शुक्रवार, 5 जनवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Jan 2024

🔶 आध्यात्मिक दृष्टिकोण का अर्थ है मन की उच्च भूमिका में प्रवेश करना। आध्यात्मिक दृष्टिकोण को प्रकट करने वाला एक अत्यन्त संक्षिप्त साधना है- और वह है अपनी आत्मा का विकास। शक्ति का एक वृहत् परिमाण इस भण्डार में एकत्रित है, उसे संकल्प, सूचना तथा मनोबल से विकसित करना पड़ता है। हमारी आत्मा में महान् शक्ति इसीलिए दी गई है कि हम उसका जितना भी सम्भव हो सदुपयोग करें, उससे यथेष्ट लाभ उठावें और उस अनन्त चेतन तत्व की समीचीन रूप से अभिवृद्धि करें।

🔷 गुरु- शिष्य संबंध बड़ा कोमल, किन्तु कल्याणकारी होता है। गुरु शिष्य को पुत्रवत् समझकर, उसे टेढ़े- मेढ़े मागों से निकाल ले जाते हैं, जिन्हें शिष्य के लिए समझ पाना कठिन होता है ।। इसलिए कई बार शिष्य अभिमान में आकर गुरु की अवज्ञा कर जाता है, इच्छा तथा आदेश की अवहेलना करता है। यद्यपि गुरु उसे कुछ भी न कहें, किन्तु फिर भी वह संभावित लाभ से वंचित रह जाता है। इसके लिए शिष्य में गुरु के प्रति सम्पूर्ण समर्पण की आवश्यकता है।

🔶 कुविचारों और दुःस्वभावों से पीछा छुड़ाने का तरीका यह है कि सद्विचारों के सम्पर्क में निरन्तर रहा जाये उनका स्वाध्याय, सत्संग और चिंतन- मनन किया जाये। साथ ही अपने सम्पर्क क्षेत्र में सुधार कार्य जारी रखा जाये। सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन का सेवा कार्य किसी न किसी रूप में कार्यान्वित करते रहा जाये। इतना करने पर ही मन को स्वच्छ, निर्मल व स्वयं को प्रगति के पथ पर अग्रगामी बनाए रखा जा सकता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
 
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गुरुवार, 4 जनवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 4 Jan 2024

जीवन की महत्ता और सफलता उसकी आत्मिक प्रगति पर निर्भर है, यह विश्वास मन में रखना चाहिए व नित्य सुदृढ़ बनाना चाहिए। भौतिक सफलताएं तो उतनी ही देर आनन्द देती हैं, जब तक कि उनकी प्राप्ति नहीं हो जाती। मिलते ही आनन्द समाप्त हो जाता है व और अधिक के लिए व्याकुलता, बेचैनी आरंभ हो जाती है। जो मानव जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर उस आनन्द की प्राप्ति के इच्छुक हैं, जिसके लिए यह जन्म मिला है, उन्हें आत्मिक प्रगति के लिए तत्पर होना चाहिए और उसके दोनों आधारों उपासना और साधना का अवलम्बन लेना चाहिए।

निष्ठुरता, एकाकीपन, अलगाव से भरे आज के समाज में सतयुगी संभावनाएँ तभी साकार होंगी जब मानव के अन्दर ब्राह्मणत्व जागेगा। सादा जीवन, उच्च विचार की परम्परा का विस्तार होगा। गरीबी को जानबूझकर ओढ़ने वालों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाएगा। बड़प्पन की कसौटी एक ही होगी, विकसित भावसंवेदना, श्रेष्ठ-उदात्त चिन्तन व समाज को ऊंचा उठाने वाले सत्कर्म। संधि वेला में ऐसे अनेक नव ब्राह्मण उभरकर आएँगे। जाति, वंश के भेद से परे इन महामानवों की जीवनचर्या परमार्थ पारायण होगी। सतयुग की वापसी तब ही तो होगी।

