शनिवार, 6 जून 2020

👉 समर्पण

एक बार किसी देश का राजा अपनी प्रजा का हाल-चाल पूछने के लिए गाँवो में घूम रहा था।

घूमते-घूमते उसके कुर्ते का बटन टूट गया, उसने अपने मंत्री को कहा कि, पता करो की इस गाँव में कौन सा दर्जी हैं,जो मेरे बटन को सिल सके, मंत्री ने पता किया, उस गाँव में सिर्फ एक ही दर्जी था, जो कपडे सिलने का काम करता था।

उसको राजा के सामने ले जाया गया, राजा ने कहा, क्या तुम मेरे कुर्ते का बटन सी सकते हो, दर्जी ने कहा,यह कोई मुश्किल काम थोड़े ही है, उसने मंत्री से बटन ले लिया, धागे से उसने राजा के कुर्ते का बटन फोरन सी दिया, क्योंकि बटन भी राजा के पास था, सिर्फ उसको अपना धागे का प्रयोग करना था।

राजा ने दर्जी से पूछा कि, कितने पैसे दू, उसने कहा, महाराज रहने दो, छोटा सा काम था, उसने मन में सोचा कि, बटन भी राजा के पास था, उसने तो सिर्फ धागा ही लगाया हैं, राजा ने फिर से दर्जी को कहा, कि, नहीं नहीं बोलो कितनीे माया दू, दर्जी ने सोचा कि, 2 रूपये मांग लेता हूँ, फिर मन में सोचा कि; कहीं राजा यह ने सोचलें,कि, बटन टाँगने के मुझ से 2 रुपये ले रहा हैं, तो गाँव वालों से कितना लेता होगा, क्योंकि उस जमाने में २ रुपये की कीमत बहुत होती थी।

दर्जी ने राजा से कहा, कि, महाराज जो भी आपको उचित लगे, वह दे दो, अब था तो राजा ही, उसने अपने हिसाब से देना था, कहीं देने में उसकी पोजीशन ख़राब न हो जाये।

उसने अपने मंत्री से कहा कि, इस दर्जी को २ गाँव दे दों, यह हमारा हुकम है।

कहाँ वो दर्जी सिर्फ २ रुपये की मांग कर रहा था, और कहाँ राजा ने उसको २ गाँव दे दिए ,, जब हम प्रभु पर सब कुछ छोड़ देते हैं, तो वह अपने हिसाब से देता हैं, सिर्फ हम मांगने में कमी कर जाते है, देने वाला तो पता नही क्या देना चाहता हैं, इसलिए संत-महात्मा कहते है, प्रभु के चरणों पर अपने आपको -अर्पण कर दों,, फिर देखो उनकी लीला।

👉 ‘‘हम बदलेंगे युग बदलेगा’’ सूत्र का शुभारम्भ (भाग २)

यदि वर्तमान परिस्थिति अनुपयुक्त लगती हो और उसे सुधारने बदलने का सचमुच ही मन हो तो सड़ी नाली की तली तक साफ करनी चाहिए। सड़ी कीचड़ भरी रहने पर दुर्गन्ध और विषकीटकों से निपटने के छुट पुट उपायों से कोई स्थायी समाधान मिल नही सकेगा। समाजगत विभीषिकाओं और व्यक्तिगत व्यथाओं के नाम रूप कितने ही क्यों न हो सबका आत्यन्तिक समाधान एक ही है कि दृष्टिकोण की दिशाधारा बदली जाय और अभ्यस्त ढर्रे की रीति नीति में क्रान्तिकारी परिवर्तन किया जाय। उलटे को उलटकर सीधा किया जा सकता है। एक शब्द में इसी को युग क्रान्ति कहा जा सकता है जिसे नियोजित किये बिना और कोई गति नहीं। जहाँ तक उतर चुके उसके उपरान्त अब महा विनाश का, सामूहिक आत्म हत्या का ही अन्तिम पड़ाव है।

मानवी क्षमता इन दिनों अनुपयुक्त को अपनाने बढ़ाने में संलग्न है। हसेना यह चाहिए कि प्रवाह मुड़े और अदूरदर्शिता को निरस्त करके औचित्य को समर्थन मिले। मनुष्य शक्तियों का भण्डार है। दुर्भाग्य एक ही है कि उसे दुष्प्रवृत्तियों में नियोजित करके बर्बादी के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है। यह स्थिति उलटी जानी चाहिए। क्षमताओं को अपव्यय से बचाया और सृजन प्रयोजनों में लगाया जाना चाहिए। यहाँ एक आवश्यक और भी है कि जो गन्दगी फैलाई जा चुकी है उसे हटाने के लिए भी तूफानी प्रयत्न किया जाय, अन्यथा मार्ग में बिखरे हुए काँटे प्रगति पथ के अवरोध ही बने रहेंगे।

‘‘हम बदलेंगे युग बदलेगा’’ के उद्घोष में निदान और उपचार के दोनों ही पक्षों का समावेश है। परिस्थितियों को बदलने के लिए मनःस्थिति को, समाज को सुधारने के लिए व्यक्ति परिष्कार को अनिवार्य माना जाना चाहिए। हर व्यक्ति को इस तथ्य से अवगत, सहमत करना चाहिए कि इन दिनों लोक मानस की दिशाधारा में समग्र परिवर्तन की आवश्यकता है। इसके बिना उज्ज्वल भविष्य की संरचना तो दूर, बढ़ती हुई विपत्तियों के त्रास से भी आत्म रक्षा संभव न हो सकेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Illuminate Every Home

Those desirous of enlightened transformation at personal, familial and social level must read and contemplate upon the Yug Sahitya and follow it in practice.

This literature, written in very lucid and self-explanatory style is focused at resolution of the problems of today and guiding the path to collective enlightenment. Good books, volumes, or words containing the pure knowledge, elevated thoughts and works of saints, sages and altruistic reformers carry the strength of their life-force and thus have the potential to transform ordinary mortal beings into great personalities. It is therefore said the punya (good omen) gained by Swadhyaya (devoted self-study and following) of such a literature is many times more than perhaps what one could get by biggest ever charity like donating the entire globe with all its resources…

If you have faith in me, and the driving optimism and will of ushering into an era of global welfare and peace, then engage your self in the swadhyaya of the YugSahitya and expand it into every house, every family around you.

Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 राष्ट्र की प्रगति का मूल आधार-चरित्रनिष्ठा

मनुष्य की सर्वोपरि सम्पदा उसकी चरित्रनिष्ठा है। यह एक ऐसा शब्द है, जो मानव के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का उद्बोधन करता है। व्यक्तिगत जीवन में कर्त्तव्य परायण, सत्यनिष्ठा, पारिवारिक जीवन में स्नेह-सद्भाव  एवं सामाजिक  जीवन में शिष्टता-शालीनता, नागरिकता आदि आदर्शों के प्रति जिस व्यक्ति में अगाध निष्ठा है और जो प्रतिपल इन आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात् रखता है, उसे चरित्रवान् कहा जा सकता है। किसी राष्ट्र या समाज की उन्नति का आधार वहाँ के भौतिक साधन, खनिज सम्पदा या उर्वर भूमि नहीं होते, वरन् किसी देश का उत्कर्ष उसके चरित्रवान नागरिकों पर निर्भर करता है।
  
चरित्रवान् व्यक्तियों की प्रामाणिकता पर हर कोई विश्वास करता है तथा उन्हें सम्मान देता है। यही नहीं, उनके प्रति श्रद्धा भी लोगों के हृदय में उमड़ती रहती है। यह श्रद्धा ही उनकी मूल्यवान सामाजिक सम्पत्ति होती है। स्वामी विवेकानन्द ने इस संदर्भ में कहा है- ‘संसार का इतिहास उन थोड़े से व्यक्तियों द्वारा बनाया गया है, जिनके पास चरित्रबल का उत्कृष्ट भण्डार था। यों कई योद्धा और विजेता हुए हैं, बड़े-बड़े चक्रवर्ती सम्राट हुए हैं, किन्तु इतिहास ने केवल उन्हीं व्यक्तियों को अपने हृदय में स्थान दिया है, जिनका व्यक्तित्व समाज के लिए, मानव जाति के लिए एक प्रकाश स्तंभ का काम कर सका है।’
  
