मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

👉 दुःखों का कारण और निवारण (भाग 2)

🔷 दुःख का एक स्थूल-सा कारण है वांछा का विरोध। जो हम चाहते हैं उसको न पा सकने पर जो क्षोभ अथवा निराशा होती है वही दुःख रूप में अनुभव होती है। मनुष्य को समझना चाहिए कि किसी की सभी वांछाएं कभी पूरी नहीं होतीं। वांछाएं वे ही पूरी होती हैं जो उचित और उपयुक्त होती हैं। किन्तु अज्ञानी व्यक्ति इसका विचार न कर अपनी वांछाएं बढ़ाते चले जाते हैं, और चाहते हैं कि वे सब बिना विरोध के पूरी होती रहें। ऐसे आदमी यह नहीं सोच पाते कि इस संसार में और दूसरे लोग भी हैं। उनकी भी अपनी कुछ वांछाएं होती हैं, जिनकी पूर्ति का अधिकार उन्हें भी है। यदि किसी एक की ही सारी वांछाएं पूरी होती रहें तो क्या दूसरे लोग अपनी वांछा पूर्ति के अधिकार से वंचित न रह जायेंगे? किसी एक की सारी वांछाएं पूरी होती रहें यह सम्भव नहीं।

🔶 किन्तु स्वार्थी मनुष्य जिनको केवल अपनेपन का ही ध्यान रहता है इस न्याय पर ध्यान नहीं दे पाते। उन्हें अपना स्वार्थ, अपना हित और अपना लाभ ही दीखता रहता है। दूसरों के हित-अहित, हानि-लाभ से जैसे कोई मतलब ही नहीं रखते। ऐसे संकीर्णमना व्यक्तियों का दुःखी रहना स्वाभाविक ही है। वे स्वार्थ पूर्ण वांछाएं करते ही रहेंगे वे असफल और अपूर्ण होती रहेंगी, उनके मन में क्षोभ और निराशा उत्पन्न होगी और जिसके फलस्वरूप वे दुःख अनुभव ही करते रहेंगे। इस क्रम में न बाधा आ सकती है और न व्यवधान।

🔷 ऐसे संकीर्ण, स्वार्थ, लिप्सु और हीन-भावना वाले किसी भी व्यक्ति से मिलकर, फिर चाहे वह अमीर हो या गरीब, सम्पन्न हो अथवा अभावग्रस्त, पढ़ा हो अथवा अनपढ़, स्त्री हो या पुरुष मालूम किया जा सकता है कि क्या वह अपने में जरा भी सुखी है? निश्चय ही वह दुःखी ही निकलेगा। विश्वासपूर्वक पूछने पर वह बतलायेगा कि वह बहुत दुःखी है, सारा संसार उसे दुःख क्लेशों से परिपूर्ण विदित होता है। निश्चय ही ऐसे लोगों के दुःख का कारण उनकी हीन और स्वार्थपूर्ण भावनायें ही होती हैं। दुःख दुर्भावनाओं के कारण होता है। दुर्भावना रखने वाला शैतान ही तो माना गया है, इसलिये महात्मा फ्रांसिस ने कहा है—‘दुःखी रहना शैतान का काम है।’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1971 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/August/v1.14

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.4

👉 Buddha Derives Inspiration from a Bug

🔶 Buddha had not yet obtained self-realization. He was engaged in intense penance. His mind was restless. A thought crossed his mind, "Despite trying very hard, I have failed to attain the objective of self realization. Instead of wasting away all this time in penance, I should have enjoyed my princely life in the palace." 

🔷 All of a sudden he saw a tiny bug trying to climb up a nearby tree. The bug tried again and again but would fall off. Still it would not give up. It tried ten times but failed. On the eleventh attempt it successfully climbed up the tree. It appeared as if this scene was enacted just for the guidance of Buddha. The self-belief in him woke up, and he continued his penance with great conviction and ultimately attained his objective of self realization. He then applied his wisdom for guiding the society on the virtuous path.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (भाग 3)

🔶 इस संयोग की वेला में आनन्दानुभूति उठानी चाहिए। माता पुत्र का -प्रेमी प्रेयसी का मिलन जितना सुखद होता है उससे भी अधिक तृप्तिदायक यह आत्म परमात्म मिलन है। इस मिलन की प्रतिक्रिया को भी अनुभूति में उतारना चाहिए। शरीर और मन परमेश्वर को समर्पित किया गया ओर उसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद यही होना चाहिए कि अपना काय कलेवर पूर्णतया परमेश्वर की इच्छानुसार गतिशील रहे। अपनी कोई इच्छा में अपनी इच्छा मिलनी जाय। परमेश्वर जिसमें प्रसन्न हो वो सोचना और वही करना सच्चे भजन परायण भक्त के लिए उचित है। बदला पाने के लिए-किया गया भजन तो वेश्यावृत्ति है।
                  
🔷 कहा जा चुका है कि भावनात्मक साधनाओं के लिए संध्या वंदन की तरह ब्रह्ममुहूर्त का बंधन नहीं है। उसे सुविधानुसार नित्य उपासन के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। यही बात मनन साधना पर लागू होती है। वातावरण शांत और स्थान एकांत होना चाहिए। आँखें बंद करे आराम कुर्सी पर पड़े हुए यह सोचना चाहिए कि -”शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकल कर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा। अब पड़ी हुई लाश के अंग-प्रत्यंगों को पोस्टमार्टम के समय उघाड़े गये अवयवों की तरह उलटना-पलटना चाहिए और समझना चाहिए कि कपड़ों से भरी हुई पेटी की तरह ही यह काया अपने सामयिक उपयोग के लिए मिली थी। इसी प्रकार मस्तिष्क को एक छोटे डिब्बे की तरह खोलकर देखना चाहिए कि उसमें मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के चार आभूषण, उपकरण औजार सुसज्जित रखे थे।”
     
🔶 इस ध्यान को जितनी गहराई से जितनी देर किया जा सके उतना संभव हो करना चाहिए और इस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि प्राण-हंस की आत्म सत्ता सर्वथा स्वतंत्र है। शरीर की वस्त्र पेटी और मस्तिष्क की उपकरण पिटारी, जीवन रथ के दो अश्व वाहनों की तरह थी। काल कलेवर लक्ष्य पूर्ति के लिए आत्म-कल्याण के लक्ष्य को तिलाञ्जलि नहीं दी जानी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 4
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.4

👉 हमारी वसीयत और विरासत (अन्तिम भाग )

🌹  आत्मीय जनों से अनुरोध एवं उन्हें आश्वासन

🔷 बच्चे बड़ों से कुछ चाहते हैं, सो ठीक है, पर बड़े बदले में कुछ न चाहते हों ऐसी बात भी नहीं। नियत स्थान पर मल-मूत्र त्यागने, शिष्टाचार समझने, हँसने-हँसाने, वस्तुएँ न बिखरने देने, पढ़ने जाने जैसी अपेक्षाएँ वे भी करते हैं। जितना सम्भव है, उतना तो उन्हें भी करना चाहिए। हमारी अपेक्षाएँ भी ऐसी ही हैं। गोवर्धन उठाने वाले ने अपने अनगढ़ ग्वाल बालों के सहारे ही गोवर्धन उठाकर दिखाया था। हनुमान की बात किसी ने नहीं सुनी तो अपने सहचर रीछ-वानरों को ही समेट लाए। नव-निर्माण के कन्धे पर लदे उत्तरदायित्व को वहन करने में हम अकेले ही समर्थ नहीं हो सकते थे। यह मिल-जुलकर सम्पन्न हो सकने वाला कार्य था। सो समझदारों में से कोई हाथ न लगा तो अपने इसी बाल-परिवार को लेकर जुट पड़े और जो कुछ, जितना-कुछ सम्भव हो सका करते रहे। अब तक की प्रगति का यही सार संक्षेप है।

🔶 बात अगले दिनों की आती है। हमें अपने बच्चों के लिए क्या करना चाहिए। इस कर्तव्य उत्तरदायित्व का सदा ध्यान रहा है और जब तक चेतना का अस्तित्व है, उसका स्मरण दिलाने योग्य बात एक ही है कि हमारी आकाँक्षा और आवश्यकता को भुला न दिया जाए। समय विकट है। इसमें प्रत्येक परिजन का समयदान और अंशदान हमें चाहिए। जितना मिलता रहा है, उससे भी अधिक मात्रा में, क्योंकि जो करना है, उसके लिए तत्काल कदम उठाने हैं। सो भी बड़े कामों के लिए बड़े-बड़े लोग चाहिए, बड़े साधन भी। हमारे परिवार का हर व्यक्ति बड़ा है। छोटेपन का तो उसने मुखौटा भर पहन रखा है। उतारने भर की देर है कि उसका असली चेहरा दृष्टिगोचर होगा। भेड़ों के समूह में पले सिंह शावक की कथा अपने प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक के ऊपर लागू होती है या हो सकती है।

🔷 हमें हमारे मार्गदर्शक ने एक पल में क्षुद्रता झटक कर महानता का परिधान पहना दिया था। इस काया कल्प में मात्र इतना ही हुआ था कि लोभ, मोह की कीचड़ से उबरना पड़ा। जिस-तिस के सत्परामर्शों आग्रहों की उपेक्षा करनी पड़ी और आत्मा-परमात्मा के संयुक्त निर्णय को शिरोधार्य करने का साहस जुटाना पड़ा है। एकाकी चलने का आत्मविश्वास जागा और आदर्शों को भगवान् मानकर कदम बढ़े। इसके बाद एकाकी नहीं रहना पड़ा और न साधनहीन, उपेक्षित स्थिति का कभी आभास हुआ। सत्य का अवलम्बन अपनाने भर की देर थी कि असत्य का कुहासा अनायास ही हटता चला गया।

🔶 हमारा परिजनों से यही अनुरोध है कि हमारी जीवनचर्या को घटना क्रम की दृष्टि से नहीं वरन् पर्यवेक्षक की दृष्टि से पढ़ा जाना चाहिए कि उसमें दैवी अनुग्रह के अवतरण होने से ‘‘साधना से सिद्धि’’ वाला प्रसंग जुड़ा या नहीं। इसी प्रकार यह भी दृष्टव्य है कि दूसरों के अवलंबन योग्य आध्यात्मिकता का प्रस्तुतीकरण करते हुए हमारे कदम ऋषि परम्परा अपनाने के लिए बढ़े या नहीं? जिसे जितनी यथार्थता मिले वह उतनी ही मात्रा में यह अनुमान लगाए कि अध्यात्म विज्ञान का वास्तविक स्वरूप यही है। आंतरिक पवित्रता और बहिरंग की प्रखरता में जो जितना आदर्शवादी समन्वय कर सकेगा, वह उन विभूतियों से लाभान्वित होगा जो अध्यात्म तत्त्वज्ञान एवं क्रिया-विज्ञान के साथ जोड़ी और बताई गई है।




🔷 अपने अनन्य आत्मीय प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक के नाम हमारी यही वसीयत और विरासत हैं कि हमारे जीवन से कुछ सीखें। कदमों की यथार्थता खोजें, सफलता जाँचें और जिससे जितना बन पड़े अनुकरण का, अनुगमन का प्रयास करें। यह नफे का सौदा है, घाटे का नहीं।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.196

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.23

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

👉 आदेश की विचित्र पालना, एक उलझन मे एक सुलझन मे

🔷 एक बार एक महात्मा जी के दरबार मे एक राहगीर आया और उसने पुछा की हॆ महात्मन सद्गुरु की आज्ञा का पालन कैसे करना चाहिये?