ईश्वर एक नियम, मर्यादा एवं व्यवस्था का नाम है। स्वयं को भी उसने अपने को इन अनुशासनों में आबद्ध कर रखा है। फिर मनुष्य के साथ व्यवहार करते समय वह अपनी सुनिश्चित रीति-नीति से पीछे कैसे हट सकता है। उसे चापलूसी के आधार पर किस तरह अपनी ओछी मनोकामनाएँ पूरी कराने के लिए सहमत किया जा सकता है। उस निष्पक्ष न्यायाधीश से कुछ अनुपयुक्त करा लेने की बात किसी को भी नहीं सोचनी चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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मंगलवार, 2 जनवरी 2024

👉 ईर्ष्या न करें, प्रेरणा ग्रहण करें। भाग १

हृदय में ईर्ष्या का भाव पाल लेने का अर्थ है, अपने अच्छे-खासे जीवन में आग लगा लेना। जंगल में आग लग जाने से जिस प्रकार हरे-भरे पेड़ जलकर राख हो जाते हैं, उसी प्रकार ईर्ष्या का भाव भर जाने से मानव-जीवन भी जल-भुनकर समाप्त हो जाता है। ईर्ष्या से हानि के सिवाय कोई लाभ नहीं। किसी से ईर्ष्या करके मनुष्य उसका तो कुछ बिगाड़ नहीं सकता है। हाँ अपनी निद्रा, अपना सुख और अपना सुख-सन्तोष अवश्य खो देता है। ऐसे भाव को, जिससे केवल अपनी ही हानि होती रहे, अपने हृदय में जमा लेना किसी प्रकार हित कर नहीं। यह आत्म-घात के समान अबोधता है।

ईर्ष्या की उत्पत्ति दूसरों की उन्नति देखकर होती है। और होती केवल उन्हीं व्यक्तियों को है जो अक्षम और अशक्त होते हैं। वे स्वयं तो कोई उन्नति करने योग्य होते नहीं और न अपनी मानसिक निर्बलता के कारण प्रयत्न ही करते हैं, लेकिन औरों का अभ्युदय देखकर जलने अवश्य लगते हैं। किन्तु इससे किसी का क्या बनता-बिगड़ता है। केवल अपने हृदय में एक ऐसी आग लग जाती है, जो गीली लकड़ी की तरह जीवन को दिन रात सुलगाती रहती है।

संसार में एक से एक अच्छे श्रेष्ठ, सफल और उन्नतिशील व्यक्ति पड़े हैं। एक से एक बढ़कर धनवान, ऐश्वर्यवान और सम्मानित व्यक्ति मौजूद हैं। उनसे यदि व्यर्थ में ईर्ष्या की जाने लगे तो उससे उनका क्या बिगड़ सकता है। किसी की उन्नति किसी के ईर्ष्या अथवा प्रेम पर तो निर्भर होती नहीं। हर आदमी अपने परिश्रम, पुरुषार्थ और प्रयत्न के बल पर आगे बढ़ता और ऊँचे चढ़ता है। यदि कोई व्यक्ति उससे मन ही मन ईर्ष्या करता रहे तो उसका प्रभाव उस पर क्या पड़ सकता है। वह अपनी ओर से जब तक अपने परिश्रम और प्रयत्न को सक्रिय रखेगा, प्रगति के पथ पर बढ़ता जायेगा। उसे न तो किसी की ईर्ष्या रोक सकती है और न द्वेष।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1970 

👉 सत्य के लिए सर्वस्व त्याग

यदि मेरी मित्रतायें मेरा साथ नहीं देतीं तो न दें। प्रेम मुझे छोड़ देता है तो छोड़ दे। मेरा तो एक ही आग्रह है कि मैं उस सत्य के प्रति सच्ची रह सकूँ, जिसकी सेवा और परिपालन के लिये, मैंने अपनी इच्छाओं का, वैभव विलास से परिपूर्ण पाश्चात्य जीव−पद्धति तक का बहिष्कार कर दिया है। जब तक मेरे शरीर में रक्त की अन्तिम बूँद और अन्तिम श्वास विद्यमान है, मैं एकमेव सत्य की प्राप्ति के हित तिल−तिल जलती रहूँगी। सत्य ही तो मनुष्य जीवन का सार है।

