शुक्रवार, 10 जनवरी 2020
👉 माँ
गाँव के सरकारी स्कूल में संस्कृत की क्लास चल रही थी। गुरूजी दिवाली की छुट्टियों का कार्य बता रहे थे।
तभी शायद किसी शरारती विद्यार्थी के पटाखे से स्कूल के स्टोर रूम में पड़ी दरी और कपड़ो में आग लग गयी। देखते ही देखते आग ने भीषण रूप धारण कर लिया। वहां पड़ा सारा फर्निचर भी स्वाहा हो गया।
सभी विद्यार्थी पास के घरो से, हेडपम्पों से जो बर्तन हाथ में आया उसी में पानी भर भर कर आग बुझाने लगे।
आग शांत होने के काफी देर बाद स्टोर रूम में घुसे तो सभी विद्यार्थियों की दृष्टि स्टोर रूम की बालकनी (छज्जे) पर जल कर कोयला बने पक्षी की ओर गयी।
पक्षी की मुद्रा देख कर स्पष्ट था कि पक्षी ने उड़ कर अपनी जान बचाने का प्रयास तक नही किया था और वह स्वेच्छा से आग में भस्म हो गया था।
सभी को बहुत आश्चर्य हुआ।
एक विद्यार्थी ने उस जल कर कोयला बने पक्षी को धकेला तो उसके नीचे से तीन नवजात चूजे दिखाई दिए, जो सकुशल थे और चहक रहे थे।
उन्हें आग से बचाने के लिए पक्षी ने अपने पंखों के नीचे छिपा लिया और अपनी जान देकर अपने चूजों को बचा लिया था।
एक विद्यार्थी ने संस्कृत वाले गुरूजी से प्रश्न किया -
"गुरूजी, इस पक्षी को अपने बच्चो से कितना मोह था, कि इसने अपनी जान तक दे दी ?"
गुरूजी ने तनिक विचार कर कहा -
"नहीं,
यह मोह नहीं है अपितु माँ के ममत्व की पराकाष्ठा है, मोह करने वाला ऐसी विकट स्थिति में अपनी जान बचाता और भाग जाता।"
भगवान ने माँ को ममता दी है और इस दुनिया में माँ की ममता से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
तभी शायद किसी शरारती विद्यार्थी के पटाखे से स्कूल के स्टोर रूम में पड़ी दरी और कपड़ो में आग लग गयी। देखते ही देखते आग ने भीषण रूप धारण कर लिया। वहां पड़ा सारा फर्निचर भी स्वाहा हो गया।
सभी विद्यार्थी पास के घरो से, हेडपम्पों से जो बर्तन हाथ में आया उसी में पानी भर भर कर आग बुझाने लगे।
आग शांत होने के काफी देर बाद स्टोर रूम में घुसे तो सभी विद्यार्थियों की दृष्टि स्टोर रूम की बालकनी (छज्जे) पर जल कर कोयला बने पक्षी की ओर गयी।
पक्षी की मुद्रा देख कर स्पष्ट था कि पक्षी ने उड़ कर अपनी जान बचाने का प्रयास तक नही किया था और वह स्वेच्छा से आग में भस्म हो गया था।
सभी को बहुत आश्चर्य हुआ।
एक विद्यार्थी ने उस जल कर कोयला बने पक्षी को धकेला तो उसके नीचे से तीन नवजात चूजे दिखाई दिए, जो सकुशल थे और चहक रहे थे।
उन्हें आग से बचाने के लिए पक्षी ने अपने पंखों के नीचे छिपा लिया और अपनी जान देकर अपने चूजों को बचा लिया था।
एक विद्यार्थी ने संस्कृत वाले गुरूजी से प्रश्न किया -
"गुरूजी, इस पक्षी को अपने बच्चो से कितना मोह था, कि इसने अपनी जान तक दे दी ?"
गुरूजी ने तनिक विचार कर कहा -
"नहीं,
यह मोह नहीं है अपितु माँ के ममत्व की पराकाष्ठा है, मोह करने वाला ऐसी विकट स्थिति में अपनी जान बचाता और भाग जाता।"
भगवान ने माँ को ममता दी है और इस दुनिया में माँ की ममता से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
👉 स्वस्थ मन का रहस्य
जो अपनी जिन्दगी में कुछ करने में असफल रहते हैं, वे प्रायः आलोचक बन जाते हैं। दूसरों की कमियाँ देखना, निन्दा करना उनका स्वभाव बन जाता है। यहाँ तक कि ऐसे लोग अपनी कमियों -कमजोरियों का दोष भी दूसरों के सिर मढ़ देते हैं। सच यही है कि जीवन पथ पर चलने में जो असमर्थ हैं, वे राह के किनारे खड़े होकर औरों पर पत्थर फेंकने लगते हैं।
दरअसल यह मन की रोगी दशा है। मानसिक ज्वर या मन की रोगग्रस्त स्थिति में ही मनुष्य ऐसे काम करता है। जब भी किसी की निन्दा का विचार मन में उठे तो जानना कि अब हम भी इसी रोग से पीड़ित हो रहे हैं। ध्यान रहे स्वस्थ मन वाला व्यक्ति कभी किसी की निन्दा में संलग्न नहीं होता। यहाँ तक कि जब दूसरे उसकी निन्दा कर रहे होते हैं, तो वह उन पर दया ही अनुभव करता है। शरीर से बीमार ही नहीं, मन से बीमार भी दया के पात्र हैं।
लोकमान्य तिलक से किसी ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा, कई बार आपकी बहुत निन्दापूर्ण आलोचनाएँ होती हैं, लेकिन आप तो कभी विचलित नहीं होते। उत्तर में लोकमान्य मुस्कराए और बोले- निन्दा ही क्यों, कई बार लोग प्रशंसा भी करते हैं। ऐसा कहकर उन्होंने पूछने वाले की आँखों में गहराई से झाँका और बोले - यह है तो मेरी जिन्दगी का रहस्य, पर मंै आपका बता देता हूूँ। निन्दा करने वाले मुझे शैतान समझते हैं और प्रशंसक मुझे भगवान् का दर्जा देते हैं। लेकिन सच मैं जानता हूँ और वह सच यह है कि मैं न तो शैतान हूँ और न ही भगवान्। मैं तो एक इन्सान हूँ जिसमें थोड़ी कमियाँ है और थोड़ी अच्छाईयाँ और मैं अपनी कमियों को दूर करने एवं अच्छाईयों को बढ़ाने में लगा रहता हूँ।
एक बात और भी है- लोकमान्य ने अपनी बात आगे बढ़ाई। जब अपनी जिन्दगी को मैं ही अभी ठीक से नहीं समझ पाया, तो भला दूसरे क्या समझेंगे। इसलिए जितनी झूठ उनकी निन्दा है, उतनी ही उनकी प्रशंसा है। इसलिए मैं उन दोनों बातों की परवाह न करके अपने आपको और अधिक सँवारने-सुधारने की क ोशिश करता रहता हूँ। सुनने वाले व्यक्ति को इन बातों को सुनकर लोकमान्य तिलक के स्वस्थ मन का रहस्य समझ में आया। उसे अनुभव हुआ कि स्वस्थ मन वाला व्यक्ति न तो किसी की निन्दा करता है और न ही किसी निन्दा अथवा प्रशंसा से प्रभावित होता है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५७
दरअसल यह मन की रोगी दशा है। मानसिक ज्वर या मन की रोगग्रस्त स्थिति में ही मनुष्य ऐसे काम करता है। जब भी किसी की निन्दा का विचार मन में उठे तो जानना कि अब हम भी इसी रोग से पीड़ित हो रहे हैं। ध्यान रहे स्वस्थ मन वाला व्यक्ति कभी किसी की निन्दा में संलग्न नहीं होता। यहाँ तक कि जब दूसरे उसकी निन्दा कर रहे होते हैं, तो वह उन पर दया ही अनुभव करता है। शरीर से बीमार ही नहीं, मन से बीमार भी दया के पात्र हैं।
लोकमान्य तिलक से किसी ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा, कई बार आपकी बहुत निन्दापूर्ण आलोचनाएँ होती हैं, लेकिन आप तो कभी विचलित नहीं होते। उत्तर में लोकमान्य मुस्कराए और बोले- निन्दा ही क्यों, कई बार लोग प्रशंसा भी करते हैं। ऐसा कहकर उन्होंने पूछने वाले की आँखों में गहराई से झाँका और बोले - यह है तो मेरी जिन्दगी का रहस्य, पर मंै आपका बता देता हूूँ। निन्दा करने वाले मुझे शैतान समझते हैं और प्रशंसक मुझे भगवान् का दर्जा देते हैं। लेकिन सच मैं जानता हूँ और वह सच यह है कि मैं न तो शैतान हूँ और न ही भगवान्। मैं तो एक इन्सान हूँ जिसमें थोड़ी कमियाँ है और थोड़ी अच्छाईयाँ और मैं अपनी कमियों को दूर करने एवं अच्छाईयों को बढ़ाने में लगा रहता हूँ।
एक बात और भी है- लोकमान्य ने अपनी बात आगे बढ़ाई। जब अपनी जिन्दगी को मैं ही अभी ठीक से नहीं समझ पाया, तो भला दूसरे क्या समझेंगे। इसलिए जितनी झूठ उनकी निन्दा है, उतनी ही उनकी प्रशंसा है। इसलिए मैं उन दोनों बातों की परवाह न करके अपने आपको और अधिक सँवारने-सुधारने की क ोशिश करता रहता हूँ। सुनने वाले व्यक्ति को इन बातों को सुनकर लोकमान्य तिलक के स्वस्थ मन का रहस्य समझ में आया। उसे अनुभव हुआ कि स्वस्थ मन वाला व्यक्ति न तो किसी की निन्दा करता है और न ही किसी निन्दा अथवा प्रशंसा से प्रभावित होता है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५७
👉 FALLACIES ABOUT SCRIPTURAL RESTRICTIONS (Part 3)
Q.3. Is Guru mandatory for Gayatri worship?
