शनिवार, 15 जुलाई 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 July

🔴 इच्छा और आवश्यकता में यथेष्ट अन्तर है, यद्यपि अनेक व्यक्ति एक ही अर्थ में इनका प्रयोग करते हैं। इच्छा का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। हम नाना प्रकार की वस्तुएं देखते हैं और लुभा कर उनकी इच्छा करने लगते हैं। ऐसी ही एक इच्छा हमारी आवश्यकता भी है। आवश्यकता केवल ऐसी इच्छा है जिसके बिना हम रह नहीं सकते, जिसके लिए हमारे पास पर्याप्त साधन हैं और जिसे प्राप्त करने से हमारी तृप्ति हो सकती है। कुछ आवश्यकताएं रुपये पैसे से, और कुछ उसके बिना भी पूर्ण हो सकती हैं। अनेक बार रुपये पैसे की कमी श्रम द्वारा पूर्ण हो जाती है।

🔵 महंगाई से बचने का एक उपाय है। आप अपनी आवश्यकताओं का अध्ययन करें। जो आराम, विलास, या फैशन की वस्तुएं हैं, उन्हें तुरन्त त्याग दें। अनावश्यक टीपटाप, दिखावा, सौंदर्य प्रतियोगिता, मिथ्या आडंबर, टायलेट का सामान, मादक द्रव्यों का सेवन छोड़ दें। नौकर छुड़ा दें और स्वयं उनका कार्य करें। अपने छोटे मोटे कार्य-कमरे की सफाई, जूता पालिश, साधारण कपड़े धोना, बाजार से सब्जी लाना, बच्चों या पत्नी को पढ़ाना, अपनी गाय भैंस की देख रेख-स्वयं कर लिया करें।

🔴 आवश्यकताओं को मर्यादा से बढ़ा देने का नाम अतृप्ति और दुःख है उन्हें कम कर पूर्ति करने से सुख और सन्तोष प्राप्त होता है। मनुष्य एक ही प्रकार के सुख से तृप्त नहीं रहता। अतः असंतोष सदैव बना रहता है। वह असंतोष निंदनीय है जिसमें किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए मनुष्य दिन रात हाय-हाय करता रहे और न पाने पर असंतुष्ट, अतृप्त, और दुःखी रहे। तृष्णाएं एक के पश्चात् दूसरी बढ़ेगी। एक आवश्यकता की पूर्ति होगी, तो दो नई आवश्यकताएं आकर उपस्थित हो जायेंगी। अतः विवेकशील पुरुष को अपनी आवश्यकताओं पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहिए। इस प्रकार आवश्यकताओं को मर्यादा के भीतर बाँधने के लिए एक विशेष शक्ति-मनोनिग्रह की जरूरत है।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी का उत्तरदायित्व (अंतिम भाग)

🔴 नई सभ्यता के संस्पर्श से दिनों दिन नारी जाति अपने मूल कर्त्तव्य गृहस्थ-जीवन की जिम्मेदारियों और कार्यों में अरुचि अनुभव करने लगी हैं। घर का काम एक बला और बोझ-सा लगता है। जिन कामों को उन्हें स्वयं करना चाहिए, उनको नौकरों या पतियों से कराना चाहती हैं। इससे वह पुरुष की सहयोगिनी न होकर भार रूप बनती जा रही है। इससे पति-पत्नी के सम्बन्ध में भी खटास पैदा होने लगती है। आजकल ऐसे भाग्यशाली दंपत्ति बहुत ही कम हैं जिनका जीवन सब तरह से शान्त, सुखी और सन्तुष्ट माना जा सके।

🔵 उन परिवारों में पति-पत्नी के बीच का संघर्ष और भी तेज होता है, जहाँ नारियाँ बाहर कमाने जाती हैं। इससे घर के काम ठीक-ठीक नहीं हो पाते। बच्चों का शिक्षण और निर्माण भी भली प्रकार नहीं हो पाता। स्त्री पुरुष दोनों ही अपने-अपने काम से थके माँदे रहते हैं। परस्पर दाम्पत्य जीवन की तृप्ति, सुख, सन्तोष वहाँ नहीं रहता जहाँ नारी को आर्थिक स्रोतों का भी साधन बनना पड़ता है। वस्तुतः नारी का कार्य-क्षेत्र घर है। वह घर की रानी है। घर की सुव्यवस्था, सफाई, भोजन, पानी का सुप्रबन्ध, घर के कामों की पूर्णता आदि नाम के कार्य हैं। घर का स्वर्ग बनाने का काम नाम का है। इसी काम को नारियाँ भली-भाँति कर सकती हैं, यह उनकी प्राकृतिक और स्वाभाविक जिम्मेदारी है।

🔴 नारी का व्यवहार, स्वभाव, बोलचाल का संयत मधुर और शिष्ट होना आवश्यक है क्योंकि अनेकों परिवार अनेकों व्यक्तियों की संगम है। नारी के माध्यम से कई परिवार एक सम्बन्ध सूत्र में बँधते हैं। अतः नारी के व्यवहार की तनिक सी गड़बड़ी, इधर की उधर लगाने, एक घर की बात दूसरे घर में कहने की आदत से परिवारों के सम्बन्ध कटु और खराब हो जाते हैं। इसी तरह परिवार तथा बाहर के अनेकों व्यक्ति शरीर के सम्बन्ध में आते है। सास, ससुर, पति रिश्तेदार, पड़ौसी आदि भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को तृप्त और सन्तुष्ट रखना नारी का ही महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1963 पृष्ठ 38
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/July/v1.38

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 2)

🔵 अठारह पुराणों का अनुवाद मैंने संस्कृत से हिन्दी में किया है। उसमें से शिवपुराण की एक कथा मुझे याद आई, जिसने हमारी शंका का समाधान कर दिया कि भगवान शंकर सहायता क्यों नहीं करते हमारी? क्यों नहीं उनकी शक्ति का लाभ मिलता? क्यों उनके चमत्कार हमें दिखाई नहीं पड़ते? जबकि शंकर भगवान के भक्त जिन्होंने क्या से क्या अनुदान प्राप्त किए हैं, जो भी तप करने के लिए खड़ा हो गया वह न जाने क्या से क्या प्राप्त करता चला गया?

🔴 हम और आप जैसे शिव-उपासक उस शक्ति को प्राप्त न कर सकते हों सो ऐसी बात नहीं, पर कहीं न नहीं चूक रह जाती है, कहीं न कहीं भूल रह जाती है। उस भूल को हमें निकालना ही पड़ेगा और निकालना ही चाहिए। इसके बिना अध्यात्म का पूरा लाभ नहीं मिल सकेगा और दुनिया के सामने हम सिर ऊँचा उठा कर यह नहीं कह सकेंगे कि हम ऐसी शक्ति के उपासक हैं जो अपनी उँगली के इशारे से सारी दुनिया को हिला सकती है तो गलती और चूक कहाँ हो गई? चूक और गलती वहाँ हो गई जहाँ भगवान शिव और पार्वती का असली स्वरूप हमको समझ में नहीं आया। उसके पीछे जो फिलॉसफी है वह समझ में नहीं आई, मात्र उसका बाहरी स्वरूप समझ में आ गया।

🔵 भगवान शंकर का भी एक कलेवर है और एक प्राण, एक बहिरंग स्वरूप है और एक अंतरंग स्वरूप। जब हम दोनों को मिला देंगे तब पॉजिटिव और निगेटिव दोनों तारों को मिलाकर जिस तरीके से स्पार्क उठते हैं और करेंट चालू हो जाता है, उसी प्रकार से भगवान का करेंट चालू हो जाएगा। बहिरंग रूप के बारे में आप जानते हैं और जिस तक आप सीमित हो गए हैं, वह कलेवर है जो मंदिर में बैठा हुआ है। जिसके चरणों में हम मस्तक झुकाते हैं, जल चढ़ाते हैं, पूजा करते हैं, प्रार्थना करते हैं, आरती उतारते हैं और जय-जयकार करते हैं—वह बहिरंग कलेवर है जिसकी भी सख्त जरूरत है, परन्तु यही सब कुछ नहीं है। हमें अंतरंग रूप के बारे में भी जानना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 29)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 भाषण करना है तो हमें ठीक समय पर पहुँचना और नियमित समय में ही पूरा करना चाहिए। समय का ध्यान न रखना, सुनने वालों के साथ बेइन्साफी है। दावत जिस समय की रखी है, उसी समय आरंभ कर देनी चाहिए। मेहमानों को घंटों प्रतीक्षा में बिठाए रहना, एक प्रकार से उनका समय बर्बाद करना है। जिसे धन की बर्बादी के समान ही हानिकारक समझा जाना चाहिए।

🔵 वस्तु का मूल्य और स्वरूप जो बताया गया है वही वस्तुतः होना चाहिए। असली में नकली की मिलावट कर देना, दामों में घिसा-पिटी करके कमीवेशी करना, व्यापार करने वालों के लिए सर्वथा अशोभनीय है। घिस-घिस कर कमी करना लिए सर्वथा अशोभनीय है। घिस-घिस कर कमी करना अपनी विश्वसनीयता तथा प्रामाणिकता पर कलंक लगाना है। असली और नकली वस्तुएँ अलग-अलग बेची जाएँ और उनके दाम वैसे ही महँगे, सस्ते स्पष्ट किए जाएँ तो व्यापारी की साख बढ़ेगी और ग्राहकों का समय बचेगा तथा संतोष होगा। ईमानदारी घाटे का सौदा नहीं है। वह प्रामाणिकता एवं विश्वसनीयता की परीक्षा भर चाहती है। इस कसौटी पर सही होना हर व्यवसायी का नागरिक कर्तव्य है। यह कर्तव्य पालन व्यक्ति का सम्मान भी बढ़ाता है और व्यवसाय भी।

🔴 दूसरों की असुविधा को ध्यान में रखते हुए अपनी सुविधा को सीमाबद्ध रखना, शिष्टता और सभ्यता भरा मधुर व्यवहार करना, मीठे वचन बोलना, वचन का पालन करना, प्रामाणिकता और विश्वस्तता की रीति-नीति अपनाना, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को हम में से प्रत्येक को सीखना और पूरा करना ही चाहिए। चाहिए ताकि समाज में शिष्ट नागरिकों की तरह हम ठीक तरह से जी सकें और दूसरों को जीने दे सकें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.41

👉 Lose Not Your Heart Day 15

🌹  Forget Painful Memories

🔵 When you find yourself recalling painful memories, the best thing to do is forget and ignore them. The way to preserve your emotional stability is to replace your unpleasant memories with pleasant ones. If you wish to keep your physical, mental, and emotional health, then learn to remove unhealthy memories in this way.

