बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

👉 जो है वही क्या कम है

एक मनुष्य किसी महात्मा के पास पहुँचा व कहने लगा- 'जीवन अल्पकाल कौ है। इस थोडे़ से समय में क्या- क्या करें? बाल्यकाल में ज्ञान नहीं रहता। बुढ़ापा उससे भी बुरा होता है। रात- दिन नींद नहीं लगती है। रोगों का उपद्रव अलग बना रहता है। युवावस्था में कुटुम्ब का भरण- पोषण किये बिना नहीं चलता। तब भला ज्ञान कैसे मिले? लोक- सेवा कब की जाय? इस जिन्दगी में तो कभी समय मिलता दीखता ही नहीं। ' ऐसा कह और खिन्न होकर वह रोने लगा।

उसे रोते देखकर महात्मा भी रोने लगे। उस आदमी ने पूछा- आप क्यों रोते हैं?' महात्मा ने कहा- 'क्या करूँ बच्चा! खाने के लिए अन्न चाहिए। लेकिन अन्न उपजाने के लिए मेरे पास जमीन नहीं है। मैं भूख से मर रहा हूँ। परमात्मा के एक अंश में माया है। माया के एक अंश में तीन गुण है। गुणों के एक अंश में आकाश है। आकाश में थोड़ी- सी वायु है और वायु में बहुत आग है। आग के एक भाग में पानी है। पानी का शतांश पृथ्वी है। पृथ्वी के आधे हिस्से पर पर्वतों का कब्जा है। नदियों और जंगलों को जहाँ देखो, वहाँ अलग बिखरे पड़े है। मेरे लिए भगवान ने जमीन का एक नन्हा सा टुकड़ा भी नहीं छोडा। थोड़ी- सी जमीन थी भी, सो उस पर और- और लोग अधिकार जमाये बैठे हैं। तब बताओ मैं भूखो न मरुँगा ?'

उस मनुष्य ने कहा- 'यह सब होते हुए भी आप जिन्दा तो हो न? फिर रोते क्यों हँ?' महात्मा तुरन्त बोल उठे- "तुम्हें भी तो समय मिला है, बहुमूल्य जीवन मिला है, फिर 'समय नहीं मिलता है, जीवन समाप्त हो रहा है' इसकी रट लगाकर क्यों हाय- हाय करते हो। अब आगे से समय न मिलने का बहाना न करना। जो कुछ भी है उसका तो उपयोग करो। "

साधनों की न्यूनता की दुहाई देना, ईश्वर के राजकुमार को तो कदापि शोभा नहीं देता। अपनी अपूर्णता को पूर्णता में बदल देने की याचना यदि आत्मिक क्षेत्र के विषय में हो तो वह मानवोचित भी है, गरिमापूर्ण भी। पर यदि बाह्य साधन प्रचुर मात्रा में हों तब उसकी ऐसी शिकायत दुर्भाग्यपूर्ण ही है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 श्रेष्ठता की परीक्षा:-

“नहीं, नहीं, विरोचन। श्रेष्ठता का आधार वह तप नहीं जो व्यक्ति को मात्र सिद्धियाँ  और सामर्थ्य प्रदान करे। ऐसा तप तो शक्ति-संचय का साधन मात्र है। श्रेष्ठ तपस्वी तो वह है जो अपने लिये कुछ चाहे बिना समाज के शोषित, उत्पीड़ित, दलित और असहाय जनों को निरन्तर ऊपर उठाने के लिये परिश्रम किया करता है। इस दृष्टि से महर्षि कण्व की तुलना राजर्षि विश्वामित्र नहीं कर सकते। कण्व की सर्वोच्च प्रतिष्ठा इसलिये है कि वह समाज और संस्कृति, व्यष्टि और समष्टि के उत्थान के लिये निरंतर घुलते रहते हैं।” भगवान इन्द्र ने विनोद भाव से विरोचन की बात का प्रतिवाद किया।

पर विरोचन अपनी बात पर दृढ़ थे। उनका कहना था- तपस्वियों में तो श्रेष्ठ विश्वामित्र ही हैं। उन दिनों विश्वामित्र शिवालिक-शिखर पर सविकल्प समाधि अवस्था में थे और कण्व वहाँ से कुछ दूर आश्रम-जीवन ज्ञापन कर रहे थे। कण्व के आश्रम में बालकों का ही शिक्षण नहीं बालिकाओं को भी समानान्तर आध्यात्मिक, धार्मिक एवं साधनात्मक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था।

विरोचन ने फिर वही व्यंग्य करते हुए कहा- “भगवान् आपको तो स्पर्धा का भय है किन्तु आप विश्वास रखिये विश्वामित्र त्यागी सर्व प्रथम है तपस्वी बाद में। उन्हें इन्द्रासन का कोई लोभ नहीं, तप तो वह आत्म-कल्याण के लिये कर रहे हैं। उन्होंने न झुकने वाली सिद्धियाँ अर्जित की हैं। उन सिद्धियों का लाभ तो समाज को भी दिया जा सकता है।“

भगवान् इन्द्र ने पुनः अपने तर्क के प्रमाणित किया- “विश्वामित्र की सिद्धियों को मैं जानता हूँ विरोचन! किन्तु सिद्धियाँ प्राप्त कर लेने के बाद यह आवश्यक नहीं कि वह व्यक्ति उनका उपयोग लोक-कल्याण में करे। शक्ति में अहंभाव का जो दोष है वह सेवा में नहीं इसलिये सेवा को मैं शक्ति से श्रेष्ठ मानता हूँ इसीलिये कण्व की विश्वामित्र से बड़ा मानता हूँ।“

बात आगे बढ़ती किन्तु महारानी शची के आ जाने से विवाद रुक गया। रुका नहीं बल्कि एक मोड़ ले लिया। शची ने हँसते हुए कहा- “अनुचित क्या है? क्यों न इस बात की हाथों-हाथ परीक्षा कर ली जाये।“

बात निश्चित हो गई। कण्व और विश्वामित्र की परीक्षा होगी, यह बात कानों-कान सारी इन्द्रपुरी में पहुँच गई। लोग उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करने लगे देखें सिद्धि की विजय होती है या सेवा की।

निशादेवी ने पहला पाँव रखा। दीप जले, देव-आरती से उनका स्वागत किया गया। दिव्य-ज्योतियों से सारा इन्द्रपुर जगमग-जगमग करने लगा। ऐसे समय भगवान् इन्द्र ने अनुचर को बुलाकर रुपसी अप्सरा मेनका को उपस्थित करने की आज्ञा दी। अविलम्ब आज्ञा का पालन किया गया। थोड़ी ही देर में मेनका वहाँ आ गई। इन्द्र ने उसे सारी बातें समझा दीं। वह रात इस तरह इन्द्रपुर में अनेक प्रकार की मनोभावों में ही बीती।

सबेरा हुआ। भगवती उषा का साम्राज्य ढलने लगा। भुवन भास्कर देव प्राची में अपनी दिव्य सभा के साथ उगने लगे। भगवती गायत्री के आराधना का यह सर्वोत्कृष्ट समय होता है। तपस्वी विश्वामित्र आसन, बंध और प्राणायाम समाप्त कर जप के लिये बैठे थे। उनके हृदय में वैराग्य की धारा अहर्निश बहा करती थी। जप और ध्यान में कोई कष्ट नहीं होता था। बैठते-बैठते चित्त भगवान् सविता के भर्ग से आच्छादित हो गया। एक प्राण भगवती गायत्री और राजर्षि विश्वामित्र। दिव्य तेज फूट रहा था उनकी मुखाकृति से। पक्षी और वन्य जन्तु भी उनकी साधना देख मुग्ध हो जाते थे।

उनकी यह गहन शान्ति और स्थिरता देखकर पक्षियों को कलरव करने का साहस न होता। जन्तु चराचर नहीं करते थे, उन्हें भय था कहीं ध्यान न टूट जाये और तपस्वी के कोप का भाजन बनना पड़े। सिंह तब दहाड़ना भूल जाते वे दिन के तृतीय प्रहर में ही दहाड़ते और वह भी विश्वामित्र की प्रसन्नता बढ़ाने के लिये क्योंकि वह उस समय वन-विहार के लिये आश्रम छोड़ चुके होते थे।

किन्तु आज उस स्तब्धता को तोड़ने को साहस किया किसी अबला ने। अबला नहीं अप्सरा। मेनका। इन्द्रपुर जिसकी छवि पर दीपक की लौ पर शलभ की भाँति जल जाने के लिये तैयार रहता था। आज उसने अप्रतिम शृंगार कर विश्वामित्र के आश्रम में प्रवेश किया था। पायल की मधुर झंकार से वहाँ का प्राण-पूत वातावरण भी सिहर उठा। लौध्र पुष्प की सुगन्ध सारे आश्रम में छा गई। जहाँ अब तक शान्ति थी, साधना थी वहाँ देखते-देखते मादकता, वैभव और विलास खेलने लगा।

दण्ड और कमण्डलु ऋषि ने एक ओर रख दिये। कस्तूरी मृग जिस तरह बहेलिये की संगीत-ध्वनि से मोहित होकर कालातीत होने के लिये चल पड़ता है। सर्प जिस तरह वेणु का नाद सुनकर लहराने लगता है। उसी प्रकार महर्षि विश्वामित्र ने अपना सर्वस्व उस रुपसी अप्सरा के अञ्चल में न्यौछावर कर दिया। सारे भारतवर्ष में कोलाहल मच गया कि विश्वामित्र का तप भंग हो गया।

एक दिन, दो दिन, सप्ताह, पक्ष और मास बीतते गये और उनके साथ ही विश्वामित्र का तप और तेज भी स्खलित होता गया। विश्वामित्र का अर्जित तप काम के दो कौड़ी दाम बिक गया। और जब तप के साथ उनकी शांति उनका यश और वैभव भी नष्ट हो गया तब उन्हें पता चला कि भूल नहीं अपराध हो गया। विश्वामित्र प्रायश्चित की अग्नि में जलने लगे।

क्रोधोच्छ्दासित विश्वामित्र ने मेनका को दंड देने का निश्चय किया पर प्रातःकाल होने तक मेनका आश्रम से जा चुकी थी, इतने दिन की योग-साधना का परिणाम एक कन्या के रूप में छोड़ कर। विश्वामित्र ने बिलखती आत्मजा के पास भी मेनका को नहीं देखा तो उनकी देह क्रोध से जलने लगी पर अब हो ही क्या सकता? मेनका इन्द्रपुर जा चुकी थी।

रोती-बिलखती कन्या को देखकर भी विश्वामित्र को दया नहीं आई। पाप उन्होंने किया था पश्चाताप भी उन्हें ही करना चाहिये था पर उनकी आँखों में तो प्रतिशोध छाया हुआ था। ऐसे समय मनुष्य को इतना विवेक कहाँ रहता है कि वह यह सोचे कि मनुष्य अपनी भूलें सुधार भी सकता है। और नहीं तो अपनी सन्तान, अपने आगे आने वाली पीढ़ी के मार्गदर्शन के लिये तथ्य और सत्य को उजागर ही रख सकता है। विश्वामित्र को आत्म-कल्याण की चिन्ता थी इसलिये उन्हें इतनी भी दया नहीं आई कि वह बालिका को उठाकर उसके लिये दूध और जल की व्यवस्था करते। बालिका को वही बिलखता छोड़कर वे वहाँ से चले गये।

मध्याह्न वेला। ऋषि कण्व लकड़ियाँ काटकर लौट रहे थे। मार्ग में विश्वामित्र का आश्रम पड़ता था। बालिका के रोने का स्वर सुनकर कण्व ने निर्जन आश्रम में प्रवेश किया। आश्रम सूना पड़ा था। अकेली बालिका दोनों हाथों के अंगूठे मुँह में चूसती हुई भूख को धोखा देने का असफल प्रयत्न कर रही थी।

कण्व ने भोली बालिका को देखा, स्थिति का अनुमान करते ही उनकी आंखें छलक उठीं। उन्होंने बालिका को उठाया, चूमा और प्यार किया और गले लगाकर अपने आश्रम की ओर चल पड़े। पीछे-पीछे उनके सब शिष्य चल रहे थे।

इन्द्र ने विरोचन से पूछा- “तात बोलो न। जिस व्यक्ति के हृदय में पाप करने वाले के प्रति कोई दुर्भाव नहीं, पाप से उत्पीड़ित के लिये इतना गहन प्यार की उसकी सेवा माता की तरह करने को तैयार वह कण्व श्रेष्ठ हैं या विश्वामित्र?”

