शनिवार, 18 जनवरी 2020

👉 हम बदलेंगे-युग बदलेगा

जैसा हम औरों को बनाना-बदलना चाहते हैं, वैसा ही स्वयं को बनाना- बदलना होगा। दूसरों को बदलने के लिए स्वयं में बदलाव जरूरी है। अपने में आने वाले बदलाव से आसपास के लोग-वातावरण अपने आप ही बदलने लगते हैं। बिना स्वयं में परिवर्तन लाये औरों में परिवर्तन सम्भव नहीं।
  
जो स्वयं जाग्रत् है केवल वही दूसरों के जागरण में सहायक बन सकता है। स्वयं सोया हुआ भला औरों को किस तरह से जगा पाएगा? सच भी यही है कि जिनके भीतर स्वयं ही अंधकार का आवास है, वह कभी भी दूसरों के लिए प्रकाश का स्रोत नहीं हो सकता। दूसरों की सेवा केवल तभी सम्भव है, जब हम स्वयं का सृजन प्रारम्भ करें। लोक निर्माण-आत्म निर्माण के बिना असम्भव है।
  
किसी ने सन्त तिरुवल्लुवर से पूछा-मैं सेवा करना चाहता हूँ। वह मुस्कराकर बोले-‘पहले साधना-तब सेवा, क्योंकि जो तुम्हारे पास नहीं है, उसे तुम दूसरों को कैसे दोगे? साधना से जब पाया जा चुका हो-तभी उसे सेवा में बाँटा जा सकता है।’ हालाँकि उलटबासी यही है कि सेवा की चाहत बहुतों में होती है, पर स्व-साधना और आत्म सृजन की नहीं। यह तो वैसा ही हुआ कि जैसे कोई बीज तो न बोना चाहे, लेकिन फसल काटना चाहे, परन्तु यह प्रकृति के विधान के विपरीत है।
  
किसी अत्यन्त दीन-दुर्बल-दरिद्र व्यक्ति ने भगवान् महावीर से कहा-भगवन्! मैं मानवता की सेवा कैसे करूँ? वह व्यक्ति शरीर से नहीं आत्मा से दुर्बल था, वह दरिद्र धन से नहीं जीवन से था। भगवान् महावीर ने उसे बड़े ही करुण भाव से देखा और बड़ी दयाभाव से उससे बोले-क्या कर सकोगे तुम? उनका यह वचन बहुत छोटा था, परन्तु बड़ा गहरा मर्म था इसमें। अच्छा हो कि इसे हम सब अपने मन में दुहरावें? यह वचन हममें से हर एक को कहा गया है। सब करना स्वयं पर और स्वयं से प्रारम्भ होता है। स्वयं से पहले जो दूसरों के लिए कुछ करना चाहता है, वह भूल में है। स्वयं का जो कल्याण कर लेता है, वही औरों का कल्याण कर पाता है। अपने परिवर्तन में ही युग परिवर्तन का बीज निहित है। तभी तो युगऋषि की वाणी कहती है-‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६३

शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

👉 सच्ची साधना

पति का अकाल निधन साध्वी रोहिणी पर वज्राघात था, जिसे सहन कर सकना असम्भव था किन्तु पुत्र देव शर्मा के प्रति कर्त्तव्य और ममता ने उसे जीने के लिए विवश कर दिया। अभ्यास नहीं था तो भी उसने घोर परिश्रम किया और बेटे का न केवल पालन पोषण ही वरन् उसे वेदाँग के अध्ययन जैसी उच्च शिक्षा भी दिलाई। देवशर्मा माँ के प्रताप से अपने समय के श्रेष्ठ विद्वानों में गिना जाने लगा।

माँ वृद्धा हो गई थी नीति कहती थी अब बेटे को प्रत्युपकार-करना चाहिये पर दुष्ट कृतघ्नता को क्या कहा जाये-जहाँ भी उसका जन्म हुआ मर्यादायें, नीति और कर्त्तव्य भाव वहीं विश्रृंखलित हुये। संसार में यह जो कलह और अशाँति है कृतघ्नता ही उसका एक मात्र कारण है। बेटे के मन में यह समझ नहीं आई। अपनी मुक्ति, अपना स्वर्ग उसे अधिक आवश्यक लगा सो माँ और छोटी बहन को बिलखता छोड़कर देवशर्मा घर से भाग निकला और तीर्थाटन करते हुये नन्दिग्राम के एक मठ में जाकर तप करने लगा।

एक दिन देवशर्मा प्रातःकाल नदी के किनारे पहुँचे। स्नान कर अपना चीवर सूखने के लिये जमीन पर डाल दिया और स्वयं वहीं पर आसन डालकर ध्यान मग्न हो गये। प्रातःकालीन सन्ध्या समाप्त कर जैसे ही देवशर्मा उठे उन्होंने देखा एक कौवा और एक बकुल चीवर को चोंच में दबाकर उड़े जा रहे हैं। देवशर्मा के क्रोध का ठिकाना न रहा। उन्होंने बड़ी-बड़ी तान्त्रिक सिद्धियाँ प्राप्त की थी। शक्ति का मद बड़ा बुरा होता है। उन्होंने क्रोधपूर्ण दृष्टि से पक्षियों की ओर देखा। आँखों से अग्नि ज्वाला फूटी और दोनों पक्षी जलकर वहीं खाक हो गये। देवशर्मा अपनी सिद्धि देखकर फूले नहीं समाये। उन्हें लगा समस्त भूमंडल पर उन जैसा कोई दूसरा सिद्ध नहीं है।