Ans. Gayatri is also known as Guru-Mantra i.e. to achieve a higher level of spiritual accomplishment, one needs an experienced Guru as a spiritual guide and protector. Let us draw an analogy from other fields. Some fields of learning require only books, whereas for others like music, crafts, etc. direct help of an expert is needed. Similarly, though the daily rituals of Gayatri worship are quite simple, for higher levels of achievement when the worshipper, (depending upon his own personal spiritual status acquired through previous births) faces several ups and downs, an experienced Guru is needed just as a doctor is required during treatment of a disease. Thus, though one can take up Gayatri worship without a Guru, initiation by a proper experienced Guru is advisable enlightened spiritul master is necessary for receiving instruction and direction for accelerating one’s spiritual growth. The spiritual evolution of the soul is a prolonged process continuing through countless cycles of births and deaths. Sought in a hurry, an inexperienced person posing as Guru may do more harm than good to the disciple.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 46
Ans. Gayatri is also known as Guru-Mantra i.e. to achieve a higher level of spiritual accomplishment, one needs an experienced Guru as a spiritual guide and protector. Let us draw an analogy from other fields. Some fields of learning require only books, whereas for others like music, crafts, etc. direct help of an expert is needed. Similarly, though the daily rituals of Gayatri worship are quite simple, for higher levels of achievement when the worshipper, (depending upon his own personal spiritual status acquired through previous births) faces several ups and downs, an experienced Guru is needed just as a doctor is required during treatment of a disease. Thus, though one can take up Gayatri worship without a Guru, initiation by a proper experienced Guru is advisable enlightened spiritul master is necessary for receiving instruction and direction for accelerating one’s spiritual growth. The spiritual evolution of the soul is a prolonged process continuing through countless cycles of births and deaths. Sought in a hurry, an inexperienced person posing as Guru may do more harm than good to the disciple.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 46
गुरुवार, 9 जनवरी 2020
👉 नव निर्माण हेतु विभूतियों का आह्वान (भाग ३)
(३) कला मंच से भाव स्पन्दन-कला मंच में चित्र, मूर्तियाँ, नाटक, अभिनय, संगीत आदि आते हैं। संगीत विद्यालय हर जगह खुलें। ध्वनियाँ सीमित हो, बाजे भी सीमित हो, सरल संगीत के ऐसे पाठ्यक्रम हो, जो वर्षों में नहीं महीनों में सीखे जा सकें। प्रचण्ड प्रेरणा भरे गीतों का प्रचलन इन विद्यालयों द्वारा हो और हर्षोत्सवों पर प्रेरक गायनों की ही प्रधानता रहे। अग्नि गीतों की पुस्तिकाएँ सर्वत्र उपलब्ध रहें। संगीत सम्मेलन, संगीत गोष्ठियाँ, कीर्तन, प्रवचन, सहगान, क्रिया गान, नाटक, लोकनृत्य जैसे अगणित मंच मण्डप सर्वत्र बनें और वे लोकरंजन की आवश्यकता पूरी करें।
चित्र प्रकाशन अपने आप में एक बड़ा काम है। कैलेण्डर तथा दूसरे चित्र आजकल खूब छपते, बिकते है उनमें प्रेरक प्रसंगों को जोड़ा जा सके तो उससे जन-मानस को मोड़ने में भारी सहायता मिल सकती है। इसमें चित्रकारों से अधिक सहयोग चित्र प्रकाशकों का चाहिए। आदर्शवादी चित्र प्रकाशन की योजना हो, तो चित्रकार उस तरह की तस्वीरें और भी अधिक प्रसन्नतापूर्वक बना देंगे। यह कार्य ऐसे है जिनमें प्रतिभा, पूँजी, सूझबूझ और लगन का थोड़ा भी समन्वय हो जाय तो बिना किसी खतरे का सामना किये सहज ही आवश्यकता पूरी की जा सकती है।
यंत्रीकरण के साथ कला का समन्वय होने से ग्रामोफोन रिकार्ड, टेप रिकार्डर तथा फिल्म सिनेमा के नये प्रभावशाली माध्यम सामने आये हैं। उनका सदुपयोग होना चाहिए। चित्र प्रदर्शनियों के उपयुक्त बड़े साइज के चित्र छपने चाहिए। रिकार्ड बनाने का कार्य योजनाबद्ध रूप से आगे बढ़ना चाहिए। यों शुरुआत दस रिकार्डों से की गई थी। पर अभी उसे सभी भाषाओं के लिए, सभी प्रयोजनों के लिए उपयुक्त बनाने में बड़ी शक्ति तथा पूँजी लगानी पड़ेगी। इसी प्रकार फिल्म निर्माण का कार्य हाथ में लेना होगा। आँकड़े यह बताते हैं कि समाचार पत्र और रेडियो मिलकर जितने लोगों को सन्देश सुनाते है, उससे कहीं अधिक सन्देश अकेला सिनेमा पहुँचाता है। समाचार पत्रों के पाठकों और रेडियो सुनने वालों की मिली संख्या से भी सिनेमा देखने वालों की संख्या अधिक है। यदि यह उद्योग विवेकवान और दूरदर्शी हाथों में हो और वे उसका उपयोग जन-मानस को परिष्कृत करने तथा नवयुग के अनुरूप वातावरण बनाने में कर गुजरें तो उसका आश्चर्यजनक परिणाम सामने आ सकता है। जिनके हाथ में इन दिनों यह उद्योग है, उनका दृष्टिकोण बदला जाय तथा नये लोग नई पूँजी और नई लगन के साथ इस क्षेत्र में उतरें, तो इतना अधिक कार्य हो सकता है जिसकी कल्पना भी इस समय कठिन है।
.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
चित्र प्रकाशन अपने आप में एक बड़ा काम है। कैलेण्डर तथा दूसरे चित्र आजकल खूब छपते, बिकते है उनमें प्रेरक प्रसंगों को जोड़ा जा सके तो उससे जन-मानस को मोड़ने में भारी सहायता मिल सकती है। इसमें चित्रकारों से अधिक सहयोग चित्र प्रकाशकों का चाहिए। आदर्शवादी चित्र प्रकाशन की योजना हो, तो चित्रकार उस तरह की तस्वीरें और भी अधिक प्रसन्नतापूर्वक बना देंगे। यह कार्य ऐसे है जिनमें प्रतिभा, पूँजी, सूझबूझ और लगन का थोड़ा भी समन्वय हो जाय तो बिना किसी खतरे का सामना किये सहज ही आवश्यकता पूरी की जा सकती है।
