शनिवार, 18 जनवरी 2020

👉 लौकिक सफलताओं का आधार

तात्पर्य केवल इतना है कि नीति और अनीति के आधार पर प्रतिष्ठा−अप्रतिष्ठा, प्रेम, द्वेष, शान्ति−अशान्ति, दंड पुरस्कार, स्वर्ग−नरक मिलते हैं, पर लौकिक सफलताओं का आधार जागरुकता, पुरुषार्थ, लगन, साहस आदि गुण ही हैं। यह सभी गुण शरीर के नहीं, मन के हैं। मन को उपयोगी, अनुकूल, उचित आदतों का, विचार पद्धति का अभ्यस्त बना लेने से ही नाना प्रकार के उन गुणों का आविर्भाव होता है जो लौकिक एवं पारलौकिक सफलताओं के मूल आधार हैं।

शरीर को आलस, असंयम, उपेक्षा एवं दुर्व्यसनों में पड़ा रहने दिया जाय तो उसकी सारी विशेषताएँ नष्ट हो जायेंगी। इसी प्रकार मन को अव्यवस्थित पड़ा रहने दिया जाय, उसे कुसंस्कार−ग्रस्त होने से संभाला न जाय तो निश्चय ही वह हीन स्थिति को पकड़ लेगा। पानी का स्वभाव नीचे की तरफ बहना है, ऊपर उठाने के लिए बहुत प्रयत्न करते हैं तब सफलता मिलती है। मन का भी यही हाल है यदि उसे रोका, संभाला, समझाया, बाँधा और उठाया न जाय तो उसका कुसंस्कारी दुर्गुणी, पतनोन्मुखी, आलसी एवं दीन−दरिद्र प्रकृति का बन जाना ही निश्चित है। आज इसी प्रकार का मानसिक अवसाद चारों ओर फैल रहा है। शरीर की दुर्बलता और बीमारी जिस प्रकार व्यापक रूप से फैली दिखाई देती है वैसी ही हमारी मानसिक दुर्बलता एवं रुग्णता भी कम शोचनीय नहीं है। कलह प्रिय, क्रोधी, तुनक-मिज़ाज, असहिष्णु, ईर्ष्यालु, छिद्रान्वेषी, अहंकारी, उद्दण्ड, प्रकृति के लोगों से हमारा समाज भरा पड़ा है। इन दुर्गुणों के कारण पारस्परिक प्रेम−भावना, आत्मीयता एवं घनिष्ठता दिन−दिन नष्ट होती जाती है और एक आदमी दूसरे से दिन−दिन दूर पड़ता जाता है। प्रेम, सहयोग, प्रसन्नता, मुस्कान, नम्रता, उदारता, सहिष्णुता, शिष्टता, कृतज्ञता के गुणों से यदि मनोभूमि परिष्कृत हो तो परस्पर का प्रेम−भाव कितना बढ़े, कितना सुदृढ़ रहे और फलस्वरूप कितनी प्रगति एवं प्रसन्नता का वातावरण बन जाय?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 23

👉 हम बदलेंगे-युग बदलेगा

जैसा हम औरों को बनाना-बदलना चाहते हैं, वैसा ही स्वयं को बनाना- बदलना होगा। दूसरों को बदलने के लिए स्वयं में बदलाव जरूरी है। अपने में आने वाले बदलाव से आसपास के लोग-वातावरण अपने आप ही बदलने लगते हैं। बिना स्वयं में परिवर्तन लाये औरों में परिवर्तन सम्भव नहीं।
  
जो स्वयं जाग्रत् है केवल वही दूसरों के जागरण में सहायक बन सकता है। स्वयं सोया हुआ भला औरों को किस तरह से जगा पाएगा? सच भी यही है कि जिनके भीतर स्वयं ही अंधकार का आवास है, वह कभी भी दूसरों के लिए प्रकाश का स्रोत नहीं हो सकता। दूसरों की सेवा केवल तभी सम्भव है, जब हम स्वयं का सृजन प्रारम्भ करें। लोक निर्माण-आत्म निर्माण के बिना असम्भव है।
  
किसी ने सन्त तिरुवल्लुवर से पूछा-मैं सेवा करना चाहता हूँ। वह मुस्कराकर बोले-‘पहले साधना-तब सेवा, क्योंकि जो तुम्हारे पास नहीं है, उसे तुम दूसरों को कैसे दोगे? साधना से जब पाया जा चुका हो-तभी उसे सेवा में बाँटा जा सकता है।’ हालाँकि उलटबासी यही है कि सेवा की चाहत बहुतों में होती है, पर स्व-साधना और आत्म सृजन की नहीं। यह तो वैसा ही हुआ कि जैसे कोई बीज तो न बोना चाहे, लेकिन फसल काटना चाहे, परन्तु यह प्रकृति के विधान के विपरीत है।
  
किसी अत्यन्त दीन-दुर्बल-दरिद्र व्यक्ति ने भगवान् महावीर से कहा-भगवन्! मैं मानवता की सेवा कैसे करूँ? वह व्यक्ति शरीर से नहीं आत्मा से दुर्बल था, वह दरिद्र धन से नहीं जीवन से था। भगवान् महावीर ने उसे बड़े ही करुण भाव से देखा और बड़ी दयाभाव से उससे बोले-क्या कर सकोगे तुम? उनका यह वचन बहुत छोटा था, परन्तु बड़ा गहरा मर्म था इसमें। अच्छा हो कि इसे हम सब अपने मन में दुहरावें? यह वचन हममें से हर एक को कहा गया है। सब करना स्वयं पर और स्वयं से प्रारम्भ होता है। स्वयं से पहले जो दूसरों के लिए कुछ करना चाहता है, वह भूल में है। स्वयं का जो कल्याण कर लेता है, वही औरों का कल्याण कर पाता है। अपने परिवर्तन में ही युग परिवर्तन का बीज निहित है। तभी तो युगऋषि की वाणी कहती है-‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६३

शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

👉 सच्ची साधना

पति का अकाल निधन साध्वी रोहिणी पर वज्राघात था, जिसे सहन कर सकना असम्भव था किन्तु पुत्र देव शर्मा के प्रति कर्त्तव्य और ममता ने उसे जीने के लिए विवश कर दिया। अभ्यास नहीं था तो भी उसने घोर परिश्रम किया और बेटे का न केवल पालन पोषण ही वरन् उसे वेदाँग के अध्ययन जैसी उच्च शिक्षा भी दिलाई। देवशर्मा माँ के प्रताप से अपने समय के श्रेष्ठ विद्वानों में गिना जाने लगा।

माँ वृद्धा हो गई थी नीति कहती थी अब बेटे को प्रत्युपकार-करना चाहिये पर दुष्ट कृतघ्नता को क्या कहा जाये-जहाँ भी उसका जन्म हुआ मर्यादायें, नीति और कर्त्तव्य भाव वहीं विश्रृंखलित हुये। संसार में यह जो कलह और अशाँति है कृतघ्नता ही उसका एक मात्र कारण है। बेटे के मन में यह समझ नहीं आई। अपनी मुक्ति, अपना स्वर्ग उसे अधिक आवश्यक लगा सो माँ और छोटी बहन को बिलखता छोड़कर देवशर्मा घर से भाग निकला और तीर्थाटन करते हुये नन्दिग्राम के एक मठ में जाकर तप करने लगा।

एक दिन देवशर्मा प्रातःकाल नदी के किनारे पहुँचे। स्नान कर अपना चीवर सूखने के लिये जमीन पर डाल दिया और स्वयं वहीं पर आसन डालकर ध्यान मग्न हो गये। प्रातःकालीन सन्ध्या समाप्त कर जैसे ही देवशर्मा उठे उन्होंने देखा एक कौवा और एक बकुल चीवर को चोंच में दबाकर उड़े जा रहे हैं। देवशर्मा के क्रोध का ठिकाना न रहा। उन्होंने बड़ी-बड़ी तान्त्रिक सिद्धियाँ प्राप्त की थी। शक्ति का मद बड़ा बुरा होता है। उन्होंने क्रोधपूर्ण दृष्टि से पक्षियों की ओर देखा। आँखों से अग्नि ज्वाला फूटी और दोनों पक्षी जलकर वहीं खाक हो गये। देवशर्मा अपनी सिद्धि देखकर फूले नहीं समाये। उन्हें लगा समस्त भूमंडल पर उन जैसा कोई दूसरा सिद्ध नहीं है।

अहंकार से भरे देवशर्मा मठ की ओर चल पड़े। मार्ग में नंदिग्राम पड़ता था सोचा आज की भिक्षा भी लेते चलें सो देवशर्मा ने एक सद् गृहस्थ के द्वार पर “भवति भिक्षाँ देहि” की पुकार लगाई और भिक्षा की प्रतीक्षा में वहीं खड़े हो गये।

भीतर से आवाज आ रही थी इससे पता चलता था कि गृह स्वामिनी अन्दर ही है पर कोई बाहर नहीं आ रहा यह देखकर देवशर्मा को बड़ा गुस्सा आया। उन्होंने दुबारा तिबारा और चौथी बार भी पुकारा पर हर बार भीतर से एक ही आवाज आई स्वामी जी ठहरिये! मैं अभी साधना कर रही हूँ साधना समाप्त कर लूँगी तक भिक्षा दूँगी तब तक आप खड़े रहिये। देवशर्मा का क्रोध सीमा पार गया। तड़प कर बोले-दुष्टा ! साधना कर रही है या परिहास-जानती नहीं इस अवहेलना का क्या परिणाम हो सकता है।

संयत और गम्भीर स्वर भीतर से बाहर आया- महात्मन् जानती हूँ आप शाप देना चाहेंगे किन्तु मैं कोई कौवा और बलाका नहीं, संत ! जो तुम्हारी कोप दृष्टि से जलकर नष्ट हो जाऊँगी। जिसने तुम्हें जीवन भर पाला उस माँ को त्यागकर अपनी मुक्ति चाहने वाले साधु ! आप मेरा कुछ भी तो बिगाड़ नहीं सकते ?

देवशर्मा का सिद्धि का अहंकार चूर-चूर हो गया। कुछ देर बाद गृह स्वामिनी घर से बाहर आई और भिक्षा देने लगी। देवशर्मा ने साश्चर्य पूछा-भद्रे ! आप मुझे यह बतादे कि आप कौन सी साधना करती हैं जिससे बिना देखे ही कौए के जलाने और माँ को असहाय छोड़ आने की घटना जान गई।

गृह स्वामिनी ने उत्तर दिया---कर्त्तव्य की साधना” महात्मन् ! म् अपने पति, अपने बच्चे, अपने परिवार, समाज और देश के प्रति कर्त्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करती हूँ। उसी की सिद्धि है यह। देवशर्मा का सिर लज्जा से नीचे झुक गया। भीख नहीं ली उन्होंने -चुपचाप जिस घर को छोड़कर आये थे चल पड़े उसी ओर छोड़ी हुई कर्त्तव्य की साधना पूरी करने।

अखण्ड ज्योति दिसम्बर, 1971    

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/December/v1.14

👉 दोनों साथ चलें

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 3)

Q.7. Should one deliberate on the meaning of the Mantra during the Jap?  
Ans. As regards contemplation on the meaning of Mantra during the Jap, it is recommended that one should only meditate on the deity during Jap. The practical difficulty in thinking about meaning of Mantra at the time of Jap is that it takes time to form imaginary pictures in accordance with the meaning of every word and during this time Jap cannot be interrupted. Jap should be continuous, uninterrupted and non-stop like the flow of oil. Of course, the meaning of Gayatri Mantra should be thoroughly understood. If it is sought to form imaginary pictures of the meanings of different words, this can conveniently be done at some other time but not with Jap.