चरित्रवान व्यक्ति के लिए अपना स्वार्थ नहीं, दूसरों का, समाज का हित मुख्य रहता है। इसी कारण वे सामूहिक हितों या परमार्थ प्रयोजनों के लिए अपने स्वार्थ का ही नहीं, अपने अस्तित्व का भी परित्याग कर देते हैं।
  
आदर्शों के प्रति निष्ठा, सामाजिक हितों के लिए उत्सर्ग का साहस व्यक्तित्व को इतना तेजस्वी बनाता है कि अनायास ही उस व्यक्ति के प्रति लोकश्रद्धा का ऊफान उमड़ने लगता है। जब किसी समाज या राष्ट्र पर संकटों के बादल घिर जाते हैं, तो जनसमुदाय ऐसे चरित्रवान, उत्साही और साहसी व्यक्तियों से ही मार्गदर्शन की अपेक्षा करता है और उसे अपना नेतृत्व सौंपता है।
  
देशभक्ति या राष्ट्र प्रेम व्यक्ति के चरित्र का एक अनिवार्य अंग है और जिन देशवासियों में अपने राष्ट्र के प्रति जितनी गाढ़ी भक्ति होगी, उसमें सुव्यवस्था, शांति और समुन्नति के आधार उतने ही पुष्ट होते चले जायेंगे। राष्ट्र का अर्थ-अपना समाज, देश परिवार ही तो है। हम सभी उसकी एक-एक इकाई हैं। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि इन दिनों अपने देश-समाज में सर्वत्र स्वार्थपरता, बेईमानी, बदनीयती और भ्रष्टाचार ही संव्याप्त है। चरित्रनिष्ठ आदर्श नेतृत्वों का एक प्रकार से अभाव ही दीखता है। जन सामान्य में भी चारित्रिक मूल्यों के प्रति आस्था कम होती जा रही है और आदर्शों की अवहेलना की जाने लगी है।  यह अवहेलना, उपेक्षा ही व्यक्तिगत प्रगति एवं राष्ट्र की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है।
  
वस्तुतः इतिहास ने उन महापुरुषों का ही गुणगान किया है, जिन्होंने अपने समाज को, राष्ट्र को नये जीवन-मूल्य, चरित्र के नये मापदण्ड दिये और आदर्शों की समयानुकूल परिभाषा अपने व्यक्तित्व तथा कृतित्व के माध्यम से की है। चरित्र-मानवीय सद्गुणों के उस समुच्चय का नाम है, जो व्यक्ति के समग्र जीवन को आच्छादित करते हैं और जीवन तथा व्यवहार के सभी क्षेत्रों में उसे प्रामाणिक सिद्ध करते हैं। चरित्र साधना से व्यक्तिगत जीवन में सरसता तथा सामाजिक जीवन में सुव्यवस्था आती है। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय प्रगति की संभावना बढ़ती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 5 जून 2020

👉 Sabse Badi Seva सबसे बड़ी सेवा

दूसरों के संकल्प और विचार जान लेना बहुत कठिन है। किन्तु अपने मन की भावनाओं को बहुत स्पष्ट समझा, सुना और परखा जा सकता है, यदि औरों की सेवा करना चाहते हैं तो पहले अपनी सेवा की योजना बनाओ, अपना सुधार सबसे सरल है। साथियो! तुम जितना अपने अन्तःकरण का परिमार्जन और सुधार कर लोगे, यह संसार तुम्हें उतना ही सुधरा हुआ परिलक्षित होगा।

जब तुम दर्पण में अपना मुख देखते हो तो, चेहरे की सुन्दरता के साथ उसके धब्बे और मलिनता भी प्रकट होती है, तब तुम उसे प्रयत्नपूर्वक साफ कर डालते हो। मुख उज्ज्वल साफ और सुन्दर निकल आता है। प्रसन्नता बढ़ जाती है, बहुत अच्छा लगने लगता है।

अन्तःकरण भी एक मुख है। उसे चेतना के दर्पण में देखने और परखने से उसकी महानतायें भी दिखाई देने लगती हैं और सौंदर्य भी। आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता इसलिये पड़ी कि उन छोटी-छोटी मलीनताओं को दूर करें, जो एक पर्त की तरह आत्मा के अनन्त सौंदर्य को प्रभावित और आच्छादित किये रहते हैं। जब वह महानतायें मिट जाती हैं तो आत्मा का उज्ज्वल, साफ और सुन्दर स्वरूप परिलक्षित होने लगता है और संसार का सब कुछ अच्छा और प्रिय मालूम होने लगता है।

मन से प्रश्न करना चाहिये- क्या तुम भयभीत हो? क्या तुम्हें इन्द्रिय-जन्य वासनाओं में मोह है? क्या तुम्हारे विचार गन्दे हैं? यदि हाँ तो सुधार के प्रयत्न में तत्काल जुट जाओ। अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जिस दिन इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ मिलने लगेगा, उस दिन से तुम संसार में सबसे सुखी व्यक्ति होंगे।

महात्मा बुद्ध

👉 ‘‘हम बदलेंगे युग बदलेगा’’ सूत्र का शुभारम्भ (भाग १)

आदत पड़ जाने पर तो अप्रिय और अवांछनीय स्थिति भी सहज और सरल ही प्रतीत नहीं होती, प्रिय भी लगने लगती है। बलिष्ठ और बीमार का मध्यवर्ती अन्तर देखने पर यह प्रतीत होते देर नहीं लगती कि उपयुक्त एवं अनुपयुक्त के बीच कितना बड़ा फर्क होता है। अतीत के देव मानवों के स्तर और सतयुगी स्वर्गोपम वातावरण से आज के व्यक्ति और समाज की तुलना करने पर यह समझते देर नहीं लगती कि उत्थान के शिखर पर रहने वाले इस धरती के सिरमौर पतन के कितने गहरे गर्त में क्यों व कैसे आ गिरे।

आज शारीरिक रुग्णता, मानसिक उद्विग्नता, आर्थिक तंगी, पारिवारिक विपन्नता, सामाजिक अवांछनीयता क्रमशः बढ़ती ही चली जा रही है, अभ्यस्तों को तो नशेगाजी की लानत और उठाईगीरी भी स्वाभाविक लगती है, कोढ़ी भी आने समुदाय में दिन गुजारते रहते है पर सही और गलत का विश्लेषण करने पर प्रतीत होता है कि हम सब ऐसी स्थिति में रह रहे है जिसे मानवी गरिमा से गई गुजरी, सड़ी ही कहा जा सकता है।

उत्थान पतन के विवेचन कर्ता बताते रहे है कि परिस्थिति और कुछ नहीं मनःस्थिति की परिणति मात्र है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के समन्वय से व्यक्तित्व बनता है। यही है जो शक्तिशाली चुम्बक की तरह अपनी सजातीय परिस्थितियों को खींचता, घसीटता और इर्द गिर्द जमा करता रहता हैं। जो भीतर से जैसा है वह बाहर से भी उसी स्तर के वातावरण से घिरा रहता है। बीज के अनुरूप ही पेड़ का स्वरुप और फलों का स्वाद आकार होता है। व्यक्तित्व को बीज और परिस्थितियों को उसकी परिणति कहा जाय तो उसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।

समाज व्यक्तियों का समूह मात्र है। लोगों का स्तर जैसा भी भला बुरा होता है समाज का प्रचलन, स्वरूप एवं माहौल वैसा ही बनकर रहता है। व्यक्ति को महत्ता देनी हो तो उसकी मनःस्थिति को ही श्रेय या दोष देना चाहिए। गुण, कर्म, स्वभाव का स्तर ही मनुष्य का वास्तविक वैभव है। उसी के अनुरूप मनुष्य उठते गिरते और सुख दुख पाते रहते हैं। बहुमत जैसा होता है समाज का स्वरूप एवं ढाँचा भी तदनुरूप बनकर खड़ा हो जाता है। मानवी उत्थान पतन के इस तत्व दर्शन को समझने के उपरान्त इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि परिस्थितियों में सुधार परिवर्तन करना हो तो व्यक्ति के अन्तराल को कुरेदना चाहिए। मनुष्य के दृष्टिकोण, स्वभाव एवं चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश हो सके तो ही सयह सम्भव है कि शान्ति, प्रगति और प्रसन्नता का आनन्द लेते हुए हँसती हँसाती, खिलती खिलाती जिन्दगी जियी जा सके। सभ्य सज्जनों का समुदाय ही समुन्नत समाज कहा और स्वर्ग सतयुग कहकर सराहा जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 2 जून 2020

