शनिवार, 8 फ़रवरी 2020
👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 2)
Q.4. What are the basic rules of an Anusthan?
Ans. The set of rules to be followed are :-
(1) As far as practicable, regularity of time and number in the Jap should be maintained in the routine with minimum possible deviations.
(2) The five basic principles i.e. (i) fasting (ii) abstention from sex (iii) self-service (iv) sleeping on ground (v) refraining from leather-ware like shoes etc., are to be followed. (One may instead use synthetics, rubber etc.) If sleeping on ground is not safe because of dampness, insects etc., a hard wooden bed may be used. Self service is essential in making shaves, (avoid the barber) cleaning of clothes (don’t send them to the laundry) personal and for other physical requirements. In case it is inconvenient to cook one’s own food, help of a close family member- wife, mother, sister etc. may be taken. Prepared food items from market (restaurants, dhabas etc.) are strictly forbidden. Sex is taboo during an Anusthan. Not only one should avoid physical sex, stimulation of sex impulse through even casual thoughts and sight should also be checked. Ladies coming in contact should be treated as mother, sister or daughter. The same is applicable to the behaviour of women towards men.
Fasting can be done in one of the following ways: (a) Only liquid food like buttermilk, milk, fruit juice etc.(b) Subsisting on fruits and vegetables only (c) taking tasteless food items devoid of salt, sugar and spices (d) partaking only one meal a day (e) choosing only two food items during the period of Anusthan.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 72
Ans. The set of rules to be followed are :-
(1) As far as practicable, regularity of time and number in the Jap should be maintained in the routine with minimum possible deviations.
(2) The five basic principles i.e. (i) fasting (ii) abstention from sex (iii) self-service (iv) sleeping on ground (v) refraining from leather-ware like shoes etc., are to be followed. (One may instead use synthetics, rubber etc.) If sleeping on ground is not safe because of dampness, insects etc., a hard wooden bed may be used. Self service is essential in making shaves, (avoid the barber) cleaning of clothes (don’t send them to the laundry) personal and for other physical requirements. In case it is inconvenient to cook one’s own food, help of a close family member- wife, mother, sister etc. may be taken. Prepared food items from market (restaurants, dhabas etc.) are strictly forbidden. Sex is taboo during an Anusthan. Not only one should avoid physical sex, stimulation of sex impulse through even casual thoughts and sight should also be checked. Ladies coming in contact should be treated as mother, sister or daughter. The same is applicable to the behaviour of women towards men.
Fasting can be done in one of the following ways: (a) Only liquid food like buttermilk, milk, fruit juice etc.(b) Subsisting on fruits and vegetables only (c) taking tasteless food items devoid of salt, sugar and spices (d) partaking only one meal a day (e) choosing only two food items during the period of Anusthan.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 72
👉 "एक ले दूजी डाल"
चींटी चावल ले चली, बीच में मिल गई दाल।
कहत कबीर दो ना मिले, एक ले दूजी डाल।।
एक चींटी अपने मुंह में चावल लेकर जा रही थी, चलते चलते उसको रास्ते में दाल मिल गई, उसे भी लेने की उसकी इच्छा हुई लेकिन चावल मुंह में रखने पर दाल कैसे मिलेगी। दाल लेने को जाती है तो चावल नहीं मिलता । चींटी का दोनों को लेने का प्रयास था।
कबीर कहते हैं-- "दो ना मिले इक ले " चावल हो या दाल।
कबीर दास जी के इस दोहे का भाव यह है कि हमारी स्थिति भी उसी चींटी -जैसी है। हम भी संसार के विषय भोगों में फंस कर अतृप्त ही रहते हैं, एक चीज मिलती है तो चाहते हैं कि दूसरी भी मिल जाए, दूसरी मिलती है तो चाहते हैं कि तीसरी मिल जाए। यह परंपरा बंद नहीं होती और हमारे जाने का समय आ जाता है।
यह हमारा मोह है, लोभ है। हमको लोहा मिलता है, किंतु हम सोने के पीछे लगते हैं। पारस की खोज करते हैं ताकि लोहे को सोना बना सकें। काम, क्रोध, लोभ यह तीनों प्रकार के नरक के द्वार हैं। यह आत्मा का नाश करने वाले हैं अर्थात अधोगति में ले जाने वाले हैं। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।
"दो ना मिले एक ले दूजी डाल "इस कथन में मुख्य रूप से संतोष की शिक्षा है जो लोभ, मोह आदि से बचने का संदेश है।
वस्तुतः प्रारब्ध से जो कुछ प्राप्त है, उसी में संतोष करना चाहिए। क्योंकि जो प्राप्त होने वाला है उसके लिए श्रम करना व्यर्थ है, और जो प्राप्त होने वाला नहीं है उसके लिए भी श्रम करना व्यर्थ है। अपने समय की हानि करनी है। यह समझना चाहिए कि हमारे कल्याण के लिए प्रभु ने जैसी स्थिति में हमको रखा है। वही हमारे लिए सर्वोत्तम है, उसी में हमारी भलाई है, मन के अनुसार न किसी को कभी वस्तु मिली है, और न मिलने वाली है। क्योंकि तृष्णा का, कामना का, कोई अंत नहीं है।
हम भगवान को पसंद करते हैं, तो क्या मांगते हैं। इस पर विचार करना चाहिए, कबीर जी कहते हैं --- "एक ले दूजी डाल"।
हमारा मन भी चींटी सरीखा है। बुद्धि हमारा सारथी है, किंतु उस पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। हम मन के हिसाब से चलते हैं और दुखी होते हैं। अतः "एक ले दूजी डाल" अर्थात जो मिल जाए उसे प्रभु प्रसाद मानकर ग्रहण करें और अधिक की लालसा कदापि न करें।
कहत कबीर दो ना मिले, एक ले दूजी डाल।।
एक चींटी अपने मुंह में चावल लेकर जा रही थी, चलते चलते उसको रास्ते में दाल मिल गई, उसे भी लेने की उसकी इच्छा हुई लेकिन चावल मुंह में रखने पर दाल कैसे मिलेगी। दाल लेने को जाती है तो चावल नहीं मिलता । चींटी का दोनों को लेने का प्रयास था।
कबीर कहते हैं-- "दो ना मिले इक ले " चावल हो या दाल।
कबीर दास जी के इस दोहे का भाव यह है कि हमारी स्थिति भी उसी चींटी -जैसी है। हम भी संसार के विषय भोगों में फंस कर अतृप्त ही रहते हैं, एक चीज मिलती है तो चाहते हैं कि दूसरी भी मिल जाए, दूसरी मिलती है तो चाहते हैं कि तीसरी मिल जाए। यह परंपरा बंद नहीं होती और हमारे जाने का समय आ जाता है।
यह हमारा मोह है, लोभ है। हमको लोहा मिलता है, किंतु हम सोने के पीछे लगते हैं। पारस की खोज करते हैं ताकि लोहे को सोना बना सकें। काम, क्रोध, लोभ यह तीनों प्रकार के नरक के द्वार हैं। यह आत्मा का नाश करने वाले हैं अर्थात अधोगति में ले जाने वाले हैं। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।
"दो ना मिले एक ले दूजी डाल "इस कथन में मुख्य रूप से संतोष की शिक्षा है जो लोभ, मोह आदि से बचने का संदेश है।
वस्तुतः प्रारब्ध से जो कुछ प्राप्त है, उसी में संतोष करना चाहिए। क्योंकि जो प्राप्त होने वाला है उसके लिए श्रम करना व्यर्थ है, और जो प्राप्त होने वाला नहीं है उसके लिए भी श्रम करना व्यर्थ है। अपने समय की हानि करनी है। यह समझना चाहिए कि हमारे कल्याण के लिए प्रभु ने जैसी स्थिति में हमको रखा है। वही हमारे लिए सर्वोत्तम है, उसी में हमारी भलाई है, मन के अनुसार न किसी को कभी वस्तु मिली है, और न मिलने वाली है। क्योंकि तृष्णा का, कामना का, कोई अंत नहीं है।
हम भगवान को पसंद करते हैं, तो क्या मांगते हैं। इस पर विचार करना चाहिए, कबीर जी कहते हैं --- "एक ले दूजी डाल"।
हमारा मन भी चींटी सरीखा है। बुद्धि हमारा सारथी है, किंतु उस पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। हम मन के हिसाब से चलते हैं और दुखी होते हैं। अतः "एक ले दूजी डाल" अर्थात जो मिल जाए उसे प्रभु प्रसाद मानकर ग्रहण करें और अधिक की लालसा कदापि न करें।
👉 खुशियों का खजाना
खुशियाँ चाहते हो? तो सबसे पहले अन्तस् में खोजो। इन्हें बाह्य परिस्थिति में नहीं आन्तरिक मनःस्थिति में ढूँढो। जो खुशियों की खोज अन्तस् में करता है, उसे फिर इन्हें कहीं अन्यत्र नहीं खोजना पड़ता। और जो यहाँ खोजने की कोशिश न करके बाहर खोजता है, वह सदा खोजता ही रहता है, किन्तु पाता कुछ भी नहीं है।
एक भिखारी था, वह जिन्दगी भर एक ही जगह पर बैठकर भीख माँगता रहा। उसकी ख्वाहिश थी कि वह भी धनवान् बने। इसलिए वह दिन में ही नहीं रात में भी भीख मांगता। जो कुछ उसे भीख में मिलता उसे खर्च करने की बजाय जोड़ता रहता। अपनी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए उसने दिन-रात भरपूर कोशिश की। लेकिन वह कभी भी धनवान न हो सका। वह भिखारी की ही तरह जिया और भिखारी की ही तरह मरा। जब वह मरा तो उसके कफन के लायक भी पूरे पैसे उसके पास नहीं थे। उसके मर जाने के बाद आस-पास के लोगों ने उसका झोपड़ा तोड़ दिया। फिर सबने मिलकर वहाँ की जमीन साफ की। सफाई करने वाले इन सभी को तब भारी अचरज हुआ, जब उन्हें उस जगह पर बड़ा भारी खजाना गड़ा हुआ मिला। यह ठीक वही जगह थी, जिस जगह पर बैठकर वह भिखारी जिन्दगी भर भीख माँगा करता था। जहाँ पर वह बैठता था, उसके ठीक नीचे यह भारी खजाना गड़ा हुआ था।
जो खुशियों की तलाश में बाहर भटकते हैं, उनकी हालत भी कुछ ऐसी ही है। क्या हममें से हर एक के भीतर ही वह खुशियों का खजाना नहीं छुपा हुआ है, जिसे कि हम सब उम्र भर बाहर खोजते रहते हैं। इसके पहले कि खुशियों के खजाने की तलाश में, आनन्द और आलोक की खोज में, शान्ति और समृद्धि की चाहत में तुम यात्रा की शुरुआत करो, सबसे पहले तो उस जगह को खोज लेना, वहीं पर खोद लेना, जहाँ कि तुम खड़े हो। क्योंकि बड़े से बड़े खोजियों ने, यात्रियों ने सारी दुनियां में, सारी उम्र भटक कर अन्ततः यह खुशियों का खजाना अपने ही अन्तस् में पाया है। इसलिए अन्यत्र इसकी खोज व्यर्थ ही है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८२