Q.8. Is taking a bath essential prior to Jap? What should one wear during the Jap?


Ans. It is more appropriate to sit in front of an altar after taking bath, wearing clean clothes and perform worship in the morning with due salutations and reverence. It keeps the mind happily steady and helps in its concentration. But when duty hours are odd, a person is sick or where it is not possible to arrange for water, one can perform mental Jap without the help of Mala. Scriptures recommend cleanliness of body and clothes as a pre-requisite for any religious practice or worship. Since a routine of wearing freshly-washed clothes during each session of Upasana, is to be maintained, one is advised to be clad only in a two-piece garment, one each for covering the upper and lower parts of the body e.g. Dhoti - Dupatta. However, for protection against cold an additional under-garment can be worn.
  
Though the pundits prescribe cleanliness of body and clothes, it is not considered mandatory for all occasions. Situations may arise when the worshipper finds it difficult to adhere to this rule strictly. Under such circumstances, one should not discontinue the routine of worship. Otherwise, the aspirant is totally deprived of even the partial benefit. Besides cleanliness, the objective of these preparatory rituals is to help the worshipper in getting rid of lethargy. A sick or weak person may wash his arms, feet and face, or if possible wipe the body with a wet cloth.  
  
Woollen or silken clothes do not absorb dirt and perspiration to the extent cotton wears do. Nevertheless, these too require cleaning at certain intervals. Since, now-a-days silk is obtained by boiling live silk worms, silk wears are no longer considered appropriate for a spiritual practice. These are not recommended for Upasana. The same holds true for animal hides. The ancient sages used hides of animals who died a natural death. This is no longer true. Animals are being killed for their hides. Now-a-days a variety of other floor-spreads (woollens, synthetics) are available ,which may be used; and cleaned by washing or through exposure to sun from time to time.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 52

👉 विचारों का प्रतिफल कर्म

कर्म जो आँखों से दिखाई देता है वह अदृश्य−विचारों का ही दृश्य रूप है। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा करता है। चोरी, बेईमानी, दगाबाजी, शैतानी, बदमाशी कोई आदमी यकायक कभी नहीं कर सकता, उसके मन में उस प्रकार के विचार बहुत दिनों से घूमते रहते हैं। अवसर न मिलने से वे दबे हुए थे, समय पाते ही वे कार्य रूप में परिणत हो गये। बाहर के लोगों को किसी के द्वारा यकायक कोई दुष्कर्म होने की बात सुनकर इसलिए आश्चर्य होता है कि वे उसकी भीतरी स्थिति को नहीं जानते थे। इसी प्रकार कोई अधिक उच्चकोटि का सत्कर्म करने का भी आकस्मिक समाचार भले ही सुनने को मिले पर वस्तुतः उसकी तैयारी वह मनुष्य भीतर ही भीतर बहुत दिनों से कर रहा होता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति आज उन्नतिशील एवं सफलता सम्पन्न दिखाई पड़ते हैं वे अचानक ही वैसे नहीं बन गये होते वरन् चिरकाल से उनका प्रयत्न उसके लिए चल रहा होता है। भीतरी पुरुषार्थ को उनने बहुत पहले जगा लिया होता है। उनने अपने मनःक्षेत्र में भीतर ही भीतर वह अच्छाइयाँ जमा कर ली होती हैं जिनके द्वारा बाह्य जगत में दूसरों का सहयोग एवं उन्नति का आधार निर्भर रहता है। बाह्य−जीवन हमारे भीतरी जीवन का प्रतिबिम्ब मात्र है। पर्दे के पीछे दीपक जल रहा है तो उसका कुछ प्रकाश बाहर भी परिलक्षित होता है। इसी प्रकार भीतरी पर्दे में जिनमें कुछ अच्छाइयाँ हैं वे ही उनकी कीमत पर बाह्य−जगत में सुख साधनों को खरीद लेते हैं।

अनैतिक प्रकृति के लोग बहुधा अपनी चालाकी से धन कमा लेते या कोई उन्नति कर लेते देखे जाते हैं। इससे उस कमाई का सारा श्रेय अनैतिकता को नहीं दिया जा सकता। माना कि लोगों की कमजोरी और भोलेपन का लाभ कई शैतान उठा लेते हैं पर इस शैतानी के पीछे भी उनकी चतुरता, तीव्र−बुद्धि, तत्परता, सावधानी, लगन, हिम्मत, कष्ट सहिष्णुता आदि अनेक गुण छिपे रहते हैं। डाकुओं में भी पुरुषार्थ, हिम्मत, बहादुरी, कष्ट−सहिष्णुता, चतुरता, सावधानी अपने साथियों के प्रति वफादारी आदि अनेक मानसिक गुण भी होते हैं। यदि यह गुण किसी में न हों और वह केवल बेईमानी से ही कुछ लाभ उठाना चाहे तो उसका प्रयास एक कदम भी सफल नहीं हो सकता। अनैतिक लोगों की सफलता से चकित होकर कई लोग अनैतिकता को लाभ और सफलता का हेतु मानने लगते हैं यह भूल है। अनैतिकता के फलस्वरूप तो उन्हें सर्वत्र अविश्वास, घृणा, तिरस्कार, असहयोग एवं यथा अवसर राजकीय एवं ईश्वरीय दंड ही मिलता है। लाभ का श्रेय तो उस मनोभूमि को है जो प्रयत्नपूर्वक इतनी जल्दी बनाई गई कि अनैतिकता के दंड एवं लोगों की पकड़ से बचते हुए एक प्रकार की सफलता प्राप्त कर ली गई। बेवकूफ एवं आलसी, लापरवाह एवं अड़ियल प्रकृति के लोग अनैतिकता को अपनाकर भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। यदि पाप से ही कमाई होती हुई होती तो हर दुरात्मा को सफलता मिली होती। फिर जो लाखों अनैतिक मनोभूमि वाले भीख−टूक पर गुजारा करते दिखाई देते हैं वे सब के सब मालदार ही हो गये होते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 22

👉 सन्त का सान्निध्य

सन्त का सान्निध्य अनूठा है। इसके रहस्य गहरे हैं। सन्त के सान्निध्य में जो दृश्य घटित होता है वह थोड़ा है। लेकिन जो अदृश्य में घटता है वह ज्यादा है। उसका महत्त्व और मोल-अनमोल है। सन्त का सान्निध्य नियमित होता रहे, इसमें निरन्तरता बनी रहे तो अपने आप ही जीवनक्रम बदलने लगता है। मन में जड़ जमाये बैठी उल्टी आस्थाएँ-मान्यताएँ-आग्रह फिर से उलटकर सीधे होने लगते हैं। सन्त के सान्निध्य में विचार परिवर्तन-जीवन परिवर्तन के क्रांति स्फुलिंग यूँ ही उड़ते रहते हैं। इनके दाहक स्पर्श से जीवन की अवांछनीयताओं का दहन हुए बिना नहीं रहता।
  
सन्त के सान्निध्य में सत् का सत्य बोध अनायास हो जाता है। पर यह हो पाता है सन्त के चित् के कारण, उसके चैतन्य प्रवाह की वजह से। हालाँकि यह अदृश्य में घटित होता है, परन्तु इसकी अनुभूति आनन्द बनकर अस्तित्व में बरसती रहती है। यह आश्चर्यकारी परिवर्तन उन सभी में होता है जो सन्त के सान्निध्य में सजग होकर रहते हैं। यह ऐसा अनुभव है जिसे जब मन करे तभी पाया जा सकता है। बस इसके लिए चाहिए सन्त का सान्निध्य।
  
इस सम्बन्ध में बड़ा पावन प्रसंग है-सन्त फरीद के जीवन का। बिलाल नाम के एक व्यक्ति को कुछ षड्यन्त्रकारी लोगों ने उनके पास भेजा। उसने सन्त फरीद को कई तरह से परेशान करने की कोशिश की, पर वह सन्त शान्त रहे। सन्त की इस अचरज भरी शान्ति ने बिलाल के मन को छू लिया और वह उन्हीं के साथ रहने लगा। उसे सन्त के साथ रहते हुए कई वर्ष बीत गये। इन वर्षों में उसमें कई आध्यात्मिक परिवर्तन हुए। हालाँकि उसने इसके लिए कोई साधना नहीं की थी। बाबा फरीद के एक शिष्य ने थोड़ा हैरान होते हुए इसका रहस्य जानना चाहा। बाबा फरीद ने हँसते हुए कहा-सन्त का सान्निध्य स्वयं में साधना है। सन्त के सान्निध्य में अदृश्य आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह उमड़ता रहता है जो न चाहने पर भी पास रहने वाले के व्यक्तित्व के ऊपरी और भीतरी परतों को प्रभावित करता है। यह प्रक्रिया अदृश्य रूप में उसके चित्त एवं चेतना को घेरती है और परिणाम में अपने आप ही सन्त के सान्निध्य में आध्यात्मिक व्यक्तित्व जन्म पा जाता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६२

गुरुवार, 16 जनवरी 2020

Aastikata Aur Sajjanata Ki Riti Niti | आस्तिकता और सज्जनता की रीति नीति ...



Title

👉 पीला पत्ता क्यों गिरा?


👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 2)

Q.4. What is the most suitable time of the day for Upasana?  

Ans. Brahm Muhoort i.e. an hour before sunrise in the morning, and just before sunset in the evening to an hour thereafter bring forth maximum result. During day Upasana may be carried out any time according to one’s convenience. Although a fixed routine in timings is recommended yet it is not mandatory. As a matter of fact, mental Jap may be carried on even while walking, travelling or lying on the bed. (The movements of lips, vocal chord and tongue are forbidden in the latter case.)

Q.5. Is  Gayatri Jap permissible during night time?

Ans. Sages had advised Jap during the day-time for two reasons. One: the nights are meant exclusively for rest. Any activity during the night (including Upasana) is likely to affect one’s health.
Two: since Sun is the deity of Gayatri, the radiations from the Sun are readily obtained from sunlight during day. Nevertheless, Upasana during the night is not a taboo. One may choose his own convenient time for Jap without any apprehension regarding the procedure.

Q.6. Is Jap permissible along-with other activities?

