मंगलवार, 2 जून 2020

👉 Hmara Chhtni Karyakrm हमारा छटनी-कार्यक्रम और उसका प्रयोजन

आज तो भावनात्मक दृष्टि से खोटे और ओछे व्यक्ति भी अपने निजी लाभ को दृष्टि से हमें घेरे रहते हैं। अधिक भीड़ उन्हीं की रहती है। यह भीड़ छट जाने से जो शक्ति बचेगी उसे सीमित क्षेत्र में अधिक सावधानी से लगाया जा सकेगा और उसका लाभ भी बहुत होगा। छटनी के पीछे एक रहस्यपूर्ण प्रयोजन और भी है जिसकी चर्चा हमने अज्ञातवास से लौटते ही कर दी थी। वह यह कि युग निर्माण का प्रयोजन साधारण मनोभूमि के घटिया, स्वार्थी, ओछे, कायर और कमजोर प्रकृति के लोग न कर सकेंगे। इसके लिए समर्थ, तेजस्वी आत्मायें अवतरित होंगी और वे ही इस कार्य को पूरा करेंगी। सीमेंट, लोहे का लेन्टर डालकर छत्ते पाटी जाती हैं तो उसका वजन उठाने के लिए बाँस-बल्ली का ढाँचा खड़ा कर लेते हैं, छत डालते समय वजन वही उठाता है, पीछे जब छत पक जाती है तब उस ढाँचे को निकाल कर अलग कर देते हैं।

युग परिवर्तन का महान कार्य तेजस्वी, मनस्वी एवं तपस्वी आत्माओं द्वारा सम्भव होगा। हम लोग जो तनिक-सा त्याग, बलिदान का प्रसंग आ जाने पर बगलें झाँकने लग जाते हैं, उतने बड़े कार्य को कर सकने के योग्य नहीं। जिस मिट्टी से हम बने हैं रेतीली और कमजोर है कोई टिकाऊ चीज उससे कैसे बन सकती है। जो एक-दो माला जप करने मात्र से तीनों लोक की ऋद्धि-सिद्धियाँ लूटने की आशा लगाये बैठे रहते हैं और जीवन-शोधन तथा परमार्थ की बात सुनते ही काठ हो जाते हैं ऐसे ओछे आदमी अध्यात्म का क, ख, ग, घ, भी नहीं जानते। आत्मबल तो उनके पास होगा ही कहाँ से।

जिसके पास आत्मबल नहीं वह युग-परिवर्तन की भूमिका में कोई कहने लायक योगदान दे भी कहाँ से सकेगा? इस तथ्य से हम भली प्रकार अवगत हैं। अपनों की नसनब्ज हमें भली प्रकार मालूम है। इसलिए उनसे इतनी ही आशा करते हैं कि छत का लेन्टर बनाने से बाँस-बल्ली की तरह थोड़ी देर अपना उपयोग कर लेने दें तो बाँस बहुत हैं। छत तो सीमेंट, कंक्रीट, लोहे की छड़ आदि के योग से बनेगी और उसे कुशल कारीगर बनावेंगे। बाँस-बल्ली का ढाँचा तो मामूली मजदूर भी बाँध देता है पर लेन्टर को बढ़िया कारीगर इंजीनियर ही ठीक तरह डाल सकते हैं। हम युग-निर्माण योजना के विशाल भवन का ढाँचा खड़ा करने वाले मामूली से मजदूर मात्र हैं। परिजन जिस मिट्टी से बने हैं उसे देखते हुए उन्हें भी हम बाँस-बल्ली मात्र ही मानते हैं। थोड़ा-सा वजन पड़ने पर जो लचक जाय, जरासी परख का अवसर आये तो दाँत निकाल दें, ऐसे लुँजपुँज व्यक्ति युग-परिवर्तन जैसी कठोर प्रक्रिया को कैसे पूरा करेंगे? जिसमें निज की कड़क नहीं वह वजन कैसे उठावेगा ?

भारतीय महान गौरव एवं वर्चस्व को पुनः अपने स्थान पर प्रतिष्ठापित करने के लिए अगले दिनों विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली आत्माएं आवश्यक संख्या में इस देश में अवतरित होंगी। व्यास, वशिष्ठ, भारद्वाज, याज्ञवल्क्य, कपिल, कणाद, विश्वामित्र, दधीच जैसे ऋषि, भीम, अर्जुन, हनुमान, अंगद, जैसे योद्धा, नागार्जुन, रावण, जैसे वैज्ञानिक गाँधी, तिलक, मालवीय, लाजपतराय जैसे नेता, शिवाजी, प्रताप, गोविन्दसिंह, जैसे देशभक्त अरविन्द, विवेकानन्द, रामतीर्थ जैसे ज्ञानी, चरक, सुश्रुत, वागभट्ट जैसे चिकित्सक, सीता, सावित्री, अरुन्धती, अनुसूया, गाँधारी, द्रौपदी, लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई जैसी नारियाँ अगले दिनों अवतरित होंगी। जब कभी भी युग-परिवर्तन के समय आये हैं तब इस महान प्रयोजन को पूरा कर सकने में समर्थ आत्माओं का भी अवतरण हुआ है। अब भी वही होने जा रहा है।

ऐसी आत्माएं जब अवतरित होती हैं जब अपने योग्य वातावरण ढूँढ़ती हैं। मधुमक्खियाँ और भौंरे पुष्प कुञ्जों के आधार पर ही जीवित रहते हैं,मछली को जलाशय चाहिए, यह परिस्थितियाँ न मिलें तो वे जीवित न रहेंगे। महान आत्माएं केवल अच्छे पारिवारिक वातावरण में जन्मती हैं। यदि प्रारब्धवश किसी अनुपयुक्त परिवार में जन्म लेती हैं तो अल्पायु में ही चली जाती हैं। दशरथ और कौशल्या ने भगवान राम को अपनी गोद में खिलाने के लिये तीन जन्मों तक लगातार तप किया था, तब उन दोनों का गुण-कर्म स्वभाव ऐसा बना था कि उसमें उच्च आत्माओं का अवतरण सम्भव हो सके। धन ऐश्वर्य भले ही न हो, गरीबी कितनी ही क्यों न हो,पर भावनात्मक दृष्टि से जहाँ का वातावरण उपयुक्त हैं,वहीं दिव्य आत्माओं का जन्म ले सकना सम्भव होगा। गिद्ध और सियार मृत लाश की गंध पाकर दूर-दूर से इकट्ठे हो जाते हैं इसी प्रकार परिष्कृत पारिवारिक वातावरण की तलाश में दिव्य आत्माएं घूमती रहती हैं और जब उपयुक्त स्थान मिल जाता है तो वे प्रसन्नतापूर्वक वहाँ जन्मती हैं। कहना न होगा कि जिन घरों में ऐसी उच्च आत्माएं जन्में उसके यश, गौरव, महत्व एवं आनन्द का बार-पार नहीं रहता।

अगले दिनों जो दिव्य आत्माएं युगनिर्माण का महान-आयोजन पूरा करने लिए अवतरित होने वाली हैं उन्हें अपने उपयुक्त परिस्थितियों की आवश्यकता पड़ेगी। इस आवश्यकता की पूर्ति हमें करनी चाहिए जिसमें कोई ऊँची जीवात्मा आवे तो वह घुटन अनुभव न करे। जिससे उसे अपने अनुकूल भावात्मक वातावरण मिल सके। जहाँ ऐसा वातावरण बन जायगा, वहाँ फिर इस बात की भी व्यवस्था हो सकती है कि वहाँ कोई महान् विभूति जन्म ले।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखंड ज्योति अगस्त १९६६

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