👉 Parmatma Ka Karya परमात्मा का कार्य

एक औरत रोटी बनाते बनाते मंत्र जाप कर रही थी, अलग से पूजा का समय कहाँ निकाल पाती थी बेचारी, तो बस काम करते करते ही...।

एकाएक धड़ाम से जोरों की आवाज हुई और साथ मे दर्दनाक चीख। कलेजा धक से रह गया जब आंगन में दौड़ कर झांकी तो आठ साल का चुन्नू चित्त पड़ा था,  खुन से लथपथ। मन हुआ दहाड़ मार कर रोये। परंतु घर मे उसके अलावा कोई था नही, रोकर भी किसे बुलाती, फिर चुन्नू को संभालना भी तो था। दौड़ कर  नीचे गई तो देखा चुन्नू आधी बेहोशी में माँ माँ की रट लगाए हुए है।

अंदर की ममता ने आंखों से निकल कर अपनी मौजूदगी का अहसास करवाया। फिर 10 दिन पहले करवाये अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बावजूद ना जाने कहाँ से इतनी शक्ति आ गयी कि चुन्नू को गोद मे उठा कर पड़ोस के नर्सिंग होम की ओर दौड़ी। रास्ते भर भगवान को जी भर कर कोसती रही, बड़बड़ाती रही, हे प्रभु क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा, जो मेरे ही बच्चे को..।

खैर डॉक्टर साहब मिल गए और समय पर इलाज होने पर चुन्नू बिल्कुल ठीक हो गया। चोटें गहरी नही थी, ऊपरी थीं तो कोई खास परेशानी नही हुई।...

रात को घर पर जब सब टीवी देख रहे थे तब उस औरत का मन बेचैन था। भगवान से विरक्ति होने लगी थी। एक मां की ममता प्रभुसत्ता को चुनौती दे रही थी।

उसके दिमाग मे दिन की सारी घटना चलचित्र की तरह चलने लगी। कैसे चुन्नू आंगन में गिरा की एकाएक उसकी आत्मा सिहर उठी, कल ही तो पुराने चापाकल का पाइप का टुकड़ा आंगन से हटवाया है, ठीक उसी जगह था जहां चिंटू गिरा पड़ा था। अगर कल मिस्त्री न आया होता तो..? उसका हाथ अब अपने पेट की तरफ गया जहां टांके अभी हरे ही थे, ऑपरेशन के। आश्चर्य हुआ कि उसने 20-22 किलो के चुन्नू को उठाया कैसे, कैसे वो आधा किलोमीटर तक दौड़ती चली गयी? फूल सा हल्का लग रहा था चुन्नू। वैसे तो वो कपड़ों की बाल्टी तक छत पर नही ले जा पाती।

फिर उसे ख्याल आया कि डॉक्टर साहब तो 2 बजे तक ही रहते हैं और जब वो पहुंची तो साढ़े 3 बज रहे थे, उसके जाते ही तुरंत इलाज हुआ, मानो किसी ने उन्हें रोक रखा था।

उसका सर प्रभु चरणों मे श्रद्धा से झुक गया। अब वो सारा खेल समझ चुकी थी। मन ही मन प्रभु से अपने शब्दों के लिए क्षमा मांगी।

भगवान कहते हैं, "मैं तुम्हारे आने वाले संकट रोक नहीं सकता, लेकिन तुम्हे इतनी शक्ति दे सकता हूँ कि तुम आसानी से उन्हें पार कर सको, तुम्हारी राह आसान कर सकता हूँ। बस धर्म के मार्ग पर चलते रहो।"

उस औरत ने घर के मंदिर में झांक कर देखा, लगा भगवान मुस्करा रहे थे।

👉 Yug Parivartan Ka Aadhar युग परिवर्तन का आधार भावनात्मक नव निर्माण (अंतिम भाग)

जाति या लिंग के कारण किसी को ऊँचा या किसी को नीचा न ठहरा सकेंगे, छूत- अछूत का प्रश्न न रहेगा। गोरी चमड़ी वाले लोगों से श्रेष्ठ होने का दावा न करेंगे और ब्राह्मण हरिजन से ऊँचा न कहलायेगा। गुण, कर्म, स्वभाव, सेवा एवं बलिदान ही किसी को सम्मानित होने के आधार बनेंगे, जाति या वंश नहीं। इसी प्रकार नारी से श्रेष्ठ नर है उसे अधिक अधिकार प्राप्त है, ऐसी मान्यता हट जायेगी। दोनों के कर्तव्य और अधिकार एक होंगे। प्रतिबन्ध या मर्यादाएँ दोनों पर समान स्तर की लागू होंगी। प्राकृतिक सम्पदाओं पर सब का अधिकार होगा। पूँजी समाज की होगी। व्यक्ति अपनी आवश्यकतानुसार उसमें से प्राप्त करेंगे और सामर्थ्यानुसार काम करेंगे। न कोई धनपति होगा न निर्धन, मृतक उत्तराधिकार में केवल परिवार के असमर्थ सदस्य ही गुजारा प्राप्त कर सकेंगे। हट्टे- कट्टे और कमाऊ बेटे बाप के उपार्जन के दावेदार न बन सकेंगे, वह बचत राष्ट्र की सम्पदा होगी। इस प्रकार धनी और निर्धन के बीच का भेद समाप्त करने वाली समाजवादी व्यवस्था समस्त विश्व में लागू होगी। हराम खोरी करते रहने पर भी गुलछर्रे उड़ाने की सुविधा किसी को न मिलेगी। व्यापार सहकारी समितियों के हाथ में होगा, ममता केवल कुटुम्ब तक सीमित न रहेगी, वरन् वह मानव मात्र की परिधि लाँघते हुए प्राणिमात्र तक विकसित होगी। अपना और दूसरों का दुःख- सुख एक जैसा अनुभव होगा। तब न तो माँसाहार की छूट रहेगी और न पशु पक्षियों के साथ निर्दयता बरतने की। ममता और आत्मीयता के बन्धनों में बँधे हुए सब लोग एक दूसरे को प्यार और सहयोग प्रदान करेंगे।
    
शरीर, मन, वस्त्र, उपकरण सभी को स्वच्छ रखने की प्रवृत्ति बढ़ेगी। शुचिता का सर्वांगीण विकास होगा। गंदगी को मानवता का कलंक माना जायेगा। न किसी का शरीर मैला कुचैला रहेगा न वस्त्र। घरों को गंदा गलीज न रहने दिया जायेगा। मनुष्य और पशुओं के मल- मूत्र को पूरी तरह खाद के लिए प्रयुक्त किया जायेगा। वस्तुएँ यथा स्थान, यथा क्रम और स्वच्छ रखने की आदत डाली जायेगी। मन में कोई छल- कपट, द्वेष- दुर्भाव जैसी मलीनता न रहेगी।
    
एकता, समता, ममता और शुचिता इन चार मूलभूत सिद्धान्तों के आधार पर विभिन्न आचार संहिताएँ, रीति- नीति, विधि व्यवस्थाएँ, मर्यादाएँ और परम्पराएँ बनाई जा सकती हैं। भौगोलिक तथा अन्य परिस्थितियों को देखते हुए उनमें हेर- फेर भी यत्किंचित होते रह सकते हैं। पर आधार उनके यही रहेंगे।
    
यह ध्यान रखने की बात है कि संसार की दो ही प्रमुख शक्तियाँ है- एक राजतन्त्र दूसरी धर्मतन्त्र। राजसत्ता में भौतिक परिस्थितियों को प्रभावित करने की क्षमता है और धर्म सत्ता में अन्तःचेतना को। दोनों को कदम से कदम मिलाकर एक दूसरे की पूरक होकर रहना होगा।
    
नव निर्माण की पृष्ठभूमि धर्म मूलक ज्ञान होगा। इसी के लिए ज्ञानतन्त्र खड़ा किया गया है और ज्ञान यज्ञ का महान अभियान चलाया गया है। स्वल्प साधनों से भी वह जिस द्रुतगति के साथ बढ़ता जा रहा है उसे देखते हुए पूर्व से सूर्योदय होने के और उसका प्रकाश सर्वत्र फैलने की बात पर सहज ही विश्वास किया जा सकता है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Love is Supreme

Divine knowledge and selfless love enlighten every dimension of life, destroy all vices and worries; there remains no feeling of hatred, jealously, discrimination, or fear. And then, one is blessed by the divine sight to see the pure love, justice and equality indwelling everywhere.

