मंगलवार, 20 नवंबर 2018
👉 You O awakened one! shall inherit the Earth !
This dear reader is about you, you are the awakend soul that is talked about in this excrept -
🔶 Awakened souls shall have the earnest desire to bring about necessary transformation within themselves. They shall carry out thorough examination of their own thoughts, feeling, actions and behavior. They shall stop being blind followers of widely prevalent trends, traditions and practices and would start using their own independent thinking. They shall also stop being foolish copycat of others. This is where the revolution would start. This will be the very first step in the process of transformation.
🔷 The change in era will kick start with a powerful process of change in character at individual level. God has been emitting such a powerful subtle current of inspiration which is touching and stirring up every sensible and awakened individuals, instigating them every moment to keep reviewing their existing situation and make all necessary changes that would empower them with independent thinking.
🔶 The light of prudence, discretion and good judgment shall eliminate all doubts of the unknown, fears of any disaster, pre-conceived notions and meek tendency of doing what others do.
🔷 You would feel so much empowered from within that you shall set off, all alone, on the path you feel to be worthy of, turning a blind eye to any words of advice, opinions or discouragement by your so-called well-wishers.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama Vangmay 66 Page 1.16
🔶 Awakened souls shall have the earnest desire to bring about necessary transformation within themselves. They shall carry out thorough examination of their own thoughts, feeling, actions and behavior. They shall stop being blind followers of widely prevalent trends, traditions and practices and would start using their own independent thinking. They shall also stop being foolish copycat of others. This is where the revolution would start. This will be the very first step in the process of transformation.
🔷 The change in era will kick start with a powerful process of change in character at individual level. God has been emitting such a powerful subtle current of inspiration which is touching and stirring up every sensible and awakened individuals, instigating them every moment to keep reviewing their existing situation and make all necessary changes that would empower them with independent thinking.
🔶 The light of prudence, discretion and good judgment shall eliminate all doubts of the unknown, fears of any disaster, pre-conceived notions and meek tendency of doing what others do.
🔷 You would feel so much empowered from within that you shall set off, all alone, on the path you feel to be worthy of, turning a blind eye to any words of advice, opinions or discouragement by your so-called well-wishers.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama Vangmay 66 Page 1.16
👉 जाग्रत आत्माओं में सबसे पहले विवेक का अवतरण होगा
🔶 सबसे पहले जाग्रत आत्माओं के भीतर आत्मपरिवर्तन की तिलमिलाहट पैदा होगी। वे गइराई से आत्म-निरीक्षण करेंगे। अन्धी भेड़ों के गिरोह में से अपने को अलग निकालेंगे और स्वतंत्र चिन्तन करेंगे। 'लोग ऐसा करते हैं तो हम भी ऐसा करेंगे' का परावलम्बन बहिष्कृत होगा। क्रांति यहीं से आरम्भ होगी। परिवर्तन का प्रथम बिन्दु यहीं रहेगा।
🔷 युग परिवर्तन का आरम्भ व्यक्ति परिवर्तन की उग्र प्रक्रिया के साथ आरम्भ होगा। इसके लिए भगवान ऐसा सूक्ष्म प्रेरणा प्रवाह उत्पन्न कर रहे हैं, जो हर जीवित और जाग्रत आत्मा को व्याकुल, बेचैन कर दे। अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करने के लिए हर घड़ी विवश करे और उसे घसीटकर उस स्थान पर खड़ा कर दे, जहाँ स्वतंत्र चिन्तन अनिवार्य हो जाता है।
🔶 विवेक का प्रकाश जब अपनाया जाता है तब अँधेरे की आशंकाएँ और विभीषिकाएँ सभी तिरोहित हो जाती हैं। वहाँ अन्धानुकरण एवं पूर्वाग्रहों का विनाश होता है। मनुष्य इतना साहस अनुभव करता है कि औचित्य के मार्ग पर अकेला ही चल पड़े। भले ही उसके तथाकथित शुभचिन्तक उसके लिए उसे रोकते, टोकते ही रह जाएँ।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-वांग्मय 66 पृष्ठ 1.16
🔷 युग परिवर्तन का आरम्भ व्यक्ति परिवर्तन की उग्र प्रक्रिया के साथ आरम्भ होगा। इसके लिए भगवान ऐसा सूक्ष्म प्रेरणा प्रवाह उत्पन्न कर रहे हैं, जो हर जीवित और जाग्रत आत्मा को व्याकुल, बेचैन कर दे। अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करने के लिए हर घड़ी विवश करे और उसे घसीटकर उस स्थान पर खड़ा कर दे, जहाँ स्वतंत्र चिन्तन अनिवार्य हो जाता है।
🔶 विवेक का प्रकाश जब अपनाया जाता है तब अँधेरे की आशंकाएँ और विभीषिकाएँ सभी तिरोहित हो जाती हैं। वहाँ अन्धानुकरण एवं पूर्वाग्रहों का विनाश होता है। मनुष्य इतना साहस अनुभव करता है कि औचित्य के मार्ग पर अकेला ही चल पड़े। भले ही उसके तथाकथित शुभचिन्तक उसके लिए उसे रोकते, टोकते ही रह जाएँ।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-वांग्मय 66 पृष्ठ 1.16
सोमवार, 19 नवंबर 2018
👉 मृदुता :-
🔷 स्वभाव की मृदुलता ग्रहण करें। मृदुल स्वभाव उस व्यक्ति का है जिसे देख कर स्वतः मन में उसके प्रति आकर्षण का भाव उत्पन्न होता है। उसके मुख, स्वभाव तथा चरित्र से मानसिक आकर्षण, प्रेम, तथा आनन्द प्रस्फुटित होता है। मृदुलता के अंतर्गत वे सभी विधियाँ आती हैं जिनके द्वारा मनुष्य दूसरों को प्रसन्न रखता तथा हृदय में अपने प्रति प्रेम उत्पन्न करता है। उसका सबके प्रति प्रेममय, मित्रतापूर्ण व्यवहार होता है। उसका व्यवहार मित्रों और हितैषियों को उसकी ओर आकर्षित करता है। उसमें चिड़चिड़ापन, उत्तेजना, क्रोध, कटुता, कुढ़न इत्यादि नहीं होती।
🔶 मृदु व्यक्ति बड़ा मीठा हंसमुख स्वभाव रखता है सभ्यतापूर्ण ढंग से व्यवहार करता है और प्रेम सहानुभूति से स्निग्ध रहता है। जो व्यक्ति उसके संपर्क में आता है, उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।
🔷 मृदु व्यक्ति सदा दूसरों को प्रसन्न रखने और प्रेम करने की बात सोचता रहता है उसके मित्रों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है। वह उदार, दयावान, और प्रेममय रहता है। इन सद्गुणों के कारण मृदुल व्यक्ति सब स्थितियों और सब प्रकार के व्यक्तियों से बड़ा अच्छा निर्भाव कर लेता है।
🔶 यथा शक्ति दूसरों से प्रेम कीजिए। सहानुभूतिपूर्ण ढंग से अप्रिय कामों को कीजिए। जिससे भी मिलें आपके वाक्य, शब्द और अक्षर प्रेम से सरस स्निग्ध रहें। जगत् के विदग्ध हृदयों को आपके शब्दों से ऐसा मरहम प्राप्त हो कि *वे अपने संताप भूल सकें और दो घड़ी अपने महत्त्व का अनुभव कर सकें।
🔶 मृदु व्यक्ति बड़ा मीठा हंसमुख स्वभाव रखता है सभ्यतापूर्ण ढंग से व्यवहार करता है और प्रेम सहानुभूति से स्निग्ध रहता है। जो व्यक्ति उसके संपर्क में आता है, उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।
🔷 मृदु व्यक्ति सदा दूसरों को प्रसन्न रखने और प्रेम करने की बात सोचता रहता है उसके मित्रों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है। वह उदार, दयावान, और प्रेममय रहता है। इन सद्गुणों के कारण मृदुल व्यक्ति सब स्थितियों और सब प्रकार के व्यक्तियों से बड़ा अच्छा निर्भाव कर लेता है।
🔶 यथा शक्ति दूसरों से प्रेम कीजिए। सहानुभूतिपूर्ण ढंग से अप्रिय कामों को कीजिए। जिससे भी मिलें आपके वाक्य, शब्द और अक्षर प्रेम से सरस स्निग्ध रहें। जगत् के विदग्ध हृदयों को आपके शब्दों से ऐसा मरहम प्राप्त हो कि *वे अपने संताप भूल सकें और दो घड़ी अपने महत्त्व का अनुभव कर सकें।
👉 अन्तःलोक का आलोक
🔷 हवा के एक झोंके ने मिट्टी का दीया बुझा दिया। मिट्टी के दीयों का भरोसा भी क्या? कब टूटे और बिखरकर मिट्टी में मिल गए। उन ज्योतियों का साथ भी कितना, जिन्हें हवाएँ जब-तब बुझा सकती है। ज्योति के बिना जीवन अँधेरों में डूब जाता है। ये अँधेरे सदा ही भयावह होते हैं। जिन्हें अनुभव है, वे जानते हैं कि अँधेरे में प्राण कँप जाते हैं और साँसें लेना भी कठिन हो जाता है।
🔶 जीवन ही नहीं जगत् भी अँधेरे से घिरा है। ऐसी कोई भी ज्योति इस जगत् में नहीं है, जो अँधेरे को पूरी तरह मिटा दे। जो भी ज्योतियाँ हैं, उन्हें देर-सबेर हवाओं के झोंके अँधेरों में डुबा देते हैं। ये जलती हैं और बुझ जाती हैं, पर अँधेरे की सघनता जस की तस बनी रहती है। जगत् में फैला हुआ अँधेरा शाश्वत है। जो इस जगत् की ज्योतियों पर भरोसा करते हैं, वे नासमझ हैं, क्योंकि ये ज्योतियाँ सब की सब आखिरकार अँधेरे से हार जाती हैं।
🔷 अंधकार से भरे इस जगत् से परे एक और लोक भी है। जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है। इस बाहरी जगत् में प्रकाश क्षणिक और सामयिक है एवं अँधेरा शाश्वत है तो इस आन्तरिक जगत् में अंधकार क्षणिक व सामयिक है और प्रकाश शाश्वत है। अचरज की बात यह है कि यह प्रकाश लोक हमारे बहुत निकट है, क्योंकि अंधकार बाहर है और प्रकाश भीतर।
🔶 याद रहे, जब तक अन्तःलोक के आलोक में जागरण नहीं होता, तब तक कोई भी ज्योति अभय नहीं दे पाती। जरूरत इस बात की है कि मिट्टी के मृण्मय दीपों पर भरोसा छोड़ा जाय और चिन्मय ज्योति को खोजा जाय। क्योंकि यही अभय, आनन्द और आलोक का स्रोत है। अँधेरे से घबराहट और आलोक की चाहत यह जताती है कि हमारी वास्तविकता प्रकाश ही है। क्योंकि आलोक ही आलोक के लिए प्यासा हो सकता है। जहाँ से प्रकाश की चाहत पनप ही है, वहीं खोजो, अन्तःलोक का आलोक-चिन्मय ज्योति का स्रोत वहीं छिपा है।
श्रीराम शर्मा आचार्य
🔶 जीवन ही नहीं जगत् भी अँधेरे से घिरा है। ऐसी कोई भी ज्योति इस जगत् में नहीं है, जो अँधेरे को पूरी तरह मिटा दे। जो भी ज्योतियाँ हैं, उन्हें देर-सबेर हवाओं के झोंके अँधेरों में डुबा देते हैं। ये जलती हैं और बुझ जाती हैं, पर अँधेरे की सघनता जस की तस बनी रहती है। जगत् में फैला हुआ अँधेरा शाश्वत है। जो इस जगत् की ज्योतियों पर भरोसा करते हैं, वे नासमझ हैं, क्योंकि ये ज्योतियाँ सब की सब आखिरकार अँधेरे से हार जाती हैं।
🔷 अंधकार से भरे इस जगत् से परे एक और लोक भी है। जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है। इस बाहरी जगत् में प्रकाश क्षणिक और सामयिक है एवं अँधेरा शाश्वत है तो इस आन्तरिक जगत् में अंधकार क्षणिक व सामयिक है और प्रकाश शाश्वत है। अचरज की बात यह है कि यह प्रकाश लोक हमारे बहुत निकट है, क्योंकि अंधकार बाहर है और प्रकाश भीतर।
🔶 याद रहे, जब तक अन्तःलोक के आलोक में जागरण नहीं होता, तब तक कोई भी ज्योति अभय नहीं दे पाती। जरूरत इस बात की है कि मिट्टी के मृण्मय दीपों पर भरोसा छोड़ा जाय और चिन्मय ज्योति को खोजा जाय। क्योंकि यही अभय, आनन्द और आलोक का स्रोत है। अँधेरे से घबराहट और आलोक की चाहत यह जताती है कि हमारी वास्तविकता प्रकाश ही है। क्योंकि आलोक ही आलोक के लिए प्यासा हो सकता है। जहाँ से प्रकाश की चाहत पनप ही है, वहीं खोजो, अन्तःलोक का आलोक-चिन्मय ज्योति का स्रोत वहीं छिपा है।
श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 Refinement of aspirations
🔷 A lack of harmony between inner life (aspirations, thinking, character, etc.) and outer life (actions, interactions, conduct, etc.) of an individual may give rise to muddled and mismatched aspirations as well as the feelings of inner dissatisfaction. Many individuals happen be deeply idealistic, however, sometimes they might commit something undesirable out of their instincts or inner traits which would then make them regret and feel discontent for having failed to practice the ideals they staunchly believed in.
🔶 This could also happen when an individual may desire to be idealistic but cannot refine or make his aspirations compatible with his aforesaid desire. For example, an individual may wish to be honest in his life and to serve the masses, however, he also has some parallel aspirations which compels him to live a lavish and luxurious life. This might make it difficult for him to prove his integrity and commitment and to have any desirable impact of his service to humanity leading to inner dissatisfaction.Anyone who desires to serve the humanity need to adopt a simplicity in their life if they wish to have any impact on masses. For that reason, it is necessary for them to shape their aspirations in such a way that they harmonize well with their ideals.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Jivan Devtā kī sādhanā-ārādhanā Vangmay 2 Page 2.16
🔶 This could also happen when an individual may desire to be idealistic but cannot refine or make his aspirations compatible with his aforesaid desire. For example, an individual may wish to be honest in his life and to serve the masses, however, he also has some parallel aspirations which compels him to live a lavish and luxurious life. This might make it difficult for him to prove his integrity and commitment and to have any desirable impact of his service to humanity leading to inner dissatisfaction.Anyone who desires to serve the humanity need to adopt a simplicity in their life if they wish to have any impact on masses. For that reason, it is necessary for them to shape their aspirations in such a way that they harmonize well with their ideals.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Jivan Devtā kī sādhanā-ārādhanā Vangmay 2 Page 2.16
👉 आकांक्षाओं का परिष्कार
🔷 आंतरिक और बाह्य जीवन में एक रसता - क्षमता न होने के कारण भी ऊल-जलूल आकांक्षाएँ तथा असंतोष की भावनाएँ उठा करती हैं। कई व्यक्ति आंतरिक दृष्टि से बड़े आदर्शवादी होते हैं, किन्तु संस्कारों से प्रेरित होकर कई ऐसे कार्य भी कर बैठते हैं जिससे कि आदर्शों को अपने जीवन में न उतार पाने का असंतोष और जीव विक्षोभ होता है।
🔶 इस तरह की भूलें तब भी होती है जबकि आदर्शवादी बनने की लालसा रखते हुए भी अपनी आकाक्षाओं को परिष्कृत या संतुलित नहीं रखा जाता। उदाहरण के लिए ईमानदार और लोकसेवी बनने की लगन है , किन्तु आकांक्षा इस तरह की है की खूब शान -शौकत और ठाठ -बाट से रहना जरूरी लगे। वैसी स्थिती में अपनी ईमानदारी व निष्ठा को प्रामाणिक सिद्ध करने और सेवा कार्यों का अपेक्षित प्रभाव ने होने पर विक्षोभ तो उत्पन्न होगा ही क्योंकि लोकसेवी के व्यक्तित्व में सादगी हो तो ही लोगों पर उसका प्रभाव पड़ता है। अतः अपनी आकांक्षाओं को अपने आदर्शों के अनुरूप ही ढालना चाहिए।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन देवता की साधना - आराधना वांग्मय 2 पृष्ठ - 2.16
🔶 इस तरह की भूलें तब भी होती है जबकि आदर्शवादी बनने की लालसा रखते हुए भी अपनी आकाक्षाओं को परिष्कृत या संतुलित नहीं रखा जाता। उदाहरण के लिए ईमानदार और लोकसेवी बनने की लगन है , किन्तु आकांक्षा इस तरह की है की खूब शान -शौकत और ठाठ -बाट से रहना जरूरी लगे। वैसी स्थिती में अपनी ईमानदारी व निष्ठा को प्रामाणिक सिद्ध करने और सेवा कार्यों का अपेक्षित प्रभाव ने होने पर विक्षोभ तो उत्पन्न होगा ही क्योंकि लोकसेवी के व्यक्तित्व में सादगी हो तो ही लोगों पर उसका प्रभाव पड़ता है। अतः अपनी आकांक्षाओं को अपने आदर्शों के अनुरूप ही ढालना चाहिए।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन देवता की साधना - आराधना वांग्मय 2 पृष्ठ - 2.16
शनिवार, 17 नवंबर 2018
👉 लोंगेवाला का युद्ध पाकिस्तान की शर्मनाक हार
🔶 नहीं रहे 'बॉर्डर' के मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी, धूल में मिला दिया था पाकिस्तान का मंसूबा
लोंगेवाला के युद्ध में पाकिस्तान के नापाक मंसूबों को खाक में मिलाने वाले ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी का निधन हो गया है। इस युद्ध पर बनी फिल्म 'बार्डर' में उनका किरदार सनी देओल ने निभाया था।
🔶 सिर्फ 120 के करीब भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान की बड़ी फौज का मुकाबला किया
🔶 किसी अतिरिक्त मदद के बगैर रात भर में पाकिस्तान के 12 टैंक तबाह कर दिए थे
🔶 पाकिस्तान की बड़ी शर्मनाक हार हुई। पाक के कुल 34 टैंक तबाह हुए थे
🔷 बॉर्डर फिल्म में जिस मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी का किरदार सनी देओल ने निभाया था, आज उनका निधन हो गया है। 1971 के लोंगेवाला के युद्ध में उनकी सैन्य टुकड़ी ने बेमिसाल बहादुरी का प्रदर्शन किया था। इसी युद्ध पर बॉर्डर फिल्म बनी थी। मेजर कुलदीप सिंह ने असाधारण नेतृत्व का परिचय दिया था जिसके लिए उनको भारत सरकार द्वारा महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। आइए आज मेजर चांदपुरी और लोंगेवाला युद्ध के बारे में विस्तार से जानते हैं...