यदि वह सत्य मुझ से रेगिस्तान में चलने को कहेगा तो मैं उसके पीछे−पीछे जाऊँगी, मुझे उसे प्राप्त करने के लिये पर्वतों पर चढ़ना पड़ा, समुद्र की थाह लेनी पड़ी तो भी मैं पीछे नहीं हटूँगी। उसने माँग की मैं प्रेम से वंचित हो जाऊँ तो मुझे वह भी स्वीकार होगा पर सत्य का आश्रय मैं छोड़ नहीं सकती। मैं तो सत्य से चिपकी रहूँगी, भले ही मुझे यह दिखाई दे कि मुझे अपना कहने वाला भी कोई नहीं रहा। मेरी हार्दिक कामना है कि जब मैं मरूँ और मेरी समाधि बनाई जाये तो उस पर लिखा जाये—“उसने सब कुछ छोड़कर भी सत्य के पीछे चलने का प्रयत्न किया।”

~ एनी बेसेंट
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1970 पृष्ठ 1

रविवार, 31 दिसंबर 2023

👉 अहिंसा

अहिंसा एक रहस्यमय शब्द है, जिसे कम ही लोग समझते हैं। अधिकतर लोग यही मानते हैं कि शरीर से किसी की पिटाई मत करो, किसी को घायल मत करो, किसी की जान मत लो, यह अहिंसा है। अहिंसा का यह अर्थ तो प्रसिद्ध है ही। परंतु यह अधूरा अर्थ है। यह तो शारीरिक अहिंसा हुई।

इसके अतिरिक्त, यदि किसी निर्दोष व्यक्ति पर आप कठोर भाषा बोलते हैं, उसकी खिल्ली उड़ाते हैं, उस पर व्यंग्य कसते हैं, उसको व्यर्थ में अपमानित करते हैं, उसे छोटा सिद्ध करने की कोशिश करते हैं, तो यह भी हिंसा है। यह वाणी के द्वारा की गई हिंसा है। इसी प्रकार से दूसरों के प्रति मन में बुरी भावना रखना, यह भी हिंसा है। यह मानसिक स्तर की हिंसा है। जैसे कि कोई व्यक्ति मन में ऐसा सोचे, कि हे भगवान! मेरे पड़ोसी की टांग टूट जाए। इस का मकान गिर जाए, इसके गोदाम में आग लग जाए, इसका बेटा दुर्घटना में मर जाए, यह व्यक्ति न्यायालय में मुकद्दमा हार जाए, इत्यादि। इस प्रकार का अनिष्ट चिंतन मानसिक हिंसा कहलाती है। तो यह तीन प्रकार की हिंसा हुई शारीरिक, वाचनिक और मानसिक।

इन तीनों प्रकार की हिंसा को न करना, किसी पर शरीर से अन्याय न करना, वाणी से भी निर्दोष को न डाँटना, मन में भी किसी का बुरा ना सोचना, यह पूर्ण अहिंसा कहलाती है। जो अहिंसा का पालन करता है, वह सदा प्रसन्न रहता है। उसे ईश्वर का आशीर्वाद मिलता है। हां, यदि कोई आपके ऊपर आक्रमण करे, तो आप अपनी रक्षा अवश्य करें। यदि आप अपनी रक्षा नहीं करते और व्यर्थ में दूसरों से पिटते रहते हैं, तो यह अहिंसा नहीं है।

स्वामी विवेकानंद

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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 31 Dec 2023

अनेक प्रकार के मन होते हैं। विचारने की शैली अनेक प्रकार की हुआ करती है विचारने के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण हुआ करते हैं। अतएव हर एक दृष्टिकोण निर्दोष है, लोगों के मत के अनुकूल बनो। उनके मत को भी ध्यान तथा सहानुभूति पूर्वक देखो और उसका आदर करो। अपने अहंकार चक्र के क्षुद्र केन्द्र से बाहर निकलो और अपनी दृष्टि को विस्तृत करो। अपना मत सर्वग्राही और उदार बना सब के मत के लिए स्थान रखो। तभी आपका जीवन विस्तृत और हृदय उदार होगा। आपको धीरे-धीरे मधुर और नम्र होकर बातचीत करनी चाहिए। मितभाषी बनो।

