रविवार, 1 मार्च 2020

👉 Quest for Joy

Man wanders all the time, throughout his life, in search of joy, blissful peace, but remains dismayed and astray…. Acquisition of hoards of wealth, worldly comforts, good health, delicious food, palatial house, vehicles, servants, gorgeous cloths, beauty, beloved family, faithful friends, supporters all around, powers, prestige, name and fame, security…., and what not he looks for? People who lack in any of these strive for their possession; those, who already have, try to possess more with new passions…

This scenario is like that of the tale of the swan (flamingo), which is hunting for the pearl since Ages, but finds nothing but a drop of dew… Why? Because, it did not really search for the pearl; did not even turn his face in the direction of the grand Ocean “Mansarovar” where the pearl is hidden in the depths… It did not gather the courage and strength to fly so long… Short-sighted intellect and pleasure-hungry mind advised it – “what is the guarantee that you will find that unseen “Mansarovar”; and who knows whether there will really be any pearl and you would trace it” so it satisfied itself with the shining drops of dew; licked it and thought it has quenched the thirst…; it flew for sometime and the thirst recurred with greater intensity. The cycle continued…

This is what happens with most of us who keep searching for ‘immortal’ joy in the mirage of perishable world, keep accumulating more of what gives only a momentary pleasure but keeps us away from the sight of real bliss…

📖 Akhand Jyoti, March. 1940

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

👉 शान्त विचारों की ठोस शक्ति (भाग २)

गम्भीर परिस्थितियों में मन का शान्त रहना इस बात का प्रतीक है कि व्यक्ति को किसी भारी व्यक्ति का सहारा मिल गया है। शान्त मन रहने से प्रतिकूल परिस्थितियाँ थोड़े ही काल में अनुकूल परिस्थितियों में परिणत हो जाती हैं। शान्त लोगों की शक्ति का दूसरे लोगों के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वास्तव में हमारी ही शक्ति दूसरे की शक्ति के रूप में प्रकाशित होती है। यदि किसी व्यक्ति का निश्चय इतना दृढ़ हो कि चाहे जो परिस्थितियाँ आवें उसका निश्चय नहीं बदलेगा तो वह अवश्य ही दूसरे व्यक्तियों के विचारों को प्रभावित करने में समर्थ होगा। जितनी ही किसी व्यक्ति की मानसिक दृढ़ता होती है उसके विचार उतने ही शान्त होते हैं। और उसकी दूसरों को प्रभावित करने की शक्ति उतनी ही प्रबल होती है। शान्त विचारों का दूसरों पर और वातावरण पर प्रभाव धीरे-धीरे होता है। उद्वेगपूर्ण विचारों का प्रभाव तुरन्त होता है। हम तुरन्त होने वाले प्रभाव से विस्मित होकर यह सोच बैठते हैं कि शान्त विचार कुछ नहीं करते और उद्वेगपूर्ण विचार ही सब कुछ करते हैं। पर जिस प्रकार किसी बीज को वृक्ष रूप में परिणत होने के लिए शान्त शक्तियों को काम करने की आवश्यकता होती है, इसी प्रकार किसी विचार को फलित होने के लिए शान्त होने की आवश्यकता होती है और उसका कार्य अवश्य जगत में होता है।

शान्त विचारों से शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन हो जाते हैं। लेखक का एक मित्र 20 वर्ष का युवक हो चुका था। इस समय भी वह ऊँचाई और मोटाई में एक चौदह वर्षीय बालक के समान लगता था। उसने किसी शुभ चिन्तक के सुझाने पर नियमित रूप से व्यायाम करना प्रारम्भ किया। थोड़े ही दिनों में वह चार इंच बढ़ गया और उसका शरीर भी पुष्ट हो गया। उसकी समझ थी कि व्यायाम ने उसे बढ़ा दिया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि व्यायाम से उसे लाभ हुआ, पर उससे भी अधिक लाभ उसके निश्चय से हुआ। इस निश्चय के कारण प्रतिदिन के शान्त विचार उसकी भावना को प्रयत्न करते गये और इस प्रकार उसके शरीर में मौलिक परिवर्तन होते गये।

हम जो कुछ सोचते हैं उसका स्थायी प्रभाव हमारे ऊपर तथा दूसरों के ऊपर पड़ता है। शान्त विचार धीरे-धीरे हमारे मन को ही बदल देते हैं। जैसे हमारे मन की बनावट होती है वैसे ही हमारे कार्य होते हैं। और हमारी सफलता भी उसी प्रकार की होती है। हम अनायास ही उन कार्यों में लग जाते हैं जो हमारी प्रकृति के अनुकूल हैं, और उन कार्यों से डरते रहते हैं जो हमारी प्रकृति के प्रतिकूल हैं। अपने स्वभाव को बदलना हमारे हाथ में है। यह अपने शान्त विचारों के कारण बदला जा सकता है। स्वभाव के बदल जाने पर मनुष्य को किसी विशेष प्रकार का कार्य करना सरल हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 11

👉 आत्म विश्वास ईश्वर का अजस्र वरदान

पुलिस का सशस्त्र गारद साथ रहने पर सुरक्षा की निश्चिंतता हो जाती है और निर्भय आश्वस्त रहा जा सकता है। जिसे ईश्वर पर उसकी सर्व शक्ति सत्ता पर विश्वास है उसे किसी से भी डरना न पड़ेगा। जिसे ईश्वर पर भरोसा है और जो उसे अपने भीतर हर घड़ी विद्यमान अनुभव करता है उसे आत्म विश्वास की कमी क्यों रहेगी? ऊपर से— अपनी महानता और सम्भावना से आस्था खो बैठा उसे नास्तिक के अतिरिक्त और क्या कहा जायगा?

