सोमवार, 26 मार्च 2018

👉 कहिए कम-करिये ज्यादा (अन्तिम भाग)

🔶 इसे हम बराबर देखते हैं कि केवल बातें बनाने वाला व्यक्ति जनता की नजरों से गिर जाता है। पहले तो उसकी बात का कुछ असर ही नहीं होता। कदाचित उसकी ललित एवं आकर्षक कथन शैली से कोई प्रभावित भी हो जाय तो बाद में अनुभव होने पर वह सब प्रभाव जाता रहता है। वाकशूर के पीछे यदि कर्मवीरता का बल नहीं तो वह पंगु हैं। जो बात कहनी हो उसको पहिले तोलिए फिर बोलिए। शब्दों को बाण की उपमा दी गई। एक बार बाण के छूट जाने पर उसे रोकना बस की बात नहीं। लोहे का बाण तो एक ही जन्म और शरीर को नष्ट करता है पर शब्द बाण तो भविष्य की युग युगीन परम्परा को भी नष्ट कर देता है।

🔷 यह सब ठीक होते हुए भी प्रश्न उठता है कि विश्व में वाकशूर ही क्यों अधिक दिखाई देते हैं। उत्तर स्पष्ट है-बोलना सरल है। इसमें किसी तरह का कष्ट नहीं होता। कार्य करने में कष्ट होता है अपनी रुचि वृत्ति-स्वभाव बुरी आदतों पर अंकुश लगाना पड़ता है। और यह बड़ा कठिन कार्य है इन्द्रियाँ स्वच्छंद हो रही हैं, विषय वासनाओं की ओर लपलपाकर बढ़ना चाहती हैं। इनका दमन किये बिना इच्छित और उपयोगी कार्य नहीं किया जा सकता। कष्ट एवं कठिनता होने पर भी जो हमारे व विश्व के लिये आवश्यक है वह तो करना ही चाहिये। अतः सच्चे कर्म योग का अभ्यास करने की आदत डालना आवश्यक है। अभ्यास ही सिद्धि का मूलमंत्र है।

🔶 कहना हम सब को बहुत आता है। पर करना नहीं आता या चाहते नहीं। केवल दूसरों की आलोचना एवं अपनी बातें बघारना ही हमारा मनसूबा बन गया है। हमारे पांडित्य में परोपदेश और विद्या ‘विवादाय’ चरितार्थ हो रहे हैं। इन्हें हमें आत्मसुधार और विश्व उद्धार में लगाना है। अन्यथा हमारा अध्ययन ‘आप बाबाजी बैंगन खावे औरों को प्रबोध सुनावें’ सा ही रहेगा।

🔷 कई कहते हैं- “हमारी कोई सुनता ही नहीं, कहते-कहते थक गये पर सुनने वाले कोई सुनते नहीं अर्थात् उन पर कुछ असर ही नहीं होता”। मेरी राय में इसमें सुनने वालों से अधिक दोष कहने वालों का है। कहने वाले करना नहीं जानते। वे अपनी ओर देखें। आत्मनिरीक्षण कार्य की शून्यता की साक्षी दे देगा। वचन की सफलता का सारा दारोमदार कर्मशीलता में है। आप चाहे बोलें नहीं, थोड़ा ही बोलें पर कार्य में जुट जाइये। आप थोड़े ही दिनों में देखेंगे कि लोग बिना कहे आपकी ओर खिंचे जा रहे हैं। अतः कहिये कम, करिये अधिक। क्योंकि बोलने का प्रभाव तो क्षणिक होगा पर कार्य का स्थायी होता है। जैन योगी चिदानन्द जी ने क्या ही सुन्दर कहा है-
कथनी कथै कोई। रहणी अति दुर्लभ होई॥

🔶 अन्य कवियों ने भी कहा है-
कथनी मीठी खांड सी, करनी विष की लोय।
कथनी तजि करनी करै, विष से अमृत होय।1।

कथनी बदनी छांडी के, करनी सों चितलाय।
नरहिं नीर पिये बिना, करनी प्यास न जाय।2।

करनी बिन  कथनी कथै, अज्ञानी दिन रात।
कूकर ज्यों भूँसत, फिरै, सुनी सुनाई बात।3।

📖 अखण्ड ज्योति-जून 1950 पृष्ठ 16

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/June/v1.16

👉 Service is Superior to Worship

🔶 A monk had two disciples. Both were totally dedicated worshippers of God. After the worship they used to help their Guru in treating the patients who visited their monastery.

🔷 One day, a patient arrived in the early morning. It was the time of worship. The monk called for his disciples for attending to the patient. The disciples replied, "Our worship is still not complete. We will come after sometime." But, the monk called them again. This time, they did come grumbling about the incomplete worship. The monk said very seriously, "I have called you to serve this suffering man. Prayers can be performed even by the angels, but only men can help other men in need. Service has higher priority over worship, since angels can not perform service." The two disciples were ashamed of their behavior and from that day they gave higher priority to service over worship."
                                       
📖 From Pragya Puran

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 6)

🔶 आप यहाँ रहिए, हम आपको पका देते हैं। आप आये थे, तब कच्चे बर्तन के रूप में थे और आप जब जाना तब हमारे अवे में पके हुए होकर जाना। मुर्गी अपने बच्चे को छाती से लगाये हुए बैठी रहती है, कछुवी अपने अण्डे को बालू में रख देती है; लेकिन देख−भाल करती रहती है। हम आपको कछुए के अण्डे की तरह कोठरी में बिठा तो गये हैं; पर आप यह मत सोचिए कि हम आपकी तरफ गौर नहीं करते और ध्यान नहीं देते। हम बराबर आपकी तरफ ध्यान दे रहे हैं। किस बात पर ध्यान दे रहे हैं? कि आपका मनःसंस्थान ऊँचा हो जाए, आपकी भावनाओं का स्तर ऊँचा हो जाए, आपके जीवन का लक्ष्य ऊँचा हो जाए, जिससे आपके व्यक्तित्व की गरिमा आगे बढ़ती हुई चली जाए।

🔷 हम केवल यही विचार करते हैं और कुछ विचार नहीं करते—आप सुन सकते हो, तो सुन लेना; नहीं सुन सकते, तो आप फिर हैं ही चिकने घड़ों की तरह; वैसे ही बने रहना, जैसे आए थे, वैसे ही चले जाना। मुर्गी अपने अण्डे को पकाने के लिए छाती से लगाये बैठी रहती है और आपको भी हम मुर्गी की तरह छाती से लगाये हुए हैं कि जब आप पकें, जब आप फूटें और जब आप फुदकना शुरू करें, चूजे की तरह, तो आपका बहुत शानदार जीवन होगा—हमारी भी महत्त्वाकांक्षा यही है। आप भी अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को हमारी तरह गला पाएँ, तो मजा आ जाए! यहाँ क्या-क्या काम कराये जाते हैं? कई चीजें कराई जाती हैं—संयम करा रहे हैं, वास्तविक बात यह है।

🔶 आपको हमने कितनी बार कहा है कि आप आहार के बारे में संयम कीजिए और न सिर्फ आहार के बारे में, बल्कि विचारों के भी बारे में और न सिर्फ विचारों के बारे में, बल्कि उनके व्यवहार के बारे में भी। आपसे चार तपों का जिक्र किया था न, आपको चार तप यहाँ बराबर करते रहने चाहिए। धन के बारे में रोक है—आपको बाजार जाने की, इधर-उधर घूमने की, सैर-सपाटे करने की, मनसादेवी के पहाड़ पर चढ़ने की। पैसा खराब करने पर हमने रोक लगा दी है। जो पैसा आपको, निरन्तर जीवन के लिए नितान्त आवश्यक नहीं है, उसको खर्च मत कीजिए। कंजूसी करें, जमा करें। ना बाबा! कंजूसी के लिए कौन कहता है आपसे? अच्छे काम के लिए कोई खर्च नहीं है क्या? आप फिजूलखर्च जरा भी मत कीजिए और जो कुछ भी आपके पास धन है, उसको लगा दीजिए अच्छे कामों में।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 73)

👉 एक ही यज्ञ-अहं को भस्म कर देना
  
🔶 ऐसे ही एक सिद्ध तपस्वी हुए हैं— बाबा माधवदास। गंगा किनारे बसे गाँव वेणुपुर में उन्होंने गहन साधना की। गाँव वाले उनके बारे में बस इतना बता पाते हैं कि बाबा जब गाँव में आए थे, तब उनकी आयु लगभग ४० साल की रही होगी। सामान के नाम पर उनके पास कुछ खास था नहीं। बस आए और गाँव के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे जम गए। बाद में गाँव वालों ने उनके लिए कुटिया बना दी। बाबा माधवदास की एक ही साधना थी-गुरुभक्ति। इसी ने उन्हें साधना के शिखर तक पहुँचाया था। जब तक उनके गुरुदेव थे, उन्होंने उनकी सेवा की। उनकी आज्ञा का पालन किया। बाद में उनके शरीर छोड़ने पर उन्हीं की आज्ञा से इस गाँव में चले आए।
  
🔷 चर्चा में गाँव वालों को उन्होंने बताया कि उनके गुरुदेव कहा करते थे कि साधु पर भी समाज का ऋण होता है। सो उसे चुकाना चाहिए। क्या ही अच्छा हो कि एक-एक साधु एक-एक गाँव में जाकर ज्ञान की अलख जगाए। गाँव के लोगों को शिक्षा और संस्कार दे। उन्हें आध्यात्मिक जीवन दृष्टि प्रदान करे। अपने गुरु के आदेश  के अनुसार वे सदा इन्हीं कामों में लगे रहते थे। जब गाँव वाले उनसे पूछते कि वह इतना परिश्रम क्यों करते हैं? तो वे कहा करते कि गुरु का आदेश मानना ही उनकी सच्ची सेवा होती है। बस, मैंने सारे जीवन उनके आदेश के अनुसार ही जीने का संकल्प लिया है।
  
🔶 बाबा माधवदास वेणुपुर में लोगों से कहा करते थे, श्रद्धा का मतलब है-समर्पण। यानि कि निमित्त मात्र हो जाना। मन में इस अनुभूति को बसा लेना कि मैं नहीं तू। गुरुभक्ति का मतलब है कि हे गुरुदेव अब मैंने स्वयं को समाप्त कर दिया है, अब तुम आओ और मेरे हृदय में विराजमान हो जाओ। अब मैं वैसे ही जीऊँगा, जैसे कि तुम जिलाओगे। अब मेरी कोई मरजी नहीं, तुम्हारी मरजी ही मेरी मरजी है। माधवदास जैसा कहते थे, वैसा ही उनका जीवन भी था। उनका कहना था कि शिष्य जिस दिन अपने आप को शव बना लेता है, उसी दिन उसके गुरुदेव उसमें प्रवेश कर उसे शिव बना देते हैं।
  