अवाँछनीय विचारों और सम्वेदनाओं को निकाल दो। अभिमान या चिड़चिड़ेपन को लेश मात्र भी बाकी नहीं रहने दो। अपने आपको बिल्कुल भुला दो। अपने व्यक्तित्व का भी अंश या भाव न रहने पावे। सेवा कार्य के लिए पूर्ण आत्मसमर्पण की आवश्यकता है यदि आप में उपरोक्त सद्गुण मौजूद हैं तो आप संसार के लिये पथ प्रदर्शक और अमूल्य प्रसाद रूप हो। आप एक अलौकिक सुगन्धित पुष्प हो जिसकी सुगन्ध देश भर में व्याप्त हो जायेगी। आपने बुद्धत्व की उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर लिया।

नम्र, दयालु, उपकारी और सहायक बनो। यही नहीं कि कभी-कभी यथावकाश इन गुणों का उपयोग किया जावे बल्कि सर्व काल में आपके सारे जीवन में इन्हीं गुणों का अभ्यास होना चाहिये। एक भी शब्द ऐसा मत कहो जिससे दूसरों को ठेस पहुँचे। बोलने से पहले भली प्रकार विचार करो और देख लो कि जो कुछ आप कहने लगे हो वह दूसरों के चित्त को दुखी तो नहीं करेगा-क्या वह बुद्धिसंगत मधुर सत्य तथा प्रिय तो है। पहले से ही ध्यानपूर्वक समझ लो कि आपके विचार शब्दों और कार्यों का क्या प्रभाव होगा। प्रारम्भ में आप कई बार भले ही असफल हो सकते हो परंतु यदि आप अभ्यास करते रहे तो अंतः में आप अवश्य सफल हो जाओगे।
                                        
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शनिवार, 30 दिसंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 30 Dec 2023

जो मनुष्य संसार की सेवा करता है वह अपनी ही सेवा करता है। जो मनुष्य दूसरों की मदद करता है वास्तव में वह अपनी ही मदद करता है। यह सदा ध्यान में रखने योग्य बात है। जब आप दूसरे व्यक्ति की सेवा करते हैं, जब आप अपने देश की सेवा करते हैं तब आप यह समझकर कि ईश्वर ने आपको सेवा द्वारा अपने को उन्नत तथा सुधारने का दुर्लभ अवसर दिया है। उस मनुष्य के आप कृतज्ञ हों जिसने आपको सेवा करने का अवसर दिया हो।

निष्काम सेवा करने से आप अपने हृदय को पवित्र बना लेते हैं। अहंभाव, घृणा, ईर्ष्या, श्रेष्ठता का भाव और उसी प्रकार के और सब आसुरी सम्पत्ति के गुण नष्ट हो जाते हैं। नम्रता, शुद्ध प्रेम, सहानुभूति, क्षमा, दया की वृद्धि होती है। भेद-भाव मिट जाते हैं। स्वार्थपरता निर्मूल हो जाती है। आपका जीवन विस्तृत तथा उदार हो जायेगा। आप एकता का अनुभव करने लगेंगे। अन्त में आपको आत्मज्ञान प्राप्त हो जायेगा। आप सब में “एक” और “एक” में ही सबका अनुभव करने लगेंगे। आप अत्यधिक आनन्द का अनुभव करने लगेंगे। संसार कुछ भी नहीं है केवल ईश्वर की ही विभूति है। लोक सेवा ही ईश्वर की सेवा है। सेवा को ही पूजा कहते हैं।

अधिकाँश साधक कुछ सेवा के बाद ही शीघ्र ही ईश्वर प्राप्ति के लिये अधीर हो जाते हैं यह निष्काम सेवा या कर्मयोग का लक्षण नहीं, कर्मयोगी वे हैं जो नम्रता तथा आत्मभाव से मनुष्यों की सेवा करते हैं। वही वास्तव में अखिल विश्व के नायक बन जाते हैं। सब लोग उनकी बड़ाई तथा आदर करते हैं। जितना ही आत्मभाव से सेवा करने जायें आप उतनी ही विशेष शक्ति, पौरुष, तथा योग्यता प्राप्त करेंगे। आप इसका अभ्यास करके ही स्वयं अनुभव प्राप्त करें।
                                        