🔶 ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह का जन्म 22 नवंबर, 1940 को एक गुर्जर सिख परिवार में हुआ था। उनके परिवार का संबंध अविभाजित भारत के पंजाब में मोंटागोमरी से था। उनके जन्म के बाद उनका परिवार बालाचौर के चांदपुर रूड़की शिफ्ट हो गया था। 1962 में उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज, होशियारपुर से ग्रैजुएशन किया। साल 1962 में चांदपुरी भारतीय थल सेना में शामिल हुए थे। 1963 में उनको ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकैडमी से पंजाब रेजिमेंट की 23वीं बटालियन में कमिशन किया गया था। उन्होंने 1965 के युद्ध में हिस्सा लिया था। युद्ध के बाद वह एक साल तक गाजा (मिस्र) में संयुक्त राष्ट्र के मिशन पर रहे। जिस समय लोंगेवाला में पाकिस्तानी फौज का हमला हुआ, उस समय वह मेजर के पद पर थे और सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर के पद पर हुए थे।
लोंगेवाला के युद्ध में पाकिस्तान के नापाक मंसूबों को खाक में मिलाने वाले ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी का निधन हो गया है। इस युद्ध पर बनी फिल्म 'बार्डर' में उनका किरदार सनी देओल ने निभाया था।
🔶 सिर्फ 120 के करीब भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान की बड़ी फौज का मुकाबला किया
🔶 किसी अतिरिक्त मदद के बगैर रात भर में पाकिस्तान के 12 टैंक तबाह कर दिए थे
🔶 पाकिस्तान की बड़ी शर्मनाक हार हुई। पाक के कुल 34 टैंक तबाह हुए थे
🔷 बॉर्डर फिल्म में जिस मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी का किरदार सनी देओल ने निभाया था, आज उनका निधन हो गया है। 1971 के लोंगेवाला के युद्ध में उनकी सैन्य टुकड़ी ने बेमिसाल बहादुरी का प्रदर्शन किया था। इसी युद्ध पर बॉर्डर फिल्म बनी थी। मेजर कुलदीप सिंह ने असाधारण नेतृत्व का परिचय दिया था जिसके लिए उनको भारत सरकार द्वारा महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। आइए आज मेजर चांदपुरी और लोंगेवाला युद्ध के बारे में विस्तार से जानते हैं...
🔶 ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह का जन्म 22 नवंबर, 1940 को एक गुर्जर सिख परिवार में हुआ था। उनके परिवार का संबंध अविभाजित भारत के पंजाब में मोंटागोमरी से था। उनके जन्म के बाद उनका परिवार बालाचौर के चांदपुर रूड़की शिफ्ट हो गया था। 1962 में उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज, होशियारपुर से ग्रैजुएशन किया। साल 1962 में चांदपुरी भारतीय थल सेना में शामिल हुए थे। 1963 में उनको ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकैडमी से पंजाब रेजिमेंट की 23वीं बटालियन में कमिशन किया गया था। उन्होंने 1965 के युद्ध में हिस्सा लिया था। युद्ध के बाद वह एक साल तक गाजा (मिस्र) में संयुक्त राष्ट्र के मिशन पर रहे। जिस समय लोंगेवाला में पाकिस्तानी फौज का हमला हुआ, उस समय वह मेजर के पद पर थे और सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर के पद पर हुए थे।
👉 लोंगेवाला का युद्ध
🔷 भारत और पाकिस्तान के बीच छिड़ा 1971 का युद्ध समाप्त होने को था। इसी बीच 4 दिसंबर को मेजर कुलदीप सिंह को सूचना मिली की बड़ी संख्या में पाकिस्तान की फौज लोंगेवाला चौकी की ओर बढ़ रही है। लोंगेवाला चौकी की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिस सैन्य टुकड़ी के पास थी, उसका नेतृत्व मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी कर रहे थे। चांदपुरी के अधीन उस समय सिर्फ 90 के करीब जवान थे और 30 के करीब जवान गश्त पर थे। करीब 120 सैनिकों की बदौलत बड़ी फौज का सामना करना मुश्किल था। चांदपुरी चाहते तो अपने सैनिकों के साथ आगे रामगढ़ निकल सकते थे लेकिन उन्होंने चौकी की सुरक्षा के लिए रुकने और पाकिस्तान की फौज से दो-दो हाथ करने का फैसला किया। तब तक शाम हो चुकी थी और अंधेरे में किसी तरह की फौजी सहायता मिलना संभव नहीं था।
🔶 कुछ ही समय के अंदर लोंगेवाला चौकी पर पाकिस्तानी टैंक गोले बरसा रहे थे। भारतीय सैनिकों ने भी जवाबी हमले की तैयारी कर ली और जीप पर लगे रिकॉइललेस राइफल और मोर्टार से फायरिंग शुरू कर दी। यह इतनी दमदार कार्रवाई थी कि पाकिस्तानी सेना के कदम रुक गए। पाकिस्तानी सेना में करीब 2000 जवान थे और भारतीय सैन्य टुकड़ी में मुश्किल से 100 जवान, फिर भी उनका हौसला मजबूत था। रात होते-होते पाकिस्तान के 12 टैंक तबाह कर दिए और 8 किलोमीटर दूर तक पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ दिया। पाकिस्तान के मंसूबे पर पानी फिर चुका था। पाकिस्तानी सैनिकों का इरादा रामगढ़ होते हुए जैसलमेर तक पहुंचना था, लेकिन आगे बढ़ना तो दूर उनको पीछे हटना पड़ रहा था।
🔷 रात भर मुट्ठी भर भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान का डटकर मुकाबला किया। अगले दिन यानी 5 दिसंबर, 1971 को सुबह सूरज निकलने के साथ ही भारतीय सैनिकों की मदद में वायु सेना का विमान पहुंच गया। भारतीय वायु सेना के विमान पाकिस्तानी टैंकों और फौजियों पर कहर बनकर टूट पड़े। पाकिस्तानी फौज उल्टे पांव भागने को मजबूर हो गई। अगले दिन 6 दिसंबर को फिर वायु सेना के हंटर विमानों ने कहर बरपाया। इसका नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान की एक पूरी ब्रिगेड और दो रेजिमेंट का सफाया हो गया।
👉 पाकिस्तान की शर्मनाक हार
🔶 लोंगेवाला के युद्ध में पाकिस्तान को बहुत शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। पाकिस्तान के 34 टैंक तबाह हो गए, 500 के करीब जवान घायल हो गए और 200 जवानों को जिंदगी से हाथ धोना पड़ा। दूसरे विश्वयुद्ध के यह पहला मौका था जब युद्ध में किसी सेना का इतनी बड़ी संख्या में टैंक तबाह हुआ हो। इस युद्ध में पाकिस्तान की काफी फजीहत हुई थी। भारतीय जमीन पर पाकिस्तान के कब्जे का मंसूबा नाकाम ही नहीं हुआ बल्कि उल्टे भारतीय सैनिक पाकिस्तान के 8 किलोमीटर अंदर तक जा घुसे। भारतीय सैनिक 16 दिसंबर तक पाकिस्तान की जमीन पर डेरा डाले रहे और 16 दिसंबर को भारत के जंग जीतने के साथ ही भारतीय सैनिक अपनी सीमा में वापस आए।
👉 मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी का बेमिसाल नेतृत्व
🔷 यह कहा जा सकता है कि अगर मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी नहीं होते तो भारत का नक्शा बदल गया होता। पाकिस्तानी फौज आसानी से रामगढ़ होते हुए जैसलमेर तक पहुंच जाती। मेजर चांदपुरी चाहते तो पाकिस्तानी फौज का सामना किए बगैर रामगढ़ जा सकते थे लेकिन उन्होंने देश के दुश्मन को करारा जवाब देने में देरी नहीं की। उन्होंने असाधारण नेतृत्व का परिचय दिया। रात के समय में वह बंकरों का चक्कर लगा रहे थे। हर बंकर में जाकर अपने सैनिकों का हौसला बढ़ाते। उन्होंने अगली सुबह को सैन्य मदद पहुंचने तक दुश्मन को करारा जवाब देने के लिए सैनिकों को प्रेरित किया। उनके इस नेतृत्व से प्रोत्साहित होकर सैनिकों ने भी डटकर पाकिस्तानी सैनिकों का मुकाबला किया और बगैर किसी अतिरिक्त मदद के पाकिस्तान के 12 टैंकों को रात तक तबाह कर दिया था।
🔷 यह कहा जा सकता है कि अगर मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी नहीं होते तो भारत का नक्शा बदल गया होता। पाकिस्तानी फौज आसानी से रामगढ़ होते हुए जैसलमेर तक पहुंच जाती। मेजर चांदपुरी चाहते तो पाकिस्तानी फौज का सामना किए बगैर रामगढ़ जा सकते थे लेकिन उन्होंने देश के दुश्मन को करारा जवाब देने में देरी नहीं की। उन्होंने असाधारण नेतृत्व का परिचय दिया। रात के समय में वह बंकरों का चक्कर लगा रहे थे। हर बंकर में जाकर अपने सैनिकों का हौसला बढ़ाते। उन्होंने अगली सुबह को सैन्य मदद पहुंचने तक दुश्मन को करारा जवाब देने के लिए सैनिकों को प्रेरित किया। उनके इस नेतृत्व से प्रोत्साहित होकर सैनिकों ने भी डटकर पाकिस्तानी सैनिकों का मुकाबला किया और बगैर किसी अतिरिक्त मदद के पाकिस्तान के 12 टैंकों को रात तक तबाह कर दिया था।
👉 परमात्मा प्राप्ति किसे होती है?
🔶 एक राजा था। वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था। वह नित्य अपने इष्ट देव को बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ ओर याद करता था। एक दिन इष्ट देव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा---"राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं | बोलो तुम्हारी कोई इचछा है ?"
🔷 प्रजा को चाहने वाला राजा बोला---"भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ है | आपकी कृपा से राज्य में सब प्रकार सुख-शान्ति है | फिर भी मेरी एक ईच्छा है कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी दर्शन दीजिये।"
🔶 "यह तो सम्भव नहीं है ।" ---भगवान ने राजा को समझाया । परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा। आखिर भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पडा ओर वे बोले, --"ठीक है, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाडी के पास लाना। मैं पहाडी के ऊपर से दर्शन दूँगा।"
🔷 राजा अत्यन्त प्रसन्न हुअा अौर भगवान को धन्यवाद दिया। अगले दिन सारे नगर मे ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड के नीचे मेरे साथ पहुँचें, वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देंगें ।
🔶 दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा ओर स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा। चलते-चलते रास्ते में एक स्थान पर तांबे के सिक्कों का पहाड देखा। प्रजा में से कुछ एक उस ओर भागने लगे। तभी ज्ञानी राजा ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे, क्योंकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो, इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो।
🔷 परन्तु लोभ-लालच में वशीभूत कुछ प्रजा तांबे के सिक्कों वाली पहाडी की ओर भाग गयी अौर सिक्कों की गठरी बना कर अपने घर की ओर चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे, पहले ये सिक्कों को समेट लें; भगवान से तो फिर कभी मिल लेंगे।
🔶 राजा खिन्न मन से आगे बढे। कुछ दूर चलने पर चांदी के सिक्कों का चमचमाता पहाड दिखाई दिया। इस वार भी बची हुई प्रजा में से कुछ लोग, उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों को गठरी बना कर अपने घर की ओर चलने लगे। उनके मन में विचार चल रहा था कि एेसा मौका बार-बार नहीं मिलता है। चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिलें न मिलें, भगवान तो फिर कभी मिल जायेंगे।
🔷 इसी प्रकार कुछ दूर ओर चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड नजर आया। अब तो प्रजाजनों में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे। वे भी दूसरों की तरह सिक्कों की गठरी लाद कर अपने-अपने घरों की ओर चल दिये।
🔶 अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे। राजा रानी से कहने लगे---"देखो कितने लोभी हैं ये लोग ? भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं । भगवान के सामने सारी दुनियां की दौलत क्या चीज है?"