🔷 जिस क्षण शिष्य का अस्तित्व मिट जाता है, उसमें सद्गुरु प्रकट हो जाते हैं। फिर सारी साधनाएँ स्वयं होने लगती हैं। सभी तप स्वयं होने लगते हैं। शिष्य को यह बात हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि सत्कर्म एक ही है, जिसे हमने न किया हो, बल्कि हमारे माध्यम से स्वयं गुरुदेव ने किया हो। जो भक्ति अहंकार को लेकर बहता है, वह कभी पवित्र नहीं हो सकता। उसके प्रवाह के सान्निध्य में कभी तीर्थ नहीं बन सकते। शिष्य के करने लायक एक ही यज्ञ है- अपने अहं को भस्म कर देना। समझने की बात यह है कि धूप में खड़े होना अथवा भूखे मरने का नाम तपस्या नहीं है, यह तो स्वयं को मिटाने का साहस है। यही तपस्या करना है। शिष्य धर्म को निभाने वाले बाबा माधवदास सारे जीवन यही तप करते रहे। इसी महातप से उनका अस्तित्व जन-जन के लिए वरदान बन गया। पर यदि कोई उनसे उनकी उपलब्धियों की बात करते, तो वे हँस पड़ते और कहते और मैं हूँ ही कहाँ, ये तो गुरुदेव हैं, जो इस शरीर को चला रहे हैं और अपने कर्म कर रहे हैं। इस सत्य के नूतन आयामों को अगले मंत्रों में स्पष्ट किया गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 115

👉 आज का सद्चिंतन 26 March 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 March 2018


👉 नारी को विकसित किया जाना आवश्यक है। (अन्तिम भाग)

🔷 दहेज की समस्या कोई स्वतंत्र समस्या नहीं, नारी की अयोग्यता की ही समस्या है। दहेज वे लोग माँगते हैं जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है। उनका कहना है कि हमारे घर की अच्छी आर्थिक स्थिति का लाभ तुम्हारी लड़की उपयोग करे इसके बदले में हमें दहेज की कीमत मिलनी चाहिए। इस माँग का दूसरा उत्तर यह हो सकता है कि दहेज का पैसा लड़की की योग्यता बढ़ाने में खर्च कर दिया जाए और उसे किसी गरीब किन्तु योग्य लड़के के साथ ब्याह दिया जाए।

🔶 लड़की अपनी योग्यता से कुछ उपार्जन करके उस लड़के की आय को बढ़ा सकती है और उससे अधिक आनन्द में रह सकती है जितनी किसी अमीर घर में-केवल उन लोगों के अनुग्रह और अपनी दीनता के बल पर सुखी रहती है। यदि लड़कियाँ सुशिक्षित हो जाएं तो माँगने वालों को सौदा पटाने की हिम्मत ही न पड़े। फिर भी यदि दहेज का राक्षस न मरे तो लड़कियाँ अपनी शिक्षा के बल पर आर्थिक स्वावलम्बन प्राप्त करके अविवाहित जीवन भी व्यतीत कर सकती हैं।

🔷 किसी भी दृष्टिकोण से विचार किया जाए यह नितान्त आवश्यक है कि नारी को वर्तमान दुरावस्था में न पड़ा रहने देकर उसे ऊपर उठाया जाए, आगे बढ़ाया जाए। उसकी शक्ति और सामर्थ्य बढ़ने से हानि किसी की नहीं, लाभ सभी का है। पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर प्रत्येक क्षेत्र में उसे सहयोग देने वाली नारी, इस वंचित, अशिक्षित, अनुभवहीन, अयोग्य एवं भार रूप नारी की अपेक्षा कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध होगी। विवेक की पुकार यही है कि स्वार्थ और परमार्थ की दृष्टि से, न्याय और कर्त्तव्य की दृष्टि से, नारी के विकास में सहयोग दें- बाधक न बनें

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति -दिसंबर 1960 पृष्ठ 29
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/December/v1.29

👉 The Spirituality & its Reality. (Last Part)

🔷 The dirty and dry berries soaked in spittle of a sweeper were eaten by BHAGWAN, why, why he ate those berries? BHAGWAN said, ‘‘I do not eat berry but the soul, the soul and the honesty. The thinking-style, the greatness is the only things I eat. I feel obliged to receive this dose from anyone. I only eat and drink love and love.’’
                                
🔶 Where is love with humans? Soaked in attachments, lust and avarice and where is shame with such humans? Had there been the shame, their souls would have been saturated; they would have been felt coolness, merriment would have taken place in their life. They would have given merriment to others. O helpless! O man engulfed in fire! Where is shame with them? Girls of BRIJ offered one cup of buttermilk to compel KRISHAN to dance over the whole courtyard.
                                         
🔷 Friends! Very this is the story of my life; very this is the spirituality of my life. Very this is how I do my UPASANA. Very this is the impressions of SADHANA. Finished, today’s session.
                                       
===OM SHANTI===

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 5)

🔷 आप एक और अनुभव कर लीजिए कि आप गुरुजी के अवे में बैठे हुए हैं। अवा क्या? कुम्हार अपने बर्तन बनाता है और बर्तन बना करके उन बर्तनों को अवे के भीतर कैद कर देता है। बस, सब बर्तन चुपचाप बैठे रहते हैं और पकते रहते हैं। आप भी चुपचाप बैठे रहिए और पकते रहिए। हम आपको प्रेरणा भेजेंगे, हम आपको विचार भेजेंगे, उसको भी तो सुनिए! बस, अपनी-अपनी ही बकते रहते हैं, हमारी नहीं सुनेंगे क्या? हमारी प्रेरणा पर आप ध्यान नहीं देंगे? हम क्या कहना चाहते हैं, उस पर गौर नहीं करेंगे? उसकी कोई उपयोगिता नहीं है? अपने आपको ही हमारे ऊपर हावी रखेंगे? हमारी मनोकामना पूरी कर दीजिए। ऐसे कौन आपकी मनोकामना पूरी कर देगा, बताइए?

🔶 रावण की मनोकामना पूरी करने में कौन समर्थ हो गया? सिकन्दर की मनोकामना कही पूरी हुई? नेपोलियन बोनापोर्ट की कहीं पूरी हुई? हिरण्यकश्यपु ने अपनी मनोकामना पूरी कर पाई? न कर पाई। आप तो बेकार आदमी हो, बार-बार बच्चों की तरह मनोकामना, मनोकामना माँगते रहते हैं? यहाँ तो आप बड़ों की तरह रवैया अख्यियार कीजिए। बच्चे ही बने रहेंगे जिन्दगी भर बड़े भी होंगे! अगर यहाँ आप बड़े हो गए हैं, तो मनोकामना वाले जंजाल को छोड़ दीजिए। मनोकामना तो भगवान ने आपकी पूरी कर दी है। हाथ-पाँव दिए हैं, आप पेट भर के रोटी कमा सकते हैं। अक्ल भगवान ने दी है आपको, आप तन ढकने के लिए कपड़े या पारिवारिक जो छोटी-मोटी जिम्मेदारियाँ हैं, भली प्रकार पूरी कर सकते हैं। यह कौन-सी मनोकामना है सिवाय हविश के! बताइए?

🔷 हविश के अलावा कोई मनोकामना नहीं है। हविश को आप हल्की नहीं कर सकते। हविश को जिस दिन आप हल्की कर लेंगे, आपकी कोई भी मनोकामना बाकी नहीं रह जाएगी, यह आप देखेंगे कि आप कितने खुश और प्रसन्न रह सकते हैं। इसलिए आप इस डायन को मार भगाइये न? दुनिया भर का माँगते फिरते हैं—नाक रगड़ते-फिरते हैं—वासनाओं के लिए, तृष्णाओं के लिए, अहंकार के लिए। इसके आगे पल्ला पसारना, उसके आगे पल्ला पसारना, इसके आगे नाक रगड़ना, उसके आगे नाक रगड़ना। आप अपने आप में हेर-फेर कीजिए, अपने आप में हेर-फेर करेंगे, तो आपको इस कायाकल्प-शिविर में आने का मानसिक लाभ मिल जाएगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 72)

👉 एक ही यज्ञ-अहं को भस्म कर देना
  
🔷 ध्यान की इस पवित्र प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ माता जगदम्बा से कहते हैं-

आनन्दमानन्दकरं प्रसन्नं ज्ञानस्वरूपं निजबोधयुक्तम्। योगीन्द्रमीड्यं भवरोगवैद्यं श्रीमद््गुरुंनित्यमहम् नमामि॥९३
यस्मिन् सृष्टिस्थितिध्वंसनिग्रहानुग्रहात्मकम्। कृत्यं पञ्चविधं शश्वद्भासते तं नमाम्यहम्॥ ९४॥
प्रातः शिरसि शुक्लाब्जे द्विनेत्रं द्विभुजं गुरुम्।     वराभययुतं शान्तं स्मरेत्तं नामपूर्वकम्॥ ९५॥

🔶 गुरुदेव आनन्दमय रूप हैं। वे शिष्यों को आनन्द प्रदान करने वाले हैं। वे प्रभु प्रसन्नमुख एवं ज्ञानमय हैं। वे सदा आत्मबोध में निमग्न रहते हैं। योगीजन सदा उनकी स्तुति करते हैं। संसार रूपी रोग के वही एक मात्र वैद्य हैं। मैं उन गुरुदेव का नित्य नमन करता हूँ॥ ९३॥ जिनकी चेतना में उत्पत्ति, स्थिति, ध्वंस, निग्रह एवं अनुग्रह ये पाँच कार्य सदा होते रहते हैं, उन गुरुदेव को मेरा नमन है॥ ९४॥ इस भाव से गुरुदेव को नमन करते हुए प्रातःकाल सहस्रारदल कमल में शान्त, वराभय मुद्रा वाले, कृपा-करुणा रूपी दोनों नेत्रों वाले, रक्षण-पोषण रूपी दो भुजाओं वाले गुरुदेव का नाम सहित स्मरण करना चाहिए॥ ९५॥
  
🔷 गुरुगीता के इन मंत्रों में सद्गुरु स्मरण एवं उनके ध्यान की महिमा है। गुणों के बिना स्मरण एवं रूप के बिना ध्यान आसान नहीं है। इसलिए शिष्यों को अपने गुरुदेव के नाम का स्मरण उनके गुणों के चिन्तन के साथ करना चाहिए। इसी तरह उन प्रभु का ध्यान उनके स्वरूप को याद करते हुए भक्तिपूर्वक करना चाहिए। शिष्य के जीवन में यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहनी चाहिए। ऐसा होते रहने पर शिष्य का अस्तित्व स्वयं ही गुरुदेव की चेतना में घुलता रहता है। जिन्होंने ऐसा किया है या फिर कर रहे हैं, वे इससे होने वाली अनुभूतियों व उपलब्धियों के स्वाद से परिचित हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 114

शनिवार, 24 मार्च 2018

👉 जटायु व गिलहरी चुप नहीं बैठे

🔶 पंख कटे जटायु को गोद में लेकर भगवान् राम ने उसका अभिषेक आँसुओं से किया। स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए भगवान् राम ने कहा-तात्। तुम जानते थे रावण दुर्द्धर्ष और महाबलवान है, फिर उससे तुमने युद्ध क्यों किया ?

🔷 अपनी आँखों से मोती ढुलकाते हुए जटायु ने गर्वोन्नत वाणी में कहा-' प्रभो! मुझे मृत्यु का भय नहीं है, भय तो तब था जब अन्याय के प्रतिकार की शक्ति नहीं जागती?