🔶 महात्मा जी ने कहा की बहुत समय पहले की बात है की दो राज्य बिल्कुल पास पास मे थे एक राज्य बहुत बड़ा और एक राज्य छोटा था! बड़े राज्य के पास अच्छीखासी सेना थी और छोटे राज्य के पास ठीक ठाक सेना थी!

🔷 बड़े राज्य के राजा विजय प्रताप के मन मे पाप आया की क्यों न इस छोटे राज्य को अपने राज्य मे शामिल कर लिया जायें और उसने छोटे राज्य पर आक्रमण करने की तैयारी शुरू कर दी इधर छोटे राज्य के राजा धर्मराज अपने गुरुवर के पास गये!

🔶 और उधर विजयप्रताप को उनके गुरू ने समझाया की बेटा युध्द से पहले एक बार अपना दूत वहाँ भेजकर धर्मराज जी को समझा दो की वो आत्मसमर्पण कर दे तो बड़ी जनहानी रुक जायेगी और बिना युध्द के आपका काम हो जायेगा और एक बात का ध्यान रखना की वहाँ उसे भेजना जो आपके लिये सबसे अहम हो और वहाँ की पलपल की जानकारी आपको दे सके!

🔷 राजा ने सोचा मेरे लिये सबसे अहम तो मैं ही हुं और विजयप्रताप स्वयं भेश बदलकर गये! राजा धर्मराज और राजा विजयप्रताप एक ऊँची पहाडी पर माँ काली के मन्दिर मे मिले राजा विजयप्रताप ने अपना प्रस्ताव रखा तो राजा धर्मराज ने कहा हॆ देव पहले आप मेरी एक बात सुनिये फिर आप कहोगे तो मैं आपका प्रस्ताव मान लूँगा और राजा धर्मराज जी ने ताली बजाई एक सैनिक आया धर्मराज जी ने कहा जाओ उस पहाडी से नीचे कुद जाओ सैनिक भागकर गया और पहाडी से नीचे जा कुदा फिर धर्मराज ने ताली बजाई एक सैनिक आया और राजा ने वही कहा और सैनिक पहाडी से नीचे जा कुदा हॆ वत्स इस तरह धर्मराज जी ने तीन बार ताली बजाई सैनिक आये और इस तरह सैनिक बिना कुछ कहे पहाडी से जा कुदे!

🔶 विजयप्रताप ने कहा अरे ये कैसा पागलपन तो धर्मराज जी ने कहा हॆ मित्र जब तक ऐसे स्वामी भक्त योद्धा हमारे पास है तब तक हम कभी हार स्वीकार नही कर सकते और राजा विजयप्रताप तत्काल उठे अपने राज्य पहुँचे और उन्होंने भी वैसे ही किया पर कोई भी पहाडी से न कुदा सब तर्क-कुतर्क करने लगे फिर राजा तत्काल धर्मराज जी के पास पहुँचे और उन्होंने धर्मराज जी के आगे अपना मस्तक झुका दिया!

🔷 राहगीर - ऐसे स्वामी-भक्त सैनिक बड़े ही आदरणीय और दुर्लभ है देव!

🔶 महात्मा - हाँ वत्स यही तो मैं आपसे कह रहा हुं की जब सद्गुरु कुछ कहे तो बिना कुछ बोले उसकी पालना कर लेना बड़े लाभ मे रहोगे! महात्मा जी ने आगे कहा की ये तीन सैनिक और कोई नही है ये तीन तन, मन और धन जब भी सद्गुरु कुछ कहे तो रणभूमि मे तन मन धन से कुद पड़ना और हॆ वत्स ये कभी न भुलना की सद्गुरु के समान कोई हितेषी नही है! और सद्गुरु और सच्चे सन्त से तर्क वितर्क कभी मत करना क्योंकि जो तर्क वितर्क मे उलझते है वो फिर उलझते ही चले जाते है और जो नही करते है वो सुलझ जाते है!

🔷 उलझन के लिये अपनी बुद्धि लगाओ और सुलझन के लिये सद्गुरु की बुद्धि से चलो अर्थात जो भी सद्गुरु कहे उसे तत्काल मान लो! और सद्गुरु वही है जो तुम्हारा तार हरि से जोड़कर हरि को आगे करके स्वयं पिछे हट जायें ऐसे सद्गुरु का आदेश परमधर्म है!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 19 Dec 2017

👉 सत्य की चाह

🔷 सत्य की चाह है, तो चित्त को किसी ‘आग्रह’ से मत बाँधो। जहां आग्रह है, वहाँ सत्य नहीं आता। आग्रह और सत्य में गहरा विरोध है। मुक्त-जिज्ञासा सत्य की खोज के लिए पहली सीढ़ी है। जो व्यक्ति सत्य की अनुभूति से पहले ही अपने चित्त को किन्हीं सिद्धान्तों, मतवादों एवं आग्रहों से बोझिल कर लेते हैं, उनकी जिज्ञासा कुंठित और अवरुद्ध हो जाती है।

🔶 जिज्ञासा- खोज की गति और प्राण है। इसी के माध्यम से विवेक जाग्रत् होता है और चेतना ऊर्ध्व बनती है। लेकिन, जिज्ञासा आस्था से नहीं, आश्चर्य से पैदा होती है। आश्चर्य-स्वच्छ चित्त का लक्षण है। उसके सम्यक अनुगमन से सत्य के ऊपर पड़े हुए परदे क्रमशः गिरते जाते हैं और एक क्षण सत्य का दर्शन होता है।     

🔷 यहाँ यह बता देना जरूरी है कि आस्तिक और नास्तिक दोनों ही आस्थावान् होते हैं। हाँ इतना अवश्य है कि आस्तिक की आस्था विधेयात्मक होती है तो नास्तिक की आस्था निषेधात्मक या नकारात्मक। जबकि आश्चर्य चित्त की एक अलग ही अवस्था है। जहाँ अविश्वास नहीं है और न ही विश्वास है। वह तो इन दोनों से मुक्त खोज के लिए स्वतंत्र है। यहाँ किसी भी आग्रह या मत के लिए कोई स्थान नहीं है।

🔶 और भला वे सत्य की खोज कर भी कैसे सकते हैं? जो कि पहले से ही किन्हीं मतों से बँधे हैं। मतों अथवा आग्रहों के खूँटों से विश्वास या अविश्वास की जंजीरों को जो खोल देता है, उसी की ही नाव सत्य के महासागर में यात्रा करने में समर्थ हो पाती है।

🔷 सत्य के आगमन की अनिवार्य शर्त हैः चित्त की पूर्ण स्वच्छता, स्वतन्त्रता एवं स्थिरता। जिसका चित्त पूर्ण स्वच्छ नहीं है, जो किन्हीं सिद्धान्तों या आग्रहों से बँधे हैं अथवा जिनका चित्त अस्थिर या चंचल है, वे सत्य के महासूर्य के दर्शन से वंचित रह जाते हैं। इसलिए सत्य की चाह को पूरा करने के लिए चित्त को पूर्ण स्वच्छ, स्वतंत्र एवं स्थिर बनाना ही होगा।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 97

👉 दुःखों का कारण और निवारण (भाग 1)

🔷 सन्त फ्रांसिस का कथन है—‘दुःखी रहना शैतान का काम है।’ इस कथन का तात्पर्य इसके सिवाय और क्या हो सकता है कि दुःखी रहना मानवीय प्रवृत्ति नहीं है। यह एक निकृष्ट प्रवृत्ति है जो मनुष्य को शोभा नहीं देती। तथापि, अधिकतर लोग दुःखी ही दिखलाई पड़ते हैं।

🔶 अब प्रश्न यह उठता है कि जब दुःखी रहना मानवीय प्रवृत्ति नहीं है, तब आखिर मनुष्य दुःखी क्यों रहते हैं? क्या कोई ऐसी अदृश्य शक्ति है जो मनुष्य को उसकी प्रवृत्ति के विरुद्ध दुःखी रहने को विवश करती है?

🔷 इस विषय में एक नहीं अनेक ऐसे प्रश्न और शंकायें उठ सकती हैं, किन्तु वास्तविकता यह है कि कोई बाह्य कारण अथवा अदृश्य शक्ति मनुष्य को दुःखी नहीं रखती है, मनुष्य अपने स्वयं के अज्ञान और दुर्बलता के कारण, अकारण ही दुःखी रहता है। वैसे न सुख का और न दुःख का, अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व है। ये मनुष्य की अपनी निर्बल अनुभूतियां ही हैं जो सुख-दुःख के रूप में आभासित होती हैं।

🔶 अदृश्य शक्ति को इस प्रसंग के बीच से निकाल ही दिया जाये, यही ठीक होगा। क्योंकि अदृश्य शक्ति तटस्थ और निरपेक्ष शक्ति होती है। वह चेतना प्रदान करने के सिवाय मनुष्य के जीवन में अधिक हस्तक्षेप नहीं करती। उसको इस प्रसंग में खींच लाने पर मानवीय धरातल पर सुख-दुःख और उसके कारणों का विवेचन कर सकना कठिन हो जायेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1971 पृष्ठ 10

👉 The Roar Of Self Reliance

🔶 “I am pure, immortal & unattached Atma.”  As soon as man accepts this great truth, he reaches immortality. He who respects his soul & takes his existance as excellent, pure, great& reliable, he becomes actually so. The yoga scriptures proclaim loudly that he who thinks himself as ‘Shiva’ is ‘Shiva’ & he who thinks himself as jiva is jiva. If you want to make yourself great, see your greatness, feel it & begin imbibing it in yourself speedily.