🔷 सही बात है। रानी ने राजा की बात का समर्थन किया अौर वह आगे बढने लगे। कुछ दूर चलने पर राजा अौर रानी ने देखा कि सप्तरंगी आभा बिखरता हीरों का पहाड है। अब तो रानी से रहा नहीं गया, हीरों के आर्कषण से वह भी दौड पडी अौर हीरों की गठरी बनाने लगी। फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साडी के पल्लु में भी बांधने लगी। रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये, परंतु हीरों की तृष्णा अभी भी नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ग्लानि ओर विरक्ति हुई। बडे दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये।
🔶 वहाँ सचमुच भगवान खडे उसका इन्तजार कर रहे थे। राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये अौर पूछा --"कहाँ है तुम्हारी प्रजा अौर तुम्हारे प्रियजन। मैं तो कब से बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हुं।"
🔷 राजा ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सिर झुका दिया। तब भगवान ने राजा को समझाया-- "राजन जो लोग भैतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हैं, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती ओर वह मेरे स्नेह तथा आर्शिवाद से भी वंचित रह जाते हैं।"
🔷 प्रजा को चाहने वाला राजा बोला---"भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ है | आपकी कृपा से राज्य में सब प्रकार सुख-शान्ति है | फिर भी मेरी एक ईच्छा है कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी दर्शन दीजिये।"
🔶 "यह तो सम्भव नहीं है ।" ---भगवान ने राजा को समझाया । परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा। आखिर भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पडा ओर वे बोले, --"ठीक है, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाडी के पास लाना। मैं पहाडी के ऊपर से दर्शन दूँगा।"
🔷 राजा अत्यन्त प्रसन्न हुअा अौर भगवान को धन्यवाद दिया। अगले दिन सारे नगर मे ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड के नीचे मेरे साथ पहुँचें, वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देंगें ।
🔶 दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा ओर स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा। चलते-चलते रास्ते में एक स्थान पर तांबे के सिक्कों का पहाड देखा। प्रजा में से कुछ एक उस ओर भागने लगे। तभी ज्ञानी राजा ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे, क्योंकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो, इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो।
🔷 परन्तु लोभ-लालच में वशीभूत कुछ प्रजा तांबे के सिक्कों वाली पहाडी की ओर भाग गयी अौर सिक्कों की गठरी बना कर अपने घर की ओर चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे, पहले ये सिक्कों को समेट लें; भगवान से तो फिर कभी मिल लेंगे।
🔶 राजा खिन्न मन से आगे बढे। कुछ दूर चलने पर चांदी के सिक्कों का चमचमाता पहाड दिखाई दिया। इस वार भी बची हुई प्रजा में से कुछ लोग, उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों को गठरी बना कर अपने घर की ओर चलने लगे। उनके मन में विचार चल रहा था कि एेसा मौका बार-बार नहीं मिलता है। चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिलें न मिलें, भगवान तो फिर कभी मिल जायेंगे।
🔷 इसी प्रकार कुछ दूर ओर चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड नजर आया। अब तो प्रजाजनों में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे। वे भी दूसरों की तरह सिक्कों की गठरी लाद कर अपने-अपने घरों की ओर चल दिये।
🔶 अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे। राजा रानी से कहने लगे---"देखो कितने लोभी हैं ये लोग ? भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं । भगवान के सामने सारी दुनियां की दौलत क्या चीज है?"
🔷 सही बात है। रानी ने राजा की बात का समर्थन किया अौर वह आगे बढने लगे। कुछ दूर चलने पर राजा अौर रानी ने देखा कि सप्तरंगी आभा बिखरता हीरों का पहाड है। अब तो रानी से रहा नहीं गया, हीरों के आर्कषण से वह भी दौड पडी अौर हीरों की गठरी बनाने लगी। फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साडी के पल्लु में भी बांधने लगी। रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये, परंतु हीरों की तृष्णा अभी भी नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ग्लानि ओर विरक्ति हुई। बडे दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये।
🔶 वहाँ सचमुच भगवान खडे उसका इन्तजार कर रहे थे। राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये अौर पूछा --"कहाँ है तुम्हारी प्रजा अौर तुम्हारे प्रियजन। मैं तो कब से बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हुं।"
🔷 राजा ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सिर झुका दिया। तब भगवान ने राजा को समझाया-- "राजन जो लोग भैतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हैं, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती ओर वह मेरे स्नेह तथा आर्शिवाद से भी वंचित रह जाते हैं।"
👉 क्रोध को करें नियंत्रित
🔶 एक ऐसा भाव है जो हम सभी के मन में बहुत बार आता है। यदि आपको अपने क्रोध को नियंत्रित करना आता है तो आप हमेशा और हर स्थिति में प्रसन्न रह सकती हैं...
🔷 कई बार हमारे आपके मन में क्रोध-आक्रोश पनपने लगता है। जब इस क्रोध-आक्रोश की सही अभिव्यक्ति नहीं हो पाती है, तब कुछ लोग अपने शरीर पर खीज निकालते हैं तो कुछ दूसरों पर। मनोचिकित्सकों का कहना है कि मन की अंदरूनी पीड़ा और कुंठा से उपजे क्रोध को काबू करना जरूरी है। क्रोध को नियंत्रित करने के लिए यह जरूरी है कि आप इसके बुनियादी कारणों को समझें।
🔶 उन कारणों को रेखांकित करने का प्रयास करें, जिनके चलते आप भावनात्मक व मानसिक रूप से पीडि़त हैं।
🔷 उन बातों की ओर भी ध्यान दें, जिनके चलते आपका दुख बढ़ जाता है।
🔶 मनोभावों और उनके पैदा होने के मूल कारणों को समझने का प्रयास करें।
🔷 क्रोध को बाहर निकालने का आपका जो भी तरीका हो, पर इस संदर्भ में यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि आपको न तो खुद को पीडि़त करना है और न ही दूसरे को कष्ट पहुंचाना है। क्रोध आने पर मुटिठयां भींचें, पर इनका प्रयोग न करें। यदि आप आस्तिक हैं तो अपने आराध्य को याद करें। इससे आपके क्रोध के ठंडे बस्ते में जाने की संभावना बढ़ जाती है।
🔶 भावनात्मक दुखों को भुलाने के लिए किसी भी तरह के मादक पदार्थ का सहारा न लें। याद रखें ऐसे पदार्थ एक तरह का छलावा हैं। इनका सेवन दुख दूर करने के बजाय स्वास्थ्य बिगड़ता है।
👉 यह है समाधान
🔷 सकारात्मक सोच के जरिए आप अपने क्रोध और आक्रोश को नियंत्रित कर सकती हैं। सबसे पहले आप अपने नकारात्मक व्यवहार को अलविदा कह दें। ऐसा करने के लिए आपको दृढ़ संकल्प शक्ति का परिचय देना होगा।
🔶 अपने प्रति ईमानदार रहें। सच से जी न चुराएं।
🔷 यदि आप आस्तिक हैं तो अपने आराध्य को याद करें। इससे आपके क्रोध की अग्नि शांत होने की संभावना बढ़ जाती है।
🔶 अपनी भावनाओं को समझने का प्रयास करें। किसी समय विशेष में आपकी अनुभूतियां क्या हैं, किस तरह के भाव आ रहे हैं? इनका परीक्षण करें। आप किन बातों से भयभीत हैं? उन कारणों को व्यवाहारिक व सकारात्मक दृष्टि से समझने का प्रयास करें। मनोचिकित्सकों के अनुसार परेशान शख्स के अधिकांश भय काल्पनिक होते हैं। यदि आप उन भयों से रूबरू होने का प्रयास करती हैं तो काफी हद तक आपका भय जाता रहता है।
🔷 कारणों पर भी ध्यान देने का प्रयास करें, जिनसे आप प्रसन्न होती हैं। इसी तरह जिन बातों से आप दुखी होती हैं, उन कारणों को भी समझने का प्रयास करें।
🔶 जिन बातों से आपका आत्मविश्वास बढ़ता है, उन बातों को रेखांकित कर उन पर अमल करें।
🔷 किसी बात को लेकर यदि आप असमंजस में पड़ गयी हैं तो इस स्थिति में अपने अंतर्मन की पुकार सुनें।
🔶 सकारात्मक व रचनात्मक सोच रखने वाले लोगों के बीच रहें। ऐसे लोगों के संपर्क में रहने से आपके मन में भी सकारात्मक भाव पनपेंगे।
🔷 जरूरत पडऩे पर दूसरों को सहयोग दें। जब आप किसी शख्स की मदद करती हैं तो इससे आपको भी अहसास होता है कि आपका भी महत्व है।
🔶 अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें। संतुलित पोषक आहार ग्रहण करें। समय पर सोएं और जागें। नियमित रूप से व्यायाम करें। सेहत अच्छी रहने से आप हरेक कार्य को आत्मविश्वास के साथ कर सकती हैं।
🔷 जिन कार्यों में आपकी दिलचस्पी है, उन्हें अंजाम दें। व्यस्त दिनचर्या में से समय निकालकर अपने शौक के लिए भी वक्त निकालना सीखें।
🔶 फुर्सत के लम्हों में सुरुचिपूर्ण या व्यक्तित्व विकास संबंधी पुस्तकें पढ़ें।
🔷 किसी कार्य को सोचने-विचारने के बाद शुरू करें। अपने मन में संकल्प लें कि अमुक कार्य को पूरा करके ही पूर्ण संतुष्ट होंगी।
🔶 क्रोध में आने के बाद किसी को न तो फोन करें और न ही किसी को मैसेज भेजें। कारण, इस दौरान आपकी नकारात्मक भावनाएं दिमाग पर हावी होती हैं। ऐसे में आप अच्छे शब्दों के बारे में सोच ही नहीं सकतीं हैं।
🔷 क्रोध में आने के बाद किसी भी प्रकार की बहस करने से बचें, क्योंकि क्रोध के दौरान बहस करने से आपके सामने कुछ ऐसी बातें आ सकती हैं, जिनके कारण आप हिंसक व्यवहार भी कर सकती हैं।
🔷 कई बार हमारे आपके मन में क्रोध-आक्रोश पनपने लगता है। जब इस क्रोध-आक्रोश की सही अभिव्यक्ति नहीं हो पाती है, तब कुछ लोग अपने शरीर पर खीज निकालते हैं तो कुछ दूसरों पर। मनोचिकित्सकों का कहना है कि मन की अंदरूनी पीड़ा और कुंठा से उपजे क्रोध को काबू करना जरूरी है। क्रोध को नियंत्रित करने के लिए यह जरूरी है कि आप इसके बुनियादी कारणों को समझें।
🔶 उन कारणों को रेखांकित करने का प्रयास करें, जिनके चलते आप भावनात्मक व मानसिक रूप से पीडि़त हैं।
🔷 उन बातों की ओर भी ध्यान दें, जिनके चलते आपका दुख बढ़ जाता है।
🔶 मनोभावों और उनके पैदा होने के मूल कारणों को समझने का प्रयास करें।
🔷 क्रोध को बाहर निकालने का आपका जो भी तरीका हो, पर इस संदर्भ में यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि आपको न तो खुद को पीडि़त करना है और न ही दूसरे को कष्ट पहुंचाना है। क्रोध आने पर मुटिठयां भींचें, पर इनका प्रयोग न करें। यदि आप आस्तिक हैं तो अपने आराध्य को याद करें। इससे आपके क्रोध के ठंडे बस्ते में जाने की संभावना बढ़ जाती है।
🔶 भावनात्मक दुखों को भुलाने के लिए किसी भी तरह के मादक पदार्थ का सहारा न लें। याद रखें ऐसे पदार्थ एक तरह का छलावा हैं। इनका सेवन दुख दूर करने के बजाय स्वास्थ्य बिगड़ता है।
👉 यह है समाधान
🔷 सकारात्मक सोच के जरिए आप अपने क्रोध और आक्रोश को नियंत्रित कर सकती हैं। सबसे पहले आप अपने नकारात्मक व्यवहार को अलविदा कह दें। ऐसा करने के लिए आपको दृढ़ संकल्प शक्ति का परिचय देना होगा।
🔶 अपने प्रति ईमानदार रहें। सच से जी न चुराएं।
🔷 यदि आप आस्तिक हैं तो अपने आराध्य को याद करें। इससे आपके क्रोध की अग्नि शांत होने की संभावना बढ़ जाती है।
🔶 अपनी भावनाओं को समझने का प्रयास करें। किसी समय विशेष में आपकी अनुभूतियां क्या हैं, किस तरह के भाव आ रहे हैं? इनका परीक्षण करें। आप किन बातों से भयभीत हैं? उन कारणों को व्यवाहारिक व सकारात्मक दृष्टि से समझने का प्रयास करें। मनोचिकित्सकों के अनुसार परेशान शख्स के अधिकांश भय काल्पनिक होते हैं। यदि आप उन भयों से रूबरू होने का प्रयास करती हैं तो काफी हद तक आपका भय जाता रहता है।
🔷 कारणों पर भी ध्यान देने का प्रयास करें, जिनसे आप प्रसन्न होती हैं। इसी तरह जिन बातों से आप दुखी होती हैं, उन कारणों को भी समझने का प्रयास करें।
🔶 जिन बातों से आपका आत्मविश्वास बढ़ता है, उन बातों को रेखांकित कर उन पर अमल करें।
🔷 किसी बात को लेकर यदि आप असमंजस में पड़ गयी हैं तो इस स्थिति में अपने अंतर्मन की पुकार सुनें।
🔶 सकारात्मक व रचनात्मक सोच रखने वाले लोगों के बीच रहें। ऐसे लोगों के संपर्क में रहने से आपके मन में भी सकारात्मक भाव पनपेंगे।
🔷 जरूरत पडऩे पर दूसरों को सहयोग दें। जब आप किसी शख्स की मदद करती हैं तो इससे आपको भी अहसास होता है कि आपका भी महत्व है।
🔶 अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें। संतुलित पोषक आहार ग्रहण करें। समय पर सोएं और जागें। नियमित रूप से व्यायाम करें। सेहत अच्छी रहने से आप हरेक कार्य को आत्मविश्वास के साथ कर सकती हैं।
🔷 जिन कार्यों में आपकी दिलचस्पी है, उन्हें अंजाम दें। व्यस्त दिनचर्या में से समय निकालकर अपने शौक के लिए भी वक्त निकालना सीखें।
🔶 फुर्सत के लम्हों में सुरुचिपूर्ण या व्यक्तित्व विकास संबंधी पुस्तकें पढ़ें।
🔷 किसी कार्य को सोचने-विचारने के बाद शुरू करें। अपने मन में संकल्प लें कि अमुक कार्य को पूरा करके ही पूर्ण संतुष्ट होंगी।
🔶 क्रोध में आने के बाद किसी को न तो फोन करें और न ही किसी को मैसेज भेजें। कारण, इस दौरान आपकी नकारात्मक भावनाएं दिमाग पर हावी होती हैं। ऐसे में आप अच्छे शब्दों के बारे में सोच ही नहीं सकतीं हैं।
🔷 क्रोध में आने के बाद किसी भी प्रकार की बहस करने से बचें, क्योंकि क्रोध के दौरान बहस करने से आपके सामने कुछ ऐसी बातें आ सकती हैं, जिनके कारण आप हिंसक व्यवहार भी कर सकती हैं।
👉 Each thing is relevant where it belongs
🔶 Prayer, compassion, politeness, charity etc. are all undoubtedly very good things indeed and can readily earn appreciation and admiration of most people, especially those who happen to be right-minded. However good these virtues may be, they cannot yield success all the time because wicked people would hardly ever bother about them and what is more, they may regard such polite people being weak and thus, try to intimidate and exploit them. In such a sorry situation, one may have to resort to handling it tactfully by giving them a taste of their own medicine.
🔷 Each thing is pertinent where it belongs. A lotus flower may stand out in a muddy pond. Even a thorny plant like cactus are of the essence and useful too.
🔶 All the incarnations of God described in Hindu sacred texts have adopted a three-pronged approach of breaking, making and sustaining as and when they were deemed necessary. Even the high and mighty powers like them had to employ all these elements of contradictory nature to accomplish the noble task of salvaging the humanity.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Jivan Devta ki sadhana-aradhana Vangmay 53 Page 8.26
👉 हर चीज अपने स्थान पर उपयोगी है
🔶 प्रार्थना, दया, विनय, भलमनसाहत बहुत अच्छी वस्तु है, इनसे वे लोग सहज ही झुक जाते हैं जिनमें कुछ अधिक मात्रा में सत् गुण मौजूद हैं। परन्तु सब जगह उपर्युक्त तत्वों के आधार पर सफलता नहीं मिल सकती, दुष्ट स्वभाव के लोग इनकी जरा भी परवाह नहीं करते तथा विनय करने वाले को दबा हुआ समझकर और भी अधिक उद्दंडता करते हैं। ऐसी दशा में काँटे से काँटा निकालना पड़ता है, कूटनीति से काम लेना पड़ता है।
🔷 हर चीज अपने स्थान पर उपयोगी है, कमल पुष्प अपने स्थान पर बहुत अच्छा है पर नागफनी का कंटीला पौधा भी निरर्थक नहीं है, उसकी आवश्यकता और उपयोगिता भी साधारण नहीं है।
🔶 हिन्दू धर्म में जितने भी अवतार हुए हैं, उनमें से सभी का कार्यक्रम त्रिगुणात्मक है, लोक संग्रह के लिए उन्होंने तीनों गुणों से युक्त कार्य किए हैं।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन देवता की साधना-वांग्मय 2 पृष्ठ-8.26
🔷 हर चीज अपने स्थान पर उपयोगी है, कमल पुष्प अपने स्थान पर बहुत अच्छा है पर नागफनी का कंटीला पौधा भी निरर्थक नहीं है, उसकी आवश्यकता और उपयोगिता भी साधारण नहीं है।
🔶 हिन्दू धर्म में जितने भी अवतार हुए हैं, उनमें से सभी का कार्यक्रम त्रिगुणात्मक है, लोक संग्रह के लिए उन्होंने तीनों गुणों से युक्त कार्य किए हैं।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन देवता की साधना-वांग्मय 2 पृष्ठ-8.26
शुक्रवार, 16 नवंबर 2018
👉 संदेह के बीज
🔷 एक सहेली ने दूसरी सहेली से पूछा:- बच्चा पैदा होने की खुशी में तुम्हारे पति ने तुम्हें क्या तोहफा दिया? सहेली ने कहा - कुछ भी नहीं! उसने सवाल करते हुए पूछा कि क्या ये अच्छी बात है? क्या उस की नज़र में तुम्हारी कोई कीमत नहीं ?