एक भिखारी था, वह जिन्दगी भर एक ही जगह पर बैठकर भीख माँगता रहा। उसकी ख्वाहिश थी कि वह भी धनवान् बने। इसलिए वह दिन में ही नहीं रात में भी भीख मांगता। जो कुछ उसे भीख में मिलता उसे खर्च करने की बजाय जोड़ता रहता। अपनी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए उसने दिन-रात भरपूर कोशिश की। लेकिन वह कभी भी धनवान न हो सका। वह भिखारी की ही तरह जिया और भिखारी की ही तरह मरा। जब वह मरा तो उसके कफन के लायक भी पूरे पैसे उसके पास नहीं थे। उसके मर जाने के बाद आस-पास के लोगों ने उसका झोपड़ा तोड़ दिया। फिर सबने मिलकर वहाँ की जमीन साफ की। सफाई करने वाले इन सभी को तब भारी अचरज हुआ, जब उन्हें उस जगह पर बड़ा भारी खजाना गड़ा हुआ मिला। यह ठीक वही जगह थी, जिस जगह पर बैठकर वह भिखारी जिन्दगी भर भीख माँगा करता था। जहाँ पर वह बैठता था, उसके ठीक नीचे यह भारी खजाना गड़ा हुआ था।
जो खुशियों की तलाश में बाहर भटकते हैं, उनकी हालत भी कुछ ऐसी ही है। क्या हममें से हर एक के भीतर ही वह खुशियों का खजाना नहीं छुपा हुआ है, जिसे कि हम सब उम्र भर बाहर खोजते रहते हैं। इसके पहले कि खुशियों के खजाने की तलाश में, आनन्द और आलोक की खोज में, शान्ति और समृद्धि की चाहत में तुम यात्रा की शुरुआत करो, सबसे पहले तो उस जगह को खोज लेना, वहीं पर खोद लेना, जहाँ कि तुम खड़े हो। क्योंकि बड़े से बड़े खोजियों ने, यात्रियों ने सारी दुनियां में, सारी उम्र भटक कर अन्ततः यह खुशियों का खजाना अपने ही अन्तस् में पाया है। इसलिए अन्यत्र इसकी खोज व्यर्थ ही है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८२
गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020
👉 सम्मान
एक वृद्ध माँ रात को 11:30 बजे रसोई में बर्तन साफ कर रही है, घर में दो बहुएँ हैं, जो बर्तनों की आवाज से परेशान होकर अपने पतियों को सास को उल्हाना देने को कहती हैं
वो कहती है आपकी माँ को मना करो इतनी रात को बर्तन धोने के लिये हमारी नींद खराब होती है साथ ही सुबह 4 बजे उठकर फिर खट्टर पट्टर शुरू कर देती है सुबह 5 बजे पूजा
आरती करके हमे सोने नही देती ना रात को ना ही सुबह जाओ सोच क्या रहे हो जाकर माँ को मना करो
बड़ा बेटा खड़ा होता है और रसोई की तरफ जाता है रास्ते मे छोटे भाई के कमरे में से भी वो ही बाते सुनाई पड़ती जो उसके कमरे हो रही थी वो छोटे भाई के कमरे को खटखटा देता है छोटा भाई बाहर आता है।
दोनो भाई रसोई में जाते हैं, और माँ को बर्तन साफ करने में मदद करने लगते है, माँ मना करती पर वो नही मानते, बर्तन साफ हो जाने के बाद दोनों भाई माँ को बड़े प्यार से उसके कमरे में ले जाते है, तो देखते हैं पिताजी भी जागे हुए हैं
दोनो भाई माँ को बिस्तर पर बैठा कर कहते हैं, माँ सुबह जल्दी उठा देना, हमें भी पूजा करनी है, और सुबह पिताजी के साथ योगा भी करेंगे
माँ बोली ठीक है बच्चों, दोनो बेटे सुबह जल्दी उठने लगे, रात को 9:30 पर ही बर्तन मांजने लगे, तो पत्नियां बोलीं माता जी करती तो हैं आप क्यों कर रहे हो बर्तन साफ, तो बेटे बोले हम लोगो की शादी करने के पीछे एक कारण यह भी था कि माँ की सहायता हो जायेगी पर तुम लोग ये कार्य नही कर रही हो कोई बात नही हम अपनी माँ की सहायता कर देते है
हमारी तो माँ है इसमें क्या बुराई है, अगले तीन दिनों में घर मे पूरा बदलाव आ गया बहुएँ जल्दी बर्तन इसलिये साफ करने लगी की नही तो उनके पति बर्तन साफ करने लगेंगे साथ ही सुबह भी वो भी पतियों के साथ ही उठने लगी और पूजा आरती में शामिल होने लगी
कुछ दिनों में पूरे घर के वातावरण में पूरा बदलाव आ गया बहुएँ सास ससुर को पूरा सम्मान देने लगी ।
कहानी का सार।
माँ का सम्मान तब कम नही होता जब बहुवे उनका सम्मान नही करती, माँ का सम्मान तब कम होता है जब बेटे माँ का सम्मान नही करे या माँ के कार्य मे सहयोग ना करे ।
जन्म का रिश्ता हैं।
माता पिता पहले आपके हैं।
वो कहती है आपकी माँ को मना करो इतनी रात को बर्तन धोने के लिये हमारी नींद खराब होती है साथ ही सुबह 4 बजे उठकर फिर खट्टर पट्टर शुरू कर देती है सुबह 5 बजे पूजा
आरती करके हमे सोने नही देती ना रात को ना ही सुबह जाओ सोच क्या रहे हो जाकर माँ को मना करो
बड़ा बेटा खड़ा होता है और रसोई की तरफ जाता है रास्ते मे छोटे भाई के कमरे में से भी वो ही बाते सुनाई पड़ती जो उसके कमरे हो रही थी वो छोटे भाई के कमरे को खटखटा देता है छोटा भाई बाहर आता है।
दोनो भाई रसोई में जाते हैं, और माँ को बर्तन साफ करने में मदद करने लगते है, माँ मना करती पर वो नही मानते, बर्तन साफ हो जाने के बाद दोनों भाई माँ को बड़े प्यार से उसके कमरे में ले जाते है, तो देखते हैं पिताजी भी जागे हुए हैं
दोनो भाई माँ को बिस्तर पर बैठा कर कहते हैं, माँ सुबह जल्दी उठा देना, हमें भी पूजा करनी है, और सुबह पिताजी के साथ योगा भी करेंगे
माँ बोली ठीक है बच्चों, दोनो बेटे सुबह जल्दी उठने लगे, रात को 9:30 पर ही बर्तन मांजने लगे, तो पत्नियां बोलीं माता जी करती तो हैं आप क्यों कर रहे हो बर्तन साफ, तो बेटे बोले हम लोगो की शादी करने के पीछे एक कारण यह भी था कि माँ की सहायता हो जायेगी पर तुम लोग ये कार्य नही कर रही हो कोई बात नही हम अपनी माँ की सहायता कर देते है
हमारी तो माँ है इसमें क्या बुराई है, अगले तीन दिनों में घर मे पूरा बदलाव आ गया बहुएँ जल्दी बर्तन इसलिये साफ करने लगी की नही तो उनके पति बर्तन साफ करने लगेंगे साथ ही सुबह भी वो भी पतियों के साथ ही उठने लगी और पूजा आरती में शामिल होने लगी
कुछ दिनों में पूरे घर के वातावरण में पूरा बदलाव आ गया बहुएँ सास ससुर को पूरा सम्मान देने लगी ।
कहानी का सार।
माँ का सम्मान तब कम नही होता जब बहुवे उनका सम्मान नही करती, माँ का सम्मान तब कम होता है जब बेटे माँ का सम्मान नही करे या माँ के कार्य मे सहयोग ना करे ।
जन्म का रिश्ता हैं।
माता पिता पहले आपके हैं।
👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 1)
Q.1. What is the difference between daily Upasana, Anusthan and Purascharan?
Ans. Daily worship is a part of routine day to day living. Anusthan is a worship of a higher order in which the devotee is bound by many restrictions and has to follow specified rules and regulations. Consequently, in the latter case, special benefits accrue. Purascharan, however, is a still higher specialised form of Sadhana. For Purascharan a number of specific Mantras and rituals are to be followed. Thus, only an individual with an advance of training is capable of performing a Purascharan. For a layman, therefore, Anusthans are recommended, which are easy to perform.
Q.2. What are the types of Anusthans? How much time is required for each?
Ans. There are three types of Anusthans small (Laghu) medium (madhyam) and Big (Uchch). The counts are as follows :
1) Small Anusthan: 24000 Japs to be completed in 9 days at the rate of 27 cycles of rosary per day. Time taken: on an average, 3 hours per day (with about 10 to 11 Malas per hour).
2) Medium Anusthan: 1,25000 Japs to be completed in 40 days at the rate of 33 Malas per day. Time taken: 3-4 hours per day.
3) Major Anusthan: 24,00,000 Japs to be completed in a year at the rate of 66 Malas per day. Time taken: about 6 hours per day.
Q.3. What are the pre-requisites for an Anusthan?
Ans. Cleansing of body, clothes and implements of worship; the six rituals; ‘Panchopchar’; Jap; Meditation ; ‘Suryarghdan’; (A small Kalash with water and incense are kept along with a photograph or idol of the deity.) Oblations of : water, ‘Akchat’, ‘Chandan’, ‘Flowers’ and ‘Naivedya’. ‘Avahan’ and ‘Visarjan’ at the beginning and end are associated with Gayatri Mantra; Yagya and Brahmbhoj.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 71
Ans. Daily worship is a part of routine day to day living. Anusthan is a worship of a higher order in which the devotee is bound by many restrictions and has to follow specified rules and regulations. Consequently, in the latter case, special benefits accrue. Purascharan, however, is a still higher specialised form of Sadhana. For Purascharan a number of specific Mantras and rituals are to be followed. Thus, only an individual with an advance of training is capable of performing a Purascharan. For a layman, therefore, Anusthans are recommended, which are easy to perform.
Q.2. What are the types of Anusthans? How much time is required for each?
Ans. There are three types of Anusthans small (Laghu) medium (madhyam) and Big (Uchch). The counts are as follows :
1) Small Anusthan: 24000 Japs to be completed in 9 days at the rate of 27 cycles of rosary per day. Time taken: on an average, 3 hours per day (with about 10 to 11 Malas per hour).
2) Medium Anusthan: 1,25000 Japs to be completed in 40 days at the rate of 33 Malas per day. Time taken: 3-4 hours per day.
3) Major Anusthan: 24,00,000 Japs to be completed in a year at the rate of 66 Malas per day. Time taken: about 6 hours per day.
Q.3. What are the pre-requisites for an Anusthan?
Ans. Cleansing of body, clothes and implements of worship; the six rituals; ‘Panchopchar’; Jap; Meditation ; ‘Suryarghdan’; (A small Kalash with water and incense are kept along with a photograph or idol of the deity.) Oblations of : water, ‘Akchat’, ‘Chandan’, ‘Flowers’ and ‘Naivedya’. ‘Avahan’ and ‘Visarjan’ at the beginning and end are associated with Gayatri Mantra; Yagya and Brahmbhoj.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 71
👉 सहनशीलता
सहनशीलता में अद्भुत शक्ति है। इसमें आत्मचेतना की अजेयता है, अमरत्व है। जिसमें सहनशीलता नहीं है, वह जल्दी टूट जाता है। जबकि जिसने सहनशीलता के अभेद्य सुरक्षाकवच को ओढ़ लिया है, उसे जीवन में प्रतिक्षण पड़ती चोटें और भी मजबूत और दृढ़ करती है।
सन्त तिलोपा अपने शिष्यों को एक सच्ची घटना सुनाते थे; एक युवक किसी लुहार के घर के पास से गुजरता था। उसने निहाई पर पड़ते हथौड़ों की चोटों की आवाज सुनी। कौतुकवश उसने लुहार के घर के भीतर झाँक कर देखा। उसे दिखाई दिया कि एक कोने में बहुत से हथौड़े टूटकर विकृत होकर पड़े हैं। उसे थोड़ा अचरज तो हुआ, फिर भी उसने सोचा कि समय और उपयोग ने उनकी ऐसी गति बनायी होगी। उस युवक ने जिज्ञासावश लुहार से पूछा; इतने सारे हथौड़ों को इस दशा तक पहुँचाने के लिए आपको कितनी निहाइयों की जरूरत पड़ी?