🔶 भगवान् राम ने कहा- तात्! तुम धन्य हो! तुम्हारी जैसी संस्कारवान् आत्माओं से संसार को कल्याण का मार्गदर्शन मिलेगा।

🔷 गिलहरी पूँछ में धूल लाती और समुद्र में डाल आती। वानरों ने पूछा-देवि! तुम्हारी पूँछ की मिट्टी से समुद्र का क्या बिगडे़गा। तभी वहाँ पहुँचे भगवान् राम ने उसे अपनी गोद में उठाकर कहा 'एक-एक कण धूल एक-एक बूँद पानी सुखा देने के मर्म को समझो वानरो। यह गिलहरी चिरकाल तक सत्कर्म में सहयोग के प्रतीक रूप में सुपूजित रहेगी। '

🔶 जो सोये रहते हैं वे तो प्रत्यक्ष सौभाग्य सामने आने पर भी उसका लाभ नहीं उठा पाते। जागृतात्माओं की तुलना में उनका जीवन जीवित-मृतकों के समान ही होता है।

👉 कहिए कम-करिये ज्यादा (भाग 1)

🔶 मानव स्वभाव की एक बड़ी कमजोरी प्रदर्शन प्रियता है। बाहरी दिखावे को वह बहुत ज्यादा पसन्द करता है। यद्यपि वह जानता और मानता है कि मनुष्य की वास्तविक कीमत उसकी कर्मशीलता, कर्मठता है। ठोस और रचनात्मक कार्य ही स्थायी लाभ, प्रतिष्ठा का कारण होता है। दिखावा और वाक शूरता नहीं। यह जानते हुये भी उसे अपनाता नहीं। इसीलिये उसे एक कमजोरी के नाम से सम्बोधित करना पड़ता है।

🔷 प्रकृति ने मनुष्य को कई अंगोपाँग दिये हैं और उनसे उचित काम लेते रहने से ही मनुष्य एवं विश्व की स्थिति रह सकती है। पर मानव स्वभाव कुछ ऐसा बन गया है कि सब अंगों का उपयोग ठीक से न कर केवल वाक्शक्ति का ही अधिक उपयोग करता है। इससे बातें तो बहुत हो जाती हैं, पर तदनुसार कार्य कुछ भी नहीं हो पाता। हो भी कैसे वह करना भी नहीं चाहता और इसीलिये दिनों दिन वाक्शक्ति का प्रभाव क्षीण होता जाता है। कार्य करने वाले को बोलना प्रिय नहीं होता, उसे व्यर्थ की बातें बनाने को अवकाश ही कहाँ होता है? वह तो अपनी वाक्शक्ति का उपयोग आवश्यकता होने पर ही करता है। अधिक बोलने से वाक्शक्ति का महत्व घट जाता है। जिसकी जबान के पीछे धर्म शक्ति का बल होता है उसी का प्रभाव पड़ता है।

🔶 वस्तुतः कार्य करना एक साधना है। इससे साधित वाक्शक्ति मंत्रवत् बलशाली बन जाती है। साधक के प्रत्येक वाक्य में अनुभव एवं कर्म साधना की शक्ति का परिचय मिलता है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में मौन का बड़ा महत्व है। जैन तीर्थंकर अपनी साधना अवस्था में प्रायः मौनावलम्बन करते हैं। इसी से उनकी वाणी में शक्ति निहित रहती है।

🔷 वर्तमान युग के महापुरुष महात्मा गाँधी के जबरदस्त प्रभाव का कारण उनका कर्मयोग ही है। वे जो कुछ कहते उसे करके बताते थे। इसी में सचाई का बल रहता है। इस सचाई और कर्मठता के कारण ही गाँधी जी के हजारों लाखों करोड़ों अनुयायी विश्व में फैले हुये हैं। गाँधी जी अपने एक क्षण को भी व्यर्थ न खोकर किसी न किसी कार्य में लगे रहते थे। और आवश्यकता होने पर कार्य की बातें भी कर लेते थे। इसी का प्रभाव है कि बड़े-बड़े विद्वान-बुद्धिमान एवं श्रीमान् उनके भक्त बन गये।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति-जून 1950 पृष्ठ 15
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/June/v1.15

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 25 March 2018


👉 नारी को विकसित किया जाना आवश्यक है। (भाग 6)

🔶 हमारा व्यक्तिगत और राष्ट्रीय भविष्य इस बात पर निर्भर है कि भावी पीढ़ियाँ सुसंस्कृत हों। स्कूली शिक्षा से आजीविका उपार्जन करने तथा विविध क्षेत्रों की साधारण जानकारी मिलने की बात पूरी हो सकती है, पर वे सद्गुण जो मानव की प्रधान सम्पत्ति हैं और जिनके ऊपर व्यक्ति तथा राष्ट्र की श्रेष्ठता निर्भर करती है, स्कूलों में नहीं सीखे जा सकते। उनके शिक्षण का सही स्थान है- घर का वातावरण और उसका निर्माण करती है- गृहिणी व्यक्ति और राष्ट्र की उन्नति के लिए हो रहे अनेकों प्रयत्नों में सुगृहिणी निर्माण कार्य अत्यधिक आवश्यक है। उपेक्षा करने पर बड़ी से बड़ी प्रगति भी व्यर्थ सिद्ध होगी। क्योंकि जब आगामी पीढ़ियों का व्यक्तित्व ही विकसित न हो सका तो बढ़ी हुई समृद्धि का भी कुछ लाभ न उठाया जा सकेगा वरन् बन्दर के हाथ में पड़ी हुई तलवार की तरह उसका दुरुपयोग एवं दुष्परिणाम ही हाथ लगेगा।

🔷 56 लाख साधुओं एवं भिखारियों का प्रश्न राष्ट्रीय प्रश्न है। इतने लोगों की उपार्जन क्षमता कुण्ठित पड़ी रहे और उनका निर्वाह भार जनता को वहन करना पड़े तो यह अर्थ संतुलन को बिगाड़ने वाली बात है। उससे भी बढ़कर चिंता की बात यह है कि हमारी आधी आबादी-नारी, कैदियों की भाँति घरों की चार-दीवारी में कलंकियों की तरह मुँह पर पर्दा डाले, घर वालों के लिए एक भार बनी बैठी रहे। इससे भी हमारा पारिवारिक एवं राष्ट्रीय अर्थ तंत्र असंतुलित ही होगा। यदि उनकी सामर्थ्य को विकसित किया जाए तो राष्ट्र के अर्थ तंत्र को समुन्नत बनाने में इतना योग मिल सकता है जितना कितनी ही विशालकाय योजनाएं भी नहीं दे सकती। इस समस्या के सामने भिखारियों की समस्या तुच्छ है। यदि हम नारी के विकास की समस्या को हल कर लें तो भिखारियों से भी अनेकों गुनी समस्या का हल हुआ समझना चाहिए।

🔶 जिन नारियों को हम माता, पत्नी, बहिन या पुत्री के रूप में प्यार करते हैं, जिन्हें सुखी बनाने की कुछ चिन्ता करते हैं उनके लिये रूढ़िवादी मान्यताओं द्वारा हम अपकार भी पूरा-पूरा करते है। किसी स्त्री का जब सूर्य अस्त हो जाता है और घर की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं होती तो उस बेचारी पर कैसी बीतती है इसे हममें से हर कोई जानता है। पर्दा प्रथा के कारण जो नारी बाजार से साग खरीदकर लाना भी नहीं सीख सकी, किसी के बात करना भी जिसे नहीं आता वह मुसीबत के समय पति या बच्चों के लिये दवा खरीदने या चिकित्सक को बुलाकर लाने में भी समर्थ नहीं हो सकती।

🔷 ऐसी स्त्रियों को जब अपने और अपने बच्चों के गुजारे की समस्या सामने आती है तब आगे केवल अंधकार ही दीखता है। किसी के दरवाजे पर भिखारी की तरह अपमान पूर्वक टुकड़ों से पेट भरते हुए उन्हें जिस व्यथा का सामना करना पड़ता है उसकी कल्पना यदि नारी को बन्धन में रखने वाले करें तो उनकी छाती पसीजे बिना न रहेगी। मानवता का दृष्टिकोण अपनाया जाए तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि नारी का भविष्य अंधेरे में लटकता हुआ छोड़ना अभीष्ट न हो तो उसे स्वावलंबी, अपने पैरों पर खड़ी होने योग्य बनाना ही चाहिये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति -दिसंबर 1960 पृष्ठ 28

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/December/v1.28

👉 The Spirituality & its Reality. (Part 3)

🔶 Friends! If I ever help you on any account either of humanity, spirituality or my soul and BHAGWAN, it is not my any favour extended to you, rather it is a favour done to my own soul which continues to complain me, ‘‘O rude man! Give something to this world, don’t eat up things. Avoid getting burdened with debt as here the man has been born only to give other eligible ones.’’
                                       
🔷 Friends! Each of you will land in above position once BHAGWAN comes to you, GAYTARI mantra comes to you. Each of you will land in the same position as that of mine. Whenever RAM will come to you, you will be living a life of HANUMAN; it means attaining a state of mind of HANUMAN implies RAM approaching to you. The day KRISHAN BHAGWAN comes to you; you will be living like ARJUN. If your approach in life is like that of HANUMAN and ARJUN, it can be said that either RAM or KRISHAN is with you.
                                  
🔶 Friends! It is an education of spirituality, of GAYATRI. You will say, ‘‘GURU JI, I came here to learn the magical tricks of GAYATRI mantra and yours’ other accomplishments. BETA!  There is no magic in the world and there is no importance and value of any ritual. Had it not been so, MARA, MARA of dacoit VALMIKI would not have worked; RAM, RAM of SHABRI would not have worked; your chanting of VISHNU SAHASTRNAM would not have gone in vein; your BHAGWAT-PATH( chanting of BHAGWAT) did not work but of SHABRI, her RAM-RAM continued to do miracles.