Ans. One may perform Jap even while walking or without taking a bath or during other physical activities. On such occasions, however, it should only be a mental process without movement of lips, larynx and tongue. Instead of taking the help of a rosary, a clock may be used for keeping a count.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 52

👉 सच्ची सम्पदा एवं विभूतियाँ

धन, यश, स्वास्थ्य, विद्या, सहयोग आदि विभूतियों के आधार पर इस संसार में नाना प्रकार की सम्पदायें और सुविधायें प्राप्त की जाती हैं। और यह विभूतियाँ मनुष्य की मानसिक स्थिति के अनुरूप आती या चली जाती हैं। भाग्य, देवता, ईश्वर, परिस्थिति आदि को भी दुख−सुख का कारण माना जाता है, पर थोड़ी और गहराई तक जाने पर यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि भाग्य एवं ईश्वर का वरदान एवं अभिशाप भी मनुष्य के अपने विचारों एवं कार्यों के आधार पर ही प्राप्त होता है। न तो ईश्वर अन्यायी है और न भाग्य लिखने वाला विधाता बावला है जो जिसका प्रारब्ध बिना विचारे चाहे जैसा लिख डाला करे। इस बाह्य जगत में अव्यवस्था चल भी सकती है, यहाँ रिश्वत, पक्षपात या भूल−चूक की गुँजाइश रहती है, पर सूक्ष्म जगत में ईश्वरीय विधान एवं कार्यफल के क्षेत्र में किसी प्रकार की गड़बड़ी संभव नहीं। वहाँ मनुष्य का कर्तृत्व ही परखा जाता है और उसी आधार पर प्रारब्ध का निर्माण किया जाता है। वस्तुतः पुरुषार्थ ही प्रारब्ध बनकर सामने आया हुआ है। आज का पुरुषार्थ अगले कल प्रारब्ध बनने वाला है। कर्म और उसका फल मिलने में देर−सवेर का जो अंतर रह जाता है वही भाग्य और ईश्वर को हमारे कर्म से बाहर की कोई स्वतन्त्र वस्तु मानने का भ्रम पैदा करता है। वस्तुतः कर्म ही प्रधान है। उसी का नाम आगे−पीछे भाग्य बन जाता है। मीठे दूध का नाम गुण और रूप भी तो समयानुसार बदलकर खट्टे गाढ़े दही के रूप में हो जाता है। प्रारब्ध और पुरुषार्थ का अन्तर भी दूध और दही जैसा ही नाममात्र का है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 21

👉 सद्गुरु प्रेम

प्रेम के दो पहलू हैं- विरह और मिलन। जिसने प्रेम किया है, वही इस सच को जान सकता है। प्रेम सद्गुरु से हो तो यह सच और भी सघन हो जाता है। प्रेम का पहला अनुभव विरह में होता है और इस अनुभव की पूर्णता मिलन में आती है। विरह न हो तो मिलन कभी होता ही नहीं है। ऐसे में सद्गुरु मिल भी जाय तो उनकी पहचान ही नहीं हो पाती। उन्हें अपने जैसा मनुष्य समझने का भ्रम बना रहता है। उनके अस्तित्व में व्याप्त गुरुतत्त्व से परिचय-पहचान और उसमें अपने व्यक्तित्व का समर्पण-विसर्जन-विलय नहीं बन पड़ता।
  
विरह में व्यक्तित्व पकता है- उसमें जन्म होता है साधक का, भक्त का और शिष्य का। इस अवस्था में चुभते हैं अनेक प्रश्न कंटक, होती हैं अनगिन परीक्षाएँ, तब आती है मिलन की उपलब्धि। सच यही है कि विरह तैयारी है और मिलन उपलब्धि। आँसुओं से रास्ते को पाटना पड़ता है तभी मिलता है सद्गुरु के मन्दिर का द्वार। रो-रोकर काटनी पड़ती है विरह की लम्बी रात, तभी आती है मिलन की सुबह। जिसकी आँखें जितनी ज्यादा रोती हैं, उसकी सुबह उतनी ही ताजा होती है। जितने आँसू बहे होते हैं, उतने ही सुन्दर सूरज का जन्म होता है।
  
शिष्य के विरह पर निर्भर है कि उसका सद्गुरु मिलन कितना प्रीतिकर, कितना गहन और कितना गम्भीर होगा। जो आसानी से मिलता है, वह आसानी से बिछुड़ता भी है। मिलकर कभी भी न बिछुड़ने वाले सद्गुरु बहुत रोने के बाद ही मिलते हैं। और आँसू भी साधारण आँसू नहीं, हृदय ही जैसे पिघल-पिघल कर आँसुओं में बहता है। जैसे रक्त आँसू बन जाता है, जैसे प्राण ही आँसू बन जाते हैं।
  
विरह अवस्था है पुकार की। शिष्य को भरोसा है कि सद्गुरु हैं तो अवश्य, पर न जाने क्यों दीख नहीं रहे। विरह का अर्थ है कि हम तुम्हें तलाशेंगे। कितनी ही हो कठिन यात्रा, कितनी ही दुर्गम क्यों न हो, हम सब दाँव पर लगाएँगे, मगर तुमसे मिलकर ही रहेंगे, शिष्य का हृदय चीत्कार कर हर पल यही कहता है, तुम जो अदृश्य हो तुम्हें दृश्य बनना ही होगा। तुम जो दूर स्पर्श के पार हो, तुमसे आलिंगन करना ही होगा।
  
अदृश्य हो चुके अपने सद्गुरु से आलिंगन की आकांक्षा, उनके अदृश्य रूप को अपनी आँखों में भर लेने की आकांक्षा विरह है। शिष्य के लिए इसमें कड़ी अग्नि परीक्षाएँ हैं। उसे गलना, जलना और मिटना पड़ता है। जिस दिन राख-राख हो जाता है उसका अस्तित्त्व, उस दिन उसी राख से सद्गुरु का मिलन प्रारम्भ हो जाता है। और तभी आती है सद्गुरु प्रेम की पूर्णता।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६२

मंगलवार, 14 जनवरी 2020

👉 यार~यार की लड़ाई

एक बार एक महात्मा जी बीच बाजार में से कहीँ जा रहे थे। वहीं पास के एक कोठे की छत पर एक वैश्या पान खा रही थी। अचानक उसने बेख्याली से उसने पान की पीक नीचे थूकी और वो पीक नीचे जा रहे महात्मा जी के ऊपर गिरी।

महात्मा जी ने ऊपर देखा वेश्या की ओर तथा मुस्करा कर आगे की और बढ़ गए। यह देखकर वैश्या को अपना अपमान समझ, गुस्सा आया। उसने वहीं पर बैठे अपने यार को कहा कि तुम्हारे होते, कोई मुझे देखकर मुस्कुरा रहा है और तुम यहाँ बैठे हो।

इतना सुनकर उसके यार ने वहीं पड़ा डंडा उठाया और नीचे उतरकर आगे जा रहे महातमा जी के सर पर जोर से दे मारा और वैश्या की तरफ देखकर मुस्कुराया, कि देख, मैंने बदला ले लिया है।

महात्मा जी ने अपना सर देखा जिसमे से खून निकल रहा था। तब भी महात्मा जी कुछ नहीं बोले और मुस्करा दिए और वहीं पास के एक पेड़ के नीचे बैठ गए। उस वैश्या का यार मुस्कुराता हुआ वापस लौटने लगा। जब वो कोठे की सीढ़ियां चढ़ रहा था, तो सबसे ऊपर की सीढ़ी से उसका पैर फिसला और वो सबसे नीचे आ गिरा और उसके बहुत ज्यादा चोट लगी।

ये सब वो वैश्या देख रही थी और वो समझ गई कि वो महात्मा जी बहुत ही नाम जपने वाले और सच्चे है। वो नीचे आई और महात्मा जी के पास जाकर पैरो में गिरकर बोली - महात्मा जी मुझे माफ़ कर दो मैंने ही आपके पीछे अपने यार को भेजा था। उसने ही आपके सर पर वार किया था मुझे माफ़ कर दो ।

तो उन महात्मा जी ने मुस्करा कर कहा कि बेटी इस सारे झगड़े में तू और मैं कहाँ से आ गए। इसमें  तुम्हारा और मेरा कोई दोष नहीं है ये यार~यार की लड़ाई है। "तुम्हारे यार से तुम्हारी बेइज्जती नहीं देखी गई" और मेरा यार जो वो ऊपरवाला है उससे मेरी तकलीफ नहीं देखी गई। इसलिए इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। और तुम्हारा यार तो तुम्हारे पास कभी कभी ही आता है कभी दिन में कभी रात में, लेकिन मेरा यार हर वक़्त मेरे साथ ही रहता है।

इसलिए तुम भी उसी की शरण लो जो हर वक़्त तुम्हारे साथ ही रहे। "जिंदगी में भी और जिंदगी के बाद भी "

👉 विदुर का भोजन और श्रीकृष्ण


👉 असंयम ही रोग का कारण

स्वास्थ्य संयम पर निर्भर है। इन्द्रियों का संयम, आहार का संयम, ब्रह्मचर्य का संयम, दिनचर्या का संयम, उत्तेजनाओं का संयम यदि रखा जा सके तो फिर स्वास्थ्य बिगड़ने का प्रारब्धजन्य कर्म भोगों के अतिरिक्त और कोई कारण शेष नहीं रह जाता। यदि संयम साध लिया जाय तो गरीबी में दिन काटने वाला, घटिया आहार पाकर भी निरोग और दीर्घजीवी रह सकता है। इसके विपरीत असंयमी व्यक्ति विपुल धनवान होकर मूल्यवान आहार और औषधियों का सहारा मिलने पर भी रोगों से ग्रसित बना रहेगा। कमजोरी और बीमारी का अभिशाप असंयम के दंड स्वरूप मिलता है। यदि इन आपत्तियों से छूटना हो तो अपनी उच्छृंखल आदतों को संयमित करना पड़ेगा। इसके बिना स्वास्थ्य सुधार के जितने भी उपाय किये जायेंगे वे क्षणिक चमत्कार भले ही दिखा दें अन्ततः असफल ही रहेंगे।

कोई औषधि कोई पद्धति ऐसी नहीं है जो असंयम के रहते हुए आरोग्य को सुरक्षित रख सके। जिसने संयम साध लिया उसके लिए उपयोगी आहार का कोई विशेष महत्त्व नहीं रह जाता। घास खाकर घोड़ा, पत्ती खाकर हाथी, मैला खाकर सुअर यदि बलवान रह सकता है तो कोई कारण नहीं कि अन्न शाक और दूध जैसे उत्तम पदार्थ प्राप्त करके भी मनुष्य निरोग एवं दीर्घजीवी न रह सके। असंयम ही वह असुर है जो हमारी स्वास्थ्य संपदा को सब प्रकार चौपट किये दे रहा है। इसे मार भगाने का व्यापक अभियान यदि आरंभ किया जाय तो ही स्वास्थ्य की समस्या हल हो सकेगी। अस्पताल और डाक्टर तो क्षणिक उपचार कर सकते हैं, तात्कालिक लाभ दिखा सकते हैं। आरोग्य तो हमारी आदतों पर निर्भर है, यदि जीवन-यापन संबंधी आदतें बिगड़ी हुई हैं तो निरोगता को स्थिर रख सकना किसी भी प्रकार संभव न होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 1)

Q.1. What is significance of correct pronunciation of the Mantra?