विरोचन आगे कुछ न बोल सके। उन्होंने लज्जावश अपना सिर नीचे झुका लिया।

अखण्ड ज्योति,सितम्बर-1969 से साभार

👉 आज का सद्चिंतन 6 Feb 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 Feb 2019


👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 Feb 2019

■ समाज के कल्याण की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, किन्तु अपने जीवन के बारे में कभी कुछ सोचा है हमने? जिन बातों को भाषण, उपदेश, लेखों में हम व्यक्त करते हैं, क्या उन्हें कभी अपने अंतर में देखा है! क्या उन आदर्शों को हम अपने परिवार, पड़ोस और राष्ट्रीय जीवन में व्यवहृत करते हैं? यदि ऐसा होने लग जाय तो हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में महान् सुधार, व्यापक क्रान्ति सहज ही हो जाए।

□ नम्रता एक प्रबल पुरुषार्थ है जिसमें सबके हित के लिए अन्यायी को मिटाने की नहीं, वरन् उसके अत्याचार को सहन करके उसे सुधारने का ठोस विज्ञान है। यह भूल सुधार का एक साधन है, जिसमें दूसरों को कष्ट न देकर स्वयं कष्ट सहन करने की क्षमता है।

◆ सच्ची प्रगति झूठे आधार अपनाने से उपलब्ध नहीं हो सकती। स्थायी सफलता और स्थिर समृद्धि के लिए उत्कृष्ट मानवीय गुणों का परिचय देना पड़ता है। जो इस कसौटी पर कसे जाने से बचना चाहते हैं, जो जैसे बने तुरन्त-तत्काल बहुत कुछ प्राप्त करना चाहते हैं, उनके सपने न सार्थक होते हैं, न सफल।

◇ धर्म अफीम की गोली नहीं है। परस्पर विद्वेष और असहिष्णुता उत्पन्न करने वाली कट्टरता को साम्प्रदायिक कहा जा सकता है, पर जिसका एकमात्र उद्देश्य ही प्रेम, दया, करुणा, सेवा, उदारता, संयम एवं सद्भावना को बढ़ाना है, उस धर्म को न तो अनावश्यक कहा जा सकता है और न अनुपयोगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 निराश मत होइए

रे. क्राक जो भी काम करने बैठते उसमें असफल हो जाते। सबसे पहले उन्होंने फ्लोरिडा में रीयल एस्टेट बेचने की कोशिश की, किंतु उसमें उन्हें घाटा हो गया। रीयल एस्टेट में घाटा होने के बाद उन्होंने उस काम को छोड़ दिया और एक बैंड में पियानो बजाने लगे। लेकिन वहां भी उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली। कुछ समय खाली रहने के बाद वे काफी परेशान हो गए। जीविका चलाने के लिए कोई न कोई काम करना तो जरूरी था। जब उन्हें काफी कोशिशों के बाद भी काम नहीं मिला, तो वे फ्रांस में कार ड्राईवर बन गए। लेकिन इसमें भी उनका मन नहीं लगा। ड्राईवरी छोड़कर वे सेल्समैन बन गए। उन्हें यह समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर उनका काम में मन क्यों नहीं लगता है?

शायद मन कोई नया और साहसिक काम करना चाहता था। ये तरह-तरह के धंधे आजमाने के बाद उन्होंने अपनी एक कंपनी बनाई और तेरह वर्ष तक मल्टी मिक्सर्स बेचते रहे। इसी तरह समय के साथ-साथ उनकी आयु बढ़ती रही और उन्हें सबसे बड़ी सफलता अपने जीवन के बावन वर्ष बिताने के बाद मिली। उन्होंने देखा कि उनके मल्टी मिक्सर्स का सबसे बड़ा खरीददार एक ऐसा रेस्तरां है, जिसे दो भाई मिलकर चलाते हैं।

एक दिन रे. क्राक उस रेस्तरां में गए। वहां उन्होंने देखा कि लोग लाइन में खड़े होकर हैमबर्गर के लिए हल्ला मचा रहे हैं। वहां से वापस आने के बाद उन्होंने काफी सोच-विचार कर मैक डोनल्ड बंधुओं के फ्रेंचाइजी अधिकार खरीद लिए। इसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने मैक डोनल्ड फ्रेंचाइजी चेन बनाकर पूरे विश्व में अपना व्यापार फैलाना शुरू किया और आज दुनिया के हर शहर में उनके बर्गर बिक रहे हैं। इस प्रकार रे. क्राक ने जीवन के उस समय में सफलता प्राप्त की, जब लोग कार्य करके और असफलता मिलने पर हार कर बैठ जाते हैं और अपना जीवन समाप्त समझते हैं।

👉 दलिया खाने के लाभ

■ दलिया में कम कैलोरी, कम वसा और उच्च फाइबर होता है जो शरीर के वजन को कम करने में मदद करता है।

□ दलिया में मौजूद अघुलनशील फाइबर कब्ज को रोकने और पाचन तंत्र के स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में मदद करता है। यह पेट के स्वास्थ्य को बनाए रखने और साथ ही साथ पेट के कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद करता है।

◆ दलिया प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का एक बड़ा स्रोत है जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करने में सहायक होता है।

◇ दलिया में फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता है जो कैंसर के खिलाफ शरीर की रक्षा करने में मदद कर सकते हैं।

■ दलिया का सेवन करने से हृदय रोग, उच्च कोलेस्ट्रॉल और उच्च रक्तचाप का खतरा कम हो जाता है।

□ दलिया में एंटी ऑक्सीडेंट गुण होते हैं जो हानिकारक विषाक्त पदार्थों से शरीर की रक्षा करते है।

◆ दलिया का सेवन मधुमेह के रोगियों के लिए भी काफी फायदेमंद होता है।

◇ दलिया कैल्शियम और मैग्नीशियम का एक अच्छा स्रोत है जो हड्डियों को मजबूत बनाता है।

■ दलिया आयरन का एक अच्छा स्त्रोत है जो हीमोग्लोबिन निर्माण करने के लिए हमारे शरीर के लिए बहुत आवश्यक है। लोहा शरीर के तापमान और चयापचय को विनियमित करने में मदद करता है।

□ दलिया पित्त पथरी के गठन को रोकने में मदद करता है।

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

👉 गेंहू के दाने: -

एक समय की बात है जब श्रावस्ती नगर के एक छोटे से गाँव में अमरसेन नामक व्यक्ति रहता था। अमरसेन बड़ा होशियार था, उसके चार पुत्र थे जिनके विवाह हो चुके थे और सब अपना जीवन जैसे-तैसे निर्वाह कर रहे थे परन्तु समय के साथ-साथ अब अमरसेन वृद्ध हो चला था! पत्नी के स्वर्गवास के बाद उसने सोचा कि अब तक के संग्रहित धन और बची हुई संपत्ती का उत्तराधिकारी किसे बनाया जाये?

ये निर्णय लेने के लिए उसने चारो बेटों को उनकी पत्नियों के साथ बुलाया और एक-एक करके गेहूं के पाँच दानें दिए और कहा कि मै तीरथ पर जा रहा हूँ और चार साल बाद लौटूंगा और जो भी इन दानों की सही हिफाजत करके मुझे लौटाएगा तिजोरी की चाबियाँ और मेरी सारी संपत्ती उसे ही मिलेगी, इतना कहकर अमरसेन वहां से चला गया।

पहले बहु- बेटे ने सोचा बुड्ढा सठिया गया है चार साल तक कौन याद रखता है हम तो बड़े हैं तो धन पर पहला हक़ हमारा ही है। ऐसा सोचकर उन्होंने गेहूं के दानें फेक दिये।

दूसरे ने सोचा की संभालना तो मुश्किल है यदि हम इन्हे खा लें तो शायद उनको अच्छा लगे और लौटने के बाद हमें आशीर्वाद देदे और कहे की तुम्हारा मंगल इसी में छुपा था और सारी संपत्ती हमारी हो जाएगी यह सोचकर उन्होंने वो पाँच दानें खा लिये।

तीसरे ने सोचा हम रोज पूजा पाठ तो करते ही हैं और अपने मंदिर में जैसे ठाकुरजी को सँभालते हैं, वैसे ही ये गेहूं भी संभाल लेंगे और उनके आने के बाद लौटा देंगे।

चौथे बहु- बेटे ने समझदारी से सोचा और पाचों दानो को एक एक कर जमीन में बो दिया और देखते-देखते वे पौधे बड़े हो गये और कुछ गेहूं ऊग आये फिर उन्होंने उन्हें भी बो दिया इस तरह हर वर्ष गेहूं की बढ़ोतरी होती गई पाँच दानें पाँच बोरी, पच्चीस बोरी,और पचासों बोरियों में बदल गए।

चार साल बाद जब अमरसेन वापस आया तो सबकी कहानी सुनी और जब वो चौथे बहु-बेटों के पास गया तो बेटा बोला , ” पिताजी , आपने जो पांच दाने दिए थे अब वे गेंहूँ की पचास बोरियों में बदल चुके हैं, हमने उन्हें संभल कर गोदाम में रख दिया है, उनपर आप ही का हक़ है। ” यह देख अमरसेन ने फ़ौरन तिजोरी की चाबियाँ सबसे छोटे बहु-बेटे को सौंप दी और कहा, तुम ही लोग मेरी संपत्ति के असल हक़दार हो।

इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि मिली हुई जिम्मेदारी को अच्छी तरह से निभाना चाहिए और मौजूद संसाधनो, चाहे वो कितने कम ही क्यों न हों, का सही उपयोग करना चाहिए। गेंहूँ के पांच दाने एक प्रतीक हैं, जो समझाते हैं कि कैसे छोटी से छोटी शुरआत करके उसे एक बड़ा रूप दिया जा सकता है।


आपको अपने परिवार में देखकर हमको बहुत प्रसन्नता होती है
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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https://youtu.be/UrTJjrUj7IU

👉 जैसे जैसे मेरी उम्र में वृद्धि होती गई

मुझे समझ आती गई कि अगर मैं Rs. 300 की घड़ी पहनूं या Rs. 30000 की, दोनों समय एक जैसा ही बताएंगी,

मेरे पास Rs. 300 का बैग हो या Rs. 30000 का, इसके अंदर के सामान में कोई परिवर्तन नहीं होंगा"

मैं 300 गज के मकान में रहूं या 3000 गज के मकान में, तन्हाई का एहसास एक जैसा ही होगा,

आख़िर में मुझे यह भी पता चला कि यदि मैं बिजनेस क्लास में यात्रा करूं या इक्नामी क्लास में, अपनी मंजिल पर उसी नियत समय पर ही पहुँचूँगा....

