🔶 हमारे भोगों, उपलब्धियों और प्रवृत्तियों के एकमात्र सूत्र संचालक हमारे स्वयं के कर्म ही हैं। तब फिर देवताओं और विधाता को प्रसन्न करने की चिन्ता करते रहना कहाँ की बुद्धिमत्ता है? हमारा साध्य और असाध्य तो कर्म ही है। वही वन्दनीय-अभिवन्दनीय है, वही वरण और आचरण के योग्य है। दैवी विधान भी उससे भिन्न और उसके विरुद्ध कुछ कभी नहीं करता। कर्म ही सर्वोपरि है। परिस्थितियों और मनःस्थितियों का वही निर्माता है। उसी की साधना से अभीष्ट की उलपब्धि सम्भव है।
🔷 आप जीवन के प्रति अपनी धारणा बदल डालिए। विश्वास तथा ज्ञान में ही अपना जीवन भवन निर्माण कीजिए। यदि वर्तमान आपत्तिग्रस्त है, तो उसका यह अर्थ नहीं है कि भविष्य भी अन्धकारमय है। आपका भविष्य उज्ज्वल है। विचारपूर्वक देखिए कि जो कुछ आपके पास है, उसका सबसे अच्छा उपयोग कर रहे हैं अथवा नहीं? क्योंकि यदि प्रस्तुत साधनों का दुरुपयोग करते हैं, तो चाहे वह कितनी ही तुच्छ और सारहीन क्यों न हो, आप उसके भी अधिकारी न रहेंगे। वह भी आपसे दूर भाग जायेंगे या छीन लिए जावेंगे।
🔶 यदि हम क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या, लोभ आदि असंगत मानसिक दोषों के शिकार होते हुए भी उन्नति पूर्ण स्वस्थ जीवन की कल्पना करते हैं तो यह असम्भव बात का स्वप्र देखना मात्र है। यदि हम वास्तव में अपने जीवन को सुखी एवं उन्नतिशील देखना चाहते हैं तो क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या आदि कुविचारों को घटाने और हटाने के लिए प्रयत्न करना होगा।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔷 आप जीवन के प्रति अपनी धारणा बदल डालिए। विश्वास तथा ज्ञान में ही अपना जीवन भवन निर्माण कीजिए। यदि वर्तमान आपत्तिग्रस्त है, तो उसका यह अर्थ नहीं है कि भविष्य भी अन्धकारमय है। आपका भविष्य उज्ज्वल है। विचारपूर्वक देखिए कि जो कुछ आपके पास है, उसका सबसे अच्छा उपयोग कर रहे हैं अथवा नहीं? क्योंकि यदि प्रस्तुत साधनों का दुरुपयोग करते हैं, तो चाहे वह कितनी ही तुच्छ और सारहीन क्यों न हो, आप उसके भी अधिकारी न रहेंगे। वह भी आपसे दूर भाग जायेंगे या छीन लिए जावेंगे।
🔶 यदि हम क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या, लोभ आदि असंगत मानसिक दोषों के शिकार होते हुए भी उन्नति पूर्ण स्वस्थ जीवन की कल्पना करते हैं तो यह असम्भव बात का स्वप्र देखना मात्र है। यदि हम वास्तव में अपने जीवन को सुखी एवं उन्नतिशील देखना चाहते हैं तो क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या आदि कुविचारों को घटाने और हटाने के लिए प्रयत्न करना होगा।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
















