अहंकार से भरे देवशर्मा मठ की ओर चल पड़े। मार्ग में नंदिग्राम पड़ता था सोचा आज की भिक्षा भी लेते चलें सो देवशर्मा ने एक सद् गृहस्थ के द्वार पर “भवति भिक्षाँ देहि” की पुकार लगाई और भिक्षा की प्रतीक्षा में वहीं खड़े हो गये।

भीतर से आवाज आ रही थी इससे पता चलता था कि गृह स्वामिनी अन्दर ही है पर कोई बाहर नहीं आ रहा यह देखकर देवशर्मा को बड़ा गुस्सा आया। उन्होंने दुबारा तिबारा और चौथी बार भी पुकारा पर हर बार भीतर से एक ही आवाज आई स्वामी जी ठहरिये! मैं अभी साधना कर रही हूँ साधना समाप्त कर लूँगी तक भिक्षा दूँगी तब तक आप खड़े रहिये। देवशर्मा का क्रोध सीमा पार गया। तड़प कर बोले-दुष्टा ! साधना कर रही है या परिहास-जानती नहीं इस अवहेलना का क्या परिणाम हो सकता है।

संयत और गम्भीर स्वर भीतर से बाहर आया- महात्मन् जानती हूँ आप शाप देना चाहेंगे किन्तु मैं कोई कौवा और बलाका नहीं, संत ! जो तुम्हारी कोप दृष्टि से जलकर नष्ट हो जाऊँगी। जिसने तुम्हें जीवन भर पाला उस माँ को त्यागकर अपनी मुक्ति चाहने वाले साधु ! आप मेरा कुछ भी तो बिगाड़ नहीं सकते ?

देवशर्मा का सिद्धि का अहंकार चूर-चूर हो गया। कुछ देर बाद गृह स्वामिनी घर से बाहर आई और भिक्षा देने लगी। देवशर्मा ने साश्चर्य पूछा-भद्रे ! आप मुझे यह बतादे कि आप कौन सी साधना करती हैं जिससे बिना देखे ही कौए के जलाने और माँ को असहाय छोड़ आने की घटना जान गई।

गृह स्वामिनी ने उत्तर दिया---कर्त्तव्य की साधना” महात्मन् ! म् अपने पति, अपने बच्चे, अपने परिवार, समाज और देश के प्रति कर्त्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करती हूँ। उसी की सिद्धि है यह। देवशर्मा का सिर लज्जा से नीचे झुक गया। भीख नहीं ली उन्होंने -चुपचाप जिस घर को छोड़कर आये थे चल पड़े उसी ओर छोड़ी हुई कर्त्तव्य की साधना पूरी करने।

अखण्ड ज्योति दिसम्बर, 1971    

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/December/v1.14

👉 दोनों साथ चलें

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 3)

Q.7. Should one deliberate on the meaning of the Mantra during the Jap?  
Ans. As regards contemplation on the meaning of Mantra during the Jap, it is recommended that one should only meditate on the deity during Jap. The practical difficulty in thinking about meaning of Mantra at the time of Jap is that it takes time to form imaginary pictures in accordance with the meaning of every word and during this time Jap cannot be interrupted. Jap should be continuous, uninterrupted and non-stop like the flow of oil. Of course, the meaning of Gayatri Mantra should be thoroughly understood. If it is sought to form imaginary pictures of the meanings of different words, this can conveniently be done at some other time but not with Jap.

Q.8. Is taking a bath essential prior to Jap? What should one wear during the Jap?


Ans. It is more appropriate to sit in front of an altar after taking bath, wearing clean clothes and perform worship in the morning with due salutations and reverence. It keeps the mind happily steady and helps in its concentration. But when duty hours are odd, a person is sick or where it is not possible to arrange for water, one can perform mental Jap without the help of Mala. Scriptures recommend cleanliness of body and clothes as a pre-requisite for any religious practice or worship. Since a routine of wearing freshly-washed clothes during each session of Upasana, is to be maintained, one is advised to be clad only in a two-piece garment, one each for covering the upper and lower parts of the body e.g. Dhoti - Dupatta. However, for protection against cold an additional under-garment can be worn.
  
Though the pundits prescribe cleanliness of body and clothes, it is not considered mandatory for all occasions. Situations may arise when the worshipper finds it difficult to adhere to this rule strictly. Under such circumstances, one should not discontinue the routine of worship. Otherwise, the aspirant is totally deprived of even the partial benefit. Besides cleanliness, the objective of these preparatory rituals is to help the worshipper in getting rid of lethargy. A sick or weak person may wash his arms, feet and face, or if possible wipe the body with a wet cloth.  
  
Woollen or silken clothes do not absorb dirt and perspiration to the extent cotton wears do. Nevertheless, these too require cleaning at certain intervals. Since, now-a-days silk is obtained by boiling live silk worms, silk wears are no longer considered appropriate for a spiritual practice. These are not recommended for Upasana. The same holds true for animal hides. The ancient sages used hides of animals who died a natural death. This is no longer true. Animals are being killed for their hides. Now-a-days a variety of other floor-spreads (woollens, synthetics) are available ,which may be used; and cleaned by washing or through exposure to sun from time to time.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 52