If you want to experience the divine joy, make your mind a source of wisdom, firm determination and noble thoughts; let your heart be an auspicious ocean of compassion. Control your tongue, purity and discipline it to speak truth. This will help your self- refinement and inner strengthening and eventually inspire the divine impulse of eternal love.

If you have integrity of character, authenticity in what you talk and do, people will believe you. You will not have to attempt convincing them. The wise and sincere seekers will themselves reach you. If in addition, you are generous and have an altruistic attitude towards everyone, you will also naturally win people’s heart. The warmth, words and works of truth and love never go in the void.

Their positive impact is an absolute certainty. There should be no doubt in your minds that pure love is omnipresent and supreme. It contains the power to accomplish the eternal quest of life. It facilitates uprooting the vices and allaying the agility, apprehensions and tensions of mind. Selfless love is a divine virtue, a preeminent source of auspicious peace and joy.

📖 Akhand Jyoti, Oct. 1943

👉 Yug Parivartan युग परिवर्तन की पृष्ठभूमि और रूपरेखा

आज की परिस्थितियों में सभी परिवर्तन चाहते हैं। अभावों के स्थान पर संपन्नता, अनिश्चितता के स्थान पर स्थिरता, आशांकाओं के स्थान पर आश्वासन अभीष्ट है। द्वेष का स्थान श्रद्धा को मिले – अविश्वास की जड़ ही कट जाय । ऐसी मुखर परिस्थितियों की कल्पना करने भर से आँखें चमकने लगती हैं।

सुविधा-साधन की दृष्टि से हम पूर्वजों की तुलना में कहीं आगे हैं। विज्ञान और बुद्धिवाद की संयुक्त प्रगति ने अनेकानेक साधन ऐसे प्रस्तुत किए हैं, जिनकी सहायता से अधिक सुखी जीवन जी सकते हैं। पूर्वजों की शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, संचार, यातायात,  बिजली, तार, डाक, जहाज आदि अनेकों ऐसे सुविधा-साधन उपलब्ध नहीं थे, जैसे आज हैं। इन उपलब्धियों के आधार पर हमें अधिक सुखी होना चाहिए था, पर देखते है‌ कि स्थिति और भी गई गुजरी हो गई है। चिकित्सा और पौष्टिक खाद्यों की सुविधा वाले दिन-दिन और भी रुग्ण बनते जा रहे हैं। उच्च शिक्षित व्यक्ति भी संतुलन और विवेक से रहित चिंतन करते और विक्षुब्ध रहते देखे जाते हैं। गरीबों का उठाईगीरी करना समझ में आ सकता है, पर जो संपन्न हैं वे क्यों अन्याय-अपहरण की नीति अपनाते हैं, यह समझ सकना कठिन है।

शिष्टाचार और आडम्बर तो बढ़ा, पर आत्मीयता और शालीनता की जड़ें खोखली होती जा रही हैं। चिन्तन और चरित्र के अवमूल्यन ने व्यक्ति और समाज के सामने असंख्य समस्याएं उत्पन्न कर दी हैं। उपलब्ध क्षमताओं का एवं साधनों के एक बड़े भाग का, उपयोग करने तथा उससे बचने की योजना पर ही खर्च होता रहता है। रचनात्मक कार्यों में लग सकने वाले साधन समस्याओं के कारण उत्पन्न उद्विग्नता में ही खप जाते हैं, फिर भी कोई समाधान दीखता नहीं। एक उलझन सुलझने नहीं पाती कि दूसरी नई उठकर खड़ी हो जाती है।. . . आदमी अपनी ही दृष्टि में घिनौना बनता जा रहा है तो फिर दूसरों से श्रद्धा, सम्मान, सद्भाव एवं सहयोग की अपेक्षा कैसे की जाए?   
    
वर्तमान की अवांछनीयताओं से निपटने और भविष्य को उज्जवल बनाने के दोनो ही उद्देश्य विचार क्रान्ति अभियान से संभव होंगे। लाल मशाल ने इसी का प्रकाश फैलाने, वातावरण बनाने और भ्रान्तिओं की लंका को जलाने में हनुमान् की जलती पूँछ बनने का निश्चय किया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Hmara Chhtni Karyakrm हमारा छटनी-कार्यक्रम और उसका प्रयोजन

आज तो भावनात्मक दृष्टि से खोटे और ओछे व्यक्ति भी अपने निजी लाभ को दृष्टि से हमें घेरे रहते हैं। अधिक भीड़ उन्हीं की रहती है। यह भीड़ छट जाने से जो शक्ति बचेगी उसे सीमित क्षेत्र में अधिक सावधानी से लगाया जा सकेगा और उसका लाभ भी बहुत होगा। छटनी के पीछे एक रहस्यपूर्ण प्रयोजन और भी है जिसकी चर्चा हमने अज्ञातवास से लौटते ही कर दी थी। वह यह कि युग निर्माण का प्रयोजन साधारण मनोभूमि के घटिया, स्वार्थी, ओछे, कायर और कमजोर प्रकृति के लोग न कर सकेंगे। इसके लिए समर्थ, तेजस्वी आत्मायें अवतरित होंगी और वे ही इस कार्य को पूरा करेंगी। सीमेंट, लोहे का लेन्टर डालकर छत्ते पाटी जाती हैं तो उसका वजन उठाने के लिए बाँस-बल्ली का ढाँचा खड़ा कर लेते हैं, छत डालते समय वजन वही उठाता है, पीछे जब छत पक जाती है तब उस ढाँचे को निकाल कर अलग कर देते हैं।

युग परिवर्तन का महान कार्य तेजस्वी, मनस्वी एवं तपस्वी आत्माओं द्वारा सम्भव होगा। हम लोग जो तनिक-सा त्याग, बलिदान का प्रसंग आ जाने पर बगलें झाँकने लग जाते हैं, उतने बड़े कार्य को कर सकने के योग्य नहीं। जिस मिट्टी से हम बने हैं रेतीली और कमजोर है कोई टिकाऊ चीज उससे कैसे बन सकती है। जो एक-दो माला जप करने मात्र से तीनों लोक की ऋद्धि-सिद्धियाँ लूटने की आशा लगाये बैठे रहते हैं और जीवन-शोधन तथा परमार्थ की बात सुनते ही काठ हो जाते हैं ऐसे ओछे आदमी अध्यात्म का क, ख, ग, घ, भी नहीं जानते। आत्मबल तो उनके पास होगा ही कहाँ से।

जिसके पास आत्मबल नहीं वह युग-परिवर्तन की भूमिका में कोई कहने लायक योगदान दे भी कहाँ से सकेगा? इस तथ्य से हम भली प्रकार अवगत हैं। अपनों की नसनब्ज हमें भली प्रकार मालूम है। इसलिए उनसे इतनी ही आशा करते हैं कि छत का लेन्टर बनाने से बाँस-बल्ली की तरह थोड़ी देर अपना उपयोग कर लेने दें तो बाँस बहुत हैं। छत तो सीमेंट, कंक्रीट, लोहे की छड़ आदि के योग से बनेगी और उसे कुशल कारीगर बनावेंगे। बाँस-बल्ली का ढाँचा तो मामूली मजदूर भी बाँध देता है पर लेन्टर को बढ़िया कारीगर इंजीनियर ही ठीक तरह डाल सकते हैं। हम युग-निर्माण योजना के विशाल भवन का ढाँचा खड़ा करने वाले मामूली से मजदूर मात्र हैं। परिजन जिस मिट्टी से बने हैं उसे देखते हुए उन्हें भी हम बाँस-बल्ली मात्र ही मानते हैं। थोड़ा-सा वजन पड़ने पर जो लचक जाय, जरासी परख का अवसर आये तो दाँत निकाल दें, ऐसे लुँजपुँज व्यक्ति युग-परिवर्तन जैसी कठोर प्रक्रिया को कैसे पूरा करेंगे? जिसमें निज की कड़क नहीं वह वजन कैसे उठावेगा ?

