मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७६)

👉 जीवनशैली आध्यात्मिक हो

यहाँ परम क्रान्तिवीर चन्द्रशेखर आजाद के बचपन चर्चा प्रासंगिक होगी। यूँ तो वह बचपन से साहसी थे। पर कुछ चीजें उन्हें डरा देती थी। इनमें से एक अँधेरा था और एक दर्द। दस- बारह साल की उम्र में उनके यहाँ एक महात्मा आये। यह महात्मा महावीर हनुमान जी के भक्त थे। हनुमान जी की पूजा करना और रामकथा कहना यही उनका काम था। चन्द्रशेखर के गाँव में भी उनकी रामकथा हो रही थी। रामकथा के मर्मिक अंश बालक चन्द्रशेखर को भावविह्वल कर देते थे। तो कुछ प्रसंगों को सुनकर वह रोमाँचित हो जाता। अपनी भावनाओं के उतार- चढ़ावों के बीच बालक चन्द्रशेखर ने सोचा कि ये महात्मा जी जरूर हमारी समस्या का समाधान कर सकते हैं।

और बस उसने अपनी समस्याएँ महात्मा जी को कह सुनायी। उसने कहा- स्वामी जी! मुझे अँधेरे से डर लगता है। महात्मा जी बोले- क्यों बेटा? तो उन्होंने कहा कि अँधेरे में भूत रहते हैं इसलिए। यह सुनकर महात्मा जी बोले- और भी किसी चीज से डरते हो। बालक ने कहा हाँ महाराज- मुझे मार खाने बहुत डर लगता है। उनकी यह सारी बातें सुनकर महात्मा जी ने उन्हें साँझ के समय झुरमुटे में बुलाया। और अपने पास बिठाकर बातें करते रहे। जब रात थोड़ी गाढ़ी हो चली तो वह उन्हें लेकर गाँव के बाहर श्मशान भूमि की ओर ले चले। जहाँ के भूतों के किस्से गाँव के लोग चटखारे लेकर सुनाते थे।

राह चलते हुए महात्मा जी ने उनसे कहा- जानते हो बेटा- भूत कौन होते हैं? बालक ने कहा नहीं महाराज। तो सुनो, वे स्वामी जी बोले- भूत वे होते हैं जिनकी अकाल मृत्यु होती है। जो जिन्दगी से डरकर आत्महत्या कर लेते हैं। जो आदमी अपनी जिन्दगी में डरपोक था वह पूरे जीवन कुछ ढंग का काम न कर सका। वह भला मरने के बाद तुम्हारा क्या बिगाड़ेगा? रही बात मार खाने से डरने की तो शरीर तो वैसे भी एक दिन मरेगा और मन- आत्मा मरने वाले नहीं है। इन बातों को करते हुए वे महात्मा गाँव के बाहर श्मशान भूमि में आ गये। श्मशान भूमि में कहीं कोई डर का कारण न था। इस अनुभव ने बालक चन्द्रशेखर को परम साहसी बना दिया। हाँ यह जरूर है कि महात्मा जी ने उन्हें रामभक्त हनुमान जी की भक्ति सिखायी। महात्मा जी की इस आध्यात्मिक चिकित्सा ने उन्हें इतना साहसी बना दिया कि अंग्रेज सरकार भी उनसे डरने लगती। उन महात्मा जी का यह भी कहना था कि यदि कोई विशिष्ट आध्यात्मिक प्रयोग करने हों तो किसी तपस्थली का चयन करना चाहिए, क्योंकि ये आध्यात्मिक चिकित्सा के केन्द्र होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०५

👉 जहाँ सुमति तहाँ सम्पत्ति

अपव्यय एवं अनावश्यक संग्रह से अनेक प्रकार की दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती हैं? अपव्यय करने वाले मानो बदले में दुष्प्रवृत्तियाँ खरीदते है और उनसे अपना तथा दूसरों का असीम अहित करते है।

बुद्धिमानी की सही परख यही है कि जो भी कमाया जाय, उसका अनावश्यक संचय अथवा अपव्यय न हो। जो उपार्जन को सदाशयता में नहीं नियोजित करता वह घर में दुष्प्रवृत्तियाँ आमंत्रित करता है। लक्ष्मी उसी घर में बसती है, फलती है जहाँ उसका सदुपयोग हो। आड़म्बर युक्त प्रदर्शन, फैशन परस्ती, विवाहों में अनावश्यक खर्च, जुआ जैसे दुर्व्यसन ऐसे ही घरों में पनपते हैं, जहाँ उपार्जन के उपयोग पर ध्यान नहीं दिया जाता, उपभोग पर नियंत्रण नहीं होता। भगवान की लानत किसी को बदले में लेनी हो तो धन को स्वयं अपने ऊपर अनाप-शनाप खर्च कर अथवा दूसरों पर अनावश्यक रूप से लुटाकर सहज ही आमंत्रित कर सकता है।

ऐसे उदाहरण आज के भौतिकता प्रधान समाज में चारों ओर देखने को मिलते हैं। परिवारों में कलह तथा सामाजिक अपराधों की वृद्धि का एक प्रमुख कारण अपव्यय की प्रवृत्ति भी है।

समुद्र संचय नहीं करता, मेघ बनकर बरस जाता है तो बदले में नदियाँ दूना जल लेकर लौटती हैं। यदि वह भी कृपण हो संचय करने लगता तो नदियाँ सूख जाती, अकाल छा जाता और यदि अत्यधिक उदार हो धनघोर बरसने लगता तो अतिवृष्टि की बिभीषिका आ जाती। अत: समन्वित नीति ही ठीक है।

एक सेठ बहुत धनी था। उसके कई लड़के भी थे। परिवार बढ़ा पर साथ ही सबमें मनोमालिन्य, द्वेष एवं कलह रहने लगा। एक रात को लक्ष्मीजी ने सपना दिया कि मैं अब तुम्हारे घर से जा रही हूँ। पर चाहो तो चलते समय का एक वरदान मांग लो। सेठ ने कहा- ''भगवती आप प्रसन्न हैं तो मेरे घर का कलह दूर कर दें, फिर आप भले ही चली जाँय।"

लक्ष्मीजी ने कहा- 'मेरे जाने का कारण ही गृह कलह था। जिन घरों में परस्पर द्वेष रहता है, मैं वहाँ नहीं रहती। अब जब कि तुमने कलह दूर करने का वरदान मांग लिया और सब लोग शांतिपूर्वक रहोगे तब तो मुझे भी यहीं ठहरना पड़ेगा। सुमति वाले घरों को छोड़कर मैं कभी बाहर नहीं जाती।"

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १ से

👉 चल पुस्तकालयों की अनिवार्य आवश्यकता-

इन दिनों की लोक रुचि घटिया मनोरंजन साहित्य पढ़ने भर की है इस कारण स्वाध्याय से चिन्तन को मिलने वाला पौष्टिक तत्व तो नहीं, उल्टे मनोभूमि में निकृष्टता बढ़ती जाती है। जहाँ तहाँ पुस्तकालय भी है, पर वह साहित्य अलमारियों में ही बन्द सड़ता रहता है। युग निर्माण साहित्य का सृजन मनो संस्थानों में व्याप्त कुविचारों के परिमार्जन के टानिक के रूप में गढ़ा गया है, पर उसकी उपयोगिता तब है जब यह साहित्य जन जन तक पहुँचे। चल पुस्तकालय अथवा ज्ञान रथ इस आवश्यकता को पूरा करेंगे।

ज्ञान रथ प्रत्येक शाखा के पास हो। उतरे साइकिल या रिक्शे के पहियों से एक धकेल सस्ते में बना ली जाये। उसे आकर्षक बनाने के लिये सजाया भी जा सकता है। इसी में युग निर्माण साहित्य तथा पत्रिकाओं की जिल्द बँधी पुरानी प्रतियाँ रहे। इन्हें लेकर गली गली मुहल्ले मुहल्ले जाया जाये तथा लोगों को आग्रह पूर्वक पढ़ने को यह साहित्य दिया जाए। एक कापी में उनके नाम नोट रहे। अगले सप्ताह उनसे वापिस लेने और नई पुस्तकें देने का क्रम बना रहे। विक्रयार्थ साहित्य भी रखा जा सकता है। सहायक आजीविका के रूप में या किसी बेकार व्यक्ति को थोड़ा वेतन देकर भी धकेले चलाई जा सकती है। इससे हुई छोटी आय से उस व्यक्ति का काम चल जायेगा। लोगों को इस साहित्य की उपयोगिता भी समझाई जा सके। तो यह धकेल सोने में सुगन्ध की कहावत चरितार्थ कर सकती है।

तीर्थ यात्रा धर्म प्रचार फेरी-

युग निर्माण परिवार के लिए ऐसी तीर्थ यात्राओं का प्रचलन करना चाहिए, जिसमें परिजन टोलियाँ बनाकर समीपवर्ती गाँवों में जाया करे, रास्ते में आदर्श वाक्य लेखन करे, दिन में जनसंपर्क और रात्रि को विचार गोष्ठी या छोटे से यज्ञायोजन के लिये आमंत्रण देना। भजन कीर्तन तथा प्रभात फेरियों का क्रम रखा जा सकता है। और सायंकाल जाकर रात्रि में विचार गोष्ठी दूसरे दिन एक छोटा सा आयोजन भी सम्पन्न किया जा सकता है। यात्रा टोलियाँ अवकाश के दिनों का तो इस पुण्य प्रयोजन में उपयोग करे ही। पीले वस्त्र, नियत झोला तथा अपने मिशन की परिचय सामग्री लेकर चला जाये तो अपना उद्देश्य अधिक सार्थक होगा ।

यह कार्य सदस्यों के ज्ञान घट की संचित राशि, उदारमना व्यक्तियों के सहयोग और चंदे से संग्रहित पूँजी-किसी भी प्रकार से सम्पन्न किये जा सकते हैं, पर इनकी उपयोगिता और उपादेयता को असंदिग्ध मानकर यह कार्य क्रम प्रत्येक शाखा को सम्पन्न करने ही चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५६


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/July/v1.56

सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

👉 लोभ रूपी कुआं

एक बार राजा भोज के दरबार में एक सवाल उठा कि ' ऐसा कौन सा कुआं है जिसमें गिरने के बाद आदमी बाहर नहीं निकल पाता?' इस प्रश्न का उत्तर कोई नहीं दे पाया।

आखिर में राजा भोज ने राज पंडित से कहा कि इस प्रश्न का उत्तर सात दिनों के अंदर लेकर आओ, वरना आपको अभी तक जो इनाम धन आदि दिया गया है, वापस ले लिए जायेंगे तथा इस नगरी को छोड़कर दूसरी जगह जाना होगा।

छः दिन बीत चुके थे। राज पंडित को जबाव नहीं मिला था। निराश होकर वह जंगल की तरफ गया। वहां उसकी भेंट एक गड़रिए से हुई। गड़रिए ने पूछा -" आप तो राजपंडित हैं, राजा के दुलारे हो फिर चेहरे पर इतनी उदासी क्यों?