🔷 He who will entertain evil thoughts again & again regarding himself, will have thoughts of inferiority & pettiness and will undoubtedly become so after some time. The obvious result of entertaining such thoutghts, as I am mean, sinful, petty, a slave, incapable, unable, indolent, unfortunate, down-trodden & afflicted, is that our subconscious mind takes the same mould. Don’t take yourself as small. The immortal prince man cannot be mean in any way. All the powers of his Father are inherent in him. All that is necessary, is that he should feel his greatness & try to make his life great in every way. He who adopts this practice, soon realizes his greatness.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (भाग 2)

🔶 यही बात मन के संबंध में भी है समस्त संसार में शून्यता संव्याप्त है। प्रलय काल की तरह नीचे अथाह नील जल राशि और ऊपर नीले आकाश है। सर्वत्र परम शांति दायिनी नीलिमा एवं नीरवता संव्याप्त है। कहीं कोई व्यक्ति या पदार्थ नहीं। मन को आकर्षित करने वाली कहीं कोई स्थिति परिस्थिति शेष नहीं। उस परम शून्यता में बालक की तरह अपनी निर्मल चेतना कमल पत्र पर लेटी हुई तैर रही है। अपने पैर का अँगूठा अपने मुँह में लगा हुआ है और आत्मा स्वरस का पान कर रही है। प्रलय काल का ऐसा चित्र बाज़ार में बिकता भी है। मनःस्थिति को उसी स्तर का बनाने का प्रयत्न किया जाय ता शून्यता की मानसिक स्थिति बनती और बढ़ती चली जाती है। शारीरिक शिथिलता और मानसिक रिक्तता की - उपरोक्त स्थिति भजन साधना की उपयुक्त पूर्व भूमिका समझी जानी चाहिए।
                  
🔷 शिथिल शरीर एवं मनःस्थिति में ही भजन ठीक प्रकार हो सकता भाव परक ध्यानयोग का यही पूर्वार्ध। आपरेशन करते-इंजेक्शन लगाते समय हिलने-जुलने पर प्रतिबंध रहता है। एक का रक्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करते समय दोनों व्यक्ति अपने हाथों को हिलाते डुलाते नहीं है। भजन को समय भी मानसिक संस्थान को इसी प्रकार शांत रहना चाहिए। भजन का उत्तरार्ध यह है कि उस सर्व शक्तिमान्- सर्व वैभववान्-सर्व उत्कृष्टताओं से संपन्न-सर्वाधिक प्रेमी परमेश्वर को अपनी सत्ता में प्रविष्ट होते हुए- घुलते हुए अनुभव किया जाय। ब्रह्माण्ड व्यापारी दिव्य प्रकाश को सागर में अपने आपको मछली की तरह निमग्न अनुभव किया जाय।
    
🔶 जिस प्रकार मिट्टी के ऊपर जल गिरने से दोनों के मिश्रण का एक नया रूप “कीचड़” बनता है वैसे ही भावना की जानी चाहिए कि परम प्रकाश अपने रोम-रोम में संव्याप्त हो रहा है। (1)शरीर के अंग प्रत्यंग में विष संयम एवं बलिष्ठता का रूप धारण कर रहा है। (2) मस्तिष्क में विवेक और प्रखर प्रतिभा-परख तेजस् बनकर बिखर रहा है। अंतरात्मा के हृदय संस्थान में वह देवत्व और आनंद रूप बना बैठा है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और तीनों शरीरों में परमात्मा की परम ज्योति को ज्वलंत अग्नि की तरह समाविष्ट देखना अपने को उस आलोक से आलोकित अनुभव करना भजन साधना की प्रधान ध्यान विद्या है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 3
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://awgpskj.blogspot.in/2017/12/1_17.html

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 167)

🌹  आत्मीय जनों से अनुरोध एवं उन्हें आश्वासन

🔷 कहने को गायत्री परिवार, प्रज्ञा परिवार आदि नाम रखे गए हैं और उनकी सदस्यता का रजिस्टर तथा समयदान, अंशदान का अनुबंध भी है, पर वास्तविकता दूसरी ही है, जिसे हम सब भली-भाँति अनुभव भी करते हैं। वह है जन्म-जन्मांतरों से संग्रहीत आत्मीयता। जिसके पीछे जुड़ी हुई अनेकानेक गुदगुदी उत्पन्न करने वाली घटनाएँ हमें स्मरण हैं। परिजन उन्हें स्मरण न रख सके होंगे। फिर वे विश्वास करते हैं कि परस्पर आत्मीयता की कोई ऐसी मजबूत डोरी बँधी है, जो कई बार तो हिलाकर रख देती है। एक दूसरे के अधिक निकट आने, परस्पर कुछ अधिक कर गुजरने के लिए आतुर होते हैं। यह कल्पना नहीं वास्तविकता है जिसकी दोनों पक्षों को निरंतर अथवा समय-समय पर अनुभूति होती रहती है।

🔶  यही तीसरा वर्ग है- बालकों का। इनकी सहायता से मिशन का कुछ काम भी चला है, पर वह बात गौण है। प्रमुख प्रश्न एक ही है कि इन्हें हँसता-हँसाता, खिलता-खिलाता देखने का आनंद कैसे मिले? अब तक भेंट, परामर्श, सत्संग, सुविधा सान्निध्य से भी इस भाव संवेदना की तुष्टि होती थी, पर अब तो नियति ने वह सुविधा भी हाथ से छीन ली है। अब परस्पर भेंट मिलन का अध्याय ही समाप्त होता जा रहा था। इसमें समय की कमी या कोई व्यवस्था सम्बन्धी कठिनाई कारण नहीं है। बात इतनी भर है कि इससे सूक्ष्मीकरण में बाधा पड़ती है। चित्त भटकता है और जिस स्तर का अंतराल पर दबाव पड़ना चाहिए वह बिखर जाता है। फलतः उस लक्ष्य की पूर्ति में बाधा पड़ती है जिसके साथ समस्त मनुष्य समुदाय का भाग्य-भविष्य जुड़ा हुआ है। अपनी निज की मुक्ति, सिद्धि या स्वर्ग उत्कर्ष जैसा कारण रहा होता तो उसे आगे कभी के लिए टाला जा सकता था, पर समय तो ऐसा विकट है जो एक क्षण की भी छूट नहीं देता। ईमानदार सिपाही की तरह मोर्चा संभालने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं। इसलिए सूक्ष्मीकरण के संदर्भ में परिजनों को हमें अपनी साधना हेतु एकाकी छोड़ देना चाहिए।

🔷 बच्चों के, प्रज्ञा परिजनों के सम्बन्ध में चलते-चलाते हमारा इतना ही आश्वासन है कि यदि वे अपने भाव-सम्वेदना क्षेत्र को थोड़ा और परिष्कृत कर लें तो निकटता अब की अपेक्षा भी अधिक गहरी अनुभव करने लगेंगे। कारण कि हमारा सूक्ष्म शरीर सन् 2000 तक और भी अधिक प्रखर होकर जिएगा। जहाँ उसकी आवश्यकता होगी, बिना विलम्ब लगाए पहुँचेगा। कठिनाइयों में सहायता करने और बालकों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने की हमारी प्रकृति में राई-रत्ती भी अन्तर नहीं होने जा रहा है। वह लाभ पहले की अपेक्षा और भी अधिक मिलता रह सकता है।

🔶 हमारे गुरुदेव सूक्ष्म शरीर से हिमालय में रहते हैं। विगत ६१ वर्षों में हमने निरन्तर उसका सान्निध्य अनुभव किया है। यों आँखों से देखने की बात मात्र जीवन भर में तीन बार ही, तीन-तीन दिन के लिए सम्भव हुई है। भाव-सान्निध्य में श्रद्धा की उत्कृष्टता रहने से उसकी परिणति एकलव्य के द्रोणाचार्य, मीरा के कृष्ण, रामकृष्ण के काली-दर्शन जैसी होती है। हमें भी वे भविष्य में हमारी निकटता अपेक्षाकृत और भी अच्छी तरह अनुभव करते रहेंगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.194

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.23

रविवार, 17 दिसंबर 2017

👉 बूढ़ा पिता


🔷 किसी गाँव में एक बूढ़ा व्यक्ति अपने बेटे और बहु के साथ रहता था। परिवार सुखी संपन्न था किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी । बूढ़ा बाप जो किसी समय अच्छा खासा नौजवान था आज बुढ़ापे से हार गया था, चलते समय लड़खड़ाता था लाठी की जरुरत पड़ने लगी, चेहरा झुर्रियों से भर चूका था बस अपना जीवन किसी तरह व्यतीत कर रहा था।

🔶 घर में एक चीज़ अच्छी थी कि शाम को खाना खाते समय पूरा परिवार एक साथ टेबल पर बैठ कर खाना खाता था। एक दिन ऐसे ही शाम को जब सारे लोग खाना खाने बैठे। बेटा ऑफिस से आया था भूख ज्यादा थी सो जल्दी से खाना खाने बैठ गया और साथ में बहु और एक बेटा भी खाने लगे। बूढ़े हाथ जैसे ही थाली उठाने को हुए थाली हाथ से छिटक गयी थोड़ी दाल टेबल पे गिर गयी। बहु बेटे ने घृणा द्रष्टि से पिता की ओर देखा और फिर से अपना खाने में लग गए।

🔷 बूढ़े पिता ने जैसे ही अपने हिलते हाथों से खाना खाना शुरू किया तो खाना कभी कपड़ों पे गिरता कभी जमीन पर। बहु चिढ़ते हुए कहा – हे राम कितनी गन्दी तरह से खाते हैं मन करता है इनकी थाली किसी अलग कोने में लगवा देते हैं, बेटे ने भी ऐसे सिर हिलाया जैसे पत्नी की बात से सहमत हो। बेटा यह सब मासूमियत से देख रहा था।

🔶 अगले दिन पिता की थाली उस टेबल से हटाकर एक कोने में लगवा दी गयी। पिता की डबडबाती आँखे सब कुछ देखते हुए भी कुछ बोल नहीं पा रहीं थी। बूढ़ा पिता रोज की तरह खाना खाने लगा, खाना कभी इधर गिरता कभी उधर । छोटा बच्चा अपना खाना छोड़कर लगातार अपने दादा की तरफ देख रहा था। माँ ने पूछा क्या हुआ बेटे तुम दादा जी की तरफ क्या देख रहे हो और खाना क्यों नहीं खा रहे। बच्चा बड़ी मासूमियत से बोला – माँ मैं सीख रहा हूँ कि वृद्धों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, जब मैं बड़ा हो जाऊँगा और आप लोग बूढ़े हो जाओगे तो मैं भी आपको इसी तरह कोने में खाना खिलाया करूँगा।

🔷 बच्चे के मुँह से ऐसा सुनते ही बेटे और बहु दोनों काँप उठे शायद बच्चे की बात उनके मन में बैठ गयी थी क्युकी बच्चा ने मासूमियत के साथ एक बहुत बढ़ा सबक दोनों लोगो को दिया था।
बेटे ने जल्दी से आगे बढ़कर पिता को उठाया और वापस टेबल पे खाने के लिए बिठाया और बहु भी भाग कर पानी का गिलास लेकर आई कि पिताजी को कोई तकलीफ ना हो।

🔶 तो मित्रों, माँ बाप इस दुनियाँ की सबसे बड़ी पूँजी हैं आप समाज में कितनी भी इज्जत कमा लें या कितना भी धन इकट्ठा कर लें लेकिन माँ बाप से बड़ा धन इस दुनिया में कोई नहीं है यही इस कहानी की शिक्षा है और मैं आशा करता हूँ मेरा इस कहानी को लिखना जरूर सार्थक होगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 18 Dec 2017


👉 World-Admixture Of Happiness & Misery

🔶 This world has been created with, Sat & Tam, good & bad and auspicious & inauspicious elements. Nobody is either wholly good or wholly bad. Good & bad tendencies arise & subside from time to time. Desirable & undesirable occasions come & go like sun & shade. The sign of wisdom is to think as to which of them should be remembered & which forgotten. If we go on remembering sorrows, scercities, failures and evils done by others, this will pervade with hellish miseries.