जो अपने ऊपर भरोसा करता है, उसी पर दूसरे भी भरोसा करते हैं। जो अपनी सहायता आप करता है, उसी की सहायता ईश्वर भी करता है। हो सकता है कि कोई निष्ठावान असफल रहा है। सम्भव है किसी कुशल किसान की फसल मारी जाय पर जिनने भी कृषि में कमाई की है उनमें से प्रत्येक को जोतने और बोने का श्रम करना पड़ा।

आत्म विश्वास ही शक्ति का स्रोत है। प्रगति के किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकना उसी के सहारे सम्भव हो सकता है। जो ईश्वर भाग्य का निर्माण करता है उसका दूसरा नाम आत्म विश्वास है। उसी की प्रेरणा से ऐसे प्रचण्ड पुरुषार्थ का उद्भव होता है। जिसके लिए दुर्गम पर्वतों को भी रास्ता देना पड़े। वस्तुतः ईश्वर का एकमात्र दिव्य उपहार जो मनुष्य को मिलता है— आत्म विश्वास ही है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जून 1974 पृष्ठ 1

👉 Rise! Have Courage

Please Note! Adversities and obstructions are there for your own good. They occur to activate your strength and trigger its constructive use. Hidden beneath them is the spring of joy. Those who have never faced any hindrances or struggled against hardships would not know the real taste of happiness and success in life. Only those who have accepted these challenges with courage and stability and conquered over against struggles in their lives are worthy of being called achievers, distinguished heroes. It is only the lives of such great people that deserve to be dignified.

So don’t loose heart. Awaken! Rise! And look at the Almighty – the Divine Light of your Life-Force. God has not sent you in human form without any purpose. He has endowed you with immense potentials; it’s your duty to make use of them. Sufferings and sorrows surface in our world only until we don’t sacrifices our narrow self-interests for greater aims in life. A sapling sprouts and a tree grows from only that seed which dissolves self-existence in the soil; flowers and fruits illustrate its accomplishments and expand its glory.

So, Be Happy and face all testing moments with smile and courage. Have unflinching faith in the eternal truth that your soul is omnipotent. This is what corresponds to having faith in God. The force of this intrinsic faith would wane out all your fears and weaknesses. Its impetus will awaken your inner strength by which you can eliminate all hindrances and win all battles of life.

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1940

👉 अद्वैत का ज्ञान - भक्ति की अनन्यता

अद्वैत का ज्ञान दरअसल अपनी आत्मा और आत्मीयता के अनन्त असीमित विस्तार का अनुभव है। ऐसा अनुभव जिसमें जड़-चेतन सभी स्वयं की आत्मचेतना में समाए नजर आते हैं। पर्वत-नदी-झरने, वृक्ष-वनस्पति, देव-दानव-मानव, पशु-पक्षी यहाँ तक कि कीट-पतंगों में अपनी ही आत्मा प्रकाशित नजर आती है। छोटे-बड़े, ऊँच-नीच, कुल-जाति यहाँ तक कि जड़-चेतन का कोई भेद यहाँ मिथ्या और मायिक अनुभव होता है। आत्मा का यह अनन्त विस्तीर्ण अनुभव ही ब्रह्म है। जिन्हें कठिन तप से यह अनुभूति मिली उन्होंने इसे अभिव्यक्त करते हुए कहा- ‘अहं ब्रह्मास्मि’।
  
परन्तु जिन्होंने तप और साधना को दरकिनार कर केवल पोथियों के पन्ने उलटे उन्होंने इस महान् अनुभव को अपने तर्कों से विकृत और भोंड़ा बना दिया। वे सब ब्रह्मास्मि को भूल अहं में अटक गए। अपनी इस भटकन को उन्होंने सही साबित करने के लिए शास्त्र रचे, तर्क जाल फैलाया। इसका प्रभाव जहाँ और जिन पर भी पड़ा उन सभी के हृदय संवेदना रस से शून्य होते गए। इससे कुछ ऐसा हो गया जैसे कि उतप्त गर्मी के दिन आते हैं और सूरज की तपन से धरती सूख जाती है और दरारें पड़ जाती है।
  
इस शुष्कता से, कण्ठ सुखाने वाली तृषा से उबरने के लिए भक्ति की वर्षा चाहिए। अद्वैत ज्ञान के अनुभव को विकृत बनाने वाले सभी प्रयासों को समाप्त करने के लिए अनन्य भक्ति चाहिए। अनन्य का अर्थ है, अन्य अन्य न रहा, अब अनन्य हो गया। कहीं कोई अब दूसरा न रहा, सभी एक हो गए। इस पथ पर चलने वाला भक्त पहले भक्ति में भीगकर स्वयं को प्रभु के साथ अनन्य अनुभव करता है। फिर वह अपने प्रियतम परमात्मा में अनन्त-अनन्त ब्रह्माण्डों की एकात्मता को अनुभव करता है। वह यह अनुभव कर लेता है कि अहंता के विसर्जित होते ही परमात्म चेतना का अद्वैत स्वतः प्रकट हो जाता है। अद्वैत की इस मिठास में उसे केवल ब्रह्मास्मि का अनुभव होता है, अहं तो यहाँ ढूँढने पर भी नहीं मिलता।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९८

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

👉 रूपान्तरण

प्रभु का स्मरण सतत् हो, उनमें समर्पण निरन्तर हो, तो जीवन में अनोखा रूपान्तरण घटित होता है। कुछ ऐसा, जैसे कि मिट्टी फूल बन जाती है और गन्दगी खाद बनकर सुगन्ध में बदल जाती है। मनुष्य के विकार भी शक्तियाँ हैं, जो प्रभु के स्मरण और प्रभु में समर्पण से रूपान्तरित हो जाती हैं। आज जो मनुष्य में पशु जैसा दिखता है, वही दिशा परिवर्तित होने से दिव्यता को उपलब्ध हो जाता है।
  
जीवन का आध्यात्मिक सच यही है कि इसमें जो अदिव्य दिखता है, वह भी बीज रूप में दिव्य है। अपने दृष्टिकोण में यदि आध्यात्मिकता आ सके तो पता चलता है कि वस्तुतः अदिव्य एवं अपवित्र कुछ भी नहीं है। सभी कुछ यहाँ दिव्य है। भेद केवल उस दिव्यता की अभिव्यक्ति के हैं।
  