यंत्रीकरण के साथ कला का समन्वय होने से ग्रामोफोन रिकार्ड, टेप रिकार्डर तथा फिल्म सिनेमा के नये प्रभावशाली माध्यम सामने आये हैं। उनका सदुपयोग होना चाहिए। चित्र प्रदर्शनियों के उपयुक्त बड़े साइज के चित्र छपने चाहिए। रिकार्ड बनाने का कार्य योजनाबद्ध रूप से आगे बढ़ना चाहिए। यों शुरुआत दस रिकार्डों से की गई थी। पर अभी उसे सभी भाषाओं के लिए, सभी प्रयोजनों के लिए उपयुक्त बनाने में बड़ी शक्ति तथा पूँजी लगानी पड़ेगी। इसी प्रकार फिल्म निर्माण का कार्य हाथ में लेना होगा। आँकड़े यह बताते हैं कि समाचार पत्र और रेडियो मिलकर जितने लोगों को सन्देश सुनाते है, उससे कहीं अधिक सन्देश अकेला सिनेमा पहुँचाता है। समाचार पत्रों के पाठकों और रेडियो सुनने वालों की मिली संख्या से भी सिनेमा देखने वालों की संख्या अधिक है। यदि यह उद्योग विवेकवान और दूरदर्शी हाथों में हो और वे उसका उपयोग जन-मानस को परिष्कृत करने तथा नवयुग के अनुरूप वातावरण बनाने में कर गुजरें तो उसका आश्चर्यजनक परिणाम सामने आ सकता है। जिनके हाथ में इन दिनों यह उद्योग है, उनका दृष्टिकोण बदला जाय तथा नये लोग नई पूँजी और नई लगन के साथ इस क्षेत्र में उतरें, तो इतना अधिक कार्य हो सकता है जिसकी कल्पना भी इस समय कठिन है।
.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 आध्यात्मिक दृष्टि
देह पर जो रुक जाय वह दृष्टि आध्यात्मिक नहीं हो सकती। दृष्टि में आध्यात्मिकता हो तो समझ में आता है कि शरीर कितना पारदर्शी है। सचमुच शरीर कितना ही ठोस क्यों न नजर आए पर आध्यात्मिक आँखों से वह कभी नहीं छिपता जो कि देह के पीछे है, प्राण और चेतना का आधार है।
हाँ आँखें ही न हों तो और बात है। आँखें न होने पर और चीजों की क्या कहें, सूरज तक नहीं दिखाई देता। सब खेल आँखों का है। विचार और तर्क से भला कोई प्रकाश को जानता है? वास्तविकता आँख की पूर्ति किसी अन्य साधन से नहीं हो सकती। प्रकाश के अनुभव के लिए आँख चाहिए। आत्मिक तत्त्व के अनुभव के लिए भी आँख चाहिए। चाहिए एक अन्तर्दृष्टि, सूक्ष्म दृष्टि, दूर दृष्टि जिसका समावेश आध्यात्मिक दृष्टि में है। यह है तो सब है। अन्यथा न प्रकाश है और न परमात्मा है।
बात अनुभव की है, यदि कोई दूसरे की देह के पार की सत्ता को देखना चाहे, उसे सबसे पहले अपनी पार्थिव सत्ता के पार झांकना होता है। जहाँ तक और जितना हम स्वयं की गहराई में झांक पाते हैं, वहीं तक अन्य देह, भी पारदर्शी हो पाती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि जितनी परिष्कृत होती है, अनुभव भी उतने ही पारदर्शी हो जाते हैं।
जितनी दूर तक हम अपनी जड़ता में चैतन्य का अविष्कार कर पाते हैं, उतनी ही दूर तक हमारे लिए समस्त जड़ जगत् चैतन्य की चेतना से भर जाता है। और तब आता है यह अनुभव कि जो मैं हूँ उसी का विस्तार यह जगत् है। जिस दिन हम सम्पूर्ण समग्रता में अपने चैतन्य को जान लेते हैं, उसी दिन यह जगत् ब्रह्ममय हो जाता है। इस क्षुद्र में कौन विराट् विद्यमान है? कौन है वह चैतन्य, जिसकी चेतना देह और जीवन का आधार है? इन प्रश्नों के हल आध्यात्मिक दृष्टि के बिना नहीं मिलते। जिस दृष्टि से ‘पर’ देखा जाता है, वही दृष्टि स्वयं को भी देखने में समर्थ है। बस केवल दृष्टि में आध्यात्मिकता का समोवश होना चाहिए। ऐसा होते ही घटित होती है- एक क्रान्ति। फिर जैसे कोई अवरुद्ध झरना फूट पड़े, ऐसे ही आध्यात्मिक अमृत की चैतन्य धारा जीवन से समस्त जड़ता के अंधेरे को बहा ले जाती है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५६
हाँ आँखें ही न हों तो और बात है। आँखें न होने पर और चीजों की क्या कहें, सूरज तक नहीं दिखाई देता। सब खेल आँखों का है। विचार और तर्क से भला कोई प्रकाश को जानता है? वास्तविकता आँख की पूर्ति किसी अन्य साधन से नहीं हो सकती। प्रकाश के अनुभव के लिए आँख चाहिए। आत्मिक तत्त्व के अनुभव के लिए भी आँख चाहिए। चाहिए एक अन्तर्दृष्टि, सूक्ष्म दृष्टि, दूर दृष्टि जिसका समावेश आध्यात्मिक दृष्टि में है। यह है तो सब है। अन्यथा न प्रकाश है और न परमात्मा है।
बात अनुभव की है, यदि कोई दूसरे की देह के पार की सत्ता को देखना चाहे, उसे सबसे पहले अपनी पार्थिव सत्ता के पार झांकना होता है। जहाँ तक और जितना हम स्वयं की गहराई में झांक पाते हैं, वहीं तक अन्य देह, भी पारदर्शी हो पाती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि जितनी परिष्कृत होती है, अनुभव भी उतने ही पारदर्शी हो जाते हैं।
जितनी दूर तक हम अपनी जड़ता में चैतन्य का अविष्कार कर पाते हैं, उतनी ही दूर तक हमारे लिए समस्त जड़ जगत् चैतन्य की चेतना से भर जाता है। और तब आता है यह अनुभव कि जो मैं हूँ उसी का विस्तार यह जगत् है। जिस दिन हम सम्पूर्ण समग्रता में अपने चैतन्य को जान लेते हैं, उसी दिन यह जगत् ब्रह्ममय हो जाता है। इस क्षुद्र में कौन विराट् विद्यमान है? कौन है वह चैतन्य, जिसकी चेतना देह और जीवन का आधार है? इन प्रश्नों के हल आध्यात्मिक दृष्टि के बिना नहीं मिलते। जिस दृष्टि से ‘पर’ देखा जाता है, वही दृष्टि स्वयं को भी देखने में समर्थ है। बस केवल दृष्टि में आध्यात्मिकता का समोवश होना चाहिए। ऐसा होते ही घटित होती है- एक क्रान्ति। फिर जैसे कोई अवरुद्ध झरना फूट पड़े, ऐसे ही आध्यात्मिक अमृत की चैतन्य धारा जीवन से समस्त जड़ता के अंधेरे को बहा ले जाती है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५६
👉 FALLACIES ABOUT SCRIPTURAL RESTRICTIONS (Part 2)
Q.2. What is the truth in the belief that God Brahma, and rishis Vashistha and Vishwamitra had laid a curse (shaap) that success will elude the practitioner unless he/ she recites certain verses (shlokas)?