🔷 Dejection, disappointment & dissatisfaction will occupy our mind every moment. But if we change our viewpoint & remember loving events, successes, prosperous people & good done by others, it will appear that there may be some scarcity now, but compared to it, pleasant circumstances are more in number. More favourable circumstances are available than unfavorable ones.

🔶 Necessity for comforts is felt to make life happy & peaceful. An effort should be made to get them. It should also not be forgotten that whatever is available should be put to the best use. If we learn the proper use of available means & use everything frugally, make the best use of them. then whatever is available can increase our happiness manifold.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (भाग 1)

🔶 उच्च स्तरीय साधना के भव पक्ष के तीन चरण है। (1) भजन, (2) मनन, (3) चिंतन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समय साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाय तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार आत्मिक जीवन के लिए भजन, मनन और चिंतन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अंतःकरण की स्वस्थता, प्रखरता, परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीन आधारों पर ही निर्भर है। गायत्री महामंत्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को कहा जा सकता है।
                  
🔷 सर्वोच्च साधन स्तर अद्वैत स्थिति का है। इसमें प्रवेश किये बिना न तो मनोलय होता है और न ईश्वर प्राप्ति। जब तक ईश्वर से भिन्न अपनी अलग सत्ता बनी रहेगी जब तक अपना विलय परमेश्वर में न होगा तब तक अपूर्णता का प्रथमता का अंत न होगा। लययोग ही समाधि की-मुक्ति की-परम स्थिति तक पहुँचा सकता है।
    
🔶 उच्च स्तरीय ‘भजन’ के लिए शरीर को शिथिल और मन को उदासीन करना पड़ता है। ताकि न शरीर की माँस पेशियों पर कोई तनाव रहे और न मस्तिष्क में कोई आकर्षण उत्तेजना पैदा करे। यह स्थिति कुछ ही दिन के अभ्यास से उपलब्ध हो जाती है। किस  आराम कुर्सी, कोमल बिस्तर या दीवार, पेड़ आदि का सहारा लेकर शरीर को निद्रित एवं मृतक स्थिति जैसा शिथिल कर देना चाहिए। इसे शवासन एवं जैसा शिथिलीकरण मुद्रा कहते हैं। शारीरिक दृष्टि से यह पूर्ण विश्राम है। मानसिक दृष्टि से इसे ध्यान भूमिका कहा जाता है। उत्तेजित तनी हुई नाड़ियाँ एवं माँस पेशियाँ होने पर कभी किसी का ध्यान लग ही नहीं सकता। इसलिए पद्मासन, बद्धपद्मासन जैसे तनाव उत्पन्न करने वाले आसन और किसी प्रयोजन के लिए उपयोगी भले ही हों-ध्यान के लिए बाधक होते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 3
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है!

🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्मा जी रहते थे और उनके आश्रम मे दुर दुर से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने को आते थे और महात्मा जी भी सभी को समान रुप से शिक्षा देते थे!

🔶 एक बार एक युवक उनके पास आया जो बहुत ही होशियार था और उसने कहा की मैं भी आपके आश्रम मे शिक्षा-दीक्षा लेना चाहता हुं तो महात्मा जी ने कहा की ठीक है! फिर वो उस युवक को लेकर दुर नगर गये और वहाँ से जब वापस लोट रहे थे तो महात्मा जी बार बार अपने थेले को देख रहे थे और युवक इस दृश्य को बराबर देख रहा था! और फिर एक नदी के किनारे महात्मा जी ने कहा वत्स रात्री मे अब हम यही पर विश्राम करते है सुबह ही यहाँ से आश्रम के लिये निकलेंगे और पुरी रात महात्मा जी उस थेले को बारबार देख रहे थे! वो युवक बारबार उन्हे देख रहा था!

🔷 महात्मा जी ने कहा की वत्स तुम यही बैठना और इस थैले को सम्भाल के रखना मैं नदी मे स्नान कर के आता हुं और पहले महात्मा जी स्नान करने को गये और फिर वो युवक गया फिर दोनो आश्रम पहुँचे और जब वहाँ पहुँचे और जब थैले को देखा तो महात्मा जी की आँखो से आँसु आने लगे जब उस युवक ने महात्मा जी से पुछा की हॆ देव इन आँसुओं का क्या कारण है और जब महात्मा जी ने कारण बताया तो वो युवक रोने लगा और वो युवक वहाँ से चला गया !

🔶 महात्मा जी के थैले मे एक सोने की ईंट थी जो एक राजा ने उन्हे परमार्थ हेतु दी थी और महात्मा जी सोच रहे थे की इस ईंट से आश्रम मे रहने वाले विद्यार्थियों के लिये कुछ अच्छे पक्के भवन का निर्माण करवा देंगे ताकि सर्दी गर्मी बरसात से उनकी रक्षा हो सके उनकी जिंदगियों का अच्छे से निर्माण हो सकेगा और गायों के लिये भी सालभर की चारे की व्यवस्था हो जायेगी और परमार्थ के अनेक कार्य सम्पुर्ण हो सकेंगे! और युवक ने सोचा की महात्मा जी का अभी भी सोने मे मोह है और महात्मा जी ठहरे गृहस्थी कही वो भटक न जायें और उसने सोने की ईंट को नदी के बहाव मे फेंक दिया और थैले मे एक पत्थर रख दिया और बड़ा खुश होने लगा की मैंने महात्मा जी को मोह से मुप्त कर दिया!

🔷 पर जब युवक ने सत्य कहा तो महात्मा जी ने कहा वत्स विवाह न करना बड़ी बात नही है बड़ी बात है विवाह करके नियम और संयम मे जीना और धन का त्याग करना बड़ी बात नही है बड़ी बात तो तब है की तुम्हारे पास धन है पर तुम्हारे मन मे उसके प्रति उदासीनता का भाव है उस धन के प्रति तुम्हारे मन मे कोई आसक्ति अथवा कोई मोह न हो!
मेरी चिन्ता का जो कारण था वो ये था की परमार्थ की जो जिम्मेदारी मुझे सोपी कही मॆरी लापरवाही से कोई अनहोनी न हो जायें और परमार्थ का कार्य कही रुक न जायें! उस सोने की ईंट के बारे मे मुझे भी पुछ सकते थे वत्स पर वत्स तुमने आवश्यकता से ज्यादा होशियारी दिखाई तुमने अपनी ही बुद्धी से सारे निर्णय अपने आप ही ले लिये होशियारी होना अच्छी बात है पर समझदारी होना ज्यादा जरूरी है!

🔶 फिर उस युवक ने कहा देव मैं बहुत बड़ा अपराधी हुं और जब तक पश्चात्ताप न कर लू तब तक मैं आपको अपना मुँह न दिखाउँगा और फिर कुछ समय बाद वो युवक वापिस लौटा और उसने महात्मा जी के सारे सपनो को साकार किया!

🔷 उसके पास जो कुछ भी था वो सबकुछ बेच आया और अपने अपराध का पश्चात्ताप किया!

🔶 इसलिये एक बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिये की कभी कभी आवश्यकता से ज्यादा होशियारी दिखाने पर नुकसान उठाना पड़ सकता है होशियारी अच्छी है पर आवश्यकता से ज्यादा होशियारी दुखदायी हो जाती है!

🔷 इसलिये होशियारी के साथ साथ समझदारी भी बहुत जरूरी है क्योंकि होशियारी उचित अनुचित नही देखती है पर समझदारी उचित अनुचित देखकर आगे बढ़ती है!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 17 Dec 2017


👉 सुख चाहिए किन्तु दुःख से डरिये मत (अन्तिम भाग)

🔶 अनेक बार अनुभव किया जा सकता है कि कभी-कभी जीवन में ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं जिनसे जीवन का हर क्षेत्र निराशा, कठिनाइयों तथा आपत्तियों से भरा दिखाई पड़ता है। हर समय वही अनुभव होता है कि अब जीवन में कोई सार नहीं रहा है, उसके अस्तित्व को हर प्रकार से खतरा पैदा हो गया है किन्तु किसी भी माध्यम से आशा का एक प्रकाश कण दीख जाने से परिस्थिति बिल्कुल बदल जाती है और वही निराश व्यक्ति एक बार फिर कमर कसकर जीवन संग्राम में योद्धा की तरह उतर पड़ता है व निश्चय विजय किया करता है। हानि के धक्के अथवा असफलता के क्षोभ से जब भी किसी व्यक्ति की मरने अथवा निराश, निकम्मे हो बैठने का समाचार सुनें तो समझ लें कि उसने अपनी भौतिक हानि के साथ अपनी आशा की भी हानि करली है अपने उत्साह का पल्ला छोड़ दिया है।
   
🔷 आशा तथा उत्साह कहीं से लाने अथवा आने वाली वस्तु नहीं है। यह दोनों तेज आपके अन्तःकरण में सदैव ही विद्यमान रहते हैं। हां आवश्यकता के समय उनको जगाना एवं पुकारना अवश्य पड़ता है। जीवन की कठिनाइयों तथा आपत्तियों से घबराकर अपने इन अन्तरंग मित्रों को भूल जाना अथवा इनका साथ छोड़ देना बहुत बड़ी भूल है। ऐसा करने का अर्थ है कि आप अपने दुर्दिनों को स्थायी बनाते हैं अपनी कठिनाइयों को पुष्ट तथा व्यापक बनाते हैं। किसी भी अन्धकार में, किसी भी प्रतिकूलता अथवा कठिनाई में अपने आशा उत्साह के सम्बन्ध को कभी मत छोड़ियेगा, कठिनाइयां आपका कुछ भी नहीं कर सकेंगी।

🔶 सुख की कामना करिये, किन्तु दुःख से डरिये नहीं। आशा और उत्साह के बल पर उन्हें जीतकर सुख के रूप में बदल डालिये। चिर प्रसन्न आशान्वित तथा उत्साहित रहिये। आपको सुख की याचना करने की आवश्यकता न होगी। वह स्वयं दरवान की ही तरह आपके जीवन की हर ड्यौढ़ी पर खड़ा आपका स्वागत करता हुआ मिलेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1966 पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.23

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.3

👉 Prosperous Crop Of Action (Karma)

🔶 Human life is a field, wherein actions are sown & their good or bad fruits are reaped. He who does good deeds, gets good fruit. A doer of bad deeds accumulates bad fruits. It is said. “He who sows mangoes, will eat mangoes, he who sows acacia, will get thorns.” Just as getting mangoes by sowing acacia is not possible in nature, similarly getting good by sowing the seeds of evils cannot even be imagined.
 
🔷 There is no other truth in human life than this. The fruit of good cannot be anything but peace, happiness & progress. Similarly, evil has never resulted in good, nor will it ever result in good in future. History bears witness to it.