भगवान् का स्मरण और भगवान् में समर्पण होने से कुछ भी घृणा, द्वेष एवं वैर योग्य नहीं रह जाता। सच तो यह है कि जो एक छोर पर पशु है, वही दूसरे छोर पर प्रभु है। पशु और प्रभु में विरोध नहीं विकास है। यह सत्य आत्मसात हो सके तो फिर आत्मदमन, उत्पीड़न और संघर्ष व्यर्थ हो जाते हैं। भला कहीं कोई अपने को टुकड़ों में तोड़कर सुखी होता है। यह तरीका आत्मशान्ति का नहीं बल्कि आत्मसन्ताप का है। इससे ज्ञान नहीं अज्ञान गहरा होता है।
  
स्वयं की चेतना के किसी अंश को नष्ट नहीं किया जा सकता। इसका दमन भी अधिक समय के लिए सम्भव नहीं है। क्योंकि जिसका दमन किया गया है, जिसे हराया गया है, उसका निरन्तर दमन करना पड़ता, उसे निरन्तर पराजित करना होता है। यह पूर्ण विजय का मार्ग का नहीं है। पूर्ण विजय का मार्ग तो रूपान्तरण है। इसमें दमन नहीं बोध है। इसमें गन्दगी को हटाना नहीं उसे खाद बनाना होता है। परमात्मा का निरन्तर स्मरण और उनमें सतत् समर्पण ही वह रसायनशास्त्र है, जिससे यह सम्भव है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९७

👉 शान्त विचारों की ठोस शक्ति (भाग १)

हमारे मन में दो प्रकार के विचार आते हैं- एक उद्वेगयुक्त और दूसरे शान्त। भय, क्रोध, शोक लोभ आदि मनोवेगों से पूरित विचार उद्वेगयुक्त विचार हैं और जिसके विचारों में मानसिक उद्वेगों का अभाव रहता है उन्हें शान्त विचार कहा जाता है। हम साधारणतः विचारों के बल को उससे सम्बन्धित उद्वेगों से ही नापते हैं। जब हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति क्रोध में आकर कोई बात कह रहा है तो हम समझते हैं कि वह व्यक्ति अवश्य ही कुछ कर दिखावेगा। पर क्रोधातुर व्यक्ति से उतना अधिक डरने का कारण नहीं जितना कि शान्त मन के व्यक्ति से डरने का कारण है। भावावेश में आने वाले व्यक्तियों के निश्चय सदा डावाँडोल रहते हैं। भावों पर विजय प्राप्त करने वाले व्यक्ति के निश्चय स्थिर रहते हैं। वह जिस काम में लग जाता है उसे पूर्ण करके दिखाता है।

उद्वेगपूर्ण विचार वैयक्तिक होते हैं उनकी मानसिक शक्ति वैयक्तिक होती है शान्त विचार वृहद मन के विचार हैं उनकी शक्ति अपरिमित होती है। मनुष्य जो निश्चय शान्त मन से करता है उसमें परमात्मा का बल रहता है और उसमें अपने आपको फलित होने की शक्ति होती है। अतएव जब कोई व्यक्ति अपने अथवा दूसरे व्यक्ति के लिये कोई निश्चय करता है और अपने निश्चय में अविश्वास नहीं करता तो निश्चय अवश्य फलित होता है। शान्त विचार सृजनात्मक और उद्वेगपूर्ण विचार प्रायः विनाशकारी होते हैं। किसी भी प्रकार के विचार में अपने आपको फलित करने की शक्ति होती है। पर यह शक्ति सन्देह के कारण नष्ट हो जाती है। जिन विचारों का हेतु वैयक्तिक होता है उनमें अनेक प्रकार के सन्देह उत्पन्न होते हैं। अतएव उनके विचार की शक्ति नष्ट हो जाती है। जब कोई मनुष्य अपने विचारों में किसी भी प्रकार का संदेह नहीं लाता तो वे विचार स्वतः ही फलित हो जाते हैं। सन्देहों को रोकने के लिए अपनी आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास होना आवश्यक है।

अपने आपकी ही अनुकूलता ईश्वर और प्रकृति की अनुकूलता के विश्वास के रूप में मनुष्य की चेतना को समक्ष आती हैं। ये भावनायें अच्छे तन-मन की अनुभूति के प्रतिभास मात्र हैं। मनुष्य अपनी आन्तरिक अनुभूति के अनुसार अनेक प्रकार की कल्पनाओं को रचता है। इन कल्पनाओं की वास्तविकता उसकी अज्ञात वास्तविक प्रेरणा पर निर्भर करती है। कल्पनायें वैसी ही आती हैं जैसी उसकी आन्तरिक प्रेरणा होती है। मनुष्य की प्रेरणा ही उसे आशावादी और निराशावादी बनाती है। अर्थात् मन का जैसा रुख रहता है उसी प्रकार की कल्पनायें मन करने लगता है। ईश्वरवादी विश्वास करने लगता है कि ईश्वर उसे आगे ले जा रहा है और जड़वादी विश्वास करने लगता है कि प्रकृति उसे आगे ले जा रही है। प्रगति और अप्रगति के सभी प्रमाण मनुष्य के रुख पर निर्भर रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 10

Q.9. What is “VAAM MARG”? (Part 9)

Ans. Yogic Sadhanas are carried out in two ways. These are designated as the ‘Dakchin Marg’ and ‘Vaam Marg’ or Tantra. References in this book pertains to the Dakchin Marg - which is the process (Sadhana) of attracting the omnipresent powers of divinity, interacting with them by developing spiritual magnetism and cultivating paranormal faculties therefrom. The Vaam Marg, on the other hand, is the technique of pulling out bio-energy from living beings and utilizing it for exercising psychic control over others and for exorcist activities.

The source of Tantrik power is not the universal divine powers, but the physical energy produced by friction of subtle particles of nature rotating around their axes at tremendous speeds. Tantriks call this energy as Durga or Kali.

In practice, the Tantrik excites the bio-energy of an animate being  by violently killing it or inflicting excruciating pain on it by extraction of flesh or blood. It is tempting for some highly egoistic and ambitious persons to acquire extraordinary powers  through Tantra, But its practise is extremely complex and dangerous. Only an extraordinarily courageous and fearless person learning under an expert can achieve success in Tantra. There are numerous instances of persons becoming mentally deranged, permanently paralysed, sick, losing power of speech, sight or hearing in course of Tantrik practices. The details of Tantra have, therefore, been kept secret and out of reach of common man. In ancient times Tantra was used for welfare activities like self-defence, espionage, treatment of terminally ill and for enhancing the intelligence quotient of mentally retarded. The practice is now extremely rare.  

