गुरुवार, 31 जनवरी 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 1 Feb 2019

◾ मेरे बच्चो! आज मैं तुम्हें एक बहुत बड़ा सन्देश देने खड़ा हुआ हूँ और वह यह है कि तुम कभी किसी अनीति एवं अविवेक-युक्त मान्यता या परम्परा को अपनाने की बौद्धिक पराधीनता को स्वीकार न करना। सम्भव है इस संघर्ष में तुम अकेले पड़ जाओ, तुम्हें साथ देने वाले लोग अपने हाथ सिकोड़ लें, पर तो भी तुम साहस न हारना। तुम्हारे दो हाथ सौ हाथ के बराबर हैं, इन्हें तान कर खड़े हो जाओगे तो बहुमत द्वारा समर्थित होते हुए भी कोई मूढ़ता तुम्हें झुकने के लिए विवश न कर सकेगी। जब तक तुम्हारी देह में प्राण शेष रहे, सत्य के समर्थन और विवेक के अनुमोदन का तुम्हारा स्वाभिमान न गले, यही अन्त में तुम्हारे गौरव का आधार बनेगा।

◾ बच्चे, जब तक तुम्हारे हृदय में उत्साह एवं गुरू तथा ईश्वर में विश्वास- ये तीनों वस्तुएँ रहेंगी -- तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनोदिन अपने हृदय में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकों, कार्य करते रहो।

◾ इस दानशील देश में हमें पहले प्रकार के दान के लिए अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान के विस्तार के लिए साहसपूर्वक अग्रसर होना होगा! और यह ज्ञान-विस्तार भारत की सीमा में ही आबद्ध नहीं रहेगा, इसका विस्तार तो सारे संसार में करना होगा! और अभी तक यही होता भी रहा है! जो लोग कहते हैं कि भारत के विचार कभी भारत से बाहर नहीं गये, जो सोचते हैं कि मैं ही पहला सन्यासी हूँ जो भारत के बाहर धर्म-प्रचार करने गया, वे अपने देश के इतिहास को नहीं जानते! यह कई बार घटित हो चुका है! जब कभी भी संसार को इसकी आवश्यकता हुई, उसी समय इस निरन्तर बहनेवाले आध्यात्मिक ज्ञानश्रोत ने संसार को प्लावित कर दिया!

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द

अपने अंग अवयवों से Apne Ang Avyavon Se
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https://youtu.be/J2Rovz78uwc

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