भारतीय महान गौरव एवं वर्चस्व को पुनः अपने स्थान पर प्रतिष्ठापित करने के लिए अगले दिनों विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली आत्माएं आवश्यक संख्या में इस देश में अवतरित होंगी। व्यास, वशिष्ठ, भारद्वाज, याज्ञवल्क्य, कपिल, कणाद, विश्वामित्र, दधीच जैसे ऋषि, भीम, अर्जुन, हनुमान, अंगद, जैसे योद्धा, नागार्जुन, रावण, जैसे वैज्ञानिक गाँधी, तिलक, मालवीय, लाजपतराय जैसे नेता, शिवाजी, प्रताप, गोविन्दसिंह, जैसे देशभक्त अरविन्द, विवेकानन्द, रामतीर्थ जैसे ज्ञानी, चरक, सुश्रुत, वागभट्ट जैसे चिकित्सक, सीता, सावित्री, अरुन्धती, अनुसूया, गाँधारी, द्रौपदी, लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई जैसी नारियाँ अगले दिनों अवतरित होंगी। जब कभी भी युग-परिवर्तन के समय आये हैं तब इस महान प्रयोजन को पूरा कर सकने में समर्थ आत्माओं का भी अवतरण हुआ है। अब भी वही होने जा रहा है।

ऐसी आत्माएं जब अवतरित होती हैं जब अपने योग्य वातावरण ढूँढ़ती हैं। मधुमक्खियाँ और भौंरे पुष्प कुञ्जों के आधार पर ही जीवित रहते हैं,मछली को जलाशय चाहिए, यह परिस्थितियाँ न मिलें तो वे जीवित न रहेंगे। महान आत्माएं केवल अच्छे पारिवारिक वातावरण में जन्मती हैं। यदि प्रारब्धवश किसी अनुपयुक्त परिवार में जन्म लेती हैं तो अल्पायु में ही चली जाती हैं। दशरथ और कौशल्या ने भगवान राम को अपनी गोद में खिलाने के लिये तीन जन्मों तक लगातार तप किया था, तब उन दोनों का गुण-कर्म स्वभाव ऐसा बना था कि उसमें उच्च आत्माओं का अवतरण सम्भव हो सके। धन ऐश्वर्य भले ही न हो, गरीबी कितनी ही क्यों न हो,पर भावनात्मक दृष्टि से जहाँ का वातावरण उपयुक्त हैं,वहीं दिव्य आत्माओं का जन्म ले सकना सम्भव होगा। गिद्ध और सियार मृत लाश की गंध पाकर दूर-दूर से इकट्ठे हो जाते हैं इसी प्रकार परिष्कृत पारिवारिक वातावरण की तलाश में दिव्य आत्माएं घूमती रहती हैं और जब उपयुक्त स्थान मिल जाता है तो वे प्रसन्नतापूर्वक वहाँ जन्मती हैं। कहना न होगा कि जिन घरों में ऐसी उच्च आत्माएं जन्में उसके यश, गौरव, महत्व एवं आनन्द का बार-पार नहीं रहता।

अगले दिनों जो दिव्य आत्माएं युगनिर्माण का महान-आयोजन पूरा करने लिए अवतरित होने वाली हैं उन्हें अपने उपयुक्त परिस्थितियों की आवश्यकता पड़ेगी। इस आवश्यकता की पूर्ति हमें करनी चाहिए जिसमें कोई ऊँची जीवात्मा आवे तो वह घुटन अनुभव न करे। जिससे उसे अपने अनुकूल भावात्मक वातावरण मिल सके। जहाँ ऐसा वातावरण बन जायगा, वहाँ फिर इस बात की भी व्यवस्था हो सकती है कि वहाँ कोई महान् विभूति जन्म ले।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखंड ज्योति अगस्त १९६६

शनिवार, 30 मई 2020

👉 युग परिवर्तन का आधार भावनात्मक नव निर्माण (भाग ४)

अगले दिनों ज्ञानतन्त्र ही धर्मतंत्र होगा। चरित्र निर्माण और लोक मंगल की गतिविधियाँ धार्मिक कर्मकाण्डों का स्थान ग्रहण करेंगी। तब लोग प्रतिमा पूजक देव मन्दिर बनाने को महत्त्व देंगे। तीर्थ- यात्राओं और ब्रह्मभोजों में लगने वाला धन लोक शिक्षण की भाव भरी सत्प्रवृत्तियों के लिए अर्पित किया जायेगा। कथा पुराणों की कहानियाँ तब उतनी आवश्यक न मानी जायेंगी जितनी जीवन समस्याओं को सुलझाने वाली प्रेरणाप्रद अभिव्यंजनाएँ। धर्म अपने असली स्वरूप में निखर कर आयेगा और उसके ऊपर चढ़ी हुई सड़ी गली केंचुली उतर कर कूड़े करकट के ढेर में जा गिरेगी।
    
ज्ञान तन्त्र वाणी और लेखनी तक ही सीमित न रहेगा, वरन् उसे प्रचारात्मक एवं संघर्षात्मक कार्यक्रमों के साथ बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्रान्ति के लिए प्रयुक्त किया जायेगा। साहित्य, संगीत, कला के विभिन्न पक्ष विविध प्रकार से लोक शिक्षण का उच्चस्तरीय प्रयोजन पूरा करेंगे। जिनके पास प्रतिभा है, जिनके पास सम्पदा है वे उससे स्वयं लाभान्वित होने के स्थान पर समस्त समाज को समुन्नत करने के लिए समर्पित करेंगे।
    
(१) एकता (२) समता (३) ममता और (४) शुचिता। नव निर्माण के चार भावनात्मक आधार होंगे।
 
एक विश्व, एक राष्ट्र, एक भाषा, एक धर्म, एक आचार, एक संस्कृति के आधार पर समस्त मानव प्राणी एकता के रूप में बँधेंगे। विश्व बन्धुत्व की भावना उभरेगी और वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श सामने रहेगा। तब देश, धर्म, भाषा, वर्ण आदि के नाम पर मनुष्य मनुष्य के बीच दीवारें खड़ी न की जा सकेंगी। अपने वर्ग के लिए नहीं, समस्त विश्व के हित साधन की दृष्टि से ही समस्याओं पर विचार किया जायेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 28 मई 2020

👉 चन्दन का कोयला तो न बनायें

एक राजा वन विहार के लिए गया। शिकार का पीछा करते-करते राह भटक गया। घने जंगल में जा पहुँचा। रास्ता साफ नहीं दीख पड़ता था। साथी कोई रहा नहीं। रात हो गई। जंगल के हिंसक पशु दहाड़ने लगे। राजा डरा और रात्रि बिताने के लिए किसी आश्रय की तलाश करने लगा।

ऊँचे पेड़ पर चढ़कर देखा तो उत्तर दिशा में किसी झोंपड़ी में दीपक जलता दिखाई दिया। राजा उसी दिशा में चल पड़ा और किसी वनवासी की झोपड़ी में जा पहुँचा।

अपने को एक राह भूला पथिक बताते हुए राजा ने उस व्यक्ति से एक रात निवास कर लेने देने की प्रार्थना की। वनवासी उदार मन वाला था। उसने प्रसन्नता पूर्वक ठहराया और घर में जो कुछ खाने को था, देकर उसकी भूख बुझाई। स्वयं जमीन पर सोया और अतिथि को आराम से नींद लेने के लिए अपनी चारपाई दे दी।

राजा ने भूख बुझाई। थकान मिटाई और गहरी नींद सोया। वनवासी की उदारता पर उसका मन बहुत प्रसन्न था। सवेरा होने पर उस वनवासी ने सही रास्ते पर छोड़ आने के लिए साथ चलने की भी सहायता की।

दोनों एक दूसरे से विलग होने लगे। तो राजा को उस एक दिन के गान और आतिथ्य का बदला चुकाने का मन आया। परन्तु क्या दे? कुछ दे भी तो उस एकान्तवासी पर चोर रहने क्यों देंगे? इसलिए ऐसी भेंट देनी चाहिए जिसके चोरी होने का डर भी नहीं और आवश्यकतानुसार उसमें से आवश्यक राशि उपलब्ध होती रहे।