🔴 Even if someone close to you has caused you grief, will you keep obsessing over your pain? Lose yourself in purposeful work and forget these painful experiences. The best way to free yourself from worry is to forget your misery.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १५

🌹  दुःखद स्मृतियों को भूलो  
🔵 जब मन में पुरानी दु:खद स्मृतियाँ सजग हों तो उन्हें भूला देने में ही श्रेष्टता है। अप्रिय बातों को भुलाना आवश्यक है। भुलाना उतना ही जरूरी है जितना अच्छी बात का स्मरण करना। यदि तुम शरीर से,, मन से और आचरण से स्वस्थ होना चाहते हो तो अस्वस्थता की सारी बातें भूल जाओ।

🔴 माना कि किसी ‘अपने ’ ने ही तुम्हें चोट पहुँचाई है,, तुम्हारा दिल दुखाया है, तो क्या तुम उसे लेकर मानसिक उधेड़बुन में लगे रहोगे। अरे भाई! उन कष्टकारक अप्रिय प्रसंगों को भूला दो, उधर ध्यान न देकर अच्छे शुभ कर्मों से मन को केंद्रीभूत कर दो।

चिंता से मुक्ति पाने का सर्वोत्तम उपाय दु:खों को भूलना ही है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 15 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 July 2017


गुरुवार, 13 जुलाई 2017

👉 आज का सद्चिंतन 14 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 July 2017


👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १४

🌹  असफलताओं का कारण

🔵 हम दूसरों को बरबस अपनी तरह विश्वास, मत, स्वभाव एवं नियमों के अनुसार कार्य करने और जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य करते हैं। दूसरों को बरबस सुधार डालने, अपने विचार या दृष्टिकोण को जबरदस्ती थोपने से न सुधार होता है न आपका ही मन प्रसन्न होता है।

🔴 यदि हम अमुक व्यक्ति को दबाए रखेंगे तो अवश्य परोक्ष रूप से हमारी उन्नति हो जायेगी। अमुक व्यक्ति हमारी उन्नति में बाधक है। अमुक हमारी चुगली करता है, दोष निकालता है, मानहानि करता है। अत: हमें अपनी उन्नति न देखकर पहले अपने प्रतिपक्षी को रोके रखना चाहिए -ऐसा सोचना और दूसरों को अपनी असफलताओं का कारण मानना, भ्रम मूूलक है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 14

🌹  The Cause of Failure

🔵 We are constantly trying to force others to think and act according to our own beliefs. These attempts to correct others' behavior neither change their minds nor satisfy us.

🔴 We justify controlling others in several ways. We believe that if we control them we may acquire some immediate gain, or that the person is a hindrance to our progress, or that the person is constantly criticizing us, spreading rumors about us, etc. Using such reasoning to blame others for your own failure will not benefit you.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मचिंतन के क्षण 14 July

🔴 धर्म प्रवचन अच्छी बात है। उसको ध्यानपूर्वक सुनना और भी अधिक अच्छा है। क्योंकि इससे जन साधारण को कर्त्तव्य बोध होता है। पर इतना ही पर्याप्त नहीं। विद्यालयों में शिक्षा सम्वर्धन का कार्य होता है। पर उस भवन में पागल कुत्ता घुस आवे या साँप किसी बिल में से निकल पड़े तो उसे लाठी से ही पाठ पढ़ाया जा सकता है। धर्मोपदेश सुनकर वे आक्रमण करना छोड़ देंगे ऐसी आशा करना नासमझी की बात है।

🔵 काशी करवट लेकर स्वर्ग जाने की मान्यता सही हो सकती है पर गीता का कृष्ण का अर्जुन को दिया गया सन्देश भी मिथ्या नहीं है जिसमें अनीति के विरुद्ध लड़ मरने की बात कही गई है। रामराज्य स्थापना से पूर्व भगवान को असुरों का दमन करना पड़ा था। धर्म की स्थापना एक इमारत उठाने की तरह है और अधर्म का नाश उससे भी अधिक आवश्यक नींव खोदने की तरह धर्म का पालन और संरक्षण योद्धा ही करते हैं। कायर तो उसकी दुहाई भर देते हैं रहते हैं।

🔴 आतंकों का दमन सशस्त्र सैनिकों का काम है। पर सामाजिक अवाँछनीयताओं, कुरीतियों, मूढ़ मान्यताओं से जूझना तो उन भावनाशीलों का कार्य है जिसमें शौर्य और पराक्रम के तत्व भी जीवित हैं। धर्मोपदेश जितना आवश्यक हैं उतना ही अभीष्ट यह भी है कि शोषण उत्पीड़न से नारी वर्ग या पिछड़े समुदायों को मुक्ति दिलाने के लिए आधार किये जायें। भले ही वे झगड़े झंझट उकसाने जैसे प्रतीत होते हों।                                          

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी का उत्तरदायित्व (भाग 3)

🔴 स्त्रियों में सभ्यता के नाम पर बढ़ता हुआ फैशन बनाव, शृंगार, चमकीले, भड़कीले वस्त्र आभूषण आदी गृहस्थ-जीवन की स्थिति और मर्यादाओं पर बहुत बुरा प्रभाव डाल रहे हैं। और इसके प्रभाव से समाज में अनेकों बुराइयाँ फैलती जा रही हैं। हालाँकि सौंदर्य, स्वास्थ्य, स्वच्छता, व्यवस्थित रहन-सहन जीवन के आवश्यक अंग हैं। किन्तु कृत्रिमता, बाह्य साधनों के प्रयोग से नित-नूतन मेकअप बनाना अस्वाभाविक और गलत रास्ता है इससे गृहस्थ-जीवन में आर्थिक समस्यायें बढ़ गयी हैं। हर व्यक्ति आर्थिक तंगी महसूस करता है। एक सौ रुपये कमाता है, डेढ़ सौ का खर्च तैयार रहता है पुरुष के पसीने की कमाई इन सौंदर्य प्रसाधन तड़कीले-भड़कीले वस्त्र जेवर आदि में पानी की तरह बहाई जाती है। और अधिकाँश परिवारों को बजट घाटे में ही चलता है। इसका स्वास्थ्य पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।

🔵 इन विभिन्न साज-सज्जा, तड़क-भड़क युक्त फैशनपरस्ती का सबसे बुरा प्रभाव सामाजिक जीवन पर पड़ता है। लोगों की दुष्प्रवृत्तियों, चारित्रिक दुर्बलताओं को प्रोत्साहन देने में सबसे बड़ी जिम्मेदारी इन अस्वाभाविक बनाव शृंगारों पर है। एक साधारण वेशभूषा में जार ही सती-साध्वी नारी को देखकर बुरे-से-बुरे व्यक्ति में भी सद्भावों का जागरण हो जाता है। जबकि इन चमकती-दमकती तितलियों को देखकर अपरिपक्व लोगों का मन स्वतः ही चलायमान हो सकता है। समाज में बढ़ते हुए अनाचार दुराचार के प्रोत्साहन में नारी के ये बनाव शृंगार भी कम जिम्मेदार नहीं हैं।

🔴 सादगी में ही स्वाभाविक सौंदर्य का निवास है। जो सजीव और आकर्षण होता है। सहज सौंदर्य मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियों को भड़काता नहीं वरन् उनको तृप्त करके पुरोगामी भी बनाता है। कृत्रिम बनाव शृंगार बचकानी प्रवृत्ति है। फूहड़पन असभ्यता की निशानी है। शालीनता सादगी में ही निवास करती है। नारी जाति का गौरव सादगी, प्रकृत सौंदर्य और लज्जायुक्त नम्रता में ही है और इसी से वह मानव-जीवन में सत् तत्वों की प्रेरणा स्रोत, देवी बन सकती है। पूज्य बन सकती है। मनुष्य की भावनाओं को पुरोगामी बना सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1963 पृष्ठ 37

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/July/v1.37

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

भवानीशंकरौ वंदे श्रद्धा विश्वासरूपिणौ।
याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तस्थमीश्वरम्।।   