इसीलिए, अपने बच्चों को बहुत ज्यादा अमीर होने के लिए प्रोत्साहित मत करो बल्कि उन्हें यह सिखाओ कि वे खुश कैसे रह सकते हैं और जब बड़े हों, तो चीजों के महत्व को देखें, उसकी कीमत को नहीं,

फ्रांस के एक वाणिज्य मंत्री का कहना था -

ब्रांडेड चीजें व्यापारिक दुनिया का सबसे बड़ा झूठ होती हैं, जिनका असल उद्देश्य तो अमीरों की जेब से पैसा निकालना होता है, लेकिन गरीब और मध्यम वर्ग लोग इससे बहुत ज्यादा प्रभावित होते हैं।

क्या यह आवश्यक है कि मैं I phone लेकर चलूं फिरू, ताकि लोग मुझे बुद्धिमान और समझदार मानें?

क्या यह आवश्यक है कि मैं रोजाना Mac'd या KFC में खाऊँ ताकि लोग यह न समझें कि मैं कंजूस हूँ?

क्या यह आवश्यक है कि मैं प्रतिदिन Friends के साथ उठक-बैठक Downtown Cafe पर जाकर लगाया करूँ, ताकि लोग यह समझें कि मैं एक रईस परिवार से हूँ?

क्या यह आवश्यक है कि मैं Gucci, Lacoste, Adidas या Nike का ही पहनूं ताकि High Status वाला कहलाया जाऊँ?

क्या यह आवश्यक है कि मैं अपनी हर बात में दो चार अंग्रेजी शब्द शामिल करूँ ताकि सभ्य कहलाऊं?

क्या यह आवश्यक है कि मैं Adele या Rihanna को सुनूँ ताकि साबित कर सकूँ कि मैं विकसित हो चुका हूँ?

नहीं दोस्तों !!

मेरे कपड़े तो आम दुकानों से खरीदे हुए होते हैं।
Friends के साथ किसी ढाबे पर भी बैठ जाता हूँ।

भुख लगे तो किसी ठेले से ले कर खाने में भी कोई अपमान नहीं समझता।

अपनी सीधी सादी भाषा मे बोलता हूँ।

चाहूँ तो वह सब कर सकता हूँ जो ऊपर लिखा है।

लेकिन,

मैंने ऐसे लोग भी देखे हैं जो एक Branded जूतों की जोड़ी की कीमत में पूरे सप्ताह भर का राशन ले सकते हैं।

मैंने ऐसे परिवार भी देखे हैं जो मेरे एक Mac'd के बर्गर की कीमत में सारे घर का खाना बना सकते हैं,

बस मैंने यहाँ यह रहस्य पाया है कि बहुत सारा पैसा ही सब कुछ नहीं है, जो लोग किसी की बाहरी हालत से उसकी कीमत लगाते हैं, वह तुरंत अपना इलाज करवाएं"

मानव मूल की असली कीमत उसकी नैतिकता, व्यवहार, मेलजोल का तरीका, सहानुभूति और भाईचारा है, ना कि उसकी मौजुदा शक्ल और सूरत, सूर्यास्त के समय एक बार सूर्य ने सबसे पूछा, मेरी अनुपस्थिति में मेरी जगह कौन कार्य करेगा ?

समस्त विश्व मे सन्नाटा छा गया। किसी के पास कोई उत्तर नहीं था। तभी कोने से एक आवाज आई।

दीये ने कहा - "मै हूं  ना" मैं अपना पूरा प्रयास करुंगा"

आपकी सोच में ताकत और चमक होनी चाहिए
छोटा-बड़ा होने से फर्क नहीं पड़ता, सोच बड़ी होनी चाहिए,
मन के भीतर एक दीप जलाएं और सदा मुस्कुराते रहिए"

जियो और जीने दो 🙏 🙏


बड़े कार्य के लिये सहयोगी चाहिये
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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https://youtu.be/UZ2ypr0UAXE

👉 आज का सद्चिंतन 5 Feb 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Feb 2019


👉 नारद मोह

एक बार नारद को काम वासना पर विजय पाने का अहंकार हो गया था। उन्होंने भगवान् विष्णु के समक्ष भी अभिमान सहित प्रकट कर दिया। भगवान् ने सोचा कि भक्त के मन में मोह- अहंकार नहीं रहने देना चाहिए। उन्होंने अपनी माया का प्रपंच रचा। सौ योजन वाले अति सुरम्य नगर में शीलनिधि नामक राजा राज्य करता था। उसकी पुत्री परम सुन्दरी विश्व मोहिनी का स्वयम्बर हो रहा था। उसे देखकर नारद के मन में मोह वासना जागृत हो गयी। वे सोचने लगे कि नृपकन्या किसी विधि उनका वरण कर ले। भगवान को अपना हितैषी जानकर नारद ने प्रार्थना की। भगवान प्रकट हो गए और उनके हित साधन का आश्वासन देकर चले गए।

मोहवश नारद भगवान की गढ़ बात को समझ नहीं सके। वे आतुरतापूर्वक स्वयंवर भूमि में पहुँचे। नृप बाला ने नारद का बन्दर का सा मुँह देखकर उधर से बिछल ही मुँह फेर लिया। नारद बार- बार उचकते- मचकते रहे। विष्णु भगवान नर- वेष में आये। नृप सुता ने उनके गले में जयमाला डाल दी। वे उसे ब्याह कर चल दिये। अपनी इच्छा पूरी न होने पर नारदजी को गुस्सा आ गया और मार्ग में नृप- कन्या के साथ जाते हुए विष्णु भगवान को शाप दे डाला। भगवान ने मुस्करा कर अपनी माया समेट ली। अब वे अकेले खड़े थे। नारदजी की आँखें खुली की खुली रह गयीं। उन्होंने बार- बार क्षमायाचना की, कहा- भगवन्। मेरी कोई व्यक्तिगत इच्छा न रहे, आपकी इच्छा ही मेरी अभिलाषा हो, लोकं- मंगल की कामना ही हमारे मन में रहे।

नारद भगवान से निर्देश- सन्देश लेकर जन- जन तक उसे पहुँचाने के लिए उल्लास के साथ धरती पर आये एवं व्यक्ति के रूप में नहीं अपितु समष्टि में संव्याप्त चेतन प्रवाह के रूप में व्यापक बने। आज ध्वंस की तमिस्रा के मध्य जो नव सृजन का आलोक बिखरा दिखाई पड़ रहा है, वह इसी का प्रतिफल है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 The Only Source of Inner Joy

God has set a marvelous interdependence within and between the conscious and the inanimate components of Nature in order to maintain the eternal beauty and harmonious functioning of His grand creation. The uncountable numbers of stars and planets revolving in the limitless Universe are mutually connected by natural forces of attraction. Any break in this connectivity would disturb the maintained equilibrium and stability and result in gigantic collision and devastation of the universal system.

The same is true of the mutual affinity of the living beings. Just imagine! If a mother does not have a feeling of love or affection for her child, or there is no binding of love between husband and wife, brother and brother, and other family members, then what will be the state of family institution? Lack of the feelings of affectionate caring, amity, cooperation, etc would ruin the entire social system as the letter is founded on these sentiments and consequent unity of its members. Dry-hearts and cruelty would destroy the sense of beauty from Nature…

A sublime spring of pure love is flowing deep within every heart. If we like to be happy, and prosper in an ambience of peace, we will have to awaken the feeling of love in our heart; this should not be an emotional excitement, rather, a feeling of compassion, generosity, honesty, humility, sensitivity, care and respect for others. Those who adopted this divine attitude on every front of their life are truly religious and followers of God. The world reciprocates to them accordingly. Every moment, every circumstance is auspicious for them.

Akhand Jyoti, Feb. 1944

हमारी निराशा को दूर करिये जिंदा शक्तिपीठ बनाईये
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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https://youtu.be/EUfOL150df4

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Feb 2019

■ अनेक लोग जरा-सा संकट आते ही बुरी तरह घबरा जाते हैं। हाय-हाय करने लगते हैं, उसे ईश्वर का प्रकोप मानकर भला-बुरा कहने लगते हैं। निराश-हतोत्साह होकर ईश्वर के प्रति अनास्थावान् होने लगते हैं-यह ठीक नहीं। आपत्तियाँ संसार में सहज संभाव्य हैं। किसी समय भी आ सकती हैं। उन्हें ईश्वर का अपने बच्चों के साथ एक खेल समझना चाहिए। उनका आशय यही होता है कि बच्चे भयावह स्थितियों के अभ्यस्त हो जायें और डरने की उनकी आदत छूट जाये।

□ निर्भयता उत्कृष्ट मानसिक स्थिति का परिणाम है। यह एक नैतिक सद्गुण है, जो बड़े तप और त्याग से प्राप्त होता है। मन का जितना विकास होता जाएगा, उसी अनुपात से निर्भयता की उपलब्धि होगी। उत्कृष्ट आदर्श-सिद्धान्तों की रक्षा के लिए जितना उत्सर्ग, त्याग, कष्ट, सहिष्णुता होगी, उसी के अनुसार निर्भयता प्राप्त होती जाएगी।

◆ पाप कर्मों के लिए अपना अंतःकरण जिसे धिक्कारता और प्रताड़ित करता रहता है, वह मनुष्य सोते-जागते कभी चैन नहीं पा सकता। दमा और दर्द के रोगी की भाँति पापी को भी न रात में, न दिन में कभी भी चैन नहीं मिलता है। वह भीतर ही भीतर अपने आप ही अपनी शक्ति को कुतरता रहता है।

◇ भाग्य और कुछ नहीं, कल के लिए हुए पुरुषार्थ का आज का परिपक्व स्वरूप ही भाग्य है। जो आज भाग्यवान् दीखते हैं, उन्हें वह सौभाग्य अनायास ही नहीं मिला है। विधाता ने कोई पक्षपात भी उनके साथ नहीं किया है। उनके पूर्व पुरुषार्थ ही आज सौभाग्य के रूप में परिलक्षित हो रहे हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

आपके पूर्व संस्कारो से हमने आप को ढूंढा है
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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https://youtu.be/v-bV4h-X9Eg

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

👉 आपका जीवन साथी कौन है?

■ माँ
□ पिता
◆ बीवी
◇ बेटा
■ पति
□ बेटी
◆ दोस्त...????

बिल्कुल नहीं

आपका असली जीवन साथी
आपका शरीर है ..

एक बार जब आपका शरीर जवाब देना बंद कर देता है तो कोई भी आपके साथ नहीं है।
आप और आपका शरीर जन्म से लेकर मृत्यु तक एक साथ रहते हैं।
जितना अधिक आप इसकी परवाह करते हैं, उतना ही ये आपका साथ निभाएगा।

आप क्या खाते हो,
फ़िट होने के लिए आप क्या करते हैं,
आप तनाव से कैसे निपटते हैं

आप कितना आराम करते हैं
आपका शरीर वैसा ही जवाब देगा।
याद रखें कि आपका शरीर एकमात्र स्थायी पता है जहां आप रहते हैं।

आपका शरीर आपकी संपत्ति है, जो कोई और साझा नही  कर सकता।

आपका शरीर आपकी ज़िम्मेदारी है।
इसलिये,
तुम हो इसके असली जीवनसाथी।

हमेशा के लिए फिट रहो अपना ख्याल रखो,
पैसा आता है और चला जाता है
रिश्तेदार और दोस्त भी स्थायी नहीं हैं।

■ याद रखिये,
कोई भी आपके  अलावा आपके शरीर की मदद नहीं कर सकता है।

आप करें:-
■ प्राणायाम - फेफड़ों के लिए
□ ध्यान - मन के लिए
◆ योग-आसन - शरीर के लिए
◇ चलना - दिल के लिए
■ अच्छा भोजन - आंतों के लिए
□ अच्छे विचार - आत्मा के लिए
◆ अच्छे  कर्म - दुनिया के लिए 

इसलिए स्वस्थ रहो, फिट रहो और प्रसन्न रहो।

👉 लोटे की चमक

‘श्री रामकृष्ण परमहंस’ रोज अपना लोटा बहुत लगन से राख या मिट्टी से मांजकर खूब चमकाते थे। रोज के इस परिश्रम से श्री परमहंस का लोटा खूब चमकता था। उनके एक शिष्य को श्री रामकृष्ण द्वारा प्रतिदिन बहुत मेहनत से लोटा चमकाना बड़ा विचित्र लगता था।

आख़िर उससे रहा नहीं गया। एक दिन वह श्री रामकृष्ण जी से पूछ ही बैठा.... “महाराज! आपका लोटा तो वैसे ही खूब चमकता है। इतना चमकता है कि इसमें हम अपनी तस्वीर भी देख ले। फिर भी रोज-रोज आप इसे मिट्टी, राख और जून से मांजने में इतनी मेहनत क्यों करते है?”

गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस मुस्कुरा उठे हँसकर बोले.... “बेटा! इस लोटे की चमक एक दिन की, एक बार की मेहनत से नहीं आई है; इसमें आई मैल को हटाने के लिए नित्य-प्रति मेहनत करनी ही पड़ती है। ठीक वैसे ही जैसे जीवन में आई बुराईयों, बुरे संस्कारो को दूर करने के लिए हमें रोजाना ही संकल्पपूर्ण परिश्रम करना पड़ता है।

वास्तव में स्वयं को अच्छे व्यक्ति में बदलने के लिए हमें रोज के अभ्यास से दुर्गुणों का मैल दूर करना पड़ता है। लोटा हो या व्यक्ति का जीवन, उसे बुराइयों के मैल से बचाने के लिए हमें रोजाना ही कड़ा परिश्रम करना पड़ेगा। तभी इस लोटे की चमक या इंसान की चमक बची रह सकती है।"

इस प्रसंग से दो शिक्षाएँ मिलती हैं। एक तो यह कि.. प्रत्येक व्यक्ति को इसी प्रकार नित्य अपनी बुराइयों को दूर करने का प्रयास करते रहना चाहिए।

दूसरा यह कि.... प्रत्येक कार्य चाहे वह देखने में लोटा माँजने जैसा तुच्छ ही क्यों न हो अगर मनोयोग से किया जाए तो उसमें विशिष्ट चमक उत्पन्न होकर आकर्षण पैदा करती है।

अर्थात, साधारण कर्म भी असाधारण एकाग्र मनोयोग से असाधारण हो जाता है।

यही सिद्धांत जीवन के प्रत्येक क्षण के संबंध में भी काम करता है... आपने अक्सर सुना होगा कि... ‘जीवन के प्रत्येक क्षण को पूर्णता से जीयो’...

अर्थात, ‘साधारण क्षण को भी विशिष्ट भाव से जीना ही जीवन को संपूर्णता से जीना कहलाता हैं।‘

👉 अच्छे आदमी अच्छे रसायनज्ञ

नागार्जुन सुप्रसिद्ध रसायनज्ञ थे, पर वे सम्पर्क में आने वालों को धर्मोपदेश ही दिया करते थे। इस पर एक व्यक्ति ने कहा- आप रसायन शास्त्र पढ़ाया करें तो आपका नाम भी बढेगा, आपकी विद्या का भी विस्तार होगा। '

नागार्जुन बोले- 'रसायनज्ञ तो कभी भी बना जा सकता है। बात तो तब है जब अच्छे आदमी बनें। जिन्हें धार्मिक उत्तरदायित्व वहन करने पड़ते हैं, उन्हें तो इस तथ्य को अनिवार्य ही मानना चाहिए। '

'जो जागृत है, उन्हें स्वयं भी इस युग चेतना में भाग लेने के लिए उठना चाहिए। ऐसे अवसर इतिहास में बार- बार नहीं आते। '

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 देश के युवकों

"मेरी समस्त भावी आशा उन युवकों में केंद्रित है, जो चरित्रवान हों, बुद्धिमान हों, लोकसेवा हेतु सर्वत्यागी और आज्ञापालक हों, जो मेरे विचारों को क्रियान्वित करने के लिए और इस प्रकार अपने तथा देश के व्यापक कल्याण के हेतु अपने प्राणों का उत्सर्ग कर सकें!...

यदि मुझे नचिकेता की श्रद्धा से संपन्न केवल दस या बारह युवक मिल जाएँ तो मैं देश के विचारों और कार्यों को एक नई दिशा में मोड़ सकता हूँ! ईश्वरीय इच्छा से इन्हीं युवकों में से कुछ समय बाद आध्यात्मिक और कर्मशक्ति के महान पुंज उदित होंगे, जो भविष्य में मेरे विचारों को कार्यान्वित करेंगे !

युवकों को एकत्र और संगठित करो ! महान त्याग के द्वारा ही महान कार्य सम्भव है! मेरे वी , श्रेष्ठ, उदात्त बंधुओं! अपने कंधों को कार्यचक्र में लगा दो, कार्यचक्र पर जुट जाओ! मत ठहरो, पीछे मत देखो न नाम के लिए न यश के लिए! व्यक्तिगत अह्मान्यता को एक ओर फेंक दो और कार्य करो! स्मरण रखो कि घास के अनेक तिनकों को जोड़कर जो रस्सी बनती है, उससे एक उन्मत्त हाथी को बाँधा जा सकता है!

ओ वीर आत्माओं! आगे बढ़ो, उन्हें मुक्त कराने के लिए जो जंजीरों में जकड़े हुए हैं, उनका बोझ हल्का कराने के लिए जो दुःख के भार से लदे हैं, उन हृदयों को आलोकित करने के लिए, जो अज्ञान के गहन अंधकार में डूबे हुए हैं!
सुनों वेदान्त डंके की चोट पर घोषणा कर रहा है...

'अभी' (निर्भय बनो) ! ईश्वर करे यह पवित्र स्वर धरती के समस्त प्राणियों के हृदयों की ग्रंथियाँ खोलने में समर्थ हो!"

~ स्वामी विवेकानंद

👉 आज का सद्चिंतन 4 Feb 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Feb 2019


शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

👉 कर्मन की गति न्यारी

एक कारोबारी सेठ सुबह सुबह जल्दबाजी में घर से बाहर निकल कर ऑफिस जाने के लिए कार का दरवाजा खोल कर जैसे ही बैठने जाता है, उसका पाँव गाड़ी के नीचे बैठे कुत्ते की पूँछ पर पड़ जाता है। दर्द से बिलबिलाकर अचानक हुए इस वार को घात समझ वह कुत्ता उसे जोर से काट खाता है। गुस्से में आकर सेठ आसपास पड़े 10-12 पत्थर कुत्ते की ओर फेंक मारता है पर भाग्य से एक भी पत्थर उसे नहीं लगता है और वह कुत्ता भाग जाता है।

सेठजी अपना इलाज करवाकर ऑफिस पहुँचते हैं जहां उन्होंने अपने मातहत मैनेजर्स की बैठक बुलाई होती है। यहाँ अनचाहे ही कुत्ते पर आया उनका सारा गुस्सा उन बिचारे प्रबन्धकों पर उतर जाता है। वे प्रबन्धक भी मीटिंग से बाहर आते ही एक दूसरे पर भड़क जाते हैं - बॉस ने बगैर किसी वाजिब कारण के डांट जो दिया था। अब दिन भर वे लोग ऑफिस में अपने नीचे काम करने वालों पर अपनी खीज निकलते हैं – ऐसे करते करते आखिरकार सभी का गुस्सा अंत में ऑफिस के चपरासी पर निकलता है जो मन ही मन बड़बड़ाते हुए भुनभुनाते हुए घर चला जाता है।

घंटी की आवाज़ सुन कर उसकी पत्नी दरवाजा खोलती है और हमेशा की तरह पूछती है “आज फिर देर हो गई आने में.... वो लगभग चीखते हुए कहता है “मै क्या ऑफिस कंचे खेलने जाता हूँ? काम करता हूँ, दिमाग मत खराब करो मेरा, पहले से ही पका हुआ हूँ, चलो खाना परोसो” अब गुस्सा होने की बारी पत्नी की थी, रसोई मे काम करते वक़्त बीच बीच में आने पर वह पति का गुस्सा अपने बच्चे पर उतारते हुए उसे जमा के तीन चार थप्पड़ रसीद कर देती है। अब बिचारा बच्चा जाए तो जाये कहाँ, घर का ऐसा बिगड़ा माहौल देख, बिना कारण अपनी माँ की मार खाकर वह रोते रोते बाहर का रुख करता है, एक पत्थर उठाता है और सामने जा रहे कुत्ते को पूरी ताकत से दे मारता है। कुत्ता फिर बिलबिलाता है।

सन्तमत विचार-दोस्तों ये वही सुबह वाला कुत्ता था!! अरे भई उसको उसके काटे के बदले ये पत्थर तो पड़ना ही था केवल समय का फेर था और सेठ जी की जगह इस बच्चे से पड़ना था!! उसका कार्मिक चक्र तो पूरा होना ही था ना!! इसलिए मित्र यदि कोई आपको काट खाये, चोट पहुंचाए और आप उसका कुछ ना कर पाएँ, तो निश्चिंत रहें, उसे चोट तो लग के ही रहेगी, बिलकुल लगेगी, जो आपको चोट पहुंचाएगा, उस का तो चोटिल होना निश्चित ही है, कब होगा किसके हाथों होगा ये केवल ऊपरवाला जानता है पर होगा ज़रूर, अरे भई ये तो सृष्टी का नियम है !!!

समय नहीं मिलता कहना छोड़े
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https://youtu.be/iLsccN62T6s

👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 Feb 2019

◾ जीवन की सर्वाेपरि सफलता इसी बात में है कि मनुष्य अपने लिए सम्माननीय स्थिति प्राप्त करे। संसार से धनी, निर्बल, विद्वान्, मूर्ख, बलवान् सभी को एक दिन जाना पड़ता है। वह जो कुछ धन, दौलत, वैभव-विभूति, सुख-दुःख उपार्जित करता है, सब यहीं इसी संसार में छूट जाता है। साथ यदि कुछ जाता है, तो जाती है वह शांति-अशांति, सुख-दुःख, श्रेष्ठता-निकृष्टता जो मनुष्य के कर्मों के अनुसार आत्मा में संचित होती रहती है।

◾ भाग्यवादी वह है, जो स्वयं अपने में विश्वास नहीं करता। वह सदा दूसरों की सलाह का ही मुहताज बना रहता है। जैसा उचित-अनुचित दूसरे लोग सुझा देते हैं, वह वैसा ही मान बैठता है। अपनी मौलिकता और अपने विवेक को वह काम में नहीं लेता। जैसा किसी दूसरे ने उसे दे दिया, वह वैसा ही स्वीकार कर लेता है।

◾ किसी व्यक्ति की उपासना सच्ची है या झूठी, उसकी एक ही परीक्षा है कि साधक की अन्तरात्मा में संतोष, प्रफुल्लता, आशा, विश्वास और सद्भावना का कितनी मात्रा में अवतरण हुआ? यदि यह गुण नहीं आये हैं और हीन वृत्तियाँ उसे घेरे हुए हैं, तो समझना चाहिए कि वह व्यक्ति पूजा-पाठ कितना ही करता हो, उपासना से दूर ही है।

◾ बड़े-बड़े उपदेश, व्याख्यान, भाषण आदि का समाज पर प्रभाव अवश्य पड़ता है, किन्तु वह क्षणिक होता है।  किसी भी भावी क्रान्ति, सुधार, रचनात्मक कार्यक्रम के लिए प्रारंभ में विचार ही देने पड़ते हैं, किन्तु सक्रियता और व्यवहार का संस्पर्श पाये बिना उनका स्थायी और मूर्त रूप नहीं देखा जा सकता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