यह गड़रिया मेरा क्या मार्गदर्शन करेगा?सोचकर पंडित ने कुछ नहीं कहा। इस पर गडरिए ने पुनः उदासी का कारण पूछते हुए कहा -" पंडित जी हम भी सत्संगी हैं,हो सकता है आपके प्रश्न का जवाब मेरे पास हो, अतः नि:संकोच कहिए।" राज पंडित ने प्रश्न बता दिया और कहा कि अगर कलतक प्रश्न का जवाब नहीं मिला तो राजा नगर से निकाल देगा।

गड़रिया बोला- "मेरे पास पारस है उससे खूब सोना बनाओ। एक भोज क्या लाखों भोज तेरे पीछे घूमेंगे। बस, पारस देने से पहले मेरी एक शर्त माननी होगी कि तुझे मेरा चेला बनना पड़ेगा।"

राज पंडित के अंदर पहले तो अहंकार जागा कि दो कौड़ी के गड़रिए का चेला बनूं? लेकिन स्वार्थ पूर्ति हेतु चेला बनने के लिए तैयार हो गया। गड़रिया बोला -" *पहले भेड़ का दूध पीओ फिर चेले बनो। राजपंडित ने कहा कि यदि ब्राह्मण भेड़ का दूध पीयेगा तो उसकी बुद्धि मारी जायेगी। मैं दूध नहीं पीऊंगा। तो जाओ, मैं पारस नहीं दूंगा - गड़रिया बोला।

राज पंडित बोला -" ठीक है, दूध पीने को तैयार हूं, आगे क्या करना है?" गड़रिया बोला-" अब तो पहले मैं दूध को झूठा करूंगा फिर तुम्हें पीना पड़ेगा।" राजपंडित ने कहा -" तू तो हद करता है! ब्राह्मण को झूठा पिलायेगा?" तो जाओ, गड़रिया बोला।

राज पंडित बोला -" मैं तैयार हूं झूठा दूध पीने को।" गड़रिया बोला-" वह बात गयी। अब तो सामने जो मरे हुए इंसान की खोपड़ी का कंकाल पड़ा है, उसमें मैं दूध दोहूंगा, उसको झूठा करूंगा, कुत्ते को चटवाऊंगा फिर तुम्हें पिलाऊंगा। तब मिलेगा पारस। नहीं तो अपना रास्ता लीजिए।"

राजपंडित ने खूब विचार कर कहा-" है तो बड़ा कठिन लेकिन मैं तैयार हूं। गड़रिया बोला-" मिल गया जवाब। यही तो कुआं है! लोभ का, तृष्णा का जिसमें आदमी गिरता जाता है और फिर कभी नहीं निकलता। जैसे कि तुम पारस को पाने के लिए इस लोभ रूपी कुएं में गिरते चले गए।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 7 Oct 2019


👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७५)

👉 जीवनशैली आध्यात्मिक हो

आध्यात्मिक चिकित्सक उनके इस दर्द को अपने दिल की गहराइयों में महसूस करते हैं। क्योंकि उन्हें इस सच्चाई का पता है कि यथार्थ में कोई भी बुरा या डरपोक नहीं है। सभी में प्रभु का सनातन अंश है। प्रत्येक व्यक्ति अपने भूल रूप में परम दिव्य होने के साथ साहस और सद्गुणों का भण्डार है। बस हुआ इतना ही है कि किन्हीं कारणों से उसकी अन्तर्चेतना में कुछ गाँठें पड़ गई है, जिसकी वजह से उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह रुक गया है। यदि ये गाँठें खोल दी जाय तो फिर स्थिति बदल सकती है। हाँ इतना जरूर है कि ये गाँठें बचपन की भी हो सकती हैं और पिछले जीवन की भी। पर यह सौ फीसदी सच है कि व्यक्ति को बुरा या डरपोक बनाने में इन्हीं का प्रभाव काम करता है।

इस सच को अधिक जानने के लिए हमें व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया में प्रवेश करना पड़ेगा। किसी का बचपन उसके व्यक्तित्व का अंकुरण है। इसके बढ़तेक्रम में व्यक्तित्व भी बढ़ता है। इस अवधि में कोई भी घटना का मन- मस्तिष्क पर गहरा असर होता है। अब यदि किसी बच्चे को बार- बार अँधेरे से अथवा कुत्ते से डराय जाय और यदि यह डर गहरा होकर किसी मनोग्रंथि का रूप ले ले तो फिर यह बच्चा मन अपनी पूरी उम्र अँधेरे और कुत्तों से डरता रहेगा। यही स्थिति भावनात्मक आघात के बारे में है। जिन्हें हम बुरे और असामाजिक लोग कहते हैं, उनमें से कोई बुरा और असामाजिक नहीं होता। भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से उपजे विरोध के स्वर, उपजी विकृतियाँ उन्हें बुरा बना देती हैं। यदि इन  मनोग्रंथियों को खोल दिया जाय तो सब कुछ बदल सकता है।

आध्यात्मिक व्यवहार चिकित्सा में चिकित्सक सबसे पहले उसकी पीड़ा- परेशानी को भली प्रकार समझता है। अपने आत्मीय सम्बन्धों व अन्तर्दृष्टि के द्वारा उसकी मनोग्रन्थि के स्वरूप व स्थिति का आँकलन करता है। इसके बाद किसी उपयुक्त आध्यात्मिक तकनीक के द्वारा उसकी इस जटिल मनोग्रन्थि को खोलता है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे यह जरूरी है कि चिकित्सक के व्यक्तित्व पर रोगी की गहरी आस्था हो। फिर सब कुछ ठीक होने लगता है। उदाहरण के लिए यदि बात किसी अँधेरे भयग्रस्त रोगी की है तो चिकित्सक सब से पहले अँधेरे के यथार्थ से वैचारिक परिचय करायेगा। फिर इसके बारे में और भी अधिक गहराई बतायेगा। बाद में उसे स्वयं लेकर उस अँधेरे स्थान पर ले जायेगा। जहाँ उसे डर लगा करता है। इस पूरी प्रक्रिया में जप या ध्यान की तकनीकों का उपयोग भी हो सकता है, क्योंकि इससे मनोग्रंथियाँ आसानी से खुलती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०४

👉 जन्म दिन मनाने की परिपाटी

युग निर्माण परिवार के सदस्यों में प्रेम परिचय बढ़े। घनिष्ठता स्थापित हो उसके लिये जन्म दिन मनाने की परम्परा विकसित की जाय। अपने व्रतधारी और सामान्य सदस्यों का जन्म दिन किस तारीख को पड़ता हे, इसका वर्ष के 365 दिनों का अनुक्रम से रजिस्टर तैयार कर लिया जाये तथा उसकी एक एक कार्बन कापी अथवा छपी कापी प्रत्येक सदस्य के पास रहे, ताकि उस दिन नियमित रूप से हर सदस्य उस सदस्य के घर बिना स्मरण दिलाये पहुँच जाया करे। जन्म दिवसोत्सवों में परिचितों, पड़ोसियों और सम्बन्धियों को भी अलग से आमंत्रित किया जाता रहे, इससे कुछ ही समय में सैकड़ों नये व्यक्तियों तक मिशन का प्रकाश अनायास ही पहुँच सकता है।

तैयारी सर्वत्र एक सी रहे इस परम्परा को लोकप्रिय बनाया जाना है, अतएव निर्धन और धनी वर्ग सब सीमित खर्च उठाये। पूजन सामग्री एवं उपकरणों की व्यवस्था शाखा अथवा टोली में रहे। स्वागत सत्कार में भी न्यूनतम खर्च हो। प्रसाद के लिये चीनी की गोली, चिनौरियाँ और सत्कार के लिये कटी सुपारी, तली-भुनी सौंफ पर्याप्त है। सम्भव हो तो, यह व्यवस्था भी शाखा में विद्यमान रहे। समय, प्रातः काम पर जाने से पूर्व, अन्यथा रात को रखा जाये और इतने समय से उसे सम्पन्न कर लिया जाये कि घर लौटने, काम पर जाने या रात्रि विश्राम में विलम्ब न हो।

एक घण्टे में यज्ञादि धर्मानुष्ठान, आधा घण्टा संगीत एक घण्टा प्रवचन प्रतिज्ञा, इस प्रकार दो ढाई घण्टे पर्याप्त है। सर्वतोमुखी पवित्रता का जल अभिसिंचन, पूजा वेदी पर देव पूजन, स्वस्ति वाचन, संक्षिप्त हवन, उपस्थित लोगों द्वारा शुभकामना, अक्षत पुष्प उपहार, अभिवादन, आशीर्वाद, भजन कीर्तन, प्रवचन, मार्गदर्शन जल इलाइची से सत्कार इतना कार्यक्रम पर्याप्त है। पूजा के मंत्र सभी पढ़े लिखे पुस्तकों से सामूहिक रूप से बोले। प्रवचन कर्ता कई तरह के प्रवचन तैयार रखे, ताकि यदि एक ही दिन कई जन्म दिन मनाने पड़े तो भी रुचि भिन्नता बनी रहे। अपने स्त्री बच्चों तथा मुहल्ले के जन्म दिन लोग स्वयं मनायें, उसमें शाखा सदस्यों का समय नहीं लगना चाहिए। इस तरह इस परम्परा के द्वारा पारस्परिक स्नेह सद्भाव के विकास का सुर सुलभ मनुष्य शरीर का लाभ किस प्रकार लिया जा सकता हे, थोड़े में ही यह उद्देश्य पूरा किया जा सकता है।