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 धैर्य और सहनशीलता

कोई व्यक्ति धैर्यवान है, सहनशील है, तो अधिकांश लोग उसे मूर्ख, कमजोर या डरपोक मानते हैं। यह उन लोगों की भूल है। धैर्य और सहनशीलता, ये दो बहुत ही उत्तम गुण अथवा शक्तियां हैं, जो किसी किसी में होती है, सब में नहीं होती। ये कमजोरियां नहीं, बल्कि शक्तियां हैं। कमजोरी तो किसी में भी हो सकती है, पर शक्ति सबमें नहीं  होती। ये दोनों चीजें भी सब में नहीं होती, इससे पता चलता है कि ये कमजोरियां नहीं, बल्कि शक्तियां हैं।

अनेक बार कार्यों को करने में बहुत धैर्य रखना पड़ता है, जल्दबाजी करने से काम बिगड़ जाता है। जब लोगों में धैर्य नहीं होता, और वे जल्दबाजी करते हैं, तब उनके काम भी बिगड़ते हैं , और आपस में झगड़े भी होते हैं। इसी प्रकार से कभी कभी कोई व्यक्ति, किसी को डांट देता है; कभी-कभी दोष होने पर डांट लगती है और कभी-कभी बिना दोष होते हुए भी डांट खानी पड़ जाती है।

जब बिना दोष के डांट खानी पड़ती है, उस समय सहनशक्ति का पता चलता है। तब बहुत से लोग इस परीक्षा में असफल हो जाते हैं , और तुरंत प्रतिक्रिया करते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि वे लोग झगड़ने लगते हैं। इसलिए सहनशीलता एक शक्ति है। धैर्य भी एक शक्ति है। ये दोनों गुण या शक्तियाँ बड़ी दुर्लभ हैं। इन गुणों या शक्तियों को अवश्य धारण करना चाहिए, तथा अपने जीवन को सुंदर सफल और आनंदित बनाना चाहिए।

स्वामी विवेकानंद

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बुधवार, 27 दिसंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 27 Dec 2023

🔸 डर तभी हो सकता है जब हृदय कमजोर हो। हृदय कमजोर करने वाली एक ही वस्तु है संसार में चाहे उसे अविश्वास, अपघात, धोखेबाजी, बेईमानी कह लो अथवा पाप। मुख्य बात यह है कि हमें किसी से भय न हो इसके लिये यह भी आवश्यक है कि हम किसी के साथ क्षुद्रता न करें। जब कोई बुरी बात मन में आती है तभी मनःस्थिति कमजोर होती है और छुपाने का स्थान ढूँढ़ना पड़ता है। हमारे मन में उठने वाली भावनायें पवित्र हों योजनायें और विचार धारायें ऐसी हों जिनसे जीवन सुव्यवस्थित बनता हो, प्रगति होती हो, हमारे कार्य इतने स्वच्छ हों कि कभी किसी को ॐ गली उठाने का अवसर न मिले तो फिर डर भी किस लिये होगा? डर का घर नहीं रहेगा तो वह बसेगा कहाँ?

🔹 संसार में सब मित्र ही नहीं होते शत्रु भी होते हैं। विसंगतियाँ प्रत्येक क्षेत्र में पाई जाती हैं। आप अच्छे व्यक्ति हैं। आपकी भावनायें सदैव दूसरों का कल्याण चाहती हैं परोपकार, परमार्थ और पुण्य को जीवन का लक्ष्य मान कर चलने वाले लोगों के साथ भी खरपेंच लगाने वालों की कमी नहीं रहती। भलमनसाहत जितनी है दुष्टता भी उससे कम नहीं। इन्हीं को शत्रु कहा गया है।