Q.10. According to the Law of Karma, everyone has to face the consequences of one’s good or bad deeds. How is it then possible for Gayatri to absolve one from sins?

Ans. It has been described that Gayatri dispels the darkness of sin. It does not mean destruction of the result of sin. It means getting rid of sinful tendencies.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 90

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

I Will Use You, I Will Not Let You Sit Idle | Pt Shriram Sharma Acharya



Title

👉 आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग (अन्तिम भाग)

अधिकाँश साधक कुछ सेवा के बाद ही शीघ्र ही ईश्वर प्राप्ति के लिये अधीर हो जाते हैं यह निष्काम सेवा या कर्मयोग का लक्षण नहीं, कर्मयोगी वे हैं जो नम्रता तथा आत्मभाव से मनुष्यों की सेवा करते हैं। वही वास्तव में अखिल विश्व के नायक बन जाते हैं। सब लोग उनकी बड़ाई तथा आदर करते हैं। जितना ही आत्मभाव से सेवा करने जायें आप उतनी ही विशेष शक्ति, पौरुष, तथा योग्यता प्राप्त करेंगे। आप इसका अभ्यास करके ही स्वयं अनुभव प्राप्त करें।

जब दूसरों की भलाई करने का भाग मनुष्य का एक अंग ही बन जाता है, तब रेचक मात्र ही किसी प्रकार की कामना नहीं रह जाया करती है। उनको दूसरों की सेवा तथा भलाई करने से ही अत्यन्त आनन्द का अनुभव हुआ करता है। दृढ़ निष्काम सेवा करने से एक विचित्र प्रकार की प्रसन्नता तथा आनन्द हुआ करता है। उनको निष्काम तथा निस्वार्थ कर्म करने से आन्तरिक आध्यात्मिक शक्ति और बल होता है।

आप दूसरों की सेवा करते समय बीज या निराशा, विरक्ति तथा उदासी के भावों को कभी मन में भी न लाया करें। सेवा में ही आनन्दित होकर सेवा किया करें। दूसरों के सेवा करने के लिए सदा प्रस्तुत रहा करें। सेवा करने के अवसर को ढूँढ़ा करें। एक भी अवसर न चूके। सेवा करने का अवसर स्वयं बना दिया करें।

कर्मयोग के अभ्यास में किया गया परिश्रम कभी निष्फल नहीं होता। यह असाध्य भी नहीं है इसमें अपराध तो होता ही नहीं उल्टे इसका थोड़ा भी अभ्यास करते रहने से जन्म-मरण रूप दुःख तथा उसकी सहयोगिनी बुराइयों के ही निवृत्ति होती है। निदान “आत्मज्ञान” की प्राप्ति कर्मयोग से होती है। यहाँ अनिश्चित कुछ भी नहीं है। कर्मयोग का यह आध्यात्म अंत में आत्मानन्द को परमगति तक पहुँचा देता है।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 8

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 8)

Q.8. How is Gayatri relevant for humankind in the present times ?

Ans.  Each individual is born with certain characteristic traits and IQ., all of which can not be explained as genetic inheritance. For instance, genetics has no explanation for the rare birth of a saint, genius or an idiot in several generations of a family. It is also a fact that many of these exclusive personal traits change in course of growth of  the person from childhood to adulthood. Modern scientists generally ascribe these changes to social environment and education. The science of today is, however, unable to throw light on the reasons for presence or absence in an individual of characteristics like empathy, compassion, large-heartedness, tolerance, courage, equanimity and creativity. Nor has modern science succeeded in devising gadgets or courses for inculcating these virtues.

The spiritual masters in the East on the other hand, maintain that the Absolute Repository of all virtues, which we call as GOD, is that source from which it is possible to acquire positive traits by personal endeavour through specific Yogic exercises under the guidance of a Guru. This is the objective of all spiritual pursuits in the East.

Ever since the dawn of civilization in India, it has been emphasised that no amount of material progress in science and technology can bring about lasting happiness, peace and prosperity for humankind, unless the individual - the unit of family, society, nation and global population, is transformed by infusion of positive thinking. The so-called progress in the West is also responsible for two world wars, nuclear-proliferation, environmental pollution, disparity in living standards, conflicts, poverty and disease all-over the world.

Gayatri is a panacea for all problems - Personal, Family, Social, National or Global : The Gayatri Sadhana is a product of thousands of years of research. Following Gayatri Yoga any individual, irrespective of caste, class, colour, nationality, social status and religious  affiliation can acquire strength from the Indwelling Divinity for solving all problems of life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 89

👉 समय का सदुपयोग

हम देखते हैं, बहुत से लोग, जिनके पास काम नहीं होता या कम होता है, वे लोग फालतू के काम करते रहते हैं। कोई ताश के पत्ते खेलता है, कोई गार्डन में व्यर्थ ही इधर उधर बैठा रहता है, कोई जुआ खेलता है, कोई सिगरेट बीड़ी पीता है, कोई शराब पीता है। बस यूँ ही अनुपयोगी/व्यर्थ के कार्य करता रहता है।

जब उससे पूछा जाता है कि आप क्या कर रहे हैं? तो वह उत्तर देता है, कुछ नहीं, बस यूं ही समय काट रहे हैं. तो संसार में बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनके पास करने के लिए कोई काम नहीं है। उनके पास समय तो है, पर काम नहीं है। अब उस समय को काटने के लिए वे इधर-उधर कुछ भी करते रहते हैं।

ऐसा करने से उनका समय तो कट जाता है, परंतु समय भी बहुत खतरनाक हथियार है, बहुत तेज धार वाला है। जब मनुष्य समय को काटता है तो समय भी मनुष्य का बहुत कुछ काटता है. उसकी संपत्ति नष्ट करता है, उसका स्वास्थ्य नष्ट करता है, उसकी आयु को नष्ट करता है, और भी बहुत सारी हानियां करने के बाद ही समय कटता है।