👉 विचारों का प्रतिफल कर्म

कर्म जो आँखों से दिखाई देता है वह अदृश्य−विचारों का ही दृश्य रूप है। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा करता है। चोरी, बेईमानी, दगाबाजी, शैतानी, बदमाशी कोई आदमी यकायक कभी नहीं कर सकता, उसके मन में उस प्रकार के विचार बहुत दिनों से घूमते रहते हैं। अवसर न मिलने से वे दबे हुए थे, समय पाते ही वे कार्य रूप में परिणत हो गये। बाहर के लोगों को किसी के द्वारा यकायक कोई दुष्कर्म होने की बात सुनकर इसलिए आश्चर्य होता है कि वे उसकी भीतरी स्थिति को नहीं जानते थे। इसी प्रकार कोई अधिक उच्चकोटि का सत्कर्म करने का भी आकस्मिक समाचार भले ही सुनने को मिले पर वस्तुतः उसकी तैयारी वह मनुष्य भीतर ही भीतर बहुत दिनों से कर रहा होता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति आज उन्नतिशील एवं सफलता सम्पन्न दिखाई पड़ते हैं वे अचानक ही वैसे नहीं बन गये होते वरन् चिरकाल से उनका प्रयत्न उसके लिए चल रहा होता है। भीतरी पुरुषार्थ को उनने बहुत पहले जगा लिया होता है। उनने अपने मनःक्षेत्र में भीतर ही भीतर वह अच्छाइयाँ जमा कर ली होती हैं जिनके द्वारा बाह्य जगत में दूसरों का सहयोग एवं उन्नति का आधार निर्भर रहता है। बाह्य−जीवन हमारे भीतरी जीवन का प्रतिबिम्ब मात्र है। पर्दे के पीछे दीपक जल रहा है तो उसका कुछ प्रकाश बाहर भी परिलक्षित होता है। इसी प्रकार भीतरी पर्दे में जिनमें कुछ अच्छाइयाँ हैं वे ही उनकी कीमत पर बाह्य−जगत में सुख साधनों को खरीद लेते हैं।

अनैतिक प्रकृति के लोग बहुधा अपनी चालाकी से धन कमा लेते या कोई उन्नति कर लेते देखे जाते हैं। इससे उस कमाई का सारा श्रेय अनैतिकता को नहीं दिया जा सकता। माना कि लोगों की कमजोरी और भोलेपन का लाभ कई शैतान उठा लेते हैं पर इस शैतानी के पीछे भी उनकी चतुरता, तीव्र−बुद्धि, तत्परता, सावधानी, लगन, हिम्मत, कष्ट सहिष्णुता आदि अनेक गुण छिपे रहते हैं। डाकुओं में भी पुरुषार्थ, हिम्मत, बहादुरी, कष्ट−सहिष्णुता, चतुरता, सावधानी अपने साथियों के प्रति वफादारी आदि अनेक मानसिक गुण भी होते हैं। यदि यह गुण किसी में न हों और वह केवल बेईमानी से ही कुछ लाभ उठाना चाहे तो उसका प्रयास एक कदम भी सफल नहीं हो सकता। अनैतिक लोगों की सफलता से चकित होकर कई लोग अनैतिकता को लाभ और सफलता का हेतु मानने लगते हैं यह भूल है। अनैतिकता के फलस्वरूप तो उन्हें सर्वत्र अविश्वास, घृणा, तिरस्कार, असहयोग एवं यथा अवसर राजकीय एवं ईश्वरीय दंड ही मिलता है। लाभ का श्रेय तो उस मनोभूमि को है जो प्रयत्नपूर्वक इतनी जल्दी बनाई गई कि अनैतिकता के दंड एवं लोगों की पकड़ से बचते हुए एक प्रकार की सफलता प्राप्त कर ली गई। बेवकूफ एवं आलसी, लापरवाह एवं अड़ियल प्रकृति के लोग अनैतिकता को अपनाकर भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। यदि पाप से ही कमाई होती हुई होती तो हर दुरात्मा को सफलता मिली होती। फिर जो लाखों अनैतिक मनोभूमि वाले भीख−टूक पर गुजारा करते दिखाई देते हैं वे सब के सब मालदार ही हो गये होते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 22

👉 सन्त का सान्निध्य

सन्त का सान्निध्य अनूठा है। इसके रहस्य गहरे हैं। सन्त के सान्निध्य में जो दृश्य घटित होता है वह थोड़ा है। लेकिन जो अदृश्य में घटता है वह ज्यादा है। उसका महत्त्व और मोल-अनमोल है। सन्त का सान्निध्य नियमित होता रहे, इसमें निरन्तरता बनी रहे तो अपने आप ही जीवनक्रम बदलने लगता है। मन में जड़ जमाये बैठी उल्टी आस्थाएँ-मान्यताएँ-आग्रह फिर से उलटकर सीधे होने लगते हैं। सन्त के सान्निध्य में विचार परिवर्तन-जीवन परिवर्तन के क्रांति स्फुलिंग यूँ ही उड़ते रहते हैं। इनके दाहक स्पर्श से जीवन की अवांछनीयताओं का दहन हुए बिना नहीं रहता।
  
सन्त के सान्निध्य में सत् का सत्य बोध अनायास हो जाता है। पर यह हो पाता है सन्त के चित् के कारण, उसके चैतन्य प्रवाह की वजह से। हालाँकि यह अदृश्य में घटित होता है, परन्तु इसकी अनुभूति आनन्द बनकर अस्तित्व में बरसती रहती है। यह आश्चर्यकारी परिवर्तन उन सभी में होता है जो सन्त के सान्निध्य में सजग होकर रहते हैं। यह ऐसा अनुभव है जिसे जब मन करे तभी पाया जा सकता है। बस इसके लिए चाहिए सन्त का सान्निध्य।
  