🔶 No action is ever without cause. Similarly, no action is without its result. It is the fundamental rule from both subtle & gross viewpoints that destinies are never created by themselves but are written by the pen of individual’s own action. A good & bad destiny is always the result of one’s own actions.

🔷 It is only a delusion to thind that any individual, society or country has prospered through evil. Life keeps an account of every moment. Water will always remain water. If it flows through mu, it will not be bereft of bad smell. It cannot be potable even by creating a delusion of water. Similarly, Successes achieved through fraud ultimately lead to ignominy. Everlasting success is achieved only through good. This alone reforms man’s this as well as the other life. Fruits of actions are incontrovertible.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

👉 धैर्य से काम


🔶 बात उस समय की है जब महात्मा बुद्ध विश्व भर में भ्रमण करते हुए बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे थे और लोगों को ज्ञान दे रहे थे।

🔷 एक बार महात्मा बुद्ध अपने कुछ शिष्यों के साथ एक गाँव में भ्रमण कर रहे थे। उन दिनों कोई वाहन नहीं हुआ करते थे सो लोग पैदल ही मीलों की यात्रा करते थे। ऐसे ही गाँव में घूमते हुए काफ़ी देर हो गयी थी। बुद्ध जी को काफ़ी प्यास लगी थी। उन्होनें अपने एक शिष्य को गाँव से पानी लाने की आज्ञा दी। जब वह शिष्य गाँव में अंदर गया तो उसने देखा वहाँ एक नदी थी जहाँ बहुत सारे लोग कपड़े धो रहे थे कुछ लोग नहा रहे थे तो नदी का पानी काफ़ी गंदा सा दिख रहा था।

🔶 शिष्य को लगा की गुरु जी के लिए ऐसा गंदा पानी ले जाना ठीक नहीं होगा, ये सोचकर वह वापस आ गया। महात्मा बुद्ध को बहुत प्यास लगी थी इसीलिए उन्होनें फिर से दूसरे शिष्य को पानी लाने भेजा। कुछ देर बाद वह शिष्य लौटा और पानी ले आया| महात्मा बुद्ध ने शिष्य से पूछा की नदी का पानी तो गंदा था फिर तुम साफ पानी कैसे ले आए। शिष्य बोला की प्रभु वहाँ नदी का पानी वास्तव में गंदा था लेकिन लोगों के जाने के बाद मैने कुछ देर इंतजार किया। और कुछ देर बाद मिट्टी नीचे बैठ गयी और साफ पानी उपर आ गया।

🔷 बुद्ध यह सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और बाकी शिष्यों को भी सीख दी कि हमारा ये जो जीवन है यह पानी की तरह है। जब तक हमारे कर्म अच्छे हैं तब तक सब कुछ शुद्ध है, लेकिन जीवन में कई बार दुख और समस्या भी आते हैं जिससे जीवन रूपी पानी गंदा लगने लगता है। कुछ लोग पहले वाले शिष्य की तरह बुराई को देख कर घबरा जाते हैं और मुसीबत देखकर वापस लौट जाते हैं, वह जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाते वहीं दूसरी ओर कुछ लोग जो धैर्यशील होते हैं वो व्याकुल नहीं होते और कुछ समय बाद गंदगी रूपी समस्याएँ और दुख खुद ही ख़त्म हो जाते हैं।

🔶 तो मित्रों, इस कहानी की सीख यही है कि समस्या और बुराई केवल कुछ समय के लिए जीवन रूपी पानी को गंदा कर सकती है| लेकिन अगर आप धैर्य से काम लेंगे तो बुराई खुद ही कुछ समय बाद आपका साथ छोड़ देगी।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 16 Dec 2017


👉 सुख चाहिए किन्तु दुःख से डरिये मत (भाग 4)

🔶 आशा और उत्साह मनुष्य जीवन के दो बहुत बड़े सम्बल हैं। मनुष्य की प्रसन्नता के यह दोनों प्रमाणिक आधार हैं जो बुद्धिमान किसी भी दशा में इनको मन्द नहीं होने देते, अभाव, दुःख, कष्ट तथा प्रतिकूलतायें उस पर वैसे ही प्रभाव नहीं डाल पातीं जैसे कवच-सज्जित शरीर पर शत्रु के वाण! कष्ट आयेगा, कठिनाई खड़ी हो जायगी आशा उनका सत्य स्वरूप समझने और उनके हल के लिए मार्ग दिखलायेगी, उत्साह आगे बढ़ायेगा। और बढ़ते हुए व्यक्ति का मार्ग कोई भी अवरोध रोक नहीं सकता। दुःख-क्लेश होता उन्हीं को है जो किसी कारण से किंकर्तव्य विमूढ़ होकर एक जगह ठिठके रहते हैं। जो ठिठककर रुकना नहीं जानता, वह कठिनाइयों को परास्त कर आगे निकल ही जाता है।
   
🔷 आशा और उत्साह की शक्ति अपरिमित है। उसका परिमाण लगाया ही नहीं जाता। प्राणान्तक संकट में पड़े हुये न जाने कितने वीर व्यक्तियों ने केवल आशा और उत्साह के बल पर इतिहास प्रसिद्ध विजयों का वरण किया है। आशा और उत्साह के अभाव में एक नगण्य से कारण से परास्त होकर न जाने कितने व्यक्ति आत्म-हत्या कर लिया करते हैं, जब कि उनका वह दुःख, वह क्लेश अथवा वह अभाव—प्राण तो दूर, एक रोम के बलिदान योग्य भी नहीं होता। आशा और उत्साह का अभाव तिनके जैसी कठिनाई को पहाड़ जैसा बना दिया करता है। निराशा अन्धकार है और निरुत्साह व्याधि। अन्धेरे में एक छोटी-सी आशंका प्राण लेवा बन जाया करती है और व्याधिग्रस्त व्यक्ति एक कदम आगे बढ़ने का साहस नहीं रखता।

🔶 दिनों, महीनों और वर्षों के संचित विषाद को आशा की एक छोटी-सी किरण क्षणभर में दूर करके जीवन में उल्लास तथा उत्साह का संचार कर देती है। मरण शय्या पर पड़ा रोगी औषधि की अपेक्षा आशा के सहारे रोग या मृत्यु पर अधिक विजय पाता है जीवन से क्षुब्ध परेशानियों से परेशान होकर आत्महत्या को उद्यत यदि किसी व्यक्ति को किसी संयोग से आशा की किरण मिल जाती है तो वह तुरन्त अशुभ विचार छोड़कर जीवन-पथ पर हंसता हुआ बढ़ चलता है। तिल-तिल भूमि पर बलिदान देता हुआ कोई भी योद्धा विजय की आशा से ही युद्ध-भूमि में बढ़ता चला जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1966 पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.23

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.3

👉 Secret Of Karma

🔶 Man is himself the creator of his own destiny. How can good fortune arise without elimination of whatever evil actions have been done previously by us knowingly or unknowingly? How can milk or butter be filled in a pitcher which is already full of dirt? Therefore, the first necessity is to make an effort to get rid of the physical and mental dirt and proliferation produced by malimpressions.

🔷 At the same time, we should continue trying to ensure that the same defects and evils may never attack us again. Purification on one side and development on the other, if undertaken regularly, will show immediate result. The pauper of yesterday is seen becoming a rich man of today. The rich of yesterday are seen begging from door to door today. Those who achieve some success in their ascetic practice. This is the open secret of Karma. Therefore, we should always act in a manner which will not make our Atma (soul)  reproach us of scorch us in the fire of repentance.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न कुछ लेकर आते थे! एक दिन महात्मा जी अपने कुछ शिष्यों के साथ नगर भ्रमण को गये तो बीच रास्ते मे उन्हे एक फल वाले के वहाँ एक आदमी कह रहा था की कुछ सस्ते फल दे दो भगवान के मन्दिर चढाने है! थोड़ा आगे बढे तो एक दुकान पर एक आदमी कह रहा था की दीपक का घी देना और वो घी ऐसा की उससे अच्छा तो तेल है! आगे बढे तो एक आदमी कह रहा था की दो सबसे हल्की धोती देना एक पण्डित जी को और एक किसी और को देनी है!

🔷 फिर जब वो मन्दिर गये तो जो नजारा वहाँ देखा तो वो दंग रह गये!

🔶 उस राज्य की राजकुमारी भगवान के आगे अपना मुंडन करवा रही थी और वहाँ पर एक किसान जिसके स्वयं के वस्त्र फटे हुये थे पर वो कुछ लोगों को नये नये वस्त्र दान कर रहा था! जब महात्मा जी ने उनसे पूछा तो किसान ने कहा हॆ महात्मन चाहे हम ज्यादा न कर पाये पर हम अपने ईश्वर को वो समर्पित करने की ईच्छा रखते है जो हमें भी नसीब न हो और जब मैं इन वस्त्रहीन लोगों को देखता हूँ तो मेरा बड़ा मना करता है की इन्हे उतम वस्त्र पहनावे!

🔷 और जब राजकुमारी से पूछा तो उस राजकुमारी ने कहा हॆ देव एक नारी के लिये उसके सिर के बाल अति महत्वपुर्ण है और वो उसकी बड़ी शोभा बढ़ाते है तो मैंने सोचा की मैं अपने इष्टदेव को वो समर्पित करूँ जो मेरे लिये बहुत महत्वपुर्ण है इसलिये मैं अपने ईष्ट को वही समर्पित कर रही हूँ!

🔶 जब उन दोनो से पूछा की आप अपने ईष्ट को सर्वश्रेष्ठ समर्पित कर रहे हो तो फिर आपकी माँग भी सर्वश्रेष्ठ होगी तो उन दोनो ने ही बड़ा सुन्दर उत्तर दिया!

🔷 हॆ देव हमें व्यापारी नही बनना है और जहाँ तक हमारी चाहत का प्रश्न है तो हमें उनकी निष्काम भक्ति और निष्काम सेवा के अतिरिक्त कुछ भी नही चाहिये!

🔶 जब महात्मा जी मन्दिर के अन्दर गये तो वहाँ उन्होने देखा वो तीनों व्यक्ति जो सबसे हल्का घी, धोती और फल लेकर आये साथ मे अपनी मांगो की एक बड़ी सूची भी साथ लेकर आये और भगवान के सामने उन मांगो को रख रहे है!

🔷 तब महात्मा जी ने अपने शिष्यों से कहा हॆ मेरे अतिप्रिय शिष्यों जो तुम्हारे लिये सबसे अहम हो जो शायद तुम्हे भी नसीब न हो जो सर्वश्रेष्ठ हो वही ईश्वर को समर्पित करना और बदले मे कुछ माँगना मत और माँगना ही है तो बस निष्काम-भक्ति और निष्काम-सेवा इन दो के सिवा अपने मन मे कुछ भी चाह न रखना!

🔶 इसीलिये एक बात हमेशा याद रखना की भले ही थोड़ा ही समर्पित हो पर जो सर्वश्रेष्ठ हो बस वही समर्पित हो !