इस सवाल के जवाब में लुहार जोर से हँस पड़ा और बोला; अरे भाई, एक ही निहाई केवल एक ही। अब तो वह युवक और भी गहरे अचरज में डूब गया। उसके गणितीय मन में सवालों के अनेकों समीकरण उभरे। निहाई एक और वह भी सर्वथा अविजित और सुरक्षित। जबकि हथौड़े अनेक और वे सबके सब टूटे हुए। आखिर इस अचरज भरे सच का रहस्यात्मक आधार क्या है? युवक अभी कुछ और सोच पाता इतने में वह लुहार बोल पड़ा, ऐसा इसलिए है मित्र क्योंकि हथौड़े चोट करते हैं और निहाई धैर्य से, सर्वथा अविचलित भाव से सभी चोटों को सहती है। इसीलिए एक ही निहाई सैकड़ों हथौड़ों को तोड़ डालती है।
इस कथा का समापन करते हुए सन्त तिलोपा ने अपने शिष्यों से कहा; जीवन का सत्य सहनशीलता है। अन्त में वही जीतता है जो चोटों को धैर्यपूर्वक सहता और स्वीकार करता है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८१
सन्त तिलोपा अपने शिष्यों को एक सच्ची घटना सुनाते थे; एक युवक किसी लुहार के घर के पास से गुजरता था। उसने निहाई पर पड़ते हथौड़ों की चोटों की आवाज सुनी। कौतुकवश उसने लुहार के घर के भीतर झाँक कर देखा। उसे दिखाई दिया कि एक कोने में बहुत से हथौड़े टूटकर विकृत होकर पड़े हैं। उसे थोड़ा अचरज तो हुआ, फिर भी उसने सोचा कि समय और उपयोग ने उनकी ऐसी गति बनायी होगी। उस युवक ने जिज्ञासावश लुहार से पूछा; इतने सारे हथौड़ों को इस दशा तक पहुँचाने के लिए आपको कितनी निहाइयों की जरूरत पड़ी?
इस सवाल के जवाब में लुहार जोर से हँस पड़ा और बोला; अरे भाई, एक ही निहाई केवल एक ही। अब तो वह युवक और भी गहरे अचरज में डूब गया। उसके गणितीय मन में सवालों के अनेकों समीकरण उभरे। निहाई एक और वह भी सर्वथा अविजित और सुरक्षित। जबकि हथौड़े अनेक और वे सबके सब टूटे हुए। आखिर इस अचरज भरे सच का रहस्यात्मक आधार क्या है? युवक अभी कुछ और सोच पाता इतने में वह लुहार बोल पड़ा, ऐसा इसलिए है मित्र क्योंकि हथौड़े चोट करते हैं और निहाई धैर्य से, सर्वथा अविचलित भाव से सभी चोटों को सहती है। इसीलिए एक ही निहाई सैकड़ों हथौड़ों को तोड़ डालती है।
इस कथा का समापन करते हुए सन्त तिलोपा ने अपने शिष्यों से कहा; जीवन का सत्य सहनशीलता है। अन्त में वही जीतता है जो चोटों को धैर्यपूर्वक सहता और स्वीकार करता है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८१
बुधवार, 5 फ़रवरी 2020
👉 QUERIES ABOUT GAYATRI YAGYA (Part 5)
Q.9. Is Akhand Yagya permissible?
Ans. Scriptures do not permit Akhand Yagya. Yagya should
be completed in a fixed time during the day only. The reason being the possibility of insects, worms etc. getting killed in the sacred fire, which makes it a violent and profane act.
Q.10. How are ‘Tantrik Mukhs’ different from Vedic Yagyas?
Ans. As opposed to Vedic Yagya performed during the day, Tantrik Mukhs are executed at night. ‘Holika Dahan’, burning of ‘funeral pyre’ etc. fall in the category of Mukh.
Mukhs are performed during night for various reasons. The oblations consist of non-eatable and untouchable objects. The sight too is not pleasant. The associated rituals are predominantly full of Tamogun. There is also no consideration for violence or non-violence during the performance. For all these considerations and to avoid interference from prying, Mukhs are organized at solitary, unknown places in utmost privacy.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 69
Ans. Scriptures do not permit Akhand Yagya. Yagya should
be completed in a fixed time during the day only. The reason being the possibility of insects, worms etc. getting killed in the sacred fire, which makes it a violent and profane act.
Q.10. How are ‘Tantrik Mukhs’ different from Vedic Yagyas?
Ans. As opposed to Vedic Yagya performed during the day, Tantrik Mukhs are executed at night. ‘Holika Dahan’, burning of ‘funeral pyre’ etc. fall in the category of Mukh.
Mukhs are performed during night for various reasons. The oblations consist of non-eatable and untouchable objects. The sight too is not pleasant. The associated rituals are predominantly full of Tamogun. There is also no consideration for violence or non-violence during the performance. For all these considerations and to avoid interference from prying, Mukhs are organized at solitary, unknown places in utmost privacy.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 69
👉 दुखी नहीं प्रसन्न होवें
बहुत बार लोग इस बात से दुखी रहते हैं, कि हमारे कई मित्र संबंधी रिश्तेदार हमें सिर्फ उसी दिन याद करते हैं, जिस दिन उनको हमारी आवश्यकता होती है। साल भर हमें पूछते भी नहीं। जिस दिन काम पड़ता है, उस दिन खूब आगे पीछे घूमते हैं।
तो इस बात से वे लोग दुखी, परेशान रहते हैं। मेरा आप सब से निवेदन है कि इस बात से परेशान न होवें। जरा सोचिए, अगर एक व्यक्ति मुसीबत में है, और वह आपको याद करता है, तो इसका अर्थ हुआ, कि वह आपको अपनी समस्या के समाधान के रूप में देखता है। अर्थात आपके पास उसकी समस्या का समाधान है। तो इसमें बुरा क्या है?
वह आपको याद करता है, यह तो आप के लिए सौभाग्य की बात है।
जरा सोचिए, क्या कोई व्यक्ति हर रोज मोमबत्ती को याद करता है? नहीं न! वह उसी दिन याद करता है, जिस दिन लाइट चली जाती है। तो इसी प्रकार से समस्या उत्पन्न होने पर,कोई आपको समाधान के रूप में याद करता है, तो आपके लिए तो खुशी की बात है। आप उससे ऊंचे हैं। इसलिए दुखी न हों, बल्कि ऐसा सोचकर प्रसन्न होवें, कि किसी को मेरी जरुरत है। मैं भी किसी से ऊंची स्थिति में हूँ, जिस को मेरी जरुरत है।
तो इस बात से वे लोग दुखी, परेशान रहते हैं। मेरा आप सब से निवेदन है कि इस बात से परेशान न होवें। जरा सोचिए, अगर एक व्यक्ति मुसीबत में है, और वह आपको याद करता है, तो इसका अर्थ हुआ, कि वह आपको अपनी समस्या के समाधान के रूप में देखता है। अर्थात आपके पास उसकी समस्या का समाधान है। तो इसमें बुरा क्या है?
वह आपको याद करता है, यह तो आप के लिए सौभाग्य की बात है।
जरा सोचिए, क्या कोई व्यक्ति हर रोज मोमबत्ती को याद करता है? नहीं न! वह उसी दिन याद करता है, जिस दिन लाइट चली जाती है। तो इसी प्रकार से समस्या उत्पन्न होने पर,कोई आपको समाधान के रूप में याद करता है, तो आपके लिए तो खुशी की बात है। आप उससे ऊंचे हैं। इसलिए दुखी न हों, बल्कि ऐसा सोचकर प्रसन्न होवें, कि किसी को मेरी जरुरत है। मैं भी किसी से ऊंची स्थिति में हूँ, जिस को मेरी जरुरत है।
👉 पूर्णता का प्रत्यावर्तन
गुरु पूर्णिमा- पूर्णता के प्रत्यावर्तन का महोत्सव है। इन पुण्य-पलों में सद्गुरु अपनी पूर्णता सुपात्र-सत्शिष्य में उड़ेलते हैं। परन्तु यह विरल सौभाग्य मिलता उन्हीं को है, जो अपने अस्तित्त्व को पूर्ण रूप से सद्गुरु के श्री चरणों में अर्पित करने का साहस जुटाते हैं। शिष्य का सम्पूर्ण समर्पण ही सद्गुरु द्वारा प्रत्यावर्तित की जाने वाली पूर्णता का आधार बनता है।
समर्पण ही पूर्णता के प्रत्यावर्तन की साधना है। हालांकि साधना की यह डगर कठिन है। जो शिष्य इस पर चलने का साहस कर रहे हैं, वे जानते हैं कि अपने ही अस्तित्त्व में छुपे हुए जड़ता-वासना और अहंता के दुर्गम शैल शिखरों को पार करना आसान नहीं है। और इन्हें पार किए बिना समर्पण सम्भव नहीं है। समर्पण की डगर पर चलने पर अपना ही मन अनेक मायावी खेल रचता है।
प्रारम्भिक क्षणों में तो कई बार शिष्य साधक अपनी जड़ता व निष्क्रियता को ही समर्पण समझ लेते हैं। परन्तु जब गुरु कृपा से विवेक की किरणें झिलमिलाती हैं तो बोध होता है कि समर्पण जड़-निष्क्रियता में नहीं बल्कि सद्गुरु के लिए निरन्तर कर्मरत रहने में है। इस अवरोध को पार कर लेने पर वासना अगला अवरोध बनती है। लेकिन जब गुरु कृपा शिष्य में बोध बनकर प्रकट होती है, तो शिष्य की चेतना में यह रहस्य उजागर होता है कि वासना के दुर्गम शैल शिखर को लांघने का रहस्य भक्तिपूर्ण तप में है।
इसके बाद अहंता का अन्तिम अवरोध बचा रहता है। समर्पण की डगर पर सतत् चलते रहने वाले शिष्य सद्गुरु कृपा से यह जान लेते हैं कि निष्काम सेवा की निरन्तरता से यह अन्तिम अवरोध भी विलीन हो जाता है। इस विलीनता के साथ ही पूर्णता की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८१
समर्पण ही पूर्णता के प्रत्यावर्तन की साधना है। हालांकि साधना की यह डगर कठिन है। जो शिष्य इस पर चलने का साहस कर रहे हैं, वे जानते हैं कि अपने ही अस्तित्त्व में छुपे हुए जड़ता-वासना और अहंता के दुर्गम शैल शिखरों को पार करना आसान नहीं है। और इन्हें पार किए बिना समर्पण सम्भव नहीं है। समर्पण की डगर पर चलने पर अपना ही मन अनेक मायावी खेल रचता है।
प्रारम्भिक क्षणों में तो कई बार शिष्य साधक अपनी जड़ता व निष्क्रियता को ही समर्पण समझ लेते हैं। परन्तु जब गुरु कृपा से विवेक की किरणें झिलमिलाती हैं तो बोध होता है कि समर्पण जड़-निष्क्रियता में नहीं बल्कि सद्गुरु के लिए निरन्तर कर्मरत रहने में है। इस अवरोध को पार कर लेने पर वासना अगला अवरोध बनती है। लेकिन जब गुरु कृपा शिष्य में बोध बनकर प्रकट होती है, तो शिष्य की चेतना में यह रहस्य उजागर होता है कि वासना के दुर्गम शैल शिखर को लांघने का रहस्य भक्तिपूर्ण तप में है।
इसके बाद अहंता का अन्तिम अवरोध बचा रहता है। समर्पण की डगर पर सतत् चलते रहने वाले शिष्य सद्गुरु कृपा से यह जान लेते हैं कि निष्काम सेवा की निरन्तरता से यह अन्तिम अवरोध भी विलीन हो जाता है। इस विलीनता के साथ ही पूर्णता की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८१
मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020
👉 जीवन मृत्यु