इस सम्बन्ध में बड़ा पावन प्रसंग है-सन्त फरीद के जीवन का। बिलाल नाम के एक व्यक्ति को कुछ षड्यन्त्रकारी लोगों ने उनके पास भेजा। उसने सन्त फरीद को कई तरह से परेशान करने की कोशिश की, पर वह सन्त शान्त रहे। सन्त की इस अचरज भरी शान्ति ने बिलाल के मन को छू लिया और वह उन्हीं के साथ रहने लगा। उसे सन्त के साथ रहते हुए कई वर्ष बीत गये। इन वर्षों में उसमें कई आध्यात्मिक परिवर्तन हुए। हालाँकि उसने इसके लिए कोई साधना नहीं की थी। बाबा फरीद के एक शिष्य ने थोड़ा हैरान होते हुए इसका रहस्य जानना चाहा। बाबा फरीद ने हँसते हुए कहा-सन्त का सान्निध्य स्वयं में साधना है। सन्त के सान्निध्य में अदृश्य आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह उमड़ता रहता है जो न चाहने पर भी पास रहने वाले के व्यक्तित्व के ऊपरी और भीतरी परतों को प्रभावित करता है। यह प्रक्रिया अदृश्य रूप में उसके चित्त एवं चेतना को घेरती है और परिणाम में अपने आप ही सन्त के सान्निध्य में आध्यात्मिक व्यक्तित्व जन्म पा जाता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६२

गुरुवार, 16 जनवरी 2020

Aastikata Aur Sajjanata Ki Riti Niti | आस्तिकता और सज्जनता की रीति नीति ...



Title

👉 पीला पत्ता क्यों गिरा?


👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 2)

Q.4. What is the most suitable time of the day for Upasana?  

Ans. Brahm Muhoort i.e. an hour before sunrise in the morning, and just before sunset in the evening to an hour thereafter bring forth maximum result. During day Upasana may be carried out any time according to one’s convenience. Although a fixed routine in timings is recommended yet it is not mandatory. As a matter of fact, mental Jap may be carried on even while walking, travelling or lying on the bed. (The movements of lips, vocal chord and tongue are forbidden in the latter case.)

Q.5. Is  Gayatri Jap permissible during night time?

Ans. Sages had advised Jap during the day-time for two reasons. One: the nights are meant exclusively for rest. Any activity during the night (including Upasana) is likely to affect one’s health.
Two: since Sun is the deity of Gayatri, the radiations from the Sun are readily obtained from sunlight during day. Nevertheless, Upasana during the night is not a taboo. One may choose his own convenient time for Jap without any apprehension regarding the procedure.

Q.6. Is Jap permissible along-with other activities?

Ans. One may perform Jap even while walking or without taking a bath or during other physical activities. On such occasions, however, it should only be a mental process without movement of lips, larynx and tongue. Instead of taking the help of a rosary, a clock may be used for keeping a count.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 52

👉 सच्ची सम्पदा एवं विभूतियाँ

धन, यश, स्वास्थ्य, विद्या, सहयोग आदि विभूतियों के आधार पर इस संसार में नाना प्रकार की सम्पदायें और सुविधायें प्राप्त की जाती हैं। और यह विभूतियाँ मनुष्य की मानसिक स्थिति के अनुरूप आती या चली जाती हैं। भाग्य, देवता, ईश्वर, परिस्थिति आदि को भी दुख−सुख का कारण माना जाता है, पर थोड़ी और गहराई तक जाने पर यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि भाग्य एवं ईश्वर का वरदान एवं अभिशाप भी मनुष्य के अपने विचारों एवं कार्यों के आधार पर ही प्राप्त होता है। न तो ईश्वर अन्यायी है और न भाग्य लिखने वाला विधाता बावला है जो जिसका प्रारब्ध बिना विचारे चाहे जैसा लिख डाला करे। इस बाह्य जगत में अव्यवस्था चल भी सकती है, यहाँ रिश्वत, पक्षपात या भूल−चूक की गुँजाइश रहती है, पर सूक्ष्म जगत में ईश्वरीय विधान एवं कार्यफल के क्षेत्र में किसी प्रकार की गड़बड़ी संभव नहीं। वहाँ मनुष्य का कर्तृत्व ही परखा जाता है और उसी आधार पर प्रारब्ध का निर्माण किया जाता है। वस्तुतः पुरुषार्थ ही प्रारब्ध बनकर सामने आया हुआ है। आज का पुरुषार्थ अगले कल प्रारब्ध बनने वाला है। कर्म और उसका फल मिलने में देर−सवेर का जो अंतर रह जाता है वही भाग्य और ईश्वर को हमारे कर्म से बाहर की कोई स्वतन्त्र वस्तु मानने का भ्रम पैदा करता है। वस्तुतः कर्म ही प्रधान है। उसी का नाम आगे−पीछे भाग्य बन जाता है। मीठे दूध का नाम गुण और रूप भी तो समयानुसार बदलकर खट्टे गाढ़े दही के रूप में हो जाता है। प्रारब्ध और पुरुषार्थ का अन्तर भी दूध और दही जैसा ही नाममात्र का है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 21

👉 सद्गुरु प्रेम

प्रेम के दो पहलू हैं- विरह और मिलन। जिसने प्रेम किया है, वही इस सच को जान सकता है। प्रेम सद्गुरु से हो तो यह सच और भी सघन हो जाता है। प्रेम का पहला अनुभव विरह में होता है और इस अनुभव की पूर्णता मिलन में आती है। विरह न हो तो मिलन कभी होता ही नहीं है। ऐसे में सद्गुरु मिल भी जाय तो उनकी पहचान ही नहीं हो पाती। उन्हें अपने जैसा मनुष्य समझने का भ्रम बना रहता है। उनके अस्तित्व में व्याप्त गुरुतत्त्व से परिचय-पहचान और उसमें अपने व्यक्तित्व का समर्पण-विसर्जन-विलय नहीं बन पड़ता।
  
