दिन व्यतीत हो जाने पर रात्रि को जब बिस्तर पर जाया जाय तो दिन भर की मानसिक चिन्तन प्रणाली और शारीरिक गतिविधियों की निष्पक्ष समीक्षा करनी चाहिए। जहाँ-जहाँ सदाशयता भरे कदम उठाये गये हैं वहाँ उनकी आत्मिक दृढ़ता को सराहना चाहिए। जहाँ साधारण मनुष्यों की अपेक्षा असाधारण उत्कृष्ट कर्तृत्व का परिचय दिया गया हो, वहाँ अपने आत्मबल पर गर्व और सन्तोष अनुभव करना चाहिए और जहाँ चूक हुई तो उसके लिए पश्चाताप प्रायश्चित करते हुए अगले दिन वैसा न करने की अपने आपको कड़ी चेतावनी देनी चाहिए। जिस प्रकार व्यापारी अपने बही खाते से यह अनुमान लगाते रहते हैं कि कारोबार नफे में चल रहा है या नुकसान में, ठीक इसी तरह अपनी भावना और क्रिया के जीवन व्यापार की गतिविधियों की समीक्षा करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि हम ऊपर उठ रहे हैं या नीचे गिर रहे हैं। यदि उठ रहे हो, तो उस उत्कर्ष की गति और भी तीव्र करने का उत्साह पैदा करना चाहिए और यदि पतन बढ़ रहा हो तो उसे रोकने के लिए रुद्र रूप धारण करना चाहिए। गीता में भगवान ने अलंकारिक रूप से जिन कौरवों से लड़ने के लिए कहा था वस्तुतः वे मनोविकार ही हैं। यह महाभारत हर व्यक्ति के जीवन में लड़ा जाना चाहिए। अपने दोष दुर्गुणों को निरस्त करने के लिए हर व्यक्ति को तरकस तूरीण सम्भालकर रखना चाहिए।
भूलों के लिए पश्चाताप प्रार्थना भर पर्याप्त नहीं, वरन् उसके लिए प्रायश्चित भी किया जाना चाहिए। छोटी भूलों के लिए छोटे शारीरिक दण्ड दिये जा सकते हैं, भोजन में कटौती, कान पकड़कर बैठक लगाना, कुछ समय खड़े रहना, देर तक जागना, चपत लगाना आदि दण्ड हो सकते हैं। यदि दूसरों को क्षति पहुँचाई गई है तो उसकी पूर्ति समाज को किसी सत्प्रवृत्ति के अभिवर्धन के लिए अनुदान देकर पूरी कर देनी चाहिए। दुष्कर्मों का प्रायश्चित यही है कि व्यक्ति को पहुँचाई गई क्षति की पूर्ति समाज की सुविधा बढ़ाने के लिए लगा दी जाय। दुष्कर्मों का फल इसी तरह शमन होता है। मात्र छुट-पुट पूजा पाठ कर लेने से उनकी निवृत्ति नहीं हो सकती।
आत्मबोध की अग्रिम प्रगति सत्कर्मों में अनुरक्ति है। संसार में जो अन्धेर, अविवेक और अनाचार चल रहा है, उसके प्रति आकर्षण नहीं घृणा ही होनी चाहिए। उसे अपनाने के लिए नहीं प्रतिरोध के लिए ही अपनी चेष्टा होनी चाहिए। व्यक्तित्व का निर्माण इसी प्रकार होगा। हमें अपने व्यक्तित्व का आदर्शवादी निर्माण करके समाज निर्माण की महत्त्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करनी चाहिए।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
भूलों के लिए पश्चाताप प्रार्थना भर पर्याप्त नहीं, वरन् उसके लिए प्रायश्चित भी किया जाना चाहिए। छोटी भूलों के लिए छोटे शारीरिक दण्ड दिये जा सकते हैं, भोजन में कटौती, कान पकड़कर बैठक लगाना, कुछ समय खड़े रहना, देर तक जागना, चपत लगाना आदि दण्ड हो सकते हैं। यदि दूसरों को क्षति पहुँचाई गई है तो उसकी पूर्ति समाज को किसी सत्प्रवृत्ति के अभिवर्धन के लिए अनुदान देकर पूरी कर देनी चाहिए। दुष्कर्मों का प्रायश्चित यही है कि व्यक्ति को पहुँचाई गई क्षति की पूर्ति समाज की सुविधा बढ़ाने के लिए लगा दी जाय। दुष्कर्मों का फल इसी तरह शमन होता है। मात्र छुट-पुट पूजा पाठ कर लेने से उनकी निवृत्ति नहीं हो सकती।
आत्मबोध की अग्रिम प्रगति सत्कर्मों में अनुरक्ति है। संसार में जो अन्धेर, अविवेक और अनाचार चल रहा है, उसके प्रति आकर्षण नहीं घृणा ही होनी चाहिए। उसे अपनाने के लिए नहीं प्रतिरोध के लिए ही अपनी चेष्टा होनी चाहिए। व्यक्तित्व का निर्माण इसी प्रकार होगा। हमें अपने व्यक्तित्व का आदर्शवादी निर्माण करके समाज निर्माण की महत्त्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करनी चाहिए।
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✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

