🔵 गोस्वामी तुलसीदास जी जब रामायण का निर्माण करने लगे तो उनके मन में एक विचार आया कि इतना बड़ा ग्रंथ जिसके जहाज पर बिठा करके संसार के प्राणियों का उद्धार किया जा सकता है, उसे बनाने के लिए मुझे क्या करना चाहिए? इसके लिए किस शक्ति की सहायता लेनी चाहिए? उन्होंने यह कहा कि भवानी-शंकर की वंदना करनी चाहिए और उनकी सहायता लेनी चाहिए। उनकी शक्ति के बिना इतना बड़ा रामचरितमानस, जिस पर बिठा करके अनेक मनुष्यों को भवसागर से पार किया जा सकता है, कैसे सम्भव होगा? उन्होंने भवानी और शंकर की वंदना की। जैसे कि सायंकाल आरती के समय हमने और आप लोगों ने भगवान शंकर और पार्वती की वंदना की। पश्चात् उनके जी में एक और विचार आया कि आखिर भगवान शंकर हैं क्या? शक्ति कहाँ से आ जाती है?  क्यों आ जाती है? उद्धार कैसे हो सकता है? ऐसे अनेक प्रश्न तुलसीदास जी के मन में उत्पन्न हुए। उनका समाधान भी उसी श्लोक में हुआ जिसका कि मैंने आप लोगों के सम्मुख विवेचन किया—‘भवानी शंकरौ वन्दे’ भवानी शंकर की हम वंदना करते हैं।

🔴 ये कौन हैं? ‘श्रद्धा विश्वास रूपिणौ’ अर्थात् श्रद्धा का नाम पार्वती और विश्वास का नाम शंकर। श्रद्धा और विश्वास—इन दोनों का नाम ही शंकर-पार्वती है। इनका प्रतीक, विग्रह मूर्ति हम मंदिरों में स्थापित करते हैं। इनके चरणों पर अपना मस्तक झुकाते हैं, जल चढ़ाते हैं, बेल-पत्र चढ़ाते हैं, आरती करते हैं। यह सब क्रिया-कृत्य करते हैं, लेकिन मूलतः शंकर क्या है? श्रद्धा और विश्वास। ‘याभ्यां बिना न पश्यन्ति’— जिनकी पूजा किए बिना कोई सिद्धपुरुष भी भगवान को प्राप्त नहीं हो सकते। भवानी शंकर की इस महत्ता और माहात्म्य पर मैं विचार करता रहा तब एक और पौराणिक कथा मेरे सामने आई।

🔵 पौराणिक कथा आती है कि एक संकट का समय था जब भगवान परशुराम को यह मालूम पड़ा कि सब जगह अन्याय, अत्याचार फैल गया, अनाचार फैल गया। इसके निवारण के लिए क्या करना चाहिए? परशुराम जी उत्तरकाशी गए और वहाँ भगवान शिव का तप करने लगे। तप करने के पश्चात् भगवान शंकर ने उन्हें एक परशु दिया और कहा—अनीति का, अन्याय का और अत्याचार का इस संसार में से उच्छेदन किया जा सकता है और आपको करना चाहिए। भगवान शंकर की ऐसी महत्ता और ऐसी शक्ति का वर्णन पुराणों में पाया गया है, पर आज हम देखते हैं कि वह शक्ति कुंठित कैसे हो गई? हम शंकर की पूजा करते हैं, पर समस्याओं से घिरे हुए क्यों हैं? शंकर की शक्ति वरदान हो करके सामने क्यों नहीं आती? शंकर के भक्त होते हुए भी हम किस तरीके से पिछड़ते और पददलित होते चले जा रहे हैं? भगवान हमारी कब सहायता करेंगे? यह विचार मैं देर तक करता रहा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 124)

🌹  हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ

🔵 पिछले दिनों बार-बार हिमालय जाने और एकांत साधना करने का निर्देश निबाहना पड़ा। इसमें क्या देखा? इसकी जिज्ञासा बड़ी आतुरता पूर्वक सभी करते हैं। उनका तात्पर्य, किन्हीं यज्ञ, गंधर्व, राक्षस, बेताल, सिद्ध पुरुष से भेंट वार्ता रही हो। उनकी उछल-कूद देखी हो। अदृश्य और प्रकट होने वाले कुछ जादुई गुटके लिए हों। इन जैसी घटनाएँ सुनने का मन होता है। वे समझते हैं कि हिमालय माने जादू का पिटारा। वहाँ जाते ही कोई करामाती बाबा डिब्बे में से भूत की तरह उछल पड़ते होंगे और जो कोई उस क्षेत्र में जाता है, उसे उन कौतूहलों-करतूतों को दिखाकर मुग्ध करते रहते होंगे। वस्तुतः हिमालय हमें अधिक अंतर्मुखी होने के लिए जाना पड़ा।

🔴 बहिरंग जीवन पर घटनाएँ छाई रहती हैं और अंतःक्षेत्र पर भावनाएँ। भावनाओं का वर्चस्व ही अध्यात्मवाद है। कामनाओं और वस्तुओं की घुड़दौड़, भौतिकवाद। चूँकि अपना जीवन क्रम दोनों का संगम रहा है, इसलिए बीच-बीच में एकांत में बहिरंग के जमे हुए प्रभावों को निरस्त करने की आवश्यकता पड़ती रही है। आत्मा को प्रकृति सान्निध्य से जितना बन पड़ा उतना हटाया है और आत्मा को परमात्मा के साथ जितना निकट ला सकना सम्भव था, उतना हिमालय के अज्ञातवास में किया है।

🔵 आहार-विहार में परिस्थितिवश अधिक सात्त्विकता का समावेश होता ही रहा है। इसके अतिरिक्त सबसे बड़ी बात हुई है-उच्चस्तरीय भाव संवेदनाओं का उन्नयन और रसास्वादन। इसके लिए व्यक्तियों की, साधनों की, परिस्थितियों की आवश्यकता नहीं पड़ती। जैसा भी भला-बुरा सामने प्रस्तुत है, उसी पर अपने भाव-चिंतन का आरोपण करके ऐसा स्वरूप बनाया जा सकता है, जिससे कुछ का कुछ दीखने लगे। कण-कण में भगवान् की, उसकी रस संवेदना की झाँकी होने लगे।
  
🔴 जिनने हमारी ‘‘सुनसान के सहचर’’ पुस्तक पढ़ी है, उनने समझा होगा कि सामान्य घटनाओं और परिस्थितियों में भी अपनी उच्च भावनाओं का समावेश करके किस प्रकार स्वर्गीय उमंगों से भरा पूरा वातावरण गठित किया जा सकता है और उसमें निमग्न रहकर सत-चित्, आनंद की अनुभूति हो सकती है। यह भी एक उच्चस्तरीय सिद्धि है। इसे हस्तगत करके हम इसी सर्वसाधारण जैसी जीवनचर्या में निरत रहते हुए स्वर्ग में रहने वाले देवताओं की तरह आनंदमग्न रहते रहे हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.18

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 28)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 केले, नारंगी आदि के छिलके लोग यों ही फेंकते रहते हैं और आए दिन दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। कितने ही लोग गाय पालते हैं और दूध दुहकर उन्हें आवारा यह समझकर छोड़ देते हैं कि किसी की चीज खाकर अपना पेट भर लाएगी और हमें दूध देगी। गौ माता के प्रति प्रचलित श्रद्धा के आधार पर कोई उसे मारेगा नहीं और अपना काम बन जाएगा। इस तरह वह गाय लोगों की वस्तुएँ खाकर, बिखेर कर, दूसरों का रोज नुकसान करती और पिटती, कुटती रहती है।

🔵 इस तरह दूसरों को कष्ट देने तथा स्वयं लाभ उठाने को क्या कहा जाए? स्वयं कीर्तन करने का मन है तो अपने घर में पूजा के उपयुक्त मंद स्वर में प्रसन्नतापूर्वक करें, पर लाउडस्पीकर लगाकर रात भर धमाल मचाने और पड़ोस के बीमारों, परीक्षार्थियों तथा अन्य लोगों की नींद नष्ट करने वाली ईश्वरभक्ति से भी पहिले हमें अपनी नागरिक मर्यादाओं और जिम्मेदारियों को समझना चाहिए। जिसका अर्थ है कि दूसरों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अपनी इच्छा को स्वेच्छापूर्वक सीमाबद्ध करना।

🔴 वचन का पालन और ईमानदारी का व्यवहार मनुष्य का प्राथमिक एवं नैतिक कर्तव्य है। जिस समय पर जिससे मिलने का, कोई वस्तु देने, काम पूरा करने का वचन दिया है, उस सच को ठीक समय पर पूरा करने का ध्यान रखना चाहिए ताकि दूसरों को असुविधा का सामना न करना पड़े। यदि हम दर्जी या मोची हैं तो उचित हे कि वायदे के समय पर उसे देने का शक्ति भर प्रयत्न करें। बार-बार तकाजे करने और निराश वापिस लौटने में जो समय खर्च होता है और असुविधा होती है उसे देखते हुए ऐसे दर्जी, धोबी अपनी प्राप्त मजदूरी से ग्राहक का चौगुना-दस गुना नुकसान कर देते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 123)

🌹  हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ

🔵 अगणित व्यक्ति गायत्री तीर्थ में आकर अनुष्ठान साधना करते रहे हैं। इससे उनके व्यक्तित्व में परिष्कार हुआ है। मनोविकारों से मुक्ति मिली है एवं भावी जीवन की रीति-नीति निर्धारित करने में मदद मिली है। विज्ञान सम्मत पद्धति से ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में उनका पर्यवेक्षण कर इसे सत्यापित भी किया गया है।