विरह में व्यक्तित्व पकता है- उसमें जन्म होता है साधक का, भक्त का और शिष्य का। इस अवस्था में चुभते हैं अनेक प्रश्न कंटक, होती हैं अनगिन परीक्षाएँ, तब आती है मिलन की उपलब्धि। सच यही है कि विरह तैयारी है और मिलन उपलब्धि। आँसुओं से रास्ते को पाटना पड़ता है तभी मिलता है सद्गुरु के मन्दिर का द्वार। रो-रोकर काटनी पड़ती है विरह की लम्बी रात, तभी आती है मिलन की सुबह। जिसकी आँखें जितनी ज्यादा रोती हैं, उसकी सुबह उतनी ही ताजा होती है। जितने आँसू बहे होते हैं, उतने ही सुन्दर सूरज का जन्म होता है।
  
शिष्य के विरह पर निर्भर है कि उसका सद्गुरु मिलन कितना प्रीतिकर, कितना गहन और कितना गम्भीर होगा। जो आसानी से मिलता है, वह आसानी से बिछुड़ता भी है। मिलकर कभी भी न बिछुड़ने वाले सद्गुरु बहुत रोने के बाद ही मिलते हैं। और आँसू भी साधारण आँसू नहीं, हृदय ही जैसे पिघल-पिघल कर आँसुओं में बहता है। जैसे रक्त आँसू बन जाता है, जैसे प्राण ही आँसू बन जाते हैं।
  
विरह अवस्था है पुकार की। शिष्य को भरोसा है कि सद्गुरु हैं तो अवश्य, पर न जाने क्यों दीख नहीं रहे। विरह का अर्थ है कि हम तुम्हें तलाशेंगे। कितनी ही हो कठिन यात्रा, कितनी ही दुर्गम क्यों न हो, हम सब दाँव पर लगाएँगे, मगर तुमसे मिलकर ही रहेंगे, शिष्य का हृदय चीत्कार कर हर पल यही कहता है, तुम जो अदृश्य हो तुम्हें दृश्य बनना ही होगा। तुम जो दूर स्पर्श के पार हो, तुमसे आलिंगन करना ही होगा।
  
अदृश्य हो चुके अपने सद्गुरु से आलिंगन की आकांक्षा, उनके अदृश्य रूप को अपनी आँखों में भर लेने की आकांक्षा विरह है। शिष्य के लिए इसमें कड़ी अग्नि परीक्षाएँ हैं। उसे गलना, जलना और मिटना पड़ता है। जिस दिन राख-राख हो जाता है उसका अस्तित्त्व, उस दिन उसी राख से सद्गुरु का मिलन प्रारम्भ हो जाता है। और तभी आती है सद्गुरु प्रेम की पूर्णता।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६२

मंगलवार, 14 जनवरी 2020

👉 यार~यार की लड़ाई

एक बार एक महात्मा जी बीच बाजार में से कहीँ जा रहे थे। वहीं पास के एक कोठे की छत पर एक वैश्या पान खा रही थी। अचानक उसने बेख्याली से उसने पान की पीक नीचे थूकी और वो पीक नीचे जा रहे महात्मा जी के ऊपर गिरी।

महात्मा जी ने ऊपर देखा वेश्या की ओर तथा मुस्करा कर आगे की और बढ़ गए। यह देखकर वैश्या को अपना अपमान समझ, गुस्सा आया। उसने वहीं पर बैठे अपने यार को कहा कि तुम्हारे होते, कोई मुझे देखकर मुस्कुरा रहा है और तुम यहाँ बैठे हो।

इतना सुनकर उसके यार ने वहीं पड़ा डंडा उठाया और नीचे उतरकर आगे जा रहे महातमा जी के सर पर जोर से दे मारा और वैश्या की तरफ देखकर मुस्कुराया, कि देख, मैंने बदला ले लिया है।

महात्मा जी ने अपना सर देखा जिसमे से खून निकल रहा था। तब भी महात्मा जी कुछ नहीं बोले और मुस्करा दिए और वहीं पास के एक पेड़ के नीचे बैठ गए। उस वैश्या का यार मुस्कुराता हुआ वापस लौटने लगा। जब वो कोठे की सीढ़ियां चढ़ रहा था, तो सबसे ऊपर की सीढ़ी से उसका पैर फिसला और वो सबसे नीचे आ गिरा और उसके बहुत ज्यादा चोट लगी।

ये सब वो वैश्या देख रही थी और वो समझ गई कि वो महात्मा जी बहुत ही नाम जपने वाले और सच्चे है। वो नीचे आई और महात्मा जी के पास जाकर पैरो में गिरकर बोली - महात्मा जी मुझे माफ़ कर दो मैंने ही आपके पीछे अपने यार को भेजा था। उसने ही आपके सर पर वार किया था मुझे माफ़ कर दो ।

तो उन महात्मा जी ने मुस्करा कर कहा कि बेटी इस सारे झगड़े में तू और मैं कहाँ से आ गए। इसमें  तुम्हारा और मेरा कोई दोष नहीं है ये यार~यार की लड़ाई है। "तुम्हारे यार से तुम्हारी बेइज्जती नहीं देखी गई" और मेरा यार जो वो ऊपरवाला है उससे मेरी तकलीफ नहीं देखी गई। इसलिए इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। और तुम्हारा यार तो तुम्हारे पास कभी कभी ही आता है कभी दिन में कभी रात में, लेकिन मेरा यार हर वक़्त मेरे साथ ही रहता है।