📖 From Akhand Jyoti

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 4)

🔶 माघ के महीने में लोग झोंपड़े लगा लेते हैं, उसी में रहते हैं, बाहर-निकलते ही नहीं, बाहर जाते ही नहीं, घर वालों को बुलाते ही नहीं। घरवाला अगर कोई आता है, तो सिर्फ खुशी के समाचार ही सुनाता है। कोई जरूरत की बात कहने आता है; पर यह नहीं कहने आता कि घर में यह आफत आ रही है कि वह आफत आ रही है। उनके चित्त में चंचलता उत्पन्न न हो, इसलिए वह लोग चिट्ठी-पत्री पर भी रोकथाम रखते हैं। हमारे पास चिट्ठी-पत्री मत भेजना, हमको एक महीने भगवान का नाम लेने देना, चिट्ठी-पत्री भेजकर, हम जो काम नहीं कर सकते हैं, उस काम के लिए हम पर दबाव मत डालना, न हम इधर के रहेंगे, न हम उधर के रहेंगे—न हम भगवान में ध्यान लगा सकेंगे, न घर की कोई सहायता कर सकेंगे। आप डावाँडोल स्थिति को मत रहने दीजिए। कल्प-साधना वालों का यह नियम है। आप भी इन नियमों का पालन कीजिए और अनुभव कीजिए कि हम एकान्तवास में हैं।

🔷 एक दिन मैंने आपसे पिछले समय में कहा भी है कि एक महीने आप यहाँ सिर्फ दो बातों का अनुभव किया कीजिए कि हम यहाँ न सिर्फ एकान्त में रहते हैं, बल्कि माताजी के पेट में निवास करते हैं। आप शान्तिकुञ्ज को यह मानकर चलिए कि यह माताजी का पेट है और पेट में जैसे बच्चा रहता है, भ्रूण रहता है, उसी तरह, भ्रूण की तरह, बच्चे की तरह आप निवास करिए। यह माताजी का आध्यात्मिक पेट है, जिसमें आप बच्चे की तरह निवास कर सकते हैं और यहाँ से जाने के बाद में आप अपने आपके एक नये जन्म का अनुभव कर सकते हैं। माताजी का बेटा—माताजी का बेटा आप नहीं बन सकते? क्या हर्ज है, आपको, बताइए?

🔶 मदालसा के बेटे आप नहीं बन सकते? कुन्ती के बेटे बनने में आपको शर्म आती है, बताइए? सीता के बेटे अगर आप बन जाएँ, तो क्या हर्ज है आपको? नहीं, कुछ हर्ज नहीं होगा आपका। आप अगर ऐसी मनःस्थिति बना लें, तो आपको अपनी गौरव-गरिमा का भान होगा और गौरव-गरिमा का आपको कदाचित् भान हो जाए, तो आप यकीन रखिए, आपका कल्प-साधना में आना सार्थक हो जाएगा। फिर आप ऐसी दिशा, ऐसी प्रेरणा और ऐसा चिन्तन लेकर जाएँगे कि मजा आ जाएगा! इसलिए आप यह अनुभव करते रहिए कि एक महीने तक हम माताजी के पेट में बैठे हुए हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 71)

👉 एक ही यज्ञ-अहं को भस्म कर देना
  
🔶 गुरुगीता के महामंत्रों की साधना से शिष्य के अस्तित्व का सद्गुरु की चेतना में लय होता है। अध्यात्म जगत् में यह अनुभूति बड़ी दुर्लभ है और यह किसी को यूँ ही नहीं मिल जाती। इसके पहले शिष्य को असंख्य-अनगिनत परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। प्रत्येक परीक्षा उसके अहं पर संघातिक प्रहार करती है। इस बज्राघात की पीड़ा जिसने सही है, वही जान सकता है। इस तरह का प्रत्येक आघात शिष्य के समर्पण के समक्ष महाचुनौती खड़ी करता है। ऐसी असंख्य चुनौतियों का सक्षम उत्तर विरले ही दे पाते हैं। अन्यथा बाकी तो बुद्धि के तर्कों एवं मन द्वारा खड़े किए गए उपद्रवों के सामने हथियार डाल देते हैं। उनके हाथ-पाँव अनायास ही फूल जाते हैं और समर्पण पथ से विचलित हो पलायन कर बैठते हैं। आध्यात्मिक साधना की समरभूमि ऐसे अनेकों पलायनवादियों की कायरता की साक्षी रही है।
  
🔷 समर्पण के भाव बने रहें, शिष्य का अस्तित्व सद्गुरु की चेतना में घुलता रहे, इसके लिए परम पूज्य गुरुदेव के ध्यान का सातत्य हमेशा बना रहना चाहिए। इसी ध्यान के बारे में ऊपर के मंत्रों में शिष्यों ने पढ़ा कि भगवान् शिव माता पार्वती से कहते हैं कि शिष्यत्व की साधना करने वालों को अपने हृदय कमल की कर्णिकाओं के बीच गुरुदेव की दिव्य भावमूर्ति का ध्यान करना चाहिए। भाव यह रहे कि उनकी दिव्य मूर्ति से शुभ्र चाँदनी सा प्रकाश विकीर्ण हो रहा है। ये सद्गुरु देव अपने शिष्यों के लिए वरदायी मुद्रा में आसीन हैं। उनके वामभाग में उनकी लीला सहचरी दिव्य शक्ति माँ विद्यमान हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 113

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

👉 लालच का सातवां घड़ा

🔷 बात बहुत पुरानी है. भारत के उत्तरी हिस्से में एक धनी व्यापारी रहता था. कई वर्ष पहले उसकी पत्नी का देहांत हो गया था. उसका घर पहाड़ी पे स्थित होने के कारण वो रोज मैदानी भाग में बसे हुए शहर में नीचे जाता और चीज़ों का लेन-देन करता था. एक दिन वह अपना मन बहलाने के लिए कही और जाने की सोचा. पहाड़ों की वादियों और जंगलों का नजारा लेने के लिए निकल पड़ा. घूमते-घूमते दोपहर हो गई थी, वो थक के चूर हो गया था. अब उसे नींद भी आने लगी थी. आराम करने के लिए व्यापारी जगह तलाशने लगा, कि उसे एक छोटी सी गुफा दिखी. जिसमे बहुत अंधेरा था, लेकिन इसकी परवाह करे बिना वो गुफा के अंदर जाके सो गया. जब नींद खुली तो उसने पाया कि गुफा में कुछ है।

🔶 गुफा में कुछ और अंदर जाने पे उसे बहुत बड़ा एक मिट्टी का घड़ा दिखा. वहाँ आस-पास कुछ और भी घड़ें थे. जो कि गिनती में पूरे सात घड़ें थे. व्यापारी को आश्चर्य भी हो रहा था और डर भी लग रहा था. क्योकि कही से ना तो कोई आवाज़ आ रही थी और ना ही उन घड़ों के पास कोई था. बड़ी मुश्किल से डरते-डरते उसने एक घड़ें का ढक्कन खोला और चकित रह गया. उस घड़ें में सोने के सिक्के ही सिक्के थे. फिर एक-एक करके उसने पाँच घड़ों के ढक्कन खोलकर देखे. सभी में स्वर्ण भरा था. छठे घड़ें को खोलने पर उसे एक पुराना सा कागज का टुकड़ा मिला. जिसमे लिखा था – ”इस सोने के सिक्कों को ढूंढने वाले, सतर्क रहना! यह सारे घड़ें और स्वर्ण तुम्हारें है, लेकिन इस धन को एक श्राप है. इन्हें ले जानें वाला उस श्राप से कभी मुक्त भी नही होगा।

🔷 जिज्ञासा में बड़ी ताक़त होती है, पर लालच उससे भी ज़्यादा शक्तिवान होता है. इतने धन की प्राप्ति के बाद व्यापारी ने समय व्यर्थ नही किया. उसने एक बैलगाड़ी की व्यवस्था कि और सभी घड़ों को अपने निवास पे ले जाने लगा. घड़े बहुत भारी थे. एक बार में वो दो घड़ें ही ले जा सकता था. रात के सन्नाटे में उसने छः घड़ें अपने घर ले जाकर रख दिए. सातवें घड़ें को ले जाना उसके लिए आसान था, क्योकि इस बार बोझा काफी कम था।

🔶 घर पहुंच कर व्यापारी ने सोचा पूरे घड़ों के सिक्कों की गिनती कर ली जायें. बारी-बारी उसने छः घड़ों के सिक्कों की गिनती कर ली. सातवें घड़े को खोलने पे उसने पाया कि वो तो आधा ही भरा हुआ है. व्यापारी बहुत दुखी और हताश हुआ. श्राप वाली बात वो भूल चुका था. श्राप की बात कहने वाले उस कागज को उसने बेकार समझ कर कब का फेंक दिया था. व्यापारी के दिल और दिमाग में अब और अधिक लालच पनपनें लगा. उसने सोचा कैसे भी करके इस सातवें घड़ें को भी पूरे धन से भरना है. उसने अधिक से अधिक धन कमाने के लिए एडी-चोटी का पूरा ज़ोर लगा दिया. लेकिन सातवें घड़े में चाहें जितना भी धन डालो, वो हमेशा आधा का आधा ही रहता. सातवें घड़े को भरने के प्रयास में व्यापारी कुछ साल और जिया, फिर एक दिन उसकी मौत हो गई. लेकिन अपने धन का उसे कोई सुख नही मिला. क्योकि वो धन उसके लिए कभी भी पर्याप्त था ही नही।

🔷 क्या उस धनी व्यापारी को अपने जीवनयापन के लिए सच में इतने धन कि आवश्यकता थी. धन कमाना ग़लत नही है. लेकिन उसका सदुपयोग ना करके सिर्फ़ संचय करते रहना बहुत ग़लत है. संचय कि भावना से कमाया हुआ सारा धन ना तो खुद के काम आता है और ना ही किसी अच्छे प्रयोजन में लगता है. इससे तो लालच का दायरा बढ़ता है. जैसे इस कहानी में व्यापारी का लालच चरम सीमा तक पहुंच गया था।

👉 अपने आप का निर्माण

🔷 मित्रो ! आत्मा को, अपने आप का निर्माण कर लेना-नम्बर एक। अपने परिवार का निर्माण कर लेना-नम्बर दो। अपने समाज को प्रगतिशील बनाने के लिए, उन्नतिशील बनाने के लिए कुछ-न-कुछ योगदान देना-नम्बर तीन। तीन काम अगर आप कर पाएँगे, तो आपको समझना चाहिए कि आपने आत्मा की भूख को बुझाने के लिए और आत्मिक जीवन को समुन्नत बनाने के लिए कुछ कदम बढ़ाना शुरु कर दिया, अन्यथा यही कहा जाएगा कि आप शरीर के लिए मरे हैं और शरीर के लिए ही जिए हैं। शरीर ही आप का इष्टदेव है।

🔶 इन्द्रियों के सुख ही तो आपकी आकांक्षा है। वासना तृष्णा ही तो आपको सबसे प्यारे मालूम पड़ते है। शरीर ही सब कुछ नहीं है, शरीर की आकांक्षाएँ ही सब कुछ नहीं है, इन्द्रियाँ ही सब कुछ नहीं है, मन की लिप्सा और लालसा ही सब कुछ नहीं है। कहीं आत्मा भी आपके भीतर है और आत्मा अगर आपके भीतर है, तो आप ये भी विश्वास रखिये कि उसकी भूख और प्यास भी है। आत्मा के अनुदान भी असीम और असंख्य हैं, लेकिन उसके भूख और प्यास भी है। पौधों के द्वारा, पेड़ों के द्वारा हरियाली भी मिलती है, छाया भी मिलती है, पर उनकी अपनी जरूरतें भी तो हैं। आप जरूरत को क्यों भूल जाते हैं? खाद की जरूरत नहीं है? पानी की जरूरत नहीं है? उनकी रखवाली की जरूरत नहीं है? उनकी रखवाली न करेंगे, खाद-पानी नहीं देंगे, तो पेड़ों से और पौधों से क्या आशा करेंगे? इसी तरीके से जीवात्मा का पेड़ और वृक्ष भी अपनी खुराक माँगता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 24 March 2018