इसलिए समय का सदुपयोग करें। खाली न बैठें। कुछ काम ढूंढें। कुछ अपने लिए करें, कुछ परिवार के लिए करें, कुछ समाज के लिए करें, कुछ राष्ट्र के लिए करें, कुछ प्राणियों की रक्षा के लिए काम करें, रोगियों विकलांगों की सहायता करें, इत्यादि। यदि आप इस प्रकार का कोई उपयोगी काम ढूंढेंगे, तो बहुत से काम मिल जाएंगे। उन कामों को करके समय का सदुपयोग करें, व्यर्थ समय को ना काटें। अन्यथा काफी सारा समय काटने के बाद आपको पता चलेगा, कि आपने समय को नहीं काटा, बल्कि समय ही आपको काट गया।

👉 संकट के क्षण

संकट के क्षण बेशकीमती हैं। जीवन में इनका महत्त्व व मोल बहुत अधिक है। इतना अधिक कि इन्हें अतिमहत्त्वपूर्ण और अनमोल कहा जा सके। जब सब कुछ व्यवस्थित होता है और कहीं कोई संकट नहीं होता, तो जीवन चेतना सुप्त व मृतप्राय हो जाती है। जब कुछ बदल नहीं रहा होता है और पुराने की पकड़ मजबूत होती है तो लगभग असम्भव हो जाता है स्वयं को बदलना। लेकिन जब हर चीज अस्त-व्यस्त होती है, जीवन में कुछ भी स्थायी, निश्चित एवं सुरक्षित नहीं होता, कोई नहीं जानता कि अगले क्षण क्या होगा? ऐसे संकट के क्षणों में जीवन स्वतन्त्र होता है परिवर्तन के लिए, रूपान्तरण के लिए।
  
संकट के बिना जीवन लगभग जेल जैसा है। जिसमें बस परम्पराओं, रीतियों, युगों पुरानी सड़-गल चुकी व्यवस्थाओं को विवशताओं के साथ निभाया जाता है। इस जेल से भाग निकलना तकरीबन असम्भव होता है। लेकिन जैसे ही संकट आया कि सब बँधी-बँधायी व्यवस्थाएँ टूट जाती हैं, विवशताओं से मुक्ति मिलती है। तनिक महसूस करें भूचाल आया हो, हर व्यवस्था बिखर चुकी हो, किसी को पता ही न हो कि पहरेदार कहाँ हैं, जेलर कहाँ है? सारे नियम टूट चुके हों, ऐसे क्षणों में कैदी अगर जरा भी सजग हो तो ये संकट के क्षण उसके लिए मोक्ष के क्षण हो सकते हैं।
  
यही वजह है कि जीवन की कारा से, प्रकृति की अर्गलाओं से, माया के बन्धनों से मोक्ष पाने की चाहत रखने वालों के जीवन में संकटों की भरमार होती है। वे भगवान् से पल प्रतिपल, प्रत्येक क्षण, घड़ी, पक्ष, मास, अयन और वर्ष संकटों का वरदान माँगते हैं। भगवान् भी अपने इन प्यारे भक्तों को उदारतापूर्वक संकटों का अनुदान देते हैं। इसी कारण तपस्वी, योगी, ज्ञानी, भक्त आदि भगवान् के जितने भी प्रियजन हैं उनके जीवन में संकट कभी भी कम नहीं पड़ते। लेकिन वे अपने तप, योग, ज्ञान एवं भक्ति से संकट के प्रत्येक क्षण को मोक्ष के क्षण में बदलते हैं। प्रत्येक संकट उनके लिए ईश्वरीय प्रकाश का द्वार होता है। भगवान् के प्रति अविचल श्रद्धा हो, जीवन के प्रति सकारात्मक भाव हो तो संकट के इन क्षणों से अधिक सुखद आध्यात्मिक साधना का सुअवसर अन्य कुछ भी नहीं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९६

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

👉 माथे का टीका

काफी समय पहले की बात है कि एक मन्दिर के बाहर बैठ कर एक भिखारी भीख माँगा करता था। (वह एक बहुत बड़े महात्मा जी का शिष्य था जो कि इक पूर्ण संत थे) उसकी उम्र कोई साठ को पार कर चुकी थी। आने जाने वाले लोग उसके आगे रक्खे हुए पात्र में कुछ न कुछ डाल जाते थे। लोग कुछ भी डाल दें, उसने कभी आँख खोल कर भी न देखा था कि किसने क्या डाला।

उसकी इसी आदत का फायदा उसके आस पास बैठे अन्य भिखारी तथा उनके बच्चे उठा लेते थे। वे उसके पात्र में से थोड़ी थोड़ी देर बाद हाथ साफ़ कर जाते थे।

कई उसे कहते भी थे कि, सोया रहेगा तो तेरा सब कुछ चोरी जाता रहेगा। वह भी इस कान से सुन कर उधर से निकाल देता था। किसी को क्या पता था कि वह प्रभु के प्यार में रंगा हुआ था। हर वक्त गुरु की याद उसे अपने में डुबाये रखती थी।

एक दिन ध्यान की अवस्था में ही उसे पता लगा कि उसकी अपनी उम्र नब्बे तक पहुंच जायेगी। यह जानकर वह बहुत उदास हो गया। जीवन इतनी कठिनाइयों से गुज़र रहा था पहले ही और ऊपर से इतनी लम्बी अपनी उम्र की जानकारी - वह सोच सोच कर परेशान रहने लग गया।

एक दिन उसे अपने गुरु की उम्र का ख्याल आया। उसे मालूम था कि गुरुदेव की उम्र पचास के आसपास थी। पर ध्यान में उसकी जानकारी में आया कि गुरुदेव तो बस दो बरस ही और रहेंगे।

गुरुदेव की पूरी उम्र की जानकारी के बाद वह और भी उदास हो गया। बार बार आँखों से बूंदे टपकने लग जाती थीं। पर उसके अपने बस में तो नही था न कुछ भी। कर भी क्या सकता था, सिवाए आंसू बहाने के।