🔶 लफ्ज़ों का ये ज़हरीला बम गिरा कर वह सहेली दूसरी सहेली को अपनी फिक्र में छोड़कर चलती बनी। थोड़ी देर बाद शाम के वक्त उसका पति घर आया और पत्नी का मुंह लटका हुआ पाया। फिर दोनों में झगड़ा हुआ। एक दूसरे को लानतें भेजी। मारपीट हुई, और आखिर पति पत्नी में तलाक हो गया।
🔷 जानते हैं प्रॉब्लम की शुरुआत कहां से हुई? उस फिजूल जुमले से जो उसका हालचाल जानने आई सहेली ने कहा था।
🔶 रवि ने अपने जिगरी दोस्त आकाश से पूछा:- तुम कहां काम करते हो? आकाश- फला दुकान में।। रवि- कितनी तनख्वाह देता है मालिक? आकाश-18 हजार। रवि-18000 रुपये बस, तुम्हारी जिंदगी कैसे कटती है इतने पैसों में? आकाश- (गहरी सांस खींचते हुए)- बस यार क्या बताऊं।।
🔷 मीटिंग खत्म हुई, कुछ दिनों के बाद आकाश अब अपने काम से बेरूखा हो गया। और तनख्वाह बढ़ाने की डिमांड कर दी। जिसे मालिक ने रद्द कर दिया। आकाश ने जॉब छोड़ दी और बेरोजगार हो गया। पहले उसके पास काम था अब काम नहीं रहा।
🔶 एक साहब ने एक शख्स से कहा जो अपने बेटे से अलग रहता था। तुम्हारा बेटा तुमसे बहुत कम मिलने आता है। क्या उसे तुमसे मोहब्बत नहीं रही? बाप ने कहा बेटा ज्यादा व्यस्त रहता है, उसका काम का शेड्यूल बहुत सख्त है। उसके बीवी बच्चे हैं, उसे बहुत कम वक्त मिलता है।
🔷 पहला आदमी बोला- वाह! यह क्या बात हुई, तुमने उसे पाला-पोसा उसकी हर ख्वाहिश पूरी की, अब उसको बुढ़ापे में व्यस्तता की वजह से मिलने का वक्त नहीं मिलता है। तो यह ना मिलने का बहाना है।
🔶 इस बातचीत के बाद बाप के दिल में बेटे के प्रति शंका पैदा हो गई। बेटा जब भी मिलने आता वो ये ही सोचता रहता कि उसके पास सबके लिए वक्त है सिवाय मेरे।
🔷 याद रखिए जुबान से निकले शब्द दूसरे पर बड़ा गहरा असर डाल देते हैं।। बेशक कुछ लोगों की जुबानों से शैतानी बोल निकलते हैं। हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बहुत से सवाल हमें बहुत मासूम लगते हैं।
🔶 जैसे-
तुमने यह क्यों नहीं खरीदा।
तुम्हारे पास यह क्यों नहीं है।
तुम इस शख्स के साथ पूरी जिंदगी कैसे चल सकती हो।
तुम उसे कैसे मान सकते हो।
वगैरा वगैरा।
🔷 इस तरह के बेमतलबी फिजूल के सवाल नादानी में या बिना मकसद के हम पूछ बैठते हैं।
जबकि हम यह भूल जाते हैं कि हमारे ये सवाल सुनने वाले के दिल में
नफरत या मोहब्बत का कौन सा बीज बो रहे हैं।।
🔶 आज के दौर में हमारे इर्द-गिर्द, समाज या घरों में जो टेंशन टाइट होती जा रही है, उनकी जड़ तक जाया जाए तो अक्सर उसके पीछे किसी और का हाथ होता है।
वो ये नहीं जानते कि नादानी में या जानबूझकर बोले जाने वाले जुमले किसी की ज़िंदगी को तबाह कर सकते हैं।
🔷 ऐसी हवा फैलाने वाले हम ना बनें।
🔶 लोगों के घरों में अंधे बनकर जाओ और वहां से गूंगे बनकर निकलो।।
🔶 लफ्ज़ों का ये ज़हरीला बम गिरा कर वह सहेली दूसरी सहेली को अपनी फिक्र में छोड़कर चलती बनी। थोड़ी देर बाद शाम के वक्त उसका पति घर आया और पत्नी का मुंह लटका हुआ पाया। फिर दोनों में झगड़ा हुआ। एक दूसरे को लानतें भेजी। मारपीट हुई, और आखिर पति पत्नी में तलाक हो गया।
🔷 जानते हैं प्रॉब्लम की शुरुआत कहां से हुई? उस फिजूल जुमले से जो उसका हालचाल जानने आई सहेली ने कहा था।
🔶 रवि ने अपने जिगरी दोस्त आकाश से पूछा:- तुम कहां काम करते हो? आकाश- फला दुकान में।। रवि- कितनी तनख्वाह देता है मालिक? आकाश-18 हजार। रवि-18000 रुपये बस, तुम्हारी जिंदगी कैसे कटती है इतने पैसों में? आकाश- (गहरी सांस खींचते हुए)- बस यार क्या बताऊं।।
🔷 मीटिंग खत्म हुई, कुछ दिनों के बाद आकाश अब अपने काम से बेरूखा हो गया। और तनख्वाह बढ़ाने की डिमांड कर दी। जिसे मालिक ने रद्द कर दिया। आकाश ने जॉब छोड़ दी और बेरोजगार हो गया। पहले उसके पास काम था अब काम नहीं रहा।
🔶 एक साहब ने एक शख्स से कहा जो अपने बेटे से अलग रहता था। तुम्हारा बेटा तुमसे बहुत कम मिलने आता है। क्या उसे तुमसे मोहब्बत नहीं रही? बाप ने कहा बेटा ज्यादा व्यस्त रहता है, उसका काम का शेड्यूल बहुत सख्त है। उसके बीवी बच्चे हैं, उसे बहुत कम वक्त मिलता है।
🔷 पहला आदमी बोला- वाह! यह क्या बात हुई, तुमने उसे पाला-पोसा उसकी हर ख्वाहिश पूरी की, अब उसको बुढ़ापे में व्यस्तता की वजह से मिलने का वक्त नहीं मिलता है। तो यह ना मिलने का बहाना है।
🔶 इस बातचीत के बाद बाप के दिल में बेटे के प्रति शंका पैदा हो गई। बेटा जब भी मिलने आता वो ये ही सोचता रहता कि उसके पास सबके लिए वक्त है सिवाय मेरे।
🔷 याद रखिए जुबान से निकले शब्द दूसरे पर बड़ा गहरा असर डाल देते हैं।। बेशक कुछ लोगों की जुबानों से शैतानी बोल निकलते हैं। हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बहुत से सवाल हमें बहुत मासूम लगते हैं।
🔶 जैसे-
तुमने यह क्यों नहीं खरीदा।
तुम्हारे पास यह क्यों नहीं है।
तुम इस शख्स के साथ पूरी जिंदगी कैसे चल सकती हो।
तुम उसे कैसे मान सकते हो।
वगैरा वगैरा।
🔷 इस तरह के बेमतलबी फिजूल के सवाल नादानी में या बिना मकसद के हम पूछ बैठते हैं।
जबकि हम यह भूल जाते हैं कि हमारे ये सवाल सुनने वाले के दिल में
नफरत या मोहब्बत का कौन सा बीज बो रहे हैं।।
🔶 आज के दौर में हमारे इर्द-गिर्द, समाज या घरों में जो टेंशन टाइट होती जा रही है, उनकी जड़ तक जाया जाए तो अक्सर उसके पीछे किसी और का हाथ होता है।
वो ये नहीं जानते कि नादानी में या जानबूझकर बोले जाने वाले जुमले किसी की ज़िंदगी को तबाह कर सकते हैं।
🔷 ऐसी हवा फैलाने वाले हम ना बनें।
🔶 लोगों के घरों में अंधे बनकर जाओ और वहां से गूंगे बनकर निकलो।।
👉 संस्कार क्या है.....""*
🔷 एक राजा के पास सुन्दर घोड़ी थी। कई बार युद्व में इस घोड़ी ने राजा के प्राण बचाये और घोड़ी राजा के लिए पूरी वफादार थीI कुछ दिनों के बाद इस घोड़ी ने एक बच्चे को जन्म दिया, बच्चा काना पैदा हुआ, पर शरीर हष्ट पुष्ट व सुडौल था।
🔶 बच्चा बड़ा हुआ, बच्चे ने मां से पूछा: मां मैं बहुत बलवान हूँ, पर काना हूँ.... यह कैसे हो गया, इस पर घोड़ी बोली: बेटा जब में गर्भवती थी, तू पेट में था तब राजा ने मेरे ऊपर सवारी करते समय मुझे एक कोड़ा मार दिया, जिसके कारण तू काना हो गया।
🔷 यह बात सुनकर बच्चे को राजा पर गुस्सा आया और मां से बोला: मां मैं इसका बदला लूंगा।
🔶 मां ने कहा राजा ने हमारा पालन-पोषण किया है, तू जो स्वस्थ है....सुन्दर है, उसी के पोषण से तो है, यदि राजा को एक बार गुस्सा आ गया तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हम उसे क्षति पहुचाये, पर उस बच्चे के समझ में कुछ नहीं आया, उसने मन ही मन राजा से बदला लेने की सोच ली।
🔷 एक दिन यह मौका घोड़े को मिल गया राजा उसे युद्व पर ले गया । युद्व लड़ते-लड़ते राजा एक जगह घायल हो गया, घोड़ा उसे तुरन्त उठाकर वापस महल ले आया।
🔶 इस पर घोड़े को ताज्जुब हुआ और मां से पूछा: मां आज राजा से बदला लेने का अच्छा मौका था, पर युद्व के मैदान में बदला लेने का ख्याल ही नहीं आया और न ही ले पाया, मन ने गवारा नहीं किया....इस पर घोडी हंस कर बोली: बेटा तेरे खून में और तेरे संस्कार में धोखा है ही नहीं, तू जानकर तो धोखा दे ही नहीं सकता है।
🔷 तुझ से नमक हरामी हो नहीं सकती, क्योंकि तेरी नस्ल में तेरी मां का ही तो अंश है।
🔶 यह सत्य है कि जैसे हमारे संस्कार होते है, वैसा ही हमारे मन का व्यवहार होता है, हमारे पारिवारिक-संस्कार अवचेतन मस्तिष्क में गहरे बैठ जाते हैं, माता-पिता जिस संस्कार के होते हैं, उनके बच्चे भी उसी संस्कारों को लेकर पैदा होते हैं।
🔷 हमारे कर्म ही 'संस्कार' बनते हैं और संस्कार ही प्रारब्धों का रूप लेते हैं! यदि हम कर्मों को सही व बेहतर दिशा दे दें तो संस्कार अच्छे बनेगें और संस्कार अच्छे बनेंगे तो जो प्रारब्ध का फल बनेगा, वह मीठा व स्वादिष्ट होगा।
🔶 बच्चा बड़ा हुआ, बच्चे ने मां से पूछा: मां मैं बहुत बलवान हूँ, पर काना हूँ.... यह कैसे हो गया, इस पर घोड़ी बोली: बेटा जब में गर्भवती थी, तू पेट में था तब राजा ने मेरे ऊपर सवारी करते समय मुझे एक कोड़ा मार दिया, जिसके कारण तू काना हो गया।
🔷 यह बात सुनकर बच्चे को राजा पर गुस्सा आया और मां से बोला: मां मैं इसका बदला लूंगा।
🔶 मां ने कहा राजा ने हमारा पालन-पोषण किया है, तू जो स्वस्थ है....सुन्दर है, उसी के पोषण से तो है, यदि राजा को एक बार गुस्सा आ गया तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हम उसे क्षति पहुचाये, पर उस बच्चे के समझ में कुछ नहीं आया, उसने मन ही मन राजा से बदला लेने की सोच ली।
🔷 एक दिन यह मौका घोड़े को मिल गया राजा उसे युद्व पर ले गया । युद्व लड़ते-लड़ते राजा एक जगह घायल हो गया, घोड़ा उसे तुरन्त उठाकर वापस महल ले आया।
🔶 इस पर घोड़े को ताज्जुब हुआ और मां से पूछा: मां आज राजा से बदला लेने का अच्छा मौका था, पर युद्व के मैदान में बदला लेने का ख्याल ही नहीं आया और न ही ले पाया, मन ने गवारा नहीं किया....इस पर घोडी हंस कर बोली: बेटा तेरे खून में और तेरे संस्कार में धोखा है ही नहीं, तू जानकर तो धोखा दे ही नहीं सकता है।
🔷 तुझ से नमक हरामी हो नहीं सकती, क्योंकि तेरी नस्ल में तेरी मां का ही तो अंश है।
🔶 यह सत्य है कि जैसे हमारे संस्कार होते है, वैसा ही हमारे मन का व्यवहार होता है, हमारे पारिवारिक-संस्कार अवचेतन मस्तिष्क में गहरे बैठ जाते हैं, माता-पिता जिस संस्कार के होते हैं, उनके बच्चे भी उसी संस्कारों को लेकर पैदा होते हैं।
🔷 हमारे कर्म ही 'संस्कार' बनते हैं और संस्कार ही प्रारब्धों का रूप लेते हैं! यदि हम कर्मों को सही व बेहतर दिशा दे दें तो संस्कार अच्छे बनेगें और संस्कार अच्छे बनेंगे तो जो प्रारब्ध का फल बनेगा, वह मीठा व स्वादिष्ट होगा।
👉 Boredom in serving humanity!?
🔷 “I have done this much, I have gone this far. Why is it only me who should be doing the work of serving people? Others too ought to do their part.” This is the common scenario witnessed among the workers engaged in serving humanity, however, it is utterly erroneous thinking and one should never resort to it. Serving humanity is the need of our soul and it nourishes our soul.
🔶 The core purpose of taking part in the tasks of serving people or helping them is not to make them feel grateful to us or to prove our greatness or to earn fame but, as a matter of fact, to uphold the glory of our soul and to keep nurturing it. Love is the inherent nature of the soul and that love can be expressed through serving humanity. Hence, how can we ever cut ourselves off from serving humanity? Why should we ever get bored of it? How can we ever abandon it?
🔷 Anyone who understands the necessity and importance of serving humanity would never ever get bored of it. And if someone does become bored, he haven’t actually understood the essence of serving humanity.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Dharma tattwa kā darśana aura marma Vangmay 53 Page 6.58
🔶 The core purpose of taking part in the tasks of serving people or helping them is not to make them feel grateful to us or to prove our greatness or to earn fame but, as a matter of fact, to uphold the glory of our soul and to keep nurturing it. Love is the inherent nature of the soul and that love can be expressed through serving humanity. Hence, how can we ever cut ourselves off from serving humanity? Why should we ever get bored of it? How can we ever abandon it?
🔷 Anyone who understands the necessity and importance of serving humanity would never ever get bored of it. And if someone does become bored, he haven’t actually understood the essence of serving humanity.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Dharma tattwa kā darśana aura marma Vangmay 53 Page 6.58
👉 सेवा साधना से ऊब क्यों?
🔷 मैंने इतना तो कर लिया, क्या अब सदा मैं ही करता रहूँगा। दूसरों को सेवा कार्य करना चाहिए। ऐसा सोचना उचित नहीं। सेवा कार्य आत्मा की आवश्यकता का पोषण है।.....
🔶 किसी पर एहसान करने के लिए दूसरों के सहायक और उपकारी बनने के लिए, अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए भी नहीं, यश के लिए भी नहीं, सेवा का प्रयोजन आत्मा की गरिमा को अक्षुण्ण रखने और उसका जीवन साधन जुटाये रखने के लिए है .....आत्मा का स्वभाव है - प्रेम और प्रेम की परिणति है सेवा। उससे छुट्टी कैसी? उससे ऊब क्यों? उसे छोड़ा कैसे जा सकता हैं?