जन्म दिन संस्कार से पारिवारिक स्नेह सद्भाव की वृद्धि और व्यक्ति निर्माण की आवश्यकता पुरी होती है, जन समुदाय को भी यह लाभ देने की दृष्टि से प्रत्येक शाखा को (1) आदर्श वाक्य लेखन (2) चल पुस्तकालय (3) धर्म फेरी तीर्थयात्रा-यह तीन कार्य क्रम अनिवार्य रूप से चलाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५५

Change Your Thoughts To Change Your Life | Pt Shriram Sharma Acharya



Title

शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

जन्मदिन का महत्त्व | Janam Divas Ka Mahatv | Pt Shriram Sharma Acharya



Title

जन्मदिन का महत्त्व | Janam Divas Ka Mahatv | Pt Shriram Sharma Acharya



Title

👉 शुद्ध अन्न से शुद्ध बुद्धि

श्री गुरु गोविन्दसिंह जी महाराज के पास खूब अशर्फियाँ थीं, खजाना था फिर भी वह यवनों से युद्ध होते समय अपने लड़ाकू शिष्यों को मुट्ठी भर चने देते थे। एक दिन उन मनुष्यों में से एक मनुष्य ने श्री गुरु गोविन्दसिंह जी की माताजी से जाकर कहा कि माता जी-हमें यवनों से लड़ना पड़ता है और गुरु गोविन्दसिंहजी के पास अशर्फियाँ है खजाने हैं फिर भी वह हमें एक मुट्ठी चने ही देते हैं और लड़वाते हैं। माताजी ने श्री गुरुगोविन्दसिंह जी को अपनी गोद में बैठा कर कहा कि- पुत्र यह तेरे शिष्य तेरे पुत्र के समान हैं फिर भी तू इन्हें एक मुट्ठी चने ही देता है ऐसा क्यों करता हैं?

श्री गुरु गोविन्दसिंह जी ने माताजी को उत्तर दिया-माता क्या तू मुझे अपने पुत्र को कभी विष दे सकती है?
माता जी ने कहा - नहीं।

गुरुगोविन्दसिंह जी ने कहा-माता मेरे यहाँ पर जो अशर्फियाँ हैं, खजाने हैं, वह इतने पवित्र नहीं हैं उसके खाने से इनमें वह शक्ति नहीं रहेगी। जो मुट्ठी भर चने खाने से इनमें शक्ति है वह फिर न रहेगी और फिर यह लड़ भी नहीं सकेंगे।

बीस उँगलियों की कमाई का, धर्म उपार्जित, भरपूर बदला चुकाकर ईमानदारी से प्राप्त किया हुआ अन्न ही मनुष्य में, सद्बुद्धि उत्पन्न कर सकता है। जो लोग अनीति युक्त अन्न ग्रहण करते हैं उनकी बुद्धि असुरता की ओर ही प्रवृत्त होती है। चित्रकूट में हमने एक महात्मा को खेती करते देखा, एक महात्मा दरजी का काम करते थे। परिश्रम और ईमानदारी के साथ कमाये हुए अन्न से ही शुद्ध बुद्धि हो सकती है और तभी भगवद् भजन, कर्त्तव्य पालन, लोक सेवा आदि सात्विक कार्य हो सकते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति, नवम्बर १९४४ पृष्ठ २१

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 5 Oct 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 5 Oct 2019



👉 सिद्धि-साधन और साधक

अनेक साधक सिद्धि जैसे गुरुतर कार्य के साधारण जान साधन-पथ पर अग्रसर होते हैं, किन्तु शिथिलता और चंचलता के कारण मनःशक्ति का पूर्ण विकास नहीं कर पाते। अनेक मुमुक्ष आरोग्य-रहित शरीर तथा अशुद्ध एवं अस्थिर मन से ही आध्यात्मिक साधनों के अनुष्ठान में प्रवृत्त होते हैं, परन्तु सफलता उन्हें भी प्राप्त नहीं होती। आध्यात्म विद्या का यह एक अनुभूत तत्व है कि इच्छित वस्तु या इष्ट परिस्थिति प्राप्त करने के लिए मानसिक चित्र कल्पना के समान अमोघ एवं सरल अन्य साधन नहीं है। किसी विशिष्ट दिशा में उन्मुख होने के निमित्त उसके साधन निर्दोष होने की अत्यंत आवश्यकता रहती है। बिना दृढ़ता के आत्मा अनन्त शक्तिमान होने पर भी अपनी कुछ भी शक्ति प्रकट नहीं कर सकता।

सिद्धि के हेतु सदा सर्वदा अपनी इच्छित वस्तु का गहन चिन्तन कीजिए क्योंकि जिस प्रकार बीज में सम्पूर्ण वृक्ष सूक्ष्म रूप से रहता है, वैसे ही अन्तर जगत में यह सम्पूर्ण स्थूल जगत सूक्ष्म बीज रूप से रहा हुआ है और जब अन्तर जगत में उपस्थित किसी वस्तु के सूक्ष्म रूप संस्कारों का दृढ़ भावना से पोषण किया जाता है तब वह वस्तु बाह्य जगत में स्थूल रूप धारण किये बिना कभी नहीं रह सकती- यह आध्यात्म शास्त्र का अबाधित सिद्धाँत है।

📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी १९४५ पृष्ठ १६

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७४)

👉 जीवनशैली आध्यात्मिक हो

व्यवहार चिकित्सा के आध्यात्मिक आयाम भी हैं, जो इसे सही अर्थों में सम्पूर्णता देते हैं। और यह आध्यात्मिक व्यवहार चिकित्सा का नया रूप लेती है। इस प्रक्रिया में आध्यात्मिक जीवनशैली की तकनीकों को अपना कर गहरे मन की गाँठें खोली जाती है। इन गाँठों के खुलते ही व्यक्ति की जीवन दृष्टि बदलती है और उसका व्यवहार सँवर जाता है। सैद्धान्तिक एवं प्रायोगिक रूप से यह व्यवहार तकनीकों के कारण कहीं अधिक प्रभावशाली है। इसमें भी मनोचिकित्सा की ही भाँति रोगी के असामान्य व्यवहार और उसके कारणों की गहरी पड़ताल करते हैं। यह पड़ताल सामान्य विश्लेषण द्वारा भी हो सकती है और आध्यात्मिक चिकित्सक की अन्तर्दृष्टि द्वारा भी।

बिगड़े हुए व्यवहार को सभी देखते हैं, पर यह आखिर बिगड़ा क्यों? इसका पता लगाने की जरूरत शायद कोई नहीं करता। जो उद्दण्ड है, उच्छृंखल है, किन्हीं बुरी आदतों का शिकार है और बुरे कामों में लिप्त है, उसे बस बुरा आदमी कहकर छुट्टी पा ली जाती है। यह बुराई उसमें आयी क्यों? इस सवाल का जवाब कोई नहीं तलाशता। बुरी संगत या बुरे कर्मों के अलावा व्यावहारिक गड़बड़ियों के और आयाम भी हैं। उदाहरण के लिए बेवजह भयातुर हो उठना, एकाएक अवसाद से घिर जाना अथवा फिर अचानक दर्द का दौरा पड़ जाना। रोगी जब इन समस्याओं के कारण बताता है, तो या तो उसे डरपोक समझा जाता है, अथवा फिर उसे सिरफिरा कहकर उसकी हँसी उड़ायी जाती है।

ये कारण होते भी अजीब हैं- जैसे कोई प्रौढ़ व्यक्ति कुत्ते की शकल देखकर घबरा जाता है। पूछने पर यही कहता है कि मुझे तो कुत्ते की फोटो भी डरावनी लगती है। सुनने वालो को लगता है कि बच्चे का डर तो समझ में आता है लेकिन यह प्रौढ़ व्यक्ति भला क्यों डरता है? इसी तरह किसी को अँधेरे से डर लगता है तो फिर कोई ऊँची इमारत देखते ही बेहोश हो जाता है। कई तो ऐसे होते हैं जिन्हें भीड़ देखते ही दर्द का दौरा पड़ जाता है। कई बेचारे तम्बाकू- सिगरेट, पान- गुटखा आदि बुरी आदतों के शिकार हैं। ऐसे लोग दुनियाँ में या तो हँसी के पात्र बनते हैं अथवा उनके पल्ले जमाने भर की घृणा, उपेक्षा, तिरस्कार, अवहेलना पड़ती है। कोई भी उनके दर्द को सुनने, बाँटने की कोशिश नहीं करता। जबकि यथार्थ यह है कि ऐसे लोग अपने सीने में अनगिनत गमों को छुपाये रहते हैं। उनके मन की परतों में भारी पीड़ा देने वाले गहरे घाव होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०३

👉 संगठित परिवार की विधि व्यवस्था-

नयी व्यवस्था के अनुसार जहाँ भी कम से कम 10 सदस्य सूत्रबद्ध हो सके वहाँ परिवार शाखा की स्थापना की जानी चाहिए तथा उसकी समुचित व्यवस्था बनाई जानी चाहिए-

अपनी श्रद्धा एवं तत्परता के आधार पर अंशदानी व्रतधारी परिजन, वरिष्ठ सदस्य कहे जावेंगे उन्हीं में से न्यूनतम पाँच एवं अधिकतम दस सदस्यों की एक कार्यकारिणी समिति बनायी जायेगी। उन्हीं में से एक को कार्यवाहक नियुक्त कर दिया जाय। सबसे योग्य व्यक्ति ही कार्यवाहक बने यह आवश्यक नहीं। जो पर्याप्त समय दे सके तथा सबसे संपर्क सूत्र बनाये रख सके, ऐसे ही किसी प्रामाणिक कर्मठ सदस्य को कार्यवाहक मान लिया जाय। अन्य वरिष्ठ सदस्य उसे सहयोग एवं मार्ग दर्शन देते रहे। बड़े स्थानों पर जहाँ एक ही व्यक्ति को संपर्क सूत्र बिठाने में कठिनाई होती हो, वहां एक से अधिक कार्यवाहक भी नियुक्त किए जा सकते हैं।