Ans. All Ved Mantras have a poetic composition (syntax) with specified musical notes. When a Mantra is recited acoustic vibrations surpassing ultrasonic frequencies are produced. These waves travel in an “extra-sensory telepathic medium” enveloping the cosmos and interact with the thought processes of all living beings. In order to strengthen the intensity of these waves, the Gayatri Mantra is recited in course of Yagya-Havan, on auspicious occasions and at the beginning of all religious ceremonies. Three different types of musical (phonetic) compositions are mentioned for the Gayatri Mantra  in the Vedas. The one specified in the Yajurveda is recommended for the masses.

Q.2. What is the methodology of chanting of Mantra during Jap?

Ans. During the routine, solo Jap, the Mantra is pronounced in such a way that although there is a slight movement of lips, larynx and tongue, it produces a resonance inaudible to anyone except the worshipper. In a mass the Mantra is pronounced loudly in unison.

Q.3. How is it possible for illiterate persons and children to do Gayatri Sadhana, for whom the pronunciation of the Mantra is somewhat difficult? 
              
Ans. Illiterate persons who cannot utter Gayatri Mantra correctly, can perform Jap of Panchakshari Gayatri “Om bhoor Bhuvaha Swaha.” If they cannot utter even these words correctly, they can perform Jap of  “Hari Om Tat-Sat.” This also serves the purpose of Panchakshari Gayatri Mantra.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 51

👉 गुरुगीता

गुरुगीता शिष्यों का हृदय गीत है। गीतों की गूँज हमेशा हृदय के आँगन में ही अंकुरित होती है। मस्तिष्क में तो सदा तर्कों के संजाल रचे जाते हैं। मस्तिष्क की सीमा बुद्धि की चहारदिवारी तक है, पर हृदय की श्रद्धा सदा विराट् और असीम है। मस्तिष्क तो बस गणितीय समीकरणों की उलझनों तक सिमटा रहता है। इसे अदृश्य, असम्भव, असीम एवं अनन्त का पता नहीं है। मस्तिष्क मनुष्य में शारीरिक-मानसिक संरचना व क्रिया की वैज्ञानिक पड़ताल कर सकता है, परन्तु मनुष्य में गुरु को ढूँढ लेना और गुरु में परमात्मा को पहचान लेना हृदय की श्रद्धा का चमत्कार है।
  
गुरुगीता के महामंत्र इसी चमत्कारी श्रद्धा से सने हैं। इनकी अनोखी-अनूठी सामर्थ्य का अनुभव श्रद्धावान् कभी भी कर सकते हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण के वचन हैं-‘श्रद्धावान् लभते ज्ञानं’ जो श्रद्धावान् हैं वही ज्ञान पाते हैं। यह श्रद्धा बड़ी दुस्साहस की बात है। कमजोर के बस की बात नहीं है, बलवान की बात है। श्रद्धा ऐसी दीवानगी है कि जब चारों तरफ मरूस्थल हो और कहीं हरियाली का नाम न दिखाई पड़ता हो, तब भी श्रद्धा भरोसा करती है कि हरियाली है, फूल खिलते हैं। जब जल का कहीं कण भी न दिखाई देता हो, तब भी श्रद्धा मानती है कि जल के झरने हैं, प्यास तृप्त होती है। जब चारों तरफ पतझड़ हो तब भी श्रद्धा में वसन्त ही होता है।
  
जो शिष्य हैं उनका अनुभव यही कहता है कि श्रद्धा में वसन्त का मौसम सदा ही होता है। श्रद्धा एक ही मौसम जानती है-वसन्त। बाहर होता रहे पतझड़, पतझड़ के सारे प्रमाण मिलते रहें, लेकिन श्रद्धा वसन्त को मानती है। इस वसन्त में भक्ति के गीत गूँजते हैं। समर्पण का सुरीला संगीत महकता है। जिनके हृदय भक्ति से सिक्त हैं, गुरुगीता के महामंत्र उनके जीवन में सभी चमत्कार करने में सक्षम हैं। अपने हृदय मंदिर में परम पूज्य गुरुदेव की प्राण-प्रतिष्ठा करके जो भावभरे मन से गुरुगीता का पाठ करेंगे, उनका अस्तित्व गुरुदेव के दुर्लभ अशीषों की वृष्टि से भीगता रहेगा। गुरुगीता उन्हें प्यारे सद्गुरु की दुर्लभ अनुभूति कराती रहेगी। ऐसे श्रद्धावान् शिष्य की आँखों से करुणामय परम पूज्य गुरुदेव की झाँकी कभी ओझल न होगी।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६१

👉 चुनौतियों से कैसे लड़े

कंकड़ इतना छोटा सा की ऊंगली पर आ जाए। किन्तु यदि सोचिये यही कंकड़ आँख में लग जाए, तो कितनी बड़ी समस्या बन जाता है? अब सोचिये ये कंकड़ आपके मार्ग में है, आप पादुकाएँ पहन बड़ी सरलता से आगे निकल जा सकते हैं। किन्तु यही कंकड़ आपके पांव और पादुकाओं के बीच फँस जाए, तो आप ठीक से चल नहीं पायेंगे, भले ही वो मार्ग पुष्पों से भरा क्यों न हो। अर्थात आप बाहर की समस्याओं से उन चुनौतियों से लड़ सकते हैं, भीतर की नहीं। भीतर की समस्याओं से लड़ना अत्यंत कठिन होता है। इसलिये सर्वप्रथम आप भीतर से शक्तिशाली हो जाइये, भीतर से पूर्ण हो जाइये, फिर आप इस संसार की सब चुनौतियों, समस्याओं से लड़ सकते हैं। विजयी हो सकते हैं।

सोमवार, 13 जनवरी 2020

👉 अहंकार का प्रदर्शन


👉 नव निर्माण हेतु विभूतियों का आह्वान (अन्तिम भाग)

(६) सम्पदा-विभूतियों में इन दिनों सर्वोपरि मान्यता पूँजी को मिली है। धन का वर्चस्व सर्वविदित है। सम्पत्ति में स्वयं कोई दोष नहीं। दोष उसके दुरुपयोग में है। व्यक्तिगत विलासिता में, अहंता की वृद्धि में यदि उसका उपयोग होता है, संग्रह बढ़ता है एवं उसका लाभ बेटे-पोतों तक ही रखने का प्रयत्न किया जाता है, तो निस्संदेह ऐसा धन निन्दनीय है। अगले दिनों समता के आधार पर ही समाज व्यवस्था बनेगी। सामर्थ्य भर श्रम एवं आवश्यकता भर साधन प्राप्त करने का क्रम चले तभी सम्पदा पर व्यक्ति का नहीं समाज का अधिकार होगा। न कोई गरीब दिखाई देगा न अमीर। पर जब तक वह स्थिति नहीं बन जाती तब तक संग्रहीत पूँजी को लोकमंगल के लिए लगाने की दूरदर्शिता दिखाने के लिए धनपतियों को कहा जायेगा।

दान न सही कम से कम इतना तो होना ही चाहिए कि युग परिवर्तित का पथ प्रशस्त करने वाले प्रचारात्मक कार्यक्रमों में पूँजी की कमी न पड़े। भले ही यह व्यवसाय बुद्धि से किया जाय तो भी इतना होना ही चाहिए कि युग परिवर्तन के प्रवाह में अनुकूलता उत्पन्न करने वाला विनियोग इस पूँजी का हो सके। पिछले पृष्ठों पर ऐसे कितने ही क्रिया कलापों की चर्चा की गई है, जिसमें पूँजी के रूप में भी यदि धन लग सके, यदि उन क्रिया कलापों को व्यावसायिक रूप में खड़ा किया जा सके तो भी बहुत कुछ हो सकता है। (१) साहित्य प्रकाशन (२) चित्र प्रकाशन (३) अभिनय मंडलियाँ (४) ग्रामोफोन रिकार्ड (५) फिल्म निर्माण। यह पाँच कार्य ऐसे हैं, जिनके लिए विशालकाय अर्थसंस्थान खड़े किये जाने चाहिए और लोकमानस को परिष्कृत बनाने की आवश्यकता पूरी की जानी चाहिए।

(७) प्रतिभायें-प्रतिभा एक वशिष्ठ और अतिरिक्त विभूति है। कुछ लोगों के व्यक्तित्व ऐसे साहसी, स्फूर्तिवान् सूक्ष्मदर्शी, मिलनसार, क्रियाकुशल और प्रभावशाली होते हैं कि वे जिस काम को भी हाथ में लें उसी को अपने मनोयोग एवं व्यवहार कुशलता के आधार पर गतिशील बनाते चले जाते है और सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचा देते हैं। इस विशेषता को प्रतिभा कहते हैं। सूझबूझ, आत्म विश्वास, कर्मठता जैसे अनेक सद्गुण उनमें भरे रहते हैं। आमतौर से ऐसे ही लोग महान कार्यों के संस्थापक एवं संचालक होते हैं। सफलतायें उनके पीछे छाया की तरह फिरती हैं, क्योंकि उन्हें ज्ञान होता है कि कठिनाइयों से कैसे निपटा जाता है, उन्हें सरल कैसे बनाया जाता है।

प्रतिभाशाली व्यक्ति ही सफल सन्त, राजनेता, समाजसेवी, साहित्यकार, कलाकार, व्यवसायी, व्यवस्थापक होते देखे गये हैं। प्रतिभाएँ ही डाकू, चोर, ठग जैसे दुस्साहस पूर्ण कार्य करती हैं। सेनाध्यक्षों के रूप में, लड़ाकू योद्धाओं के रूप में उन्हें ही अग्रिम पंक्ति में देखा जाता है। क्रान्तिकारी भी इसी तरह के लोग बनते हैं। प्रतिभाशाली तत्व जहाँ कहीं भी चमक रहे हो वहाँ से उन्हें आमंत्रित किया जा रहा है कि वे अपने ईश्वरीय अनुदान को निरर्थक विडम्बनाओं में खर्च न करें वरन् उसे नव निर्माण के ऐसे महान प्रयोजन में नियोजित कर दें जिसमें उनका, उनकी प्रतिभा का तथा समस्त संसार का हित साधन हो सके।