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 15 Dec 2017


👉 प्रतिकूलतायें जीवन को प्रखर बनाती हैं

🔷 आग के बिना न भोजन पकता है, न सर्दी दूर होती है और न ही धातुओं का गलाना- ढलाना सम्भव हो पाता है। आदर्शों की परिपक्वता के लिए यह आवश्यक है कि उनके प्रति निष्ठा की गहराई कठिनाइयों की कसौटी पर कमी और खरे- खोटे की यथार्थता समझी जा सके। बिना तपे सोने को प्रमाणिक कहाँ माना जाता है? उसका उपयुक्त मूल्य कहाँ मिलता है? यह तो प्रारंभिक कसौटी है।       

🔶 कठिनाइयों के कारण उत्पन्न हुई असुविधाओं को सभी जानते हैं। इसलिए उनसे बचने का प्रयत्न भी करते हैं। इसी प्रयत्न के लिए मनुष्य को दूरदर्शिता अपनानी पड़ती है और उन उपायों को ढूँढना पड़ता है, जिनके सहारे विपत्ति से बचना सम्भव हो सके। यही है वह बुद्धिमानी जो मनुष्यों को यथार्थवादी और साहसी बनाती है। जिननेकठिनाईयों में प्रतिकूलता को बदलने के लिए पराक्रम नहीं किया, समझना चाहिए कि उन्हे सुदृढ़ व्यक्तित्व के निर्माण का अवसर नहीं मिला। कच्ची मिट्टी के बने बर्तन पानी की बूँद पड़ते ही गल जाते हैं। किन्तु जो देर तक आँवे की आग सहते हैं, उनकी स्थिरता, शोभा कहीं अधिक बढ़ जाती है।

🔷 तलवार पर धार रखने के लिए उसे घिसा जाता है। जमीन से सभी धातुऐँ कच्ची ही निकलती हैं। उनका परिशोधन भट्ठी के अतिरिक्त और किसी उपाय से सम्भव नहीं। मनुष्य कितना विवेकवान, सिद्धन्तवादी और चरित्रनिष्ठ है, इसकी परीक्षा विपत्तियों में से गुजरकर इस तप- तितीक्षा में पक कर ही हो पाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सुख चाहिए किन्तु दुःख से डरिये मत (भाग 3)

🔶 सुख-सुविधा की कामना बेशक की जाये और उसके लिए अथक प्रयत्न भी, पर साथ ही कठिनाइयों का स्वागत करने के लिए भी प्रस्तुत रहना चाहिए। अनुकूलता पाकर हर्षोन्मत्त हो उठना और प्रतिकूलता देखते ही रो उठना मानसिक हीनता का लक्षण है। मनोहीन मनुष्य संसार में कुछ भी करने लायक नहीं होता। वह जीता जरूर है लेकिन मृतकों से भी बुरी जिन्दगी। जिसका हृदय विषाद से आक्रान्त है, चिन्ताओं से अभिभूत है उसका जीना जीने में नहीं गिना जा सकता। जिन्दगी वास्तव में वही है जिसमें जीने के साथ कुछ ऊंचा और अच्छा करते रहने का उत्साह सक्रिय होता रहे।
   
🔷 यह उत्साहपूर्ण सक्रियता केवल उसी में सम्भव है जो हर समय कठिनाइयों से लड़ने का साहस रखता है आपत्तियों से संघर्ष करने की हिम्मत वाला है। जो व्यग्र है त्रस्त है और निराश है वह न केवल संसार पर ही बल्कि अपने पर भी बोझ बना हुआ श्वासों का भार ढोया करता है। चिन्तित तथा निराश मनःस्थिति वाला व्यक्ति किसी पुरुषार्थ के योग्य नहीं रहता। जिसकी जड़ में दीमक लग चुकी है अथवा जिसका मूल किसी कीड़े ने काट डाला है उस लता से, उस वृक्ष से सुन्दर फल-फूलों की आशा नहीं की जा सकती।

🔶 सुख-सुविधा की कामना अवश्य करिए यह उपयुक्त है। किन्तु साथ ही कठिनाइयों से लोहा लेने के लिए भी सदैव तत्पर रहिये। कठिनाइयां स्वयं कष्ट लेकर नहीं आतीं। वे केवल आती है आपकी मानसिक प्रसन्नता, आपकी आशा तथा आपके उत्साह पर आवरण डालने। यदि आपने उनको अपनी इन आत्म-किरणों पर परदा डाल लेने दिया तो आपके मनो-मन्दिर में अन्धकार हो जायगा और तब तमोजन्य निराश, क्षोभ, दुःख, भय तथा असन्तोष की अशिव भावनायें आपको तरह-तरह से त्रस्त करने लगेंगी और आप अकारण ही पीड़ित रहने लगेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1966 पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.22

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.3

👉 Be Silent, Be Strong

🔶 World serve both as nectar & poison. The speech which is true, inspiring & encouraging, free from deceit, sweet & beneficial will be called nectarine. On the contrary, the words which are harsh, egoistic, mocking. taunting, shallow & inimical will be poisonous & others.

🔷 Words should never be misused. If possible, observe silence for a day in a week or a month & engage the mind in self-analysis & contemplation of truth. Silence is very dynamic. The language of an individual who controls his words & observes silence. as for as possible is very sweet. Speak only as much as is necessary. Misuse of words wastes a large part of our energy. Therefore, just as brahmacharya etc. have been ordained for control of senses, similarly the practice of silence has been laid down for control of speech.

🔶  Mahatma Gandhi has said- “Silence is the best speech.” If it is necessary to speak, speak as little as possible. If one word can do, don’t use two. In Franklin’s words, “No teacher is better than an ant & it remains silent.” Carlyle has said- “Silence has more word-power than speech.”

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 6)

🔶 हमने अपने जीवन के इस अन्तिम समय में सारी हिम्मत और शक्ति इस बात में लगा दी है कि शान्तिकुञ्ज को हम एक विश्वविद्यालय बना देंगे। पाँच सौ व्यक्तियों के लिए हमने एक माह में शिक्षण देने की व्यवस्था की है। इतना बड़ा काम व मात्र एक महीना? हमने इसलिए बड़ा नहीं रखा, क्योंकि हमको कम समय में एक लाख से अधिक सही जीवन जीने वाले आदमी तैयार करने हैं। हमने पाँच सौ आदमियों को प्रत्येक माह ट्रेण्ड करके स्वयं का महान् और शानदार जीवन जीने के लिए शिक्षण देने का प्रबन्ध किया है। न केवल स्वयं का जीवन बल्कि समाज की सेवा का शिक्षण। न केवल समाज की सेवा बल्कि यह भी कि आज की समस्याएँ क्या हैं? गुत्थियों का हल और समाधान निकालने के लिए क्या कदम बढ़ाए जाने चाहिए और किस तरीके से काम करना चाहिए? यह सिखाने का प्रबन्ध किया है।
                  
🔷 एक और आपको अचम्भा होगा। यहाँ बहुत दिनों से जब से यह आश्रम बना है, यहाँ के निवास के लिए, बिजली तो जलती है, कुएँ से पानी जो लेते हैं, उसके लिए किसी से कुछ भी नहीं लिया गया है। अब एक और हिम्मत बढ़ाई है। वह यह कि अब खाने की जिम्मेदारी भी हम अपने कन्धों पर उठाएँगे, गरीब और अमीर दोनों के लिए कोई खर्च वसूला नहीं जाएगा। यदि कोई कहे कि हमने आपका खाया है, दान का पैसा है, ब्राह्मण का, साधु का पैसा है, हम खाना नहीं चाहते तो हम कहेंगे कि मुट्ठी बन्द करके दे जाइए, हम रसीद काट देंगे आपकी। तो इस शिक्षण में यह नवीन विशेषता है कि अधिक से अधिक आदमी लाभान्वित हो सकें।
    
🔶 सरकारी स्कूलों-कॉलेजों में आपने देखा होगा कि वहाँ बोर्डिंग फीस अलग देनी पड़ती है। पढ़ाई की फीस अलग देनी पड़ती है, लाइब्रेरी फीस अलग व ट्यूशन फीस अलग। लेकिन हमने यह हिम्मत की है कि कानी कौड़ी की भी फीस किसी के ऊपर लागू नहीं की जाएगी। यही विशेषता नालन्दा-तक्षशिला विश्वविद्यालय में भी थी। वही हमने भी की है, लेकिन बुलाया केवल उन्हीं को है, जो समर्थ हों, शरीर या मन से बूढ़े न हो गए हों, जिनमें क्षमता हो, जो पढ़े-लिखे हों। इस तरह के लोग आयेंगे तो ठीक है, नहीं तो अपनी नानी को, दादी को, मौसी को, पड़ोसन को लेकर के यहाँ कबाड़खाना इकट्ठा कर देंगे तो यह विश्वविद्यालय नहीं रहेगा? फिर तो यह धर्मशाला हो जाएगी। साक्षात् नरक हो जाएगा। इसे नरक मत बनाइए आप।

🔷 जो लायक हों वे यहाँ की ट्रेनिंग प्राप्त करने आएँ और हमारे प्राण, हमारे जीवट से लाभ उठाना चाहें, चाहे हम रहें या न रहें, वे लोग आएँ। प्रतिभावानों के लिए निमन्त्रण है, बुड्ढों, अशिक्षितों, उजड्डों के लिए निमन्त्रण नहीं है। आप कबाड़खाने को लेकर आएँगे तो हम आपको दूसरे तरीके से रखेंगे, दूसरे दिन विदा कर देंगे। आप हमारी व्यवस्था बिगाड़ेंगे? हमने न जाने क्या-क्या विचार किया है और आप अपनी सुविधा के लिए धर्मशाला का लाभ उठाना चाहते हैं? नहीं, यह धर्मशाला नहीं है। यह कॉलेज है, विश्वविद्यालय है। कायाकल्प के लिए बनी एक अकादमी है। हमारे सतयुगी सपनों का महल है। आपमें से जिन्हें आदमी बनना हो, बनाना हो, इस विद्यालय की संजीवनी विद्या सीखने के लिए आमन्त्रण है। कैसे जीवन को ऊँचा उठाया जाता है, समाज की समस्याओं को कैसे हल किया जाता है? यह आप लोगों को सिखाया जाएगा। दावत है आप सबको। आप सबमें जो विचारशील हों, भावनाशील हों, हमारे इस कार्यक्रम का लाभ उठाएँ। अपने को धन्य बनाएँ और हमको भी।

🌹  हमारी बात समाप्त।
🌹  ॐ शान्ति।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 166)