जहाँ परिवार शाखा में सदस्यों की संख्या अधिक हो वहाँ उन्हें कई टोलियों में बाट लेना चाहिए। टोलियाँ दस से बीस व्यक्तियों तक की रहे। हर टोली किसी सुनिश्चित क्षेत्र एवं सुनिश्चित कार्यों का उत्तरदायित्व सँभालें। महिला जागरण के लिए महिलाओं की टोलियाँ भी बनाई जाये। महिला जागरण भी युग निर्माण परिवार के कार्यों का ही एक अंग है, अतः हर परिवार शाखा का इसके लिए भी कटिबद्ध होना ही चाहिए। महिलाओं में महिलाएँ ही ठीक से कार्य कर सकती है। इसलिए महिला टोलियों का गठन तथा महिला कार्यवाहिका की नियुक्ति भी की जानी चाहिए।

कार्यवाहक-कार्यवाहिका की नियुक्ति मथुरा से कराई जाय। कभी परिवर्तन की आवश्यकता हो तो किसी केन्द्रीय प्रतिनिधि की उपस्थिति में यह कार्य सहज भाव से कर लिया जाय। अपने संगठनों को चुनाव के झंझट एवं पदलोलुपता के विष से बचाना आवश्यक है। सारे कार्य परिवार भाव से चलाये जाने चाहिए। परिवार शब्द हमें अत्यन्त प्रिय है। उसमें वे सभी विशेषताएँ जुड़ी हुई है जो इस धरती पर स्वर्ग के अवतरण के लिए आवश्यक है। हम सदैव से परिवार संस्था की गरिमा बखानते रहे हैं। आदर्श परिवार, व्यक्तित्व निर्माण की पाठशाला एवं नररत्नों की खदान सिद्ध हो सकते हैं। व्यक्ति ओर समाज को जोड़ने वाली शृंखला भी यही है। स्वस्थ पारिवारिक भावना जितनी व्यापक होती जाएगी, उसी अनुपात से मनुष्यों के बीच आत्मीयता एवं सहकारिता बढ़ेगी और उदार आदान प्रदान का पथ प्रशस्त होगा।

आदर्श परिवार वही है जिसके सदस्य एक दूसरे का हित साधन ही अपना सर्वोत्तम स्वार्थ समझते हो तथा अधिकार छोड़ने एवं कर्तव्य पालन के लिए तत्पर रहते हो। यह दिव्य वृत्तियाँ परिवारों में ही विकसित हो सकती है। आरम्भिक अभ्यास, व्यक्तिगत परिवार की छोटी व्यायामशाला में भी किया जा सकता है। किन्तु मात्र इतना ही पर्याप्त नहीं। वंश परिवार को विश्व परिवार के रूप में विकसित करना होगा। वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्श जब व्यवहार में उतरेंगे तभी सतयुग का पुनरागमन होगा। पारिवारिकता की भावना का उत्थान अभ्युदय ही समाज निर्माण का, विश्व शान्ति का, मानवी उज्ज्वल भविष्य का एकमात्र आधार है।

परिवार शब्द हमारी नस नस में उत्साह भर देता है। उसका निखरा हुआ स्वरूप कही भी बनता दिखे, तो आँखें चमकने लगती है। गायत्री परिवार, युग निर्माण परिवार, नामकरण हम इसी दृष्टि से करते रहे हैं। इस नामकरण के साथ ही हम वह भाव भी पिरो देना चाहते हैं, जो हमें पुलकित करता रहता है। हम अपने पीछे ऋषि परम्परा के अनुकूल एक आदर्श परिवार छोड़ जाना चाहते हैं। इसलिए उसके सदस्यों में ऐसे लोगों को ही सम्मिलित करना चाहते हैं, जिनमें उर्वरता के व उत्कृष्टता के, जीवन और जागृति के कुछ चिन्ह पहले से ही विद्यमान हो, इन मौलिक गुणों के चिन्ह जहाँ होगे, वहाँ अपने परिश्रम का भी कुछ परिणाम निकलेगा। इन दिनों, इस गुरु पूर्णिमा पर हम अपने परिवार का पुनर्जीवन इसी दृष्टि से कर रहे हैं। उनके विकास तथा पुष्टि के लिये कुछ सुगम किन्तु प्रभावशाली कार्यक्रम नियमित रूप से अपनाने का आग्रह भी किया गया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५४

👉 मंत्री की तरकीब

राजा कर्मवीर अपनी प्रजा के स्वभाव से दुखी रहता था। उसके राज्य के लोग बेहद आलसी थे। वे कोई काम नहीं करना चाहते थे। अपनी जिम्मेदारी वे दूसरों पर टाल दिया करते थे। वे सोचते थे कि सारा काम राज्य की ओर से ही किया जाएगा। राजा ने अनेक माध्यमों से उन्हें यह संदेश देने की कोशिश की कि किसी भी राज्य में नागरिकों की भी कुछ जिम्मेदारी होती है। राजा ने कई बार सख्त उपाय भी किए पर उनमें कोई सुधार नहीं हुआ।

एक दिन मंत्री ने राजा को एक तरकीब सुझाई। नगर के बीच चौराहे पर एक पत्थर डाल दिया गया, जिससे आधा रास्ता रुक गया। सुबह-सुबह एक व्यापारी घोड़ागाड़ी से वहां पहुंचा। जब कोचवान ने उसे पत्थर के बारे में बताया तो उसने गाड़ी मुड़वा ली और दूसरे रास्ते से चला गया। कई राहगीर इसी तरह लौट गए। तभी एक गरीब किसान आया। उसने आसपास खेल रहे लड़कों को बुलवाया और उनके साथ मिलकर पत्थर हटा दिया। पत्थर हटते ही वहां एक कागज नजर आया, जिस पर लिखा था-इसे राजा तक पहुंचाओ। किसी को कुछ समझ में नहीं आया। किसान कागज लेकर राजा के पास पहुंचा। राजा ने किसान को भरपूर इनाम दिया। यह बात राज्य भर में फैल गई। इनाम के लालच में अब लोग इस तरह के कई काम करने लग गए। धीरे-धीरे यह उनकी आदत में शामिल हो गया।

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

👉 सच्ची सरकार

कन्धे पर कपड़े का थान लादे और हाट-बाजार जाने की तैयारी करते हुए नामदेव जी से पत्नि ने कहा- भगत जी! आज घर में खाने को कुछ भी नहीं है। आटा, नमक, दाल, चावल, गुड़ और शक्कर सब खत्म हो गए हैं। शाम को बाजार से आते हुए घर के लिए राशन का सामान लेते आइएगा।

भक्त नामदेव जी ने उत्तर दिया- देखता हूँ जैसी विठ्ठल जीकी कृपा।
अगर कोई अच्छा मूल्य मिला, तो निश्चय ही घर में आज धन-धान्य आ जायेगा।

पत्नि बोली संत जी! अगर अच्छी कीमत ना भी मिले, तब भी इस बुने हुए थान को बेचकर कुछ राशन तो ले आना। घर के बड़े-बूढ़े तो भूख बर्दाश्त कर लेंगे। पर बच्चे अभी छोटे हैं, उनके लिए तो कुछ ले ही आना।

जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा। ऐसा कहकर भक्त नामदेव जी हाट-बाजार को चले गए।

बाजार में उन्हें किसी ने पुकारा- वाह सांई! कपड़ा तो बड़ा अच्छा बुना है और ठोक भी अच्छी लगाई है। तेरा परिवार बसता रहे। ये फकीर ठंड में कांप-कांप कर मर जाएगा।दया के घर में आ और रब के नाम पर दो चादरे का कपड़ा इस फकीर की झोली में डाल दे।

भक्त नामदेव जी- दो चादरे में कितना कपड़ा लगेगा फकीर जी?

फकीर ने जितना कपड़ा मांगा, इतेफाक से भक्त नामदेव जी के थान में कुल कपड़ा उतना ही था। और भक्त नामदेव जी ने पूरा थान उस फकीर को दान कर दिया।

दान करने के बाद जब भक्त नामदेव जी घर लौटने लगे तो उनके सामने परिजनो के भूखे चेहरे नजर आने लगे। फिर पत्नि की कही बात, कि घर में खाने की सब सामग्री खत्म है। दाम कम भी मिले तो भी बच्चो के लिए तो कुछ ले ही आना।

अब दाम तो क्या, थान भी दान जा चुका था। भक्त नामदेव जी एकांत मे पीपल की छाँव मे बैठ गए।

जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा। जब सारी सृष्टि की सार पूर्ती वो खुद करता है, तो अब मेरे परिवार की सार भी वो ही करेगा।
और फिर भक्त नामदेव जी अपने हरिविठ्ठल के भजन में लीन गए।

अब भगवान कहां रुकने वाले थे। भक्त नामदेव जी ने सारे परिवार की जिम्मेवारी अब उनके सुपुर्द जो कर दी थी।

अब भगवान जी ने भक्त जी की झोंपड़ी का दरवाजा खटखटाया।

नामदेव जी की पत्नी ने पूछा- कौन है?

नामदेव का घर यही है ना? भगवान जी ने पूछा।

अंदर से आवाज हां जी यही आपको कुछ चाहिये भगवान सोचने लगे कि धन्य है नामदेव जी का परिवार घर मे कुछ भी नही है फिर ह्र्दय मे देने की सहायता की जिज्ञयासा हैl

भगवान बोले दरवाजा खोलिये

लेकिन आप कौन?