.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 युवा शक्ति

संवेदना और साहस की सघनता में युवा शक्ति प्रज्वलित होती है। जहाँ भाव छलकते हों और साहस मचलता हो, समझो वहीं यौवन के अंगारे शक्ति की धधकती ज्वालाओं में बदलने के लिए तत्पर हैं। विपरीतताएँ इसे प्रेरित करती हैं, विषमताओं से इसे उत्साह मिलता है। समस्याओं के संवेदन इसमें नयी ऊर्जा का संचार करते हैं। काल की कुटिल व्यूह रचनाओं की छुअन से यह और अधिक उफनती है और तब तक नहीं थमती जब तक कि यह इन्हें पूरी तरह से छिन्न-भिन्न न कर दे।
  
हारे मन और थके तन से कोई कभी युवा नहीं होता, फिर भले ही उसकी आयु कुछ भी क्यों न हो? यौवन तो वहीं है, जहाँ शक्ति का तूफान अपनी सम्पूर्ण प्रचण्डता से सक्रिय है। जो अपने महावेग से समस्याओं के गिरि शिखरों को ढहाता, विषमताओं के महावटों को उखाड़ता और विपरीतताओं के खाई-खड्ढों को पाटता चलता है। ऐसा क्या है? जो युवा न कर सके? ऐसी कौन सी मुश्किल है जो उसकी शक्ति को थाम ले? अरे वह युवा शक्ति की क्या? जिसे कोई अवरोध रोक ले।
  
समस्याओं की परिधि व्यक्तिगत हो या पारिवारिक, सामाजिक-राष्ट्रीय हो अथवा वैश्विक, युवा शक्ति इनका समाधान करने में कभी नहीं हारी है। रानी लक्ष्मीबाई, वीर सुभाष, स्वामी विवेकानन्द, शहीद भगतसिंह के रूप में इसके अनगिन आयाम प्रकट हुए हैं। यह प्रक्रिया आज भी जारी है। देह का महाबल, प्रतिभा की पराकाष्ठा, आत्मा का परम तेज और सबसे बढ़कर महान उद्देश्यों के लिए इन सभी को न्यौछावर करने के बलिदानी साहस से युवा शक्ति ने सदा असम्भव को सम्भव किया है। इनकी एक हुंकार से साम्राज्य सिमटे हैं, राज सिंहासन भूलुंठित हुए हैं और नयी व्यवस्थाओं का नवोदय हुआ है।
    
सचमुच ही यौवन भगवती महाशक्ति का वरदान है। यहाँ वह अपनी सम्पूर्ण महिमा के साथ प्रदीप्त होती है। दुष्ट दलन, सद्गुण पोषण एवं कलाओं के सौन्दर्य सृजन के सभी रूप यहीं प्रकट होते हैं। ध्यान देने की बात यह है कि यौवन में शक्ति के महानुदान मिलते तो सभी को हैं, पर टिकते वहीं हैं जहाँ इनका सदुपयोग होता है। जरा सा दुरुपयोग होते ही शक्ति यौवन की संहारक बन जाती है। कालिख की अँधेरी कालिमा में इसकी प्रभा विलीन होने लगती है। इसलिए युवा जीवन की शक्ति सम्पन्नता सार्थक यौवन में ही संवर्धित हो पाती है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५९

👉 FALLACIES ABOUT SCRIPTURAL RESTRICTIONS (Part 5)

Q.5. Is audible chanting of Gayatri scripturally permissible?
Ans. Some people say that Gayatri Mantra being a “secret” Mantra should only be whispered in the ear during initiation. This may apply to Tantrik Mantras but not to Gayatri Mantra. According to scriptures the Ved Mantras should be chanted loudly with tune or accent according to specified notation. Whispering is needed only for secrecy and it is done in seclusion in conspiracies. There is nothing in Gayatri Mantra necessitating such a secrecy.  

Nowhere in the scriptures, audible chanting of Gayatri is forbidden. The tradition of whispering the Mantra in the ears of the person being initiated owes its origin to the vested interests of the dark middle ages, when a particular class of society amongst the Hindus claimed exclusive rights to Gayatri worship and its initiation in order to prove its superiority in spiritual matters. Nothing can be more ludicrous than preaching secrecy and advocating intellectual proprietary rights on worship of God. (During the medieval period the Popes in Europe indulged in similar corrupt practices.)    In fact, the scriptures clearly emphasize the need to rhyme the Gayatri Mantra . In Devi Bhagwat (11.3.11) it is mentioned that “Since it protects its singer, it is known as Gayatri”. The ‘Chandogyaupnishad” (Shankar Bhasya) too confirms this assertion. The ‘Niruktam’ says that since this Mantra was used by the Devtas for praying (Stuti), it came to be known as Gayatri Mantra (7.12). Besides, literally the word Gayatri is composed of two words- Gai and Train. In sanskrit Gai stands for ‘To sing’ and Train means ‘to look after’ or ‘to protect’, i.e. it protects the one who sings it.

Hence, arguments against audible chanting of this Mantra have no basis whatsoever.
          
Ordinarily Jap should be performed in such a way that throat, lips, tongue may go on moving but even a person sitting close by may not be able to hear. It is possible to have estimation of average time and number of Japs with the help of a Mala. Those who do not possess a Mala can estimate the number approximately with the help of time. Tulsi, Sandal-wood Malas are most appropriate ones for performance of Jap. For Tantrik applications Rudraksh Malas are used.
  
Ordinarily, words are pronounced by the movement of throat, palate, tongue, lips etc., According to spiritual science it is also mentioned that there are some subtle centres, channels etc. within the human body which vibrate along with utterance of words.      
As soon as the key of a type-writer is pressed, there is a stroke on the paper and the particular letter is typed on it. The letters of Gayatri Mantra have been selected in such a manner that by utterance thereof specific ultrasonic sound waves are created and positive attributes of Gun (virtues), Karma (action) and Swabhav (nature) get activated. A  Sadhak gains spiritually as well as materially by this Sadhana.
  
Mental Jap without moving the lips can be performed during illness or in a journey when a person cannot take a bath and during the period of Sootak when there is birth or death in a family. It can also be done while walking on a the road or lying on the bed at night.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 49

Om Namah Namo Omkar | ॐ नमः नमो ओमकार | Shantikunj Haridwar



Title

शनिवार, 11 जनवरी 2020

👉 नारी का सम्मान


👉 दिमाग की शक्ति


👉 भारत माता

भारत माता का आँचल हिमालय के श्वेत शिखरों से लेकर केरल की हरियाली तक फैला हुआ है। कन्याकुमारी के महासागर की तरंगों में इसकी तिरंगी आभा लहराती है। माता अपने आँचल में अपनी सभी एक सौ तीस करोड़ संतानों को समेटे हुए हैं। सभी जातियाँ, सभी वंश इसी की कोख से उपजे हैं। अपनी छाती चीरकर सभी के लिए पोषण की व्यवस्था जुटाती है। संतानों का सुख ही इस माँ का सुख है, संतानों का दुःख ही इसकी पीड़ा।
  
इस प्रेममयी जननी ने अपने पुत्रों के लिए, पुत्रियों के लिए बहुत कुछ सहा है। परायों के आघातों ने इसे कष्ट तो दिया, पर इसके धैर्य को डिगा नहीं पाये। गोरी, गजनी जैसे आक्रान्ताओं की मर्मान्तक चोटों को इसने न केवल सहा, बल्कि उन्हें उदारतापूर्वक क्षमा भी किया। तैमूरलंग, चंगेजखान की क्रूरताओं को इसने बिना विचलित हुए बर्दाश्त किया। यहाँ तक कि इन सभी के वंशजों को अपनी संतान समझकर अपने आँचल की छाँव दी।
  
यह क्षमामयी माता बिलखी तो तब, तड़पी तो तब, जब अपनों ने ही मीरजाफर, जयचन्द बनकर इस पर वार किये। माँ की ममता को छला, इसकी भावनाओं को आहत किया, कोख को लजाया। आज भी जब इसके अपने बच्चे परायों के बहकावे में आकर अपनों को आतंकित करते हैं, क्रूरता के कुकृत्य करते हैं, तो इस धैर्यमयी का धीरज रो पड़ता है। समझ में नहीं आता कि यह किससे कहें, कैसे कहें अपनी पीड़ा? कहाँ बाँटें अपना दर्द।
  
हालाँकि भारत माता के सत्पुत्रों, सत्पुत्रियों की भी कमी नहीं है। वीर शिवाजी, महाप्रतापी राणाप्रताप, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, इसके यश को दिगन्तव्यापी बनाने वाले विवेकानन्द, इस पर अपने सुखों को न्यौछावर करने वाले सुभाष, गाँधी, इसके दुःखों को मिटाने के लिए सदा-सर्वदा तप में रत युगऋषि आचार्य श्रीराम शर्मा-इन मातृभक्तों ने ही तो इसे गुलामी से मुक्त कर गौरान्वित किया। आज माता ने फिर से अपनी संतानों की संवेदना को पुकारा है, जो इसकी कोख का मान रखें, इसके आँचल की अखण्डता बनाये रखें।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५८

👉 FALLACIES ABOUT SCRIPTURAL RESTRICTIONS (Part 4)

Q.4. I have already taken Diksha (initiation) from a Guru. Will it be proper for me to seek another Guru?

Ans. There are no restrictions on choosing more than one Guru. It all depends on the type and level of achievement sought for. Ram had Vashistha as his family Guru and Vishwamitra for learning of martial and other branches of knowledge. Dattatreya is known for having twenty four Gurus. Durvasa was family-Guru of Krishna and Brahaspati was his Guru in respect of learning the specific branches of knowledge.              