जो जीवन के रहस्य को जान लेते हैं- वे मृत्यु के रहस्य को भी जान लेते हैं। इस जीवन का प्रत्येक क्षण बोध का एक अवसर है। जिन्दगी का हर पल किसी नए रहस्य को अनावृत्त करने के लिए, उसे जानने के लिए है। जो इस सच से अनजान रहकर जिन्दगी के क्षण-पल को, दिवस-रात्रि को यूँ ही चुका देते हैं, वे दरअसल जीवन से चूक जाते हैं। मृत्यु भी उनके लिए केवल रहस्यमय भयावह अँधेरा बनकर रह जाती है।
चीनी सन्त लाओत्से के जीवन का एक प्रसंग है। साँझ के समय उसके पास एक युवक ची-लु एक उलझन लेकर आया। लाओत्से ने साँझ के झुरपुटे में उसके चेहरे की ओर ताकते हुए कहा- अपनी बात कहो? इस पर उस युवक ने पूछा मृत्यु क्या है? लाओत्से ने अपने उत्तर में थोड़ा हैरानी व्यक्त करते हुए कहा- अरे समस्या तो जीवन की होती है, मृत्यु की कैसी समस्या? फिर थोड़ी देर रुक कर लाओत्से ने धीमे से कहा- मृत्यु उनके लिए समस्या बनी रहती है, जो जीवन की समस्या का समाधान नहीं जान लेते।
ची-लु, लाओत्से के कथन को ध्यान से सुन रहा था। वृद्ध लाओत्से उससे कह रहा था- अपनी शक्तियों को केवल जीवन जी लेने में नहीं, बल्कि उसे ज्ञात करने में लगाओ। मृत्यु एवं मृतात्माओं की चिन्ता करने की बजाय जीवन एवं जीवित मनुष्यों की समस्याओं के समाधान की खोज करो। अरे जब तुम अभी जीवन से ही परिचित नहीं हो, तब तुम मृत्यु से भला कैसे परिचित हो सकते हो।
लाओत्से के कथन की गहराई का अहसास ची-लु को होने लगा। उसने अनुभव किया कि जो जीवन को जान लेते हैं, केवल वे ही मृत्यु को जान पाते हैं। जीवन का रहस्य जिन्हें ज्ञात हो जाता है, उन्हें मृत्यु भी रहस्य नहीं रह जाती है। क्योंकि वह तो उसी सच का दूसरा पहलू है।
मृत्यु का भय केवल उन्हें सताता है, जो कि जीवन को नहीं जानते। मृत्यु के भय से जो मुक्त हो सका- समझना कि उसने जीवन का बोध पा लिया। किसी की मृत्यु के समय ही यह पता चलता है कि वह व्यक्ति जीवन को सही ढंग से जानता था या नहीं। अब तनिक स्वयं में झाँको- वहाँ यदि मृत्यु का भय हो, तो समझो कि तुम्हें अभी जीवन को जानना शेष है। ऐसा कहते हुए लाओत्से ने साँझ समय का दीपक जला दिया, जिसके उजाले में जीवन व मृत्यु के सच झिलमिला उठे।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८०
चीनी सन्त लाओत्से के जीवन का एक प्रसंग है। साँझ के समय उसके पास एक युवक ची-लु एक उलझन लेकर आया। लाओत्से ने साँझ के झुरपुटे में उसके चेहरे की ओर ताकते हुए कहा- अपनी बात कहो? इस पर उस युवक ने पूछा मृत्यु क्या है? लाओत्से ने अपने उत्तर में थोड़ा हैरानी व्यक्त करते हुए कहा- अरे समस्या तो जीवन की होती है, मृत्यु की कैसी समस्या? फिर थोड़ी देर रुक कर लाओत्से ने धीमे से कहा- मृत्यु उनके लिए समस्या बनी रहती है, जो जीवन की समस्या का समाधान नहीं जान लेते।
ची-लु, लाओत्से के कथन को ध्यान से सुन रहा था। वृद्ध लाओत्से उससे कह रहा था- अपनी शक्तियों को केवल जीवन जी लेने में नहीं, बल्कि उसे ज्ञात करने में लगाओ। मृत्यु एवं मृतात्माओं की चिन्ता करने की बजाय जीवन एवं जीवित मनुष्यों की समस्याओं के समाधान की खोज करो। अरे जब तुम अभी जीवन से ही परिचित नहीं हो, तब तुम मृत्यु से भला कैसे परिचित हो सकते हो।
लाओत्से के कथन की गहराई का अहसास ची-लु को होने लगा। उसने अनुभव किया कि जो जीवन को जान लेते हैं, केवल वे ही मृत्यु को जान पाते हैं। जीवन का रहस्य जिन्हें ज्ञात हो जाता है, उन्हें मृत्यु भी रहस्य नहीं रह जाती है। क्योंकि वह तो उसी सच का दूसरा पहलू है।
मृत्यु का भय केवल उन्हें सताता है, जो कि जीवन को नहीं जानते। मृत्यु के भय से जो मुक्त हो सका- समझना कि उसने जीवन का बोध पा लिया। किसी की मृत्यु के समय ही यह पता चलता है कि वह व्यक्ति जीवन को सही ढंग से जानता था या नहीं। अब तनिक स्वयं में झाँको- वहाँ यदि मृत्यु का भय हो, तो समझो कि तुम्हें अभी जीवन को जानना शेष है। ऐसा कहते हुए लाओत्से ने साँझ समय का दीपक जला दिया, जिसके उजाले में जीवन व मृत्यु के सच झिलमिला उठे।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८०
सोमवार, 3 फ़रवरी 2020
👉 धन नहीं धन का संग्रह पाप:-
गोपाल्लव हजार गायों का स्वामी नगर-सेठ। धन की अथाह राशि थी उसके पास। किन्तु तो भी गोपाल्लव के जीवन में कोई रस नहीं था, शान्ति नहीं थी, कभी उसने सन्तोष का अनुभव किया हो ऐसा कभी भी नहीं हुआ। वैभव विलास से परिपूर्ण जीवन का एक क्षण भी तो उसे ऐसा याद नहीं आ रहा था जब उसने निर्द्वंदता प्राप्त की हो।
विषय-भोगी गोपाल्लव को यह सब भली प्रकार सोचने का अवसर तब मिला जब राजयक्ष्मा से पीड़ित होकर वह रोग शैया से जा लगा। गोपाल्लव सोच रहे- 'धन की आसक्ति, विषयों के सुख का आकर्षण कितना प्रबल है कि मनुष्य यह भी नहीं सोच पाता कि इस संसार से परे भी कुछ है क्या ? शरीर कृश और जराजीर्ण हो गया तब कहीं मृत्यु याद आती है और मनुष्य सोचता है कि जीवन व्यर्थ गया,पाया कुछ नहीं, गांठ में था सो भी खो दिया।'
गोपाल्लव पड़े यही सोच रहे थे तभी उसके कर्ण-कुहरों पर टकराई एक ध्वनि-बहुत मीठी, भक्ति की भावनाओं से ओत-प्रोत। ऐसा लगा द्वार पर ही बैठा हुआ कोई व्यक्ति भक्ति-गीत गा रहा है। मन को सच्चा सुख भावनाओं में मिलता है। जीवन भर के भूले भटके राही को परमपिता परमात्मा की क्षणिक अनुभूति भी कितना सुख कितना विश्राम देती है यह उस गोपाल्लव को देखता तो सहज ही पता चल जाता। भजन सुनने से ऐसा आराम मिला मानो जलते घावों पर किसी ने शीतल मरहम लगा दिया हो। गोपाल्लव को नींद आ गई आज वे पूर्ण-प्रगाढ़ नींद भर सोये।
नींद टूटी तो वह स्वर-अन्तर्धान हो चुका था। गोपाल्लव ने परिचारक से पूछा- "अभी थोड़ी देर पूर्व बाहर कौन गा रहा था उसे भीतर तो बुलाना, बड़ा ही कर्ण प्रिय स्वर था। उसने मुझे जो शान्ति प्रदान की वह अब तक कभी भी नहीं मिली।"
परिचारक ने हंसकर कहा- "वह कोई संगीतज्ञ नहीं था आर्य! वह तो नगर का मोची है यहीं बैठकर जूते गांठता है और दिन भर के निर्वाह योग्य धन मिलते ही उठकर चला जाता है। सुना है वह अपने ही बनाये पद गाता है, बड़ा ईश्वर भक्त है। तभी तो उसके हर शब्द से रस टपकता है।"
प्रातःकाल वही स्वर फिर सुनाई दिया। गोपाल्लव ने मोची को बुलाकर उसे एक स्वर्ण मुद्रा देते हुए कहा- "तात! यह लो स्वर्ण मुद्रा तुम्हारे कल के गीत ने मुझे अपूर्व शान्ति प्रदान की।"
स्वर्ण मुद्रा पाकर मोची बड़ा प्रसन्न हुआ। खुशी-खुशी घर लौट आया किन्तु उसके बाद कई दिन तक उसका स्वर सुनाई न दिया। सप्ताहान्त मोची आया और सीधे गोपाल्लव के पास जाकर बोला- ”अर्थ कामेष्वसक्तानाँ धर्म ज्ञानं विधीयते” तात! धन और इंद्रियों के वशवर्ती नहीं है जो वहीं धर्म और ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। आत्म-कल्याण के मार्ग में यह दोनों वस्तुयें बाधक हैं।"
यह कहकर उसने स्वर्ण मुद्रा लौटा दी। गोपाल्लव ने पूछा- "कई दिन से आये नहीं।"
मोची ने उत्तर दिया- "आर्य! धन की तृष्णा बुरी होती है आपकी दी इस स्वर्ण मुद्रा की रक्षा और उसके उपयोग का चिन्तन करने के आगे मुझे अपना मार्ग ही भूल गया था इसीलिए तो इसे लौटाने आया हूँ।"
गोपाल्लव ने अनुभव किया धन का जीवनोपयोगी उपभोग ही पर्याप्त है परिग्रह से कभी शान्ति नहीं मिल सकती अपना धर्म धर्मार्थ व्यय कर उसने भी मोची की तरह परम शान्ति पाई।
📖 अखण्ड ज्योति जून 1971 पृष्ठ
विषय-भोगी गोपाल्लव को यह सब भली प्रकार सोचने का अवसर तब मिला जब राजयक्ष्मा से पीड़ित होकर वह रोग शैया से जा लगा। गोपाल्लव सोच रहे- 'धन की आसक्ति, विषयों के सुख का आकर्षण कितना प्रबल है कि मनुष्य यह भी नहीं सोच पाता कि इस संसार से परे भी कुछ है क्या ? शरीर कृश और जराजीर्ण हो गया तब कहीं मृत्यु याद आती है और मनुष्य सोचता है कि जीवन व्यर्थ गया,पाया कुछ नहीं, गांठ में था सो भी खो दिया।'
गोपाल्लव पड़े यही सोच रहे थे तभी उसके कर्ण-कुहरों पर टकराई एक ध्वनि-बहुत मीठी, भक्ति की भावनाओं से ओत-प्रोत। ऐसा लगा द्वार पर ही बैठा हुआ कोई व्यक्ति भक्ति-गीत गा रहा है। मन को सच्चा सुख भावनाओं में मिलता है। जीवन भर के भूले भटके राही को परमपिता परमात्मा की क्षणिक अनुभूति भी कितना सुख कितना विश्राम देती है यह उस गोपाल्लव को देखता तो सहज ही पता चल जाता। भजन सुनने से ऐसा आराम मिला मानो जलते घावों पर किसी ने शीतल मरहम लगा दिया हो। गोपाल्लव को नींद आ गई आज वे पूर्ण-प्रगाढ़ नींद भर सोये।
नींद टूटी तो वह स्वर-अन्तर्धान हो चुका था। गोपाल्लव ने परिचारक से पूछा- "अभी थोड़ी देर पूर्व बाहर कौन गा रहा था उसे भीतर तो बुलाना, बड़ा ही कर्ण प्रिय स्वर था। उसने मुझे जो शान्ति प्रदान की वह अब तक कभी भी नहीं मिली।"
परिचारक ने हंसकर कहा- "वह कोई संगीतज्ञ नहीं था आर्य! वह तो नगर का मोची है यहीं बैठकर जूते गांठता है और दिन भर के निर्वाह योग्य धन मिलते ही उठकर चला जाता है। सुना है वह अपने ही बनाये पद गाता है, बड़ा ईश्वर भक्त है। तभी तो उसके हर शब्द से रस टपकता है।"
प्रातःकाल वही स्वर फिर सुनाई दिया। गोपाल्लव ने मोची को बुलाकर उसे एक स्वर्ण मुद्रा देते हुए कहा- "तात! यह लो स्वर्ण मुद्रा तुम्हारे कल के गीत ने मुझे अपूर्व शान्ति प्रदान की।"
स्वर्ण मुद्रा पाकर मोची बड़ा प्रसन्न हुआ। खुशी-खुशी घर लौट आया किन्तु उसके बाद कई दिन तक उसका स्वर सुनाई न दिया। सप्ताहान्त मोची आया और सीधे गोपाल्लव के पास जाकर बोला- ”अर्थ कामेष्वसक्तानाँ धर्म ज्ञानं विधीयते” तात! धन और इंद्रियों के वशवर्ती नहीं है जो वहीं धर्म और ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। आत्म-कल्याण के मार्ग में यह दोनों वस्तुयें बाधक हैं।"
यह कहकर उसने स्वर्ण मुद्रा लौटा दी। गोपाल्लव ने पूछा- "कई दिन से आये नहीं।"
मोची ने उत्तर दिया- "आर्य! धन की तृष्णा बुरी होती है आपकी दी इस स्वर्ण मुद्रा की रक्षा और उसके उपयोग का चिन्तन करने के आगे मुझे अपना मार्ग ही भूल गया था इसीलिए तो इसे लौटाने आया हूँ।"
गोपाल्लव ने अनुभव किया धन का जीवनोपयोगी उपभोग ही पर्याप्त है परिग्रह से कभी शान्ति नहीं मिल सकती अपना धर्म धर्मार्थ व्यय कर उसने भी मोची की तरह परम शान्ति पाई।
📖 अखण्ड ज्योति जून 1971 पृष्ठ
👉 QUERIES ABOUT GAYATRI YAGYA (Part 4)
Q.6. What is the necessity of collective-Yagyas?