🔴 उपरोक्त प्रमुख कार्यों और निर्धारणों को देखकर सहज बुद्धि यह अनुमान लगा सकती है कि इनके लिए श्रम, मनोयोग, साधन कितनी बड़ी संख्या में कितने लोगों के लगे होंगे, इसकी कल्पना करने पर प्रतीत होता है कि सब सरंजाम पहाड़ जितना होना चाहिए। उसे उठाने, आमंत्रित, एकत्रित करने में एक व्यक्ति की अदृश्य शक्ति भर काम करती रही है। प्रत्यक्ष याचना की, अपील की, चंदा जमा करने की प्रक्रिया कभी अपनाई नहीं गई। जो कुछ चला है स्वेच्छा से सहयोग से चला है।

🔵 सभी जानते हैं कि आजकल धन जमा करने के लिए कितने दबाव, आकर्षण और तरीके काम में लाने पड़ते हैं, पर मात्र यही एक ऐसा मिशन है, जो दस पैसा प्रतिदिन के ज्ञानघट और एक मुट्ठी अनाज वाले धर्मघट स्थापित करके अपना काम भली प्रकार चला लेता है। जो इतनी छोटी राशि देता है, वह यह भी अनुभव करता है कि संस्था हमारी है, हमारे श्रम सहयोग से चल रही है फलतः उसकी आत्मीयता भी सघनता पूर्वक जुड़ी रहती है। संचालकों को भी इतने लोगों के सामने उत्तरदायी होने, जबाब देने का ध्यान रखते हुए एक-एक पाई का खर्च फूँक-फूँक कर करना पड़ता है। कम पैसे में इतने बड़े काम चल पड़ने और सफल होने का रहस्य यह लोकप्रियता ही है।
  
🔴 निःस्वार्थ, निस्पृह और उच्चस्तरीय व्यक्तित्व वाले जितने कार्यकर्ता इस मिशन के पास हैं, उतने अन्य किसी संगठन के पास कदाचित ही हों। इसका कारण एक ही है, संचालन सूत्र को अधिकाधिक निकट से परखने के उपरांत यह विश्वास करना कि यहाँ ब्राह्मण आत्मा सही काम करती है। बुद्ध को लोगों ने परखा और लाखों परिव्राजक घर-बार छोड़कर इनके अनुयायी बने। गाँधी के सत्याग्रहियों ने भी वेतन नहीं माँगा। इन दिनों हर संस्था के पास वैतनिक कर्मचारी काम करते हैं, तब मात्र प्रज्ञा अभियान ही एक मात्र ऐसा तंत्र है जिसमें हजारों लोग उच्चस्तरीय योग्यता होते हुए भी मात्र भोजन-वस्त्र पर निर्वाह करते हैं।
  
🔵 इतने व्यक्तियों का श्रम-सहयोग बूँद-बूँद करके लगने वाला इतना धन-साधन किस प्रकार चुंबकत्व से खिंचता हुआ चला आता है, वह भी एक सिद्धि का चमत्कार है, जो अन्यत्र कदाचित् कहीं दिखाई पड़े।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.18

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 27)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 घरों की गन्दगी लोग अक्सर गली या सड़क पर डाल देते हैं, उससे रास्ता निकलने वालों को असुविधा है और सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता अस्त-व्यस्त होती है। उचित यही है कि घरों में कूड़ेदान रखें और जब सफाई कर्मचारी आए, तब उसे उठवा दें। अशोभनीय अस्वच्छता से उस गली में रहने वाले तथा निकलने वालों को कष्ट न पहुँचाएँ। सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता और व्यवस्था नष्ट करना यह बताता है कि इन घिनौने व्यक्तियों को मनुष्यता के आरंभिक कर्तव्य नागरिकता तक का ही ज्ञान नहीं है।

🔵 मुसाफिरखाने, धर्मशाला, पाक्र, नदी-किनारे सिनेमाघर आदि सबके काम में आने वाले स्थानों में लोग जहाँ-तहाँ रद्दी कागज, दोने, पत्ते, सिगरेट के खोखे, मूँगफली के छिलके आदि पटकते रहते हैं और देखते-देखते ये स्थान गंदगी से भर जाते हैं। रेलगाड़ियों के डिब्बे में जहाँ हर आदमी को घिचपिच बैठना पड़ता है, ऐसी गंदगी बहुत अखरती है। संडासों में मलमूत्र का विसर्जन गलत स्थानों पर करने से वहाँ की स्थिति ऐसी हो जाती है कि दूसरों को उसका उपयोग करना कठिन पड़ता है। जबकि कितने ही मुसाफिर खड़े चल रहे हैं, तब कुछ लोग बिस्तर बिछाए, टाँग लम्बी किए लेटे रहते हैं और उठाने पर झगड़ते हैं।

🔴 इन लोगों को मनुष्यता की आरंभिक शिक्षा सीखनी ही चाहिए कि सार्वजनिक उपयोग के स्थान या वस्तुओं का उतना ही उपयोग करें जितना कि अपना हक है। सामान्य डिब्बे बैठने भर के लिए हैं। खाली हो तो कोई लेट भी सकता है, पर जबकि अनेक मुसाफिर खड़े या लटकते चल रहे हैं और चंद लोग लेटने को ऐसा आनंद उठाएँ, जिसे प्राप्त करने का हक उन्हें नहीं है तो उसे ढीठता या पशुता ही कहा जाएगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.38

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.6

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 13 July 2017


बुधवार, 12 जुलाई 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 26)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 समाज में स्वस्थ परम्परा कायम रहें, उसी से अपनी और सबकी सुविधा बनी रहेगी। यह ध्यान में रखते हुए हम में से प्रत्येक को अपने नागरिक कर्तव्यों का पालन करने में भावनापूर्वक दत्तचित्त होना चाहिए। समाज सबका है। सब लोग थोड़ा-थोड़ा बिगाड़ करें तो सब मिलाकर बिगाड़ की मात्रा बहुत बड़ी हो जाएगी, किंतु यदि थोड़े-थोड़े प्रयत्न सुधार भी बहुत हो सकता है। उचित यही है कि हम सब मिलकर अपने समाज को सुधारने, संचालित करने और स्वस्थ परम्पराएँ प्रचलित करने का प्रयत्न करें और सभ्य, सुविकसित लोगों की तरह भौतिक एवं आत्मिक प्रगति कर सुख-संतोष प्राप्त कर सकें।

🔵 दूसरों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अपनी सुविधा और स्वतंत्रता को स्वेच्छापूर्वक सीमित करना, सभ्य देश के सभ्य नागरिकों का कर्तव्य है। स्वच्छता को ही लीजिए, कहीं भी नाक, थूक साफ करना, पान-तम्बाकू की पीक डाल देना, अपने लिए कुछ दूर जाने का कष्ट भले ही बचाए, पर दूसरों को घृणा, असुविधा होगी और यदि अपने को कोई रोग है तो उसका आक्रमण उस गंदगी में आने-जाने वाले पर होगा। भले ही कोई रोके नहीं, पर हमारा नागरिक कर्तव्य है कि दूसरों की असुविधा को ध्यान में रखते हुए स्वयं उस गंदगी को डालने के योग्य उपयुक्त स्थान तक जाकर उसे साफ करें।

🔴 बीड़ी-सिगरेट हम पीते हैं तो ध्यान रखें कि अस्वच्छ धुँआ छोड़ने से पास में बैठे हुए दूसरे लोगों की तबियत खराब तो नहीं होती, स्वयं ही पता लगाएँ कि किसी को असुविधा तो नहीं होती। यदि हमारी उस क्रिया से दूसरों को तकलीफ होती है, तो सभ्यता का तकाजा यही है कि कहीं अन्यत्र जाकर बीड़ी पिए और धुँआ छोड़ें। सबसे आग्रह यह है कि इस बुरी आदत को छोड़ ही दें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.38

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.6

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 122)

🌹  हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ

🔵 ८. अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय की शोध के लिए ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की स्थापना। इसमें यज्ञ विज्ञान एवं गायत्री महाशक्ति का उच्चस्तरीय अनुसंधान चलता है। इसी उपक्रम को आगे बढ़ाकर जड़ी-बूटी विज्ञान की चरक कालीन प्रक्रिया का अभिनव अनुसंधान हाथ में लिया गया है। इसके साथ ही खगोल विद्या की टूटी हुई कड़ियों को नए सिरे से जोड़ा जा रहा है।

🔴 ९. देश के कोने-कोने में २४०० निजी इमारत वाली प्रज्ञा पीठ और बिना इमारत वाले ७५०० प्रज्ञा संस्थानों की स्थापना करके नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक पुनर्निर्माण की युगांतरीय चेतना को व्यापक बनाने का सफल प्रयत्न। इस प्रयास को ७४ देशों के प्रवासी भारतीयों में भी विस्तृत किया गया है।

🔵 १०. देश की समस्त भाषाओं तथा संस्कृतियों के अध्ययन, अध्यापन का एक अभिनव केंद्र स्थापित किया गया है ताकि हर वर्ग के लोगों तक नवयुग की विचारधारा को पहुँचाया जा सके। प्रचारक हर क्षेत्र में पहुँच सकें। अभी तो जन-जागरण के प्रचारक जत्थे जीप, गाड़ियों के माध्यम से हिंदी, गुजराती, उड़िया, मराठी क्षेत्रों में ही जाते हैं। अब वे देश के कोने-कोने में पहुँचेंगे और पवित्रता एवं एकात्मता की जड़ें मजबूत करेंगे।
  