Ans. That this is baseless, is established by the following references from the scriptures:-
a) Gayatri is well known as the inherent creative power of God. She is also at places referred metaphysically as spouse of God Brahma. Scriptures say that with the help of Gayatri, He (Brahma) created the universe and expounded the doctrines of Vedas (the four faces of Brahma symbolize the four streams of Vedic revelation).
b) Vashistha inflicted a crushing defeat on Vishwamitra with the help of Nandini- the symbolical cow which fulfils all wishes and is regarded as the counterpart of Kamdhenu of heaven (Swarg).
c) To Vishwamitra goes the credit of untravelling the mystery of Gayatri. Not only he practised Gayatri for a very long period with strictest of self-discipline, and acquired immense occult powers therefrom, but also developed the expertise and methodology for invocation of divine powers through practice of Gayatri Sadhana.
From the aforesaid, it is evident that the great spiritual personalities of yore had used the power of Gayatri to fulfil their objectives. There is, therefore, no logic in assuming that they had cursed it and deprived other human beings of its fruits.
It appears that the feudal lords of the medieval ages, propounded their independent cults and to establish their own doctrines found it necessary to discredit the traditional practice of Gayatri. The concocted story of ‘curse on Gayatri’ was the easiest and simplest way of striking at the roots of faith and confidence of the masses. This could have been one reason behind this baseless assumption. Otherwise, who in this universe has the capability to put a curse on divine manifestations like the sun, clouds, air, lightening, the earth etc. Gayatri is, in essence, the primordial energy of the Almighty. Hence, all are free to utilize it without any restrictions or apprehensions whatsoever. At the most, the concept of the so-called “curse” may be symbolically indicative of the need for a Guru of the status of Vashistha and Vishwamitra, in absence of whom success eludes the worshipper.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 46
Ans. That this is baseless, is established by the following references from the scriptures:-
a) Gayatri is well known as the inherent creative power of God. She is also at places referred metaphysically as spouse of God Brahma. Scriptures say that with the help of Gayatri, He (Brahma) created the universe and expounded the doctrines of Vedas (the four faces of Brahma symbolize the four streams of Vedic revelation).
b) Vashistha inflicted a crushing defeat on Vishwamitra with the help of Nandini- the symbolical cow which fulfils all wishes and is regarded as the counterpart of Kamdhenu of heaven (Swarg).
c) To Vishwamitra goes the credit of untravelling the mystery of Gayatri. Not only he practised Gayatri for a very long period with strictest of self-discipline, and acquired immense occult powers therefrom, but also developed the expertise and methodology for invocation of divine powers through practice of Gayatri Sadhana.
From the aforesaid, it is evident that the great spiritual personalities of yore had used the power of Gayatri to fulfil their objectives. There is, therefore, no logic in assuming that they had cursed it and deprived other human beings of its fruits.
It appears that the feudal lords of the medieval ages, propounded their independent cults and to establish their own doctrines found it necessary to discredit the traditional practice of Gayatri. The concocted story of ‘curse on Gayatri’ was the easiest and simplest way of striking at the roots of faith and confidence of the masses. This could have been one reason behind this baseless assumption. Otherwise, who in this universe has the capability to put a curse on divine manifestations like the sun, clouds, air, lightening, the earth etc. Gayatri is, in essence, the primordial energy of the Almighty. Hence, all are free to utilize it without any restrictions or apprehensions whatsoever. At the most, the concept of the so-called “curse” may be symbolically indicative of the need for a Guru of the status of Vashistha and Vishwamitra, in absence of whom success eludes the worshipper.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 46
मंगलवार, 7 जनवरी 2020
👉 अनुभव और समझ
एक बहुत विशाल पेड़ था। उस पर कई हंस रहते थे। उनमें एक बहुत सयाना हंस था। बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी। सब उसका आदर करते ‘ताऊ’ कह कर बुलाते थे। एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया।
ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा- ‘‘देखो !! उस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी।’’
एक युवा हंस हंसते हुए बोला- ‘‘ताऊ यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी?’’
सयाने हंस ने समझाया- ‘‘आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही है। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढऩे के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे।’’
किसी हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपरी शाखाओं तक पहुंच गई। बेल का तना मोटा होना शुरू हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई। एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिया उधर आ निकला। पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़ कर जाल बिछाया और चला गया। सांझ को सारे हंस लौट आए और पेड़ पर उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए। सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे।
एक हंस ने हिम्मत करके कहा- ‘‘ताऊ हम मूर्ख हैं,लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो।’’
दूसरा हंस बोला- ‘‘इस संकट से निकलने की तरकीब तुम ही हमें बता सकते हो। आगे हम तुम्हारी बात नहीं टालेंगे।’’
सभी हंसों ने हामी भरी, तब ताऊ ने उन्हें बताया- "‘‘मेरी बात ध्यान से सुनो। सुबह जब बहेलिया आएगा, सब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकाल कर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पड़े रहना। जैसे ही वह अंतिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब एक साथ उड़ जाना।’’
सुबह बहेलिया आया। हंसों ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझ कर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए। बहेलिया अवाक् होकर देखता रह गया।
ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा- ‘‘देखो !! उस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी।’’
एक युवा हंस हंसते हुए बोला- ‘‘ताऊ यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी?’’
सयाने हंस ने समझाया- ‘‘आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही है। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढऩे के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे।’’
किसी हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपरी शाखाओं तक पहुंच गई। बेल का तना मोटा होना शुरू हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई। एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिया उधर आ निकला। पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़ कर जाल बिछाया और चला गया। सांझ को सारे हंस लौट आए और पेड़ पर उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए। सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे।
एक हंस ने हिम्मत करके कहा- ‘‘ताऊ हम मूर्ख हैं,लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो।’’
दूसरा हंस बोला- ‘‘इस संकट से निकलने की तरकीब तुम ही हमें बता सकते हो। आगे हम तुम्हारी बात नहीं टालेंगे।’’
सभी हंसों ने हामी भरी, तब ताऊ ने उन्हें बताया- "‘‘मेरी बात ध्यान से सुनो। सुबह जब बहेलिया आएगा, सब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकाल कर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पड़े रहना। जैसे ही वह अंतिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब एक साथ उड़ जाना।’’
सुबह बहेलिया आया। हंसों ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझ कर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए। बहेलिया अवाक् होकर देखता रह गया।
👉 नव निर्माण हेतु विभूतियों का आह्वान (भाग २)
(२) शिक्षा एवं साहित्य-व्यक्ति की समस्त गरिमा उसकी मनःस्थिति पर, विचार प्रक्रिया पर निर्भर है। इस जीवन प्राण के मर्म स्थल को शिक्षा एवं साहित्य के माध्यम से ही परिष्कृत बनाया जा सकता है। व्यक्ति और समाज के निर्माण में शिक्षा और साहित्य की महत्ता सर्वविदित है। युग परिवर्तन की इन घड़ियों में दोनों माध्यमों का समुचित उपयोग किया जाना चाहिए।
सरकारों को अपने ढंग से काम करने देना चाहिए। वर्तमान वातावरण में उनके लिये यह कठिन ही है। नये युग के अनुरूप मस्तिष्क ढालने वाली वाली शिक्षा पद्धति के बारे में वे सही ढंग से कुछ सोच सकें और वैसा ही कुछ सही कदम उठा सकें। सरकारें भौतिक जानकारियाँ देने वाली जो शिक्षा प्रक्रिया चला रही हैं उससे लाभ उठाना चाहिये, किन्तु भाव परिष्कार की पूरक धर्म शिक्षा, नैतिक शिक्षा, भावनात्मक नव निर्माण की शिक्षा पद्धति का संचालन जनता स्तर पर होना चाहिए। प्रौढ़ शिक्षा का कार्य भी जनता को ही अपने हाथ में लेना चाहिए। ये सरकारी स्तर पर नहीं, जन स्तर पर ही हल हो सकता है। विवाहित महिलाओं की शिक्षा का प्रबन्ध सरकारी विद्यालय कर सकेंगे, यह आशा रखनी व्यर्थ है। दृष्टिकोण का परिष्कार, आज की परिस्थितियों में चरित्र निर्माण का व्यवहार पक्ष, समाज संरचना की अगणित समस्याएँ और हल, विश्व परिवार के लिए बाध्य करने वाले प्रचण्ड वातावरण का निर्माण, यह सब प्रयोजन जन स्तर के विद्यालय ही पूरा कर सकेंगे। पूरे या अधूरे समय के-जहाँ वे जिस स्तर पर भी खुल सकें खोले जायें। जनता अपनी रोटी, कपड़ा, दवा, मनोरंजन आदि का खर्च स्वयं उठाती है, इसके लिए सरकार से अनुदान नहीं माँगती, तो फिर भावनात्मक नव-निर्माण की शिक्षा के लिए सरकार का मुँह ताका जाय, इसकी क्या आवश्यकता है?