👉 नारी को विकसित किया जाना आवश्यक है। (भाग 5)

🔷 शरीर के सुख साधन पैसे के बल पर खरीदे जा सकते हैं पर आत्मा को विकसित करने वाले सद्गुण धन के बदले में नहीं मिल सकते। परिजनों की भौतिक समृद्धि के सुखोपभोग के ऐशोआराम के साधन कोई धनी व्यक्ति आसानी से जुटा सकता है पर बालकों पर संस्कार डालने का काम धन खर्च करने मात्र से नहीं हो सकता। यदि इतने में ही परिवार की उन्नति हमने मान रखी हो तो बात दूसरी है पर यदि हमने विकसित व्यक्तित्व का मूल्याँकन किया हो और यह माना हो कि बात की बात में नष्ट हो जाने वाली दौलत की अपेक्षा व्यक्तित्व की प्रतिभा की महत्ता अधिक है तो निश्चय ही उसके लिए वे प्रयत्न करने होंगे जिनसे व्यक्तित्व विकसित होता है। ऐसे प्रयत्नों में सबसे प्रधान, सब में आवश्यक यह है कि नारी के मानसिक संस्थान को प्रबुद्ध किया जाए। इसके लिए उसे एकदम घुटाने वाली पराधीनता से गुण करना होगा। इन बंधनों में रहते, किताबी ज्ञान करा देने जैसे उपायों से न उसे आगे बढ़ाया जा सकता है और न ऊंचा उठाया जा सकता है।

🔶 भविष्य की चिन्ता प्रत्येक व्यक्ति को रहती है। आने वाले कल की निश्चिन्तता के लिये जो कुछ बन पड़ता है सुरक्षात्मक प्रयत्न करते हैं। बीमा व्यवसाय इसी आधार पर टिका हुआ है। हमारा बुढ़ापा शान्तिमय बीते इसके लिये कुछ बचा लेना, जमा कर लेना ही पर्याप्त न होगा वरन् जिन लोगों के साथ जीवन के अंतिम दिन काटने हैं उन्हें सज्जन और सौम्य बना लेना ही वह कार्य होगा जिससे भावी जीवन की शाँति के संबंध में निश्चिन्तता हो सके।

🔷 आज हमारे बच्चे उद्दंडता, अवज्ञा, आलस्य एवं विलासिता की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। यह स्थिति अभिभावकों से लेकर अध्यापकों तक को चिन्तित बनाये हुए है। राष्ट्र का भविष्य जिस भावी पीढ़ी के हाथ में है वह यदि सद्गुणी न हुई तो समाज में बुराइयाँ ही बढ़ेंगी। जिस भ्रष्टाचार का, अनैतिकता का, विलासिता का, स्वार्थता का आज चारों ओर बोलबाला है उसके कारण अवाँछनीय कार्यों की संख्या दिन-दिन बढ़ती जा रही है। यदि यह अभिवृद्धि न रुकी तो उन्नति की अनेक योजनाओं के होते हुए भी भविष्य अन्धकारमय ही रहेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति -दिसंबर 1960 पृष्ठ 28

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/December/v1.28

👉 The Spirituality & its Reality. (Part 2)

🔷 BHAGWAN asks, calls for an explanation from everybody and goes on saying only this, ‘‘I have offered you the human life, the most precious item of not only my treasure but of this world also. Give answer how you have expended the same? Give answer, O culprit! Give its answer to me. O accused! Just answer me.’’ BHAGWAN just goes on asking this question. BHAGWAN where on one hand goes on asking, ‘‘what did you give me?’’ we on the other keep demanding from him our dues asking him, ‘‘I have three daughters, where is my son as fourth child? I am earning 250 rupees per month, where is my promotion to 400 rupees per month? I have 80 BIGHA agricultural fields, while it should have been 100 BIGHAs.

🔶 Thus we keep complaining from BHAGWAN that he did not give so and so and in a way we continue to live with a list of have-nots.  Complaints begin to be generated from both the sides. BHAGWAN says, ‘‘you do not give this and that to me.’’ Here we say, ‘‘O BHAGWAN, you did not give me this and that.’’ This state of mind if allowed to be sustained makes in long run our circumstances complex and rigid leading us to live a spoiled life.

🔷 O man! Believe me, BHAGWAN is a particular stream of PARMATMA (a self-regulatory mechanism existing in the universe) and it comes in the form of some help or assistance from some quarter (internal or external). BHAGWAN rushing towards you for your help simply means thoughts of generosity, kindness occupying a seat in your mind and tendencies to help others and offer whatever is possessed to needy ones, occupying a seat in your mind.

📖 From Akhand Jyoti

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 3)

🔷 यह गुफा प्रवेश है आपका। हमको ऐसा ही करना पड़ा है, जब कभी भी हमारा मन अस्त-व्यस्त हुआ है, तो गुरुदेव ने बुलाया और एक ऐसे स्थान पर रखा, जहाँ हमारे अलावा कोई नहीं था। इससे हमको अपने बारे में विचार करने का मौका मिलता है। आदमी आमतौर से तो दूसरों पर ही विचार करता रहता है। दुकान में क्या हुआ? बेटे का क्या हुआ? बेटी का क्या हुआ? भतीजी का क्या हुआ? दुनिया के जंजाल को तो आदमी बुनता रहता है; पर अपने बारे में कभी विचार नहीं करता। हमको उस एकान्त स्थान में रह कर करके कई बार हिमालय जाना पड़ा, तब हमें कई बार अपने आप में विचार करने का मौका मिला। गुरुदेव का आदेश था कि बाहर की बात पर मत विचार करना, सिर्फ अपनी बात विचार करना और कोई बात मत विचार करना। हमने भी वैसा ही किया। आपको भी ऐसा ही करना पड़ेगा। जब आप यहाँ आए हैं, सिर्फ अपने बारे में विचार करना चाहिए और सब बातों को भूल जाना चाहिए। खासतौर से आप घर की बातों को भूल ही जाएँ।

🔶 घर की बातों को आप जरा भी स्मरण न करें। घर में क्या हो रहा होगा? फायदा हो रहा होगा कि नुकसान हो रहा होगा, बेटी का ब्याह हो रहा होगा, बेटे का ब्याह हो रहा होगा, अमुक बात हो रही होगी, अमुक बीमार पड़ा होगा, इन बातों से आप क्या कर सकते हैं? या तो आप वहाँ जाइये, विवाह-शादी कीजिए; नहीं जा सकते, तो चिन्ता को छोड़िए। आप एकान्त में भी रह रहे हों और एकान्त के फायदे को भी खत्म कर रहे हों—यह सब मत कीजिए।

🔷 आप सबसे पहले अपने मन को अलग कर लीजिए और यह मानकर चलिए कि हम एक महीने के लिए कहीं अलग, विदेश चले गए हैं, बीमार हो गए हैं या कुछ और हो गए हैं। एक महीने अगर आप चिन्ता नहीं करेंगे, तो आपका मन उस दिशा में चलेगा, जहाँ आपको विचार करना चाहिए और आप अगर अपने मन को खाली नहीं करेंगे, जंजाल में ही बनाए रखेंगे, तो आप इस एकान्त साधना में, जिस उद्देश्य के लिए बुलाए गए हैं, आपके लिए पूरा कर सकना सम्भव नहीं होगा। फिर क्या करें? जैसा आपने सुना होगा कि इलाहाबाद में कल्प-साधना के शिविर चलते हैं और वह त्रिवेणी के तट पर माघ के महीने में महीने भर के होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 70 )

👉 गुरु ही इष्ट है, इष्ट ही गुरु है

🔷 बंगाल में एक सन्त हुए अवधूत तारानाथ, इन्होंने ध्यान की अलग-अलग तकनीकों का विकास किया है। अवधूत तारानाथ महान् योगी होने के साथ उच्चकोटि के तंत्र साधक भी थे। उन्होंने तंत्र एवं योग के मिश्रण से ध्यान साधना पर गम्भीर अन्वेषण किए। उनका कहना था कि एक देवता के सैकड़ों- सहस्रों मंत्र होते हैं। कामना, कल्पना एवं संकल्प की दृष्टि से प्रत्येक मंत्र देवता के स्वरूप एक भिन्न आयाम को प्रकाशित-परिभाषित करता है। इनमें से साधक अपनी साधना के लिए जिस भी मंत्र का चयन करता है, उस मंत्र की प्रकृति के अनुरूप उसमें योग के ऐश्वर्य का विकास होता है।
  
🔶 ध्यान के सम्बन्ध में भी यही यथार्थ है। एक ही देवता के विविध ध्यान होते हैं। जो साधक की अलग-अलग भावनाओं एवं विचारों को मूर्त करते हैं। अवधूत तारानाथ सभी तरह की ध्यान प्रक्रिया में गुरु ध्यान को विशेष महत्ता देते थे। उनका कहना था कि गुरुदेव सर्वदेव, देवीमय हैं। उनके ध्यान से सभी का ध्यान हो जाता है। साधक के जीवन में सारे सुफल आ जाते हैं। उन्होंने स्वयं अपनी साधना इसी विधि से सम्पन्न की। उनका जन्म बंगाल के एक गाँव में हुआ था। जन्म के थोड़े दिनों में ही उनके माता-पिता का देहान्त हो गया। अनाथ बालक बेचारा असहाय की भाँति इधर-उधर भटकने लगा।
  
🔷 तभी उनकी भेंट माँ तारा के परम भक्त वामाखेपा से हुई। वामाखेपा की चेतना सदा माँ में लीन रहती थी। उनकी दृष्टि जब इस बालक पर पड़ी, तो उन्होंने इसे माँ की शरण में जाने की सलाह दी। पर इस अनाथ बालक को अपना सब कुछ इन्हीं में नजर आया। उन्होंने बड़े ही सरल भाव से कहा- बाबा, आपके लिए सब कुछ माँ हैं। पर मेरे लिए मेरे सब कुछ आप हैं। मैं आपकी ही शरण में आऊँगा। बालक की इन भोली बातों पर वामाखेपा हँस दिए। पर उस बालक ने वामाखेपा को अपना गुरुदेव एवं इष्ट सब कुछ मान लिया।
  
🔶 माँ तारा के मन्दिर से थोड़ी दूरी पर उसने अपनी साधना प्रारम्भ कर दी। गुरु का ध्यान, उनका चिन्तन एवं गुरु की सेवा। कर्म, विचार व भावनाओं का प्रवाह नित्य निरन्तर सद्गुरु की दिशा में बह चला। वृत्तियाँ गुरुदेव में तदाकार होने लगीं। एक कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि को जब आकाश में पूर्णचन्द्र उदित था, अवधूत तारानाथ के अन्तर्गगन में भी पूर्णिमा का चन्द्र उदित हो गया। स्वयं वामाखेपा उसके अन्तराकाश में हँस रहे थे। उनकी परावाणी के स्वर अवधूत तारानाथ के कण-कण में समा रहे थे- बेटा! गुरु ही इष्ट है, इष्ट ही गुरु है। गुरु के ध्यान से सब कुछ मिल जाता है। यही सच है। सद्गुरु की यह कृपा अवधूत तारानाथ के जीवन में घनीभूत हो गयी। उन्हें अपनी गुरु-भक्ति से साधना जीवन का सार मिल गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 112