🔷 जो सेवा की आवश्यकता और महत्ता को समझता है। उसे उससे कभी भी ऊब नहीं आती। जो ऊबता हो समझना चाहिए, अभी उसे सेवा का रस नहीं आया।...
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म वांग्मय 532 पृष्ठ-6.58
🔶 किसी पर एहसान करने के लिए दूसरों के सहायक और उपकारी बनने के लिए, अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए भी नहीं, यश के लिए भी नहीं, सेवा का प्रयोजन आत्मा की गरिमा को अक्षुण्ण रखने और उसका जीवन साधन जुटाये रखने के लिए है .....आत्मा का स्वभाव है - प्रेम और प्रेम की परिणति है सेवा। उससे छुट्टी कैसी? उससे ऊब क्यों? उसे छोड़ा कैसे जा सकता हैं?
🔷 जो सेवा की आवश्यकता और महत्ता को समझता है। उसे उससे कभी भी ऊब नहीं आती। जो ऊबता हो समझना चाहिए, अभी उसे सेवा का रस नहीं आया।...
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म वांग्मय 532 पृष्ठ-6.58
गुरुवार, 15 नवंबर 2018
👉 माँ की ममता
🔶 कक्षा 7 की बात है गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। संस्कृत का कालांश चल रहा था। गुरूजी दिवाली की छुट्टियों का कार्य बता रहे थे। तभी शायद किसी शरारती विद्यार्थी के पटाखे से स्कूल के स्टोर रूम में पड़ी दरी और कपड़ो में आग लग गयी।
🔷 देखते ही देखते आग ने भीषण रूप धारण कर लिया। वहां पड़ा सारा फर्निचर भी स्वाहा हो गया। सभी विद्यार्थी पास के घरो से, हेडपम्पों से जो बर्तन हाथ में आया उसी में पानी भर भर कर आग बुझाने लगे।
🔶 आग शांत होने के काफी देर बाद स्टोर रूम में घुसे तो सभी विद्यार्थियों की दृष्टि स्टोर रूम की बालकनी(छज्जे) पर जल कर कोयला बने पक्षी की ओर गयी। पक्षी की मुद्रा देख कर स्पष्ट था कि पक्षी ने उड़ कर अपनी जान बचाने का प्रयास तक नही किया था और वह स्वेच्छा से आग में भस्म हो गया था,
🔷 सभी को बहुत आश्चर्य हुआ। एक विद्यार्थी ने उस जल कर कोयला बने पक्षी को धकेला तो उसके नीचे से तीन नवजात चूजे दिखाई दिए, जो सकुशल थे और चहक रहे थे।
🔶 उन्हें आग से बचाने के लिए पक्षी ने अपने पंखों के नीचे छिपा लिया और अपनी जान देकर अपने चूजों को बचा लिया था।
🔷 एक विद्यार्थी ने संस्कृत वाले गुरूजी से प्रश्न किया - "गुरूजी, इस पक्षी को अपने बच्चो से कितना मोह था, कि इसने अपनी जान तक दे दी ?"
🔶 गुरूजी ने तनिक विचार कर कहा - "नहीं, यह मोह नहीं है अपितु माँ के ममत्व की पराकाष्ठा है, मोह करने वाला ऐसी विकट स्थिति में अपनी जान बचाता और भाग जाता।"
🔷 भगवान ने माँ को ममता दी है और इस दुनिया में माँ की ममता से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
🔷 देखते ही देखते आग ने भीषण रूप धारण कर लिया। वहां पड़ा सारा फर्निचर भी स्वाहा हो गया। सभी विद्यार्थी पास के घरो से, हेडपम्पों से जो बर्तन हाथ में आया उसी में पानी भर भर कर आग बुझाने लगे।
🔶 आग शांत होने के काफी देर बाद स्टोर रूम में घुसे तो सभी विद्यार्थियों की दृष्टि स्टोर रूम की बालकनी(छज्जे) पर जल कर कोयला बने पक्षी की ओर गयी। पक्षी की मुद्रा देख कर स्पष्ट था कि पक्षी ने उड़ कर अपनी जान बचाने का प्रयास तक नही किया था और वह स्वेच्छा से आग में भस्म हो गया था,
🔷 सभी को बहुत आश्चर्य हुआ। एक विद्यार्थी ने उस जल कर कोयला बने पक्षी को धकेला तो उसके नीचे से तीन नवजात चूजे दिखाई दिए, जो सकुशल थे और चहक रहे थे।
🔶 उन्हें आग से बचाने के लिए पक्षी ने अपने पंखों के नीचे छिपा लिया और अपनी जान देकर अपने चूजों को बचा लिया था।
🔷 एक विद्यार्थी ने संस्कृत वाले गुरूजी से प्रश्न किया - "गुरूजी, इस पक्षी को अपने बच्चो से कितना मोह था, कि इसने अपनी जान तक दे दी ?"
🔶 गुरूजी ने तनिक विचार कर कहा - "नहीं, यह मोह नहीं है अपितु माँ के ममत्व की पराकाष्ठा है, मोह करने वाला ऐसी विकट स्थिति में अपनी जान बचाता और भाग जाता।"
🔷 भगवान ने माँ को ममता दी है और इस दुनिया में माँ की ममता से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
👉 नारी का सदैव सम्मान करे
🔶 एक विदेशी महिला स्वामी विवेकानंद के समीप आकर बोली मैं आपस शादी करना चाहती हूं। विवेकानंद बोले क्यों? मुझसे क्यों? क्या आप जानती नहीं की मैं एक सन्यासी हूं? औरत बोली मैं आपके जैसा ही गौरवशाली, सुशील और तेजोमयी पुत्र चाहती हूं और वो वह तब ही संभव होगा। जब आप मुझसे विवाह करेंगे।
🔷 विवेकानंद बोले हमारी शादी तो संभव नहीं है, परन्तु हां एक उपाय है। औरत- क्या? विवेकानंद बोले आज से मैं ही आपका पुत्र बन जाता हूं। आज से आप मेरी मां बन जाओ। आपको मेरे रूप में मेरे जैसा बेटा मिल जाएगा।औरत विवेकानंद के चरणों में गिर गयी और बोली की आप साक्षात् ईश्वर के रूप है। इसे कहते है पुरुष और ये होता है पुरुषार्थ एक सच्चा पुरुष सच्चा मर्द वो ही होता है जो हर नारी के प्रति अपने अन्दर मातृत्व की भावना उत्पन्न कर सके।
📖 स्वामी विवेकानन्द के जीवन के प्रेरक प्रसंग
🔷 विवेकानंद बोले हमारी शादी तो संभव नहीं है, परन्तु हां एक उपाय है। औरत- क्या? विवेकानंद बोले आज से मैं ही आपका पुत्र बन जाता हूं। आज से आप मेरी मां बन जाओ। आपको मेरे रूप में मेरे जैसा बेटा मिल जाएगा।औरत विवेकानंद के चरणों में गिर गयी और बोली की आप साक्षात् ईश्वर के रूप है। इसे कहते है पुरुष और ये होता है पुरुषार्थ एक सच्चा पुरुष सच्चा मर्द वो ही होता है जो हर नारी के प्रति अपने अन्दर मातृत्व की भावना उत्पन्न कर सके।
📖 स्वामी विवेकानन्द के जीवन के प्रेरक प्रसंग
👉 Why society?
🔶 The main difference between man and animal is that man establishes and lives in a society and progresses together through cooperation and mutual support whereas animals mostly live isolated self-contained lives. Animals fulfill their own needs one way or another by themselves or live in groups and jointly defend themselves against predators. This, however, this isn’t good enough to be tagged as living in a society. On the other hand, it is man’s second nature to live in society or have a community spirit. It is absolutely inherent in his nature or his innate instinct.
🔷 The offspring of birds and animals become self-reliable very quickly after their birth and therefore, they forget their intimate connection (blood relation) with their parents. This may one of the underlying factors responsible for the lack of lasting mutual loving and caring feelings amongst them. On the other hand, human beings remain dependent on their parents or guardians for very long after birth which may be one of the main reason for their lasting mutual bond.If we ponder a bit more deeply on this subject, we will understand that the dependence of offspring on their parents or guardians do not end when they become adults but keep existing as have to rely on the society in countless areas in life.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Jivan Devtā kī sādhanā-ārādhana Vangmay 53 Page 2.18
🔷 The offspring of birds and animals become self-reliable very quickly after their birth and therefore, they forget their intimate connection (blood relation) with their parents. This may one of the underlying factors responsible for the lack of lasting mutual loving and caring feelings amongst them. On the other hand, human beings remain dependent on their parents or guardians for very long after birth which may be one of the main reason for their lasting mutual bond.If we ponder a bit more deeply on this subject, we will understand that the dependence of offspring on their parents or guardians do not end when they become adults but keep existing as have to rely on the society in countless areas in life.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Jivan Devtā kī sādhanā-ārādhana Vangmay 53 Page 2.18
👉 मनुष्य सामाजिक प्राणी
🔶 मनुष्य और पशु में एक मुख्य अंतर यही है कि मनुष्य समाज बनाकर सहयोग एवं सहकारिता के आधार पर बढ़ता है तथा पशु एकाकी ही अपना जीवन बीता देते हैं। वे अपनी आवश्यकताएँ भी अपने-अपने ढंग से पूरा कर लेते हैं। अपवाद स्वरूप पशु भी कहीं-कहीं समूह बनाकर रहते हैं और अपने शत्रुओं का सामूहिक रूप से मुकाबला करते हैं। लेकिन उस समूह को समाज की संज्ञा नहीं दी जा सकती जबकि सामाजिकता मनुष्य के स्वभाव का अगं है। मनुष्य का समाज बनाकर रहना पूर्णत: स्वाभाविक और प्रकृति प्रदत्त नियति है।
🔷 पशु-पक्षियों में परस्पर प्रेमपूर्ण भावनाओं - सम्बन्धों का अभाव इसीलिए रहता है कि उनके बच्चे जल्द स्वावलंबी होने के कारण अपना जन्म सम्बन्ध भूल जाते हैं।मनुष्यों में परस्पर सम्बन्ध बना रहने का एक मुख्य कारण यह है की वह जन्म के बाद भी काफी समय अपने अभिभावकों पर निर्भर रहता है। अधिक गंभीरता से देखा जाय तो मनुष्य की निर्भरता वयस्क होने तक ही समाप्त नहीं हो जाती वरन् उसे जीवन भर कई विषयों में समाज पर निर्भर रहना पड़ता है।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन देवता की साधना-आराधना वांग्मय 2 पृष्ठ-2.18
🔷 पशु-पक्षियों में परस्पर प्रेमपूर्ण भावनाओं - सम्बन्धों का अभाव इसीलिए रहता है कि उनके बच्चे जल्द स्वावलंबी होने के कारण अपना जन्म सम्बन्ध भूल जाते हैं।मनुष्यों में परस्पर सम्बन्ध बना रहने का एक मुख्य कारण यह है की वह जन्म के बाद भी काफी समय अपने अभिभावकों पर निर्भर रहता है। अधिक गंभीरता से देखा जाय तो मनुष्य की निर्भरता वयस्क होने तक ही समाप्त नहीं हो जाती वरन् उसे जीवन भर कई विषयों में समाज पर निर्भर रहना पड़ता है।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन देवता की साधना-आराधना वांग्मय 2 पृष्ठ-2.18
बुधवार, 14 नवंबर 2018
👉 साधना- अपने आपे को साधना (अन्तिम भाग)
🔷 घरेलू उपयोग में आने वाले जानवर भी बिना सिखाये, सधाये अपना काम ठीक तरह कहाँ कर पाते हैं। बछड़ा युवा हो जाने पर भी अपनी मर्जी से हल, गाड़ी आदि में चल नहीं पाता। घोड़े की पीठ पर सवारी करना, उसे दुरकी चाल चलाना सहज ही संभव नहीं होता। ऊँटगाड़ी, ताँगा, बैलगाड़ी में जुतने वाले पशु अपने आप चलने नहीं लग जाते उन्हें कठिनाई से प्यार, फटकार के सहारे—धीरे−धीरे बहुत दिन में इस योग्य बनाया जाता है कि अपना काम ठीक तरह अंजाम देने लगें। साधना इसी का नाम है। इन्द्रियों के समूह को—मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के अन्तःकरण चतुष्टय को वन्य पशुओं से समकक्ष गिना जा सकता है।
🔶 अपने स्वाभाविक रूप में यह सारा ही चेतना परिवार उच्छृंखल होता है। जन्म−जन्मान्तरों के पाशविक कुसंस्कारों की मोटी परत उस पर जमा होती है। उसे उतारने के लिए जिस खराद का उपयोग किया जाता है उसे साधना कह सकते हैं। पशुता को परिष्कृत करके उसे मनुष्यता के—देवत्व के रूप में विकसित करना, अनगढ़ पत्थर को कलात्मक प्रतिमा के रूप में गढ़ देने के सदृश एक विशिष्ट कौशल है। इस प्रवीणता में पारंगत होने का नाम ही आत्म−साधना है। पशुओं को प्रशिक्षित करने और पत्थर से मूर्तियाँ बनाने की तरह कार्य कुछ कठिन तो है—पर है ऐसा जिसमें लाभ ही लाभ भरा पड़ा है।
🔷 कठपुतली नचाने वाले, हाथ की सफाई से बाजीगरी के कौतुक दिखाने वाले, बन्दर और रीछ का तमाशा करने वाले, जादूगर जैसे लगते हैं और उन्हें चमत्कारी समझा जाता है। यह चमत्कार और कुछ नहीं किसी विशेष दिशा में तन्मयतापूर्वक धैर्य और उत्साह के साथ लगे रहने का प्रतिफल मात्र है। ऐसा चमत्कार कौतूहल प्रदर्शन से लेकर किसी भी साधारण असाधारण कार्य में आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त करने के रूप में कभी भी, कहीं भी देखा जा सकता है।
🔶 अपनी ईश्वर प्रदत्त विशेषताओं को उभारने और महत्वपूर्ण प्रयोजन में नियुक्त करने का नाम साधना है। साधना का परिणाम सिद्धि के रूप में सामने आता है। यह नितान्त स्वाभाविक और सुनिश्चित है। यदि अपने आपे को साधा जाय−व्यक्तित्व को खरादा जाय तो वह सब कुछ प्रचुर परिमाण में अपने ही घर पाया जा सकता है, जिसकी तलाश में जहाँ-तहाँ मारे−मारे फिरना और मृग−तृष्णा की तरह निराश भटकना पड़ता है।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 15
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.15
🔶 अपने स्वाभाविक रूप में यह सारा ही चेतना परिवार उच्छृंखल होता है। जन्म−जन्मान्तरों के पाशविक कुसंस्कारों की मोटी परत उस पर जमा होती है। उसे उतारने के लिए जिस खराद का उपयोग किया जाता है उसे साधना कह सकते हैं। पशुता को परिष्कृत करके उसे मनुष्यता के—देवत्व के रूप में विकसित करना, अनगढ़ पत्थर को कलात्मक प्रतिमा के रूप में गढ़ देने के सदृश एक विशिष्ट कौशल है। इस प्रवीणता में पारंगत होने का नाम ही आत्म−साधना है। पशुओं को प्रशिक्षित करने और पत्थर से मूर्तियाँ बनाने की तरह कार्य कुछ कठिन तो है—पर है ऐसा जिसमें लाभ ही लाभ भरा पड़ा है।
🔷 कठपुतली नचाने वाले, हाथ की सफाई से बाजीगरी के कौतुक दिखाने वाले, बन्दर और रीछ का तमाशा करने वाले, जादूगर जैसे लगते हैं और उन्हें चमत्कारी समझा जाता है। यह चमत्कार और कुछ नहीं किसी विशेष दिशा में तन्मयतापूर्वक धैर्य और उत्साह के साथ लगे रहने का प्रतिफल मात्र है। ऐसा चमत्कार कौतूहल प्रदर्शन से लेकर किसी भी साधारण असाधारण कार्य में आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त करने के रूप में कभी भी, कहीं भी देखा जा सकता है।
🔶 अपनी ईश्वर प्रदत्त विशेषताओं को उभारने और महत्वपूर्ण प्रयोजन में नियुक्त करने का नाम साधना है। साधना का परिणाम सिद्धि के रूप में सामने आता है। यह नितान्त स्वाभाविक और सुनिश्चित है। यदि अपने आपे को साधा जाय−व्यक्तित्व को खरादा जाय तो वह सब कुछ प्रचुर परिमाण में अपने ही घर पाया जा सकता है, जिसकी तलाश में जहाँ-तहाँ मारे−मारे फिरना और मृग−तृष्णा की तरह निराश भटकना पड़ता है।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 15
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.15
👉 Positivity in, Negativity out
🔷 To be alive is to live each moment to the fullest, with great enthusiasm and zest.
