प्रकृति प्रकोप के रूप में सामूहिक दण्ड व्यवस्था ही चलती है। अति वृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, बाढ़, तूफान, महामारी, भूमि कीटक आदि के रूप में कई प्रकार की विकृतियाँ आये दिन दरवाजे पर लगी रहने की घटनाएँ पाप युग में होती हैं। सतयुग के सम्बन्ध में विवरण मिलता है कि तब मनुष्य दीर्घजीवी होते थे। बाप के सामने बेटा नहीं मरता था। वृक्ष मनचाहे फल देते थे। भूमि से प्रचुर अन्न उपजता था। गौएँ बहुत दूध देती थी। वर्षा उपयुक्त समय पर उपयुक्त मात्रा में होती थी। प्रकृति प्रकोप कभी नहीं होता था। यह प्रकृति की अनुकूलता मनुष्य की सत्प्रवृत्तियों के साथ जुड़ी हुई है। इकॉलाजी विज्ञान के अनुसार प्रकृति की विचारशीलता, सन्तुलन व्यवस्था, दूरदर्शिता एवं न्याय प्रियता का अब क्रमशः अधिकाधिक परिचय मिलता जा रहा है। सामूहिक दुष्प्रवृत्तियों का सामूहिक दण्ड भी उसी व्यवस्था के अन्तर्गत आता है।
व्यक्ति के कर्म का दण्ड व्यक्ति को मिलना चाहिए। यह व्यवस्था तो चलती ही है, पर सामूहिक उत्तरदायित्वों से बँधा रहने के कारण मनुष्य को सामूहिक दुष्प्रवृत्तियों की रोक थाम करने का भी जिम्मेदार माना है। उसकी उपेक्षा की जाय तो वह भी एक पाप बनता है। स्वयं अच्छा रहना तो उचित ही है, पर उतना ही आवश्यक यह भी है कि जिस समाज में रहा जा रहा है उसे परिष्कृत बनाये रहने की जिम्मेदारी निबाहने में भी उतनी ही तत्परता बरती जाय। अपने आप के हित साधन में लगे रहने वाले, दूसरों की उपेक्षा करने वाले स्वार्थी कहलाते है और निन्दा के पात्र बनते हैं। यद्यपि स्वार्थ साधन कोई प्रत्यक्ष अपराध नहीं है और न उससे किसी मर्यादा का प्रत्यक्षतः उल्लंघन ही होता है। फिर भी व्यक्तिवादी स्वार्थ परायण व्यक्ति निन्दित ठहराये जाते हैं, उसका एक ही कारण है कि मनुष्य के लिए सामाजिक सुव्यवस्था के प्रति उतना ही जागरूक रहना आवश्यक माना गया है जितना कि अपने निर्वाह और सुरक्षा का प्रबन्ध करना।
सरकार कई अपराधों के लिए सामूहिक जुर्माना करती है। समीपवर्तिय क्षेत्र में अपराध होता रहे इसका हमसे सीधा सम्बन्ध नहीं, यह सोचकर उसे रोका न जाय तो इस उपेक्षा को भी मानवी कर्तव्य शास्त्र में दण्डनीय अपराध माना गया है। सामूहिक जुर्माना ऐसे ही अपराधों में किये जाने की दण्ड व्यवस्था है। पड़ौस के गाँव में डकैती पड़ती रहे और जिसके पास बन्दूक का लाइसेन्स है वह डाकुओं का सामना करने न गया, तो उस कायरता को अपराध माना जायेगा और उसकी बन्दूक जब्त कर ली जायेगी। सामूहिक प्रकृति प्रकोप भी ऐसे ही सामूहिक दण्ड विधान के रूप में समूचे मनुष्य जाति पर बरसते है। आवश्यक नहीं कि जिन्हें कष्ट भुगतना पड़ा है मात्र उन्हीं का अपराध हो। मुहल्ले में गन्दगी के ढ़ेर जमा हो तो जमा करने वाले भी और उसे न रोकने