Ans. Yagyas at a larger scale are required to be performed to purify the subtle environment and destroy pollution permeating the atmosphere. It infuses religious sentiments and enthusiasm in persons who are present and those who participate in it get an opportunity to take a vow to abandon one vice by way of offering Dev-dakshina and adopt one virtue or righteous tendency. In this way big Yagyas help in uplifting the moral and ethical levels of the participants.
The meaning of the word Yagya is to do sacrifice, to give money in charity and do worship. Its practical meaning is that one ought not to spend his entire earnings on himself and his family, but should also contribute a part of it for the welfare of others. It also implies that divinity and gentlemanliness should be respected and people should live together in mutual cooperation.
Q.7. Is ‘Agnihotra’ during the nights justified for matrimonial functions?
Ans. In fact scriptures advise performance of marriages and associated Agnihotra (Yagya) during the day only. However, it has become customary in India to perform marriages during the night because of the convenience and leisure of participants. Agnihotra associated with matrimonial functions performed during the night are, therefore, exceptions. Although marriages during the night have become a norm for this reason, the best period for the ceremony is considered as the dusk time.
Q.8. What type of clothes are recommended during performance of Yagya?
Ans. During a Yagya, the purifying energy emanating from the Agnihotra stimulates the outer skin and permeates the body through the physical perforations, bringing out sweat and other impurities from within. It is therefore, advisable to wear loose clothes to permit an easy intake of ‘ Pran’- the life-force and excretion of impure elements (Kalmash). For this reason, in ancient times a two-piece wear of Dhoti and Dupatta was recommended which permitted a free circulation of air in and around the body. Course, heavy and tight clothing is not advisable for this very reason, Dhoti and Kurta are cheap and convenient wears, which, besides meeting the above objectives, also serve the purpose of religious and cultural integrity. Dhoti and Kurta are also easily washable. In those regions where Dhoti-Kurta are not traditional wears, clean-washed Pyjama may be used. Socks should never be worn during the Sadhana. These are considered as dirty as shoes. (However, to ward off extreme cold, one may wear clean socks reserved exclusively, for this purpose).
Though traditionally a yellow Dupatta (Angavastra) on shoulders is recommended, it is not mandatory. Ladies may wear yellow Saree or a loose traditional wear.
For Group performance, it is advisable to keep stock of spare clothes for the visiting participants. Continuance of a Yagya in the night is not justifiable.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 67
Ans. Yagyas at a larger scale are required to be performed to purify the subtle environment and destroy pollution permeating the atmosphere. It infuses religious sentiments and enthusiasm in persons who are present and those who participate in it get an opportunity to take a vow to abandon one vice by way of offering Dev-dakshina and adopt one virtue or righteous tendency. In this way big Yagyas help in uplifting the moral and ethical levels of the participants.
The meaning of the word Yagya is to do sacrifice, to give money in charity and do worship. Its practical meaning is that one ought not to spend his entire earnings on himself and his family, but should also contribute a part of it for the welfare of others. It also implies that divinity and gentlemanliness should be respected and people should live together in mutual cooperation.
Q.7. Is ‘Agnihotra’ during the nights justified for matrimonial functions?
Ans. In fact scriptures advise performance of marriages and associated Agnihotra (Yagya) during the day only. However, it has become customary in India to perform marriages during the night because of the convenience and leisure of participants. Agnihotra associated with matrimonial functions performed during the night are, therefore, exceptions. Although marriages during the night have become a norm for this reason, the best period for the ceremony is considered as the dusk time.
Q.8. What type of clothes are recommended during performance of Yagya?
Ans. During a Yagya, the purifying energy emanating from the Agnihotra stimulates the outer skin and permeates the body through the physical perforations, bringing out sweat and other impurities from within. It is therefore, advisable to wear loose clothes to permit an easy intake of ‘ Pran’- the life-force and excretion of impure elements (Kalmash). For this reason, in ancient times a two-piece wear of Dhoti and Dupatta was recommended which permitted a free circulation of air in and around the body. Course, heavy and tight clothing is not advisable for this very reason, Dhoti and Kurta are cheap and convenient wears, which, besides meeting the above objectives, also serve the purpose of religious and cultural integrity. Dhoti and Kurta are also easily washable. In those regions where Dhoti-Kurta are not traditional wears, clean-washed Pyjama may be used. Socks should never be worn during the Sadhana. These are considered as dirty as shoes. (However, to ward off extreme cold, one may wear clean socks reserved exclusively, for this purpose).
Though traditionally a yellow Dupatta (Angavastra) on shoulders is recommended, it is not mandatory. Ladies may wear yellow Saree or a loose traditional wear.
For Group performance, it is advisable to keep stock of spare clothes for the visiting participants. Continuance of a Yagya in the night is not justifiable.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 67
👉 बोध
बोध का परिणाम है त्याग। जो अन्तस में बोध के घटित हुए बिना त्याग करते हैं, उनका जीवन केवल आडम्बर बन कर रह जाता है। अन्तर्भावों की घुटन, बेचैनी उन्हें निरन्तर सालती रहती है। एक युवक भगवान् तथागत के पास पहुँचा। उसके चेहरे पर विजय का भाव था। अपने भावों को व्यक्त करते हुए उसने शास्ता से कहा- उसने गृह त्याग करने की सारी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं। अब वह भिक्षु बनने के योग्य हो गया है। उस युवक के इस दर्प भरे कथन पर भगवान् हँस दिए।
महात्मा बुद्ध की इस हँसी को वहाँ पास बैठे सारिपुत्र ने देखा। युवक के चले जाने के बाद उन्होंने भगवान् से हँसी का रहस्य जानना चाहा। उत्तर में सारिपुत्र की ओर देखते हुए बुद्ध बोले, संसार की तैयारियों की बात तो सुनी थी, पर संन्यास की तैयारियाँ क्या है? यह कथन समझ में नहीं आया। संसार से संन्यास में परिवर्तन, चित्त में बोध क्रान्ति के बिना घटित नहीं हो सकता। त्याग करना, संन्यास लेना, भिक्षु होना, न तो वेष परिवर्तन है, न नाम परिवर्तन और न गृह परिवर्तन है। यह तो विशुद्ध दृष्टि परिवर्तन है।
त्याग के लिए तो चित्त का समग्र परिवर्तन होना चाहिए। इस क्रान्ति के लिए बौद्धिक गणितीय जोड़-तोड़, विभाजन गुणन फल के समीकरण काम नहीं देते। संसार में सफल होने की सारणियाँ भी यहाँ काम नहीं आती। सांसारिकता का सम्पूर्ण गणित इस बोध के लिए न केवल व्यर्थ है, बल्कि विघ्न भी है। स्वप्न की नियमावलियाँ, जैसे जागरण में काम नहीं आती हैं, वैसे ही संसार के सत्य संन्यास में काम नहीं आते। आखिर वैराग्य और संन्यास संसार के स्वप्न से जागरण ही तो है।
शास्ता के इन शाश्वत वचनों ने सारिपुत्र के अन्तःकरण को छुआ। पर इनसे अछूता वह युवक फिर से एक दिन बुद्ध के पास आया और थोड़ा चिन्तित स्वर में बोला, त्याग की सारी तैयारियों में एक कसर बाकी रह गयी है। अभी चीवर की व्यवस्था जुटानी है। उसके इस कथन पर बुद्ध विहंस कर बोले, युवक सारा सामान छोड़ने के लिए ही कोई भिक्षु होता है, तू उसी को जुटाने के लिए परेशान है। जा अपनी दुनियाँ में लौट जा, तू अभी भिक्षु होने योग्य नहीं है। इसके लिए तो बोध की सम्पदा चाहिए जो विवेक-वैराग्य के बिना नहीं मिलती
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १७९
महात्मा बुद्ध की इस हँसी को वहाँ पास बैठे सारिपुत्र ने देखा। युवक के चले जाने के बाद उन्होंने भगवान् से हँसी का रहस्य जानना चाहा। उत्तर में सारिपुत्र की ओर देखते हुए बुद्ध बोले, संसार की तैयारियों की बात तो सुनी थी, पर संन्यास की तैयारियाँ क्या है? यह कथन समझ में नहीं आया। संसार से संन्यास में परिवर्तन, चित्त में बोध क्रान्ति के बिना घटित नहीं हो सकता। त्याग करना, संन्यास लेना, भिक्षु होना, न तो वेष परिवर्तन है, न नाम परिवर्तन और न गृह परिवर्तन है। यह तो विशुद्ध दृष्टि परिवर्तन है।
त्याग के लिए तो चित्त का समग्र परिवर्तन होना चाहिए। इस क्रान्ति के लिए बौद्धिक गणितीय जोड़-तोड़, विभाजन गुणन फल के समीकरण काम नहीं देते। संसार में सफल होने की सारणियाँ भी यहाँ काम नहीं आती। सांसारिकता का सम्पूर्ण गणित इस बोध के लिए न केवल व्यर्थ है, बल्कि विघ्न भी है। स्वप्न की नियमावलियाँ, जैसे जागरण में काम नहीं आती हैं, वैसे ही संसार के सत्य संन्यास में काम नहीं आते। आखिर वैराग्य और संन्यास संसार के स्वप्न से जागरण ही तो है।
शास्ता के इन शाश्वत वचनों ने सारिपुत्र के अन्तःकरण को छुआ। पर इनसे अछूता वह युवक फिर से एक दिन बुद्ध के पास आया और थोड़ा चिन्तित स्वर में बोला, त्याग की सारी तैयारियों में एक कसर बाकी रह गयी है। अभी चीवर की व्यवस्था जुटानी है। उसके इस कथन पर बुद्ध विहंस कर बोले, युवक सारा सामान छोड़ने के लिए ही कोई भिक्षु होता है, तू उसी को जुटाने के लिए परेशान है। जा अपनी दुनियाँ में लौट जा, तू अभी भिक्षु होने योग्य नहीं है। इसके लिए तो बोध की सम्पदा चाहिए जो विवेक-वैराग्य के बिना नहीं मिलती