🔶 Start each day like it’s a new life, a new birth and all day long live each breath like a yogi, do not allow even a speck of negativity to enter.
🔷 Let there be hope, hope and nothing but hope in your thoughts.
🔶 Resolve to adopt such a positive and optimistic attitude at the very beginning of a year, or even now and follow it through, you will soon scale the summit of success.
-Pt. Shriram Sharma Acharya
🔶 Start each day like it’s a new life, a new birth and all day long live each breath like a yogi, do not allow even a speck of negativity to enter.
🔷 Let there be hope, hope and nothing but hope in your thoughts.
🔶 Resolve to adopt such a positive and optimistic attitude at the very beginning of a year, or even now and follow it through, you will soon scale the summit of success.
-Pt. Shriram Sharma Acharya
👉 सकारात्मकता
🔷 जीवन हर पल जीने, उत्साह-उमंग के साथ उसे अनुभव करने का नाम है। हर दिन का शुभारम्भ उत्साह के साथ ऐसे हो, जैसे नया जन्म हुआ हो, दिनभर, हर श्वास योगी की तरह जियो, जरा भी नकारात्मकता प्रविष्ट मत होने दो। सकारात्मक, सकारात्मक मात्र सकारात्मक। यही तुम्हारा चिंतन हो। यह चिंतन यदि वर्ष के शुभारम्भ से ही अपनाने का संकल्प ले लो तो तुम्हे सफलताओं के शीर्ष तक पहुँचने में ज्यादा विलम्ब न होगा।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
सोमवार, 12 नवंबर 2018
👉 बडा हुआ तो क्या हुआ……
🔶 एक शेर अपनी शेरनी और दो शावकों के साथ वन मे रहता था। शिकार मारकर घर लेकर आता और सभी मिलकर उस शिकार को खाते। एक बार शेर को पूरा दिन कोई शिकार नही मिला, वह वापस अपनी गुफा के लिए शाम को लौट रहा था तो उसे रास्ते मे एक गीदड का छोटा सा बच्चा दिखा। इतने छोटे बच्चे को देखकर शेर को दया आ गई। उसे मारने के बजाए वह अपने दांतो से हल्के पकड कर गुफा मे ले आया। गुफा मे पहुँचा तो शेरनी को बहुत तेज भूख लग रही थी, किन्तु उसे भी इस छोटे से बच्चे पर दया आ गई और शेरनी ने उसे अपने ही पास रख लिया। अपने दोनों बच्चो के साथ उसे भी पालने लगी। तीनों बच्चे साथ साथ खेलते कूदते बड़े होने लगे। शेर के बच्चो को ये नही पता था की हमारे साथ यह बच्चा गीदड है। वे उसे भी अपने जैसा शेर ही समझने लगे। गीदड का बच्चा शेर के बच्चो से उम्र मे बड़ा था, वह भी स्वयं को शेर और दोनो का बडा भाई समझने लगा। दोनों बच्चे उसका बहुत आदर किया करते थे।
🔷 एक दिन जब तीनों जंगल मे घूम रहे तो अचानक उन के सामने एक हाथी आया। शेर के बच्चे हाथी को देखकर गरज कर उस पर कूदने को ही थे कि एकाएक गीदड बोला, “यह हाथी है हम शेरो का कट्टर दुश्मन इससे उलझना ठीक नही है, चलो यहाँ से भाग चलते है” यह कहते हुए गीदड अपनी दुम दबाकर भागा। शेर के बच्चे भी उसके आदेश के कारण एक दूसरे का मुँह देखते हुए उसके पीछे चल दिए। घर पहुँचकर दोनों ने हँसते हुए अपने बड़े भाई की कायरता की कहानी माँ और पिता को बताई, की हाथी को देखकर बड़े भय्या तो ऐसे भागे जैसे आसमान सर पर गिरा हो और ठहाका मारने लगे। दूसरे ने हँसी मे शामिल होते हुए कहा यह तमाशा तो हमने पहली बार देखा है शेर और शेरनी मुस्कराने लगे गीदड को बहुत बुरा लगा की सभी उसकी हँसी उड़ा रहे है। क्रोध से उसकी आँखें लाल हो गई और वह उफनते हुए दोनों शेर के बच्चों को कहा, “तुम दोनों अपने बड़े भाई की हँसी उड़ा रहे हो तुम अपने आप को समझते क्या हो?”
🔶 शेरनी ने जब देखा की बात लड़ाई पर आ गई है तो गीदड को एक और ले जाकर समझाने लगी बेटे ये तुम्हारे छोटे भाई है। इनपर इस तरह क्रोध करना ठीक नही है। गीदड बोला, “वीरता और समझदारी में मै इनसे क्या कम हूँ जो ये मेरी हँसी उड़ा रहे है” गीदड अपने को शेर समझकर बोले जा रहा था। आखिर मे शेरनी ने सोचा की इसे असली बात बतानी ही पड़ेगी, वर्ना ये बेचारा फालतू मे ही मारा जाएगा। उसने गीदड को बोला, “मैं जानती हूँ बेटा तुम वीर हो, सुंदर हो, समझदार भी हो लेकिन तुम जिस कुल मे जन्मे हो, उससे हाथी नही मारे जाते है। तुम गीदड हो। हमने तुम पर दया कर अपने बच्चे की तरह पाला। इसके पहले की तुम्हारी हकीकत उन्हें पता चले यहाँ से भाग जाओ नही तो ये तुम्हें दो मिनट भी जिंदा नही छोड़ेंगे।” यह सुनकर गीदड बहुत डर गया और उसी समय शेरनी से विदा लेकर वहाँ से भाग गया ॥
🔷 स्वभाव का अपना महत्व है। विचारधारा अपना प्रभाव दिखाती ही है। स्वभाव की अपनी नियति नियत है।
🔷 एक दिन जब तीनों जंगल मे घूम रहे तो अचानक उन के सामने एक हाथी आया। शेर के बच्चे हाथी को देखकर गरज कर उस पर कूदने को ही थे कि एकाएक गीदड बोला, “यह हाथी है हम शेरो का कट्टर दुश्मन इससे उलझना ठीक नही है, चलो यहाँ से भाग चलते है” यह कहते हुए गीदड अपनी दुम दबाकर भागा। शेर के बच्चे भी उसके आदेश के कारण एक दूसरे का मुँह देखते हुए उसके पीछे चल दिए। घर पहुँचकर दोनों ने हँसते हुए अपने बड़े भाई की कायरता की कहानी माँ और पिता को बताई, की हाथी को देखकर बड़े भय्या तो ऐसे भागे जैसे आसमान सर पर गिरा हो और ठहाका मारने लगे। दूसरे ने हँसी मे शामिल होते हुए कहा यह तमाशा तो हमने पहली बार देखा है शेर और शेरनी मुस्कराने लगे गीदड को बहुत बुरा लगा की सभी उसकी हँसी उड़ा रहे है। क्रोध से उसकी आँखें लाल हो गई और वह उफनते हुए दोनों शेर के बच्चों को कहा, “तुम दोनों अपने बड़े भाई की हँसी उड़ा रहे हो तुम अपने आप को समझते क्या हो?”
🔶 शेरनी ने जब देखा की बात लड़ाई पर आ गई है तो गीदड को एक और ले जाकर समझाने लगी बेटे ये तुम्हारे छोटे भाई है। इनपर इस तरह क्रोध करना ठीक नही है। गीदड बोला, “वीरता और समझदारी में मै इनसे क्या कम हूँ जो ये मेरी हँसी उड़ा रहे है” गीदड अपने को शेर समझकर बोले जा रहा था। आखिर मे शेरनी ने सोचा की इसे असली बात बतानी ही पड़ेगी, वर्ना ये बेचारा फालतू मे ही मारा जाएगा। उसने गीदड को बोला, “मैं जानती हूँ बेटा तुम वीर हो, सुंदर हो, समझदार भी हो लेकिन तुम जिस कुल मे जन्मे हो, उससे हाथी नही मारे जाते है। तुम गीदड हो। हमने तुम पर दया कर अपने बच्चे की तरह पाला। इसके पहले की तुम्हारी हकीकत उन्हें पता चले यहाँ से भाग जाओ नही तो ये तुम्हें दो मिनट भी जिंदा नही छोड़ेंगे।” यह सुनकर गीदड बहुत डर गया और उसी समय शेरनी से विदा लेकर वहाँ से भाग गया ॥
🔷 स्वभाव का अपना महत्व है। विचारधारा अपना प्रभाव दिखाती ही है। स्वभाव की अपनी नियति नियत है।
👉 साधना- अपने आपे को साधना (भाग 7)
🔶 सधाने से सामान्य स्तर के प्राणी आश्चर्यजनक कार्य करके दिखाते हैं। बन गये मनुष्य को पास भी नहीं आने देतीं ओर खेतों को उजाड़ कर रख जाती हैं, पर जब वे पालतू हो जाती हैं तो दूध, बछड़े गोबर आदि बहुत कुछ देती हैं। स्वयं सुखी रहती है और उसके पालने वाले भी लाभान्वित होते हैं यही बात अन्य वन्य पशुओं के बारे में लागू होती है। जंगली घोड़े, कुत्ते, सुअर, हाथी आदि स्वयं भूखे मरते, कष्ट उठाते और अनिश्चित जीवन जीते हैं। फालतू बन जाने पर वे स्वयं निश्चिन्ततापूर्वक रहते हैं और अपने पालने वालों को लाभ पहुँचाते हैं। अपने भीतर शरीर तथा मन− क्षेत्र में एक से एक बढ़कर शक्तिशाली धाराएँ प्रवाहित होती हैं।
🔷 वे निरुद्देश्य और अनियन्त्रित स्थिति में रहकर वन्य पशुओं जैसी असंगत बनी रहती हैं। फलतः विकृत होकर वे सड़ी दुर्गन्ध की तरह अपने समूचे प्रभाव क्षेत्र को विषैला बना देती हैं। आग जहाँ भी रहती है वहीं जलाती है, तेजाब की बोतल जहाँ भी फैलती है वहीं गलाती है। विकृत प्रवृत्तियाँ छितराई हुई आग और फूटी तेजाब की बोतल की तरह हैं, उनसे केवल विनाश ही सम्भव होता है। यह दोनों ही वस्तुएँ यदि सुनियोजित रखी जा सकें तो उनसे उपयोगी लाभ मिलते हैं और वे इतने बढ़े−बढ़े होते हैं कि सामान्य दीखने वाला मनुष्य पग−पग पर अपनी असामान्य स्थिति का परिचय देता है। साधना जीवन के बहिरंग और अन्तरंग क्षेत्रों में सुसंस्कारित सुव्यवस्था उत्पन्न करने का नाम है। इसे समझ पाने और कर पाने का प्रतिफल, जंगली जानवरों को पकड़ कर पालतू बनाने की कला में प्रवीण व्यवसाइयों जैसा ही प्राप्त होता।
🔶 सरकस के जानवर कितने आश्चर्यजनक करतब दिखाते हैं। देखने वाले बाग−बाग हो उठते हैं। इन बंधे जानवरों को प्रशंसा मिलती है—प्रतिष्ठा होती है और अच्छी खुराक मिलती है। सधाने वाले और सिखाने वालों को अच्छा वेतन मिलता है और सरकस के मालिकों को उन्हीं जानवरों के सहारे धनवान बनने का अवसर मिलता है जो उच्छृंखल होने की स्थिति में स्वयं असन्तुष्ट रहते और दूसरों को रुष्ट करते थे।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 15
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.15
🔷 वे निरुद्देश्य और अनियन्त्रित स्थिति में रहकर वन्य पशुओं जैसी असंगत बनी रहती हैं। फलतः विकृत होकर वे सड़ी दुर्गन्ध की तरह अपने समूचे प्रभाव क्षेत्र को विषैला बना देती हैं। आग जहाँ भी रहती है वहीं जलाती है, तेजाब की बोतल जहाँ भी फैलती है वहीं गलाती है। विकृत प्रवृत्तियाँ छितराई हुई आग और फूटी तेजाब की बोतल की तरह हैं, उनसे केवल विनाश ही सम्भव होता है। यह दोनों ही वस्तुएँ यदि सुनियोजित रखी जा सकें तो उनसे उपयोगी लाभ मिलते हैं और वे इतने बढ़े−बढ़े होते हैं कि सामान्य दीखने वाला मनुष्य पग−पग पर अपनी असामान्य स्थिति का परिचय देता है। साधना जीवन के बहिरंग और अन्तरंग क्षेत्रों में सुसंस्कारित सुव्यवस्था उत्पन्न करने का नाम है। इसे समझ पाने और कर पाने का प्रतिफल, जंगली जानवरों को पकड़ कर पालतू बनाने की कला में प्रवीण व्यवसाइयों जैसा ही प्राप्त होता।
🔶 सरकस के जानवर कितने आश्चर्यजनक करतब दिखाते हैं। देखने वाले बाग−बाग हो उठते हैं। इन बंधे जानवरों को प्रशंसा मिलती है—प्रतिष्ठा होती है और अच्छी खुराक मिलती है। सधाने वाले और सिखाने वालों को अच्छा वेतन मिलता है और सरकस के मालिकों को उन्हीं जानवरों के सहारे धनवान बनने का अवसर मिलता है जो उच्छृंखल होने की स्थिति में स्वयं असन्तुष्ट रहते और दूसरों को रुष्ट करते थे।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 15
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.15
👉 Just make not break too
🔶 Secret to good gardening lies not only in nourishing the plants but also in pruning the weeds. Plants need to be cared after, given nourishments, yes but the weeds need to be trimmed too. Only then the dream of a beautiful garden can be realized.
🔷 In much the same way, secret of self-progress lies in not only constructive activities like reading, contemplation, pious company, religious observances but also in performing corrective actions necessary for self reform. For the eradication of negative imprints and inferior traits we need to undergo the arduous penance of introspection and self-reform.
🔶 For progress and reform it is necessary to adopt a balanced approach that does justice to both aspects of the process. It was the vile side effect, of our extremist, inappropriately lax and one-sided religiousness that India had to suffer the curse of long political enslavement, which lasted for a thousand years.
🔷 Yes we must foster that which is good and noble, but the eradication of what is bad and vile is our pious duty too. Only if we fully understand and appreciate this eternal truth, can each one of us uphold justice and strike down injustice like it was done in the days of yore.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Dharma Tattva kā darśan aura marma Vangmay 53 Page 1.35
🔷 In much the same way, secret of self-progress lies in not only constructive activities like reading, contemplation, pious company, religious observances but also in performing corrective actions necessary for self reform. For the eradication of negative imprints and inferior traits we need to undergo the arduous penance of introspection and self-reform.
🔶 For progress and reform it is necessary to adopt a balanced approach that does justice to both aspects of the process. It was the vile side effect, of our extremist, inappropriately lax and one-sided religiousness that India had to suffer the curse of long political enslavement, which lasted for a thousand years.