एक दिन सुबह कोई पति पत्नी मन्दिर में आये। वे दोनों भी उसी गुरु के शिष्य थे जिसका शिष्य वह भिखारी था। वे तो नही जानते थे भिखारी को, पर भिखारी को मालूम था कि दोनों पति पत्नी भी उन्ही गुरु जी के शिष्य थे।

दोनों पति पत्नी लाइन में बैठे भिखारियों के पात्रों में कुछ न कुछ डालते हुए पास पहुंच गये। भिखारी ने दोनों हाथ जोड़ कर उन्हें ऐसे ही प्रणाम किया जैसे कोई घर में आये हुए अपने गुरु भाईओं को करता है।

भिखारी के प्रेम पूर्वक किये गये प्रणाम से वे दोनों प्रभावित हुए बिना न रह सके। भिखारी ने उन दोनों के भीतर बैठे हुए अपने गुरुदेव को प्रणाम किया था इस बात को वे जान न पाए।

उन्होंने यही समझा कि भिखारी ने उनसे कुछ अधिक की आस लगाई होगी जो इतने प्यार से नमस्कार किया है। पति ने भिखारी की तरफ देखा और बहुत प्यार से पुछा, कुछ कहना है या कुछ और अधिक चाहिए ?

भिखारी ने अपने पात्र में से एक सिक्का निकाला और उनकी तरफ बढ़ाते हुए बोला, जब गुरुदेव के दर्शन को जायो तो मेरी तरफ से ये सिक्का उनके चरणों में भेंट स्वरूप रख देना।

पति पत्नी ने एक दुसरे की तरफ देखा, उसकी श्रद्धा को देखा, पर एक सिक्का, वो भी गुरु के चरणों में! पति सोचने लगा क्या कहूँगा, कि एक सिक्का! कभी एक सिक्का गुरु को भेंट में तो शायद किसी ने नही दिया होगा, कभी नही देखा।

पति भिखारी की श्रद्धा को देखे तो कभी सिक्के को देखे। कुछ सोचते हुए पति बोला, आप इस सिक्के को अपने पास रक्खो, हम वैसे ही आपकी तरफ से उनके चरणों में रख देंगे।

नही आप इसी को रखना उनके चरणों में। भिखारी ने बहुत ही नम्रता पूर्वक और दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा। उसकी आँखों से झर झर आंसू भी निकलने लग गये।

भिखारी ने वहीं से एक कागज़ के टुकड़े को उठा कर सिक्का उसी में लपेट कर दे दिया। जब पति पत्नी चलने को तैयार हो गये तो भिखारी ने पुछा, वहाँ अब भंडारा कब होगा?भंडारा तो कल है, कल गुरुदेव का जन्म दिवस है न। भिखारी की आँखे चमक उठीं। लग रहा था कि वह भी पहुंचेगा, गुरुदेव के जन्म दिवस के अवसर पर।

दोनों पति पत्नी उसके दिए हुए सिक्के को लेकर चले गये। अगले दिन जन्म दिवस (गुरुदेव का) के उपलक्ष में आश्रम में भंडारा था। वह भिखारी भी सुबह सवेरे ही आश्रम पहुंच गया।

भंडारे के उपलक्ष में बहुत शिष्य आ रहे थे। पर भिखारी की हिम्मत न हो रही थी कि वह भी भीतर चला जाए। वह वहीं एक तरफ खड़ा हो गया कि शायद गेट पर खड़ा सेवादार उसे भी मौका दे भीतर जाने के लिए। पर सेवादार उसे बार बार वहाँ से चले जाने को कह रहा था।

दोपहर भी निकल गयी, पर उसे भीतर न जाने दिया गया। भिखारी वहाँ गेट से हट कर थोड़ी दूर जाकर एक पेड़ की छावं में खड़ा हो गया। वहीं गेट पर एक कार में से उतर कर दोनों पति पत्नी भीतर चले गये। एक तो भिखारी की हिम्मत न हुई कि उन्हें जा कर अपने सिक्के की याद दिलाते हुए कह दे कि मेरी भेंट भूल न जाना। और दूसरा वे दोनों शायद जल्दी में भी थे इस लिए जल्दी से भीतर चले गये। और भिखारी बेचारा, एक गरीबी, एक तंग हाली और फटे हुए कपड़े उसे बेबस किये हुए थे कि वह अंदर न जा सके।

दूसरी तरफ दोनों पति पत्नी गुरुदेव के सम्मुख हुए, बहुत भेंटे और उपहार थे उनके पास, गुरुदेव के चरणों में रखे। पत्नी ने कान में कुछ कहा तो पति को याद आ गया उस भिखारी की दी हुई भेंट। उसने कागज़ के टुकड़े में लिपटे हुए सिक्के को जेब में से बाहर निकाला, और अपना हाथ गुरु के चरणों की तरफ बढ़ाया ही था तो गुरुदेव आसन से उठ खड़े हुए, गुरुदेव ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाकर सिक्का अपने हाथ में ले लिया, उस भेंट को गुरुदेव ने अपने मस्तक से लगाया और पुछा, ये भेंट देने वाला कहाँ है, वो खुद क्यों नही आया ?

गुरुदेव ने अपनी आँखों को बंद कर लिया, थोड़ी ही देर में आँख खोली और कहा, वो बाहर ही बैठा है, जायो उसे भीतर ले आयो। पति बाहर गया, उसने इधर उधर देखा। उसे वहीं पेड़ की छांव में बैठा हुआ वह भिखारी नज़र आ गया।

पति भिखारी के पास गया और उसे बताया कि गुरुदेव ने उसकी भेंट को स्वीकार किया है और भीतर भी बुलाया है। भिखारी की आँखे चमक उठीं। वह उसी के साथ भीतर गया, गुरुदेव को प्रणाम किया और उसने गुरुदेव को अपनी भेंट स्वीकार करने के लिए धन्यवाद दिया।

गुरुदेव ने भी उसका हाल जाना और कहा प्रभु के घर से कुछ चाहिए तो कह दो आज मिल जायेगा। भिखारी ने दोनों हाथ जोड़े और बोला - एक भेंट और लाया हूँ आपके लिए, प्रभु के घर से यही चाहता हूँ कि वह भेंट भी स्वीकार हो जाये।

हाँ होगी, लायो कहाँ है? वह तो खाली हाथ था, उसके पास तो कुछ भी नजर न आ रहा था भेंट देने को, सभी हैरान होकर देखने लग गये कि क्या भेंट होगी!