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १७९
रविवार, 2 फ़रवरी 2020
👉 वासन्ती हूक, उमंग और उल्लास यदि आ जाए जीवन में (अंतिम भाग)
आज के दिन हमने अपने ब्रह्मवर्चस का उद्घाटन कराया था। ब्रह्मवर्चस एक सिद्धान्त है कि मनुष्य के भीतर अनन्त शक्तियों का जखीरा सोया हुआ है जिसे जगाना है। जगाने के लिए तप करना पड़ता है। तप करके हम अपने भीतर सोए हुए स्रोतों को जगा सकते हैं, उभार सकते हैं। तप करने का सिद्धान्त यह है, जिससे खाने-पीने से लेकर ब्रह्मवर्चस के नियम पालने तक के बहिरंग तप आते है और भीतर वाले तप में हम अपनी अन्तरात्मा और चेतना को तपा डालते हैं। तप करने से शक्तियाँ आती हैं, मनुष्य में देवत्व का उदय होता है। मनुष्य में देवत्व का उदय करने के लिए सामान्य जीवन में आस्तिकता अपनानी और बहिरंग जीवन में तपश्चर्या करनी पड़ती है। आस्तिकता का अर्थ नेक जीवन और तपश्चर्या का अर्थ लोकहित के लिए, सिद्धान्तों के लिए मुसीबतें सहने से है। तप करने की शिक्षा ब्रह्मवर्चस द्वारा सिखाते हैं। यह एक प्रतीक है, सिम्बल है, एक स्थान है। मनुष्य के भीतर देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण—यही हमारे दो सपने हैं। हमारी कुण्डलिनी और शक्तिपात इन्हीं दो प्रयोजनों में काम आती हैं, तीसरे किसी प्रयोजन में नहीं। तपपरायण और लोकोपयोगी जीवन यही मनुष्य में देवत्व का उदय है।
धरती पर स्वर्ग के वातावरण का क्या मतलब है? अच्छे वातावरण को स्वर्ग बैकुण्ठ में ही नहीं वरन् जमीन पर भी हो सकता है। जहाँ अच्छे आदमी, शरीफ आदमी, अच्छी नीयत के आदमी ठीक परम्परा को अपनाकर भले आदमियों के तरीके से रहते हैं वहीं स्वर्ग पैदा हो जाता है। हम चाहते थे कि धरती पर स्वर्ग बनाने के लिए कोई एक ऐसा मोहल्ला बना दें, एक ऐसा ग्राम बसा दें, जिसमें त्याग करने वाले, सेवा करने वाले लोग आएँ और वहाँ पर सिद्धान्तों के आधार पर जिएँ, हल्की-फुल्की, हँसती-हँसाती शान्ति की जिन्दगी जिएँ, मोहब्बत की जिन्दगी जिएँ और यह दिखा सकें कि लोकोपयोगी जिन्दगी भी जी जा सकती है क्या? धरती पर इसका एक नमूना बनाने के लिए हमने गायत्री नगर बसाया है। और आपको दावत देते हैं कि आप अपने बच्चे को संस्कारवान नहीं बना सकते तो उसको हमारे सुपुर्द कर दीजिए। आप कौन हैं? हम वाल्मीकि ऋषि हैं और वाल्मीकि ऋषि के तरीके से आपके बच्चों को लव-कुश बना सकते हैं। आपकी औरत को तपस्विनी सीता बना सकते हैं। दोनों संस्थाओं की वसन्त पंचमी के दिन इसीलिए स्थापना की गई है। आस्तिकता के लिए, ज्ञानयज्ञ के लिए, विचार-क्रान्ति के लिए यह एक नमूना है।
तपश्चर्या के सिद्धान्तों को प्राणवान बनाने के लिए, ज्ञान-विज्ञान के लिए, ब्रह्मवर्चस और आस्तिकता को जीवित करने के लिए, धरती पर स्वर्ग पैदा करने के लिए, हिल-मिलकर रहने और त्याग, बलिदान, सेवा की जिन्दगी जीने के लिए गायत्री नगर बसाया गया है। लोग यहाँ हमारा प्यार पाने के लिए, संस्कार पाने के लिए, आदर्श पाने के लिए, प्रेरणा पाने के लिए, प्रकाश पाने के लिए आते हैं। नैमिषारण्य क्षेत्र में शौनक और सूत का संवाद होता था। सारे ब्राह्मण बैठते थे, ज्ञान-ध्यान की बातें करते थे और लोकोपयोगी जीवन जीते थे। मेरा भी मन था कि ‘एकदा नैमिषारण्ये’ के तरीके से स्नेहवश लोग यहाँ आएँ और हिल-मिलकर काम करें, समाज सेवा की बातें करें, दूसरों को उठाने की बातें करें। हम एक ऐसी दुनिया बसाना चाहते हैं, ऐसा नगर बसाना चाहते हैं, जिससे दुनिया को दिखा सकें कि भावी जीवन, भावी संसार अगर होगा तो स्वर्ग जैसा कैसे बनाया जा सकेगा? स्वर्ग में शान्ति का, परमार्थ का जीवन जीने के लिए क्या-क्या तकलीफें आ सकती हैं? ऐसा हम गायत्री नगर का उद्घाटन करते हैं। चूँकि हमारे गुरु ने यही दिया और उसके लिए वायदा किया कि तेरा ऊँचा उद्देश्य है, तो तेरे लिए कमी नहीं पड़ेगी। मैं भी आपको विश्वास दिलाता हूँ कि अगर आपके जीवन में उद्देश्य ऊँचे हों तो आपको कमी नहीं रहेगी, कोई अभाव नहीं रहेगा। मेरी एक ही इच्छा और एक ही कामना रही है कि वसन्त पर्व के दिन आपको बुलाऊँ और अपने भीतर जो पक्ष है, उस पिटारी को खोलकर दिखाऊँ कि मेरे अन्दर कितना दर्द है? कितनी करुणा है? जीवन को पवित्र बनाने की कितनी संवेदना है? कितना देवत्व है? यही खोलकर आपको दिखाना चाहता था। अगर आपको ये चीजें पसन्द हों तो मैं चाहता हूँ कि आप इन चीजों को देखें, इनको परखें, छुएँ और अगर हिम्मत हो तो इनको खरीद ही ले जाएँ।
ॐ शान्ति।
.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
धरती पर स्वर्ग के वातावरण का क्या मतलब है? अच्छे वातावरण को स्वर्ग बैकुण्ठ में ही नहीं वरन् जमीन पर भी हो सकता है। जहाँ अच्छे आदमी, शरीफ आदमी, अच्छी नीयत के आदमी ठीक परम्परा को अपनाकर भले आदमियों के तरीके से रहते हैं वहीं स्वर्ग पैदा हो जाता है। हम चाहते थे कि धरती पर स्वर्ग बनाने के लिए कोई एक ऐसा मोहल्ला बना दें, एक ऐसा ग्राम बसा दें, जिसमें त्याग करने वाले, सेवा करने वाले लोग आएँ और वहाँ पर सिद्धान्तों के आधार पर जिएँ, हल्की-फुल्की, हँसती-हँसाती शान्ति की जिन्दगी जिएँ, मोहब्बत की जिन्दगी जिएँ और यह दिखा सकें कि लोकोपयोगी जिन्दगी भी जी जा सकती है क्या? धरती पर इसका एक नमूना बनाने के लिए हमने गायत्री नगर बसाया है। और आपको दावत देते हैं कि आप अपने बच्चे को संस्कारवान नहीं बना सकते तो उसको हमारे सुपुर्द कर दीजिए। आप कौन हैं? हम वाल्मीकि ऋषि हैं और वाल्मीकि ऋषि के तरीके से आपके बच्चों को लव-कुश बना सकते हैं। आपकी औरत को तपस्विनी सीता बना सकते हैं। दोनों संस्थाओं की वसन्त पंचमी के दिन इसीलिए स्थापना की गई है। आस्तिकता के लिए, ज्ञानयज्ञ के लिए, विचार-क्रान्ति के लिए यह एक नमूना है।
तपश्चर्या के सिद्धान्तों को प्राणवान बनाने के लिए, ज्ञान-विज्ञान के लिए, ब्रह्मवर्चस और आस्तिकता को जीवित करने के लिए, धरती पर स्वर्ग पैदा करने के लिए, हिल-मिलकर रहने और त्याग, बलिदान, सेवा की जिन्दगी जीने के लिए गायत्री नगर बसाया गया है। लोग यहाँ हमारा प्यार पाने के लिए, संस्कार पाने के लिए, आदर्श पाने के लिए, प्रेरणा पाने के लिए, प्रकाश पाने के लिए आते हैं। नैमिषारण्य क्षेत्र में शौनक और सूत का संवाद होता था। सारे ब्राह्मण बैठते थे, ज्ञान-ध्यान की बातें करते थे और लोकोपयोगी जीवन जीते थे। मेरा भी मन था कि ‘एकदा नैमिषारण्ये’ के तरीके से स्नेहवश लोग यहाँ आएँ और हिल-मिलकर काम करें, समाज सेवा की बातें करें, दूसरों को उठाने की बातें करें। हम एक ऐसी दुनिया बसाना चाहते हैं, ऐसा नगर बसाना चाहते हैं, जिससे दुनिया को दिखा सकें कि भावी जीवन, भावी संसार अगर होगा तो स्वर्ग जैसा कैसे बनाया जा सकेगा? स्वर्ग में शान्ति का, परमार्थ का जीवन जीने के लिए क्या-क्या तकलीफें आ सकती हैं? ऐसा हम गायत्री नगर का उद्घाटन करते हैं। चूँकि हमारे गुरु ने यही दिया और उसके लिए वायदा किया कि तेरा ऊँचा उद्देश्य है, तो तेरे लिए कमी नहीं पड़ेगी। मैं भी आपको विश्वास दिलाता हूँ कि अगर आपके जीवन में उद्देश्य ऊँचे हों तो आपको कमी नहीं रहेगी, कोई अभाव नहीं रहेगा। मेरी एक ही इच्छा और एक ही कामना रही है कि वसन्त पर्व के दिन आपको बुलाऊँ और अपने भीतर जो पक्ष है, उस पिटारी को खोलकर दिखाऊँ कि मेरे अन्दर कितना दर्द है? कितनी करुणा है? जीवन को पवित्र बनाने की कितनी संवेदना है? कितना देवत्व है? यही खोलकर आपको दिखाना चाहता था। अगर आपको ये चीजें पसन्द हों तो मैं चाहता हूँ कि आप इन चीजों को देखें, इनको परखें, छुएँ और अगर हिम्मत हो तो इनको खरीद ही ले जाएँ।
ॐ शान्ति।
.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 कर्म फल
एक बार शंकर जी पार्वती जी भ्रमण पर निकले। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक तालाब में कई बच्चे तैर रहे थे, लेकिन एक बच्चा उदास मुद्रा में बैठा था। पार्वती जी ने शंकर जी से पूछा, यह बच्चा उदास क्यों है? शंकर जी ने कहा, बच्चे को ध्यान से देखो। पार्वती जी ने देखा, बच्चे के दोनों हाथ नही थे, जिस कारण वो तैर नही पा रहा था। पार्वती जी ने शंकर जी से कहा कि आप शक्ति से इस बच्चे को हाथ दे दो ताकि वो भी तैर सके।
शंकर जी ने कहा, हम किसी के कर्म में हस्तक्षेप नही कर सकते हैं क्योंकि हर आत्मा अपने कर्मो के फल द्वारा ही अपना काम अदा करती है। पार्वती जी ने बार बार विनती की। आखिरकर शंकर जी ने उसे हाथ दे दिए। वह बच्चा भी पानी में तैरने लगा।
एक सप्ताह बाद शंकर जी पार्वती जी फिर वहाँ से गुज़रे। इस बार मामला उल्टा था, सिर्फ वही बच्चा तैर रहा था और बाकी सब बच्चे बाहर थे। पार्वती जी ने पूछा यह क्या है ? शंकर जी ने कहा, ध्यान से देखो। देखा तो वह बच्चा दूसरे बच्चों को पानी में डुबो रहा था इसलिए सब बच्चे भाग रहे थे। शंकर जी ने जवाब दिया : हर व्यक्ति अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है। भगवान किसी के कर्मो के फेर में नही पड़ते है। उसने पिछले जन्मो में हाथों द्वारा यही कार्य किया था इसलिए उसके हाथ नही थे। हाथ देने से पुनः वह दूसरों की हानि करने लगा है।
प्रकृति नियम के अनुसार चलती है, किसी के साथ कोई पक्षपात नही। आत्माएँ जब ऊपर से नीचे आती हैं तो अच्छी ही होती हैं, कर्मो अनुसार कोई अपाहिज है तो कोई भिखारी, तो कोई गरीब तो कोई अमीर लेकिन सब परिवर्तन शील है। अगर महलों में रहकर या पैसे के नशे में आज कोई बुरा काम करता है तो कल उसका भुगतान तो सबको करना ही पड़ेगा।
शंकर जी ने कहा, हम किसी के कर्म में हस्तक्षेप नही कर सकते हैं क्योंकि हर आत्मा अपने कर्मो के फल द्वारा ही अपना काम अदा करती है। पार्वती जी ने बार बार विनती की। आखिरकर शंकर जी ने उसे हाथ दे दिए। वह बच्चा भी पानी में तैरने लगा।
एक सप्ताह बाद शंकर जी पार्वती जी फिर वहाँ से गुज़रे। इस बार मामला उल्टा था, सिर्फ वही बच्चा तैर रहा था और बाकी सब बच्चे बाहर थे। पार्वती जी ने पूछा यह क्या है ? शंकर जी ने कहा, ध्यान से देखो। देखा तो वह बच्चा दूसरे बच्चों को पानी में डुबो रहा था इसलिए सब बच्चे भाग रहे थे। शंकर जी ने जवाब दिया : हर व्यक्ति अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है। भगवान किसी के कर्मो के फेर में नही पड़ते है। उसने पिछले जन्मो में हाथों द्वारा यही कार्य किया था इसलिए उसके हाथ नही थे। हाथ देने से पुनः वह दूसरों की हानि करने लगा है।
प्रकृति नियम के अनुसार चलती है, किसी के साथ कोई पक्षपात नही। आत्माएँ जब ऊपर से नीचे आती हैं तो अच्छी ही होती हैं, कर्मो अनुसार कोई अपाहिज है तो कोई भिखारी, तो कोई गरीब तो कोई अमीर लेकिन सब परिवर्तन शील है। अगर महलों में रहकर या पैसे के नशे में आज कोई बुरा काम करता है तो कल उसका भुगतान तो सबको करना ही पड़ेगा।
👉 प्रत्याहार - क्या है ?