In schools, with the change in class, teachers also change. Village Purohit, Teerth Purohit, Family Purohit, Dikcha Purohit, Sadhana Purohit are all different. They do not contradict but supplement each other.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 48

👉 नव निर्माण हेतु विभूतियों का आह्वान (भाग ४)

(४) विज्ञान-विज्ञान की उपलब्धियाँ आश्चर्यजनक हैं। उसने मानवी सुख सुविधाओं में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि की है। पर यह भी सही है कि उसके दुरुपयोग से होने वाली हानियाँ भी कम नहीं उठानी पड़ रही हैं। अस्त्रों के उत्पादन में विशेषतया गैसें, किरणें एवं अणु विस्फोटजन्य अस्त्रों ने तो संसार के अस्तित्व को ही संकट में डालने वाली विभीषिका उत्पन्न कर दी है। यदि यह शोध, आविष्कार सृजनात्मक प्रयोजनों तक ही सीमित रहे, तो उसका प्रतिफल धरती पर स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है। ध्वंसात्मक उपकरण जुटाने में जितने साधन खपाये जा रहे हैं, यदि उन्हें मानवी अभावों और शोक-सन्तापों की निवृत्ति में लगा दिया जाय, तो उसका प्रतिफल इस संसार को स्वर्गोपम बनाने में हो सकता है। समुद्र के खारे पानी से मीठा जल प्राप्त किया जा सकता है। जमीन के नीचे बहने वाली विशाल नदियों का जल धरती पर लाया जा सकता है और सारी दुनियाँ सचमुच शस्यश्यामला बन सकती है। कृषि, पशुपालन, बागवानी, वन सम्पदा, स्वास्थ्य सम्वर्धन और मस्तिष्कीय विकास की दिशा में विज्ञान को अभी बहुत काम करना बाकी है। प्रकृति के प्रकोपों से लोहा लेने के साधन जुटाने में, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी, भूकम्प, बाढ़, तूफान, शीत-ताप की असहनीयता का सामना करने योग्य शक्ति का उपार्जन हो सकता है। वाहनों को सरल एवं सस्ता बनाया जा सकता है, संचार साधनों के विस्तार की अभी बहुत गुंजायश है।

(५) शासन सत्ता-राज सत्ता जिनके हाथ में इन दिनों है अथवा अगले दिनों आने वाली है, उन्हें संकीर्ण राष्ट्रीयता के अपने प्रिय क्षेत्र या वर्ग के लोगों को लाभान्वित करने की बात छोड़कर समस्त विश्व में समान रूप से सुख शान्ति की बात सोचनी होगी और समस्त संसार को एक परिवार बनाने की नीति अपना कर प्रकृति प्रदत्त साधनों एवं मानवी उपार्जन को समान रूप से सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध करना होगा। युद्धों की भाषा में सोचना बन्द कर न्याय का आधार स्वीकार करना होगा। वर्गभेद और वर्णभेद की जड़े उखाड़नी होंगी।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

👉 मनुष्य खोज रहा हूँ


👉 जल्दबाजी का दुष्परिणाम


👉 माँ

गाँव के सरकारी स्कूल में संस्कृत की क्लास चल रही थी। गुरूजी दिवाली की छुट्टियों का कार्य बता रहे थे।

तभी शायद किसी शरारती विद्यार्थी के पटाखे से स्कूल के स्टोर रूम में पड़ी दरी और कपड़ो में आग लग गयी। देखते ही देखते आग ने भीषण रूप धारण कर लिया। वहां पड़ा सारा फर्निचर भी स्वाहा हो गया।

सभी विद्यार्थी पास के घरो से, हेडपम्पों से जो बर्तन हाथ में आया उसी में पानी भर भर कर आग बुझाने लगे।

आग शांत होने के काफी देर बाद स्टोर रूम में घुसे तो सभी विद्यार्थियों की दृष्टि स्टोर रूम की बालकनी (छज्जे) पर जल कर कोयला बने पक्षी की ओर गयी।

पक्षी की मुद्रा देख कर स्पष्ट था कि पक्षी ने उड़ कर अपनी जान बचाने का प्रयास तक नही किया था और वह स्वेच्छा से आग में भस्म हो गया था।

सभी को बहुत आश्चर्य हुआ।

एक विद्यार्थी ने उस जल कर कोयला बने पक्षी को धकेला तो उसके नीचे से तीन नवजात चूजे दिखाई दिए, जो सकुशल थे और चहक रहे थे।

उन्हें आग से बचाने के लिए पक्षी ने अपने पंखों के नीचे छिपा लिया और अपनी जान देकर अपने चूजों को बचा लिया था।

एक विद्यार्थी ने संस्कृत वाले गुरूजी से प्रश्न किया -
"गुरूजी, इस पक्षी को अपने बच्चो से कितना मोह था, कि इसने अपनी जान तक दे दी ?"

गुरूजी ने तनिक विचार कर कहा -
"नहीं,
यह मोह नहीं है अपितु माँ के ममत्व की पराकाष्ठा है, मोह करने वाला ऐसी विकट स्थिति में अपनी जान बचाता और भाग जाता।"

भगवान ने माँ को ममता दी है और इस दुनिया में माँ की ममता से बढ़कर कुछ भी नहीं है।

👉 स्वस्थ मन का रहस्य

जो अपनी जिन्दगी में कुछ करने में असफल रहते हैं, वे प्रायः आलोचक बन जाते हैं। दूसरों की कमियाँ देखना, निन्दा करना उनका स्वभाव बन जाता है। यहाँ तक कि ऐसे लोग अपनी कमियों -कमजोरियों का दोष भी दूसरों के सिर मढ़ देते हैं। सच यही है कि जीवन पथ पर चलने में जो असमर्थ हैं, वे राह के किनारे खड़े होकर औरों पर पत्थर फेंकने लगते हैं।
  
दरअसल यह मन की रोगी दशा है। मानसिक ज्वर या मन की रोगग्रस्त स्थिति में ही मनुष्य ऐसे काम करता है। जब भी किसी की निन्दा का विचार मन में उठे तो जानना कि अब हम भी इसी रोग से पीड़ित हो रहे हैं। ध्यान रहे स्वस्थ मन वाला व्यक्ति कभी किसी की निन्दा में संलग्न नहीं होता। यहाँ तक कि जब दूसरे उसकी निन्दा कर रहे होते हैं, तो वह उन पर दया ही अनुभव करता है। शरीर से बीमार ही नहीं, मन से बीमार भी दया के पात्र हैं।
  
लोकमान्य तिलक से किसी ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा, कई बार आपकी बहुत निन्दापूर्ण आलोचनाएँ होती हैं, लेकिन आप तो कभी विचलित नहीं होते। उत्तर में लोकमान्य मुस्कराए और बोले- निन्दा ही क्यों, कई बार लोग प्रशंसा भी करते हैं। ऐसा कहकर उन्होंने पूछने वाले की आँखों में गहराई से झाँका और बोले - यह है तो मेरी जिन्दगी का रहस्य, पर मंै आपका बता देता हूूँ। निन्दा करने वाले मुझे शैतान समझते हैं और प्रशंसक मुझे भगवान् का दर्जा देते हैं। लेकिन सच मैं जानता हूँ और वह सच यह है कि मैं न तो शैतान हूँ और न ही भगवान्। मैं तो एक इन्सान हूँ जिसमें थोड़ी कमियाँ है और थोड़ी अच्छाईयाँ और मैं अपनी कमियों को दूर करने एवं अच्छाईयों को बढ़ाने में लगा रहता हूँ।
  
एक बात और भी है- लोकमान्य ने अपनी बात आगे बढ़ाई। जब अपनी जिन्दगी को मैं ही अभी ठीक से नहीं समझ पाया, तो भला दूसरे क्या समझेंगे। इसलिए जितनी झूठ उनकी निन्दा है, उतनी ही उनकी प्रशंसा है। इसलिए मैं उन दोनों बातों की परवाह न करके अपने आपको और अधिक सँवारने-सुधारने की क ोशिश करता रहता हूँ। सुनने वाले व्यक्ति को इन बातों को सुनकर लोकमान्य तिलक के स्वस्थ मन का रहस्य समझ में आया। उसे अनुभव हुआ कि स्वस्थ मन वाला व्यक्ति न तो किसी की निन्दा करता है और न ही किसी निन्दा अथवा प्रशंसा से प्रभावित होता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५७

👉 FALLACIES ABOUT SCRIPTURAL RESTRICTIONS (Part 3)

Q.3. Is Guru mandatory for Gayatri worship?

Ans. Gayatri is also known as Guru-Mantra i.e. to achieve a higher level of spiritual accomplishment, one needs an experienced Guru as a spiritual guide and protector. Let us draw an analogy from other fields. Some fields of learning require only books, whereas for others like music, crafts, etc. direct help of an expert is needed. Similarly, though the daily rituals of Gayatri worship are quite simple, for higher levels of achievement when the worshipper, (depending upon his own personal spiritual status acquired through previous births) faces several ups and downs, an experienced Guru is needed just as a doctor is required during treatment of a disease. Thus, though one can take up Gayatri worship without a Guru, initiation by a proper experienced Guru is advisable enlightened spiritul master is necessary for receiving instruction and direction for accelerating one’s spiritual growth. The spiritual evolution of the soul is a prolonged process continuing through countless cycles of births and deaths. Sought in a hurry, an inexperienced person posing as Guru may do more harm than good to the disciple.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 46

गुरुवार, 9 जनवरी 2020

👉 नव निर्माण हेतु विभूतियों का आह्वान (भाग ३)

(३) कला मंच से भाव स्पन्दन-कला मंच में चित्र, मूर्तियाँ, नाटक, अभिनय, संगीत आदि आते हैं। संगीत विद्यालय हर जगह खुलें। ध्वनियाँ सीमित हो, बाजे भी सीमित हो, सरल संगीत के ऐसे पाठ्यक्रम हो, जो वर्षों में नहीं महीनों में सीखे जा सकें। प्रचण्ड प्रेरणा भरे गीतों का प्रचलन इन विद्यालयों द्वारा हो और हर्षोत्सवों पर प्रेरक गायनों की ही प्रधानता रहे। अग्नि गीतों की पुस्तिकाएँ सर्वत्र उपलब्ध रहें। संगीत सम्मेलन, संगीत गोष्ठियाँ, कीर्तन, प्रवचन, सहगान, क्रिया गान, नाटक, लोकनृत्य जैसे अगणित मंच मण्डप सर्वत्र बनें और वे लोकरंजन की आवश्यकता पूरी करें।

चित्र प्रकाशन अपने आप में एक बड़ा काम है। कैलेण्डर तथा दूसरे चित्र आजकल खूब छपते, बिकते है उनमें प्रेरक प्रसंगों को जोड़ा जा सके तो उससे जन-मानस को मोड़ने में भारी सहायता मिल सकती है। इसमें चित्रकारों से अधिक सहयोग चित्र प्रकाशकों का चाहिए। आदर्शवादी चित्र प्रकाशन की योजना हो, तो चित्रकार उस तरह की तस्वीरें और भी अधिक प्रसन्नतापूर्वक बना देंगे। यह कार्य ऐसे है जिनमें प्रतिभा, पूँजी, सूझबूझ और लगन का थोड़ा भी समन्वय हो जाय तो बिना किसी खतरे का सामना किये सहज ही आवश्यकता पूरी की जा सकती है।

यंत्रीकरण के साथ कला का समन्वय होने से ग्रामोफोन रिकार्ड, टेप रिकार्डर तथा फिल्म सिनेमा के नये प्रभावशाली माध्यम सामने आये हैं। उनका सदुपयोग होना चाहिए। चित्र प्रदर्शनियों के उपयुक्त बड़े साइज के चित्र छपने चाहिए। रिकार्ड बनाने का कार्य योजनाबद्ध रूप से आगे बढ़ना चाहिए। यों शुरुआत दस रिकार्डों से की गई थी। पर अभी उसे सभी भाषाओं के लिए, सभी प्रयोजनों के लिए उपयुक्त बनाने में बड़ी शक्ति तथा पूँजी लगानी पड़ेगी। इसी प्रकार फिल्म निर्माण का कार्य हाथ में लेना होगा। आँकड़े यह बताते हैं कि समाचार पत्र और रेडियो मिलकर जितने लोगों को सन्देश सुनाते है, उससे कहीं अधिक सन्देश अकेला सिनेमा पहुँचाता है। समाचार पत्रों के पाठकों और रेडियो सुनने वालों की मिली संख्या से भी सिनेमा देखने वालों की संख्या अधिक है। यदि यह उद्योग विवेकवान और दूरदर्शी हाथों में हो और वे उसका उपयोग जन-मानस को परिष्कृत करने तथा नवयुग के अनुरूप वातावरण बनाने में कर गुजरें तो उसका आश्चर्यजनक परिणाम सामने आ सकता है। जिनके हाथ में इन दिनों यह उद्योग है, उनका दृष्टिकोण बदला जाय तथा नये लोग नई पूँजी और नई लगन के साथ इस क्षेत्र में उतरें, तो इतना अधिक कार्य हो सकता है जिसकी कल्पना भी इस समय कठिन है।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आध्यात्मिक दृष्टि