🔴 ११-प्रचार तंत्र अब तक टैप रिकार्डरों और स्लाइड प्रोजेक्टरों के माध्यम से ही चलता रहा है। अब उसमें वीडियो फिल्म निर्माण की एक कड़ी और जोड़ी जा रही है।
  
🔵 १२. प्रज्ञा अभियान की विचारधारा को फोल्डर योजना के माध्यम से देश की सभी भाषाओं में प्रसारित किया जा रहा है ताकि कोई कोना ऐसा न बचे, जहाँ नव चेतना का वातावरण न बने।

🔴 १३. प्रज्ञा पुराण के पाँच खण्डों का प्रकाशन हर भाषा में तथा उसके टैप प्रवचनों का निर्माण। इस आधार पर नवीनतम समस्याओं का पुरातन कथा आधार पर समाधान का प्रयास।

🔵 १४. प्रतिदिन शान्तिकुञ्ज के भोजनालय में शिक्षार्थियों, अतिथियों और तीर्थयात्रियों की संख्या प्रायः एक हजार रहती है। किसी से कोई मूल्य नहीं माँगा जाता। सभी भावश्रद्धा से प्रसाद ग्रहण करके ही जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.18

👉 विश्वासघात से प्राण जाना अच्छा।

🔴 महाराणा प्रताप के सदस्यों में एक बड़ा पराक्रमी योद्धा रघुपति सिंह था। वह छिपकर छापे मारने में बड़ा कुशल था। अकबर उससे बड़ा परेशान रहता। उसे पकड़ने के लिए एक बड़े इनाम की घोषणा की हुई थी।

🔵 एक बार रघुपति सिंह का लड़का बीमार पड़ा। वह उसे देखने के लिए वेष बदल कर घर को चला। चित्तौड़ के सभी दरवाजों पर पहरेदार बैठे थे। घर पहुँचने का कोई रास्ता न था। आखिर उसने पकड़े जाने का खतरा उठा कर भी मरणासन्न लड़के का मुँह देखने की ठानी। रघुपति सिंह ने एक पहरेदार के पास जाकर कहा-मेरा नाम रघुपति सिंह है। मैं अपने मरणासन्न बेटे को देखने आया हूँ। इस समय तुम मुझे पकड़ो मत, मैं घर जाकर वापिस तुम्हारे पास आ जाऊँगा तब तुम गिरफ्तार कर लेना। पहरेदार उसकी सच्चाई से बड़ा प्रभावित हुआ। उसने घर जाने की इजाजत दे दी। अपने वचनानुसार रघुपति सिंह लौटा और उसी पहरेदार के पास आकर अपने को गिरफ्तार करा दिया।

🔴 पहरेदार उसे अकबर के पास ले गया। जिस खूँखार योद्धा को पकड़ने के लिए इतने दिन से इतने प्रयत्न हो रहे थे और इतना इनाम घोषित था उसे हाथ पकड़कर एक साधारण पहरेदार लिए आ रहा है और वह चुपचाप चला आ रहा है, इस दृश्य को देखकर अकबर स्तब्ध रह गये। उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ। उन्होंने पहरेदार से इस अनहोनी बात का कारण पूछा तो उसने सच-सच सब बात कह सुनाई।

अकबर ने पूछा-तुम जब घर चले गये थे तो फिर छिपकर क्यों न भाग गये। पहरेदार के पास आकर अपनी जान जोखिम में क्यों डाली?

🔴 रघुपति सिंह ने कहा-राजपूत अपने वचन पर दृढ़ रहते हैं, वे किसी के साथ विश्वासघात करने की अपेक्षा मरना अधिक अच्छा समझते हैं।

🔵 विश्वासघात मनुष्य का सबसे बड़ा अपराध है। सच्चे लोग कितनी ही बड़ी यहाँ तक कि प्राणों की हानि उठाकर भी शत्रु तक के साथ विश्वासघात नहीं करते।

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १३

🌹  प्रेम एक महान शक्ति

🔵 प्रेम ही एक ऐसी महान शक्ति है जो प्रत्येक दिशा में जीवन को आगे बढ़ाने में सहायक होती है। बिना प्रेम के किसी के विचारों में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। विचार तर्क- वितर्क की सृष्टि नहीं है। विचारणा तथा विश्वास बहुकाल के सत्संग से बनते हैं। अधिक समय की संगति का ही परिणाम प्रेम है। इसलिए विचार धारणा अथवा विश्वास प्रेम का विषय है।

🔴 यदि हम दूसरों पर विजय प्राप्त करके उनको अपनी विचारधारा में बहाना चाहते हैं, उनके दृष्टिकोण को बदलकर अपनी बात मनवाना चाहते हैं, तो प्रेम का सहारा लेना चाहिए। तर्क और बुद्धि हमें आगे नहीं बढ़ा सकते हैं। विश्वास रखिए कि आपकी प्रेम और सहानुभूति सभी बातों को सुनने के लिए दुनियाँ विवश होगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 13

🌹  Love, a Great Power

🔵 Love is a kind of power that can further any aspect of your life. It is impossible to bring about a change in anyone's thinking without love. Healthy mindsets are rarely ever formed through reasoning and arguments. Healthy mindsets as well as trust are developed through prolonged good company. The result of this prolonged good company is love. Therefore, a healthy mindset and trust are both the results of love.

🔴 We must use love to change others' outlook and way of thinking. Logic and intelligent arguments are not sufficient. If what you have to say is full of love and sympathy, the world will be willing to follow you.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 July

🔴 विचार व्यर्थ के मनोरंजन समझे जाते हैं। पर वस्तुतः उनकी सृजनात्मक शक्ति अनन्त है। वे एक प्रकार के चुम्बक हैं जो अपने अनुरूप परिस्थितियों को कहीं से भी खींच बुलाते हैं। साधन किसी को उपहार में नहीं मिले और यदि मिले हों तो टिके नहीं। अपना पेट ही आहार पचाता और जीवित रहने योग्य रस रक्त का उत्पादन करता है। ठीक इसी प्रकार विचार प्रवाह ही व्यक्ति का स्तर विनिर्मित करता है। क्षमताएं उसी के आधार पर उत्पन्न होती हैं। पराक्रम के प्रवाह को दिशाधारा उसी से मिलती है।

🔵 सज्जनता का माहात्म्य बताना और धर्म की दुहाई देना सरल है। उसने वक्ता को धर्मोपदेश कहलाने का अवसर मिलता है और श्रोता भक्त जन समझे जाते हैं। यह सब सरल है। वाचाल और मूढ़मति इन दोनों कार्यों को सरलतापूर्वक करते और सस्ती वाहवाही लूटते रहते हैं। कठिन कार्य है अनीति का विरोध करना और अवाँछनीयता से जूझना। ऐसे जुझारू शूरवीर यदि उत्पन्न न हों तो समझना चाहिए अधर्म और अनाचार अपने स्थान पर यथावत बना रहेगा। उसे हटाने और मिटाने का कोई सुयोग न बनेगा। प्रतिरोध के अभाव में अनाचार के हौसले बढ़ते हैं और वह चौगुनी सौगुनी गति से बढ़कर उन लोगों को भी चपेट में लेता है जो मुँह न खोलने के कारण अपने को सुरक्षित समझते थे और सोचते थे कि हम किसी को नहीं छेड़ते तो हमें कोई क्यों छेड़ेगा?
                                               
🔴 अनाचारों का आक्रमण उन्हीं पर होता है जो सज्जनता की आड़ में अपनी कायरता को छिपाये बैठे रहते हैं। बहेलिये चिड़ियों और मछलियों को ही जाल में समेटते हैं। जलाशयों में रहने वाले घड़ियालों और जंगलों में घूमते चीतों से उन्हें भी डर लगता है। कीड़े-मकोड़ों को लोग पैरों तले कुचलते हैं पर साँप बिच्छुओं से उन्हें भी बच कर चलना पड़ता है। बर्र के छत्ते में हाथ कौन डालता है? अनीति करना बुरी बात है पर उसे सहन करते रहना उससे भी बुरा। जीत की सम्भावना न हो तो पिसते रहने की अपेक्षा विद्रोह पर उतारू होकर मर मिटना कहीं श्रेष्ठ है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी का उत्तरदायित्व (भाग 2)

🔴 नारी घर की नियन्त्री है। वह सब तरह से घर का नियंत्रण करती है। घर के सब कामों की देख−रेख संचालन, व्यवस्था, उत्तरदायित्व उसी पर है। “गृहणी गृह मुच्यते” कहकर हमारे पूर्वजों ने इसीलिए उसका सम्मान किया है।

🔵 नारी अन्नपूर्णा है। घर में वह सभी को आवश्यक खाद्य पदार्थों से तृप्त करती है। पति से लेकर सास-ससुर, घर के अन्य सभी सदस्यों को समान रूप से तृप्त करती है। इतना ही नहीं अतिथि, गृह-पालित पशु से लेकर पड़ौस के कुत्ते तक को भी समान स्नेह, प्रेम, वात्सल्य के साथ भोजन देकर तृप्त करती है। इसीलिए उसे अन्नपूर्णा कहा गया है।