प्रत्याहार - (आष्टांग योग का पाँचवा अंग) क्या है ?
ऋषिजन कहते है कि इंद्रियों के व्यर्थ स्खलन को रोकें और उसे उस दिशा में लगाएँ जिससे आपका जीवन सुख और शांतिमय व्यतीत हो।
अष्टांगयोग का पाँचवाँ अंग प्रत्याहार है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार यह पाँच योग के बाहरी अंग हैं अर्थात योग में प्रवेश करने की भूमिका मात्र।
जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है उसी प्रकार इंद्रियों को इन घातक वासनाओं से विमुख कर अपनी आंतरिकता की ओर मोड़ देने का प्रयास करना ही प्रत्याहार है।
क्या है वासनाएँ : काम, क्रोध, लोभ, मोह यह तो मोटे-मोटे नाम हैं, लेकिन व्यक्ति उन कई बाहरी बातों में रत रहता है जो आज के आधुनिक समाज की उपज हैं जैसे शराबखोरी, सिनेमाई दर्शन और चार्चाएँ, अत्यधिक शोरपूर्ण संगीत, अति भोजन जिसमें माँस भक्षण के प्रति आसक्ति, महत्वाकांक्षाओं की अंधी दौड़ और ऐसी अनेक बातें जिससे कि पाँचों इंद्रियों पर अधिक भार पड़ता है और अंतत: वह समयपूर्व निढाल हो बीमारियों की चपेट में आ जाती है।
नुकसान : आँख रूप को, नाक गंध को, जीभ स्वाद को, कान शब्द को और त्वचा स्पर्श को भोगती है। भोगने की इस वृत्ति की जब अति होती है तो इस सबसे मन में विकार की वृद्धि होती है। ये भोग जैसे-जैसे बढ़ते हैं, इंद्रियाँ सक्रिय होकर मन को विक्षिप्त करती रहती हैं। मन ज्यादा व्यग्र तथा व्याकुल होने लगता है, जिससे शक्ति का क्षय होता है।
उपाय : इंद्रियों को भोगों से दूर करने तथा इंद्रियों के रुख को भीतर की ओर मोड़कर स्थिर रखने के लिए प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। प्राणायाम के अभ्यास से इंद्रियाँ स्थिर हो जाती हैं। सभी विषय समाप्त हो जाते हैं। अतः प्राणायाम के अभ्यास से प्रत्याहार की स्थिति अपने आप बनने लगती है। दूसरा उपाय है रोज सुबह और शाम पाँच से तीस मिनट का ध्यान। इस सबके बावजूद अदि आपके भीतर संकल्प है तो आप संकल्प मात्र से ही प्रत्याहार की स्थिति में हो सकते हैं। हालाँकि प्रत्याहार को साधने के हठयोग में कई तरीके बताए गए हैं।
लाभ : यम, नियम, आसन और प्राणायम को साधने से प्रत्याहार स्वत: ही सध जाता है। इसके सधने से व्यक्ति का एनर्जी लेवल बढ़ता है। पवित्रता के कारण ओज में निखार आता है। किसी भी प्रकार के रोग शरीर और मन के पास फटकते तक नहीं हैं। आत्मविश्वास और विचार क्षमता बढ़ जाती है, जिससे धारणा सिद्धि में सहयोग मिलता है। खासकर यह अनंत में छलाँग लगाने के लिए स्वयं के तैयार होने की स्थिति है।
ऋषिजन कहते है कि इंद्रियों के व्यर्थ स्खलन को रोकें और उसे उस दिशा में लगाएँ जिससे आपका जीवन सुख और शांतिमय व्यतीत हो।
अष्टांगयोग का पाँचवाँ अंग प्रत्याहार है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार यह पाँच योग के बाहरी अंग हैं अर्थात योग में प्रवेश करने की भूमिका मात्र।
जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है उसी प्रकार इंद्रियों को इन घातक वासनाओं से विमुख कर अपनी आंतरिकता की ओर मोड़ देने का प्रयास करना ही प्रत्याहार है।
क्या है वासनाएँ : काम, क्रोध, लोभ, मोह यह तो मोटे-मोटे नाम हैं, लेकिन व्यक्ति उन कई बाहरी बातों में रत रहता है जो आज के आधुनिक समाज की उपज हैं जैसे शराबखोरी, सिनेमाई दर्शन और चार्चाएँ, अत्यधिक शोरपूर्ण संगीत, अति भोजन जिसमें माँस भक्षण के प्रति आसक्ति, महत्वाकांक्षाओं की अंधी दौड़ और ऐसी अनेक बातें जिससे कि पाँचों इंद्रियों पर अधिक भार पड़ता है और अंतत: वह समयपूर्व निढाल हो बीमारियों की चपेट में आ जाती है।
नुकसान : आँख रूप को, नाक गंध को, जीभ स्वाद को, कान शब्द को और त्वचा स्पर्श को भोगती है। भोगने की इस वृत्ति की जब अति होती है तो इस सबसे मन में विकार की वृद्धि होती है। ये भोग जैसे-जैसे बढ़ते हैं, इंद्रियाँ सक्रिय होकर मन को विक्षिप्त करती रहती हैं। मन ज्यादा व्यग्र तथा व्याकुल होने लगता है, जिससे शक्ति का क्षय होता है।
उपाय : इंद्रियों को भोगों से दूर करने तथा इंद्रियों के रुख को भीतर की ओर मोड़कर स्थिर रखने के लिए प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। प्राणायाम के अभ्यास से इंद्रियाँ स्थिर हो जाती हैं। सभी विषय समाप्त हो जाते हैं। अतः प्राणायाम के अभ्यास से प्रत्याहार की स्थिति अपने आप बनने लगती है। दूसरा उपाय है रोज सुबह और शाम पाँच से तीस मिनट का ध्यान। इस सबके बावजूद अदि आपके भीतर संकल्प है तो आप संकल्प मात्र से ही प्रत्याहार की स्थिति में हो सकते हैं। हालाँकि प्रत्याहार को साधने के हठयोग में कई तरीके बताए गए हैं।
लाभ : यम, नियम, आसन और प्राणायम को साधने से प्रत्याहार स्वत: ही सध जाता है। इसके सधने से व्यक्ति का एनर्जी लेवल बढ़ता है। पवित्रता के कारण ओज में निखार आता है। किसी भी प्रकार के रोग शरीर और मन के पास फटकते तक नहीं हैं। आत्मविश्वास और विचार क्षमता बढ़ जाती है, जिससे धारणा सिद्धि में सहयोग मिलता है। खासकर यह अनंत में छलाँग लगाने के लिए स्वयं के तैयार होने की स्थिति है।
शनिवार, 1 फ़रवरी 2020
👉 श्रीमद्भगवद्गीता
श्रीमद्भगवद्गीता- ऐसा सुमधुर गीत है, जिसे स्वयं भगवान् ने गाया है। धर्मभूमि-कुरुक्षेत्र में खड़े विश्वरूप विश्वगुरु श्रीकृष्ण ने कर्म का यह काव्य कहा है। इसमें सृष्टि की सरगम है- जीवन के बोल हैं। सृष्टि सृजन-स्थिति और विलय का कोई भी ऐसा रहस्य नहीं है- जिसे इस भगवद् गान में गाया न गया हो। इसी तरह जीवन के सभी आयाम- सभी विद्याएँ इसमें बड़े ही अपूर्व ढंग से प्रकट हुई हैं। इस दिव्य गीत के सृष्टि सप्तक (सप्तलोक) को प्रकृति अष्टक (अष्टधा प्रकृति) के साथ स्वयं भगवती चित्शक्ति ने अपनी चैतन्य धाराओं में गूँथा है।
श्रीमद्भगवद्गीता का परिचय स्वयं भगवद्गीता के प्रत्येक अध्याय के अन्त में कहा गया है।
‘‘ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीता सूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे ........ नाम ..........अध्यायः।’’
ॐकार परमेश्वर का तत्-सत् रूप में स्मरण करते हुए बताया गया है कि यह भगवद् गान उपनिषद् है- यह ब्रह्मविद्या है, यह योगशास्त्र है, जो कृष्ण और अर्जुन संवाद बनकर प्रकट हुआ है। भगवद्गीता के इस परिचय में गहनता और व्यापकता दोनों है। यह भगवद्गीता, उपनिषदों की परम्परा में श्रेष्ठतम उपनिषद् है।
इस उपनिषद् के आचार्य श्रीकृष्ण हैं और शिष्य धनुषपाणि अर्जुन हैं। आचार्य श्रीकृष्ण समस्त ज्ञान का आदि हैं और अन्त हैं। वे स्वयं अनन्त हैं। शिष्य अर्जुन-जिज्ञासु हैं, गुरुनिष्ठ हैं और अपने सद्गुरु भगवान् गुरु को पूर्णतया समर्पित हैं। सद्गुरु व सत्शिष्य की इसी स्थिति में ब्रह्मविद्या प्रकट होती है। सृष्टि व जीवन के सभी रहस्य कहे-सुने-समझे व आत्मसात् किए जाते हैं। परन्तु इन रहस्यों का साक्षात् व साकार तभी स्पष्ट होता है- जब शिष्य योग साधक बनकर सद्गुरु द्वारा उपदिष्ट योग साधना का अभ्यास करे। योग की विविध तकनीकों का इसमें प्राकट्य होने से ही गीता योगशास्त्र है।
अन्त में यह कहा गया है कि उपनिषद् प्रणीत यह ब्रह्मविद्या- योगशास्त्र तभी समझा जा सकता है, जब कृष्ण-अर्जुन संवाद की स्थिति बने। जो अर्जुन की तरह गुरुनिष्ठ शिष्य नहीं है, उसका तो हमेशा भगवान् गुरु श्रीकृष्ण से विवाद ही रहता है। श्रीमद्भगवद्गीता तो केवल उनके अन्तस् में अपने स्वरों को झंकृत करती है, जो भगवान् के साथ समस्वरित है। संवाद की यह विशेषता बने तो आज भी पृथ्वीतत्त्व से बनी धर्मभूमि देह में परात्पर चेतना बनकर विद्यमान परमात्मा श्रीकृष्ण- जीवात्मा अर्जुन को निष्काम कर्म का काव्य सुनाते हैं।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १७१
श्रीमद्भगवद्गीता का परिचय स्वयं भगवद्गीता के प्रत्येक अध्याय के अन्त में कहा गया है।
‘‘ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीता सूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे ........ नाम ..........अध्यायः।’’
ॐकार परमेश्वर का तत्-सत् रूप में स्मरण करते हुए बताया गया है कि यह भगवद् गान उपनिषद् है- यह ब्रह्मविद्या है, यह योगशास्त्र है, जो कृष्ण और अर्जुन संवाद बनकर प्रकट हुआ है। भगवद्गीता के इस परिचय में गहनता और व्यापकता दोनों है। यह भगवद्गीता, उपनिषदों की परम्परा में श्रेष्ठतम उपनिषद् है।