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 23 March 2018

गुरुवार, 22 मार्च 2018

👉 ईश्वर की भक्ति (अन्तिम भाग)

🔶 प्रार्थना का सच्चा उत्तर पाने का सब से प्रथम मार्ग आत्म विश्वास है। आत्म विश्वासी, शरीर और मन से भरपूर प्रयत्न करता है। कर्तव्य परायण द्वारा ही सच्ची प्रार्थना होनी सम्भव है। तैरने वाला ही समुद्र के गहरे जल में डुबकी लगा कर तली में से मोती ढूँढ़ ला सकता है। जो पानी को देखकर जी चुराता है, उसके लिए मोती पाना तो दूर तैरने का आनन्द लेना भी कठिन है। समय को बर्बाद करने वाले, काम से जी चुराने वाले, अज्ञानी और इन्द्रिय परायण लोग भक्त नहीं हो सकते, चाहे वे कितना ही ढोंग क्यों न रचते हों, ऐसे लोग ईश्वर के नाम पर भिक्षा माँग कर पेट भर सकते हैं। प्रार्थना नहीं कर सकते। प्रमाद और प्रेम यह दोनों तो एक दूसरे के विरोधी तत्व हैं जहाँ एक होगा वहाँ दूसरा ठहर नहीं सकता।

🔷 आज देखते हैं कि असंख्य मनुष्य ईश्वर पूजा का कर्म काण्ड करते हैं पर उन्हें रत्ती भर भी लाभ नहीं होता। कारण यह है कि वे प्रथम, आत्मा को जानने का कष्ट नहीं करते और व्यर्थ की तोता रटन्त में अपना समय बर्बाद करते हैं।

🔶 सच्चा भक्त अपनी आत्मा के दिव्य मन्दिर में परमात्मा का निरन्तर दर्शन करता है। ईश्वर उसके बिलकुल निकट है। अपने दिलदार को दिल में छिपाये हुए वह निहाल बना रहता है। प्रभु का पावन चित्र उसके हृदय पर अंकित होता है। वह व्यर्थ की उलझनों में नहीं पड़ता वरन् अनुभव करता है कि—”दिल के आइने में है तस्वीरें यार, जब जरा गर्दन उठाई देख ली।” वह ईश्वरीय प्रेम का दिव्य समुद्र अपने चारों ओर लहराता हुआ देखता है और उसमें आनन्द के गोते लगाता है। ऐसे ईश्वर परायण भक्त की आन्तरिक ज्योति उसके बाहरी आचरण में स्पष्ट दिखाई देने लगी है। अपने को आत्म भाव से देखने वाला, ईश्वरीय अखण्ड ज्योति के प्रत्यक्ष दर्शन करने वाला, मनुष्य महात्मा—बन जाता है। वह तुच्छ स्वार्थों और इन्द्रिय लालसाओं में वशीभूत होकर दुष्कर्म नहीं करता। पवित्रता और प्रेम की अजस्र धारा उसके आचरणों में से निर्झरिणी की तरह झरती है, उसके लिए अमुक विधि से प्रार्थना करने की बाधा नहीं रहती। चाहे जिस तरीके से और चाहे जब वह प्रार्थना करता रह सकता है, उसकी हर एक पुकार प्रभावशाली होती है और निश्चित परिणाम उपस्थित करने की पूर्ण सामर्थ्य रखती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1985 पृष्ठ 26

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/March/v1.2

बुधवार, 21 मार्च 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 22 March 2018


👉 उपासना बिना कल्याण नहीं (भाग 1)

🔶 चन्द्रमा तब चमकता है जब उस पर सूर्य चमकता है। जब वह चमक उसे प्राप्त नहीं होती है तो अमावस्या के दिन यथास्थान रहते हुए भी उसका अस्तित्व लुप्त प्रायः ही रहता है। होते हुए भी न होने जैसी स्थिति उसकी रहती है। पृथ्वी के उतने भाग में दिन रहता है जितने पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं। जितने भाग पर वे नहीं चमकती वहीं घोर अन्धकार छाया रहता है, और हाथों-हाथ सूझ नहीं पड़ता। यही बात आत्मा के सम्बन्ध में है। उस पर जब परमात्मा का प्रकाश चमकता है जो उज्ज्वल और दीप्तिमान दीखता है और जब वह चमक बन्द हो जाती है तो मानव शरीर धारी एक निकृष्ट नर-पशु के रूप में एक घृणित एवं निकम्मा अस्तित्व मात्र ही दृष्टि गोचर होता है। परमात्मा से दूर रहने वालों मनुष्य बहुधा मनुष्यता से रहित ही पाये जाते हैं।

🔷 आत्मा, परमात्मा का एक अंश मात्र है। उसे जो कुछ शक्ति और प्रतिभा प्राप्त है ईश्वर की ही विभूति है। जिसमें वह विभूति जितनी कम पड़ जाती है वह उतना ही दीन-हीन बना रहता है। शक्ति का स्रोत जिस उद्गम से प्रवाहित होता है उसके साथ सम्बन्ध जोड़ लेने से सामान्य जीव को भी शक्ति का पुँज बनने में देर नहीं लगती। बिजलीघर के साथ जुड़े हुए पतले-पतले तार अपने भीतर इतनी शक्ति धारण कर लेते हैं कि उनके द्वारा सैकड़ों घोड़ों की शक्ति वाली मशीनें धड़-धड़ाती हुई चलने लगती हैं। उनको स्पर्श करने वाले बल्ब अन्धेरी रात को दिन जैसा प्रकाशवान बना देते हैं। बिजली घर से जब तक सम्बन्ध है तभी तक उन तारों में यह विभूति रहती है कि उनके स्पर्श से चमत्कार उत्पन्न हो सके जब वह सम्बन्ध कट जाता है, तारों को बिजली घर के विद्युत भण्डार की धारा का प्रवाह मिलना रुक जाता है तो फिर उनका कोई महत्व नहीं रह जाता। देखने से पहले जैसा लगने पर भी वे न प्रकाश उत्पन्न करते हैं और न मशीनें चला पाते हैं। तार का मूल्य बिजली घर से सम्बन्ध होने के कारण हो तो या, वह टूट गया तो फिर उसकी महत्ता कहाँ स्थिर रह सकती थीं?

🔶 आत्मा के द्वारा अनेक लौकिक और पारलौकिक प्रयोजन पूर्ण किये जाते हैं। अनेकों सफलता और समृद्धियों को प्राप्त करने का श्रेय आत्म-बल को ही दिया जा सकता है। शरीर की दृष्टि से सब मनुष्य लगभग समान होते हैं। देह के बल पुञ्जों में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। फिर भी मनुष्य-मनुष्य के बीच जमीन आसमान का अन्तर पाया जाता है। एक भीरु है तो दूसरा दुस्साहसी। एक दुष्ट है तो दूसरा महात्मा। एक तृष्णा वासना की मृग मरीचिका में भटकता है, दूसरा आनन्द और उल्लास की परितृप्ति का रसास्वादन करता है। एक के उद्वेग और शोक सन्ताप का ठिकाना नहीं, दूसरे को सन्तोष की शान्ति आह्लादित किये रहती है। एक को सम्पूज्य और दूसरे को तिरस्कृत देखते हैं। एक प्रगति की ओर बढ़ रहा है तो दूसरा पतन के गर्त में गिरता ही चला जा रहा है। इस प्रकार के असाधारण अन्तर मनुष्य की आन्तरिक आत्मिक स्थिति की भिन्नता के कारण ही उत्पन्न होते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1964 पृष्ठ 27

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/April/v1.6

👉 नारी को विकसित किया जाना आवश्यक है। (भाग 4)

🔶 राम हमारे घरों में आये, इसके लिए कौशल्या की जरूरत है। कृष्ण का अवतार देवकी की कोख ही कर सकती है। कर्ण, अर्जुन और भीम के पुनः दर्शन करने हों तो कुँती तैयार करनी पड़ेगी। हनुमान चाहिये तो अंजनी तलाश करनी होगी। अभिमन्यु का निर्माण कोई सुभद्रा ही कर सकती है। शिवाजी की आवश्यकता हो तो जीजाबाई का अस्तित्व पहले होना चाहिये यदि इस ओर से आँखें बंद कर ली गई और भारतीय नारी को जिस प्रकार अविद्या और अनुभव हीनता की स्थिति में रहने को विवश किया गया है, उसी तरह आगे भी रखा गया हो आगामी पीढ़ियाँ और भी अधिक मूर्खता उद्दंडता लिए युग आवेगी और हमारे घरों की परिपाटी को नरक बना देंगी। परिवारों से ही समाज बनता है फिर सारा समाज और भी घटिया लोगों से भरा होने के कारण अब से भी अधिक पतनोन्मुखी हो जायेगा।

🔷 आज हमारे बालकों की क्या स्थिति है, इसे बाहर ढूंढ़ने जाने या कोई रिपोर्ट तैयार कराने की जरूरत नहीं है। हममें से हर कोई अपने-अपने घरों को देख सकता है और छाती पर हाथ रखकर कह सकता है कि अपने बच्चों के गुण कर्म स्वभाव के संबंध में संतोष है या असन्तोष? अब अंधे माता-पिता को कंधे पर बिठा कर तीर्थ यात्रा कराने वाले श्रावण कुमार ढूंढ़ने न मिलेंगे। पिता का संकेत और विमाता की इच्छा मात्र प्रतीत होते ही वन गमन करने वाले राम आज किसी घर में तलाश तो किये जाएं?

🔶 भाई के लिये जान देने वाले भरत और लक्ष्मण शायद ही किसी विरले घर में मिलें? पति के आदेश पर बिक जाने वाली शैव्या आज कितने पतियों को प्राप्त है यह जानना कठिन है। ऐसे उच्च मानसिक स्तर से भरे हुए परिवार आज ढूंढ़े नहीं मिल सकते। इसका एकमात्र कारण है- नारी की अधोगति। जब सोता ही सूखा गया तो नाले में पानी कहाँ से बहेगा? जब नारी की दुर्दशाग्रस्त स्थिति में पड़ी है तो उससे उत्पन्न होने वाली सन्तान के समुन्नत होने की आशा करना दुराशा मात्र ही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति -दिसंबर 1960 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/December/v1.27

👉 The Spirituality & its Reality. (Part 1)

🔶 So much high faculties and life of a man have been provided to us for what job and BHAGWAN has sent you at which specific time?—To fulfill our obligations. This backward nation, backward civilization, backward culture and backward caste—all were just crying in pain with disastrous chaos to be let loose and was needing your help. The humanity was begging but you kept ignoring it under pretence that you have your own business to do, have to do service, have to give birth to children and earn money. You said that but humanity asked you, ‘‘ I need your money.’’ ‘‘I need your time.’’ ‘‘I need your labour.’’ The humanity asked your labour, time and money but you just denied. You are an offender and even BARAH BHAGWAN does not spare an offender.
                                  
