🔷 दुःख का एक स्थूल-सा कारण है वांछा का विरोध। जो हम चाहते हैं उसको न पा सकने पर जो क्षोभ अथवा निराशा होती है वही दुःख रूप में अनुभव होती है। मनुष्य को समझना चाहिए कि किसी की सभी वांछाएं कभी पूरी नहीं होतीं। वांछाएं वे ही पूरी होती हैं जो उचित और उपयुक्त होती हैं। किन्तु अज्ञानी व्यक्ति इसका विचार न कर अपनी वांछाएं बढ़ाते चले जाते हैं, और चाहते हैं कि वे सब बिना विरोध के पूरी होती रहें। ऐसे आदमी यह नहीं सोच पाते कि इस संसार में और दूसरे लोग भी हैं। उनकी भी अपनी कुछ वांछाएं होती हैं, जिनकी पूर्ति का अधिकार उन्हें भी है। यदि किसी एक की ही सारी वांछाएं पूरी होती रहें तो क्या दूसरे लोग अपनी वांछा पूर्ति के अधिकार से वंचित न रह जायेंगे? किसी एक की सारी वांछाएं पूरी होती रहें यह सम्भव नहीं।
🔶 किन्तु स्वार्थी मनुष्य जिनको केवल अपनेपन का ही ध्यान रहता है इस न्याय पर ध्यान नहीं दे पाते। उन्हें अपना स्वार्थ, अपना हित और अपना लाभ ही दीखता रहता है। दूसरों के हित-अहित, हानि-लाभ से जैसे कोई मतलब ही नहीं रखते। ऐसे संकीर्णमना व्यक्तियों का दुःखी रहना स्वाभाविक ही है। वे स्वार्थ पूर्ण वांछाएं करते ही रहेंगे वे असफल और अपूर्ण होती रहेंगी, उनके मन में क्षोभ और निराशा उत्पन्न होगी और जिसके फलस्वरूप वे दुःख अनुभव ही करते रहेंगे। इस क्रम में न बाधा आ सकती है और न व्यवधान।
🔷 ऐसे संकीर्ण, स्वार्थ, लिप्सु और हीन-भावना वाले किसी भी व्यक्ति से मिलकर, फिर चाहे वह अमीर हो या गरीब, सम्पन्न हो अथवा अभावग्रस्त, पढ़ा हो अथवा अनपढ़, स्त्री हो या पुरुष मालूम किया जा सकता है कि क्या वह अपने में जरा भी सुखी है? निश्चय ही वह दुःखी ही निकलेगा। विश्वासपूर्वक पूछने पर वह बतलायेगा कि वह बहुत दुःखी है, सारा संसार उसे दुःख क्लेशों से परिपूर्ण विदित होता है। निश्चय ही ऐसे लोगों के दुःख का कारण उनकी हीन और स्वार्थपूर्ण भावनायें ही होती हैं। दुःख दुर्भावनाओं के कारण होता है। दुर्भावना रखने वाला शैतान ही तो माना गया है, इसलिये महात्मा फ्रांसिस ने कहा है—‘दुःखी रहना शैतान का काम है।’
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1971 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/August/v1.14
http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.4
🔶 किन्तु स्वार्थी मनुष्य जिनको केवल अपनेपन का ही ध्यान रहता है इस न्याय पर ध्यान नहीं दे पाते। उन्हें अपना स्वार्थ, अपना हित और अपना लाभ ही दीखता रहता है। दूसरों के हित-अहित, हानि-लाभ से जैसे कोई मतलब ही नहीं रखते। ऐसे संकीर्णमना व्यक्तियों का दुःखी रहना स्वाभाविक ही है। वे स्वार्थ पूर्ण वांछाएं करते ही रहेंगे वे असफल और अपूर्ण होती रहेंगी, उनके मन में क्षोभ और निराशा उत्पन्न होगी और जिसके फलस्वरूप वे दुःख अनुभव ही करते रहेंगे। इस क्रम में न बाधा आ सकती है और न व्यवधान।
🔷 ऐसे संकीर्ण, स्वार्थ, लिप्सु और हीन-भावना वाले किसी भी व्यक्ति से मिलकर, फिर चाहे वह अमीर हो या गरीब, सम्पन्न हो अथवा अभावग्रस्त, पढ़ा हो अथवा अनपढ़, स्त्री हो या पुरुष मालूम किया जा सकता है कि क्या वह अपने में जरा भी सुखी है? निश्चय ही वह दुःखी ही निकलेगा। विश्वासपूर्वक पूछने पर वह बतलायेगा कि वह बहुत दुःखी है, सारा संसार उसे दुःख क्लेशों से परिपूर्ण विदित होता है। निश्चय ही ऐसे लोगों के दुःख का कारण उनकी हीन और स्वार्थपूर्ण भावनायें ही होती हैं। दुःख दुर्भावनाओं के कारण होता है। दुर्भावना रखने वाला शैतान ही तो माना गया है, इसलिये महात्मा फ्रांसिस ने कहा है—‘दुःखी रहना शैतान का काम है।’
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1971 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/August/v1.14
http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.4










