उसी जंगल में राजा का एक विशाल चंदन उद्यान था। उसमें बढ़िया चंदन के सैकड़ों पेड़ थे। राजा ने अपना पूरा परिचय वनवासी को दिया और अपने हाथ से लिखकर उसे चंदन उद्यान का स्वामी बना दिया। दोनों संतोष पूर्वक अपने-अपने घर चले गये।

वनवासी लकड़ी बेचकर गुजारा करता था। इसने लकड़ी का कोयला बना कर बेचने में कम श्रम पड़ने तथा अधिक पैसा मिलने की जानकारी प्राप्त कर ली थी। वही रीति-नीति अपनायी। पेड़ अच्छे और बड़े थे। आसानी से कोयला बनने लगा। उसने एक के बजाय दो फेरी निकट के नगर में लगानी आरंभ कर दी ताकि दूनी आमदनी होने लगे। वनवासी बहुत प्रसन्न था। अधिक पैसा मिल जाने पर उसने अधिक सुविधा सामग्री खरीदनी आरम्भ कर दी और अधिक शौक मौज से रहने लगा।

दो वर्ष में चन्दन का प्रायः पूरा उद्यान कोयला बन गया। एक ही पेड़ बचा। एक दिन वर्षा होने से कोयला तो न बन सका। कुछ प्राप्त करने के लिए पेड़ से एक डाली काटी और उसे ही लेकर नगर गया। लकड़ी में से भारी सुगंध आ रही थी। खरीददारों ने समझ लिया चह चंदन है। कोयले की तुलना में दस गुना अधिक पैसा मिला। सभी उस लकड़ी की माँग करने लगे। कहा कि- “भीगी लकड़ी के कुछ कम दाम मिले हैं। सूखी होने पर उसकी और भी अधिक कीमत देंगे।

वन वासी पैसे लेकर लौटा और मन ही मन विचार करने लगा। यह लकड़ी तो बहुत कीमती है। मैंने इसके कोयले बनाकर बेचने की भारी भूल की, यदि लकड़ी काटता बेचता रहता तो कितना धनाढ्य बन जाता और इतनी सम्पदा इकट्ठी कर लेता जो पीढ़ियों तक काम देती।

राजा के पास जाने व पुनः याचना कर अपनी मूर्खता दर्शाने में कोई सार न था। शरीर भी बुड्ढा हो गया था। कुछ अधिक पुरुषार्थ करने का उत्साह नहीं था। झाड़ियाँ काटकर कोयले बनाने और पेट पालने की वही पुरानी प्रक्रिया अपना ली और जैसे-तैसे गुजारा करने लगा।

मनुष्य जीवन चंदन उद्यान है इसकी एक-एक टहनी असाधारण मूल्यवान है। जो इसका सदुपयोग कर सकें, वे धन्य होंगे, जिनने प्रमाद बरता वे वनवासी की तरह पछतायेंगे।

👉 युग परिवर्तन का आधार भावनात्मक नव निर्माण (भाग ३)

यह हलचलें जन- जन में दृष्टिगोचर होंगी। समुन्नत आत्मा निजी सुख सुविधाओं को तिलाञ्जलि देकर विश्व के भावनात्मक नव निर्माण को इस युग की सर्वोत्तम साधना, उपासना, तपश्चर्या एवं आवश्यकता समझते हुए इसी में सर्वतो भावेन संलग्न होगी। साथ ही सामान्य स्तर के व्यक्तियों में इतना विवेक तो अनायास ही जागृत होगा कि वे अन्धकार और प्रकाश का अन्तर समझ सकें। अनुचित के लिए दुराग्रह छोड़कर न्याय और विवेक के आधार पर प्रतिदिन उचित को स्वीकार कर सकें। इस प्रकार उभय पक्षीय सुयोग संयोग उस प्रयोजन को अग्रगामी बनाता चला जायेगा जो युग परिवर्तन का मूलभूत आधार है।
    
आज की स्थिति को देखते हुए यह दोनों ही कार्य कठिन दीखते हैं। धर्म विडम्बना के सस्ते प्रलोभनों को तिरस्कृत कर धर्म प्रेमी लोग कष्ट साध्य परमार्थ में प्रवेश करेंगे यह कठिन है। बुद्धिजीवी अपनी अच्छी खासी सुविधाओं का परित्याग कर लोक मंगल के लिए दर- दर ठोकरें खायेंगे यह भी कठिन ही दीखता है। पर समय यह भी कराके छोड़ेगा। रीछ वानर अपने प्राण हथेली पर रख कर मौत से लड़ने गये थे। बुद्ध के ढाई लाख अनुयायी यौवन की उमंगों को कुचलते हुए भिक्षुक बनने की जटिल प्रक्रिया स्वीकार करने को सहमत हुए थे। गाँधी की पुकार पर लाखों ने अपनी बर्बादी को स्वीकार किया था। उसी प्रकरण को यदि इतिहास फिर दुहराए तो इसे न कठिन मानना चाहिए और न असंभव। जो भूतकाल में होता रहा है उसकी पुनरावृत्ति को कठिन या जटिल मानने का कोई कारण नहीं। समय की पुकार इस कष्टसाध्य प्रक्रिया को भी पूरा करके रहेगी। जीवन्त और जागृत आत्माओं का एक बड़ा वर्ग निकट भविष्य में ही आगे आवेगा और ज्ञान तंत्र का ऐसा विशालकाय शस्त्रागार खड़ा करेगा, जिसकी सहायता से अनाचार की लंका को ध्वस्त किया जा सके।
    
धर्म अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होगा। उसके प्रसार प्रतिपादन का ठेका किसी वेश या वंश विशेष पर न रह जायेगा। सम्प्रदाय वादियों के डेरे उखड़ जायेंगे, उन्हें मुफ्त के गुलछर्रे उड़ाने की सुविधा छिनती दीखेगी तो कोई उपयोगी धंधा अपनाकर भले मानसों की तरह आजीविका उपार्जित करेंगे। तब चरित्र, परिष्कृत ज्ञान एवं लोक मंगल के लिए प्रस्तुत किया गया अनुदान ही किसी को सम्मानित या श्रद्धास्पद बना सकेगा। पाखण्ड पूजा के बल पर जीने वाले उलूक उस दिवा प्रकाश से भौंचक होकर देखेंगे और किसी कोटर में बैठे दिन गुजारेंगे। अज्ञानान्धकार में जो पौ बारह रहती थी उन अतीत की स्मृतियों को वे ललचाई दृष्टि से सोचते तो रहेंगे पर फिर समय लौटकर कभी आ न सकेगा।
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 You are the Architect of Your Destiny

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If you depend upon others or look for someone’s help in the moments of difficulty, you must be living under some illusion. Otherwise, you would identify the root-cause of the problems you are facing and analyze your own vices and flaws that might have been responsible for those troubles. By overcoming those drawbacks and weaknesses, you would be best equipped to resolve or get rid of most of your problems on your own.

With the aspiration of being progressive and successful, you should also begin adopting virtuous tendencies and sharpening and enhancing your potentials. Your destiny is indeed written according to your intrinsic nature, inner qualities. Intense impressions of your tendencies, sentiments and thinking and conduct, account for shaping of your inner personality, which is attributed to be the architect of your future evolution. God’s system works according to – “you harvest what you have sown”. If good qualities, abilities are not cultivated by you, and the seeds of virtues are left in a virgin (dormant) state within your self, and instead, negative tendencies, follies, untoward habits are allowed to accumulate and grow, God’s rule will formulate your destiny as full of sufferings; you will not have a good fate or hopes in future unless and until you refine yourself and inculcate the potentials of elevation. So it is in fact in your own hand to design your destiny.

If you awaken your self-confidence, set high ideals as your goal and sincerely endeavor to make yourself capable and deserving for that goal, God’s script will indeed destine you to have a bright and successful life accordingly. If you think wisely, know yourself and earnestly search for the illumined goal, you will certainly find the righteous path to achieve it at the right moment.