🔷 I said that I go and I did just that. Now I go to HIMAALAYA but will not allow my friends to keep crying in pain of sin. I will lift you to carry you and will tear your stomach apart if its need be. I will do that ruthlessly as only blessing is not my job. To tear your stomach apart is also my job.
                                 
🔶 Blessing is the job of almost every gentle man and it should be that.  Such men maintained their honesty and moral that giving is the duty and responsibility of every man. It is the demand of the spirituality; I do not do any favour to you or others. It is my spirituality and anyone’s spirituality will not allow one to sit in peace. It will keep cursing, hurting and saying, ‘‘O man! You are not born for eating, rather for giving.’’ It is your right to give and what you gave to this world? Spirituality says & pinches.

📖 From Akhand Jyoti

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 2)

🔶 पिछला शिविर, जो आपसे पहले का गया है, उसमें ढेरों आदमी ऐसे थे, जो अपना वजन छह-छह पौण्ड बढ़ाकर ले गए; क्योंकि जो उन्होंने हल्का-सात्विक भोजन किया, वह ठीक तरीके से हजम हुआ, कम मात्रा में खाया, पेट पर दबाव कम पड़ा, हर तरह से हजम होता चला गया और रक्त बढ़ता गया तथा उनकी सेहत में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ। आप भी ऐसे ही कर लेंगे, जो जायकेदार चीजें हैं, जो न केवल महँगी होती हैं, बल्कि हानिकारक भी होती हैं, उनसे आप अपना पिण्ड छुड़ा लें, तो समझना चाहिए आपने एक ऐसे भूत-प्रेत से पिण्ड छुड़ा लिया, जो देखने में तो बड़ा आकर्षक मालूम पड़ता था; पर आपको पटक-पटक के मारता था। इस दृष्टि से उपवास का भी महत्त्व तो है; लेकिन उपवास के महत्त्व से भी बढ़कर है अनुशासन का महत्त्व। अब आपको एक नई दिशा पकड़नी है, अब आपको एक नया जन्म लेना है। आप एक नया जन्म लेने की कोशिश कीजिए और यह कोशिश कीजिए कि पिछला समय हमारा जीवन सामान्य स्तर का था।

🔷 घिनौना तो मैं क्यों कहूँ? पर आप यह मान सकते हैं कि घटिया स्तर का जीवन था। घटिया ही कहना पड़ेगा, घटिया क्यों न कहें? घटिया मुझे इसलिए कहना चाहिए कि आपके अन्दर भगवान् ने जो क्षमताएँ दी हैं, अगर आपने सही तरीके से उनका विकास किया होता, तो यकीन रखें, आप दूसरे कबीर हो गए होते; आप यकीन रखें, आप दूसरे रविदास और गुरुनानक हो गए होते; आप यकीन रखें, आप दूसरे विवेकानन्द रहे होते और दयानन्द रहे होते; गाँधी हो गए होते; अब्राहम लिंकन हो गए होते। यह भी तो सब घटिया और छोटे स्तर के लोग थे; लेकिन जब उन्होंने अपने आप को समझ लिया और अपने आपकी सही दिशाधारा को ठीक पकड़ लिया और उसी रास्ते पर क्रमबद्ध रूप से चलते चले, तो कहाँ-से पहुँच गये?

🔶 आपके लिए भी यह पूरे तरीके से मुमकिन था; पर आप कर नहीं पाये, क्यों? दिक्कत क्या थी? पैसा नहीं था? साधन नहीं थे? बेकार बात मत करिए! न पैसे से कोई ताल्लुक है, न साधनों से कोई ताल्लुक है, न कठिनाइयों से कोई ताल्लुक है; केवल एक ही बात से ताल्लुक है कि आपका मनःसंस्थान बहुत गया-बीता बना रहा और उसमें से यह विचार न आया कि हमको महान जीवन के अनुरूप अपनी विचारधारा बना लेनी चाहिए। बस, यही एक कारण था। अब आप उस कमी को यहाँ पूरी कर ले जाइए। यह बीच का समय मिला है आपको। बीच का समय नया जन्म लेने का समय है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

http://awgpskj.blogspot.in/2018/03/1_19.html

👉 गुरुगीता (भाग 69)

👉 गुरु ही इष्ट है, इष्ट ही गुरु है

🔶 अपने इन कृपालु सद्गुरु को किस भाँति ध्यायें? किस तरह उनकी धारणा करें? इस साधना विधान को स्पष्ट करते हुए भगवान् सदाशिव माता भवानी से कहते हैं-

हृदंबुजे कर्णिकमध्यसंस्थे सिंहासनेसंस्थितदिव्यमूर्तिम्।
ध्यायेद्गुरुं चन्द्रकलाप्रकाशं चित्पुस्तकाभीष्टवरं दधानम्॥ ९१॥

श्वेताम्बरं श्वेतविलेपपुष्पं मुक्ताविभूषं मुदितं द्विनेत्रम्।
वामांङ्कपीठस्थितदिव्यशकिं्त मन्दस्मितं सांद्रकृपानिधानम्॥ ९२॥

🔷 (शिष्य धारणा करें) उसके हृदय कमल की कर्णिकाओं के बीच स्थित सिंहासन में गुरुदेव की दिव्यमूर्ति विराजमान है। इस दिव्यमूर्ति से शुभ्र चाँदनी सा प्रकाश विकीर्ण हो रहा है। इन सद्गुरुदेव के एक हाथ में पुस्तक है और दूसरा हाथ वर प्रदान करने की मुद्रा में ऊपर उठा है॥ ९१॥ सद्गुरुदेव श्वेत वस्त्र पहने हुए हैं, उन्होंने श्वेत लेप धारण किया है। वे श्वेत पुष्प एवं मोतियों की माला से अलंकृत हैं। उनके दोनों नेत्रों से आनन्द छलक रहा है। उनके वामभाग में उनकी लीला सहचरी दिव्य शक्ति माँ विद्यमान हैं। ऐसे मधुर मधुमय मुस्कान बिखेरने वाले गुरुदेव का ध्यान करना चाहिए॥ ९२॥

🔶 गुरुगीता के इन मंत्रों में सद्गुरु के ध्यान की विशिष्ट विधि है। इस विधि का एक खास मकसद है। जिसे ध्यान के सूक्ष्म ज्ञाता जान सकते हैं। जो ध्यान के अर्थ व सत्य से परिचित हैं, वे जानते हैं कि ध्यान मात्र एकाग्रता नहीं है। यह आत्मशोधन की प्रक्रिया के साथ अपनी कल्पनाओं व कामनाओं के अनुसार ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के नियंत्रण व नियोजन की विधि है। हमारी चाहत क्या है? इसी के अनुसार ध्यान का विधान तय किया जाता है। ध्यान के उग्र रूप शत्रु संहार के लिए होते हैं। ध्यान में राजस भाव की प्रगाढ़ता वैभव एवं समृद्धि देती है। ध्यान का परम सात्त्विक सौम्य रूप ज्ञान देने वाला होता है। गुरुगीता में वर्णित इस ध्यान विधि में सात्त्विक एवं राजस रूप का मिश्रित भाव है। गुरुदेव के श्वेत वस्त्र सात्त्विक भाव को प्रगाढ़ करते हैं, किन्तु उनका मोतियों की माला एवं पुष्प से अलंकृत स्वरूप राजस भाव की वृद्धि करता है। इन दोनों भावों के मिश्रण से ध्यान का यह स्वरूप ज्ञान व मोक्ष देने के साथ लौकिक व सांसारिक ऐश्वर्य को भी देने वाला है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 110

👉 आज का सद्चिंतन 21 March 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 March 2018


👉 ईश्वर की भक्ति (भाग 1)

🔷 जिसको अपने पर विश्वास नहीं, वह ईश्वर पर विश्वास नहीं कर सकता। ऐसे आत्म-घातियों को अपने पाप का परिणाम भोगने के लिये ईश्वर छोड़ देता है और वह धैर्यपूर्वक तब तक उसी कुछ मदद न करने के लिए ठहरा रहता है, जब तक कि वह आत्म-घात करना न छोड़ दे। माता तब तक बच्चे को निर्दयतापूर्वक धूप में खड़ा रहने देती है जब तक कि वह फिर चोरी न करने की प्रतिज्ञा नहीं करता। भक्त का प्रथम लक्षण आत्म-विश्वास है। आत्म-विश्वास का अर्थ है परमात्मा में विश्वास करना। जो आत्मा के सच्चिदानन्द स्वरूप की झाँकी करता है, वही प्रभु के निकट तक पहुँच सकता है। ईश्वर नामक सर्वव्यापक सत्ता में प्रवेश करने का द्वार आत्मा में होकर है, वही इस खाई का पुल है।

🔶 अन्य उपायों से प्रभु को प्राप्त करने वालों का प्रयत्न ऐसा है जैसे पुल का तिरस्कार करके गहरी नदी का कोई और मार्ग तलाश करते फिरना। आचार्यों का अनुभव है कि—”दैवापि दुर्बल घातकः” क भी दुर्बलों का घातक है। अविश्वासी और आत्म-घाती निश्चय ही विपत्ति में पड़े रहते हैं और बिना पतवार के जहाज की तरह इधर-उधर टकराते हुए जीवन का उद्देश्य नष्ट करते रहते हैं। एक क्रूर कर्ता अपराधी की जेल की जैसे निष्पक्ष जज कुछ सुनवाई नहीं करता और सरसरी में खारिज कर देता है, वैसे ही आत्म तिरस्कार करने वालों को ईश्वर के यहाँ भी तिरस्कार प्राप्त होता है और उनकी प्रार्थना निष्फल चली जाती है।

🔷 ईश्वर से की गई प्रार्थना का तभी उत्तर मिलता है जब हम अपनी शक्तियों को काम में लावें। आलस्य, प्रमाद, अकर्मण्यता और अज्ञान यह सब गुण यदि मिल जाएं तो मनुष्य की दशा वह हो जाती है जैसे कि किसी कागज के थैले के अन्दर तेजाब भर दिया जाए। ऐसा थैला अधिक समय तक न ठहर सकेगा और बहुत जल्द गल कर नष्ट हो जाएगा। ईश्वरीय नियम, बुद्धिमान माली के सदृश हैं, वह निकम्मे घास कूड़े को उखाड़ कर फेंक देता है और योग्य पौधों की भरपूर साज-सँभाल रखकर उन्हें उन्नत बनाता है। जिस खेत में निकम्मे खरपतवार उग पड़ें उसमें अन्न की फसल मारी जाएगी। भला ऐसे किसान की कौन प्रशंसा करेगा, जो अपने खेत की ऐसी दुर्दशा कराता है। निश्चय ही ईश्वरीय नियम निकम्मे पदार्थों की गन्दगी हटाते रहते हैं, ताकि सृष्टि का सौंदर्य नष्ट न होने पावे। यह कहावत बिलकुल सच है कि—ईश्वर उसकी मदद करता है जो खुद अपनी मदद करता है, अपने पैरों पर खड़ा होने वाले को पीठ थपथपाने वाले दूसरे लोग भी मिल जाते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1943 पृष्ठ 2