इसलिए तुम भी उसी की शरण लो जो हर वक़्त तुम्हारे साथ ही रहे। "जिंदगी में भी और जिंदगी के बाद भी "

👉 विदुर का भोजन और श्रीकृष्ण


👉 असंयम ही रोग का कारण

स्वास्थ्य संयम पर निर्भर है। इन्द्रियों का संयम, आहार का संयम, ब्रह्मचर्य का संयम, दिनचर्या का संयम, उत्तेजनाओं का संयम यदि रखा जा सके तो फिर स्वास्थ्य बिगड़ने का प्रारब्धजन्य कर्म भोगों के अतिरिक्त और कोई कारण शेष नहीं रह जाता। यदि संयम साध लिया जाय तो गरीबी में दिन काटने वाला, घटिया आहार पाकर भी निरोग और दीर्घजीवी रह सकता है। इसके विपरीत असंयमी व्यक्ति विपुल धनवान होकर मूल्यवान आहार और औषधियों का सहारा मिलने पर भी रोगों से ग्रसित बना रहेगा। कमजोरी और बीमारी का अभिशाप असंयम के दंड स्वरूप मिलता है। यदि इन आपत्तियों से छूटना हो तो अपनी उच्छृंखल आदतों को संयमित करना पड़ेगा। इसके बिना स्वास्थ्य सुधार के जितने भी उपाय किये जायेंगे वे क्षणिक चमत्कार भले ही दिखा दें अन्ततः असफल ही रहेंगे।

कोई औषधि कोई पद्धति ऐसी नहीं है जो असंयम के रहते हुए आरोग्य को सुरक्षित रख सके। जिसने संयम साध लिया उसके लिए उपयोगी आहार का कोई विशेष महत्त्व नहीं रह जाता। घास खाकर घोड़ा, पत्ती खाकर हाथी, मैला खाकर सुअर यदि बलवान रह सकता है तो कोई कारण नहीं कि अन्न शाक और दूध जैसे उत्तम पदार्थ प्राप्त करके भी मनुष्य निरोग एवं दीर्घजीवी न रह सके। असंयम ही वह असुर है जो हमारी स्वास्थ्य संपदा को सब प्रकार चौपट किये दे रहा है। इसे मार भगाने का व्यापक अभियान यदि आरंभ किया जाय तो ही स्वास्थ्य की समस्या हल हो सकेगी। अस्पताल और डाक्टर तो क्षणिक उपचार कर सकते हैं, तात्कालिक लाभ दिखा सकते हैं। आरोग्य तो हमारी आदतों पर निर्भर है, यदि जीवन-यापन संबंधी आदतें बिगड़ी हुई हैं तो निरोगता को स्थिर रख सकना किसी भी प्रकार संभव न होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 1)

Q.1. What is significance of correct pronunciation of the Mantra?

Ans. All Ved Mantras have a poetic composition (syntax) with specified musical notes. When a Mantra is recited acoustic vibrations surpassing ultrasonic frequencies are produced. These waves travel in an “extra-sensory telepathic medium” enveloping the cosmos and interact with the thought processes of all living beings. In order to strengthen the intensity of these waves, the Gayatri Mantra is recited in course of Yagya-Havan, on auspicious occasions and at the beginning of all religious ceremonies. Three different types of musical (phonetic) compositions are mentioned for the Gayatri Mantra  in the Vedas. The one specified in the Yajurveda is recommended for the masses.

Q.2. What is the methodology of chanting of Mantra during Jap?

Ans. During the routine, solo Jap, the Mantra is pronounced in such a way that although there is a slight movement of lips, larynx and tongue, it produces a resonance inaudible to anyone except the worshipper. In a mass the Mantra is pronounced loudly in unison.

Q.3. How is it possible for illiterate persons and children to do Gayatri Sadhana, for whom the pronunciation of the Mantra is somewhat difficult? 
              
Ans. Illiterate persons who cannot utter Gayatri Mantra correctly, can perform Jap of Panchakshari Gayatri “Om bhoor Bhuvaha Swaha.” If they cannot utter even these words correctly, they can perform Jap of  “Hari Om Tat-Sat.” This also serves the purpose of Panchakshari Gayatri Mantra.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 51

👉 गुरुगीता

गुरुगीता शिष्यों का हृदय गीत है। गीतों की गूँज हमेशा हृदय के आँगन में ही अंकुरित होती है। मस्तिष्क में तो सदा तर्कों के संजाल रचे जाते हैं। मस्तिष्क की सीमा बुद्धि की चहारदिवारी तक है, पर हृदय की श्रद्धा सदा विराट् और असीम है। मस्तिष्क तो बस गणितीय समीकरणों की उलझनों तक सिमटा रहता है। इसे अदृश्य, असम्भव, असीम एवं अनन्त का पता नहीं है। मस्तिष्क मनुष्य में शारीरिक-मानसिक संरचना व क्रिया की वैज्ञानिक पड़ताल कर सकता है, परन्तु मनुष्य में गुरु को ढूँढ लेना और गुरु में परमात्मा को पहचान लेना हृदय की श्रद्धा का चमत्कार है।
  