🔸 मन की शक्तियाँ विलक्षण हैं। मनुष्य का सुख-दुख बन्धन और मोक्ष मन के अधीन है। संसार में ऐसा कोई स्थल नहीं जहाँ मन न जा सके, लोक और परलोक में भी मन एक पल में जा सकता है। जिसे आंखें देख नहीं सकतीं, जो कान सुन नहीं सकते, मन उसे भी सरलता से ग्रहण कर सकता है उसकी चंचलता को रोका जा सके और पारदर्शी काँच की तरह स्वच्छ बनाया जा सके तो आत्म साक्षात्कार का नित्य निरतिशय सुख भी मन के आधीन है। “मन सैवानुद्रष्टव्यम्” आत्मसाक्षात्कार के लिए मन ही नेत्रवान् है ऐसा श्रुति में कहा गया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 सुस्थिरता का एकमात्र अवलम्बन

आध्यात्मिकता मानव जीवन की रीढ़ है। रीढ़ की हड्डी टूट जाय तो फिर जिन्दगी बेकार हो जाती है। इसी प्रकार जिसमें आध्यात्मिक आस्था न रहेगी वह व्यक्ति अन्य किसी आधार पर इस प्रलोभन भरी दुनियाँ में धर्म कर्तव्य पर टिका न रह सकेगा। वह गड़बड़ में पड़ेगा और गड़बड़ियाँ करेगा। सचाई, नीति और भलाई की नीति चिरकाल तक अपनाये रहना केवल उसी के लिए संभव हो सकता है जो ईश्वर की सर्वज्ञता और न्यायशीलता पर विश्वास करता है। गाँधीजी कहा करते थे—‛प्रार्थना जीवन का ध्रुवतारा है।’ रात्रि के गहन अन्धकार में ध्रुवतारे का अवलम्बन छोड़ देने वाला भटकता ही फिरेगा। आज हमने आस्तिकता और उपासना का मार्ग छोड़ दिया है और सचमुच हम बुरी तरह बीहड़ बन में भटकते रहे हैं। भटकते−भटकते वहाँ आ पहुँचे हैं जहाँ से सर्वनाश अत्यन्त समीप दीखने लगा है। हमें पीछे लौटना होगा। जीवन के ध्रुवतारे की ओर दृष्टि डालनी होगी। आस्तिकता और उपासना का जन−जीवन में कोई स्थान होना ही चाहिए। ‘अखण्ड ज्योति’ का पहला कार्यक्रम यही है। हम में से प्रत्येक व्यक्ति आस्तिक एवं उपासक बने, गायत्री आन्दोलन के पीछे यही भावना सन्निहित है। भारतीय धर्म की सब से प्राचीन, सब से श्रेष्ठ, सबसे वैज्ञानिक, सबसे महत्वपूर्ण उपासना ‘गायत्री’ ही मानी गई है। ऋषियों और शास्त्रों ने जैसा कि इसे अत्याधिक आवश्यक एवं अनिवार्य माना है वैसा ही हम भी मानते हैं और प्रत्येक विचारशील को इसे अपनाने के लिए प्रेरणा देते हैं।

✍🏻 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
📖 *अखण्ड ज्योति फरवरी 1962*

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मंगलवार, 26 दिसंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 26 Dec 2023

यदि तुम एक विद्वान बनने की चेष्टा कर रहे हो तो अपने आपको एक विद्वान की ही भाँति रखो वैसा ही वातावरण एकत्रित करो, निराशा निकाल कर यह उम्मीद रखो कि मूर्ख कालिदास की भाँति हम भी महान बनेंगे। निराशा निकाल कर तुम इस एकटिंग को पूर्ण करने की चेष्टा करो। तुम अनुभव करो कि मैं विद्वान हूँ, सोचो कि मैं अधिकाधिक विद्वान बन रहा हूँ। मेरी विद्वता की निरंतर अभिवृद्धि हो रही है। तुम्हारे व्यवहार से लोगों को यह ज्ञात होना चाहिए कि तुम सचमुच विद्वान हो। तुम्हारा आचरण भी पूर्ण विश्वास युक्त हो शंका, शुबाह या निराशा का नाम निशान भी न हो। अपने इस विश्वास पर तुम्हें पूरी दृढ़ता का प्रदर्शन करना उचित है। यह अभिनय करते-करते एक दिन तुम स्वयमेव अपने कार्य को पूर्ण करने की क्षमता प्राप्त कर लोगे।