साहित्यकारों से इसी दिशा में लेखनी उठाने के लिए कहा जा रहा है। कवियों से मूर्छना को जागृति में परिणित कर सकने वाले अग्नि गीत लिखने के लिए कहा गया है। कहानीकार कथा माध्यमों से हृदयग्राही चित्रण प्रस्तुत कर सकते हैं। पत्रकार अपने पत्र-पत्रिकाओं में इस प्रकार के समाचारों और लेखों को स्थान देना आरम्भ करें। प्रकाशक ऐसी ही पुस्तकें छापें। संसार में लगभग ६०० भाषाएँ हैं। भारत में ही सरकारी मान्यता प्राप्त १४ भाषाएँ है और इससे कई गुनी संख्या उन भाषाओं की है जिन्हें मान्यता प्राप्त नहीं है। इन सभी भाषाओं में प्रचुर साहित्य लिखा जाना, अनुवादित किया जाना, छापा जाना और विक्रय किया जाना आवश्यक है। इस प्रकाशन व्यवसाय के लिए पूँजी और प्रतिभा दोनों की ही जरूरत है। मात्र लेखक नहीं प्रकाशक भी जब इस क्षेत्र में उतरेंगे तो उनके परस्पर सहयोग, समन्वय से कुछ काम चलेगा।
.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
सरकारों को अपने ढंग से काम करने देना चाहिए। वर्तमान वातावरण में उनके लिये यह कठिन ही है। नये युग के अनुरूप मस्तिष्क ढालने वाली वाली शिक्षा पद्धति के बारे में वे सही ढंग से कुछ सोच सकें और वैसा ही कुछ सही कदम उठा सकें। सरकारें भौतिक जानकारियाँ देने वाली जो शिक्षा प्रक्रिया चला रही हैं उससे लाभ उठाना चाहिये, किन्तु भाव परिष्कार की पूरक धर्म शिक्षा, नैतिक शिक्षा, भावनात्मक नव निर्माण की शिक्षा पद्धति का संचालन जनता स्तर पर होना चाहिए। प्रौढ़ शिक्षा का कार्य भी जनता को ही अपने हाथ में लेना चाहिए। ये सरकारी स्तर पर नहीं, जन स्तर पर ही हल हो सकता है। विवाहित महिलाओं की शिक्षा का प्रबन्ध सरकारी विद्यालय कर सकेंगे, यह आशा रखनी व्यर्थ है। दृष्टिकोण का परिष्कार, आज की परिस्थितियों में चरित्र निर्माण का व्यवहार पक्ष, समाज संरचना की अगणित समस्याएँ और हल, विश्व परिवार के लिए बाध्य करने वाले प्रचण्ड वातावरण का निर्माण, यह सब प्रयोजन जन स्तर के विद्यालय ही पूरा कर सकेंगे। पूरे या अधूरे समय के-जहाँ वे जिस स्तर पर भी खुल सकें खोले जायें। जनता अपनी रोटी, कपड़ा, दवा, मनोरंजन आदि का खर्च स्वयं उठाती है, इसके लिए सरकार से अनुदान नहीं माँगती, तो फिर भावनात्मक नव-निर्माण की शिक्षा के लिए सरकार का मुँह ताका जाय, इसकी क्या आवश्यकता है?
साहित्यकारों से इसी दिशा में लेखनी उठाने के लिए कहा जा रहा है। कवियों से मूर्छना को जागृति में परिणित कर सकने वाले अग्नि गीत लिखने के लिए कहा गया है। कहानीकार कथा माध्यमों से हृदयग्राही चित्रण प्रस्तुत कर सकते हैं। पत्रकार अपने पत्र-पत्रिकाओं में इस प्रकार के समाचारों और लेखों को स्थान देना आरम्भ करें। प्रकाशक ऐसी ही पुस्तकें छापें। संसार में लगभग ६०० भाषाएँ हैं। भारत में ही सरकारी मान्यता प्राप्त १४ भाषाएँ है और इससे कई गुनी संख्या उन भाषाओं की है जिन्हें मान्यता प्राप्त नहीं है। इन सभी भाषाओं में प्रचुर साहित्य लिखा जाना, अनुवादित किया जाना, छापा जाना और विक्रय किया जाना आवश्यक है। इस प्रकाशन व्यवसाय के लिए पूँजी और प्रतिभा दोनों की ही जरूरत है। मात्र लेखक नहीं प्रकाशक भी जब इस क्षेत्र में उतरेंगे तो उनके परस्पर सहयोग, समन्वय से कुछ काम चलेगा।
.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 बुद्धि से बोध तक
बुद्ध पूर्णिमा में आध्यात्मिक जीवन की सम्पूर्णता का प्रकाश है। सच तो यह है कि जहाँ बोध ही बुद्ध हैं, वहीं पूर्णिमा है और जहाँ बुद्धि है, वहीं अमावस। बुद्धत्व में अनुभव का बोध है, जबकि बुद्धि में केवल बीते हुए पुराने पड़ चुके अनुभवों का संकलन और अनुमान की भटकन। अपनी आँखें न हों तो करोड़ों सूर्य मिलकर भी जीवन का अँधियारा नहीं मिटा सकते। ऐसे में लकड़ी और छड़ी कितनी ही मजबूत क्यों न हों, पर इनसे आँखों का अनुभव नहीं पाया जा सकता।
भगवान् बुद्ध ने मानवता को इसी सत्य की सीख दी। उन्होंने जीवन की जो राह दिखाई, उसका आदि तो बुद्धि में है, पर अंत बोध में है। उन्हें अपना प्रारम्भ बुद्धि से करना पड़ा, क्योंकि हम सब यहीं खड़े हैं, परन्तु अंत बुद्धि में नहीं हैं। अंत तो परम अतिक्रमण है, जहाँ सब विचार खो जाते हैं, सब बुद्धिमत्ता विसर्जित हो जाती है, रह जाता है तो केवल निर्वाण, शान्ति व शून्यता भरा साक्षी भाव। यही बोध और अनुभव का चरम शिखर है।
मानवता के इन परम सद्गुरु ने बुद्धि के प्रयोग को अस्वीकारा नहीं। उन्होंने कहा कि बुद्धि के प्रयोग करो, संदेह, तर्क, विश्लेषण, विवेचन एक-एक कर सभी अथवा एक साथ सभी। पर इनकी गति अनुभव की ओर होना चाहिए। अनुभव की ओर गति न हो सकी तो बुद्धि केवल अमावस बनकर रह जायेगी। भले ही फिर इस अमावस के अँधेरे में संदेह, तर्क विश्लेषण, विवेचन जुगनुओं की भाँति चमकते हैं, किन्तु यदि बुद्धि की प्रतिबद्धता अनुभव रही तो प्रतिपदा, द्वितीया के क्रमिक सोपानों को पार करते हुए पूर्णिमा का प्रकाश आ ही जायेगा।
भगवान् तथागत के उपदेशों का सार यही है कि आध्यात्मिक जीवन का प्रारम्भ भले ही अनुभवों का संकलन एवं विश्लेषण से हो पर इस यात्रा का चरम स्वयं के अनुभव एवं परसंश्लेषण में होना चाहिए। बुद्धि से बोध तक यही है अनुभवाधारित पूर्णिमा की आध्यात्मिक यात्रा। इस यात्रा की सम्पूर्णता का अर्थ है-बोध की सम्पूर्णता। जहाँ कहीं, जब, जिस किसी के जीवन में यहाँ सम्पूर्णता आयी समझो उसके अंतस् में बुद्ध पूर्णिमा की चाँदनी बरस गयी।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५३