भगवान जी ने कहा- सेवक की क्या पहचान होती है भगतानी? जैसे नामदेव जी विठ्ठल के सेवक, वैसे ही मैं नामदेव जी का सेवक हूl

ये राशन का सामान रखवा लो। पत्नि ने दरवाजा पूरा खोल दिया।फिर इतना राशन घर में उतरना शुरू हुआ, कि घर के जीवों की घर में रहने की जगह ही कम पड़ गई। इतना सामान! नामदेव जी ने भेजा है? मुझे नहीं लगता।पत्नी ने पूछा।

भगवान जी ने कहा- हाँ भगतानी! आज नामदेव का थान सच्ची सरकार ने खरीदा है। जो नामदेव का सामर्थ्य था उसने भुगता दिया। और अब जो मेरी सरकार का सामर्थ्य है वो चुकता कर रही है। जगह और बताओ।सब कुछ आने वाला है भगत जी के घर में।

शाम ढलने लगी थी और रात का अंधेरा अपने पांव पसारने लगा था।

समान रखवाते-रखवाते पत्नि थक चुकी थीं। बच्चे घर में अमीरी आते देख खुश थे। वो कभी बोरे से शक्कर निकाल कर खाते और कभी गुड़। कभी मेवे देख कर मन ललचाते और झोली भर-भर कर मेवे लेकर बैठ जाते। उनके बालमन अभी तक तृप्त नहीं हुए थे।

भक्त नामदेव जी अभी तक घर नहीं आये थे, पर सामान आना लगातार जारी था।

आखिर पत्नी ने हाथ जोड़ कर कहा- सेवक जी! अब बाकी का सामान संत जी के आने के बाद ही आप ले आना। हमें उन्हें ढूंढ़ने जाना है क्योंकी वो अभी तक घर नहीं आए हैं।

भगवान जी बोले- वो तो गाँव के बाहर पीपल के नीचे बैठकर विठ्ठल सरकार का भजन-सिमरन कर रहे हैं। अब परिजन नामदेव जी को देखने गये।

सब परिवार वालों को सामने देखकर नामदेव जी सोचने लगे, जरूर ये भूख से बेहाल होकर मुझे ढूंढ़ रहे हैं।

इससे पहले की संत नामदेव जी कुछ कहते उनकी पत्नी बोल पड़ीं- कुछ पैसे बचा लेने थे।
अगर थान अच्छे भाव बिक गया था, तो सारा सामान संत जी आज ही खरीद कर घर भेजना था क्या?
भक्त नामदेव जी कुछ पल के लिए विस्मित हुए। फिर बच्चों के खिलते चेहरे देखकर उन्हें एहसास हो गया, कि जरूर मेरे प्रभु ने कोई खेल कर दिया है।

पत्नि ने कहा अच्छी सरकार को आपने थान बेचा और वो तो समान घर मे भैजने से रुकता ही नहीं था। पता नही कितने वर्षों तक का राशन दे गया।
उससे मिन्नत कर के रुकवाया- बस कर! बाकी संत जी के आने के बाद उनसे पूछ कर कहीं रखवाएँगे।

भक्त नामदेव जी हँसने लगे और बोले- ! वो सरकार है ही ऐसी।
जब देना शुरू करती है तो सब लेने वाले थक जाते हैं।
उसकी बख्शीश कभी भी खत्म नहीं होती।
वह सच्ची सरकार की तरह सदा कायम रहती है।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 4 Oct 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 4 Oct 2019


👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७२)

👉 संयम है प्राण- ऊर्जा का संरक्षण, सदाचार ऊर्ध्वगमन

अभी कुछ दिनों पूर्व साइकोन्यूरो इम्यूनोलॉजी के क्षेत्र में एक प्रयोग किया गया। यह प्रयोग दो विशिष्ट वैज्ञानिकों आर. डेविडसन और पी. एरिकसन ने सम्पन्न किया। इस प्रयोग में उन्होंने चार सौ व्यक्तियों को लिया। इसमें से २०० व्यक्ति ऐसे थे, जिनकी अध्यात्म के प्रति आस्था थी जो संयमित एवं सदाचार परायण जीवन जीते थे। इसके विपरीत २०० व्यक्ति इनमें इस तरह के थे जिनका विश्वास भोगविलास में था, जो शराबखानों व जुआघरों में अपना समय बिताते थे। जिनकी जीवनशैली अस्त- व्यस्त थी। इन दोनों तरह के व्यक्तियों का उन्होंने लगातार दस वर्षों तक अध्ययन किया।

अध्ययन की इस प्रक्रिया में उन्होंने देखा कि जो व्यक्ति संयम, सदाचार पूर्वक जीते हैं, वे बीमार कम होते हैं। उनमें मानसिक उत्तेजना, उद्वेग एवं आवेग बहुत कम होते हैं। ऐसे व्यक्ति प्रायः तनाव, दुश्चिंता से मुक्त होते हैं। यदि इन्हें कोई बीमारी हुई भी तो ये बहुत जल्दी ठीक हो जाते हैं। चाट लगने पर या ऑपरेशन होने पर उनकी अपेक्षा इनके घाव जल्दी भर जाते हैं। इसके विपरीत असंयमित एवं विलासी मनोभूमि वालों की स्थिति इनसे ठीक उलटा पायी गयी। इनकी जीवनी शक्ति नष्ट होते रहने के कारण इन्हें कोई न कोई छोटी- मोटी बीमारियाँ हमेशा घेरे रहती हैं। छूत की बीमारियों की सम्भावना इनमें हमेशा बनी रहती है। तनाव, दुश्चिंता, उत्तेजना, आवेग तो जैसे इनका स्वभाव ही होता है। कोई बीमारी होने पर अपेक्षाकृत ये जल्दी ठीक नहीं होते। एक ही बीमारी इन्हें बार- बार घेरती रहती है। चोट लगने या ऑपरेशन होने पर इनके घाव भरने में ज्यादा समय लगता है। इस स्थिति को एक दशक तक परखते रहने पर डेविडसन व एरिकसन ने यह निष्कर्ष निकाला कि संयम- सदाचार से व्यक्ति में प्रतिरोधक क्षमता में असाधारण वृद्धि होती है। इसी कारण उनमें शारीरिक व मानसिक रोगों की सम्भावना कम रहती है। यदि किसी तरह से कोई रोग हुआ भी तो इनसे छुटकारा जल्दी मिलता है।

इस क्रम में इस वैज्ञानिक दृष्टि की अपेक्षा आध्यात्मिक दृष्टि कहीं ज्यादा गहरी व सूक्ष्म है। हमने परम पूज्य गुरुदेव के जीवन में इस सत्य की अनुभूति पायी है। अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में उन्होंने तो केवल अपने संकल्प से अनगिनत लोगों को रोग मुक्त किया। पर अखण्ड ज्योति संस्थान के निवास काल में रोग निवारण की इस प्रक्रिया को वे थोड़े अलग ढंग से सम्पन्न करते थे। इसके लिए वे रोगी का पहना हुआ कपड़ा माँगते थे, और उसके प्राणों के सूक्ष्म परमाणुओं का परीक्षण आध्यात्मिक रीति से करते थे। बाद में स्थिति के अनुरूप उसकी चिकित्सा करते थे।

ऐसे ही एक बार उनसे गुजरात के देवेश भाई ने अपने किसी रिश्तेदार के बारे में उन्हें लिखा। ये रिश्तेदार कई बुरी आदतों का शिकार थे। हालाँकि इनका स्वास्थ्य काफी अच्छा था। गुरुदेव ने देवेश भाई से इनका पहना हुआ कपड़ा मँगाया। कपड़े के आध्यात्मिक परीक्षण के बाद उन्होंने देवेश भाई को चिट्ठी लिखी कि तुम्हारे इन रिश्तेदार के जीवन के दीये का तेल चुक गया है और अब शीघ्र ही इनकी ज्योति बुझने वाली है। गुरुदेव के इस पत्र पर देवेश भाई को यकीन ही नहीं हुआ। क्योंकि ये रिश्तेदार तो पर्याप्त स्वस्थ थे। देवेश भाई गुरुदेव की इस चिट्ठी को लेकर सीधे मथुरा पहुँचे। सामने मिलने पर भी गुरुदेव ने अपनी उन्हीं बातों को फिर से दुहराया। सभी को अचरज तो तब हुआ जब ये रिश्तेदार महोदय पंद्रह दिनों बाद चल बसे। इस पर गुरुदेव ने उन्हें पत्र लिखकर कहा- यदि जीवनीशक्ति बिल्कुल भी न बची हो और संयम- सदाचार की अवहेलना के कारण जीवन के पात्र में छेद ही छेद हैं; तो आध्यात्मिक चिकित्सा असम्भव है। आध्यात्मिक चिकित्सा के लिए आध्यात्मिक जीवनशैली को अपनाना बेहद जरूरी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०१

👉 मेरे सदगुरु के दरबार में...

मेरे सदगुरु के दरबार में "द" शब्द वाली वस्तु "स" शब्द में बहुत ही जल्दी बदलती है...!

जैसे दुःख बदल जाता है सुख में------

दुविधा बदल जाती है सुविधा में ------

दुर्गुण बदल जाते हैं सद्गुण में ------

दुर्बलता बदल जाती है सबलता में----

दरिद्रता बदल जाती है संपन्नता में------

दुर्विचार बदल जाते हैं सद्विचार में-----

दुर्व्यव्हार बदल जाता है सद्व्यव्हार में-------

दुष्परिणाम बदल जाते हैं सुपरिणाम में------

दुराचार बदल जाता है सदाचार में---

दाग बदल जाते हैं साख में----

दुर्भावना बदल जाती है सद्भावना में ------

और
कुसंग बदल जाते हैं सत्संग में..!!