देह पर जो रुक जाय वह दृष्टि आध्यात्मिक नहीं हो सकती। दृष्टि में आध्यात्मिकता हो तो समझ में आता है कि शरीर कितना पारदर्शी है। सचमुच शरीर कितना ही ठोस क्यों न नजर आए पर आध्यात्मिक आँखों से वह कभी नहीं छिपता जो कि देह के पीछे है, प्राण और चेतना का आधार है।
  
हाँ आँखें ही न हों तो और बात है। आँखें न होने पर और चीजों की क्या कहें, सूरज तक नहीं दिखाई देता। सब खेल आँखों का है। विचार और तर्क से भला कोई प्रकाश को जानता है? वास्तविकता आँख की पूर्ति किसी अन्य साधन से नहीं हो सकती। प्रकाश के अनुभव के लिए आँख चाहिए। आत्मिक तत्त्व के अनुभव के लिए भी आँख चाहिए। चाहिए एक अन्तर्दृष्टि, सूक्ष्म दृष्टि, दूर दृष्टि जिसका समावेश आध्यात्मिक दृष्टि में है। यह है तो सब है। अन्यथा न प्रकाश है और न परमात्मा है।
  
बात अनुभव की है, यदि कोई दूसरे की देह के पार की सत्ता को देखना चाहे, उसे सबसे पहले अपनी पार्थिव सत्ता के पार झांकना होता है। जहाँ तक और जितना हम स्वयं की गहराई में झांक पाते हैं, वहीं तक अन्य देह, भी पारदर्शी हो पाती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि जितनी परिष्कृत होती है, अनुभव भी उतने ही पारदर्शी हो जाते हैं।
  
जितनी दूर तक हम अपनी जड़ता में चैतन्य का अविष्कार कर पाते हैं, उतनी ही दूर तक हमारे लिए समस्त जड़ जगत् चैतन्य की चेतना से भर जाता है। और तब आता है यह अनुभव कि जो मैं हूँ उसी का विस्तार यह जगत् है। जिस दिन हम सम्पूर्ण समग्रता में अपने चैतन्य को जान लेते हैं, उसी दिन यह जगत् ब्रह्ममय हो जाता है।    इस क्षुद्र में कौन विराट् विद्यमान है? कौन है वह चैतन्य, जिसकी चेतना देह और जीवन का आधार है? इन प्रश्नों के हल आध्यात्मिक दृष्टि के बिना नहीं मिलते। जिस दृष्टि से ‘पर’ देखा जाता है, वही दृष्टि स्वयं को भी देखने में समर्थ है। बस केवल दृष्टि में आध्यात्मिकता का समोवश होना चाहिए। ऐसा होते ही घटित होती है- एक क्रान्ति। फिर जैसे कोई अवरुद्ध झरना फूट पड़े, ऐसे ही आध्यात्मिक अमृत की चैतन्य धारा जीवन से समस्त जड़ता के अंधेरे को बहा ले जाती है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५६

👉 FALLACIES ABOUT SCRIPTURAL RESTRICTIONS (Part 2)

Q.2. What is the truth in the belief that God Brahma, and rishis Vashistha and Vishwamitra had laid a curse (shaap) that success will elude the practitioner unless he/ she recites certain verses (shlokas)?

Ans. That this is baseless, is established by the following references from the scriptures:-   

a) Gayatri is well known as the inherent creative power of God. She is also at places referred metaphysically as spouse of God Brahma. Scriptures say that with the help of Gayatri, He (Brahma) created the universe and expounded the doctrines of Vedas (the four faces of Brahma symbolize the four streams of Vedic revelation).
b) Vashistha inflicted a crushing defeat on Vishwamitra with the help of Nandini- the symbolical cow which fulfils all wishes and is regarded as the counterpart of Kamdhenu of heaven (Swarg).   

c) To Vishwamitra goes the credit of untravelling the mystery of Gayatri. Not only he practised Gayatri for a very long period with strictest of self-discipline, and acquired immense occult powers therefrom, but also developed the expertise and methodology for invocation of divine powers through practice of Gayatri Sadhana.
  
From the aforesaid, it is evident that the great spiritual personalities of yore had used the power of Gayatri to fulfil their objectives. There is, therefore, no logic in assuming that they had cursed it and deprived other human beings of its fruits.
                  
It appears that the feudal lords of the medieval ages, propounded their independent cults and to establish their own doctrines found it necessary to discredit the traditional practice of Gayatri. The concocted story of ‘curse on Gayatri’  was the easiest and simplest way of striking at the roots of faith and confidence of the masses. This could have been one  reason behind this baseless assumption. Otherwise, who in this universe has the capability to put a curse on divine manifestations like the sun, clouds, air, lightening, the earth etc. Gayatri is, in essence, the primordial energy of the Almighty. Hence, all are free to utilize it without any restrictions or apprehensions whatsoever. At the most, the concept of the so-called “curse” may be symbolically indicative of the need for a Guru of the status of Vashistha and Vishwamitra, in absence of whom success eludes the worshipper.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 46

Ghane Andhere Me Hum Ghiren Hain | घने अँधेरे में हम घिरे हैं | Shraddhe...



Title

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

👉 अनुभव और समझ

एक बहुत विशाल पेड़ था। उस पर कई हंस रहते थे। उनमें एक बहुत सयाना हंस था। बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी। सब उसका आदर करते ‘ताऊ’ कह कर बुलाते थे। एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया।

ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा- ‘‘देखो !! उस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी।’’

एक युवा हंस हंसते हुए बोला- ‘‘ताऊ यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी?’’

सयाने हंस ने समझाया- ‘‘आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही है। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढऩे के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे।’’

किसी हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपरी शाखाओं तक पहुंच गई। बेल का तना मोटा होना शुरू हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई। एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिया उधर आ निकला। पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़ कर जाल बिछाया और चला गया। सांझ को सारे हंस लौट आए और पेड़ पर उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए। सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे।

एक हंस ने हिम्मत करके कहा- ‘‘ताऊ हम मूर्ख हैं,लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो।’’

दूसरा हंस बोला- ‘‘इस संकट से निकलने की तरकीब तुम ही हमें बता सकते हो। आगे हम तुम्हारी बात नहीं टालेंगे।’’

सभी हंसों ने हामी भरी, तब ताऊ ने उन्हें बताया- "‘‘मेरी बात ध्यान से सुनो। सुबह जब बहेलिया आएगा, सब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकाल कर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पड़े रहना। जैसे ही वह अंतिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब एक साथ उड़ जाना।’’

सुबह बहेलिया आया। हंसों ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझ कर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए। बहेलिया अवाक् होकर देखता रह गया।

👉 पुष्ट इकाइओं से बना समर्थ राष्ट्र


👉 सद्गृहस्थ की सिद्धि-साधना


👉 शालीन परिवार


👉 सद्गृहस्थ सुधन्वा की शक्ति


👉 नव निर्माण हेतु विभूतियों का आह्वान (भाग २)

(२) शिक्षा एवं साहित्य-व्यक्ति की समस्त गरिमा उसकी मनःस्थिति पर, विचार प्रक्रिया पर निर्भर है। इस जीवन प्राण के मर्म स्थल को शिक्षा एवं साहित्य के माध्यम से ही परिष्कृत बनाया जा सकता है। व्यक्ति और समाज के निर्माण में शिक्षा और साहित्य की महत्ता सर्वविदित है। युग परिवर्तन की इन घड़ियों में दोनों माध्यमों का समुचित उपयोग किया जाना चाहिए।

सरकारों को अपने ढंग से काम करने देना चाहिए। वर्तमान वातावरण में उनके लिये यह कठिन ही है। नये युग के अनुरूप मस्तिष्क ढालने वाली वाली शिक्षा पद्धति के बारे में वे सही ढंग से कुछ सोच सकें और वैसा ही कुछ सही कदम उठा सकें। सरकारें भौतिक जानकारियाँ देने वाली जो शिक्षा प्रक्रिया चला रही हैं उससे लाभ उठाना चाहिये, किन्तु भाव परिष्कार की पूरक धर्म शिक्षा, नैतिक शिक्षा, भावनात्मक नव निर्माण की शिक्षा पद्धति का संचालन जनता स्तर पर होना चाहिए। प्रौढ़ शिक्षा का कार्य भी जनता को ही अपने हाथ में लेना चाहिए। ये सरकारी स्तर पर नहीं, जन स्तर पर ही हल हो सकता है। विवाहित महिलाओं की शिक्षा का प्रबन्ध सरकारी विद्यालय कर सकेंगे, यह आशा रखनी व्यर्थ है। दृष्टिकोण का परिष्कार, आज की परिस्थितियों में चरित्र निर्माण का व्यवहार पक्ष, समाज संरचना की अगणित समस्याएँ और हल, विश्व परिवार के लिए बाध्य करने वाले प्रचण्ड वातावरण का निर्माण, यह सब प्रयोजन जन स्तर के विद्यालय ही पूरा कर सकेंगे। पूरे या अधूरे समय के-जहाँ वे जिस स्तर पर भी खुल सकें खोले जायें। जनता अपनी रोटी, कपड़ा, दवा, मनोरंजन आदि का खर्च स्वयं उठाती है, इसके लिए सरकार से अनुदान नहीं माँगती, तो फिर भावनात्मक नव-निर्माण की शिक्षा के लिए सरकार का मुँह ताका जाय, इसकी क्या आवश्यकता है?