भगवान् बुद्ध ने मानवता को इसी सत्य की सीख दी। उन्होंने जीवन की जो राह दिखाई, उसका आदि तो बुद्धि में है, पर अंत बोध में है। उन्हें अपना प्रारम्भ बुद्धि से करना पड़ा, क्योंकि हम सब यहीं खड़े हैं, परन्तु अंत बुद्धि में नहीं हैं। अंत तो परम अतिक्रमण है, जहाँ सब विचार खो जाते हैं, सब बुद्धिमत्ता विसर्जित हो जाती है, रह जाता है तो केवल निर्वाण, शान्ति व शून्यता भरा साक्षी भाव। यही बोध और अनुभव का चरम शिखर है।
मानवता के इन परम सद्गुरु ने बुद्धि के प्रयोग को अस्वीकारा नहीं। उन्होंने कहा कि बुद्धि के प्रयोग करो, संदेह, तर्क, विश्लेषण, विवेचन एक-एक कर सभी अथवा एक साथ सभी। पर इनकी गति अनुभव की ओर होना चाहिए। अनुभव की ओर गति न हो सकी तो बुद्धि केवल अमावस बनकर रह जायेगी। भले ही फिर इस अमावस के अँधेरे में संदेह, तर्क विश्लेषण, विवेचन जुगनुओं की भाँति चमकते हैं, किन्तु यदि बुद्धि की प्रतिबद्धता अनुभव रही तो प्रतिपदा, द्वितीया के क्रमिक सोपानों को पार करते हुए पूर्णिमा का प्रकाश आ ही जायेगा।
भगवान् तथागत के उपदेशों का सार यही है कि आध्यात्मिक जीवन का प्रारम्भ भले ही अनुभवों का संकलन एवं विश्लेषण से हो पर इस यात्रा का चरम स्वयं के अनुभव एवं परसंश्लेषण में होना चाहिए। बुद्धि से बोध तक यही है अनुभवाधारित पूर्णिमा की आध्यात्मिक यात्रा। इस यात्रा की सम्पूर्णता का अर्थ है-बोध की सम्पूर्णता। जहाँ कहीं, जब, जिस किसी के जीवन में यहाँ सम्पूर्णता आयी समझो उसके अंतस् में बुद्ध पूर्णिमा की चाँदनी बरस गयी।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५३
👉 FALLACIES ABOUT SCRIPTURAL RESTRICTIONS (Part 1)
Q.1. Is Gayatri worship conditioned? (Is Gayatri ‘keelit’)?
Ans. There are two methods for invoking powers of Gayatri. One the simple divine method for spiritual progress and the other an intricate method of ‘Tantra Shastra’ for immediate fulfilment of worldly desires. The Mantras of Tantra Shastra also have a destructive power. Unless, they are practised with a strict discipline and for proper objective, they are capable of inflicting harm on the practitioner. A person with an ulterior motive can inflict harm on others through the power obtained by invocation of occult powers through ‘Tantra Sadhana’. Hence specific key procedures are required to unlock the powers of Tantrik Mantras. This, too, is possible only with the help of an experienced Guru. As doses of a high potency medicine are to be decided by an experienced doctor, decoding or unlocking a Mantra (in the above discipline) depends on the spiritual status of the one practitioner. ‘Durga Shaptshati’ which requires ‘Kavach’, ‘Keelan’ and ‘Argal’ may be quoted as an example).
Vedic Mantras (such as Gayatri) are not bound by such strict restrictions, as they are practised exclusively for one’s inherent spiritual growth and for developing god-gifted capabilities for performing noble deeds. Vedic Mantras, therefore, do not require any ‘unlocking keys’. Nevertheless, as a sick person or a student needs an experienced doctor or a teacher for proper treatment or teaching a beginner in this field too requires the guidance of an accomplished Guru, in the absence of which he wanders aimlessly without making any progress whatsoever in the path of Sadhana.
None should entertain any apprehension that in Kalyug, Gayatri Mantra has been accursed or that its Sadhana goes in vain. Who can curse God and what effect can it have? This is nothing but a ruse meant to undermine the faith of the people and to allure them to join some other sect.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 44
Ans. There are two methods for invoking powers of Gayatri. One the simple divine method for spiritual progress and the other an intricate method of ‘Tantra Shastra’ for immediate fulfilment of worldly desires. The Mantras of Tantra Shastra also have a destructive power. Unless, they are practised with a strict discipline and for proper objective, they are capable of inflicting harm on the practitioner. A person with an ulterior motive can inflict harm on others through the power obtained by invocation of occult powers through ‘Tantra Sadhana’. Hence specific key procedures are required to unlock the powers of Tantrik Mantras. This, too, is possible only with the help of an experienced Guru. As doses of a high potency medicine are to be decided by an experienced doctor, decoding or unlocking a Mantra (in the above discipline) depends on the spiritual status of the one practitioner. ‘Durga Shaptshati’ which requires ‘Kavach’, ‘Keelan’ and ‘Argal’ may be quoted as an example).
Vedic Mantras (such as Gayatri) are not bound by such strict restrictions, as they are practised exclusively for one’s inherent spiritual growth and for developing god-gifted capabilities for performing noble deeds. Vedic Mantras, therefore, do not require any ‘unlocking keys’. Nevertheless, as a sick person or a student needs an experienced doctor or a teacher for proper treatment or teaching a beginner in this field too requires the guidance of an accomplished Guru, in the absence of which he wanders aimlessly without making any progress whatsoever in the path of Sadhana.