वाले भी उस सड़न से हानि उठावेंगे। पड़ोस का छप्पर जलता रहे और अपने घर शान्ति पूर्वक बैठे रहा जाय तो बढ़ती हुई आग अपने को भी लपेटने लगेगी। मुहल्ले में गुन्डा गर्दी बढ़ती रहे तो अनेक सौम्य प्रकृति के बालक भी उस कुचक्र के शिकार किसी न किसी प्रकार बनकर ही रहेंगे। एक व्यक्ति दुष्कर्म करता है बदनामी सारे परिवार या गाँव की होती है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
व्यक्ति के कर्म का दण्ड व्यक्ति को मिलना चाहिए। यह व्यवस्था तो चलती ही है, पर सामूहिक उत्तरदायित्वों से बँधा रहने के कारण मनुष्य को सामूहिक दुष्प्रवृत्तियों की रोक थाम करने का भी जिम्मेदार माना है। उसकी उपेक्षा की जाय तो वह भी एक पाप बनता है। स्वयं अच्छा रहना तो उचित ही है, पर उतना ही आवश्यक यह भी है कि जिस समाज में रहा जा रहा है उसे परिष्कृत बनाये रहने की जिम्मेदारी निबाहने में भी उतनी ही तत्परता बरती जाय। अपने आप के हित साधन में लगे रहने वाले, दूसरों की उपेक्षा करने वाले स्वार्थी कहलाते है और निन्दा के पात्र बनते हैं। यद्यपि स्वार्थ साधन कोई प्रत्यक्ष अपराध नहीं है और न उससे किसी मर्यादा का प्रत्यक्षतः उल्लंघन ही होता है। फिर भी व्यक्तिवादी स्वार्थ परायण व्यक्ति निन्दित ठहराये जाते हैं, उसका एक ही कारण है कि मनुष्य के लिए सामाजिक सुव्यवस्था के प्रति उतना ही जागरूक रहना आवश्यक माना गया है जितना कि अपने निर्वाह और सुरक्षा का प्रबन्ध करना।
सरकार कई अपराधों के लिए सामूहिक जुर्माना करती है। समीपवर्तिय क्षेत्र में अपराध होता रहे इसका हमसे सीधा सम्बन्ध नहीं, यह सोचकर उसे रोका न जाय तो इस उपेक्षा को भी मानवी कर्तव्य शास्त्र में दण्डनीय अपराध माना गया है। सामूहिक जुर्माना ऐसे ही अपराधों में किये जाने की दण्ड व्यवस्था है। पड़ौस के गाँव में डकैती पड़ती रहे और जिसके पास बन्दूक का लाइसेन्स है वह डाकुओं का सामना करने न गया, तो उस कायरता को अपराध माना जायेगा और उसकी बन्दूक जब्त कर ली जायेगी। सामूहिक प्रकृति प्रकोप भी ऐसे ही सामूहिक दण्ड विधान के रूप में समूचे मनुष्य जाति पर बरसते है। आवश्यक नहीं कि जिन्हें कष्ट भुगतना पड़ा है मात्र उन्हीं का अपराध हो। मुहल्ले में गन्दगी के ढ़ेर जमा हो तो जमा करने वाले भी और उसे न रोकने वाले भी उस सड़न से हानि उठावेंगे। पड़ोस का छप्पर जलता रहे और अपने घर शान्ति पूर्वक बैठे रहा जाय तो बढ़ती हुई आग अपने को भी लपेटने लगेगी। मुहल्ले में गुन्डा गर्दी बढ़ती रहे तो अनेक सौम्य प्रकृति के बालक भी उस कुचक्र के शिकार किसी न किसी प्रकार बनकर ही रहेंगे। एक व्यक्ति दुष्कर्म करता है बदनामी सारे परिवार या गाँव की होती है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य








