जिस वस्तु को हमें प्राप्त करना है उसके लिए जितनी मानसिक क्रिया होगी, जितना उसकी प्राप्ति का विचार किया जायगा, उतनी ही शीघ्रता से वह वस्तु हमारी ओर आकर्षित होगी। प्रत्येक वस्तु पहले मन में उत्पन्न की जाती है फिर वस्तु जगत में उसकी प्राप्ति होती है। तुम अपने विषय में अयोग्यता की भावना रखते हो अतः उसी प्रकार की तुम्हारे अन्तःकरण की सृष्टि होती जाती है। तुम्हारी भय की डरपोक कल्पनाएं ही तुम्हारे मन में निराशा के काले बादलों की सृष्टि कर रही है। मनःस्थिति के ही अनुसार अन्य व्यक्ति तुमसे द्वेष अथवा प्रेम करते हैं। और संसार की, समस्त वस्तुएं तुम्हारे पास आकर्षित होकर आती या मुड़कर दूर भागती हैं।

जब तुम निश्चय कर लोगे कि मेरा निराशा से जीवन का कोई संबंध नहीं होगा। मुझे नाउम्मीदों से कोई सरोकार नहीं है, मैं अब से वस्त्रभूषा पर शरीर पर, व्यवहार में, अपने कार्यों में निराशा का कोई चिन्ह भी न रहने दूँगा मैं पूर्ण शक्ति और मनोरथ सिद्धि में प्रवृत्त हूँगा, निराशापूर्ण वातावरण से मेरा कुछ लेना देना नहीं है। मैंने तो अपनी प्रवृत्ति ही उत्तम पदार्थों की ओर कर दी है। लता और मनोरथ सिद्धि मेरे बाएं हाथ का खेल है मुझे संसार की कठिनाई अपने श्रेय के मार्ग विचलित नहीं कर सकतीं तब याद रखो तुम्हारे हृदय में एक दिव्य शक्ति-शासनकर्ता शक्ति प्रसन्न होगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 शुभ विचारों का प्रभाव

दूषित विचारों से वातावरण की सारी सुंदरता नष्ट हो गई है। अब मनुष्य-जीवन का कुछ मूल्य नहीं रहा है; क्योंकि कुविचारों के फेर में इतनी अधिक अशांति उत्पन्न कर ली गई है कि उसमें थोड़े से से विचारवान व्यक्तियों को भी चैन से रहने का अवसर नहीं मिलता। इस संसार की सुखद रचना और इसके सौंदर्य को जाग्रत करना चाहते हो, तो वैयक्तिक तथा सामाजिक जीवन में सद्विचारों की प्रतिष्ठा करनी ही पड़ेगी। इसके लिए केवल कुछ व्यक्तियों को नहीं, वरन बुराइयों की तुलना कुछ अधिक प्रभावशाली सामूहिक प्रयास करने पड़ेंगे; तभी सबके हित संरक्षित रह सकेंगे।

यह कल्पना तभी साकार हो सकेगी; जब अपने विचारों के :परिवर्तन से सभ्य-सुसंस्कृत समाज की रचना का प्रयत्न करोगे। तुम उसी पदार्थ को अपनी ओर आकृष्ट करते हो; जिसके लिए अंतर में विचार होते हैं। अब तक बुरे विचार उठ रहे थे। अत: वातावरण भी कुरूप-सा, अशांत-सा लग रहा है। भ्रम और द्वेषपूर्ण विचारों से दुर्भावनाओं को मार्ग मिलता रहा। अब इसे छोड़ने का क्रम अपनाना चाहिए और शुभ विचारों की परंपरा डालनी चाहिए।

प्रेममय विचारों से हम अपने प्रेमास्पद को आकृष्ट करते हैं। ये विचार भी अप्रकट न रह सकेंगे। शीघ्र ही स्वभाव रूप में प्रकट होंगे और शीघ्र ही स्वभाव, क्रिया तथा कर्म के रूप में परिणत होकर वैसे ही परिणाम उपस्थित कर देंगे।


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रविवार, 24 दिसंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 24 Dec 2023