None should entertain any apprehension that in Kalyug, Gayatri Mantra has been accursed or that its Sadhana goes in vain. Who can curse God and what effect can it have? This is nothing but a ruse meant to undermine the faith of the people and to allure them to join some other sect.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 44
👉 ज्ञान और विज्ञान एक दूसरे का अवलम्बन अपनाएँ
ज्ञान और विज्ञान यह दोनों सहोदर भाई हैं। ज्ञान अर्थात् चेतना को मानवी गरिमा के अनुरूप चिन्तन तथा चरित्र के लिए आस्थावान बनने तथा बनाने की प्रक्रिया। यदि ज्ञान का अभाव हो तो मनुष्य को भी अन्य प्राणियों की भाँति स्वार्थ परायण रहना होगा। उसकी गतिविधियाँ पेट की क्षुधा निवारण तथा मस्तिष्कीय खुजली के रूप में कामवासना का ताना-बाना बते रहने में ही नष्ट हो जायेंगी।
मनुष्य भी एक तरह का पशु है। जन्मजात रूप से उसमें भी पशु, प्रवृत्तियाँ भरी होती हैं। उन्हें परिमार्जित करके सुसंस्कारी एवं आदर्शवादी बनाने का काम जिस चिन्तन पद्धति का है उसे ज्ञान कहा गया है। गीताकार का कथन है कि—‘‘ज्ञान से अधिक श्रेष्ठ और पवित्र अन्य कोई वस्तु नहीं है। ‘न हि ज्ञानेन पवित्रमिद्द विद्यते।’
ज्ञान वह अग्नि है जो सड़े-गले उबले लोहे को अग्नि संस्कार करके माण्डूर भस्म—लौह भस्म आदि अमतोपम गुण दिखा सकने योग्य बनाती है। पतित, पापी, मूढ़, पशु, महामानव, ऋषि आदि की काया एक ही तरह की होती है। उनकी बनावट और रहन-सहन पद्धति में कोई अन्तर नहीं होता। फिर जो एक को गया-गुजरा और दूसरों को आकाश में छाया देखते हैं। वह उसकी ज्ञान चेतना का ही चमत्कार है। वह हेय स्तर की ही तो मनुष्य निरर्थक या अनर्थ मूलक कामों में लगा हुआ दृष्टिगोचर होगा। यदि यह ज्ञान पवित्र, श्रेष्ठ और उत्साहवर्धक हो तो वही शरीर ऐसा काम करते हुए दिखाई देगा जिनसे असंख्यों को प्रेरणा मिले और उसका अनुगमन करने वालों के लिए भी प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो।
ज्ञान आन्तरिक जीवन से सम्बन्धित है और वह चेतना क्षेत्र में प्रभावित करके उचित-अनुचित का अन्तर करना सिखाता है। दूरदर्शी विवेकशीलता के आधार पर जो निर्णय या निर्धारण किए जाते हैं उन्हें ज्ञान का, सद्ज्ञान का ही अनुदान कहना चाहिए।
ज्ञान का सहोदर है—विज्ञान। विज्ञान अर्थात् पदार्थ ज्ञान। हमारे चारों ओर अगणित वस्तुएँ बिखरी पड़ी हैं। वे अपने मूलरूप में प्रायः निरर्थक जैसी हैं उन्हें उपयोगी बनाने और उनकी विशेषताओं को समझने की प्रक्रिया विज्ञान है। विज्ञान ने मनुष्य को साधन सम्पन्न बनाया है। अन्य प्राणी इस जानकारी से रहित हैं इसलिए वे निकटवर्ती आहार को उपलब्ध करने में ही अपनी क्षमता समाप्त कर लेते हैं। यौवन की तरंग मन में उठने पर वे प्रजनन कृत्य में भी अपना विशेष पुरुषार्थ प्रदर्शित करते देखे जाते हैं। यह प्रकृति प्रदत्त शरीर के साथ मिलने वाली स्वाभाविकता है। उन्हें विज्ञान नहीं मिला। विज्ञान केवल मनुष्य की विशेष उपलब्धि है। आग जलाना, कृषि, पशुपालन, वास्तुशिल्प, भाषा, चिकित्सा आदि एक से एक बढ़कर जानकारियाँ उसने प्राप्त की हैं और उनके सहारे साधन सम्पन्न बना है।
कभी विज्ञान की परिधि छोटी थी और उसके सहारे जीवनोपयोगी वस्तुओं तक का ही उत्पादन एवं प्रस्तुतीकरण होता था, पर अब बात बहुत आगे बढ़ गई और प्रकृति ने अनेकानेक रहस्य खोज निकाल लिए गए हैं। इतना ही नहीं वरन् इससे भी आगे बढ़कर दूसरों के साधन छीनने वाले, उन्हें असमर्थ बनाने वाले प्राण घातक अस्त्र-शस्त्र भी बनने लगे हैं। जिस विज्ञान से सुख साधनों की वृद्धि का स्वप्न देखा जाता है वही यदि विनाश या पतन की सामग्री प्रस्तुत करने लगे तो आश्चर्य और असमंजस की बात है।
आज ज्ञान और विज्ञान दोनों ही अपनी प्रौढ़ावस्था में हैं। विडम्बना एक ही है कि वे सीधी राह चलने की अपेक्षा उल्टी दिशा अपना रहे हैं और एकदूसरे का सहयोग न करके विरोध का रुख अपनाए हुए हैं और तरह-तरह के दाँव-पेचों का आविष्कार कर रहे हैं। इन गतिविधियों से वह धारा अवरुद्ध हो गई, जो अब तक मनुष्य को समर्थ और सुखी बनाती रही है। अब उनमें प्रयास भस्मासुर जैसे ही चले हैं। जिसने उन्हें विकसित किया उसी मनुष्य का हेय, हीन बनाते और जीवन संकट खड़ा करने के लिए उद्यत दीखते हैं।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
मनुष्य भी एक तरह का पशु है। जन्मजात रूप से उसमें भी पशु, प्रवृत्तियाँ भरी होती हैं। उन्हें परिमार्जित करके सुसंस्कारी एवं आदर्शवादी बनाने का काम जिस चिन्तन पद्धति का है उसे ज्ञान कहा गया है। गीताकार का कथन है कि—‘‘ज्ञान से अधिक श्रेष्ठ और पवित्र अन्य कोई वस्तु नहीं है। ‘न हि ज्ञानेन पवित्रमिद्द विद्यते।’
ज्ञान वह अग्नि है जो सड़े-गले उबले लोहे को अग्नि संस्कार करके माण्डूर भस्म—लौह भस्म आदि अमतोपम गुण दिखा सकने योग्य बनाती है। पतित, पापी, मूढ़, पशु, महामानव, ऋषि आदि की काया एक ही तरह की होती है। उनकी बनावट और रहन-सहन पद्धति में कोई अन्तर नहीं होता। फिर जो एक को गया-गुजरा और दूसरों को आकाश में छाया देखते हैं। वह उसकी ज्ञान चेतना का ही चमत्कार है। वह हेय स्तर की ही तो मनुष्य निरर्थक या अनर्थ मूलक कामों में लगा हुआ दृष्टिगोचर होगा। यदि यह ज्ञान पवित्र, श्रेष्ठ और उत्साहवर्धक हो तो वही शरीर ऐसा काम करते हुए दिखाई देगा जिनसे असंख्यों को प्रेरणा मिले और उसका अनुगमन करने वालों के लिए भी प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो।
ज्ञान आन्तरिक जीवन से सम्बन्धित है और वह चेतना क्षेत्र में प्रभावित करके उचित-अनुचित का अन्तर करना सिखाता है। दूरदर्शी विवेकशीलता के आधार पर जो निर्णय या निर्धारण किए जाते हैं उन्हें ज्ञान का, सद्ज्ञान का ही अनुदान कहना चाहिए।