हे गुरुदेव, मैंने तो भीख मांग कर ही गुज़ारा करना है, मैं तो इस समाज पर बोझ हूँ। इस समाज को मेरी तो कोई जरूरत ही नही है। पर हे मेरे गुरुदेव, समाज को आपकी सख्त जरूरत है, आप रहोगे, अनेकों को अपने घर वापिस ले जायोगे।

इसी लिए मेरे गुरुदेव, मैं अपनी बची हुई उम्र आपको भेंट स्वरूप दे रहा हूँ। कृपया इसे कबूल करें।" इतना कहते ही वह भिखारी गुरुदेव के चरणों पर झुका और फिर वापिस न उठा। कभी नही उठा।

वहाँ कोहराम मच गया कि ये क्या हो गया, कैसे हो गया? सभी प्रश्न वाचक नजरों से गुरुदेव की तरफ देखने लग गये। एक ने कहा,  हमने भी कई बार कईओं से कहा होगा कि भाई मेरी उम्र आपको लग जाए, पर हमारी तो कभी नही लगी। पर ये क्या, ये कैसे हो गया??

गुरुदेव ने कहा, इसकी बात सिर्फ इस लिए सुन ली गयी क्योंकि इसके माथे का टीका चमक रहा था। आपकी इस लिए नही सुनी गयी क्योंकि माथे पर लगे टीके में चमक न थी।

सभी ने उसके माथे की तरफ देखा, वहाँ तो कोई टीका न लगा था। गुरुदेव सबके मन की उलझन को समझ गये और बोले  टीका ऊपर नही, भीतर के माथे पर लगा होता है..!!

👉 प्रतिहिंसा का अन्त नहीं

👉 आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग (भाग ३)

कर्मयोगियों को सुशील, मनोहर मिलनसार प्रकृति का होना होगा। उसको पूर्ण रूप से, अनुकूलता, क्षमाशीलता, सहानुभूति करने वाला, विश्व प्रेम, दया के गुणों से युक्त रहना होगा। उनको दूसरों की चाल तथा आदतों के अनुकूल ही अपने को बनाना होगा। उनको अपने हृदय को ऐसा बनाना होगा कि सभी को अपने गले लगा सकें। उन्हें अपने मन को शाँत तथा समतुल्य रखना होगा। दूसरों को सुखी देखकर उनको प्रसन्न होना होगा। अपनी सब इन्द्रियों को अपने वश में करना होगा। अपना जीवन बहुत सादगी से व्यतीत करना होगा। उन्हें अनादर, अपकीर्ति, निन्दा, कलंक, लज्जित होना, कठोर वचन सुनना, शीत-उष्ण तथा रोगों के कष्ट को सहना होगा। उन्हें सहनशील होना होगा। उनको आप में, ईश्वर में, शास्त्रों में, अपने गुरु के वचन में पूरा विश्वास रखना होगा।

जो मनुष्य संसार की सेवा करता है वह अपनी ही सेवा करता है। जो मनुष्य दूसरों की मदद करता है वास्तव में वह अपनी ही मदद करता है। यह सदा ध्यान में रखने योग्य बात है। जब आप दूसरे व्यक्ति की सेवा करते हैं, जब आप अपने देश की सेवा करते हैं तब आप यह समझकर कि ईश्वर ने आपको सेवा द्वारा अपने को उन्नत तथा सुधारने का दुर्लभ अवसर दिया है। उस मनुष्य के आप कृतज्ञ हों जिसने आपको सेवा करने का अवसर दिया हो।

कर्मयोग ही मन को अन्तर्ज्योति तथा आत्मज्ञान की प्राप्ति का उपयुक्त पात्र बनाता है। वह हृदय को विशाल बनाकर सब प्रकार के बाधा विघ्नों को जो एकता प्राप्त करने में बाधक हुआ करते हैं, हटा देता है। कर्मयोग ही चित्त वृद्धि के लिये एक सफल साधन है।

निष्काम सेवा करने से आप अपने हृदय को पवित्र बना लेते हैं। अहंभाव, घृणा, ईर्ष्या, श्रेष्ठता का भाव और उसी प्रकार के और सब आसुरी सम्पत्ति के गुण नष्ट हो जाते हैं। नम्रता, शुद्ध प्रेम, सहानुभूति, क्षमा, दया की वृद्धि होती है। भेद-भाव मिट जाते हैं। स्वार्थपरता निर्मूल हो जाती है। आपका जीवन विस्तृत तथा उदार हो जायेगा। आप एकता का अनुभव करने लगेंगे। अन्त में आपको आत्मज्ञान प्राप्त हो जायेगा। आप सब में “एक” और “एक” में ही सबका अनुभव करने लगेंगे। आप अत्यधिक आनन्द का अनुभव करने लगेंगे। संसार कुछ भी नहीं है केवल ईश्वर की ही विभूति है। लोक सेवा ही ईश्वर की सेवा है। सेवा को ही पूजा कहते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 8

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 7)

Q.7. Why is the Sadhak advised to keep the progress in Sadhana a secret?

Ans. The purpose of keeping Sadhana secret is only to avoid the possibility of confusion because of multiple interactions with people, so that after dispelling all doubts, one holds fast to it firmly and marches ahead on the chosen path. People try to criticise, find faults and suggest new methods and create doubts in the mind of the Sadhak, if he discusses the method of his Sadhana with several persons. Everyone who is consulted will suggest something new and the Sadhak’s mind will get confused and he will lose faith. He will then change frequently his method of Sadhana and on account of doubt get deprived of its benefits. It is therefore, essential to have full faith in one’s well settled method and it should be pursued with unflinching devotion, under the guidance of an accomplished Guru.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 87