👉 उत्तरदायित्व समझें और निवाहें-

पुनर्गठन के साथ साथ सदस्यों को कुछ निश्चित उत्तरदायित्व सौंपे गये है। पत्रिकाएँ मँगाने वालों से अनुरोध किया गया है कि वे उन्हें स्वयं तो ध्यान से पढ़े ही, साथ ही दस नहीं तो न्यूनतम पाँच अन्य व्यक्तियों को भी पढ़ाने या सुनाने का भाव भरा श्रमदान तो करते ही रहें। हर सदस्य ज्ञान यज्ञ में इतना तो योगदान करे ही, ताकि हर अंक से कई व्यक्ति लाभ उठायें और मिशन का सन्देश अधिक क्षेत्र में फैलता चला जाय।

जो अंशदान करने का व्रत ले चुके है, उन्हें न्यूनतम 10 पैसा (आज १ रुपया) एवं एक घण्टा समय नित्य बचाकर मिशन के प्रसार में लगाना चाहिए। अपने संपर्क क्षेत्र में झोला पुस्तकालय चलाना इसका सर्वश्रेष्ठ ढंग है। विचारशील व्यक्तियों की सूची तैयार कर ली जाय। किस दिन किस के यहाँ जाना है ? यह क्रम बना लिया जाय। ज्ञान घट के संचित धन से मिशन का साहित्य खरीदा जाय, पुरानी पत्रिकाओं पर कवर लगाकर उनका भी उपयोग किया जाय।

इतने से ही घर घर ज्ञान सिंचन का क्रम चल सकता है। घर बैठे, बिना मूल्य नव जीवन देने वाली ज्ञान गंगा का लाभ भला कौन न उठायेगा? जरूरत इतनी भर है कि साहित्य जबरदस्ती थोपा न जाय, उसका महत्व समझाते हुए, पाठक की रुचि जगाते हुए उसे पढ़ने का अनुरोध किया जाय। जैसे जैसे रुचि बढ़े वैसे वैसे अधिक महत्त्वपूर्ण साहित्य देने का सिलसिला चलाया जाय।

संपर्क क्षेत्र में झोला पुस्तकालय चलाने के लिए बहुत समय से आग्रह किया जाता रहा है। जिनने नव निर्माण की विचारधारा का महत्व समझा वे आलस्य, प्रमाद के संकीर्ण अहंकार को आड़े नहीं आने देते वरन् इस परमार्थ में तत्पर रहते हुए आत्म गौरव एवं आन्तरिक सन्तोष का अनुभव करते हैं। ज्ञान के कर्म में परिणत होने का यह प्रथम चरण है कि ज्ञान यज्ञ को-विचार क्रांति को समर्थ बनाने के लिए अपने समय एवं साधन का नियमित अनुदान प्रस्तुत करते रहा जाय। झोला पुस्तकालय चलाने के लिए ज्ञान घट की स्थापना और एक घण्टा समय तथा दस पैसा नित्य का अनुदान देना, देखने में कितना ही सरल एवं स्वल्प क्यों न हो, पर हमारे सन्तोष के लिए उतना भी बहुत है। ऐसे व्रतधारी कर्मनिष्ठ परिजनों से आज नहीं तो कल हम बड़ी बड़ी आशाएँ करना आरम्भ कर सकते हैं। उनका दर्जा स्वभावतः ऊँचा है। मात्र ज्ञान का शुभारम्भ है। कर्म के साथ संयुक्त हो जाने पर उस बीज को वृक्ष बनाने का आश्वासन देने वाला अंकुर कह सकने में हमें किसी प्रकार का संकोच नहीं है।

दस पैसा (आज १ रुपया) और एक घण्टे की न्यूनतम शर्त भावनापूर्वक पूरी करने वालों का स्तर निश्चित रूप से विकसित होता चलेगा। अपने अन्दर बढ़ते हुए देवत्व की प्रखरता के आधार पर वे दिव्य प्रयोजन के लिए क्रमशः बड़े अनुदान प्रस्तुत करने का गौरव प्राप्त कर सकेंगे। माह में एक दिन की आय तथा प्रतिदिन 4 घण्टे का समय देना और अन्ततः कर्मयोगी वानप्रस्थ के स्तर तक पहुँच जाना उन्हीं के लिए सम्भव हो सकेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५३
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/July/v1.53

👉 ‼ चिन्तन ‼

संसार क्षणभंगुर है, संसार में चारों ओर देखो यहां, वहां, जहां, तहां देखो जितने भी  पदार्थ इन चर्म चक्षुओं के एवं पांच इंद्रियों के अनुभव में आने वाले पदार्थ है, सभी पदार्थ नश्वर, क्षणभंगुर है, जिन नाशवान पदार्थों को यह मानव अपना मान बैठता है, चाहे वह मां हो, चाहे पिता हो, चाहे भाई-बहन हो, चाहे कुटुंब-परिवार हो चाहे गाड़ी, घोड़ा मकान, दुकान हो चाहे जमीन, जायदाद हो चाहे धन, रुपया, पैसा हो चाहे पत्नी, पुत्र हो यह सब नाशवान है, और जब इन नाशवान पदार्थों के प्रति यह मानव मेरा-मेरा करके उसके प्रति गाड़ा मोह कर लेता है, यह मोह इस भव को ही नहीं भव-भावन्तर को भी बिगाड़ने में समर्थ हो जाता है, यह मानव प्राणी इन पदार्थों को वर्तमान में अपना मानता ही है, अगले भव क्या भव-भवान्तर के लिए भी अपना मानने को तैयार है, लेकिन आप देखो आपके सामने से ही जब आपके मां-बाप, दादा-दादी आदि पदार्थ जिन्हें आप अपना मान लेते है, जब नाश को प्राप्त होते हैं, मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उस समय आपको कितना कष्ट होता है, और आप कुछ समय के लिए नहीं भव-भवान्तर के लिए कर्मों का बंद कर लिया करते हैं, इसी प्रकार से संसार असार है, नाशवान है, क्षण-भंगुर है, संसार में रहकर भी प्राणी अपनी बुद्धि-विवेक का प्रयोग कर सत मार्ग को स्वीकार कर देव, शास्त्र, गुरु की भक्ति करते हुए, आराधना करते हुए अपने आत्म तत्व को पहचाने, वह नाशवान नहीं है, ऐसी अमर आत्मा को, अपनी आत्मा को जानने का पहचानने का प्रयास करें यही मनुष्य पर्याय का सार है।

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

Mahashakti Gayatri Ki Mahima Part 2 | महाशक्ति गायत्री की महिमा भाग 2



Title

We Need People To Lead Revolutions



Title

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 3 Oct 2019


👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 3 Oct 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७२)

👉 संयम है प्राण- ऊर्जा का संरक्षण, सदाचार ऊर्ध्वगमन

आध्यात्मिक चिकित्सकों के लिए संयम- सदाचार प्राण ऊर्जा को संरक्षित, संग्रहीत व संवर्धित करने की वैज्ञानिक विधियाँ हैं। आमतौर पर संयम और सदाचार को एक विवशता के रूप में जबरदस्ती थोपे गये जीवन क्रम के रूप में लिया जाता है। कई लोग तो इन्हें प्रवृत्तियों के दमन के रूप में समझते हैं और पूरी तरह से अवैज्ञानिक मानते हैं। आध्यात्मिक चिकित्सकों का कहना है कि ऐसे लोग दोषी नहीं नासमझ हैं। दरअसल इन लोगों को प्राण ऊर्जा के प्रवाह की प्रकृति, उसमें आने वाली विकृति एवं इसके निदान- निवारण की सूक्ष्म समझ नहीं है। ये जो भी कहते हैं अपनी नासमझी की वजह से कहते हैं।

बात समझदारी की हो तो संयम- प्राण ऊर्जा का संरक्षण है और सदाचार उसका उर्ध्वगमन है। ये दोनों ही तत्त्व नैतिक होने की अपेक्षा आध्यात्मिक अधिक है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अकेले प्राण ऊर्जा का संरक्षण पर्याप्त नहीं है, इसका ऊर्ध्वगमन भी जरूरी है। हालाँकि अकेले संरक्षण हो तो भी व्यक्ति बीमार नहीं होता, पर यदि बात प्राण शक्ति से मानसिक सामर्थ्य के विकास की हो तो इसका ऊर्ध्वगमन भी होना चाहिए। आयुर्वेद के कतिपय ग्रंथ इस बात की गवाही देते हैं कि जिस भी व्यक्ति में प्राणों का ऊर्ध्वगमन हो रहा है, उसके स्नायु वज्र की भाँति मजबूत हो जाते हैं। उसकी धारणा शक्ति असाधारण होती है। वह मनोबल व साहस का धनी होता है।

इस सच्चाई को और अधिक व्यापक ढंग से जानना चाहे तो संयम का अर्थ है- अपने जीवन की शक्तियों की बर्बादी को रोकना। बूँद- बूँद करके उन्हें बचाना। इस प्रक्रिया में इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम व विचार संयम को प्रमुखता दी जाती है। जहाँ तक सदाचार का प्रश्र है तो यह आध्यात्मिक शक्तियों के विकास के लिए किया जाने वाला आचरण है। यह किसी तरह की विवशता नहीं बल्कि जीवन के उच्चस्तरीय प्रयोजनों के प्रति आस्था है। जिनमें यह आस्था होती है वे शुरुआत में भले ही जड़ बुद्धि हों लेकिन बाद में प्रतिभावान् हुए बिना नहीं रहते। उनकी मानसिक सामर्थ्य असाधारण रूप से विकसित होती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १००

शनिवार, 28 सितंबर 2019

👉 मन की आवाज

एक बुढ़िया बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही थी। चलते-चलते वह थक गई थी। तभी उसने देखा कि एक घुड़सवार चला आ रहा है। उसे देख बुढ़िया ने आवाज दी, ‘अरे बेटा, एक बात तो सुन।’ घुड़सवार रुक गया। उसने पूछा, ‘क्या बात है माई ?’ बुढ़िया ने कहा, ‘बेटा, मुझे उस सामने वाले गांव में जाना है। बहुत थक गई हूं। यह गठरी उठाई नहीं  जाती। तू भी शायद उधर ही जा रहा है। यह गठरी घोड़े पर रख ले। मुझे चलने में आसानी हो जाएगी।’

उस व्यक्ति ने कहा, ‘माई तू पैदल है। मैं घोड़े पर हूं। गांव अभी बहुत दूर है।.पता नहीं तू कब तक वहां पहुंचेगी। मैं तो थोड़ी ही देर में पहुंच जाऊंगा। वहां पहुंचकर क्या तेरी प्रतीक्षा करता रहूंगा?’ यह कहकर वह चल पड़ा। कुछ ही दूर जाने के बाद उसने अपने आप से कहा, ‘तू भी कितना मूर्ख है। वह वृद्धा है, ठीक से चल भी नहीं सकती। क्या पता उसे ठीक से दिखाई भी देता हो या नहीं। तुझे गठरी दे रही थी। संभव है उस गठरी में कोई कीमती सामान हो। तू उसे लेकर भाग जाता तो कौन पूछता। चल वापस, गठरी ले ले।

वह घूमकर वापस आ गया और बुढ़िया से बोला, ‘माई, ला अपनी गठरी। मैं ले चलता हूं। गांव में रुककर तेरी राह देखूंगा।’

बुढ़िया ने कहा, ‘न बेटा, अब तू जा, मुझे गठरी नहीं देनी।’ घुड़सवार ने कहा, ‘अभी तो तू कह रही थी कि ले चल। अब ले चलने को तैयार हुआ तो गठरी दे नहीं रही। ऐसा क्यों? यह उलटी बात तुझे किसने समझाई है?’