🔴 नारी निर्मात्री है। गृहकार्य, गृह व्यवस्था के साथ-साथ सत्सन्तति का निर्माण भी नारी ही करती है। बालक को जन्म देने से लेकर उसका विधिवत पालन-पोषण, शिक्षा, प्रेरणा द्वारा बच्चों को महान् बनाने का उत्तरदायित्व नारी पर ही हैं। इसीलिए उसे बालक की प्रथम आचार्य बताया गया है।

🔵 इसमें कोई सन्देह नहीं कि नारी का मानव समाज में बहुत बड़ा स्थान है, वैसे भी नारी जाति मानव समाज का आधा अंग है। जिसकी स्थिति से सम्पूर्ण समाज प्रभावित होता है। किसी मनुष्य के शरीर का अर्द्धांग असाध्य बीमारी से ग्रस्त हो या उसे लकवा मार जाय तो सम्पूर्ण शरीर का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। इसी तरह नारी जाति की उत्कृष्टता अथवा निकृष्टता का प्रभाव मानव समाज पर पड़ता है। नारी की गति स्थिति पद-पद पर मानव जीवन को प्रभावित करती है।

🔴 आजकल हमारे गृहस्थ और सामाजिक जीवन में व्याप्त विषमता, कठिनाई, अशान्ति, क्लेश, दुराचार आदि का स्त्रियों पर भी कुछ कम उत्तरदायित्व नहीं है। पारिवारिक जीवन में फैली हुई बुराइयाँ, अशाँति, कलह, दाम्पत्य जीवन की शुष्कता और नीरसता तथा उलझनपूर्ण संघर्षों में नारी का भी बहुत बड़ा हाथ है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1963 पृष्ठ 36
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/July/v1.36

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (अंतिम भाग)

🔴 कैसे मित्र बनें? आप हमारा सहयोग कीजिए, हम आपका सहयोग करेंगे। अन्धे और पंगे का उदाहरण पेश कीजिए। अन्धे को आँख से दिखाई नहीं पड़ता था और पंगा चल नहीं सकता था। दोनों ने आपस में मित्रता बना ली और मित्रता बना करके एक नदी पार कर ली, आपने सुना होगा, हमारे और हमारे गुरुदेव के बारे में यही हुआ। हमारे गुरुदेव पंगे हैं; क्योंकि जिस सीमा में वह काम करते हैं, वहाँ से दौड़-धूप करना उनके लिए मुमकिन नहीं और हम अन्धे हैं। हमारे पास न ज्ञान है, न विचार है। हम दोनों ने आपस का तालमेल बिठा लिया है और तालमेल बिठा करके अन्धे और पंगे की तरह नदी पार करने का फैसला कर लिया है। आप भी ऐसा ही कर लीजिए। 

🔵 आप शान्तिकुञ्ज के साथ वही रिश्ता बना लीजिए, जो रिश्ता अन्धे और पंगे का है। आप ज्ञान के अभाव में, विचारों के अभाव में भटकने वाले हैं और हम पंगे हैं। हम सारे संसार में किस तरीके से काम करेंगे? हम और आप दोनों ही मिलें, तो मजा आ जाए। आप पीछे के लिए क्या छोड़ जाएँगे, मुझे मालूम नहीं। दौलत नहीं छोड़ पाये, तो हर्ज नहीं है; लेकिन आप ऐसी चीज छोड़कर चले जाएँ, जिससे आपकी औलाद यह कहती रहे कि हम ऐसे शानदार आदमी की सन्तान हैं। आप शानदार के लिए पीछे वालों के लिए ऐसा रास्ता छोड़कर जाइए, जिस पर चलने वाले दूसरे लोग सराहते रहें कि हमको कोई रास्ता बता गया था, किसी ने हमको रास्ता दिखाया था, जिस पर हम चले और चलने के बाद में अपनी नाव को पार कर लिया और दूसरों की नाव को पार लगा दिया। आप ऐसा रास्ता अपनाइए। नई जिन्दगी जीइए, नया चिन्तन ग्रहण कीजिए, नया दृष्टिकोण अपनाइए, नई हिम्मत से काम लीजिए और नया जीवन जीने की तैयारी करके यहाँ से विदा होइए। बस, हमारी बात समाप्त।

॥ॐ शान्ति:॥

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १२

🌹  दूसरों पर निर्भर न रहो

🔵 जिस दिन तुम्हें अपने हाथ- पैर और दिल पर भरोसा हो जावेगा, उसी दिन तुम्हारी अंतरात्मा कहेगी कि बाधाओं को कुचल कर तू अकेला चल अकेला।

🔴 जिन व्यक्तियों पर तुमने आशा के विशाल महल बना रखे हैं वे कल्पना के व्योम में विहार करने के समान हैं। अस्थिर सारहीन खोखले हैं। अपनी आशा को दूसरों में संश्लिष्ट कर देना स्वयं अपनी मौलिकता का हृास कर अपने साहस को पंगु कर देना है। जो व्यक्ति दूसरों की सहायता पर जीवन यात्रा करता है वह शीघ्र अकेला रह जाता है।

🔵 दूसरो को अपने जीवन का संचालक बना देना ऐसा ही है जैसा अपनी नौका को ऐसे प्रवाह में डाल देना जिसके अंत का आपको कोई ज्ञान नहीं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य



👉 Lose Not Your Heart Day 12

🌹  Do not Depend on Others

🔵 The day you develop faith in the strength of your own hands, feet, and heart, your soul will tell you to go forth alone.

🔴 Keeping high expectations of others is like building castles in the air: unreal and worthless. Pinning your hopes on others cripples your own originality and courage. The person who centers his life around another person becomes alone very quickly.

🔵 Putting your life in another person's hands is like setting sail without knowing where you are going.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 12 July 2017


👉 Lose Not Your Heart Day 12

🌹  Do not Depend on Others

🔵 The day you develop faith in the strength of your own hands, feet, and heart, your soul will tell you to go forth alone.

🔴 Keeping high expectations of others is like building castles in the air: unreal and worthless. Pinning your hopes on others cripples your own originality and courage. The person who centers his life around another person becomes alone very quickly.

🔵 Putting your life in another person's hands is like setting sail without knowing where you are going.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 25)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 नियंत्रण में रहना आवश्यक है। मनुष्य के लिए यही उचित है कि वह ईश्वरीय मर्यादाओं का पालन करे। अपने उत्तरदायित्वों को समझे और कर्तव्यों को निबाहें। नीति, सदाचार और धन का पालन करते हुए सीमित लाभ में संतोष करना पड़ सकता है। गरीबी और सादगी का जीवन बिताना पड़ सकता है, पर उसमें चैन अधिक है। अनीति अपनाकर अधिक धन एकत्रित कर लेना संभव है, पर ऐसा धन अपने साथ इतने उपद्रव लेकर आता है कि उनसे निपटना भारी त्रासदायक सिद्ध होता है।

🔵 दंभ और अहंकार का प्रदर्शन करके लोगों के ऊपर जो रौब जमाया जाता है, उससे आतंक और कौतूहल हो सकता है, पर श्रद्धा और प्रतिष्ठा का दर्शन भी दुर्लभ रहेगा। विलासिता और वासना का अनुपयुक्त भोग भोगने वाला अपना शारीरिक, मानसिक और सामाजिक संतुलन नष्ट करके खोखला ही बनता जाता है। परलोक और पुनर्जन्म को अंधकारमय बनाकर आत्मा को असंतुष्ट और परमात्मा को अप्रसन्न रखकर क्षणिक सूखों के लिए अनीति का मार्ग अपनाना, किसी भी दृष्टि से दूरदर्शिता पूर्ण नहीं कहा जा सकता।

🔴  बुद्धिमत्ता इसी में है कि हम धर्म, कर्तव्य पालन का महत्त्व समझें, सदाचार की मर्यादाओं का उल्लंघन न करें। स्वयं शांतिपूर्वक जिएँ और दूसरों को सुखपूर्वक जीने दें। यह सब नियंत्रण की नीति अपनाने से ही संभव हो सकता है। कर्तव्य और धर्म का अंकुश परमात्मा ने हमारे ऊपर इसीलिए रखा है कि सन्मार्ग में भटकें नहीं। इन नियंत्रणों को तोड़ने की चेष्टा करना अपने और दूसरों के लिए महती विपत्तियों को आमंत्रित करने की मूर्खता करना ही गिना जाएगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.37

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.6

👉 Lose Not Your Heart Day 11

🌹  Walk Alone
🔵 Great men go far on their paths because they walk alone. Their inspiration comes from within. They alone spur their happiness and remove their sadness and they are helped along only by their own ideas.

🔴 Loneliness is an undeniable truth. To be afraid of it, feel inferior because of it, or lose sight of your duties because of it is the greatest sin. What you believe to be loneliness is actually a kind of solitude, given to you to develop your own inner strength. When you depend on yourself, you are better able to realize your full potential.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 11 July 2017


सोमवार, 10 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 10

🌹  Look for the Treasure Within Yourself

🔵 Keep your mind engaged in useful tasks; do not let it go idle. Take life seriously. The task of spiritual growth is before you, and time is very short. If you are led astray by your own negligence, you alone will have to pay the price.

🔴 Patience and hope will enable you to face any situation. Stand on your own feet and challenge the entire world if you need to, but you should only be satisfied after attaining your highest goals. When others look outside for worldly treasure, look inside for the treasure within yourself.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 10 July 2017


रविवार, 9 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 9

🌹  Courtesy, Simplicity, Empathy, Compassion

🔵 It is your responsibility to cultivate courtesy, simplicity, empathy, and compassion. Before looking for and criticizing faults in others,
address the glaring flaws in yourself. If you are unable to control your speech, use it against yourself instead of others.