👉 लक्ष्य

क्षण भंगुर लालसाओं और उनकी तृप्ति को लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता। जो अभी हैं, अभी नहीं हैं। जिनके रंग-रूप पल-पल बदलते हैं। जिनके पूरी होने से मिलने वाली तृप्ति, नहीं पूरी होने से मिलने वाली अतृप्ति से गहरा अवसाद एवं विषाद देती है। ऐसी क्षण भंगुर माया मरीचिका भला जीवन का लक्ष्य कैसे हो सकती है। लक्ष्य को तो सदा शाश्वत्-सर्वकालिक एवं शान्तिदायक होना चाहिए।
  
महान सन्त गुरजिएफ अपने शिष्यों से कथा कहते थे- आकाश में उड़ने वाली चिड़िया को अपने से थोड़ी ही दूर एक चमकता हुआ श्वेत बादल दिखा। उसने सोचा- चलो मैं उड़कर उस बादल को छू लूँ। ऐसा सोचते हुए वह चिड़िया उस बादल को अपना लक्ष्य बनाकर अपनी पूरी क्षमता से उड़ चली। लेकिन हवाओं के साथ अठखेलियाँ करता वह बादल कभी पूर्व में जाता तो कभी पश्चिम में और कभी तो वहीं रुककर चक्कर खाते हुए चक्करों का चक्रव्यूह रचाने लगता। यही नहीं कभी वह छुपता तो कभी प्रकट हो जाता। अपनी बहुतेरी कोशिशों के बाद चिड़िया उस तक नहीं पहुँच सकी।
  
प्रयासों के इस दौर में उसने पाया कि जिस बादल के पीछे वह अपने जीवन को दाँव में लगाकर भाग रही थी, वह अचानक हवा के झोकों से छट गया है। अपने अथक प्रयत्न के परिणाम में उस चिड़िया ने देखा कि अरे! यहाँ तो कुछ भी नहीं है। इस सच को देखकर उस चिड़िया को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसके जाग्रत् हो चुके अन्तर्विवेक ने कहा; यह तो बड़ी भूल हो गयी। यदि लक्ष्य बनाना हो तो क्षण भंगुर बादलों को नहीं बल्कि पर्वत की चोटियों को बनाना चाहिए, जो शाश्वत और अनन्त है।
  
गुरजिएफ की यह बोध कथा प्रायः हम सभी के जीवन में घटित होती है। हममें से अनेक क्षण भंगुर बादलों की ही तरह क्षण भंगुर लालसाओं को लक्ष्य बनाने के भ्रम में पड़े रहते हैं। यदि वे अन्तर्विवेक के प्रकाश में देखें तो निकट ही अनादि और अनन्त परमात्मा की पर्वतमालाएँ भी हैं। जिसे जीवन का लक्ष्य बनाने से सदा-सर्वदा कृतार्थता और धन्यता ही उपलब्ध होती है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९५

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

👉 कर्ण की उदारता


👉 विरोध का सामना कैसे करें?

गंगा के तट पर एक संत अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे, तभी एक शिष्य ने पुछा, “ गुरू जी, यदि हम कुछ नया… कुछ अच्छा करना चाहते हैं पर समाज उसका विरोध करता है तो हमें क्या करना चाहिए?”

गुरु जी ने कुछ सोचा और बोले ,” इस प्रश्न का उत्तर मैं कल दूंगा।”

अगले दिन जब सभी शिष्य नदी के तट पर एकत्रित हुए तो गुरु जी बोले, “आज हम एक प्रयोग करेंगे… इन तीन मछली पकड़ने वाली डंडियों को देखो, ये एक ही लकड़ी से बनी हैं और बिलकुल एक समान हैं।”

उसके बाद गुरु जी ने उस शिष्य को आगे बुलाया जिसने कल प्रश्न किया था।गुरु जी ने निर्देश दिया - “ पुत्र, ये लो इस डंडी से मछली पकड़ो।” शिष्य ने डंडी से बंधे कांटे में आंटा लगाया और पानी में डाल दिया। फ़ौरन ही एक बड़ी मछली कांटे में आ फंसी…

गुरु जी बोले-” जल्दी…पूरी ताकत से बाहर की ओर खींचो।“ शिष्य ने ऐसा ही किया ,उधर मछली ने भी पूरी ताकत से भागने की कोशिश की…फलतः डंडी टूट गयी।
गुरु जी बोले- “कोई बात नहीं; ये दूसरी डंडी लो और पुनः प्रयास करो…।”

शिष्य ने फिर से मछली पकड़ने के लिए काँटा पानी में डाला।
इस बार जैसे ही मछली फंसी, गुरु जी बोले, “आराम से… एकदम हल्के हाथ से डंडी को खींचो।” शिष्य ने ऐसा ही किया, पर मछली ने इतनी जोर से झटका दिया कि डंडी हाथ से छूट गयी।

गुरु जी ने कहा, “ओह्हो, लगता है मछली बच निकली, चलो इस आखिरी डंडी से एक बार फिर से प्रयत्न करो।” शिष्य ने फिर वही किया। पर इस बार जैसे ही मछली फंसी गुरु जी बोले, “ सावधान! इस बार न अधिक जोर लगाओ न कम.. बस जितनी शक्ति से मछली खुद को अंदर की ओर खींचे उतनी ही शक्ति से तुम डंडी को बाहर की ओर खींचो.. कुछ ही देर में मछली थक जायेगी और तब तुम आसानी से उसे बाहर निकाल सकते हो”

शिष्य ने ऐसा ही किया और इस बार मछली पकड़ में आ गयी।
“क्या समझे आप लोग?” गुरु जी ने बोलना शुरू किया…” ये मछलियाँ उस समाज के समान हैं जो आपके कुछ करने पर आपका विरोध करता है। यदि आप इनके खिलाफ अधिक शक्ति का प्रयोग करेंगे तो आप टूट जायेंगे, यदि आप कम शक्ति का प्रयोग करेंगे तो भी वे आपको या आपकी योजनाओं को नष्ट कर देंगे… लेकिन यदि आप उतने ही बल का प्रयोग करेंगे जितने बल से वे आपका विरोध करते हैं तो धीरे-धीरे वे थक जाएंगे… हार मान लेंगे… और तब आप जीत जायेंगे… इसलिए कुछ उचित करने में जब ये समाज आपका विरोध करे तो समान बल प्रयोग का सिद्धांत अपनाइये और अपने लक्ष्य को प्राप्त कीजिये।”

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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