🔷 Yes we must foster that which is good and noble, but the eradication of what is bad and vile is our pious duty too. Only if we fully understand and appreciate this eternal truth, can each one of us uphold justice and strike down injustice like it was done in the days of yore.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Dharma Tattva kā darśan aura marma Vangmay 53 Page 1.35
👉 धर्म की स्थापना ही नहीं, अधर्म की अवहेलना भी
🔶 जिस प्रकार माली को पौधों में खाद-पानी लगाना पड़ता है साथ ही बेढंगी टहनियों की काट-छाँट तथा समीपवर्ती खर-पतवार को भी उखाड़ना पड़ता है तभी सुन्दर बाग का सपना साकार होता है, उसी प्रकार आत्मोन्नति के लिए जहाँ स्वाध्याय, सत्संग, धर्मानुष्ठान आदि करने पड़ते हैं, वहाँ कुसंस्कारों और दुष्प्रवृत्तियों के निराकरण के लिए आत्मशोधन की प्रताड़ना तपश्चर्या भी अपनानी होती है। प्रगति और परिष्कार के लिए सृजन और उन्मूलन की उभयपक्षीय प्रक्रिया अपनानी होती है।
🔷 अतिवादी, उदारपक्षी, एकांगी धार्मिकता का ही दुष्परिणाम था जो हजार वर्ष की लम्बी राजनैतिक गुलामी के रूप में अपने देश को अभिशाप की तरह भुगतना पड़ा। सज्जनता का परिपोषण जितना आवश्यक है उतना ही दुष्टता का उन्मूलन भी परम पवित्र मानवीय कर्त्तव्य हैं। यदि वह सनातन सत्य ठीक तरह समझा जा सके तो प्राचीनकाल की तरह आज भी हर व्यक्ति को न्याय के औचित्य का पोषण और अन्याय के का निराकरण को सकता है।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म वांग्मय 53 पृष्ठ-1.35
🔷 अतिवादी, उदारपक्षी, एकांगी धार्मिकता का ही दुष्परिणाम था जो हजार वर्ष की लम्बी राजनैतिक गुलामी के रूप में अपने देश को अभिशाप की तरह भुगतना पड़ा। सज्जनता का परिपोषण जितना आवश्यक है उतना ही दुष्टता का उन्मूलन भी परम पवित्र मानवीय कर्त्तव्य हैं। यदि वह सनातन सत्य ठीक तरह समझा जा सके तो प्राचीनकाल की तरह आज भी हर व्यक्ति को न्याय के औचित्य का पोषण और अन्याय के का निराकरण को सकता है।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म वांग्मय 53 पृष्ठ-1.35
शनिवार, 10 नवंबर 2018
👉 साधना- अपने आपे को साधना (भाग 6)
🔷 शरीर को जीवित और सुसंचालित रखने के लिए दो कार्य आवश्यक हैं एक भोजन, दूसरा भय त्याग। इनमें से एक की भी उपेक्षा नहीं हो सकती। भोजन न किया जाय तो पोषण के लिए नितान्त आवश्यक रस रक्त की नई उत्पत्ति न होना और पुराने संचित रक्त की पूँजी समाप्त होते ही काया दुर्बल होकर मृत्यु के मुख में चली जायगी। इसी प्रकार मल त्याग न करने पर नित्य उत्पन्न होते रहने वाले विष जमा होते और बढ़ते चले जायेंगे और उनका विस्फोट अनेक उपद्रवों के रूप में प्रकट होकर कष्टकारक मृत्यु का आधार बनेगा।
🔶 पञ्च भौतिक शरीर की तरह सूक्ष्म शरीर की दिव्य−चेतना की भी कुछ आवश्यकताएँ हैं। उसे भी भूख लगती है। उस पर भी मैल चढ़ते हैं और सफाई की आवश्यकता पड़ती है, इन दोनों प्रयोजनों को पूरी करने वाली प्रक्रिया साधन कही जाती है। उससे सत्प्रवृत्तियों को जगाकर वह सब उगाया, पकाया जा सकता है जिससे आत्मा की भूख बुझती है और जीवन भूमि में हरी−भरी फसल लहलहाती है। साधना से उन मलीनताओं का—मनोविकारों का निष्कासन होता है जो प्रगति के हर क्षेत्र में चट्टान बनकर अड़े रहते हैं और पग−पग पर व्यवधान उत्पन्न करते हैं।
🔷 साबुन और पानी से कपड़ा धोया जाता है और धूप में सुखा देने पर वह भकाभक दीखने लगता है। उसे पहनने वाला स्वयं गौरवान्वित होता है और देखने वालों को उस सुरुचि पर प्रसन्नता होती है। साधन में प्रयुक्त होने वाली आत्म−शोधन और आत्म−निर्माण की उभय−पक्षीय प्रक्रिया अन्तःक्षेत्र में धँसे−फँसे कुसंस्कारों को उखाड़ कर उनकी जगह आम्र वृक्ष लगती है। कँटीली झाड़ियों से पिण्ड छुड़ाने और स्वादिष्ट फल सम्पदा से लाभान्वित होने का दुहरा लाभ मिलता है।
🔶 संसार में जितने भी चमत्कारी देवता जाने माने गये हैं, उन सबसे बढ़कर आत्म देव है। उसकी साधना प्रत्यक्ष है। नकद धर्म की तरह उसकी उपासना कभी भी—किसी की भी—निष्फल नहीं जाती। यदि उद्देश्य समझते हुए सही दृष्टिकोण अपनाया जा सके और विधिवत् साधना की जा सके तो जीवन साधना को अमृत, पारस और कल्प−वृक्ष की कामधेनु की सार्थक उपमा दी जा सकती है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.14
🔶 पञ्च भौतिक शरीर की तरह सूक्ष्म शरीर की दिव्य−चेतना की भी कुछ आवश्यकताएँ हैं। उसे भी भूख लगती है। उस पर भी मैल चढ़ते हैं और सफाई की आवश्यकता पड़ती है, इन दोनों प्रयोजनों को पूरी करने वाली प्रक्रिया साधन कही जाती है। उससे सत्प्रवृत्तियों को जगाकर वह सब उगाया, पकाया जा सकता है जिससे आत्मा की भूख बुझती है और जीवन भूमि में हरी−भरी फसल लहलहाती है। साधना से उन मलीनताओं का—मनोविकारों का निष्कासन होता है जो प्रगति के हर क्षेत्र में चट्टान बनकर अड़े रहते हैं और पग−पग पर व्यवधान उत्पन्न करते हैं।
🔷 साबुन और पानी से कपड़ा धोया जाता है और धूप में सुखा देने पर वह भकाभक दीखने लगता है। उसे पहनने वाला स्वयं गौरवान्वित होता है और देखने वालों को उस सुरुचि पर प्रसन्नता होती है। साधन में प्रयुक्त होने वाली आत्म−शोधन और आत्म−निर्माण की उभय−पक्षीय प्रक्रिया अन्तःक्षेत्र में धँसे−फँसे कुसंस्कारों को उखाड़ कर उनकी जगह आम्र वृक्ष लगती है। कँटीली झाड़ियों से पिण्ड छुड़ाने और स्वादिष्ट फल सम्पदा से लाभान्वित होने का दुहरा लाभ मिलता है।
🔶 संसार में जितने भी चमत्कारी देवता जाने माने गये हैं, उन सबसे बढ़कर आत्म देव है। उसकी साधना प्रत्यक्ष है। नकद धर्म की तरह उसकी उपासना कभी भी—किसी की भी—निष्फल नहीं जाती। यदि उद्देश्य समझते हुए सही दृष्टिकोण अपनाया जा सके और विधिवत् साधना की जा सके तो जीवन साधना को अमृत, पारस और कल्प−वृक्ष की कामधेनु की सार्थक उपमा दी जा सकती है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.14
👉 Who creates problems?
🔷 A spider spins its own web and remains entangled in it. At some point it starts to think that its web is its confinement and laments being trapped in it. However, when it realizes the root of the problem, it dismantles the web which it created, gulps down the threads and sets itself free. As a result, the spider experiences the joy of freedom by removing all the barriers responsible for its miseries.
🔶 In the same way, every individual creates his own cocoon, his own little world. He alone creates this world with no outside interferences and influences. The hindering and facilitating circumstances imposed by the outside world, they are just temporary and keep appearing and disappearing like the ebb and flow of the tide.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Jivan Devta ki sadhana-aradhana 2:3.1
🔶 In the same way, every individual creates his own cocoon, his own little world. He alone creates this world with no outside interferences and influences. The hindering and facilitating circumstances imposed by the outside world, they are just temporary and keep appearing and disappearing like the ebb and flow of the tide.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Jivan Devta ki sadhana-aradhana 2:3.1
👉 झूठे मित्र
🔷 एक खरगोश बहुत भला था। उसने बहुत से जानवरों से मित्रता की और आशा की कि वक्त पड़ने पर मेरे काम आवेंगे। एक दिन शिकारी कुत्तों ने उसका पीछा किया। वह दौड़ा हुआ गाय के पास पहुँचा और कहा—आप हमारे मित्र हैं, कृपाकर अपने पैने सींगों से इन कुत्तों को मार दीजिए। गाय ने उपेक्षा से कहा—मेरा घर जाने का समय हो गया। बच्चे इन्तजार कर रहे होंगे, अब मैं ठहर नहीं सकती।
🔶 तब वह घोड़े के पास पहुँचा और कहा—मित्र घोड़े! मुझे अपनी पीठ पर बिठाकर इन कुत्तों से बचा दो। घोड़े ने कहा—मैं बैठना भूल गया हूँ, तुम मेरी ऊँची पीठ पर चढ़ कैसे पाओगे? अब वह गधे के पास पहुँचा और कहा—भाई, मैं मुसीबत में हूँ, तुम दुलत्ती झाड़ने में प्रसिद्ध हो इन कुत्तों को लातें मारकर भगा दो। गधे ने कहा—घर पहुँचने में देरी हो जाने से मेरा मालिक मुझे मारेगा। अब तो मैं घर जा रहा हूँ। यह काम किसी फुरसत के वक्त करा लेना।
🔷 अब वह बकरी के पास पहुँचा और और उससे भी वही प्रार्थना की। बकरी ने कहा—जल्दी भाग यहाँ से, तेरे साथ मैं भी मुसीबत में फँस जाऊँगी। तब खरगोश ने समझा कि दूसरों का आसरा तकने से नहीं अपने बल बूते से ही अपनी मुसीबत पार होती है। तब वह पूरी तेजी से दौड़ा और एक घनी झाड़ी में छिपकर अपने प्राण बचाए।
🔶 अक्सर झूठे मित्र कुसमय आने पर साथ छोड़ बैठते हैं। दूसरों पर निर्भर रहने में खतरा है, अपने बलबूते ही अपनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1964 पृष्ठ 21
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/October/v1.21
🔶 तब वह घोड़े के पास पहुँचा और कहा—मित्र घोड़े! मुझे अपनी पीठ पर बिठाकर इन कुत्तों से बचा दो। घोड़े ने कहा—मैं बैठना भूल गया हूँ, तुम मेरी ऊँची पीठ पर चढ़ कैसे पाओगे? अब वह गधे के पास पहुँचा और कहा—भाई, मैं मुसीबत में हूँ, तुम दुलत्ती झाड़ने में प्रसिद्ध हो इन कुत्तों को लातें मारकर भगा दो। गधे ने कहा—घर पहुँचने में देरी हो जाने से मेरा मालिक मुझे मारेगा। अब तो मैं घर जा रहा हूँ। यह काम किसी फुरसत के वक्त करा लेना।
🔷 अब वह बकरी के पास पहुँचा और और उससे भी वही प्रार्थना की। बकरी ने कहा—जल्दी भाग यहाँ से, तेरे साथ मैं भी मुसीबत में फँस जाऊँगी। तब खरगोश ने समझा कि दूसरों का आसरा तकने से नहीं अपने बल बूते से ही अपनी मुसीबत पार होती है। तब वह पूरी तेजी से दौड़ा और एक घनी झाड़ी में छिपकर अपने प्राण बचाए।
🔶 अक्सर झूठे मित्र कुसमय आने पर साथ छोड़ बैठते हैं। दूसरों पर निर्भर रहने में खतरा है, अपने बलबूते ही अपनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1964 पृष्ठ 21
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/October/v1.21
शुक्रवार, 9 नवंबर 2018
👉 Sanyasi Kon...?? संन्यासी कौन..?
🔷 उन दिनों विवेकानन्द भारत भ्रमण के लिये निकले हुए थे! इसी क्रम में घुमते हए एक दिन हाथरस पहुँचे! भूख और थकान से उनकी विचित्र हालत हो रही थी! कुछ सस्ताने के लिये वे एक वृक्ष के नीचे निढाल हो गये!
🔶 अरुणोदय हो चुका था! उसकी सुनहरी किरणें स्वामी जी के तेजोद्दीप्त चेहरे पर पड़कर उसे और कान्तिवान बना रही थीं! इसी समय उधर से एक युवक निकला! स्वामी जी के आभावान चेहरे को देखकर ठिठका! अभी वह कुछ बोल पाता, इससे पूर्व ही उनकी आँखे खुलीं और एक मृदु हास्य बिखेर दिया! प्रत्युत्तर में युवक ने हाथ जोड़ लिये और आग्रह भरे स्वर में कहा -
🔷 "आप कुछ थके और भूखे लग रहे हैं! यदि आपत्ति न हो, तो चलकर मेरे यहाँ विश्राम करें!" बिना कुछ कहे स्वामी जी उठ पड़े और युवक के साथ चलने के लिये राजी हो गये!
🔶 चार दिन बीत गये! नरेन्द्र अन्यत्र प्रस्थान की तैयारी करने लगे! इसी समय वह युवक उनके समक्ष उपस्थित हुआ! चल पड़ने को तैयार देख उसने पूछ लिया - "क्या अभी इसी समय प्रस्थान करेंगे?" "हाँ , इसी वक्त! " उत्तर मिला! "तो फिर मुझे भी संन्यास दीक्षा देकर अपने साथ ले चलिये, मैं भी संन्यासी बनूँगा!"
🔷 स्वामी जी मुस्करा दिये! बोले - "संन्यास और संन्यासी का अर्थ जानते हो?" जी हाँ, भलीभाँति जानता हूँ! संन्यास वह है जो मोक्ष की ओर प्रेरित करे और संन्यासी वह जो मुक्ति की इच्छा करे! "किसकी मुक्ति?"
🔶 स्वयं की, साधक की! " तत्क्षण उत्तर मिला!
🔷 स्वामीजी खिलखिलाकर हँस पड़े! बोले - " तुम जिस संन्यास की चर्चा कर रहे हो, वह संन्यास नहीं पलायनवाद है! संन्यास न कभी ऐसा था, न आगे होने वाला है! तुम इस पवित्र आश्रम को इतना संकीर्ण न बनाओ! यह इतना महान् व शक्तिवान् है कि जब कभी इसकी आत्मा जागेगी, तो बम की तरह धमाका करेगा! तब भारत, भारत ( वर्तमान दयनीय भारत ) न रहकर, भारत ( आभायुक्त ) महाभारत, विशाल भारत बन जायेगा और एक बार पुनः समस्त विश्व इसके चरणों में गिरकर शान्ति के सन्देश की याचना करेगा! यही अटल निर्धारण है! ऐसा होने से कोई भी रोक नहीं सकता! अगले दिनों यह होकर रहेगा!
🔶 मैं स्पष्ट देख रहा हूँ की भारत के युवा संन्यासी इस मुहीम में पूर्ण निष्ठा के साथ जुट पड़े हैं और अपनी सम्पूर्ण क्षमता लगाकर इसे मूर्तिमान करने में कुछ भी कसर उठा नहीं रख रहे हैं! इनके प्रयासों से भारत की आत्मा को जगते, मैं देख रहा हूँ और देख रहा हूँ उस नवविहान को, जिसकी हम सबको लम्बे समय से प्रतीक्षा है! "
🔷 तनिक रुककर उन्होंने पुनः कहना आरम्भ लिया - " यह वही संन्यास है, जिसकी सामर्थ्य को हम विस्मृत कर चुके हैं, जिसके दायित्व को भला चुके हैं! इसका तात्पर्य आत्म-मुक्ति कदापि नहीं हो सकता! यह स्वयं में खो जाने की, अपने तक सीमित होने की प्रेरणा हमें नहीं देता, वरन् आत्मविस्तार का उपदेश करता है! यह व्यक्ति की मुक्ति का नाम नहीं, अपितु समाज की, विश्व की, समस्त मानव जाति की मुक्ति का पर्याय है! यह महान आश्रम अपने में दो महान परम्पराओं को साथ लेकर चलता है - साधु और ब्राह्मण की! साधु वह, जिसने स्वयं को साध लिया! ब्राह्मण वह, जो विराट् ब्रह्म की उपासना करता हो, उसी की स्वर्ग मुक्ति की बात सोचता हो! तुम्हारा संन्यास गुफा-कन्दराओं तक, एकान्तवास तक परिमित है किन्तु हमारा संन्यास जन-संकुलता का नाम है! "
🔶 वाणी कुछ समय के लिये रुकी, तत्पश्चात पुनः उभरी - " बोलो ! तुम्हें कौन-सा संन्यास चहिये? एकान्त वाला आत्म-मुक्ति का संन्यास या साधु-ब्राह्मणों वाला सर्व-मुक्ति का संन्यास? "
🔷 युवक स्वामीजी के चरणों में गिर पड़ा, बोला - " नहीं, नहीं मेरा आत्म-मुक्ति का मोह भंग हो चुका है! मुझे ऐसा संन्यास नहीं चहिये! मैं समाज की स्वर्ग मुक्ति के लिये काम करूँगा! देखा जाय तो समाज-मुक्ति के बिना व्यक्ति की अपनी मुक्ति सम्भव नहीं! "
🔶 युवक के इस कथन पर स्वामीजी ने सिर हिलाकर सहमति प्रकट की! एक क्षण के लिये दोनों के नेत्र मिले मानों प्राण-प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया चल पड़ी हो! फिर उसे गुरु ने उठाकर गले से लगा लिया और कहा - " आज से शरत्चन्द्र गुप्त नहीं, स्वामी सदानन्द हुए! " गुरु-शिष्य दोनों उसी समय आगे की यात्रा पर प्रस्थान कर गये!!