🌹  तीन संकल्पों की महान् पूर्णाहुति
🔷 तीसरा वर्ग प्रज्ञा परिवार का है। इसमें हमारा व्यक्तिगत लगाव है। लम्बे समय से जिस-जिस बहाने साथ-साथ रहने के कारण घनिष्ठता ऐसी और इतनी बढ़ गई है कि उसका समापन किसी भी प्रकार हो सकना सम्भव नहीं। इसके कई कारण हैं। प्रथम यह कि हमें अनेक जन्मों का स्मरण है। लोगों को नहीं। जिनके साथ पूर्व जन्मों में सघन सम्बन्ध रहे हैं उन्हें संयोगवश या प्रयत्नपूर्वक हमने परिजनों के रूप में एकत्रित कर लिया है और वे जिस-तिस कारण हमारे इर्द-गिर्द जमा हो गए हैं। इन्हें अखण्ड ज्योति अपने आँचल में समेटे बटोरे रही है। संगठन के नाम पर चलने वाले रचनात्मक कार्यक्रम भी इस संदर्भ में आकर्षण उत्पन्न करते रहे हैं।

🔶  इसके अतिरिक्त बच्चों और अभिभावकों के बीच जो सहज वात्सल्य भरा आदान -प्रदान रहता है, वह भी चलता रहा है। बच्चे सहज स्वभाव अभिभावकों से कुछ चाहते हैं। भले ही मुँह खोलकर माँगे नहीं अथवा भाव-भंगिमा से प्रकट करते रहें। बच्चों की आकाँक्षा बढ़ी-चढ़ी होती हैं। भले ही वह उपयोगी हो या अनुपयोगी, आवश्यक हो या अनावश्यक। दे दिलाकर ही उन्हें चुपाया जाता है। इतनी समझ होती नहीं कि पैसा व्यर्थ जाने और वस्तु किसी काम न आने का तर्क उसके गले उतारा जा सके। बच्चों और अभिभावकों के बीच यह दुलार भरी खींचतान तब तक चलती रहती है, जब तक वे परिपक्व नहीं हो जाते और उपयोगिता-अनुपयोगिता का अंतर नहीं समझने लगते। हमारे साथ एक रिश्ता परिजनों का यह भी चलता रहा है।

🔷 मान्यता सो मान्यता। आदत सो आदत। प्रत्यक्ष रिश्तेदारी न सही पूर्व संचित सघनता का दबाव सही। एक ऐसा सघन सूत्र हम लोगों के बीच विद्यमान है जो विचार विनियम, सम्पर्क-सान्निध्य तक ही सीमित नहीं रहता, कुछ ऐसा भी चाहता है कि अधिक प्रसन्नता का कोई साधन कोई अवसर हाथ लगे। कइयों के सामने कठिनाइयाँ होती हैं। कई भ्रमवश जंजाल में फँसे रहते हैं। कइयों को अधिक अच्छी स्थिति चाहिए। कारण कई हो सकते हैं, पर देखा यह जाता है कि अधिकाँश लोग इच्छा आकाँक्षा लेकर आते हैं। वाणी से या बिना वाणी के व्यक्त करते हैं, साथ ही सोचते हैं कि हमारी बात यथा स्थान पहुँच गई। उसका विश्वास उन्हें तब होता है जब पूरा न सही आधा-अधूरा उपलब्ध भी हो जाता है।

🔶 याचक और दानी का रिश्ता दूसरा है, पर बच्चों और अभिभावकों के बीच यह बात लागू नहीं होती। बछड़ा दूध न पिए तो गाय का बुरा हाल होता है। मात्र गाय ही बछड़े को नहीं देती, बछड़ा भी गाय को देता है। यदि ऐसा न होता तो कोई अभिभावक बच्चे जनने और उनके लालन-पालन में समय लगाने, पैसा खर्च करने का झंझट मोल न लेते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.192

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

👉 हीरों से भरा खेत

🔶 हफीज अफ्रीका का एक किसान था। वह अपनी जिंदगी से खुश और संतुष्ट था। हफीज खुश इसलिए था कि वह संतुष्ट था। वह संतुष्ट इसलिए था क्योंकि वह खुश था। एक दिन एक अक्लमंद आदमी उसके पास आया। उसने हफीज से कहा, ‘अगर तुम्हारे पास अंगूठे जितना बड़ा हीरा हो, तो तुम पूरा शहर खरीद सकते हो, और अगर तुम्हारे पास मुट्ठी जितना बड़ा हीरा हो तो तुम अपने लिए शायद पूरा देश ही खरीद लो।‘ वह अक्लमंद आदमी इतना कह कर चला गया। उस रात हफीज सो नहीं सका। वह असंतुष्ट हो चुका था, इसलिए उसकी खुशी भी खत्म हो चुकी थी।

🔷 दूसरे दिन सुबह होते ही हफीज ने अपने खेतों को बेचने और अपने परिवार की देखभाल का इंतजाम किया, और हीरे खोजने के लिए रवाना हो गया। वह हीरों की खोज में पूरे अफ्रीका में भटकता रहा, पर उन्हें पा नहीं सका। उसने उन्हें यूरोप में भी दूंढ़ा, पर वे उसे वहां भी नहीं मिले। स्पेन पहुंचते-पहुंचते वह मानसिक, शारीरिक और आर्थिक स्तर पर पूरी तरह टूट चुका था। वह इतना मायूस हो चुका था कि उसने बार्सिलोना नदी में कूद कर खुदखुशी कर ली।

🔶 इधर जिस आदमी ने हफीज के खेत खरीदे थे, वह एक दिन उन खेतों से होकर बहने वाले नाले में अपने ऊंटों को पानी पिला रहा था। तभी सुबह के वक्त उग रहे सूरज की किरणें नाले के दूसरी और पड़े एक पत्थर पर पड़ी, और वह इंद्रधनुष की तरह जगमगा उठा। यह सोच कर कि वह पत्थर उसकी बैठक में अच्छा दिखेगा, उसने उसे उठा कर अपनी बैठक में सजा दिया। उसी दिन दोपहर में हफीज को हीरों के बारे में बताने वाला आदमी खेतों के इस नए मालिक के पास आया। उसने उस जगमगाते हुए पत्थर को देख कर पूछा, ‘क्या हफीज लौट आया?‘ नए मालिक ने जवाब दिया, ‘नहीं, लेकिन आपने यह सवाल क्यों पूछा?‘

🔷 अक्लमंद आदमी ने जवाब दिया, ‘क्योंकि यह हीरा है। मैं उन्हें देखते ही पहचान जाता हूं।‘ नए मालिक ने कहा, ‘नहीं, यह तो महज एक पत्थर है। मैंने इसे पाले के पास से उठाया है। आइए, मैं आपको दिखता हूं। वहां पर ऐसे बहुत सारे पत्थर पड़े हुए हैं। उन्होंने वहां से नमूने के तौर पर बहुत सारे पत्थर उठाए, और उन्हें जांचन-परखने के लिए भेज दिया। वे पत्थर हीरे ही साबित हुए। उन्होंने पाया कि उस खेत में दूर-दूर तक हीरे दबे हुए थे।

🔶 इससे हमें सीख मिलते हैं-

🔷 जब हमारा नजरिया सही होता है, तो हमें महसूस होता है कि हम हीरों से भरी हुई जमीन पर चल रहे हैं। मौके हमेशा हमारे पावों तले दबे हुए हैं। हमें उनकी तलाश में कहीं जाने की जरूरत नहीं है। हमें केवल उनको पहचान लेना है।

🔶 दूसरे के खेत की घास हमेंशा हरी लगती है। जिन्हें मौके की पहचान नहीं होती, उन्हें मौके का खटखटाना शोर लगता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 14 Dec 2017


👉 सुख चाहिए किन्तु दुःख से डरिये मत (भाग 2)

🔶 मन प्रसन्न है तो संसार में सभी ओर प्रसन्नता ही प्रसन्नता दृष्टिगोचर होगी, सुख ही सुख अनुभव होगा। तब ऐसी सहज प्रसन्नता की दशा में परिस्थितियों के अनुकूल होने की अपेक्षा नहीं रहती। परिस्थितियां अनुकूल हैं—मनभावनी हैं—बहुत अच्छा। परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं तब भी कोई अन्तर नहीं पड़ता। प्रसन्न-मन मानव उन्हें अनुकूल करने के लिए प्रयत्न करेगा, संघर्ष करेगा, पसीना बहायेगा, मूल्य चुकायेगा, कष्ट उठायेगा किन्तु दुःखी नहीं होगा। वह, यह सब हंसते-हंसते, प्रसन्न मनो मुद्रा में ही करता रहेगा। उसे परिश्रम में आनन्द आयेगा। संघर्ष में सुख मिलेगा। असफलता पर हंसी आयेगी और सफलता का स्वागत करेगा। जीवन की विविध परिस्थितियां तथा विविध उपलब्धियां उसकी प्रसन्नता को बढ़ा ही सकती हैं घटा नहीं सकती।
   
🔷 यह सही है कि संसार का कोई मनुष्य दुःख की कामना नहीं करता। यदि चाहता है तो केवल सुख ही चाहता है। किन्तु एक मात्र सुख की स्वार्थपूर्ण कामना का अर्थ यह है कि दुःख क्लेश आ जाने पर हाय-हाय करते हुए हाथ-पैर छोड़कर बैठे रहना और दुर्भाग्य अथवा नियति को कोसते रहना। इस प्रकार की निरुत्साह वृत्ति ही सुख की स्वार्थ कामना है जो कि किसी मानव को शोभा नहीं देती।

 🔶 एक मात्र सुख की आकांक्षा रखने वाले दुःख क्लेशों से भयभीत होने वाले न केवल स्वार्थी ही होते हैं अपितु कायर भी होते हैं। कायरता मनुष्य जीवन का कलंक है जो संघर्षों, मुसीबतों एवं आपत्तियों से डरता है, उनके आने पर निराश अथवा निरुत्साहित हो जाता है वह और कोई बड़ा काम कर सकना तो दूर साधारण मनुष्यों की तरह साधारण जीवन भी यापन नहीं कर सकता है। संसार में न तो आज तक ऐसा कोई मनुष्य हुआ है और न आगे ही होगा जिसके जीवन में सदा प्रसन्नता की परिस्थितियां ही बनी रहे। उसे कभी दुःख क्लेश के तप्त झोंके न सहन करने पड़े हों।

🔷 राजा से लेकर रंक तक और बलवान से लेकर निर्बल तक प्रत्येक प्राणी को अपनी-अपनी स्थिति में अपनी तरह के दुःख क्लेश उठाने ही पड़ते हैं। कभी शारीरिक कष्ट, कभी मानसिक क्लेश, कभी सामाजिक कठिनाई कभी आर्थिक अभाव तो कभी आध्यात्मिक अन्धकार मनुष्य को सताते ही रहते हैं। सदा सर्वदा कोई भी व्यक्ति कष्ट एवं कठिनाइयों से सर्वथा मुक्त नहीं रह सकता। तब ऐसी अनिवार्य अवस्था में किसी प्रकार की कठिनाई, आ जाने पर निराश, चिन्तित अथवा क्षुब्ध हो उठना इस बात का प्रमाण है कि हम संसार के शाश्वत नियमों से सामंजस्य स्थापित नहीं करना चाहते, हम असामान्यता के प्रति हठी अथवा दुराग्रही बने रहना चाहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1966 पृष्ठ 21
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.21

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.3

👉 How To Develop Personality?