गुरुगीता के महामंत्र इसी चमत्कारी श्रद्धा से सने हैं। इनकी अनोखी-अनूठी सामर्थ्य का अनुभव श्रद्धावान् कभी भी कर सकते हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण के वचन हैं-‘श्रद्धावान् लभते ज्ञानं’ जो श्रद्धावान् हैं वही ज्ञान पाते हैं। यह श्रद्धा बड़ी दुस्साहस की बात है। कमजोर के बस की बात नहीं है, बलवान की बात है। श्रद्धा ऐसी दीवानगी है कि जब चारों तरफ मरूस्थल हो और कहीं हरियाली का नाम न दिखाई पड़ता हो, तब भी श्रद्धा भरोसा करती है कि हरियाली है, फूल खिलते हैं। जब जल का कहीं कण भी न दिखाई देता हो, तब भी श्रद्धा मानती है कि जल के झरने हैं, प्यास तृप्त होती है। जब चारों तरफ पतझड़ हो तब भी श्रद्धा में वसन्त ही होता है।
  
जो शिष्य हैं उनका अनुभव यही कहता है कि श्रद्धा में वसन्त का मौसम सदा ही होता है। श्रद्धा एक ही मौसम जानती है-वसन्त। बाहर होता रहे पतझड़, पतझड़ के सारे प्रमाण मिलते रहें, लेकिन श्रद्धा वसन्त को मानती है। इस वसन्त में भक्ति के गीत गूँजते हैं। समर्पण का सुरीला संगीत महकता है। जिनके हृदय भक्ति से सिक्त हैं, गुरुगीता के महामंत्र उनके जीवन में सभी चमत्कार करने में सक्षम हैं। अपने हृदय मंदिर में परम पूज्य गुरुदेव की प्राण-प्रतिष्ठा करके जो भावभरे मन से गुरुगीता का पाठ करेंगे, उनका अस्तित्व गुरुदेव के दुर्लभ अशीषों की वृष्टि से भीगता रहेगा। गुरुगीता उन्हें प्यारे सद्गुरु की दुर्लभ अनुभूति कराती रहेगी। ऐसे श्रद्धावान् शिष्य की आँखों से करुणामय परम पूज्य गुरुदेव की झाँकी कभी ओझल न होगी।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६१

👉 चुनौतियों से कैसे लड़े

कंकड़ इतना छोटा सा की ऊंगली पर आ जाए। किन्तु यदि सोचिये यही कंकड़ आँख में लग जाए, तो कितनी बड़ी समस्या बन जाता है? अब सोचिये ये कंकड़ आपके मार्ग में है, आप पादुकाएँ पहन बड़ी सरलता से आगे निकल जा सकते हैं। किन्तु यही कंकड़ आपके पांव और पादुकाओं के बीच फँस जाए, तो आप ठीक से चल नहीं पायेंगे, भले ही वो मार्ग पुष्पों से भरा क्यों न हो। अर्थात आप बाहर की समस्याओं से उन चुनौतियों से लड़ सकते हैं, भीतर की नहीं। भीतर की समस्याओं से लड़ना अत्यंत कठिन होता है। इसलिये सर्वप्रथम आप भीतर से शक्तिशाली हो जाइये, भीतर से पूर्ण हो जाइये, फिर आप इस संसार की सब चुनौतियों, समस्याओं से लड़ सकते हैं। विजयी हो सकते हैं।

सोमवार, 13 जनवरी 2020

👉 अहंकार का प्रदर्शन


👉 नव निर्माण हेतु विभूतियों का आह्वान (अन्तिम भाग)

(६) सम्पदा-विभूतियों में इन दिनों सर्वोपरि मान्यता पूँजी को मिली है। धन का वर्चस्व सर्वविदित है। सम्पत्ति में स्वयं कोई दोष नहीं। दोष उसके दुरुपयोग में है। व्यक्तिगत विलासिता में, अहंता की वृद्धि में यदि उसका उपयोग होता है, संग्रह बढ़ता है एवं उसका लाभ बेटे-पोतों तक ही रखने का प्रयत्न किया जाता है, तो निस्संदेह ऐसा धन निन्दनीय है। अगले दिनों समता के आधार पर ही समाज व्यवस्था बनेगी। सामर्थ्य भर श्रम एवं आवश्यकता भर साधन प्राप्त करने का क्रम चले तभी सम्पदा पर व्यक्ति का नहीं समाज का अधिकार होगा। न कोई गरीब दिखाई देगा न अमीर। पर जब तक वह स्थिति नहीं बन जाती तब तक संग्रहीत पूँजी को लोकमंगल के लिए लगाने की दूरदर्शिता दिखाने के लिए धनपतियों को कहा जायेगा।

दान न सही कम से कम इतना तो होना ही चाहिए कि युग परिवर्तित का पथ प्रशस्त करने वाले प्रचारात्मक कार्यक्रमों में पूँजी की कमी न पड़े। भले ही यह व्यवसाय बुद्धि से किया जाय तो भी इतना होना ही चाहिए कि युग परिवर्तन के प्रवाह में अनुकूलता उत्पन्न करने वाला विनियोग इस पूँजी का हो सके। पिछले पृष्ठों पर ऐसे कितने ही क्रिया कलापों की चर्चा की गई है, जिसमें पूँजी के रूप में भी यदि धन लग सके, यदि उन क्रिया कलापों को व्यावसायिक रूप में खड़ा किया जा सके तो भी बहुत कुछ हो सकता है। (१) साहित्य प्रकाशन (२) चित्र प्रकाशन (३) अभिनय मंडलियाँ (४) ग्रामोफोन रिकार्ड (५) फिल्म निर्माण। यह पाँच कार्य ऐसे हैं, जिनके लिए विशालकाय अर्थसंस्थान खड़े किये जाने चाहिए और लोकमानस को परिष्कृत बनाने की आवश्यकता पूरी की जानी चाहिए।