जीवन का उद्देश्य क्या है l डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/ESS7tLe3stM

👉 साहस अपनाया- कृतकृत्य बने

भगतसिंह और सुभाष जैसा यश मिलने की सम्भावना हो तो उस मार्ग पर चलने के लिए हजारों आतुर देखे जाते हैं। समझाया जाय तो कितने ही बिना उतराई लिए पार उतारने की प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं। पटेल बनने के लिए कोई भी अपनी वकालत छोड़ सकता है। पर दुर्भाग्य इतना ही रहता है कि समय को पहचानना और उपयुक्त अवसर पर साहस जुटाना सभी लोगों से बन ही नहीं पड़ता। वे जागरूक ही है जो महत्वपूर्ण निर्णय करते, साहसिकता अपनाते और अविस्मरणीय महामानवों की पदवी प्राप्त करते हैं। ऐसे सौभाग्यों में श्रेयार्थी का विवेक ही प्रमुख होता है।

महान् बनने के लिए जहाँ आत्म- साधना और आत्म- विकास की तपश्चर्या को आवश्यक बताया गया है वहाँ इस ओर भी संकेत किया गया है कि उसकी प्रखरता से सम्पर्क साधने और लाभान्वित होने का अवसर भी न चूका जाय। यों ऐसे अवसर कभी- कभी ही आते और किसी भाग्यशाली को ही मिलते है। किन्तु कदाचित् वैसा सुयोग बैठ जाय तो ऐसा अप्रत्याशित लाभ मिलता है जिसे लाटरी खुलने और देखते- देखते मालदार बन- जाने के समतुल्य कहा जा सके।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 आज का सद्चिंतन 2 Feb 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Feb 2019

गुरुवार, 31 जनवरी 2019

👉 जीवन का सफर

जीत किसके लिए, हार किसके लिए
ज़िंदगी भर ये तकरार किसके लिए..
जो भी आया है वो जायेगा एक दिन
फिर ये इतना अहंकार किसके लिए

एक बार एक नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी। एक कौए ने लाश देखी, तो प्रसन्न हो उठा, तुरंत उस पर आ बैठा।

यथेष्ट मांस खाया। नदी का जल पिया। उस लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए कौए ने परम तृप्ति की डकार ली। वह सोचने लगा, अहा ! यह तो अत्यंत सुंदर यान है, यहां भोजन और जल की भी कमी नहीं। फिर इसे छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता फिरूं?

कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश के ऊपर कई दिनों तक रमता रहा.. भूख लगने पर वह लाश को नोचकर खा लेता, प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता। अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह, किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के मनोहरी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह विभोर होता रहा।

नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली। वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य प्राप्त हुआ। सागर से मिलना ही उसका चरम लक्ष्य था, किंतु उस दिन लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो गई।

चार दिन की मौज-मस्ती ने उसे ऐसी जगह ला पटका था, जहां उसके लिए न भोजन था, न पेयजल और न ही कोई आश्रय। सब ओर सीमाहीन अनंत खारी जल-राशि तरंगायित हो रही थी।

कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ दिन तक तो चारों दिशाओं में पंख फटकारता रहा, अपनी छिछली और टेढ़ी-मेढ़ी उड़ानों से झूठा रौब फैलाता रहा, किंतु महासागर का ओर-छोर उसे कहीं नजर नहीं आया।

आखिरकार थककर, दुख से कातर होकर वह सागर की उन्हीं गगनचुंबी लहरों में गिर गया। एक विशाल मगरमच्छ उसे निगल गया।

शारीरिक सुख में लिप्त मनुष्यों की भी गति उसी कौए की तरह होती है, जो आहार और आश्रय को ही परम गति मानते हैं और अंत में अनन्त संसार रूपी सागर में समा जाते है।


Shinkanji Ka Swad ll शिकंजी का स्वाद
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https://youtu.be/FkEa3-JEIeo

👉 जीवन एक बीज फला, दूसरा गला

दो बीज धरती की गोद में जा पड़े। मिट्टी ने उन्हें ढक दिया। दोनों रात सुख की नींद सोये। प्रात:काल दोनों जगे तो एक के अंकुर फूट गये और वह ऊपर उठने लगा। यह देख छोटा बीज बोला- भैया ऊपर मत जाना। वहाँ बहुत भय है। लोग तुझे रौद्र डालेंगे, मार डालेंगे। बीज सब सुनता रहा और चुपचाप ऊपर उठता रहा। धीरे- धीरे धरती की परत पारकर ऊपर निकल आया और बाहर का सौन्दर्य देखकर मुस्कराने लगा। सूर्य देवता ने धूप स्नान कराया और पवन देव ने पंखा डुलाया, वर्षा आई और शीतल जल पिला गई, किसान आया और चक्कर लगाकर चला गया। बीज बढ़ता ही गया। झूमता, लहलहाता, और फलता हुआ बीज एक दिन परिपक्व अवस्था तक जा पहुँचा। जब वह इस संसार से विदा हुआ तो अपने जैसे बीज छोड़कर हँसता और आत्म- सन्तोष अनुभव करता विदा हो गया।

मिट्टी के अन्दर दबा बीज यह देखकर पछता रहा था- भय और संकीर्णता के कारण मैं जहाँ था वहीं पडा रहा और मेरा भाई असंख्य गुना समृद्धि पा गया।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 आज का सद्चिंतन 1 Feb 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 Feb 2019


👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (अन्तिम भाग)

तीसरा महासत्य है- अपूर्णता को पूर्णता तक पहुँचाने का जीवन लक्ष्य प्राप्त करना। दोष-दुर्गुणों का निराकरण करते चलने और गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता बढ़ाते चलने से ही ईश्वर और जीव के बीच की खाई पट सकती है। इन्हीं दो कदमों को साहस और श्रद्धा के साथ अनवरत रूप से उठाते रहने पर जीवन लक्ष्य तक पहुँचना सम्भव हो सकता है। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की नीति अपनाकर ही आत्मा को परमात्मा बनने और नर को नारायण स्तर तक पहुँचाने का अवसर मिल सकता है। स्वर्ग, मुक्ति, आत्मदर्शन, ईश्वर प्राप्ति आदि इसी अपूर्णता के निराकरण का काम है।

चौथा महासत्य है- इस विश्व ब्रह्माण्ड को ईश्वर की साकार प्रतिमा मानना। श्रम सीकरों और श्रद्धा सद्भावना के अमृत जल से उसका अभिषेक करने की तप साधना करना। दूसरों के दुःख बटाने और अपने सुख बाँटने की सहृदयता विकसित करना। आत्मीयता का अधिकाधिक विस्तार करना। अपनेपन को शरीर परिवार तक सीमित न रहने देकर उसे विश्व सम्पदा मानना और अपने कर्तव्यों को छोटे दायरे में थोड़े लोगों तक सीमित न रख कर अधिकाधिक व्यापक बनाना।

यह चार सत्य-चार तथ्य ही समस्त अध्यात्म विज्ञान के, साधना विधान के केन्द्र बिन्दु हैं। चार वेदों का सार तत्व यहीं है। इन्हीं महासत्यों को हृदयंगम करने और उन्हें व्यवहार में उतारने से परम लक्ष्य की प्राप्ति होती है। जीवनोद्देश्य पूर्ण होता है। इन महासत्यों को जितनी श्रद्धा और जागरूकता के साथ अपनाया जायेगा आत्म-निर्माण उतना ही सरल और सफल होता चला जायेगा। युग निर्माण की दिशा में बढ़ते हुए हमें सर्वप्रथम आत्म-निर्माण पर ही ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

Andhvishwas Ka Pardafash अंधविश्वास का पर्दाफाश
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https://youtu.be/nB7sJGZaQog

👉 Learn to Share

You are really fortunate if God has endowed you with vigor, brilliance, knowledge, power, prosperity and glory. Then your life must be progressive and joyful in the worldly sense. But this success or joy would be momentary and won’t be fulfilling, if you keep your resources and belongings closed to your chest and use them only for your selfish interests. Your joy, your satisfaction would expand exponentially if you learn to distribute them and share whatever you have with many others.

Try to spend at least a fraction of your wealth, your resources for the needy. Your help will not only give them support to rise and progress, more importantly, it will bestow the spiritual benefits of being kind and altruistic. This will augment your happiness manifold. Those being helped by you will also be happy and thus the stock of joy in the world will also expand.

Distributing and sharing with a sight of altruistic wisdom and a feel of compassion provide the golden key to unalloyed joy. God has been so kind to you; you should also be kind to others. God is defined as the eternal source of infinite bliss because HIS mercy pervades everywhere for all creatures, for everything; HIS divine powers are omnipresent; every impulse of joy is an expression of HIS beatitude.

You should see the dignity of HIS divine creation in this world. God has also given you an opportunity to glorify your life by selflessly spreading HIS auspicious grace…

Akhand Jyoti, April 1943


Dharm Ka Saar धर्म का सार
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https://youtu.be/ErM6MW0hZ0M

👉 अपनी रोटी बाँट कर खाइए

आप पड़े सौभाग्यशाली हैं यदि आपको ईश्वर ने श्रम, वैभव, विद्या, पद, बल, यश तथा चातुर्य दिया है। इन विभूतियों की सहायता से आपका जीवन सुखी और आनंदमय होगा, परंतु वह आनंद अधूरा, नीरस और क्षणिक होगा, यदि इन संपदाओं का उपयोग केवल अपने ही संकुचित लाभ के लिए करेंगे। आनंद को अनेक गुना बढ़ाने का मार्ग यह है कि अपनी रोटी बाँट कर खाओ।

जो आपको प्राप्त है, उसका कुछ अंश उन लोगों को बाँट दो, जिन्हें इसकी आवश्यकता है। इससे दुहरा लाभ होगा। वह अभावग्रस्त मनुष्य उन्नति के साधन प्राप्त करके विकसित होगा और त्याग करने पर जो आनंद एवं आध्यात्मिक सुगंध उत्पन्न होती है, आप उसे प्राप्त करेंगे। दोनों पक्षों को एक अपूर्व आनंद प्राप्त होगा और उसके कारण संसार के सुख में कुछ और वृद्धि हो जाएगी।

आनंद का सच्चा मार्ग यह है कि अपनी रोटी बाँट कर खाओ। अपनी संपदाओं से दूसरों की सहायता करके वही करो जो ईश्वर ने तुम्हारे साथ किया है। ईश्वर को `आनंदघन’ कहा जाता है क्योंकि वह अपनी दिव्य विभूतियाँ नि:स्वार्थ भाव से प्राणियों को देता है।

आप भी सर्वोच्च आनंदमय महान पद प्राप्त कर सकते हैं, बशर्ते कि अपनी रोटी बाँट कर खाएँ।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1943

न तो हिम्मत हारे ओर न हार स्वीकार करें
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https://youtu.be/VtI_TWH4K2Q

👉 आत्मचिंतन के क्षण 1 Feb 2019

◾ मेरे बच्चो! आज मैं तुम्हें एक बहुत बड़ा सन्देश देने खड़ा हुआ हूँ और वह यह है कि तुम कभी किसी अनीति एवं अविवेक-युक्त मान्यता या परम्परा को अपनाने की बौद्धिक पराधीनता को स्वीकार न करना। सम्भव है इस संघर्ष में तुम अकेले पड़ जाओ, तुम्हें साथ देने वाले लोग अपने हाथ सिकोड़ लें, पर तो भी तुम साहस न हारना। तुम्हारे दो हाथ सौ हाथ के बराबर हैं, इन्हें तान कर खड़े हो जाओगे तो बहुमत द्वारा समर्थित होते हुए भी कोई मूढ़ता तुम्हें झुकने के लिए विवश न कर सकेगी। जब तक तुम्हारी देह में प्राण शेष रहे, सत्य के समर्थन और विवेक के अनुमोदन का तुम्हारा स्वाभिमान न गले, यही अन्त में तुम्हारे गौरव का आधार बनेगा।

◾ बच्चे, जब तक तुम्हारे हृदय में उत्साह एवं गुरू तथा ईश्वर में विश्वास- ये तीनों वस्तुएँ रहेंगी -- तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनोदिन अपने हृदय में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकों, कार्य करते रहो।

◾ इस दानशील देश में हमें पहले प्रकार के दान के लिए अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान के विस्तार के लिए साहसपूर्वक अग्रसर होना होगा! और यह ज्ञान-विस्तार भारत की सीमा में ही आबद्ध नहीं रहेगा, इसका विस्तार तो सारे संसार में करना होगा! और अभी तक यही होता भी रहा है! जो लोग कहते हैं कि भारत के विचार कभी भारत से बाहर नहीं गये, जो सोचते हैं कि मैं ही पहला सन्यासी हूँ जो भारत के बाहर धर्म-प्रचार करने गया, वे अपने देश के इतिहास को नहीं जानते! यह कई बार घटित हो चुका है! जब कभी भी संसार को इसकी आवश्यकता हुई, उसी समय इस निरन्तर बहनेवाले आध्यात्मिक ज्ञानश्रोत ने संसार को प्लावित कर दिया!