📖 Akhand Jyoti, Sept. 1943

👉 अनाचार से कैसे निपटें? (भाग २)

आकर्षक लगने वाली सभी वस्तुएं उपयोगी नहीं होतीं। सर्प, बिच्छू, काँतर, कनखजूरे जैसे प्राणी देखने में सुन्दर लगते हैं पर उनके गुणों को देखने पर पता चलता है  कि वे समीप आने वाले को कितना त्रास देते हैं ? प्रथम पहचान में ही न किसी का मित्र बनना चाहिए और न किसी को बनाना चाहिए। चरित्र के बारे में बारीकी से देखना, समझना और परखना चाहिए। मात्र शालीनता के प्रति आशा रखने वाले और आदर्शों का दृढ़तापूर्वक अवलम्बन करने वाले ही इस योग्य होते हैं कि उनसे घनिष्टता का सम्बन्ध स्थापित किया जाए।   
   
बड़ी बात दुर्जनों को समझाकर सज्जनता के मार्ग पर लाना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि उनके गिरोह को छिन्न-भ्न्न करने से लेकर घात लगाने की चलती प्रक्रिया में कारगर अवरोध खड़े कर देना। इसके लिए जनसाधारण को साहस जगाने वाला प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, प्रतिरोध कर सकने वाली साहसिक मंडलियों का गठन किया जाना चाहिए और सरकरी तंत्र तक यह आवाज पहुँचाई जानी चाहिए कि उसके भागीदार अधिकारी कर्मचारी उस कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करें जिसके लिए उन्होंने जिम्मेदारी कंधे पर उठाई है। इस कार्य में उन्हें जहाँ भी कठिनाई अनुभव हो रही हो, उसे दूर करने के लिए जागरूक नागरिकों को समुचित प्रयत्न करना चाहिए। जनता का साहस, सुरक्षा बलों का पराक्रम और सरकारी तंत्र का समुचित योगदान यदि मिलने लगे तो गुंडा गर्दी का उन्मूलन उतना कठिन न रहेगा जितना अब है।
   
हर व्यक्ति अपने को ऐसा चुस्त-दुरुस्त रखे जिससे प्रतीत हो कि वह किसी भी आक्रमण का सामना करने के लिए तैयार है। यह कार्य प्राय: एकाकी होने पर नहीं बन पड़ता, समूह में अपनी शक्ति होती है। मिल-जुलकर रहने और एक-दूसरे की क्षमता बनाए रहने पर आधी मुसीबत टल जाती है। आक्रमण अपना हाथ रोक लेते हैं और बढ़ते कदमों को पीछे हटा लेने पर विवश होते हैं। निजी हौसला बुलन्द रखने के अतिरिक्त अपने जैसे ही साहसी लोगों का संगठन बना लेना चाहिए और उनके साथ-साथ रहने,  साथ-साथ उठने-बैठने के अवसर बनाते रहने चाहिए। बर्रों के छत्ते में हाथ डालने में डर लगता है, पर यदि वह अकेली पास आ डटे तो उसका कचूमर निकालने के लिए कोई भी तैयार हो जाता है। मधुमक्खियों के छ्त्ते से आमतौर से लोग बचकर ही निकलते हैं। बन्दर समूह में रहते हैं और एक को छेड़ने पर दूसरे भी उनकी सहायता के लिए इकट्ठे हो जाते हैं – इस कारण लोग बन्दरों के झुंड को छेड़ते नहीं वरन् उससे बचकर ही निकलने में अपनी भलाई देखते हैं।         
 
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 26 मई 2020

👉 उत्तरदायित्व व प्राथमिकता पर ध्यान

जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थी। वो एकांत जगह की तलाश में घुम रही थी, कि उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी। उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिये।

वहां पहुँचते  ही उसे प्रसव पीडा शुरू हो गयी।
उसी समय आसमान में घनघोर बादल वर्षा को आतुर हो उठे और बिजली कडकने लगी।

उसने दाये देखा, तो एक शिकारी तीर का निशाना, उस की तरफ साध रहा था। घबराकर वह दाहिने मुडी, तो वहां एक भूखा शेर, झपटने को तैयार बैठा था। सामने सूखी घास आग पकड चुकी थी और पीछे मुडी, तो नदी में जल बहुत था।

मादा हिरनी क्या करती? वह प्रसव पीडा से व्याकुल थी। अब क्या होगा? क्या हिरनी जीवित बचेगी? क्या वो अपने शावक को जन्म दे पायेगी? क्या शावक जीवित रहेगा?

क्या जंगल की आग सब कुछ जला देगी? क्या मादा हिरनी शिकारी के तीर से बच पायेगी? क्या मादा हिरनी भूखे शेर का भोजन बनेगी?
वो एक तरफ आग से घिरी है और पीछे नदी है। क्या करेगी वो?

हिरनी अपने आप को शून्य में छोड, अपने बच्चे को जन्म देने में लग गयी। कुदरत का करिश्मा देखिये। बिजली चमकी और तीर छोडते हुए, शिकारी की आँखे चौंधिया गयी। उसका तीर हिरनी के पास से गुजरते, शेर की आँख में जा लगा, शेर दहाडता हुआ इधर उधर भागने लगा। और शिकारी, शेर को घायल ज़ानकर भाग गया। घनघोर बारिश शुरू हो गयी और जंगल की आग बुझ गयी। हिरनी ने शावक को जन्म दिया।

हमारे जीवन में भी कभी कभी कुछ क्षण ऐसे आते है, जब हम चारो तरफ से समस्याओं से घिरे होते हैं और कोई निर्णय नहीं ले पाते। तब सब कुछ नियति के हाथों सौंपकर अपने उत्तरदायित्व व प्राथमिकता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। अन्तत: यश, अपयश, हार, जीत, जीवन, मृत्यु का अन्तिम निर्णय ईश्वर करता है। हमें उस पर विश्वास कर उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए।

कुछ लोग हमारी सराहना करेंगे,
कुछ लोग हमारी आलोचना करेंगे।

दोनों ही मामलों में हम फायदे में हैं,

एक हमें प्रेरित करेगा और
दूसरा हमारे भीतर सुधार लाएगा।।

👉 युग परिवर्तन का आधार भावनात्मक नव निर्माण (भाग २)

युग परिवर्तन के जिस अभियान में हमें दिलचस्पी है वह चेतनात्मक उत्कर्ष ही है। इसके लिए ज्ञान तन्त्र को समर्थ और परिष्कृत करना पड़ेगा। इसका अर्थ यह नहीं कि भौतिक प्रगति व्यर्थ है। वह भी आवश्यक है, पर वह दूसरे लोगों का काम है, जिसे वे शक्ति भर सम्पन्न कर भी रहे हैं। सरकारें पंच वर्षीय योजनाएँ बनाती हैं। वैज्ञानिक शोध कार्यों में जुटे हुए हैं, अर्थशास्त्री व्यवसाय उत्पादन और वितरण का ताना- बाना बुन रहे हैं। सैन्य तन्त्र आयुधों के निर्माण और योद्धाओं के प्रशिक्षण में लगा है। शिक्षा शास्त्री बौद्धिक क्षमता के अभिवर्धन में लगे हैं। उपेक्षित तो ज्ञान तन्त्र ही पड़ा है उस नाम पर जो खड़ा है उसे तो विदूषकों जैसी विडम्बना ही कहा जा सकता है। धर्म के नाम पर जो कहा और किया जा रहा है उससे ऐसी आस्तिकता की अपेक्षा नास्तिकता भली प्रतीत होती है। ज्ञान तन्त्र यदि मानवीय सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन को उपेक्षा कर्मकाण्डों में ही उलझाये रहे और सातवें आसमान के सपने दिखाता रहे, कर्म को व्यर्थ और भक्ति को प्रधान कहता रहे तो उससे मानव समाज का, विश्व का कोई हित साधन न हो सकेगा। धर्म व्यवसायियों की आजीविका भले ही चलती रहे।
  