(७) प्रतिभायें-प्रतिभा एक वशिष्ठ और अतिरिक्त विभूति है। कुछ लोगों के व्यक्तित्व ऐसे साहसी, स्फूर्तिवान् सूक्ष्मदर्शी, मिलनसार, क्रियाकुशल और प्रभावशाली होते हैं कि वे जिस काम को भी हाथ में लें उसी को अपने मनोयोग एवं व्यवहार कुशलता के आधार पर गतिशील बनाते चले जाते है और सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचा देते हैं। इस विशेषता को प्रतिभा कहते हैं। सूझबूझ, आत्म विश्वास, कर्मठता जैसे अनेक सद्गुण उनमें भरे रहते हैं। आमतौर से ऐसे ही लोग महान कार्यों के संस्थापक एवं संचालक होते हैं। सफलतायें उनके पीछे छाया की तरह फिरती हैं, क्योंकि उन्हें ज्ञान होता है कि कठिनाइयों से कैसे निपटा जाता है, उन्हें सरल कैसे बनाया जाता है।

प्रतिभाशाली व्यक्ति ही सफल सन्त, राजनेता, समाजसेवी, साहित्यकार, कलाकार, व्यवसायी, व्यवस्थापक होते देखे गये हैं। प्रतिभाएँ ही डाकू, चोर, ठग जैसे दुस्साहस पूर्ण कार्य करती हैं। सेनाध्यक्षों के रूप में, लड़ाकू योद्धाओं के रूप में उन्हें ही अग्रिम पंक्ति में देखा जाता है। क्रान्तिकारी भी इसी तरह के लोग बनते हैं। प्रतिभाशाली तत्व जहाँ कहीं भी चमक रहे हो वहाँ से उन्हें आमंत्रित किया जा रहा है कि वे अपने ईश्वरीय अनुदान को निरर्थक विडम्बनाओं में खर्च न करें वरन् उसे नव निर्माण के ऐसे महान प्रयोजन में नियोजित कर दें जिसमें उनका, उनकी प्रतिभा का तथा समस्त संसार का हित साधन हो सके।

.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 युवा शक्ति

संवेदना और साहस की सघनता में युवा शक्ति प्रज्वलित होती है। जहाँ भाव छलकते हों और साहस मचलता हो, समझो वहीं यौवन के अंगारे शक्ति की धधकती ज्वालाओं में बदलने के लिए तत्पर हैं। विपरीतताएँ इसे प्रेरित करती हैं, विषमताओं से इसे उत्साह मिलता है। समस्याओं के संवेदन इसमें नयी ऊर्जा का संचार करते हैं। काल की कुटिल व्यूह रचनाओं की छुअन से यह और अधिक उफनती है और तब तक नहीं थमती जब तक कि यह इन्हें पूरी तरह से छिन्न-भिन्न न कर दे।
  
हारे मन और थके तन से कोई कभी युवा नहीं होता, फिर भले ही उसकी आयु कुछ भी क्यों न हो? यौवन तो वहीं है, जहाँ शक्ति का तूफान अपनी सम्पूर्ण प्रचण्डता से सक्रिय है। जो अपने महावेग से समस्याओं के गिरि शिखरों को ढहाता, विषमताओं के महावटों को उखाड़ता और विपरीतताओं के खाई-खड्ढों को पाटता चलता है। ऐसा क्या है? जो युवा न कर सके? ऐसी कौन सी मुश्किल है जो उसकी शक्ति को थाम ले? अरे वह युवा शक्ति की क्या? जिसे कोई अवरोध रोक ले।
  
समस्याओं की परिधि व्यक्तिगत हो या पारिवारिक, सामाजिक-राष्ट्रीय हो अथवा वैश्विक, युवा शक्ति इनका समाधान करने में कभी नहीं हारी है। रानी लक्ष्मीबाई, वीर सुभाष, स्वामी विवेकानन्द, शहीद भगतसिंह के रूप में इसके अनगिन आयाम प्रकट हुए हैं। यह प्रक्रिया आज भी जारी है। देह का महाबल, प्रतिभा की पराकाष्ठा, आत्मा का परम तेज और सबसे बढ़कर महान उद्देश्यों के लिए इन सभी को न्यौछावर करने के बलिदानी साहस से युवा शक्ति ने सदा असम्भव को सम्भव किया है। इनकी एक हुंकार से साम्राज्य सिमटे हैं, राज सिंहासन भूलुंठित हुए हैं और नयी व्यवस्थाओं का नवोदय हुआ है।
    
सचमुच ही यौवन भगवती महाशक्ति का वरदान है। यहाँ वह अपनी सम्पूर्ण महिमा के साथ प्रदीप्त होती है। दुष्ट दलन, सद्गुण पोषण एवं कलाओं के सौन्दर्य सृजन के सभी रूप यहीं प्रकट होते हैं। ध्यान देने की बात यह है कि यौवन में शक्ति के महानुदान मिलते तो सभी को हैं, पर टिकते वहीं हैं जहाँ इनका सदुपयोग होता है। जरा सा दुरुपयोग होते ही शक्ति यौवन की संहारक बन जाती है। कालिख की अँधेरी कालिमा में इसकी प्रभा विलीन होने लगती है। इसलिए युवा जीवन की शक्ति सम्पन्नता सार्थक यौवन में ही संवर्धित हो पाती है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५९

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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