👉 गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी

👉 सूत्र नं० 9

🔶 श्लोक-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।


🔷 अर्थ-
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।

🔶 सूत्र-
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन से कहना चाहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो आप पूर्ण निष्ठा से साथ वह कर्म नहीं कर पाओगे। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकार अपना काम करते रहो। फल देना, न देना व कितना देना ये सभी बातें परमात्मा पर छोड़ दो क्योंकि परमात्मा ही सभी का पालनकर्ता है।

👉 नारी को विकसित किया जाना आवश्यक है। (भाग 3)

🔶 भारतीय समाज प्राचीन काल में इसलिए समुन्नत था कि प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार की सर्वांगीण उन्नति का ध्यान रखता था, आज की तरह केवल धन के पीछे पागल न था। सर्वांगीण प्रगति के महत्व को जब से भुलाया जाने लगा तब से पारिवारिक प्रगति रुक गई। धन कमाने वाले, ऊंचे औहदों पर नौकरी करने वाले लड़के बच्चे अब भी घरों में पैदा होते हैं, पर उनके द्वारा कोई ऐसा कार्य नहीं होता जिस पर गर्व करने की जी चाहे।

🔷 यह स्पष्ट है कि व्यक्ति का निर्माण उसकी माता करती है। माता का ज्ञान अनुभव और अन्तःकरण जितना विकसित होगा, उतना ही बालकों का मन और मस्तिष्क भी विकसित होगा। अच्छे पेड़ हमेशा अच्छी भूमि में पनपते हैं। बीज कितना ही बढ़िया क्यों न हो यदि भूमि ऊसर है तो वहाँ न तो फसल पक सकती है और न अच्छा बगीचा लग सकता है। इसी प्रकार अच्छी माताओं के होने पर ही सुसंतान की आशा की जा सकती है और जिन घरों में सुसंतति है उन्हें ही घर कहना चाहिये। अन्यथा दुर्बुद्धि और दुर्गुणी, रोगी और आलसी बालकों के घर को तो नरक का नमूना ही कह सकते हैं। वहाँ निरन्तर कलह, ईर्ष्या, द्वेष, असंतोष, चोरी, अवज्ञा, अपकीर्ति एवं उत्पात की आग जलती रहेगी। ऐसे घरों में उसी तरह गुजारा करना पड़ता है जैसे सूत मरघट में अपनी जिन्दगी गुजारता है।

🔶 माता के संस्कार बालक पर जाते हैं यह एक निश्चित तथ्य है। इसलिये जिन्हें अपने घर को सुसंतति से हरा-भरा, फला-फूला देखना हो उन्हें पहले माता का निर्माण करना चाहिए। लोग इतना ही करते हैं कि बालक स्वस्थ हो इसके लिये गर्भावस्था में स्त्री को घी दूध, मेवा, लड्डू आदि खिलाते हैं। दूध अधिक निकले इसके लिए माता को जीरा, सोंठ, बबूल का गोंद आदि खिलाते हैं। इससे लोगों की बुद्धि में इतनी समझदारी तो जान पड़ती है कि वे माता को खिलाने से उसका लाभ बालक को मिलने की बात स्वीकार करते हैं। बच्चा बीमार हो तो माता को परहेज से रहने की अमुक चीज खाने, अमुक न खाने की हिदायत करते हैं। पर यह बुद्धिमानी यहीं समाप्त हो जाती है। कैसा अच्छा होता यदि लोग यह भी अनुभव करते कि माता के ज्ञान, अनुभव और अन्तःकरण के विकास का प्रभाव बालकों पर भी अवश्य पड़ेगा। इसलिये सन्तान को सुयोग्य बनाने के लिए पहले उसकी माता को सुयोग्य बनाना आवश्यक है। यदि इतनी जानकारी लोगों की रही होती तो आज हमारे समाज का स्तर ही दूसरा हुआ होता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति -दिसंबर 1960 पृष्ठ 27

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/December/v1.27

👉 The Effect of Sitting with the King

🔶 A long time ago a poor Brahmin deposited his money with a merchant. He thought that when his little daughter will grow up, he will use the money and its interest for her marriage.

🔷 Many years passed by. He now went to the merchant to claim his money. But he was shocked to find that the merchant refused even to recognize him, and said, "You never deposited any money with me." The poor Brahmin took his complaint to the King. The king could not take any direct action against the merchant due to lack of evidence, but he thought of a plan. It was announced that he next day there will be a great royal procession passing through the main streets of the city. The King told the poor Brahmin, "You should wait for my procession, near the merchant's house."

🔶 The next day everyone lined up along the streets to witness the royal procession and greet the King. When the procession reached the merchant's house, the King suddenly ordered it to halt. The King then addressed the poor Brahmin as Guruji, and requested to sit beside him and then the procession continued. The King dropped the Brahmin after sometime. The wicked merchant saw all this and trembled with fear. "Oh dear! This Brahmin is King's Guru", he thought, "If he complains against me, I will be in big trouble" The merchant immediately searched for the Brahmin and said, "I am sorry. Due to some mistake in the accounts your money was not traceable. Now, I have found out hat you had actually deposited the money with me. Please forgive me" The merchant gave back all the money along with the interest. He also gave lots gifts for the marriage of the Brahmin's daughter. Then the Brahmin thought, "Sitting near the King for a very short while has achieved so much. Then sitting near God - who is the King of all Kings can surely work wonders. True prayer and meditation is surely like sitting near God"

📖 From Akhand Jyoti

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
 

देवियो! भाइयो!!

🔶 आप जिस कल्प-साधना सत्र में आए हुए हैं, उसका उद्देश्य समझने की कोशिश करें। अनगढ़ और अस्त-व्यस्त जीवन को सुव्यवस्थित जीवन में बदल देने की बात इस कल्प-साधना में विशेष रूप से ध्यान रखी गई है। जीवनभर हम अनगढ़ रहे हैं, बन्दरों की तरह उचक-मचक करने वाले, लक्ष्यहीन बच्चों की तरह इधर-उधर भागने वाले और तरह-तरह की चीजों पर मन चलाने वाले हम रहे हैं; न कोई अनुशासन मन के ऊपर रहा, न कोई लक्ष्य रहा और न कोई दिशा रही। बस, यही है हमारे जीवन की संक्षिप्त कहानी और इस कहानी में अब नया अध्याय जुड़ना चाहिए। फिर आपकी अस्त-व्यस्तता को अनुशासन में बदल जाना चाहिए और आपकी लक्ष्यहीनता को अब एक दिशा पकड़ लेनी चाहिए कि अब हमारा जीवन किधर जाएगा?

🔷 इसी का प्राथमिक अभ्यास कराने के लिए आपको कल्प-साधना शिविर में बुलाया गया है। आप अपनी मनःस्थिति को उसी के अनुरूप बनाइए। क्रियाएँ जो आपसे कराई जा रही हैं, ये क्रियाएँ अपने आप में भी महत्त्वपूर्ण हैं। उपवास अपने आप में भी लाभदायक होता है। पेट पर इसका असर पड़ता है; पर आप यहाँ तक सीमित मत रहिए। उपवास के लिए हम क्यों बुलाते हैं आपको?  उपवास तो आप घर पर भी कर सकते हैं, बहुत-से आदमी करते भी हैं; नवरात्रि पर उपवास करते हैं, दूसरे उपवास करते हैं; पर यहाँ हमने केवल उपवास के ही लिए नहीं बुलाया आपको। यहाँ हमने आपको अनुशासन पालने करने के लिए बुलाया है—तरह-तरह के अनुशासन। शुरुआत तो आपकी जीभ से कराई है। जीभ का अनुशासन अगर आप निभा लेंगे, तो और दूसरे अनुशासन, जो जीवन के लिए और अत्यधिक उपयोगी हैं, उनको भी आप पालने में सफल हो जाएँगे।

🔶 गाँधीजी ने अपनी ‘सप्त महाव्रत’ नाम की पुस्तक में पहला अध्याय अस्वाद का लिखा है। उन्होंने कहा है कि जो आदमी अपनी जीभ पर काबू कर लेगा, वह अपनी ज्ञानेन्द्रियों पर और मन पर भी काबू प्राप्त कर लेगा। उन्होंने यह भी लिखा है कोई आदमी ब्रह्मचर्य की बात विचार करता हो, तो उसको पहले अपनी जीभ पर काबू पाने की कोशिश करनी चाहिए। जिस आदमी की जीभ पर लगाम नहीं है, वह ब्रह्मचर्य का कभी पालन नहीं कर पायेगा। उच्छृंखल जीभ न केवल आहार को उच्छृंखल बनाती है, न केवल मस्तिष्क को उच्छृंखल बनाती है, बल्कि हमारी विकृतियों को भड़काने में भी काम आती है, इसलिए जीभ का अनुशासन आवश्यक माना गया है। आप इस उद्देश्य को समझिये। आप खाली दलिया खायेंगे, जौ, चावल खाएँगे, वह तो ठीक है; खाएँगे, तो अच्छी बात है; खाएँगे, तो सात्विक है। अनावश्यक वस्तुएँ न खाएँगे, तो कौन-सी हर्ज की बात है? आवश्यक वस्तुओं को एक महीने रहकर खाएँगे, यह तो बहुत अच्छी बात है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 68)

👉 गुरु ही इष्ट है, इष्ट ही गुरु है

🔶 गुरुगीता के मंत्र शिष्यों के अन्तर्मन को कषाय-कल्मष से मुक्त करते हैं। इसमें भक्ति की धारा बहाकर सद्गुरु की भावचेतना से जोड़ते हैं। शिष्य का अन्तर्मन जब तक कलुषित है, कल्मष से लथ-पथ है तब तक उसे सद्गुरु की सत्ता का सार्थक बोध नहीं हो पाता। यहाँ तक कि लौकिक-सांसारिक दृष्टि से उनके पास रहकर भी आध्यात्मिक दृष्टि से वह उनसे कोसों दूर रहता है। देह की दृष्टि से भले ही वह गुरुदेव से कितना ही नजदीक रहे, पर आत्मा की दृष्टि से उनसे अपरिचित बना रहता है। यह अपरिचय-परिचय में बदले। परिचय प्रगाढ़ता में परिवर्तित हो और प्रगाढ़ता पवित्र भावनाओं में बदल जाए इसके लिए गुरुगीता के मंत्रों की साधना सर्वोत्तम उपाय है।
  
🔷 शिष्यों के मन के मैल को धोने वाली गुरुगीता के पूर्व मंत्र में चेताया गया है कि देव, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व कोई भी गुरु से विमुख होने पर किसी को मोक्ष नहीं मिलता। भगवान् शिव के वचन हैं कि गुरुदेव का ध्यान सभी तरह के आनन्द का प्रदाता है। इससे सांसारिक सुखों के साथ मोक्ष की प्राप्ति भी होती है। इसलिए प्रत्येक शिष्य का यह पावन संकल्प होना चाहिए कि मैं अपने सद्गुरु का ध्यान करूँगा। ये गुरुदेव ब्रह्मानन्द का परम सुख देने वाले, द्वन्द्वातीत एवं सभी भावों से परे हैं। ये प्रभु नित्य, शुद्ध, निराभास, निराकार एवं माया से परे हैं। उन्हें मेरा नित्य नमन है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 108

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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