेकिन जैसे ही संकट आया कि सब बँधी-बँधायी व्यवस्थाएँ टूट जाती हैं, विवशताओं से मुक्ति मिलती है। तनिक महसूस करें भूचाल आया हो, हर व्यवस्था बिखर चुकी हो, किसी को पता ही न हो कि पहरेदार कहाँ हैं, जेलर कहाँ है? सारे नियम टूट चुके हों, ऐसे क्षणों में कैदी अगर जरा भी सजग हो तो ये संकट के क्षण उसके लिए मोक्ष के क्षण हो सकते हैं।
  
यही वजह है कि जीवन की कारा से, प्रकृति की अर्गलाओं से, माया के बन्धनों से मोक्ष पाने की चाहत रखने वालों के जीवन में संकटों की भरमार होती है। वे भगवान् से पल प्रतिपल, प्रत्येक क्षण, घड़ी, पक्ष, मास, अयन और वर्ष संकटों का वरदान माँगते हैं। भगवान् भी अपने इन प्यारे भक्तों को उदारतापूर्वक संकटों का अनुदान देते हैं। इसी कारण तपस्वी, योगी, ज्ञानी, भक्त आदि भगवान् के जितने भी प्रियजन हैं उनके जीवन में संकट कभी भी कम नहीं पड़ते। लेकिन वे अपने तप, योग, ज्ञान एवं भक्ति से संकट के प्रत्येक क्षण को मोक्ष के क्षण में बदलते हैं। प्रत्येक संकट उनके लिए ईश्वरीय प्रकाश का द्वार होता है। भगवान् के प्रति अविचल श्रद्धा हो, जीवन के प्रति सकारात्मक भाव हो तो संकट के इन क्षणों से अधिक सुखद आध्यात्मिक साधना का सुअवसर अन्य कुछ भी नहीं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९६

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