रविवार, 15 दिसंबर 2019

👉 ज्ञान की प्यास

ज्ञान की प्यास हम सबमें है। अन्तस् में कुछ जल रहा है, जो शान्त होना चाहता है। इस शान्ति के लिए अनेकों कोशिशें की जाती हैं। इंसान कितनी ही दिशाओं में इसे खोजता है। शायद अनगिनत जन्मों से यह खोज चल रही है। किसी मायामृग की खोज में उसका चित्त भटकता रहता है। लेकिन हर कदम पर उसे निराशा के अलावा और कुछ भी हाथ नहीं आता। कोई राह उसे मंजिल पर पहुँचाती हुई प्रतीत नहीं होती। गति होती है, पर गन्तव्य नजर नहीं आता। क्या जिन्दगी के ये टेढ़े-मेढ़े रास्ते कहीं भी नहीं ले जाते?
  
इस सवाल के उत्तर में तर्क पूर्ण व्याख्याएँ प्रस्तुत नहीं करनी हैं। जीवन की गहन-गहराइयों में उतरकर ज्ञान का शीतल स्रोत खोजना है, समाधान के सुरीले स्वर सुनने हैं। ज्ञान वाक् जाल में नहीं है। तर्कपूर्ण शब्दों में भी इसे नहीं पाया जा सकता। सच तो यह है कि बौद्धिक उत्तर खोजने में, उसके कुँहासे में वास्तविक उत्तर खो जाता है। बुद्धि मौन हो तो अनुभूति बोलती है। विचार चुप हो तो विवेक जगता है।
  
सच तो यह है कि जिन्दगी के मूलभूत प्रश्नों के उत्तर बौद्धिक तर्कों से नहीं मिलते। बौद्धिक तर्कों में ज्ञान का आभास तो है, पर ज्ञान नहीं है। ज्ञान के लिए तो ऋषिवाणी कहती है-‘न प्रवचनेन, न मेधया, न बहुना श्रुतेन’ यानि कि न प्रवचन से, न मेधा से और न बहुत सुनने से। ज्ञान तो ‘अनन्तं निर्विकल्पं’ है। शान्त और शून्य होने पर प्रकट होता है। तभी समस्याएँ गिर जाती हैं, प्रश्न पेड़ के सूखे पत्तों की तरह झड़ जाते हैं।
  
समाधान समाधि के शून्य से आता है। ज्ञान की इस किरण के फूटते ही चेतना के एक नये आयाम पर जीवन का प्रवेश हो जाता है। यही भाव दशा तो समाधि है। इसके लिए पूछें और शान्त हो जायें। गहरी शून्यता में डूबें। समाधि में समाधान को आने दें, फलने दें। चित्त की इस निस्तरंग-निर्विकल्प स्थिति में उसका दर्शन करें-जो है, सो मैं हूँ। स्वयं को जाने बिना ज्ञान की प्यास नहीं मिटती। स्वयं को खोजे बिना अन्तस् की जलन नहीं घटती। स्वयं को जानना ज्ञान है, बाकी सब जानकारी है। चित्त जिस क्षण भटकन भरी बौद्धिकता को छोड़कर चुप और थिर हो जाता है, उसी क्षण ‘सत्यम् ज्ञानम् अनन्तम् ब्रह्म’ के द्वार खुल जाते हैं। दिशा-शून्य चेतना प्रभु में विलीन हो जाती है। और ज्ञान की प्यास का अन्त केवल प्रभु मिलन में है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४२

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