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द

अपने अंग अवयवों से Apne Ang Avyavon Se
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https://youtu.be/J2Rovz78uwc

👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (भाग 5)

आत्म-निर्माण के मूलभूत चार दार्शनिक सिद्धांतों पर हर दिन बहुत गम्भीरता के साथ बहुत देर तक मनन-चिन्तन करना चाहिए। जब भी समय मिले चार तथ्यों को चार वेदों का सार तत्त्व मानकर समझना और हृदयंगम करना चाहिए। यह तथ्य जितनी गहराई तक अन्तःकरण में प्रवेश कर सकेंगे, प्रतिष्ठित हो सकेंगे, उसी अनुपात से आत्म-निर्माण के लिए आवश्यक वातावरण बनता चला जायेगा।

आत्म-दर्शन का प्रथम तथ्य है आत्मा को परमात्मा का परम पवित्र अंश मानना और शरीर एवं मन को उससे सर्वथा भिन्न मात्र वाहन अथवा औजार भर समझना। शरीर और आत्मा के स्वार्थों का स्पष्ट वर्गीकरण करना। काया के लिए उससे सम्बन्धित पदार्थों एवं शक्तियों के लिए हम किस सीमा तक क्या करते हैं, इसकी लक्ष्मण रेखा निर्धारित करना और आत्मा के स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपनी क्षमताओं का एक बड़ा अंश बचाना, उसे आत्म कल्याण के प्रयोजनों में लगाना।

दूसरा आध्यात्मिक तथ्य है-मानव जीवन को ईश्वर का सर्वोपरि उपहार मानना। इसे लोकमंगल के लिए दी हुई परम पवित्र अमानत स्वीकार करना। स्पष्ट है कि प्राणिमात्र को ईश्वर की सन्तान मानना। निष्पक्ष न्यायकारी पिता समान रूप से ही अपने सब बालकों को अनुदान देता है। मनुष्य को इतने सुविधा साधन वह विलासिता और अहन्ता की पूर्ति के लिए देकर पक्षपाती और अन्यायी नहीं बन सकता। जो मिला वह खजांची के पास रहने वाली बैंक अमानत की तरह है। संसार को सुखी समुन्नत बनाने के लिए ही मनुष्य को विभिन्न सुविधाएँ मिली हैं। उनमें से निर्वाह के लिए न्यूनतम भाग अपने लिये रखकर शेष को लोकमंगल के लिए ईश्वर के इस सुरम्य उद्यान को अधिक सुरम्य सुविकसित बनाने के लिए खर्च किया जाना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

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बुधवार, 30 जनवरी 2019

👉 आदतों के जंजाल

आदतों के जंजाल से नि‍कलेंगे तभी समझेंगे मुक्ति के मायने

एक बार मिस्र में कुछ कैदि‍यों को उम्रकैद की सजा देकर कि‍ले में रखा गया था। सारे कैदी अपनी जवानी में पकड़े गए थे और जेल में ही बूढ़े हो गए थे। बाद में जब राज्यय की सरकार का तख्ता पलटा, तो इन उम्रकैदियों को आजाद कर दि‍या गया। पर वे तो आजादी भूल चुके थे। उनके लिए जेल ही घर और बेड़ियां जेवर बन चुकी थीं। उन्हों।ने किले के बाहर जाने से इनकार कर दि‍या। उनके इनकार के बावजूद उन सबको जबरदस्ती जेल से निकाल दि‍या गया। उस वक्तए तो वह चले गए, लेकिन शाम को आधे से ज्यादा कैदी जेल के दरवाजे आकर कहने लगे कि हमे अंदर आने दो, हमारा यही घर है।

दरअसल ये कैदी रोज वहां जीवन व्यतीत करते-करते वहीं के हो गए थे। जेल ही उनका घर बन गया था। वह बाहर की दुनिया भूल चुके थे। जेल में समय से खाना मिल जाता था। समय से सो जाते थे। आपस में बातचीत कर लेते थे। जिंदगी व्यतीत हो ही रही थी। बाहर उन कैदियों ने यह कहा कि हमें नींद नहीं आएगी। बेड़ियां न होने से हमारे हाथ-पैर हलके हो गए हैं। हमसे चला नहीं जाता। बेड़ियों के बिना हमें अपने पैर हलके लगते हैं। उन्हें इसकी आदत बन गई थी।

ऐसे ही गुलामी की भी आदत हो जाती है। ठीक ऐसे ही अवगुणों में रहने की भी आदत हो जाती है। और इस आदत में रमा इंसान समय और तकदीर की भी परवाह नहीं करता। समय यदि उनकी तकदीर बदल भी देता है, तो भी वह उन अवगुणों को नहीं छोड़ पाता। आदतों के जंजाल में फंसा इंसान न तो तकदीर की उंगली पकड़कर चल पाता है और न ही समय देख भविष्यम का फैसला ले पाता है। यह तो प्रत्यक्ष है कि वह कैदी याचना कर रहे थे कि उन्हें अंदर आने दिया जाए। हकीकत यह है कि जिन अवगुणों में मनुष्य जी रहा होता है, वह अवगुण उसको अवगुणों की तरह नहीं दिखाई देते। इसलिए उस अवगुण को तोड़ने की जरूरत ही नहीं महसूस होती, क्योंकि अवगुण दिखाई ही नहीं देते। जेल ही जब घर लगता है, तो आजादी उनके लिए क्या मायने रख सकती है? किसको आजाद करना है, जब जेल ही उसका घर है अवगुण ही रस हैं, अवगुण ही जीवन हैं? इन अवगुणों से बचना बड़ी मुश्किल बात है। व्यक्ति अवगुणों के साथ जीवनपर्यंत रहते हैं।

महात्मा गांधी ने कहा है कि, 'आपके विचार आपके शब्द बन जाते हैं, आपके शब्द आपके कर्म बन जाते हैं, आपके कर्म आपकी आदतें बन जाती हैं, आपकी आदतें आपके मूल्य बन जाते है और आपके मूल्य आपकी तकदीर बन जाते है।' बेहतर जीवन शैली आदतों की विवेचना कर मूल्यांकन करने की सलाह देगी। तय हमें करना होगा कि हम आदतों के कभी दास न बनें और कभी भी गलत आदतों को फलने-फूलने न दें।

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👉 चेतना की स्वतंत्रता

एक संध्या एक पहाड़ी सराय में एक नया अतिथि आकर ठहरा। सूरज ढलने को था, पहाड़ उदास और अंधेरे में छिपने को तैयार हो गए थे। पक्षी अपने निबिड़ में वापस लौट आए थे। तभी उस पहाड़ी सराय में वह नया अतिथि पहुंचा। सराय में पहुंचते ही उसे एक बड़ी मार्मिक और दुख भरी आवाज सुनाई पड़ी। पता नहीं कौन चिल्ला रहा था?

पहाड़ की सारी घाटियां उस आवाज से...लग गई थीं। कोई बहुत जोर से चिल्ला रहा था--स्वतंत्रता, स्वतंत्रता, स्वतंत्रता।

वह अतिथि सोचता हुआ आया, किन प्राणों से यह आवाज उठ रही है? कौन प्यासा है स्वतंत्रता को? कौन गुलामी के बंधनों को तोड़ देना चाहता है? कौनसी आत्मा यह पुकार कर रही? प्रार्थना कर रही?

और जब वह सराय के पास पहुंचा, तो उसे पता चला, यह किसी मनुष्य की आवाज नहीं थी, सराय के द्वार पर लटका हुआ एक तोता स्वतंत्रता की आवाज लगा रहा था।
वह अतिथि भी स्वतंत्रता की खोज में जीवन भर भटका था। उसके मन को भी उस तोते की आवाज ने छू लिया।

रात जब वह सोया, तो उसने सोचा, क्यों न मैं इस तोते के पिंजड़े को खोल दूं, ताकि यह मुक्त हो जाए। ताकि इसकी प्रार्थना पूरी हो जाए। अतिथि उठा, सराय का मालिक सो चुका था, पूरी सराय सो गई थी। तोता भी निद्रा में था, उसने तोते के पिंजड़े का द्वार खोला, पिंजड़े के द्वार खोलते ही तोते की नींद खुल गई, उसने जोर से सींकचों को पकड़ लिया और फिर चिल्लाने लगा--स्वतंत्रता, स्वतंत्रता, स्वतंत्रता।

वह अतिथि हैरान हुआ। द्वार खुला है, तोता उड़ सकता था, लेकिन उसने तो सींकचे को पकड़ रखा था। उड़ने की बात दूर, वह शायद द्वार खुला देख कर घबड़ा आया, कहीं मालिक न जाग जाए। उस अतिथि ने अपने हाथ को भीतर डाल कर तोते को जबरदस्ती बाहर निकाला। तोते ने उसके हाथ पर चोटें भी कर दीं। लेकिन अतिथि ने उस तोते को बाहर निकाल कर उड़ा दिया।

निश्चिंत होकर वह मेहमान सो गया उस रात। और अत्यंत आनंद से भरा हुआ। एक आत्मा को उसने मुक्ति दी थी। एक प्राण स्वतंत्र हुआ था। किसी की प्रार्थना पूरी करने में वह सहयोगी बना। वह रात सोया और सुबह जब उसकी नींद खुली, उसे फिर आवाज सुनाई पड़ी, तोता चिल्ला रहा था--स्वतंत्रता, स्वतंत्रता।

वह बाहर आया, देखा, तोता वापस अपने पिंजड़े में बैठा हुआ है। द्वार खुला है और तोता चिल्ला रहा है--स्वतंत्रता, स्वतंत्रता। वह अतिथि बहुत हैरान हुआ। उसने सराय के मालिक को जाकर पूछा, यह तोता पागल है क्या? रात मैंने इसे मुक्त कर दिया था, यह अपने आप पिंजड़े में वापस आ गया है और फिर भी चिल्ला रहा, स्वतंत्रता?