इस उपनिषद् के आचार्य श्रीकृष्ण हैं और शिष्य धनुषपाणि अर्जुन हैं। आचार्य श्रीकृष्ण समस्त ज्ञान का आदि हैं और अन्त हैं। वे स्वयं अनन्त हैं। शिष्य अर्जुन-जिज्ञासु हैं, गुरुनिष्ठ हैं और अपने सद्गुरु भगवान् गुरु को पूर्णतया समर्पित हैं। सद्गुरु व सत्शिष्य की इसी स्थिति में ब्रह्मविद्या प्रकट होती है। सृष्टि व जीवन के सभी रहस्य कहे-सुने-समझे व आत्मसात् किए जाते हैं। परन्तु इन रहस्यों का साक्षात् व साकार तभी स्पष्ट होता है- जब शिष्य योग साधक बनकर सद्गुरु द्वारा उपदिष्ट योग साधना का अभ्यास करे। योग की विविध तकनीकों का इसमें प्राकट्य होने से ही गीता योगशास्त्र है।
अन्त में यह कहा गया है कि उपनिषद् प्रणीत यह ब्रह्मविद्या- योगशास्त्र तभी समझा जा सकता है, जब कृष्ण-अर्जुन संवाद की स्थिति बने। जो अर्जुन की तरह गुरुनिष्ठ शिष्य नहीं है, उसका तो हमेशा भगवान् गुरु श्रीकृष्ण से विवाद ही रहता है। श्रीमद्भगवद्गीता तो केवल उनके अन्तस् में अपने स्वरों को झंकृत करती है, जो भगवान् के साथ समस्वरित है। संवाद की यह विशेषता बने तो आज भी पृथ्वीतत्त्व से बनी धर्मभूमि देह में परात्पर चेतना बनकर विद्यमान परमात्मा श्रीकृष्ण- जीवात्मा अर्जुन को निष्काम कर्म का काव्य सुनाते हैं।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १७१
शुक्रवार, 31 जनवरी 2020
👉 मनन
मनन - मन से मन-न होने की आध्यात्मिक यात्रा है। यह ऐसी अनोखी प्रक्रिया है- जिसमें संलग्न होने- समर्पित होने पर मन का सम्पूर्णतया विसर्जन और विलय हो जाता है। इस सच पर कितना ही कोई अचरज क्यों न करे, फिर भी सच तो सच ही है। हालांकि इस अनूठे रहस्य से कम ही लोग परिचित हैं। जबकि मनन शब्द का चलन बहुतायत में होता है। अनेकों-अनेक बार इसका प्रयोग करते हैं। फिर भी इसके आध्यात्मिक रहस्य का स्पर्श विरले ही कर पाते हैं।
सामान्य सोच तो एक विचार को बार-बार सोचते रहने को मनन मान लेती है। जबकि आध्यात्मवेत्ता कहते हैं कि मन में उठती किसी विशेष विचार की गुनगुनाहट-गूँज अथवा ध्वनि-प्रतिध्वनि को मनन कहना ठीक नहीं है। यह तो एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति है- जो किसी सत्यान्वेषी साधक को तब होती है, जब वह किसी पवित्र विचार, पवित्र भाव अथवा पावन व्यक्तित्व या उसी दिव्य छवि को अपने में धारण करता है।
यदि पवित्र तत्त्वों-सत्यों को ठीक से धारण कर लिया गया है, तो मन में स्वतः ही धारणा घटित होने लगती है। मन कुछ उसी तरह मौन हो उसकी अनुभूति में डूबता है, जैसे कि कोई स्वाद लोलुप व्यक्ति स्वादिष्ट भोजन करते समय- मूक और मौन हो स्वाद के अनुभव में खो जाता है। उस समय उसके अन्दर की हल-चल थम जाती है। उसे अपने आस-पास होने वाली उथल-पुथल का भी ध्यान नहीं रहता।
कुछ ऐसी ही घटना तब घटित होती है- जब मन-मनन में डूबता है। जैसे-जैसे उसमें धारण किए गए पवित्र विचार, पवित्र भाव अथवा पावन व्यक्तित्व या उसकी दिव्य छवि की अनुभूति प्रगाढ़ होती है, वह विलीन होता जाता है। यह विलीनता इस कदर प्रगाढ़ होती है कि मन, उसमें संजोयी सारी संस्कार राशि, कर्म बीजों का ढेर, आदतें, प्रवृत्तियाँ सभी खो जाती हैं। यहाँ तक कि मन-मन-न में परिवर्तित हो जाता है। मन का यह परिवर्तन और रूपान्तरण ही तो मन-न है। जिसके परिणाम में अन्तस् में उज्ज्वल आत्म प्रकाश की धाराएँ फूट पड़ती हैं। यह ऐसा सच है जिसे जो करे - सो जाने।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १७०
सामान्य सोच तो एक विचार को बार-बार सोचते रहने को मनन मान लेती है। जबकि आध्यात्मवेत्ता कहते हैं कि मन में उठती किसी विशेष विचार की गुनगुनाहट-गूँज अथवा ध्वनि-प्रतिध्वनि को मनन कहना ठीक नहीं है। यह तो एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति है- जो किसी सत्यान्वेषी साधक को तब होती है, जब वह किसी पवित्र विचार, पवित्र भाव अथवा पावन व्यक्तित्व या उसी दिव्य छवि को अपने में धारण करता है।
यदि पवित्र तत्त्वों-सत्यों को ठीक से धारण कर लिया गया है, तो मन में स्वतः ही धारणा घटित होने लगती है। मन कुछ उसी तरह मौन हो उसकी अनुभूति में डूबता है, जैसे कि कोई स्वाद लोलुप व्यक्ति स्वादिष्ट भोजन करते समय- मूक और मौन हो स्वाद के अनुभव में खो जाता है। उस समय उसके अन्दर की हल-चल थम जाती है। उसे अपने आस-पास होने वाली उथल-पुथल का भी ध्यान नहीं रहता।
कुछ ऐसी ही घटना तब घटित होती है- जब मन-मनन में डूबता है। जैसे-जैसे उसमें धारण किए गए पवित्र विचार, पवित्र भाव अथवा पावन व्यक्तित्व या उसकी दिव्य छवि की अनुभूति प्रगाढ़ होती है, वह विलीन होता जाता है। यह विलीनता इस कदर प्रगाढ़ होती है कि मन, उसमें संजोयी सारी संस्कार राशि, कर्म बीजों का ढेर, आदतें, प्रवृत्तियाँ सभी खो जाती हैं। यहाँ तक कि मन-मन-न में परिवर्तित हो जाता है। मन का यह परिवर्तन और रूपान्तरण ही तो मन-न है। जिसके परिणाम में अन्तस् में उज्ज्वल आत्म प्रकाश की धाराएँ फूट पड़ती हैं। यह ऐसा सच है जिसे जो करे - सो जाने।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १७०
👉 QUERIES ABOUT GAYATRI YAGYA (Part 3)
Q.3. Is it necessary to perform Yagya daily?
Ans. Gayatri and Yagya constitute a pair. Gayatri has
been called righteous wisdom and Yagya as righteous act. Coordination of both gives wisdom to solve all problems. Yagya may be performed as and when it is convenient. It can suffice to utter Gayatri Mantra and offer ghee and sugar in fire. If it is sought to be more brief, the purpose of symbolic worship of Agnihotra can also be fulfilled if a Ghrit lamp is lighted, incense- stick is burnt and Gayatri Mantra is uttered. If even this brief ritual cannot be performed daily, it should be done once in a week or on any convenient day at least once in a month. Those who are not acquainted with the procedure, and facilitators and material resources are not available, can write to Shantikunj for performance of Yagya in requisite quantity. Yagya is performed daily in Shantikunj for two hours in three Yagyashala having nine Yagya Kunds each.
Q.4. How many Kunds are required in a Yagya?
Ans. On a small scale, the members of the family may offer 2400 (cumulative) Ahutis in a Single Kund Yagya. If neighbours, relatives and friends also wish to participate, a five Kundiya Yagya may be organised and five thousand oblations offered.
Q.5. What type of Prasad is recommended during Poornahuti?
Ans. In the existing circumstances, it is advised to replace Brahmbhoj with Brahmadan, wherein instead of sweets, literature pertaining to Gayatri Sadhana is distributed as Prasad to the deserving participants.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 64
Ans. Gayatri and Yagya constitute a pair. Gayatri has
been called righteous wisdom and Yagya as righteous act. Coordination of both gives wisdom to solve all problems. Yagya may be performed as and when it is convenient. It can suffice to utter Gayatri Mantra and offer ghee and sugar in fire. If it is sought to be more brief, the purpose of symbolic worship of Agnihotra can also be fulfilled if a Ghrit lamp is lighted, incense- stick is burnt and Gayatri Mantra is uttered. If even this brief ritual cannot be performed daily, it should be done once in a week or on any convenient day at least once in a month. Those who are not acquainted with the procedure, and facilitators and material resources are not available, can write to Shantikunj for performance of Yagya in requisite quantity. Yagya is performed daily in Shantikunj for two hours in three Yagyashala having nine Yagya Kunds each.
Q.4. How many Kunds are required in a Yagya?
Ans. On a small scale, the members of the family may offer 2400 (cumulative) Ahutis in a Single Kund Yagya. If neighbours, relatives and friends also wish to participate, a five Kundiya Yagya may be organised and five thousand oblations offered.
Q.5. What type of Prasad is recommended during Poornahuti?
Ans. In the existing circumstances, it is advised to replace Brahmbhoj with Brahmadan, wherein instead of sweets, literature pertaining to Gayatri Sadhana is distributed as Prasad to the deserving participants.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
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