🔷 मोक्ष अकेले हथियाने की वस्तु नहीं है! "मोक्ष हम सब को" यही वाक्य शुद्ध है! सब के मोक्ष का प्रयत्न करने में अपना मोक्ष भी सम्मिलित है।
🔶 अरुणोदय हो चुका था! उसकी सुनहरी किरणें स्वामी जी के तेजोद्दीप्त चेहरे पर पड़कर उसे और कान्तिवान बना रही थीं! इसी समय उधर से एक युवक निकला! स्वामी जी के आभावान चेहरे को देखकर ठिठका! अभी वह कुछ बोल पाता, इससे पूर्व ही उनकी आँखे खुलीं और एक मृदु हास्य बिखेर दिया! प्रत्युत्तर में युवक ने हाथ जोड़ लिये और आग्रह भरे स्वर में कहा -
🔷 "आप कुछ थके और भूखे लग रहे हैं! यदि आपत्ति न हो, तो चलकर मेरे यहाँ विश्राम करें!" बिना कुछ कहे स्वामी जी उठ पड़े और युवक के साथ चलने के लिये राजी हो गये!
🔶 चार दिन बीत गये! नरेन्द्र अन्यत्र प्रस्थान की तैयारी करने लगे! इसी समय वह युवक उनके समक्ष उपस्थित हुआ! चल पड़ने को तैयार देख उसने पूछ लिया - "क्या अभी इसी समय प्रस्थान करेंगे?" "हाँ , इसी वक्त! " उत्तर मिला! "तो फिर मुझे भी संन्यास दीक्षा देकर अपने साथ ले चलिये, मैं भी संन्यासी बनूँगा!"
🔷 स्वामी जी मुस्करा दिये! बोले - "संन्यास और संन्यासी का अर्थ जानते हो?" जी हाँ, भलीभाँति जानता हूँ! संन्यास वह है जो मोक्ष की ओर प्रेरित करे और संन्यासी वह जो मुक्ति की इच्छा करे! "किसकी मुक्ति?"
🔶 स्वयं की, साधक की! " तत्क्षण उत्तर मिला!
🔷 स्वामीजी खिलखिलाकर हँस पड़े! बोले - " तुम जिस संन्यास की चर्चा कर रहे हो, वह संन्यास नहीं पलायनवाद है! संन्यास न कभी ऐसा था, न आगे होने वाला है! तुम इस पवित्र आश्रम को इतना संकीर्ण न बनाओ! यह इतना महान् व शक्तिवान् है कि जब कभी इसकी आत्मा जागेगी, तो बम की तरह धमाका करेगा! तब भारत, भारत ( वर्तमान दयनीय भारत ) न रहकर, भारत ( आभायुक्त ) महाभारत, विशाल भारत बन जायेगा और एक बार पुनः समस्त विश्व इसके चरणों में गिरकर शान्ति के सन्देश की याचना करेगा! यही अटल निर्धारण है! ऐसा होने से कोई भी रोक नहीं सकता! अगले दिनों यह होकर रहेगा!
🔶 मैं स्पष्ट देख रहा हूँ की भारत के युवा संन्यासी इस मुहीम में पूर्ण निष्ठा के साथ जुट पड़े हैं और अपनी सम्पूर्ण क्षमता लगाकर इसे मूर्तिमान करने में कुछ भी कसर उठा नहीं रख रहे हैं! इनके प्रयासों से भारत की आत्मा को जगते, मैं देख रहा हूँ और देख रहा हूँ उस नवविहान को, जिसकी हम सबको लम्बे समय से प्रतीक्षा है! "
🔷 तनिक रुककर उन्होंने पुनः कहना आरम्भ लिया - " यह वही संन्यास है, जिसकी सामर्थ्य को हम विस्मृत कर चुके हैं, जिसके दायित्व को भला चुके हैं! इसका तात्पर्य आत्म-मुक्ति कदापि नहीं हो सकता! यह स्वयं में खो जाने की, अपने तक सीमित होने की प्रेरणा हमें नहीं देता, वरन् आत्मविस्तार का उपदेश करता है! यह व्यक्ति की मुक्ति का नाम नहीं, अपितु समाज की, विश्व की, समस्त मानव जाति की मुक्ति का पर्याय है! यह महान आश्रम अपने में दो महान परम्पराओं को साथ लेकर चलता है - साधु और ब्राह्मण की! साधु वह, जिसने स्वयं को साध लिया! ब्राह्मण वह, जो विराट् ब्रह्म की उपासना करता हो, उसी की स्वर्ग मुक्ति की बात सोचता हो! तुम्हारा संन्यास गुफा-कन्दराओं तक, एकान्तवास तक परिमित है किन्तु हमारा संन्यास जन-संकुलता का नाम है! "
🔶 वाणी कुछ समय के लिये रुकी, तत्पश्चात पुनः उभरी - " बोलो ! तुम्हें कौन-सा संन्यास चहिये? एकान्त वाला आत्म-मुक्ति का संन्यास या साधु-ब्राह्मणों वाला सर्व-मुक्ति का संन्यास? "
🔷 युवक स्वामीजी के चरणों में गिर पड़ा, बोला - " नहीं, नहीं मेरा आत्म-मुक्ति का मोह भंग हो चुका है! मुझे ऐसा संन्यास नहीं चहिये! मैं समाज की स्वर्ग मुक्ति के लिये काम करूँगा! देखा जाय तो समाज-मुक्ति के बिना व्यक्ति की अपनी मुक्ति सम्भव नहीं! "
🔶 युवक के इस कथन पर स्वामीजी ने सिर हिलाकर सहमति प्रकट की! एक क्षण के लिये दोनों के नेत्र मिले मानों प्राण-प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया चल पड़ी हो! फिर उसे गुरु ने उठाकर गले से लगा लिया और कहा - " आज से शरत्चन्द्र गुप्त नहीं, स्वामी सदानन्द हुए! " गुरु-शिष्य दोनों उसी समय आगे की यात्रा पर प्रस्थान कर गये!!
🔷 मोक्ष अकेले हथियाने की वस्तु नहीं है! "मोक्ष हम सब को" यही वाक्य शुद्ध है! सब के मोक्ष का प्रयत्न करने में अपना मोक्ष भी सम्मिलित है।
👉 साधना- अपने आपे को साधना (भाग 5)
🔷 गायक और वादक एक दिन में अपने विषय में पारंगत नहीं हो जाते, उन्हें स्तर की, नाद की साधना नित्य निरन्तर करनी पड़ती है। ‘रियाज’ न किया जाय तो गायक का स्वर छितराने लगता है और वादक की उँगलियाँ जकड़−मकड़ दिखाने लगती हैं। संगीत सम्मेलन तो यदा−कदा ही होते हैं, पर वहाँ पहुँचने पर सफलता का श्रेय देने वाली स्वर साधना को नित्य ही अपनाये रहना पड़ता है। गीत सुनने वालों ने कितनी प्रशंसा की और कितनी धन राशि दी यह बात गौण रहती है। संगीत साधक, आत्म−तुष्टि की नित्य मिलने वाली प्रसन्नता को ही पर्याप्त मानता है और बाहर से कुछ भी न मिले तो भी वह एकान्त जंगल की किसी कुटिया में रहकर भी आजीवन बिना ऊबे संगीत साधना करता रह सकता है। आत्म−साधक की मनः−स्थिति इतनी तो होनी ही चाहिए।
🔶 नर्तक, अभिनेता अपना अभ्यास जारी रखते हैं। शिल्पी और कलाकार जानते हैं कि उन्हें अपने प्रयोजन के लिए नित्य नियमित अभ्यास करना चाहिए। फौजी सैनिकों को अनिवार्य रूप से ‘परेड’ करनी पड़ती है। अभ्यास छूट जाने पर न तो गोली का निशाना ठीक बैठता है और न मोर्चे पर लड़ने के लिए जिस कौशल की आवश्यकता पड़ती है वह हाथ रहता है। किसी विशेष प्रयोजन के लिए नियत संख्या तथा नियत अवधि की साधना से किसी पूजा प्रयोजन का संकल्प लेने वाला समाधान हो सकता है पर आत्म−साधक को इतने भर से सन्तोष नहीं मिलता। वह जानता है कि प्यास बुझाने के लिए रोज ही कुँए से पानी खींचना पड़ता है और सफाई रखने के लिए रोज ही कमरे को बुहारना पड़ता है।
🔷 मानवी सत्ता की स्थिति भी ऐसी ही है, उसकी हीरों भरी खदान को हर दिन खोदना, कुरेदना चाहिए। तभी नित्य नये उपहार मिलने सम्भव होंगे। शरीर को स्नान कराना , दाँत माँजना , कपड़े धोना नित्य कर्म है। उसकी उपेक्षा नहीं हो सकती। संसार का विक्षोभ भरा वातावरण हर किसी की अन्तःचेतना को प्रभावित करता है। उसकी नित्य सफाई न की जाय तो क्रमशः गन्दगी बढ़ती ही चली जायगी और अन्ततः कोई बड़ी विपत्ति खड़ी करेगी।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.14
🔶 नर्तक, अभिनेता अपना अभ्यास जारी रखते हैं। शिल्पी और कलाकार जानते हैं कि उन्हें अपने प्रयोजन के लिए नित्य नियमित अभ्यास करना चाहिए। फौजी सैनिकों को अनिवार्य रूप से ‘परेड’ करनी पड़ती है। अभ्यास छूट जाने पर न तो गोली का निशाना ठीक बैठता है और न मोर्चे पर लड़ने के लिए जिस कौशल की आवश्यकता पड़ती है वह हाथ रहता है। किसी विशेष प्रयोजन के लिए नियत संख्या तथा नियत अवधि की साधना से किसी पूजा प्रयोजन का संकल्प लेने वाला समाधान हो सकता है पर आत्म−साधक को इतने भर से सन्तोष नहीं मिलता। वह जानता है कि प्यास बुझाने के लिए रोज ही कुँए से पानी खींचना पड़ता है और सफाई रखने के लिए रोज ही कमरे को बुहारना पड़ता है।
🔷 मानवी सत्ता की स्थिति भी ऐसी ही है, उसकी हीरों भरी खदान को हर दिन खोदना, कुरेदना चाहिए। तभी नित्य नये उपहार मिलने सम्भव होंगे। शरीर को स्नान कराना , दाँत माँजना , कपड़े धोना नित्य कर्म है। उसकी उपेक्षा नहीं हो सकती। संसार का विक्षोभ भरा वातावरण हर किसी की अन्तःचेतना को प्रभावित करता है। उसकी नित्य सफाई न की जाय तो क्रमशः गन्दगी बढ़ती ही चली जायगी और अन्ततः कोई बड़ी विपत्ति खड़ी करेगी।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.14
👉 Now Study is the Only Option
🔷 Human mind is like a blank paper or an unexposed photographic film, which records the effect of surrounding situations, events and thoughts, accordingly shaping the mentality. A person is basically neither wise nor a fool, neither good nor bad, but very sensitive, and hence, is deeply influenced by the surrounding and molded in the same pattern. This can lead him to great heights or it can throw him into hell, based on the environment around him.The most important thing needed for raising our personality to greater heights is a thought process associated with not only idealism, but also with our faith and favor.
🔶 This can be fulfilled in two ways: One, long enough association with a Guru, idealist person with high moral and sound character; and Second, reading, study and absorption of thoughts of such great personalities. Under the prevailing circumstances, the first option seems very difficult, as such great people have become so rare now, and gradually they are being replaced by the cheaters and fraudsters who themselves are confused and mislead the followers who blindly confide in them. The really deserving spiritual leaders are so busy in refining the current situation that they hardly can devote any time to accompany and lead the anxious mass. Therefore, if one is fortunate enough to be around a really honest wise man, he should get the chance to satisfy the thirst of knowledge, because, long association with such personalities is rarely possible.
🔷 The second option is readily available – and that is the reading and deep study of thoughts of great spiritual leaders, expressed and written in books. Only through such study, a prolonged atmosphere can be created in our mind which can lead us to a glorious, divine life. Our efforts to satisfy this spiritual hunger must be far stronger than working for our physical needs of bread, butter and shelter. The study of such pious literature must become a part of our daily routine. Then only our mind can be protected from ill-effects of the polluted environment, which otherwise encourages us to involve into deteriorated, shameful activities. If not curtailed, this environment can provoke common mass to look for benefits in such activities.So, self study of great thoughts and pious books is the only solution to protect our mind from contaminated environment.
🔶 The great spiritual personalities - living or dead, have created the literature containing immortal thoughts, and this is permanently available in the form of books for our study. Such books are inexpensive, they do not cost much, but the benefit derived from them is precious like gold and invaluable.It hardly needs to mention that Yug Nirman Yojana combines the old wisdom with the new knowledge and imbibes the principles of our ancient “Sanatan” religion along with the modern intellectual and scientific thought process. The learned class admires it as a marvelous and unique combination. It is a wise step to study the Yug Nirman Literature instead of reading many diversified books leading to confusion.Let us make a good habit of reading Yug Nirman Literature a part of our routine daily life.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana – The Vision, Structure and the Program – Vangmay 66 Page 6.28
🔶 This can be fulfilled in two ways: One, long enough association with a Guru, idealist person with high moral and sound character; and Second, reading, study and absorption of thoughts of such great personalities. Under the prevailing circumstances, the first option seems very difficult, as such great people have become so rare now, and gradually they are being replaced by the cheaters and fraudsters who themselves are confused and mislead the followers who blindly confide in them. The really deserving spiritual leaders are so busy in refining the current situation that they hardly can devote any time to accompany and lead the anxious mass. Therefore, if one is fortunate enough to be around a really honest wise man, he should get the chance to satisfy the thirst of knowledge, because, long association with such personalities is rarely possible.
🔷 The second option is readily available – and that is the reading and deep study of thoughts of great spiritual leaders, expressed and written in books. Only through such study, a prolonged atmosphere can be created in our mind which can lead us to a glorious, divine life. Our efforts to satisfy this spiritual hunger must be far stronger than working for our physical needs of bread, butter and shelter. The study of such pious literature must become a part of our daily routine. Then only our mind can be protected from ill-effects of the polluted environment, which otherwise encourages us to involve into deteriorated, shameful activities. If not curtailed, this environment can provoke common mass to look for benefits in such activities.So, self study of great thoughts and pious books is the only solution to protect our mind from contaminated environment.
🔶 The great spiritual personalities - living or dead, have created the literature containing immortal thoughts, and this is permanently available in the form of books for our study. Such books are inexpensive, they do not cost much, but the benefit derived from them is precious like gold and invaluable.It hardly needs to mention that Yug Nirman Yojana combines the old wisdom with the new knowledge and imbibes the principles of our ancient “Sanatan” religion along with the modern intellectual and scientific thought process. The learned class admires it as a marvelous and unique combination. It is a wise step to study the Yug Nirman Literature instead of reading many diversified books leading to confusion.Let us make a good habit of reading Yug Nirman Literature a part of our routine daily life.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana – The Vision, Structure and the Program – Vangmay 66 Page 6.28
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026
शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...

















