बुढ़िया मुस्कराकर बोली, ‘उसी ने समझाई है जिसने तुझे यह समझाया कि माई की गठरी ले ले। जो तेरे भीतर बैठा है वही मेरे भीतर भी बैठा है। तुझे उसने कहा कि गठरी ले और भाग जा। मुझे उसने समझाया कि गठरी न दे, नहीं तो वह भाग जाएगा। तूने भी अपने मन की आवाज सुनी और मैंने भी सुनी।

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७१)

👉 संयम है प्राण- ऊर्जा का संरक्षण, सदाचार ऊर्ध्वगमन

संयम- सदाचार के प्रयोग चिकित्सा की आध्यात्मिक प्रक्रिया के आधार हैं। इन्हीं के बलबूते आध्यात्मिक चिकित्सा के संरजाम जुटते और अपना परिणाम प्रस्तुत करते हैं। हालाँकि चिकित्सा की अन्य विधियाँ इन प्रयोगों के बारे में मौन हैं। लेकिन अगर इन्हें ध्यान से परखा जाय तो इनमें भी किसी न किसी स्तर पर यह सच्चाई झलकती है। रोगी का रोग निदान करने के बाद प्रायः सभी चिकित्सक खानपान के तौर- तरीके और जीवनशैली के बारे में निर्देश देते हैं। इन निर्देशों में प्रकारान्तर से संयम- सदाचार ही अन्तर्निहित रहता है। तनिक सोचें तो सही- कौन ऐसा चिकित्सक होगा जो अपने गम्भीर रोगी को तला- भुना खाना, मिर्च- मसालेदार गरिष्ठ चीजों के उपयोग की इजाजत देगा। यही क्यों रोगियों के साथ राग- रंग एवं विलासिता के विषय भोग भी वर्जित कर दिये जाते हैं।

चिकित्सा की कोई भी पद्धति रोगियों के जीवनक्रम का जिस तरह से निर्धारण करती है, प्रकारान्तर से वह उन्हें संयम- सदाचार की सिखावन ही है। इस सिखावन की उपेक्षा करके कोई गम्भीर रोग केवल औषधियों के सहारे ठीक नहीं होता है। इसमें इतना जरूर है कि इन चिकित्सकों एवं रोगियों की यह आस्था रोग निवारण तक ही किसी तरह टिक पाती है। रोग के लक्षण गायब होते ही फिर वे भोग- विलास में संलग्न होकर नये रोगों को आमंत्रित करने में जुट जाते हैं। जबकि आध्यात्मिक चिकित्सा की जीवन दृष्टि एवं जीवनशैली संयम- सदाचार के प्रयोगों पर ही टिकी है। आध्यात्मिक चिकित्सकों ने इन प्रयोगों को बड़ी गहनता से किया है। इसकी विशेषताओं एवं सूक्ष्मताओं को जाना है और इसके निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ९९

👉 पुनर्गठन का स्वरूप-

निर्णय किया गया है कि जो नियमित रूप से इस विचारधारा के संपर्क में रहने के लिए आतुर रहते हैं, समय पर यह आहार न मिलने से बेचैनी अनुभव करते हैं और तलाश के लिए हाथ पैर पीटते हैं, उन सबको परिजन सदस्य मानेंगे। नये नामांकन उन्हीं के होंगे और उन्हीं के व्यक्तिगत परिचय सुरक्षित रजिस्टर में नोट किये जावेंगे। इन परिचयों के आधार पर उनकी स्थिति समझना एवं विचारों का आवश्यक आदान प्रदान भी सम्भव हो सकेगा।

कर्मठ कार्यकर्ताओं की श्रेणी इससे ऊँची है। उन्हें व्रतधारी कह सकते हैं। न्यूनतम एक घण्टा समय और दस पैसा प्रतिदिन ज्ञान यज्ञ के लिए जो लगाते हैं उनकी श्रद्धा ने कर्मक्षेत्र में प्रवेश पा लिया ऐसा माना जा सकता है।

संक्षेप में भविष्य के युग निर्माण परिवार में तीन प्रकार के परिजन होंगे-
१- सहयोगी समर्थक स्नेही परिचित (2) पत्रिकाओं के सदस्य नियमित पाठक एवं सुनने वाले (3) अंशदान प्रस्तुत करके मिशन की सक्रिय सहायता करने वाले। इन तीनों में से सहयोगी श्रेणी का नामांकन स्थानीय शाखाओं में ही नोट रहेगा। इनका पंजीकरण हमारे लिए सम्भवं नहीं। इनकी संख्या तो लाखों की संख्या पार करके करोड़ों तक पहुँचेगी।
शान्तिकुञ्ज एवं गायत्री तपोभूमि में (1) पत्रिकाओं के नियमित सदस्यों, पाठकों का तथा (2) अंशदान करने वाले व्रतधारी कर्मनिष्ठों का ही रिकार्ड रहेगा। इन दोनों को मिलाकर स्थानीय संगठन की इकाइयाँ बना दी जायेगी। परिवार का पुनर्गठन इसी आधार पर होगा। विभिन्न प्रकार के आदान प्रदानों की शृंखला इसी परिवार के बीच चलेगी। मिशन के भविष्य का उत्तरदायित्व इन्हीं प्राणवान परिजनों के कन्धे पर डाला जायेगा। इस हस्तान्तरण के उपरान्त ही हम अपनी निकटवर्ती विदाई के लिए शान्तिपूर्वक महाप्रयाण कर सकेंगे।

पुनर्गठन की योजना यह है कि जहाँ श्री अखण्ड ज्योति, युग निर्माण, महिला जागृति आदि मिशन की पत्रिकाओं के न्यूनतम 10 सदस्य हैं, वहाँ उनका एक युग निर्माण परिवार गठित कर दिया जाय। इसी दृष्टि से पत्रिकाओं के सदस्यों का सर्वेक्षण प्रारम्भ भी कर दिया गया है। संख्या को महत्व न देकर हमें स्तर की गरिमा स्वीकार करनी होगी। अस्तु विचार है कि जो मिशन का स्वरूप ठीक तरह समझते हैं और सही दिशा में कदम बढ़ाने के लिए सहमत हैं, उन्हें ही साथ लेकर चला जाय।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५३

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/July/v1.53

बुधवार, 25 सितंबर 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७०)

👉 वातावरण की दिव्य आध्यात्किम प्रेरणाएँ

दक्षिणेश्वर की पावन मिट्टी को अपने माथे पर लगाकर, यहाँ के पेड़ों के नीचे बैठकर हम सभी के मन का अवसाद दूर होता था। वारीन्द्र इस कथा को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि स्वाधीनता संघर्ष का वह दौर हममें से किसी के लिए आसान नहीं था। विपरीतताएँ- विपन्नताएँ भयावह थी। कदम- कदम पर भारी संकट थे। कब क्या हो जाय कोई ठिकाना नहीं। ऐसे में अच्छा खासा व्यक्ति भी मनोरोगी हो जाए। जीवन शैली ऐसी कि खाना- सोना यहाँ तक कि जीना भी हराम। ऐसे में देह का रोगों से घिर जाना कोई आश्चर्य की बात न थी। पर हम सभी को दक्षिणेश्वर की मिट्टी पर गहरी आस्था थी। इस मिट्टी से तिलक कर हम ऊर्जावान होते थे। यह भूमि हमारी सब प्रकार से चिकित्सा करती थी।

इस आश्चर्यजनक किन्तु सत्य का मर्म आस्थावान समझ सकते हैं। यह अनुभव कर सकते हैं कि वातावरण की आध्यात्मिक प्रेरणाएँ किस तरह से व्यक्तित्व को प्रेरित, प्रभावित व परिवर्तित करती हैं। वारीन्द्र की इस अनुभूति कथा की अगली कड़ी का सच यह है कि महर्षि श्री अरविन्द को जब अंग्रेज पुलिस कप्तान गिरफ्तार करने उनके कमरे में आया तो उसे एक डिबिया मिली। इस डिबिया में दक्षिणेश्वर की मिट्टी थी। साधारण सी मिट्टी इतने जतन से रखी गई थी, अंग्रेज कप्तान को इस पर बिल्कुल भरोसा न हुआ। उसने कई ढंग से पूछ- ताछ की, जाँच- पड़ताल की, पर कोई उसके मन- मुताबिक निष्कर्ष न निकला। क्योंकि उस मिट्टी को वह बम बनाने का रसायन समझ रहा था। उसने उसे प्रयोगशाला में परीक्षण के लिए भेज दिया।

प्रयोगशाला के निष्कर्षों ने भी उसे बेचैन कर दिया। क्योंक ये निष्कर्ष भी उसे मिट्टी बता रहे थे। पर वह मानने के लिए तैयार नहीं था कि यह मिट्टी हो सकती है। सभी क्रान्तिकारियों ने इस पर उसका खूब मजाक बनाया। वारीन्द्र ने इस घटना पर अपनी टिप्पणी करते हुए लिखा था कि वह अंग्रेज कप्तान एक अर्थो में सही था। वह मिट्टी साधारण थी भी नहीं। वह एकदम असाधारण थी, क्योंकि उसमें दक्षिणेश्वर के परमहंस देव की चेतना समायी थी, जो हम सभी के जीवन की औषधि थी। अध्यात्मिक वातावरण के इस सच के दिव्य प्रभाव बहुत सघन है किन्तु इन्हें वही अनुभव कर सकता है, जो संयम व सदाचार के प्रयोगों में संलग्र हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ९७