सराय का मालिक पूछने लगा, उसने कहा, तुम भी भूल में पड़ गए। इस सराय में जितने मेहमान ठहरते हैं, सभी इसी भूल में पड़ जाते हैं। तोता जो चिल्ला रहा है, वह उसकी अपनी आकांक्षा नहीं, सिखाए हुए शब्द हैं। तोता जो चिल्ला रहा है, वह उसकी अपनी प्रार्थना नहीं, सिखाए हुए शब्द हैं, यांत्रिक शब्द हैं। तोता स्वतंत्रता नहीं चाहता, केवल मैंने सिखाया है वही चिल्ला रहा है। तोता इसीलिए वापस लौट आता है। हर रात यही होता है, कोई अतिथि दया खाकर तोते को मुक्त कर देता है। लेकिन सुबह तोता वापस लौट आता है।

मैंने यह घटना सुनी थी। और मैं हैरान होकर सोचने लगा, क्या हम सारे मनुष्यों की भी स्थिति यही नहीं है? क्या हम सब भी जीवन भर नहीं चिल्लाते हैं-- मोक्ष चाहिए,
स्वतंत्रता चाहिए, सत्य चाहिए, आत्मा चाहिए, परमात्मा चाहिए? लेकिन मैं देखता हूं कि हम चिल्लाते तो जरूर हैं, लेकिन हम उन्हें सींकचों को पकड़े हुए बैठे रहते हैं जो हमारे बंधन हैं।

हम चिल्लाते हैं, मुक्ति चाहिए, और हम उन्हीं बंधनों की पूजा करते रहते हैं जो हमारा पिंजड़ा बन गया, हमारा कारागृह बन गया। कहीं ऐसा तो नहीं है कि यह मुक्ति की प्रार्थना भी सिखाई गई प्रार्थना हो, यह हमारे प्राणों की आवाज न हो? अन्यथा कितने लोग स्वतंत्र होने की बातें करते हैं, मुक्त होने की, मोक्ष पाने की, प्रभु को पाने की। लेकिन कोई पाता हुआ दिखाई नहीं पड़ता। और रोज सुबह मैं देखता हूं, लोग अपने पिंजड़ों में वापस बैठे हैं, रोज अपने सींकचों में, अपने कारागृह में बंद हैं। और फिर निरंतर उनकी वही आकांक्षा बनी रहती है।

सारी मनुष्य-जाति का इतिहास यही है। आदमी शायद व्यर्थ ही मांग करता है स्वतंत्रता की। शायद सीखे हुए शब्द हैं। शास्त्रों से, परंपराओं से, हजारों वर्ष के प्रभाव से सीखे हुए शब्द हैं। हम सच में स्वतंत्रता चाहते हैं? और स्मरण रहे कि जो व्यक्ति अपनी चेतना को स्वतंत्र करने में समर्थ नहीं हो पाता, उसके जीवन में आनंद की कोई झलक कभी उपलब्ध नहीं हो सकेगी। स्वतंत्र हुए बिना आनंद का कोई मार्ग नहीं है।

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👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (भाग 4)

मन को, मस्तिष्क को अस्त-व्यस्त उड़ने की छूट नहीं देनी चाहिए। शरीर की तरह उसे भी क्रमबद्ध और उपयोगी चिन्तन के लिए सधाया जाना चाहिए। कुसंस्कारी मन बनैले सुअर की तरह कहीं भी किधर भी दौड़ लगाता रहता है शरीर भले ही विश्राम करे पर मन तो कुछ सोचेगा ही। यह सोचना भी शारीरिक श्रम की तरह ही उत्पादक होता है। समय की बर्बादी की तरह ही अनुपयोगी और निरर्थक चिन्तन भी हमारी बहुमूल्य शक्ति को नष्ट करता है। दुष्ट चिन्तन तो आग से खेलने की तरह है। आज परिस्थितियों में जो सम्भव नहीं वैसी आकाश पाताल जैसी कल्पनाएँ करते रहने, योजनाएँ बनाते रहने से मनुष्य अव्यावहारिक बनता जाता है।

व्यभिचार, आक्रमण, षड्यन्त्र जैसी कल्पनाएँ करते रहने से मन निरन्तर कलुषित होता चला जाता है और उपयोगी योजनायें बनाने के लिए गहराई तक प्रवेश कर सकना उसके लिए सम्भव नहीं रहता। उद्धत आचरण शरीर को नष्ट करते हैं और उद्धत विचार मन मस्तिष्क का सत्यानाश करके रख देते हैं। मनोनिग्रह का योगाभ्यास में बहुत माहात्म्य गाया गया है। उस चित्त निरोध का व्यावहारिक स्वरूप यही है कि जिस दिशा को हम उपयोगी मानते हैं और जिस सन्दर्भ में सोचना आवश्यक समझते हैं उसी निर्देश पर हमारी विचारणा गतिशील रहे। वैज्ञानिकों, बुद्धिजीवियों और योगाभ्यासियों में यही विशेषता होती है कि वे अपने मस्तिष्क को निर्धारित प्रयोजन पर ही लगाये रहते है। अस्त-व्यस्त उड़ानों में उसे तनिक भी नहीं भटकने देते।

यह आदत हमें डालनी चाहिए कि चिन्तन का क्षेत्र निर्धारित करके उस पर मन को केन्द्रित करने की आदत यदि डाली जा सके तो मस्तिष्कीय प्रखरता का, मनोबल सम्पादन का द्वार खुल जायेगा और मन्दबुद्धि जैसी मस्तिष्कीय बनावट रहते हुए भी अपने चिन्तन क्षेत्र में निष्णात बन जायेंगे। समय की दिनचर्या में बाँधकर शरीर का श्रेष्ठतम उपयोग किया जा सकता है। मन का महत्त्व शरीर से कम नहीं अधिक है। उसका भटकाव रोककर उसे उपयोगी निर्दिष्ट चिन्तन में यदि सधाया जाना सम्भव हो सके तो मस्तिष्क की विचारशक्ति से बहुमूल्य लाभ उठाया जा सकता है। समुन्नत जीवन विकास में यह शरीर और मन पर बन्धन लगाने की साधना सही रूप से तप तितीक्षा का, व्रत संयम का उच्चस्तरीय लाभ दे सकती है।

ऊपर की पंक्तियों में कुछ मोटे सुझाव संकेत भर हैं। विचार करने पर अनेकों प्रसंग ऐसे सामने आते हैं जिनमें विधि निषेध की आवश्यकता पड़ती है। क्या छोड़ना, क्या अपनाना इसका महत्त्वपूर्ण निर्णय करना पड़ता है। यह हर दिन प्रस्तुत परिस्थितियों और आवश्यकताओं को देखते हुए किया जाना चाहिए। यह मान्यता हृदयंगम की जानी चाहिए कि आत्म-निर्माण का महान लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अवांछनीयताओं का क्रमशः परित्याग करना ही पड़ेगा और उपयोगी गुण, कर्म, स्वभाव को व्यावहारिक जीवन में समाविष्ट करने का साहसपूर्ण प्रयास करना ही होगा। विधि और निषेध के दो कदम क्रमबद्ध रूप से निरन्तर उठाते चलने की व्रतशीलता ही हमें आत्मिक प्रगति के उच्च लक्ष्य तक पहुँचा सकने में समर्थ हो सकती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 Jan 2019


👉 बादलों की तरह बरसते रहो

वे लोग अगले जन्म में दु:ख भोगेंगे जो किसी को कुछ नहीं देते और पैसे को जोड़कर जमा करते जाते हैं। जिसने अपने घर में दौलत के ढेर जोड़ रख हैं मगर उसका सदुपयोग नहीं करता उसे एक प्रकार का चौकीदार ही कहना चाहिए। उसका जीवन पृथ्वी के लिए भार रूप है जो वेश की परवाह किए बिना निरंतर धन के लिए ही हाय-हाय करते हैं। जो न तो खुद खा सकता है और न दूसरों को दे सकता, चाहे वह करोड़पति ही क्यों न हो, मामूली गरीब आदमी से उसमें कुछ विशेषता नहीं है। उचित-अनुचित तरीकों से पेट पर पट्टी बाँध कर जो धन जोड़ा या है, वह उसके किसी काम न आएगा, उसका उपयोग तो दूसरे ही करेंगे। वह मनुष्य बुद्धिमान् है, जिसने अपना धन शुभ कार्यों में खर्च कर दिया है। असल में वह बरसने वाले बादलों के समान है, जो आज खाली होता है, तो कल फिर भर जाएगा।

मिलनसारी, भलमनसाहत का व्यवहार और दूसरों के हितों का ख्याल रखना, ये ऐसे गुण हैं, जिनसे दुनिया अपनी हो सकती है। संसार उनको भुला नहीं सकता, जो अपने से छोटे और बड़ों के साथ शिष्टता का व्यवहार करते हैं।

कटुभाषी और निष्ठुर स्वभाव के मनुष्य का जीवन लोहे और काठ की तरह नीरस होता है चाहे वे भले ही आरी की तरह तेज हों। जिस कर्महीन मनुष्य को इतने लम्बे चौड़े विश्व में हँसने और मुस्कराने योग्य कुछ दिखाई नहीं देता और सारे दिन कुड़ कुढ़ता रहता है, उसे उस रोगी की तरह समझना चाहिए जिस दिन में भी नहीं दीखता। बद-मिज़ाज व्यक्ति के पास चाहे कितनी ही विद्या और सम्पत्ति क्यों न हों, वह उस दूध के समान निकम्मा है जो गन्दे पात्र में रखा होने से दूषित हो गया है।

📖 अखण्ड ज्योति -फरवरी 1943

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👉 Generous Like the Clouds

Stingy fellows, who keep their resources only to themselves and remain apathetic to others’ sufferings, are in fact accounting sins for their future destiny. Those who have stocked heaps of wealth in their possession but never use it are mere ‘guards’ of money. Such fellows are burden on this earth that can do nothing for anyone. Even materialistically, they don’t enjoy anything; the thirst of gaining more, the worries and tensions of safeguarding the possession and the miserly attitude do not let them live in peace; they neither eat well nor can give anything to others. Despite having millions or billions of riches, they remain poor, beggars… Thirst for more and more of selfish possession does not even let one see what are the right or wrong means of piling the stocks of wealth. Prosperity earned by unfair means cannot let one prosper… One dies empty handed and later one all that ‘dead property’ possessed by him does no good to even to those who grabs it afterwards…

On the contrary, those who earn honestly and spend magnanimously and wisely in good, constructive and auspicious activities are always prospering. They are like clouds, which enshower generously; even if emptied today, the clouds are filled again and return back tomorrow with same dignity.