नव निर्माण के अवतरण की किरणें अगले दिनों प्रबुद्ध एवं जीवन्त आत्माओं पर बरसेंगी, वे व्यक्तिगत लाभ में संलग्न रहने की लिप्सा को लोक उत्सर्ग करने की आन्तरिक पुकार सुनेंगे। यह पुकार इतनी तीव्र होगी कि चाहने पर भी वे संकीर्ण स्वार्थ परता भरा व्यक्तिवादी जीवन जी ही न सकेंगे। लोभ और मोह की जटिल जंजीरें वैसी ही टूटती दीखेंगी जैसे कृष्ण जन्म के समय बन्दी गृह के ताले अनायास ही खुल गये थे। यों माया वृद्ध नर कीटकों के लिए वासना और तृष्णा की परिधि तोड़कर परमार्थ के क्षेत्र में कदम बढ़ाना लगभग असंभव जैसा लगता है। पेट और प्रजनन की विडम्बनाओं के अतिरिक्त वे क्या आगे की और कुछ बात सोच या कर सकेंगे? पर समय ही बतायेगा कि इसी जाल जंजाल में जकड़े हुए वर्गों में से कितनी प्रबुद्ध आत्माएँ उछल कर आगे आती हैं और सामान्य स्थिति में रहते हुए कितने ऐसे अद्भुत क्रिया कलाप सम्पन्न करती हैं, जिन्हें देख कर आश्चर्य चकित रह जाना पड़ेगा। जन्मजात रूप से तुच्छ स्थिति में जकड़े हुए व्यक्ति अगले दिनों जब महामानवों की भूमिका प्रस्तुत करते दिखाई पड़े तो समझना चाहिए युग परिवर्तन का प्रकाश एवं चमत्कार सर्व साधारण को प्रत्यक्ष हो चला।

निस्सन्देह युग परिवर्तन का प्रधान आधार भावनात्मक नव निर्माण ही होगा। जन मानस में इन दिनों झूठ मान्यताओं की भरमार है। सोचने की सही पद्धति एक प्रकार से विस्मृत ही हो गयी है। स्थिति का सही मूल्यांकन कर सकने वाला दृष्टिकोण हाथ से चला गया है। उसके स्थान पर भ्रान्तियों की चमगादड़ें विचार भवन के गुम्बदों में उलटी लटक पड़ी हैं। इस सारे कूड़े करकट को एक बार झाड़ बुहार कर साफ करना होगा और चिन्तन की इस परिष्कृत प्रक्रिया को जन मानस में प्रतिष्ठापित करना पड़ेगा जो मानवीय गरिमा के अनुरूप है। किसी धर्म सम्प्रदाय, सन्त या ग्रन्थ को बुद्धि बेच कर किसी का भी अन्धानुकरण न करने की बात हर किसी के मन में घुसती चली जायेगी और जो न्याय, विवेक, सत्य एवं तथ्य की कसौटियों पर खरा सिद्ध होगा उसी को स्वीकारने की प्रवृत्ति बढ़ेगी। इस आधार के प्रबल होते ही न अनैतिकताओं के लिए कोई स्थान रह जायेगा और न मूढ़ मान्यताओं के लिए। निर्मल और निष्पक्ष चिन्तन किसी भी देश, धर्म या वर्ग के व्यक्ति को उसी स्थान पर पहुँचा देगा, जिसके लिए भारतीय अध्यात्म अनादि काल से अंगुलि निर्देश करता रहा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 A blind boy

A blind boy sat on the steps of a building with a hat by his feet. He held up a sign which said: “I am blind, please help.”

There were only a few coins in the hat.

A man was walking by. He took a few coins from his pocket and dropped them into the hat. He then took the sign, turned it around, and wrote some words. He put the sign back so that everyone who walked by would see the new words.

Soon the hat began to fill up. A lot more people were giving money to the blind boy. That afternoon the man who had changed the sign came to see how things were.

The boy recognized his footsteps and asked, “Were you the one who changed my sign this morning? What did you write?”

The man said, “I only wrote the truth. I said what you said but in a different way.”

What he had written was: “Today is a beautiful day and I cannot see it.”

Do you think the first sign and the second sign were saying the same thing?

Of course both signs told people the boy was blind. But the first sign simply said the boy was blind. The second sign told people they were so lucky that they were not blind. Should we be surprised that the second sign was more effective?

Moral of the story: Be thankful for what you have. Be creative. Be innovative. Think differently and positively.

Invite others towards good with wisdom. Live life with no excuse and love with no regrets. When life gives you 100 reasons to cry, show life that you have 1000 reasons to smile. Face your past without regret. Handle your present with confidence. Prepare for the future without fear. Keep the faith and drop the fear.

Great men say, “Life has to be an incessant process of repair and reconstruction, of discarding evil and developing goodness…. In the journey of life, if you want to travel without fear, you must have the ticket of a good conscience.”

The most beautiful thing is to see a person smiling. And even more beautiful is, knowing that you are the reason behind it.

👉 अनाचार से कैसे निपटें? (भाग १)

कीचड़ में कमल उगना एक सुयोग है। आमतौर से उसमें गंदे कीड़े ही कुलबुलाते रहते हैं। जिन्होंने लोकप्रवाह में बहने के लिए आत्म समर्पण कर दिया, समझना चाहिए उनके लिए नर-पशु स्तर का जीवनयापन ही भाग्य विधान जैसा बन गया। वे खाते, सोते, पाप बटोरते और रोते-कलपते मौत के मुँह में चले जाते हैं। स्रष्टा ने मनुष्य जीवन का बहुमूल्य जीवन धरोहर के रूप में दिया था, होना यह चाहिए था कि इस सुयोग का लाभ उठाकर अपनी अपूर्णता पूर्णता में बदली गयी होती और विश्वमानव की सेवा-साधना में संलग्न रहकर देवमानव की भूमिका में प्रवेश करके धन्य बना जाता, असंख्यों को सन्मार्ग में चलाकर सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन का अजस्र पुण्य कमाया गया होता। यह तो बन नहीं पड़ता, उल्टे पाप का पिटारा सिर पर लादकर लंबे भविष्य को अन्धकारमय बनाया जाता है।

सत्य परायणों और न्यायनिष्ठों को समय-समय पर दूसरों की सहायता भी मिलती रही है, इतिहास इसका साक्षी है। यदि ऐसा न हुआ होता तो बहुसंख्यक कुकर्मियों ने इस संसार की समूची शालीनता का भक्षण कर लिया होता। सत्यनिष्ठ एकाकी होने के कारण सर्वत्र पराजित-पराभूत हो गए होते किन्तु ऐसा हुआ नहीं। प्रहलाद पथ के अनुयायी कष्ट सहकर भी अपनी विजय ध्वजा फहराते हैं। ईसा मरकर भी मरे नहीं, सुकरात की काया नष्ट होने पर भी उसका यश, वर्चस्व और दर्शन अपेक्षाकृत और भी प्रखर हुआ, व्यापक बना। गोवर्धन पर्वत उठाए जाने का संकल्प आरम्भ में असंभव लगता रहा होगा, पर समय ने सदुद्देश्य का साथ दिया और सत्संकल्प ने विजय दुंदुभी बजाई।
  
विलासिता, सज-धज और ठाट-बाट की आड़ में बढ़ता हुआ खर्च किसी को भी कुमार्ग पर ढकेल सकता है। सीमित और आवश्यक खर्च की पूर्ति तो सही हो सकती है, पर असाधारण खर्च की पूर्ति के लिए तो गलत तरीके ही अपनाने होते हैं।

अपराधी प्रवृत्ति एक प्रकार की छूत वाली बीमारी है जो पहले परिवार के नवोदित सदस्यों पर आक्रमण करती है। कुकर्मी लोगों की संतानें भी अनैतिक कार्यों में ही रुचि लेती हैं और उन्हीं की अभ्यस्त बनती हैं। इसके अतिरिक्त ऐसा भी होता है कि जिनके साथ उनकी घनिष्टता है, उन्हें भी उसी पतन के गर्त में गिरने का कुयोग बने। ऐसे लोग प्रयत्नपूर्वक अपना संपर्क क्षेत्र बढ़ाते हैं और उद्धत आचरणों के फलस्वरूप तत्काल बड़े लाभ मिलने के सब्जबाग दिखाते हैं। आरम्भ में हिचकने वालों की हिम्मत बढ़ाने के लिए कितने ही इस आधार पर बड़े-बड़े लाभ प्राप्त कर लेने के मन गढ़न्त वृतान्त सुनाते हैं। जिन्हें सच मानने और उस प्रकार का आचरण करने में अपनी भी उपयोगिता देखकर सहज ही तैयार हो जाते हैं। गिरोह बनता है और साथियों की सहायता से अपराधी लोगों का समुदाय बनता है। संगठित प्रयत्नों की सफलता सर्व विदित है। अनाचार पर उतारू लोग भी आक्रामक नीति अपनाकर आरम्भिक सफलता तो प्राप्त कर ही लेते हैं, पीछे भले ही उनके भयानक दुष्प्रिणाम भुगतने पड़ें।  

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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