👉 शरीर नहीं चेतना के सम्बन्धी चाहिए-

अब हम युग निर्माण परिवार का प्रारम्भिक सदस्य उन्हें मानेंगे जिनमें मिशन की विचारधारा के प्रति आस्था उत्पन्न हो गई है, जो उसका मूल्य महत्व समझते हैं, उसके लिए जिनके मन में उत्सुकता एवं आतुरता रहती है। जिनमें यह उत्सुकता उत्पन्न न हुई हो उनका हमसे व्यक्तिगत सम्बन्ध परिचय भर माना जा सकता है, मिशन के साथ उन्हें सम्बन्ध नहीं माना जायेगा।

यहाँ इन दो बातों का अन्तर स्पष्ट समझ लिया जाना चाहिए कि हमारा व्यक्तिगत परिचय एक बात है और मिशन के साथ सम्बन्ध दूसरी। व्यक्तिगत परिचय को शरीरगत संपर्क कहा जा सकता है और मिशन के प्रति घनिष्ठता को हमारे प्राणों के साथ लिपटना। शरीर संबंधी तो नाते रिश्तेदारों से लेकर भवन निर्माण, प्रेस, खरीद फरोख्त आदि के सिलसिले में हमारे संपर्क में आने वाले ढेरों व्यक्ति हैं। वे भी अपने संपर्क का गौरव अनुभव करते हैं। किन्तु हमारे अन्तःकरण का हमारी आकांक्षाओं एवं प्रवृत्तियों का न तो उन्हें परिचय ही है और न उस नाते, सम्बन्ध सहयोग ही है। उसी श्रेणी में उन्हें भी गिना जायेगा जिन्होंने कभी गुरु दीक्षा अथवा भेंट वार्तालाप के नाते सामयिक संपर्क बनाया था। इस बहिरंग शरीरगत संपर्क को भी झुठलाया नहीं जा सकता। उनके स्नेह, सद्भाव के लिए हमारे मन में स्वभावतः जीवन भर कृतज्ञता एवं आभार के भाव बने रहेंगे। किन्तु जो हमारे अन्तःकरण को भी छू सके हैं, छू सकते हैं, उनकी तलाश हमें सदा से रही है, रहेगी भी।

यदि किसी को हमारा वास्तविक परिचय प्राप्त करना हो तो नवयुग के प्रतीक प्रतिनिधि के रूप में ही हमारे समूचे जीवन का-समूचे व्यक्तिगत का मूल्यांकन करना चाहिए। हमारे रोम रोम में चेतना के रूप में बसा हुआ भगवान यह रास रचाए हुए हैं। पन्द्रह वर्ष की आयु में अपना जीवन जिस भगवान-जिस सद्गुरु को समर्पित किया था, वह शरीर सत्ता नहीं, वरन् युग चेतना की ज्वलन्त ज्वाला ही कही जा सकती है। उसके प्रभाव से हम जो कुछ भी सोचते और करते हैं उसे असंदिग्ध रूप से भजन कहा जा सकता है। यह भजन मानवी आदर्शों को पुनर्जीवित करने का विविध प्रयोगों के रूप में समझा जा सकता है। हमारी दैनिक उपासना भी इसी का एक अंग है। उसके माध्यम से हम अपनी सामर्थ्य पर-अन्तरात्मा पर प्रखरता की धार रखते हैं, इसलिए उसे साधना भर कहा जायेगा। साध्य तो वह भगवान है, जिसकी झाँकी स्थूल शरीर में सत्कर्म, सूक्ष्म शरीर में सद्ज्ञान एवं कारण शरीर में सद्भाव के रूप में भासित होती है। एक वाक्य में कहना हो तो हमारा प्राण स्पंदन और मिशन, एक ही कहा जा सकता है। इस तथ्य के आधार पर जिनकी मिशन की विचारधारा के प्रति जितनी निष्ठा और तत्परता है, उन्हें हम अपने प्राण जीवन का उतना ही घना सम्बन्धी मानते हैं। भले ही वे व्यक्तिगत रूप से हमारे शरीरगत संपर्क में कभी न आये हों, हमारी आशा भरी दृष्टि उन्हीं पर जा टिकती है।

उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखकर हम युग निर्माण परिवार का पुनर्गठन कर रहे हैं। हम हर माह आत्ममंथन से जो कुछ उपार्जित करते हैं, उसे भाव भरे नवनीत की तरह स्वजनों को बाँटते हैं। यह वितरण नियमित रूप से मिशन की पत्रिकाओं के माध्यम से किया जाता है। जिन्हें यह रुचिकर लगता है, जो उत्सुकतापूर्वक उसकी प्रतीक्षा करते हैं, उन्हें हम अपने सुख दुःख-दर्द सम्वेदना का साथी-सहभागी मानते हैं। आज वह चेतना जहाँ उत्सुकता के रूप में है, वहाँ कल तत्परता भी उत्पन्न होकर रहेगी, ऐसी आशा करना निरर्थक नहीं-तथ्यपूर्ण है। आज जो हमारी सम्वेदनाओं में सम्मिलित हैं कल वे हमारे कदम से कदम और कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने का भी साहस करेंगे, इस आशा का दीपक हम मरण के दिन तक सँजोये ही रहेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५१

Gayatri Mantra Ka Arth | गायत्री मंत्र का अर्थ



Title

शनिवार, 21 सितंबर 2019

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ...
इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब फाइनेसिअली इंडिपेंडेंट बेटा पिता के कई बार समझाने पर भी इग्नोर कर देता और कहता, "यही तो उम्र है शौक की,खाने पहनने की, जब आपकी तरह मुँह में दाँत और पेट में आंत ही नहीं रहेगी तो क्या करूँगा।"

बहू खुशबू भी भरे पूरे परिवार से आई थी, इसलिए बेटे की गृहस्थी की खुशबू में रम गई थी। बेटे की नौकरी अच्छी थी तो फ्रेंड सर्किल उसी हिसाब से मॉडर्न थी। बहू को अक्सर वह पुराने स्टाइल के कपड़े छोड़ कर मॉडर्न बनने को कहता, मगर बहू मना कर देती .....

वो कहता "कमाल करती हो तुम, आजकल सारा ज़माना ऐसा करता है, मैं क्या कुछ नया कर रहा हूँ। तुम्हारे सुख के लिए सब कर रहा हूँ और तुम हो कि उन्हीं पुराने विचारों में अटकी हो। क्वालिटी लाइफ क्या होती है तुम्हें मालूम ही नहीं।"

और बहू कहती "क्वालिटी लाइफ क्या होती है, ये मुझे जानना भी नहीं है, क्योकि लाइफ की क्वालिटी क्या हो, मैं इस बात में विश्वास रखती हूँ।"

आज अचानक पापा आई. सी. यू. में एडमिट हुए थे। हार्ट अटेक आया था। डॉक्टर ने पर्चा पकड़ाया, तीन लाख और जमा करने थे। डेढ़ लाख का बिल तो पहले ही भर दिया था मगर अब ये तीन लाख भारी लग रहे थे। वह बाहर बैठा हुआ सोच रहा था कि अब क्या करे।

उसने कई दोस्तों को फ़ोन लगाया कि उसे मदद की जरुरत है, मगर किसी ने कुछ तो किसी ने कुछ बहाना कर दिया। आँखों में आँसू थे और वह उदास था तभी खुशबू  खाने का टिफिन लेकर आई और बोली,"अपना ख्याल रखना भी जरुरी है। ऐसे उदास होने से क्या होगा? हिम्मत से काम लो, बाबू जी को कुछ नहीं होगा आप चिन्ता मत करो। कुछ खा लो फिर पैसों का इंतजाम भी तो करना है आपको मैं यहाँ बाबूजी के पास रूकती हूँ आप खाना खाकर पैसों का इंतजाम कीजिये। "पति की आँखों से टप-टप आँसू झरने लगे।

"कहा न आप चिन्ता मत कीजिये। जिन दोस्तों के साथ आप मॉडर्न पार्टियां करते हैं आप उनको फ़ोन कीजिये, देखिए तो सही, कौन कौन मदद को आता हैं। "पति खामोश और सूनी निगाहों से जमीन की तरफ़ देख रहा था। कि खुशबू का हाथ उसकी पीठ पर आ गया। और वह पीठ  को सहलाने लगी।

"सबने मना कर दिया। सबने कोई न कोई बहाना बना दिया खुशबू।आज पता चला कि ऐसी दोस्ती तब तक की है जब तक जेब में पैसा है। किसी ने भी हाँ नहीं कहा जबकि उनकी पार्टियों पर मैंने लाखों उड़ा दिये।"

"इसी दिन के लिए बचाने को तो माँ-बाबा कहते थे। खैर, कोई बात नहीं, आप चिंता न करो, हो जाएगा सब ठीक। कितना जमा कराना है?"

"अभी तो तनख्वाह मिलने में भी समय है, आखिर चिन्ता कैसे न करूँ खुशबू ?"

"तुम्हारी ख्वाहिशों को मैंने सम्हाल रखा है।"

"क्या मतलब....?"

"तुम जो नई नई तरह के कपड़ो और दूसरी चीजों के लिए मुझे पैसे देते थे वो सब मैंने सम्हाल रखे हैं। माँ जी ने फ़ोन पर बताया था, तीन लाख जमा करने हैं। मेरे पास दो लाख थे। बाकी मैंने अपने भैया से मंगवा लिए हैं। टिफिन में सिर्फ़ एक ही डिब्बे में खाना है बाकी में पैसे हैं।" खुशबू ने थैला टिफिन सहित उसके हाथों में थमा दिया।

"खुशबू ! तुम सचमुच अर्धांगिनी हो, मैं तुम्हें मॉडर्न बनाना चाहता था, हवा में उड़ रहा था। मगर तुमने अपने संस्कार नहीं छोड़े. आज वही काम आए हैं। "

सामने बैठी माँ के आँखो में आंसू थे उसे आज खुद के नहीं बल्कि पराई माँ के संस्कारो पर नाज था और वो बहु के सर पर हाथ फेरती हुई ऊपरवाले का शुक्रिया अदा कर रही थी।


#Subscribe Us On  
#Rishi_Chintan #YouTube:- 
 
https://bit.ly/2KISkiz  

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...