🔴 First, discipline yourself. Without discipline, you cannot experience your true nature. Courtesy, simplicity, empathy, and compassion are all manifestations of this true nature.

🔵 Disregard how others treat you and stay focused on your own growth. If you can grasp this, you have understood a great secret.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 24)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 आत्म प्रताडऩा सबसे बड़ी मानसिक व्याधि है। जिसका मन अपने दुष्कर्मों के लिए अपने आपको धिक्कारता रहेगा, वह कभी आंतरिक दृष्टि से सशक्त न रह सकेगा। उसे अनेक मानसिक दोष दुर्गुण घेरेंगे और धीरे-धीरे अनेक मनोविकारों से ग्रस्त हो जाएगा।

🔵 मर्यादाओं का उल्लंघन करके लोग तात्कालिक थोड़ा लाभ उठाते देखे जाते हैं। दूरगामी परिणामों को न सोचकर लोग तुरंत के लाभ को देखते हैं। बेईमानी से धन कमाने, दंभ से अहंकार बढ़ाने और अनुपयुक्त भोगों के भोगने से जो क्षणिक सुख मिलता है, वह परिणाम में भारी विपत्ति बनकर सामने आता है। मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट कर डालने और आध्यात्मिक महत्ता एवं विशेषताओं को समाप्त करने में सबसे बड़ा कारण आत्म प्रताडऩा है। ओले पड़ने से जिस प्रकार फसल नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार आत्म प्रताडऩा की चोटें पड़ते रहने से मन और अंतःकरण के सभी श्रेष्ठ तत्त्व नष्ट हो जाते हैं और ऐसा मनुष्य प्रेत-पिशाचों जैसी श्मशान मनोभूमि लेकर निरंतर विक्षुब्ध विचरता रहता है।

🔴 धर्म कर्तव्यों की मर्यादा को तोड़ने वाले उच्छृंखल, कुमार्गगामी मनुष्यों को गतिविधियों को रोकने के लिए, उन्हें दंड देने के लिए समाज और शासन की ओर से जो प्रतिरोधात्मक व्यवस्था हुई है, उससे सर्वथा बचे रहना संभव नहीं। धूर्तता के बल पर आज कितने ही अपराधी प्रवृत्ति के लोग सामाजिक भर्त्सना से और कानून दंड से बच निकलने में सफल होते रहते हैं, पर यही चाल सदा सफल होती रहेगी, ऐसी बात नहीं है। असत्य का आवरण अंततः छँटना ही है। जन-मानस में व्याप्त घृणा का सूक्ष्म प्रभाव उस मनुष्य पर अदृश्य रूप से पड़ता है। जिसके अहित परिणाम ही सामने आते हैं।

🔵 राजदंड से बचे रहने के लिए ऐसे लोग रिश्वत में बहुत खर्च करते हैं, निरंतर डरे और दबे रहते हैं, उनका कोई सच्चा मित्र नहीं रहता। जो लोग उनसे लाभ उठाते हैं, वे भी भीतर ही भीतर घृणा करते हैं और समय आने पर शत्रु बन जाते हैं। जिनकी आत्मा धिक्कारेगी उनके लिए देर-सबेर में सभी कोई धिक्कारने वाले बन जाएँगे। ऐसी धिक्कार एकत्रित करके यदि मनुष्य जीवित रहा हो उसका जीवन न जीने के बराबर है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.36

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.6

शनिवार, 8 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 8

🌹 Introspect

🔵 Whatever happens, let it happen. Whatever is said about you, let it be said. You should consider these things as illusory as a mirage. If you have really detached yourself from the world, then why should such things affect you? Focus on inspecting yourself thoroughly for weaknesses. Only then can you begin the process of growth.

🔴 Take advantage of every moment and every opportunity. Your path is very long, and time is very short. Concentrate your inner strength on reaching your goal.

🔵 Do not despair in any situation. Have faith not in the capacity of man, but in the capacity of God. God will show you the right path.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 9 July 2017


👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 23)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 अनियंत्रित मनुष्य कितना घातक हो सकता है, इसकी कल्पना मात्र से सिहरन होती है। जिन असुरों, दानवों, दस्युओं, दुरात्माओं के कुकृत्यों से मानव सभ्यता कलंकित होती रहे है, वे शक्ल-सूरत से तो मनुष्य ही थे, पर उन्होंने स्वेच्छाचार अपनाया, मर्यादाओं को तोड़ा, न धर्म का विचार किया, न कर्तव्य का। शक्तियों के मद में जो कुछ उन्हें सूझा, जिसमें लाभ दिखाई दिया, वही करते रहे, फलस्वरूप उनका जीवन सब प्रकार घृणित और निकृष्ट बना रहा। उनके द्वारा असंख्यों का उत्पीड़न होता रहा। असुरता का अर्थ ही उच्छृंखलता है।

🔵 मर्यादाओं का उल्लंघन करने की घटनाएँ, दुर्घटनाएँ कहलाती हैं और उनके फलस्वरूप सर्वत्र विक्षोभ भी उत्पन्न होता है। सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, पृथ्वी सभी अपनी नियत कक्षा और धुरी पर घूमते हैं, एक दूसरे के साथ आकर्षण शक्ति में बँधे रहते हैं और एक नियत व्यवस्था के अनुरूप अपना कार्यक्रम जारी रखते हैं। यदि वे नियत व्यवस्था के अनुरूप अपना कार्यक्रम जारी रखें, तो उसका परिणाम प्रलय ही हो सकता है। यदि ग्रह मार्ग में भटक जाएँगे तो एक दूसरे से टकराकर विनाश की प्रक्रिया उत्पन्न कर देंगे। मनुष्य भी जब अपने कर्तव्य मार्ग से भटकता है तो अपना ही नहीं, दूसरे अनेकों का नाश भी करता है।

🔴  परमात्मा ने हर मनुष्य की अंतरात्मा में एक मार्गदर्शन चेतना की प्रतिष्ठा की है, जो उसे हर उचित कर्म करने की प्रेरणा एवं अनुचित करने पर भर्त्सना करती रहती हैं। सदाचरण कर्तव्यपालन के कार्य, धर्म या पुण्य कहलाते हैं, उनके करते ही तत्क्षण करने वाले को प्रसन्नता एवं शांति का अनुभव होता है। इसके विपरीत यदि स्वेच्छाचार बरता गया है, धर्म मर्यादाओं को तोड़ा गया है, स्वार्थ के लिए अनीति का आचरण किया गया है, तो अंतरात्मा में लज्जा, संकोच, पश्चाताप, भय और ग्लानि का भाव उत्पन्न होगा। भीतर ही भीतर अशान्ति रहेगी और ऐसा लगेगा मानो अपना अंतरात्मा ही अपने को धिक्कार रहा है। इस आत्म प्रताडऩा की पीड़ा को भुलाने के लिए अपराधी प्रवृत्ति के लोग नशेबाजी का सहारा लेते हैं। फिर भी चैन कहाँ, पाप वृत्तियाँ जलती हुई अग्नि की तरह हैं। जो पहले वहीं जलन पैदा करती है जहाँ उसे स्थान मिलता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गुरुपूर्णिमा पर्व पर - मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं- मोक्षमूलं गुरुकृपा

🔵 संत कबीर कहते है कि गुरु गोविन्द दोनों खड़े है। मैं पहले किसके चरण स्पर्श करूं? अंततः गुरु की बलिहारी लेते है कि है गुरुवर! यदि आप न होते तो मुझे गोविन्द की परमतत्त्व की ईश्वरत्व की प्राप्ति न हुई होती गुरु का महत्व इतना अधिक बताया गया है हमारे साँस्कृतिक वाङ्मय में बिना उसका स्मरण किये हमारा कोई कार्य सफल नहीं होता। गुरुतत्त्व को जानने मानने उस पर अपनी श्रद्धा और अधिक गहरी जमाते हुए अपना अंतरंग न्यौछावर करने का पर्व है गुरुपूर्णिमा व्यास पूर्णिमा।

🔴 गुरु वस्तुतः शिष्य को गढ़ता है एक कुम्भकार की तरह। इस कार्य में उसे कहीं चोट भी लगानी पड़ती है कुसंस्कारों का निष्कासन भी करना पड़ता है तथा कहीं अपने हाथों की थपथपाहट से उसे प्यारा का पोषण देकर उसमें सुसंस्कारों का प्रवेश भी वह कराता है। यह वस्तुतः एक नये व्यक्तित्व को गढ़ने की प्रक्रिया का नाम है। संत कबीर ने इसलिए गुरु को कुम्हार कहते हुये शिष्य को कुम्भ बताया है। मटका बनाने के लिये कुम्भकार को अंदर हाथ लगाकर बाहर से चोट लगानी पड़ती है कि कहीं कोई कमी तो रह नहीं गयी। छोटी-सी कमी मटके में कमजोरी उसके टूटने का कारण बन सकती है।

🔵 गुरु ही एक ऐसी प्राणी है जिससे शिष्य के आत्मिक सम्बन्धी की सम्भावनायें बनती है प्रगाढ़ होती चली जाती है। शेष पारिवारिक सामाजिक प्राणियों से शारीरिक मानसिक-भावनात्मक सम्बन्ध तो होते है आध्यात्मिक स्तर का उच्चस्तरीय प्रेम तो मात्र गुरु से ही होता है। गुरु अर्थात् मानवीय चेतना का मर्मज्ञ मनुष्य में उलट फेर कर सकने में उसका प्रारब्ध तक बदल सकने में समर्थ एक सर्वज्ञ। सभी साधक गुरु नहीं बन सकते। कुछ ही बन पाते व जिन्हें वे मिल जाते है, वे निहाल हो जाते है।