साहित्यकारों से इसी दिशा में लेखनी उठाने के लिए कहा जा रहा है। कवियों से मूर्छना को जागृति में परिणित कर सकने वाले अग्नि गीत लिखने के लिए कहा गया है। कहानीकार कथा माध्यमों से हृदयग्राही चित्रण प्रस्तुत कर सकते हैं। पत्रकार अपने पत्र-पत्रिकाओं में इस प्रकार के समाचारों और लेखों को स्थान देना आरम्भ करें। प्रकाशक ऐसी ही पुस्तकें छापें। संसार में लगभग ६०० भाषाएँ हैं। भारत में ही सरकारी मान्यता प्राप्त १४ भाषाएँ है और इससे कई गुनी संख्या उन भाषाओं की है जिन्हें मान्यता प्राप्त नहीं है। इन सभी भाषाओं में प्रचुर साहित्य लिखा जाना, अनुवादित किया जाना, छापा जाना और विक्रय किया जाना आवश्यक है। इस प्रकाशन व्यवसाय के लिए पूँजी और प्रतिभा दोनों की ही जरूरत है। मात्र लेखक नहीं प्रकाशक भी जब इस क्षेत्र में उतरेंगे तो उनके परस्पर सहयोग, समन्वय से कुछ काम चलेगा।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बुद्धि से बोध तक

बुद्ध पूर्णिमा में आध्यात्मिक जीवन की सम्पूर्णता का प्रकाश है। सच तो यह है कि जहाँ बोध ही बुद्ध हैं, वहीं पूर्णिमा है और जहाँ बुद्धि है, वहीं अमावस। बुद्धत्व में अनुभव का बोध है, जबकि बुद्धि में केवल बीते हुए पुराने पड़ चुके अनुभवों का संकलन और अनुमान की भटकन। अपनी आँखें न हों तो करोड़ों सूर्य मिलकर भी जीवन का अँधियारा नहीं मिटा सकते। ऐसे में लकड़ी और छड़ी कितनी ही मजबूत क्यों न हों, पर इनसे आँखों का अनुभव नहीं पाया जा सकता।
  
भगवान् बुद्ध ने मानवता को इसी सत्य की सीख दी। उन्होंने जीवन की जो राह दिखाई, उसका आदि तो बुद्धि में है, पर अंत बोध में है। उन्हें अपना प्रारम्भ बुद्धि से करना पड़ा, क्योंकि हम सब यहीं खड़े हैं, परन्तु अंत बुद्धि में नहीं हैं। अंत तो परम अतिक्रमण है, जहाँ सब विचार खो जाते हैं, सब बुद्धिमत्ता विसर्जित हो जाती है, रह जाता है तो केवल निर्वाण, शान्ति व शून्यता भरा साक्षी भाव। यही बोध और अनुभव का चरम शिखर है।
  
मानवता के इन परम सद्गुरु ने बुद्धि के प्रयोग को अस्वीकारा नहीं। उन्होंने कहा कि बुद्धि के प्रयोग करो, संदेह, तर्क, विश्लेषण, विवेचन एक-एक कर सभी अथवा एक साथ सभी। पर इनकी गति अनुभव की ओर होना चाहिए। अनुभव की ओर गति न हो सकी तो बुद्धि केवल अमावस बनकर रह जायेगी। भले ही फिर इस अमावस के अँधेरे में संदेह, तर्क विश्लेषण, विवेचन जुगनुओं की भाँति चमकते हैं, किन्तु यदि बुद्धि की प्रतिबद्धता अनुभव रही तो प्रतिपदा, द्वितीया के क्रमिक सोपानों को पार करते हुए पूर्णिमा का प्रकाश आ ही जायेगा।
  
भगवान् तथागत के उपदेशों का सार यही है कि आध्यात्मिक जीवन का प्रारम्भ भले ही अनुभवों का संकलन एवं विश्लेषण से हो पर इस यात्रा का चरम स्वयं के अनुभव एवं परसंश्लेषण में होना चाहिए। बुद्धि से बोध तक यही है अनुभवाधारित पूर्णिमा की आध्यात्मिक यात्रा। इस यात्रा की सम्पूर्णता का अर्थ है-बोध की सम्पूर्णता। जहाँ कहीं, जब, जिस किसी के जीवन में यहाँ सम्पूर्णता आयी समझो उसके अंतस् में बुद्ध पूर्णिमा की चाँदनी बरस गयी।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५३

👉 FALLACIES ABOUT SCRIPTURAL RESTRICTIONS (Part 1)

Q.1. Is Gayatri worship conditioned? (Is Gayatri ‘keelit’)?

Ans. There are two methods for invoking powers of  Gayatri. One the simple divine method for spiritual progress and the other an intricate method of ‘Tantra Shastra’ for immediate fulfilment of worldly desires. The Mantras of Tantra Shastra also have a destructive power. Unless, they are practised with a strict discipline and for proper objective, they are capable of inflicting harm on the practitioner. A person with an ulterior motive can inflict harm on others through the power obtained by invocation of occult powers through ‘Tantra Sadhana’. Hence specific key procedures are required to unlock the powers of Tantrik Mantras. This,  too, is possible only with the help of an experienced Guru. As doses of a high potency medicine are to be decided by an experienced doctor, decoding or unlocking a Mantra (in the above discipline) depends on the spiritual status of the one practitioner. ‘Durga Shaptshati’ which requires ‘Kavach’, ‘Keelan’ and ‘Argal’ may be quoted as an example).  

Vedic Mantras (such as Gayatri) are not bound by such strict restrictions, as they are practised exclusively for one’s inherent spiritual growth and for developing god-gifted capabilities for performing noble deeds. Vedic Mantras, therefore, do not require any ‘unlocking keys’. Nevertheless, as a sick person or a student needs an experienced doctor or a teacher for proper treatment or teaching a beginner in this field too requires the guidance of an accomplished Guru, in the absence of which he wanders aimlessly without making any progress whatsoever in the path of Sadhana.

None should entertain any apprehension that in Kalyug, Gayatri Mantra has been accursed or that its Sadhana goes in vain. Who can curse God and what effect can it have? This is nothing but a ruse meant to undermine the faith of the people and to allure them to join some other sect.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 44

👉 ज्ञान और विज्ञान एक दूसरे का अवलम्बन अपनाएँ

ज्ञान और विज्ञान यह दोनों सहोदर भाई हैं। ज्ञान अर्थात् चेतना को मानवी गरिमा के अनुरूप चिन्तन तथा चरित्र के लिए आस्थावान बनने तथा बनाने की प्रक्रिया। यदि ज्ञान का अभाव हो तो मनुष्य को भी अन्य प्राणियों की भाँति स्वार्थ परायण रहना होगा। उसकी गतिविधियाँ पेट की क्षुधा निवारण तथा मस्तिष्कीय खुजली के रूप में कामवासना का ताना-बाना बते रहने में ही नष्ट हो जायेंगी।
  
मनुष्य भी एक तरह का पशु है। जन्मजात रूप से उसमें भी पशु, प्रवृत्तियाँ भरी होती हैं। उन्हें परिमार्जित करके सुसंस्कारी एवं आदर्शवादी बनाने का काम जिस चिन्तन पद्धति का है उसे ज्ञान कहा गया है। गीताकार का कथन है कि—‘‘ज्ञान से अधिक श्रेष्ठ और पवित्र अन्य कोई वस्तु नहीं है। ‘न हि ज्ञानेन पवित्रमिद्द विद्यते।’
  
ज्ञान वह अग्नि है जो सड़े-गले उबले लोहे को अग्नि संस्कार करके माण्डूर भस्म—लौह भस्म आदि अमतोपम गुण दिखा सकने योग्य बनाती है। पतित, पापी, मूढ़, पशु, महामानव, ऋषि आदि की काया एक ही तरह की होती है। उनकी बनावट और रहन-सहन पद्धति में कोई अन्तर नहीं होता। फिर जो एक को गया-गुजरा और दूसरों को आकाश में छाया देखते हैं। वह उसकी ज्ञान चेतना का ही चमत्कार है। वह हेय स्तर की ही तो मनुष्य निरर्थक या अनर्थ मूलक कामों में लगा हुआ दृष्टिगोचर होगा। यदि यह ज्ञान पवित्र, श्रेष्ठ और उत्साहवर्धक हो तो वही शरीर ऐसा काम करते हुए दिखाई देगा जिनसे असंख्यों को प्रेरणा मिले और उसका अनुगमन करने वालों के लिए भी प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो।
  
ज्ञान आन्तरिक जीवन से सम्बन्धित है और वह चेतना क्षेत्र में प्रभावित करके उचित-अनुचित का अन्तर करना सिखाता है। दूरदर्शी विवेकशीलता के आधार पर जो निर्णय या निर्धारण किए जाते हैं उन्हें ज्ञान का, सद्ज्ञान का ही अनुदान कहना चाहिए।
  
ज्ञान का सहोदर है—विज्ञान। विज्ञान अर्थात् पदार्थ ज्ञान। हमारे चारों ओर अगणित वस्तुएँ बिखरी पड़ी हैं। वे अपने मूलरूप में प्रायः निरर्थक जैसी हैं उन्हें उपयोगी बनाने और उनकी विशेषताओं को समझने की प्रक्रिया विज्ञान है। विज्ञान ने मनुष्य को साधन सम्पन्न बनाया है। अन्य प्राणी इस जानकारी से रहित हैं इसलिए वे निकटवर्ती आहार को उपलब्ध करने में ही अपनी क्षमता समाप्त कर लेते हैं। यौवन की तरंग मन में उठने पर वे प्रजनन कृत्य में भी अपना विशेष पुरुषार्थ प्रदर्शित करते देखे जाते हैं। यह प्रकृति प्रदत्त शरीर के साथ मिलने वाली स्वाभाविकता है। उन्हें विज्ञान नहीं मिला। विज्ञान केवल मनुष्य की विशेष उपलब्धि है। आग जलाना, कृषि, पशुपालन, वास्तुशिल्प, भाषा, चिकित्सा आदि एक से एक बढ़कर जानकारियाँ उसने प्राप्त की हैं और उनके सहारे साधन सम्पन्न बना है।
  
कभी विज्ञान की परिधि छोटी थी और उसके सहारे जीवनोपयोगी वस्तुओं तक का ही उत्पादन एवं प्रस्तुतीकरण होता था, पर अब बात बहुत आगे बढ़ गई और प्रकृति ने अनेकानेक रहस्य खोज निकाल लिए गए हैं। इतना ही नहीं वरन् इससे भी आगे बढ़कर दूसरों के साधन छीनने वाले, उन्हें असमर्थ बनाने वाले प्राण घातक अस्त्र-शस्त्र भी बनने लगे हैं। जिस विज्ञान से सुख साधनों की वृद्धि का स्वप्न देखा जाता है वही यदि विनाश या पतन की सामग्री प्रस्तुत करने लगे तो आश्चर्य और असमंजस की बात है।
  
आज ज्ञान और विज्ञान दोनों ही अपनी प्रौढ़ावस्था में हैं। विडम्बना एक ही है कि वे सीधी राह चलने की अपेक्षा उल्टी दिशा अपना रहे हैं और एकदूसरे का सहयोग न करके विरोध का रुख अपनाए हुए हैं और तरह-तरह के दाँव-पेचों का आविष्कार कर रहे हैं। इन गतिविधियों से वह धारा अवरुद्ध हो गई, जो अब तक मनुष्य को समर्थ और सुखी बनाती रही है। अब उनमें प्रयास भस्मासुर जैसे ही चले हैं। जिसने उन्हें विकसित किया उसी मनुष्य का हेय, हीन बनाते और जीवन संकट खड़ा करने के लिए उद्यत दीखते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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