दूसरों की निन्दा सुनना हानिकारक है। क्योंकि वह झूठी हो तो व्यर्थ ही मन में भ्रम और दुर्भाव पैदा होकर अपनी मनः स्थिति की निंदा करते हैं और यदि वह निन्दा सच्ची हो तो न विचारने लायक तुच्छ मनुष्य के संबंध में विचारने से अपनी समय-क्षति होती है।

युग निर्माण आंदोलन अगले दिनों जिस प्रचंड रूप से मूर्तिमान होगा उसकी रहस्यमय भूमिका कम ही लोगो को विदित होगी, पर यह निश्चित है की वह आंदोलन बहुत ही प्रखर और प्रचंड रूप से उठेगा और पूर्ण सफल होगा । सफलता का श्रेय किन व्यक्तियों को, किन संस्थाओं को मिलेगा इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं । पर होना यह निश्चित रूप से है ।

सच्ची बात अच्छी नहीं लगती और अच्छी लगने वाली बात सच्ची नहीं होती। अच्छाई कभी झगड़ा नहीं करती और झगड़ा कभी अच्छा नहीं होता । बुद्धिमान कभी ज्यादा बकवाद नहीं करते और ज्यादा बकवाद करने वाले कभी बुद्धिमान नही होते।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 मनोविकारों के दुष्परिणाम

दीन, हीन, दरिद्र, अभागे, पतित, क्षुद्र, निराश प्रकृति के लोग सदा दुख और पतन की ही बात सोचते हैं, उन्हें दुर्भाग्य का ही रोना रोते और भविष्य के निराशा पूर्ण चित्र बनाते हुए ही देखा जायेगा। इन्हें संयोगवश कुछ सुख साधन मिल भी जाय तो भी उनकी वेषभूषा, मुखाकृति, भावभंगिमा निराश और दीन मनुष्यों जैसी ही मिलेगी। चोर, उठाईगीरे व्यभिचारी लम्पट, प्रकृति के लोग दूसरों के धन पर, रूप यौवन पर ही लार टपकाते रहते हैं। बेईमान, रिश्वतखोर, ठग, धोखेबाज, डाकू प्रकृति के लोग दूसरों के खीसे पर ऐसे ही घात लगाये रहते हैं जैसे बगुला मछली को ताकता रहता है। ऐसे लोगों का मलीन मन भला कहीं चैन पा सकता है? वे अभागे यह नहीं जानते कि मानसिक स्वच्छता की भी कोई स्थिति इस संसार में होती है और उसे प्राप्त करने वाला स्वर्गीय सुख शान्ति का अनुभव कर सकता है।

मनोविकार अगणित प्रकार के हैं और वे सभी अपने-अपने ढंग के रोग हैं। शरीर के रोग को दूसरे भी जान सकते हैं पर मन का रोग भीतर छिपा होने से वह केवल रोगी को ही दीखता है। इतना अन्तर तो अवश्य है बाकी कष्टों में कोई अन्तर नहीं। सच तो यह है कि शरीर के कष्ट से मन का कष्ट अधिक दुखदायी होता है। बुखार में पड़े रोगी को जितनी पीड़ा है, पुत्र शोक से संतप्त व्यक्ति को उससे कहीं अधिक है। सिर दर्द की तुलना में अपमान और असफलता का दुख गहरा है। क्रुद्ध और कामासक्त मनुष्य जितना असंतुलित दीखता है उतना जुकाम खाँसी का मरीज नहीं। लोभी और स्वार्थी जितना पाप प्रवृत्त रहता है उतना भूखा और दरिद्र नहीं। रोगी मनुष्य स्वयं जितना व्यथित रहता है, और दूसरों को जितना दुख देता है उसकी अपेक्षा मनोविकार ग्रस्त का क्षेत्र अधिक विस्तृत है। वह स्वयं भी अधिक दुख पाता है और दूसरे अधिक लोगों को अधिक मात्रा में सताता भी है। इसलिए शारीरिक आरोग्य की जितनी आवश्यकता अनुभव की जाती है, मानसिक आरोग्य पर उससे भी अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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