🔴 रामकृष्ण कहते थे सामान्य गुरु कान फूँकते है जब कि अवतारों पुरुष श्रेष्ठ महापुरुष सतगुरु-प्राण फूँकते है। उनका स्पर्श, दृष्टि व कृपा ही पर्याप्त हैं। ऐसे गुरु जब आते है तब अनेकों विवेकानन्द, महर्षि दयानन्द, गुरु विरजानन्द, संत एकनाथ, गुरु जनार्दन नाथ, पंत निवृत्ति नाथ, गुरु गहिनी नाथ, योगी अनिर्वाण, गुरु स्वामी निगमानन्द, आद्य शंकराचार्य, गुरु गोविन्दपाद कीनाराम, गुरु कालूराम तैलंग स्वामी, गुरु भगीरथ स्वामी, महाप्रभु चैतन्य, गुरु ईश्वरपुरी जैसी महानात्माएं विनिर्मित हो जाती है। अंदर से गुरु का हृदय प्रेम से लबालब होता है बाहर से उसका व्यवहार कैसा भी हों। बाहर से उसका व्यवहार कैसा भी हो। उसके हाथ में तो हथौड़ा है जो अहंकार को चकनाचूर कर डालता है ताकि एक नया व्यक्ति विनिर्मित हो।

🔵 गुरु का अर्थ है सोयों में जगा हुआ व्यक्ति, अंधों में आँख वाला व्यक्ति अंधों में आँख वाला व्यक्ति। गुरु का अर्थ है वहाँ अब सब कुछ मिट गया है मात्र परमात्मा ही परमात्मा है वहाँ बस! ऐसे क्षणों में जब हमें परमात्मा बहुत दूर मालूम पड़ता है, सद्गुरु ही उपयोगी हो सकता है क्योंकि वह हमारे जैसा है

🔴 मनुष्य जैसा है हाड़ माँस मज्जा का है फिर भी हमसे कुछ ज्यादा ही है। जो हमने नहीं जाना उसने जाना है। हम कल क्या होने वाले है, उसकी उसे खबर है। वह हमारा भविष्य है, हमारी समस्त सम्भावनाओं का द्वार है। गुरु एक झरोखा है, जिससे दूरस्थ परमात्मा रूपी आकाश को हम देख सकते है।

🔵 वे अत्यन्त सौभाग्यशाली कहे जाते है जिन्हें सद्गुरु के दर्शन हुए। जो दर्शन नहीं कर पाए पर उनके शक्ति प्रवाह से जुड़ गये व अपने व्यक्तित्व में अध्यात्म चेतना के अवतरित होने की पृष्ठभूमि बनाते रहे, वे भी सौभाग्यशाली तो है ही जो गुरु की विचार चेतना से जुड़े गया वह उनके अनुदानों का अधिकारी बन गया। शर्त केवल एक ही है पात्रता का सतत् अभिवर्धन तथा गहनतम श्रद्धा का गुरु के आदर्शों पर आरोपण। जो इतना कुछ अंशों में भी कर लेता है वह उनका उतने ही अंशों में उत्तराधिकारी बनता चला जाता है। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं माता भगवती देवी दोनों ही आज हमारे बीच स्थूल शरीर से नहीं है किन्तु ऋषियुग्म रूपी गुरुसत्ता की सूक्ष्म व कारण शक्ति का प्रवाह यथावत् और भी प्रखर रूप में हम सबके बीच विद्यमान है। आवश्यकता है सही रूप में उनसे जुड़ने की। यों दीक्षित तो ढेरों उनसे जुड़ने की। ये दीक्षित तो ढेरों उनसे हो सकते हैं किन्तु दीक्षा का मूल अर्थ अपनी इच्छा उन्हें दी अपना अहं समर्पित कर स्वयं को खाली किया ऐसा जीवन में उतारने वाले कुछ सौ या हजार ही हो सकते हैं। ये ही सच्चे अर्थों में उनके शिष्य कहे जा सकते हैं। अनुदान के पात्र भी ये ही हो सकते हैं।

🔴 जिसने परमपूज्य गुरुदेव के अस्सी वर्ष के तथा परमवंदनीय माताजी के सत्तर वर्ष के जीवन के थोड़े से भी हिस्से को देखा है तो उन्हें वहाँ अगाध स्नेह की गंगोत्री बहती मिली है। इतना प्यार इस सीमा तक स्नेह जितना कि सगी माँ भी पुत्र को नहीं दे सकती, गुरुवर ने व मातृ सत्ता ने अपनी पापी से पापी संतान से भी किया। जिसने उनकी इस प्रेम धार में बहकर उनके ज्ञानरूपी नौका में बैठने भर की हिम्मत कर ली, वह तर गया। जो डर गया। जो नहीं देख पाये उस दिव्य गुरुसत्ता को वह उनकी वसीयत और विरासत और धरोहर से उस प्राण ऊर्जा को पाते है। पूज्यवर ने जो कुछ भी लिखकर रख दिया एवं प्रवचनों में कह गये वह एक प्रकार से शक्तिपात का एक माध्यम बन गया। ऋतम्भरा प्रज्ञा का दूरदर्शी विवेकशीलता का जागरण जो परिजनों के मन में उनके सत्साहित्य के पठन मनन उनकी चर्चा से लीला प्रसंगों के श्रवण से हुआ वह शक्तिपात नहीं तो और क्या हैं।

🔵 लाखों नहीं, करोड़ों व्यक्तियों के जीवन की दिशाधारा को आमूलचूल बदल देने का कार्य कभी -कभी इस धरती पर सम्भवामि युगे-युगे कहकर आने वाली सत्ता ही करती है। वह कार्य इस युग में भी ऋषि युग्म की कारण सत्ता द्वारा सम्पन्न हो रहा है यह देखा व अनुभव किया जा सकता है। असंभव को भी संभव कर दिखाना महाकाल के स्तर की सत्ता की ही बात है। समय को पहचानना व सद्गुरु की पहचान कर उनसे अनन्य भाव से जुड़ जाना ही इस समय की सबसे बड़ी समझदारी है यह तथ्य भली-भाँति हृदयंगम कर लिया जाना चाहिये।

🔴 गायत्री परिवार-युगनिर्माण अनेकों को जलाता रहा है तो उसका भी एक ही कारण है वह है उसकी निष्ठा प्रामाणिकता तथा अविरल बहती स्नेह की धार। गुरुपर्व इसी गुरुता को स्मरण रखने का पर्व है। यदि गुरुसत्ता के जीवन में आ जाय तो हमारा जीवन धन्य बन जाय। शिष्यत्व सार्थक हो जाय।

🔵 श्रद्धा की परिपक्वता समर्पण की पूर्णता शिष्य में अनन्त सम्भावनाओं के द्वार खोल देती है। शास्त्र पुस्तकें तो जानकारी भर देते है किन्तु पूज्यवर जैसी गुरुसत्ता स्वयं में जीवन्त शास्त्र होते है। उनकी एक झलक भर देख कर अपने जीवन में उतारने जीवन में उतारने का प्रयास ही शिष्य का सही अर्थों में गुरुवरण है। गुरुवरण का गुरु से एकत्व की अनुभूति का अर्थ है परमात्मा से एकात्मता। गुरु देह नहीं है सत्ता है शक्ति का पुँज है। देह जाने पर भी क्रियाशीलता यथावत् बरकरार रहती है, वस्तुतः वह बहुगुणित हो सक्रियता के परिणाम में और अधिक व्यापक हो जाती है।

🔴 हमें विश्वास रखना चाहिये कि गुरुसत्ता देह से हमारे बीच न हो हमारा वह सूक्ष्म कारण रूप में सतत् मार्गदर्शन करेगी। हम गुरुतत्त्व को नित्य जीवन में धारण करते रहने का अपना कर्तव्य पूरा करते रहें तो शेष कार्य वह स्वतः कर लेगी।

🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1995

👉 गुरु वन्दना

एक तुम्हीं आधार सद्गुरु।
एक तुम्हीं आधार॥

   
जब तक मिलो न तुम जीवन में।
शान्ति कहाँ मिल सकती मन में॥
खोज फिरा संसार सद्गुरु।
एक तुम्हीं आधार सद्गुरु॥१॥

    कैसा भी हो तैरन हारा।
    मिले न जब तक शरण-सहारा॥
    हो न सका उस पार सद्गुरु॥
    एक तुम्हीं आधार  सद्गुरु॥२॥

हे प्रभु तुम्हीं विविध रूपों में।
हमें बचाते भव कूपों से॥
ऐसे परम उदार सद्गुरु।
एक तुम्हीं आधार सद्गुरु॥३॥

    हम आये हैं द्वार तुम्हारे।
    अब उद्धार करो दुःखहारे॥
    सुन लो दास पुकार सद्गुरु॥
    एक तुम्हीं आधार सद्गुरु॥४॥

छा जाता जग में अंधियारा।
तब पाने प्रकाश की धारा॥
आते तेरे द्वार सद्गुरु।
एक तुम्हीं आधार सद्गुरु॥५॥

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 8 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 2 Sep 2026

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