Integrity, benevolence, caring and helping sociability – are virtues of greatness, which can make the entire world your own. No one can forget the warmth of meeting such amicable personalities. But, the selfish fellows, howsoever talented and affluent they might be, remain aloof and virtually isolated; their state is like that of milk kept in a dirty pot, which is thrown without use…

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1943

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👉 आत्मचिंतन के क्षण 30 Jan 2019

◾ किसी विचारधारा का परिणाम तभी प्राप्त हो सकता है, जब वह कार्यरूप में परिणत हो। मानसिक व्यसन के रूप में कुछ पढ़ते-सुनते और सोचते रहें, कार्यरूप में उसे परिणत न करें तो उस विचार विलास मात्र से कितना उद्देश्य पूर्ण हो सकेगा। आध्यात्मिक विचारधारा का लम्बा स्वाध्याय मन पर एक हलकी सी सतोगुणी छाप तो छोड़ता है, पर जब तक क्रिया में वे विचार न उतरें तब तक यह स्वाध्याय भी एक विनोद व्यसन ही बना रहता है।

◾ अनावश्यक दुर्भावनाओं को मन में स्थान देना, दूसरों के लिए अशुभ सोचते रहना, औरों के लिए उतना हानिकारक नहीं होता, जितना अपने लिए। उचित यही है कि हम सद्भाव संपन्न रहें। जिनमें वस्तुतः दोष-दुर्गुण हों उन्हें चारित्रिक रुग्णता से ग्रसित समझकर सुधार का भरसक प्रयत्न करें, पर उस द्वेष-दुर्बुद्धि  से बचे रहें, जो अंततः अपने ही व्यक्तित्व को आक्रामक असुरता से भर देती है और दूसरों को ही नहीं अपना भी सर्वनाश प्रस्तुत करती है।

◾ ऊँचा उठना ही मनुष्य जीवन की सफलता का चिह्न है। मन को निग्रहीत, बुद्धि को परिष्कृत, चित्त को उदात्त और अहंकार को निर्मल बनाकर इसी शरीर में दिव्य शक्तियों का अवतरण किया जा सकता है और उन विभूतियों से लाभान्वित हुआ जा सकता है, जो देवताओं में सन्निहित मानी जाती हैं।

◾ यदि तुम भलाई का अनुकरण करके कष्ट सहन करो तो कुछ समय पश्चात् कष्ट तो चला जाता है,  पर भलाई बनी रहती है। पर यदि तुम बुराई का अनुकरण करके सुखोपभोग करो तो समय आने पर सुख तो चला जायेगा और बुराई बनी रहेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 29 जनवरी 2019

👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (भाग 3)

दूसरों का आदर करना, सद्व्यवहार का अभ्यस्त होना, सज्जनोचित शिष्टाचार बरतना, मधुर वचन बोलना यह व्यक्तित्व की गरिमा बढ़ाने वाली साधना है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसे दूसरों के साथ मिल-जुल कर रहना पड़ता है। स्नेह सौहार्द का वातावरण तभी बना रह सकता है जब दूसरों के साथ शालीनता का व्यवहार किया जाय। अहंकारी व्यक्ति दूसरों को तुच्छ समझते है और कटु वचन एवं दुर्व्यवहार पर उतारू रहते हैं। उद्धत आतंकवादी उच्छृंखल आचरण करके कोई अपने अहंकार की पूर्ति होने की बात सोच सकता है, पर वस्तुतः वह हर किसी की दृष्टि में अपना सम्मान खोता है। स्तर गिराता है और घृणास्पद बनता है। उद्धत आचरण से सम्भव है सामने वाला चुप ही रहे, परन्तु उसका स्नेह सहयोग तो चला ही जाता है। इस प्रकार क्रोधी, अशिष्ट, उच्छृंखल व्यक्ति अपना नाम बढ़ाने की बात सोचता है, पर वस्तुतः उसे निरन्तर खोता चला जाता है। कुसमय में अपने को एकाकी अनुभव करता है। स्नेह सहयोग से वंचित होकर वह भूत बेताल की अशान्त अतृप्त मनःस्थिति में जा फँसता है।

ईर्ष्या, द्वेष, झूठ, छल, प्रपंच, दुरभिसन्धि, षड्यन्त्र, शोषण, अपहरण, आक्रमणों की आसुरी मनोवृत्ति अपना कर मनुष्य अपराधी आचरण ही करता हैं उसकी गतिविधियाँ ऐसी हो जाती हैं, जिससे मनुष्य सबकी आँखों में गिरता है यहाँ तक कि अपनी आँखों में भी। धन या पद पाने की अपेक्षा लोकश्रद्धा प्राप्त करना अधिक मूल्यवान है। दुष्ट-दुराचारी बनकर कोई यदि साधन सम्पन्न बन जाय तो यही कहा जाना चाहिए कि उसने खोया बहुत पाया कम। व्यसनी, व्यभिचारी, आलसी और प्रमादी, आतंकवादी, अत्याचारी, उस सुखद उपलब्धि से वंचित ही रहते है जिसे पाने के लिए यह कुमार्ग अपनाया। दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का आश्रय लेकर मनुष्य दूसरों की जितनी हानि करता है उसकी तुलना में अपनी असंख्य गुनी हानि कर लेता है।

समय को नियमितता के बन्धनों में बाँधा जाना चाहिए। चौबीसों घण्टे की निर्धारित दिनचर्या बनानी चाहिए और उस पर तत्परतापूर्वक चलते जाना चाहिए। समय ही सबसे बड़ी सम्पदा है, उसका एक क्षण भी बर्बाद नहीं होना चाहिये। शरीर की क्षमता के अनुरूप श्रम किया जाय, काम का स्तर और सिलसिला बदलते ही रहा जाय ताकि थकान नहीं चढ़ेगी। हर काम में दिलचस्पी पैदा की जाय, उसे खेल समझते हुए पूरे मनोयोग के साथ करना चाहिए। यह आदत पड़ जाय तो दुर्बल शरीर वाला व्यक्ति भी बिना थके बहुत काम करता रह सकता है। आहार-विहार विवेकपूर्ण और क्रमबद्ध होने चाहिए। समयानुसार काम बदलने से विश्राम और विनोद का उद्देश्य पूरा हो सकता है। सामने प्रस्तुत कामों को दिलचस्पी और मनोयोग के साथ करने का अभ्यास करना मनोनिग्रह का सर्वोत्तम योगाभ्यास है। उस साधना में निष्णात व्यक्ति हाथों हाथ क्रिया कुशलता के अभिवर्धन और सफलताओं के वरण का उत्साहवर्द्धक लाभ प्राप्त करता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

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सोमवार, 28 जनवरी 2019

👉 झुठा

"मम्मी , मम्मी ! मैं उस बुढिया के साथ स्कुल नही जाउँगा ना ही उसके साथ वापस आउँगा "मेरे दस वर्ष के बेटे ने गुस्से से अपना स्कुल बैग फेकतै हुए कहा तो मैं बुरी तरह से चौंक गई !

यह क्या कह रहा है? अपनी दादी को बुढिया क्यों कह रहा है? कहाँ से सीख रहा है इतनी बदतमीजी?

मैं सोच ही रही थी कि बगल के कमरे से उसके चाचा बाहर निकले और पुछा-"क्या हुआ बेटा?"

उसने फिर कहा -"चाहे कुछ भी हो जाए मैं उस बुढिया के साथ स्कुल नहीं जाउँगा हमेशा डाँटती रहती है और मेरे दोस्त भी मुझे चिढाते हैं !"

घर के सारे लोग उसकी बात पर चकित थे
घर मे बहुत सारे लोग थे मैं और मेरे पति, दो देवर और देवरानी , एक ननद , ससुर और नौकर भी !

फिर भी मेरे बेटे को स्कुल छोडने और लाने की जिम्मेदारी उसकी दादी की ही थी पैरों मे दर्द रहता था पर पोते के प्रेम मे कभी शिकायता नही करती थी बहुत प्यार करती थी उसको क्योंकि घर का पहला पोता था।

पर अचानक बेटे के मुँह से उनके लिए ऐसे शब्द सुन कर सबको बहुत आश्चर्य हो रहा था शाम को खाने पर उसे बहुत समझाया गया पर वह अपनी जिद पर अडा रहा
पति ने तो गुस्से मे उसे थप्पड़ भी मार दिया तब सबने तय किया कि कल से उसे स्कुल छोडने और लेने माँजी नही जाएँगी !!!

अगले दिन से कोई और उसे लाने ले जाने लगा पर मेरा मन विचलित रहने लगा कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया?
मै उससे कुछ नाराज भी थी !

शाम का समय था मैने दुध गर्म किया और बेटे को देने के लिए उसने ढुँढने लगी मैं छत पर पहुँची तो बेटे के मुँह से मेरे बारे मे बात करते सुन कर मेरे पैर ठिठक गये...
मैं छुपकर उसकी बात सुनने लगी वह अपनी दादी के गोद मे सर रख कर कह रहा था-

"मैं जानता हूँ दादी कि मम्मी मुझसे नाराज है पर मैं क्या करता?
इतनी ज्यादा गरमी मे भी वो आपको मुझे लेने भेज देते थे ! आपके पैरों मे दर्द भी तो रहता है मैने मम्मी से कहा तो उन्होंने कहा कि दादी अपनी मरजी से जाती हैं !
दादी मैंने झुठ बोला......बहुत गलत किया पर आपको परेशानी से बचाने के लिये मुझे यही सुझा...

आप मम्मी को बोल दो मुझे माफ कर दे "

वह कहता जा रहा था और मेरे पैर तथा मन सुन्न पड़ गये थे मुझे अपने बेटे के झुठ बोलने के पीछे के बड़प्पन को महसुस कर गर्व हो रहा था....
मैने दौड कर उसे गले लगा लिया और बोली-"नहीं , बेटे तुमने कुछ गलत नही किया

हम सभी पढे लिखे नासमझो को समझाने का यही तरीका था..शाबाश... बेटा !!!

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👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (भाग 2)

स्वच्छता और व्यवस्था ऐसा गुण है जिसमें किसी की कुरुचि का सहज ही परिचय प्राप्त किया जा सकता है। गन्दगी से घृणा और स्वच्छता से प्रेम रखा जाय तो वह उत्साह सहज ही बना रहेगा जिसके आधार पर शरीर, वस्त्र, फर्नीचर, पुस्तकें, स्टेशनरी, बर्तन, फर्श, चित्र, साइकिल आदि सम्बन्धित सामान को स्वच्छ एवं सुव्यवस्थित रखा जा सके। सफाई की यह आदत हिसाब-किताब पर, लेन-देन पर भी लागू होती है। घर, दफ्तर को, बच्चों को, वस्तुओं को साफ-सुथरा रखकर न केवल आगन्तुकों को अपनी सुरुचि का परिचय देते हैं वरन् अपने स्वभाव में अनोखी विशेषता उत्पन्न करते है।

जिसे ईमानदारी का जीवन जीना हो उसे पूर्व तैयारी मितव्ययी रहने की, सादा जीवन जीने की करनी चाहिए। जो कम में गुजारा करना जानता है उसी के लिए यह सम्भव है कि कम आमदनी से सन्तोष पूर्वक निर्वाह कर ले। ईमानदारी से आय सीमित रहती है, उतनी नहीं हो सकती जितनी बेईमानी अपनाने से। ऐसी दशा में यदि श्रेष्ठ जीवन जीना हो तो अपने खर्च जहाँ तक सम्भव हो वहाँ तक घटाने चाहिए। जिसने खर्च बढ़ा रखे हैं उन्हें उनकी पूर्ति के लिए बेईमानी का रास्ता ही अपनाना पड़ेगा। फिजूलखर्ची यों निर्दोष भी मालूम पड़ सकती है। अपना कमाना अपना उड़ाना इसमें किसी को क्या ऐतराज होना चाहिए। परन्तु बात इतनी सरल नहीं है। प्रकारान्तर से फिजूलखर्ची बेईमानी अपनाने के लिए बाध्य करती है।

अनियन्त्रित खर्च करने की आदत बढ़ती ही जाती है और वह देखते-देखते उस सीमा को छूती है जहाँ न्यायोचित आमदनी कम पड़े और घटोत्तरी की पूर्ति के लिए बेईमानी पर उतारू होना पड़े। जिसने आमदनी और खर्च का तालमेल बिठाना सीखा है वही कुछ सत्कर्मों के लिए भी बचा सकता है। अन्यथा सदुद्देश्य की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य भी आर्थिक तंगी के कारण रुके पड़े रहेंगे। सादगी की जीवनचर्या सस्ती पड़ती है, कम समय लेती है। अस्तु मितव्ययी व्यक्ति के लिए ही यह सम्भव होगा कि वह आदर्शवादी जीवन जी सके और परमार्थ की दिशा में कुछ कहने लायक योगदान दे सके।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)


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👉 आज का सद्चिंतन 28 Jan 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Jan 2019

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...