🔶 Can development of personality be possible through speeches & writings? This issue is worth consideration. Today only these two means are adopted to achieve any thing. Speeches & writhing can also be necessary to some extent to obtain general information; but this alone will not do. Creative means will have to be adopted for this purpose. It is only by injecting spirituality & theism in this purpose.

🔷 It is only by injecting spirituality & theism in the innerself that faith can be increased in the ideals. Which can eliminate an individual’s evil & animal tendencies & inculcate divine tendencies. This alone is Sadhana (Practice). Sadhana is taken as capable of disentangling every knote of human life, and remover of all obstructions.
 
🔶 This belief is not untrue. The practice which can eliminate the impurities & perplexity covering the Atma can also open the gates of peace, happiness & prosperity. The scientific method of spiritual development alone is called by the name of Sadhana (Practice). The job of spiritual development is more important than construction of a huge workshop or a large factory.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 5)

🔶 ट्रेनिंग बड़ी आवश्यक है। विश्वमित्र राम व लक्ष्मण को उनके पिता से माँगकर ले गए थे और उनको ट्रेनिंग दी थी। काहे की ट्रेनिंग दी थी। बड़ी महत्त्वपूर्ण ट्रेनिंग थी। शिवाजी का इतना भारी धनुष तोड़ा जाए? लंका में जो राक्षस रहते हैं, उनको किस तरीके से समाप्त किया जाए? रामराज्य की स्थापना कैसे की जाए? ये सारी बातें विश्वमित्र के आश्रम में जाकर सीखी थीं। ऐसी ही एक ट्रेनिंग की व्यवस्था हमने अपने शान्तिकुञ्ज में की है, ताकि आप समाज में छाई असुरता से लड़ सकें।
                  
🔷 शान्तिकुञ्ज को पहले से भी हमारा तीस गुना करने का मन था, किन्तु अब बहुत दिनों से नालन्दा और तक्षशिला विश्वविद्यालय, यही हमारे दिमाग में घूमते रहते हैं। हमें यही सपना आते रहता है कि नालन्दा, जिसमें हजारों धर्म-प्रचारक तैयार किए गए थे एवं तक्षशिला जिसमें हजारों संस्कृति प्रचारक तैयार किए गए थे, यहाँ पर बने। धर्म का नाम तो मैं अब नहीं लूँगा। यह नाम बहुत बदनाम हो गया है। मैं समाज-सेवा की बात आपसे कहूँगा। यह कहूँगा कि आपकी महानता की वृद्धि के लिए सेवा नहीं करेंगे, तब तक आप उन्नतिशील नहीं बनेंगे? आपकी आत्मा में सन्तोष और शान्ति का निवास नहीं होगा।
    
🔶 आत्मसन्तोष के अलावा समाज का सहयोग व भगवान् का अनुग्रह कैसे मिल सकता है, शानदार जिन्दगी कैसे जीनी चाहिए? इसके लिए हमारे यहाँ ट्रेनिंग चलती है। ट्रेनिंग तो पहले भी चलती थी। नौ दिन की, पाँच दिन व एक माह की, पर अब हमने सारे के सारे शान्तिकुञ्ज को विश्वविद्यालय के रूप में परिणत कर दिया है। कानूनन तो यह विश्वविद्यालय नहीं है, क्योंकि विश्वविद्यालय के लिए तो खानापूर्ति की जाती है, वह बहुत बड़ी है लेकिन पुराने समय में नालन्दा में कोई खानापूर्ति नहीं हुई थी और न तक्षशिला में कोई खानापूर्ति हुई थी। ये गवर्नमेण्ट से कोई सम्बन्धित नहीं हुए थे। हमारा यह विश्वविद्यालय इसी प्रकार का है।

🔷 आज मनुष्य को जीना कहाँ आता है? जीना भी एक कला है। सब आदमी खाते हैं, पीते हैं, सोते हैं और मौत के मुँह में चले जाते हैं, किन्तु जीना नहीं जानते। जीना बड़ी शानदार चीज है। इसको संजीवनी विद्या कहते हैं—जीवन जीने की कला। यहाँ हम अपने विश्वविद्यालय में, शान्तिकुञ्ज में जीवन जीने की कला सिखाते हैं और यह सिखाते हैं कि आज के गए-बीते जमाने में आप अपनी नाव पार करने के साथ-साथ सैकड़ों आदमियों को बिठाकर पार किस तरह से लगा पाते हैं? नाव चलाना भी एक कला है। हम आपको नाव दे दें व आपको नदी के किनारे छोड़ दें, कहें कि आप जाइए तो इतने मात्र से आप नाव नहीं चला सकेंगे। कहीं लहरों के चक्कर में पड़ेंगे और बहते हुए चले जाएँगे। नाव को डुबो देंगे और आप भी डूब जाएँगे। लेकिन अगर आपको ट्रेनिंग मिली हो तो आप सकुशल पार हो जाएँगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 165)

🌹  तीन संकल्पों की महान् पूर्णाहुति

🔷 युग संधि २००० तक चलेगी। तब तक हमें स्थूल या सूक्ष्म शरीर से सक्रिय रहना है। हमें सौंपे गए सभी कामों को पूरा करके ही जाना है। परिजन अब तक के सभी महत्त्वपूर्ण कार्यों में साथ देते, हाथ बँटाते और कदम से कदम मिलाकर चलते रहे हैं। विश्वास किया गया है कि इस अग्निपरीक्षा की घड़ी में वे साथ नहीं छोड़ेंगे, मुँह नहीं मोड़ेंगे। इस श्रेय साधना में सभी प्राणवानों की बराबर की भागीदारी रहेगी।

🔶 साधना से उपलब्ध अतिरिक्त सामर्थ्य को विश्व के मूर्धन्य वर्गों को हिलाने उलटने में लगाने का हमारा मन है। अच्छा होता सुई और धागे को आपस में पिरो देने वाले कोई सूत्र मिल जाते। अन्यथा सर्वथा अपरिचित रहने की स्थिति में तारतम्य बैठने में कठिनाई होगी। मूर्धन्यों में सत्ताधीश, धनाध्यक्ष, वैज्ञानिक और मनीषी वर्ग का उल्लेख है। यह सर्वोच्च स्तर के भी होंगे और सामान्य स्तर के भी। सर्वोच्च स्तर वालों की सूक्ष्मता जहाँ पैनी होती है वहाँ वे अहंकारी और आग्रही भी कम नहीं होते। इसलिए मात्र उच्च वर्ग तक ही अपने को सीमित न रखकर हम मध्यम वृत्ति के इन चारों की भी अपनी पकड़ में ले रहे हैं ताकि बात नीचे से उठते-उठते ऊपर तक पहुँचने का भी कोई सिलसिला बने।

🔷 दूसरा वर्ग जाग्रत आत्माओं का है, इसका उत्पादन सदा से भारतभूमि में अधिक होता रहा है। महामानव, ऋषि, मनीषी, देवता यहाँ जितने जन्मे हैं, उतने अन्यत्र कहीं नहीं। यही हमारे लिए समीप भी पड़ा है। अस्तु प्रयत्न करेंगे कि जहाँ कहीं भी पूर्व संचित संस्कारों वाली आत्माएँ दृष्टिगोचर हों उन्हें समय का संदेश सुनाएँ, युगधर्म बताएँ और समझाएँ कि यह समय व्यामोह में कटौती करके, किसी प्रकार निर्वाह भर में संतोष करने का है। जो हस्तगत है उसे बोया उगाया और हजार गुना बढ़ाया जाना चाहिए। हम अकेले ही उगे, बढ़े और गलकर समाप्त हो गए तो यह एक दुर्घटना होगी। एक से हजार वाली बात सोची और कही जा रही है तो उसकी प्रत्यक्ष परिणति भी वैसी ही होनी चाहिए। प्रज्ञा परिवार बड़ा है। फिर भारत भूमि की उर्वरता कम नहीं है। इसके अतिरिक्त अपनी योजना विश्वव्यापी है।

🔶 उसकी परिधि में अकेला भारत ही नहीं समूचा संसार भी आता है। अस्तु प्रयत्न यह चला है कि विचार-क्रान्ति की प्रक्रिया को परिस्थितियों के अनुरूप व्यापक बनाने के लिए जाग्रत आत्माओं का समुदाय हर क्षेत्र में हर देश में मिले। कार्य पद्धतियाँ क्षेत्रीय वातावरण के अनुरूप बनती रहेंगी, पर लक्ष्य एक ही रहेगा-ब्रेन वाशिंग, विचार परिवर्तन, प्रज्ञा अभियान। हम तीर की तरह सनसनाते हुए ही लक्ष्य तक पहुँचने का प्रयत्न करेंगे। जिनमें इस प्रकार की जीवटता होगी, वे अनुभव करेंगे कि उन्हें कोई कोंचता, कुरेदता, झकझोरता, घसीटता और बाधित करता है। यों ऐसे लोग समय की पुकार पर अंतरात्मा की प्रेरणा से भी जग पड़ते हैं। ब्रह्ममुहूर्त में मुर्गा बाँग लगाने के लिए उठ खड़ा होता है, तो कोई कारण नहीं कि जिनमें प्राण चेतना विद्यमान है, वे महाकाल का आमंत्रण न सुनें ओर पेट-प्रजनन की आड़ में व्यस्तता और अभावग्रस्तता की ही बहानेबाज़ी करते रहें। समय की पुकार और हमारी मनुहार का संयुक्त प्रभाव कुछ भी न पड़े ऐसा हो ही नहीं सकता। विश्वास किया गया है कि इस स्तर का एक शानदार वर्ग उभरकर ऊपर आएगा और सामने ही कटिबद्ध खड़ा दृष्टिगोचर होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.191

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.23

👉 प्रज्ञायुग में परिवार की जिम्मेदारी समझी जाएगी

🔷 प्रज्ञा युग में हर व्यक्ति सामाजिक नीति मर्यादाओं को महत्व देगा। कोई ऐसा काम न करेगा जिससे मानवी गरिमा एवं समाज व्यवस्था को आँच आती हो। शिष्टाचार, सौजन्य, सहयोग, ईमानदारी, वचन का पालन, निश्छलता जैसी कसौटियों पर पारस्परिक व्यवहार खरा उतरना चाहिए। अनीति का न तो सहयोग किया जाय और न प्रत्यक्ष परोक्ष समर्थन। सामाजिक सुव्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि मूढ़ मान्यताओं का, अवाँछनीय प्रचलनों का, हानिकारक कुरीतियों का, विरोध किया जाय। इस प्रकार छल, शोषण उत्पीड़न जैसे अनाचारों से भी असहयोग, प्रतिरोध एवं संघर्ष का रुख अपनाया जाय। अनीति आचरण एवं अनुपयुक्त प्रचलनों को समान रूप से अहितकर माना जायेगा और उन्हें अपनाना तो दूर कोई उनका समर्थन तक करने को सहमत न होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1984 पृष्ठ 30
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/July/v1.30

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...