ज्ञान का सहोदर है—विज्ञान। विज्ञान अर्थात् पदार्थ ज्ञान। हमारे चारों ओर अगणित वस्तुएँ बिखरी पड़ी हैं। वे अपने मूलरूप में प्रायः निरर्थक जैसी हैं उन्हें उपयोगी बनाने और उनकी विशेषताओं को समझने की प्रक्रिया विज्ञान है। विज्ञान ने मनुष्य को साधन सम्पन्न बनाया है। अन्य प्राणी इस जानकारी से रहित हैं इसलिए वे निकटवर्ती आहार को उपलब्ध करने में ही अपनी क्षमता समाप्त कर लेते हैं। यौवन की तरंग मन में उठने पर वे प्रजनन कृत्य में भी अपना विशेष पुरुषार्थ प्रदर्शित करते देखे जाते हैं। यह प्रकृति प्रदत्त शरीर के साथ मिलने वाली स्वाभाविकता है। उन्हें विज्ञान नहीं मिला। विज्ञान केवल मनुष्य की विशेष उपलब्धि है। आग जलाना, कृषि, पशुपालन, वास्तुशिल्प, भाषा, चिकित्सा आदि एक से एक बढ़कर जानकारियाँ उसने प्राप्त की हैं और उनके सहारे साधन सम्पन्न बना है।
कभी विज्ञान की परिधि छोटी थी और उसके सहारे जीवनोपयोगी वस्तुओं तक का ही उत्पादन एवं प्रस्तुतीकरण होता था, पर अब बात बहुत आगे बढ़ गई और प्रकृति ने अनेकानेक रहस्य खोज निकाल लिए गए हैं। इतना ही नहीं वरन् इससे भी आगे बढ़कर दूसरों के साधन छीनने वाले, उन्हें असमर्थ बनाने वाले प्राण घातक अस्त्र-शस्त्र भी बनने लगे हैं। जिस विज्ञान से सुख साधनों की वृद्धि का स्वप्न देखा जाता है वही यदि विनाश या पतन की सामग्री प्रस्तुत करने लगे तो आश्चर्य और असमंजस की बात है।
आज ज्ञान और विज्ञान दोनों ही अपनी प्रौढ़ावस्था में हैं। विडम्बना एक ही है कि वे सीधी राह चलने की अपेक्षा उल्टी दिशा अपना रहे हैं और एकदूसरे का सहयोग न करके विरोध का रुख अपनाए हुए हैं और तरह-तरह के दाँव-पेचों का आविष्कार कर रहे हैं। इन गतिविधियों से वह धारा अवरुद्ध हो गई, जो अब तक मनुष्य को समर्थ और सुखी बनाती रही है। अब उनमें प्रयास भस्मासुर जैसे ही चले हैं। जिसने उन्हें विकसित किया उसी मनुष्य का हेय, हीन बनाते और जीवन संकट खड़ा करने के लिए उद्यत दीखते हैं।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 विश्व स्तरीय चालीस दिवसीय साधना अनुष्ठान
Note :
चालीस दिवसीय साधना अनुष्ठान की यह साधना साधकों को अपने घर पर रह कर ही संपन्न करनी है । इस के लिए शांतिकुंज नहीं आना होगा । पंजीयन करने का उद्देश्य सभी साधकों की सूचना एकत्र करना एवं शांतिकुंज स्तर पर दोष परिमार्जन एवं संरक्षण एवं मार्गदर्शन की व्यवस्था करना है ।
प्रखर साधना किस लिये ??
#युग परिवर्तन के चक्र को तीव्र करने हेतु
#संक्रमण काल में युगशिल्पियों को तपाने हेतु
#आतंकवादी / आसुरी शक्तियों के निरस्तीकरण हेतु
#वंदनीया माता जी को श्रद्धांजलि हेतु
# नव सृजन की गतिविधियों को शक्ति एवं संरक्षण प्रदान करने हेतु
आत्मीय परिजन,
सन् 2026 में परम वंदनीया माताजी के जन्म, अखण्ड दीप प्रज्ज्वलन एवं श्री अरविन्द महर्षि के अति मानस अवतरण की शताब्दी मनाई जानी है। प्रखर साधना के अभाव में समस्त सामाजिक, सांस्कृतिक आंदोलन धराशायी हो गये। युग निर्माण आन्दोलन इसलिये प्रखर है क्योंकि इसमें ऋषियुग्म का तप एवं युग साधकों की प्रखर साधना है। इस विषम बेला में और अधिक प्रखरता की अपेक्षा की जा रही है। इस हेतु शांतिकुंज ने 2026 तक वार्षिक चालीस दिवसीय अनुष्ठान की योजना बनाई है।
क्या करें ??
* चूँकि विश्व स्तर पर 24000 साधकों द्वारा साधना की जायेगी, इस हेतु जोन/ उप जोन / जिला समितियों को अपनी जवाबदारी सुनिश्चित करनी है।
* सक्रिय 108 जिलों में 240 साधक प्रति जिले के हिसाब से एवं अन्य जिले में 108 या 51 साधक तैयार/सहमत/संकल्पित करें।
* तपोनिष्ठ पूज्यवर ने 24 लाख के 24 महापुरश्चरण किये थे तो हम छोटा- सा सवा लाख मंत्रों का चालीस दिवसीय अनुष्ठान तो करें ही।
* पूज्यवर ने 24 वर्षों तक जौ की रोटी और छाछ पर तप किया, हम यथा संभव 40 दिनों तक नमक और (या) शक्कर का त्याग करें।
* पूज्यवर ने जीवनकाल में 3200 के आसपास पुस्तकें लिखीं, हम चालीस दिनों में दो- तीन पुस्तकों का स्वाध्याय तो कर ही लें ।।
* उन्होंने करोड़ों व्यक्तियों/साधकों का निर्माण किया, हम अपने जैसे / अपने से बेहतर 24 व्यक्तियों को साधक / कार्यकर्ता बना दें तभी हम उनके पुत्र कहलायेंगे, इससे कम में बात नहीं बनेगी।
* शान्तिकुन्ज में पाँच दिवसीय मौन (अंत:ऊर्जा) शिविर चलते हैं, अपने जिले में चालीस दिनों में एक दिन, एक दिवसीय मौन शिविर इस दौरान संचालित करें।
* पूर्णाहुति, समस्त शक्तिपीठों पर एक साथ एक समय पर संपन्न हो।
कैसे करें ?- अनुशासन, अणुव्रत :-
1. उपासना :: न्यूनतम 33 मालाओं का चालीस दिनों तक जप प्रतिदिन करना है, भले ही
दो या तीन चरणों में हो। जप के साथ हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर उदीयमान भगवान
सविता का ध्यान। जप से पूर्व अनुलाम- विलाम अथवा प्राणसंचार प्राणायाम करें। जप गिनती के लिये नही, अपितु उसकी गहराई को बढ़ाते हुये, भावविह्वल होकर करें। अपनी ही माला से जप करें।
2. साधना :: चालीस दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन, हो सके तो एक समय उपवास, सात्विक, अस्वाद व्रत, न्यूनतम दो घंटे मौन, अपनी सेवा अपने हाथों से, मेरा अनुष्ठान है इस बात का सार्वजनिक प्रचार न करना, अर्थ संयम, विचार संयम के साथ समय संयम का पालन का प्रयास करना। भाव शुद्धि, चित्त शुद्धि का अधिकाधिक प्रयास। साधना का अहंकार न पालें, पूज्यवर करा रहे हैं, यही भाव प्रकट हो। मोह से पिंड छुड़ाने हेतु कभी कभी शक्तिपीठ पर विश्राम करें। लोभ निवारण हेतु अपनी प्रिय वस्तुयें बांटने का प्रयत्न करें। चालीस दिनों तक निंदा से बचना, परिजनों की प्रशंसा को लक्ष्य बनावें, गुण ग्राहक बनें। स्वास्थ्य के अनुकूल हो तो, गोझरण/गौमूत्र/तुलसी जल का सेवन करें इससे ध्यान सहज लगेगा।
3. स्वाध्याय :: स्वाध्याय से श्रद्धा संवर्धन होता है। अत: गायत्री महाविज्ञान, हमारी वसीयत विरासत, महाकाल की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया, लोकसेवियों हेतु दिशा बोध इन पुस्तकों का अनिवार्य स्वाध्याय हो। हमको सब मालूम है इस अकड़ में न रहें, पुस्तकों का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
4. आराधना :: समयदान, जन संपर्क एवं देवालय सेवा का लक्ष्य रखें। परिणाम की चिंता किये बगैर 40 दिनों में न्यूनतम 10 लोगों तक साहित्य पहुँचा कर उनका हालचाल पूछें एवं अच्छे श्रोता की तरह सुनें, यथोचित समाधान दें। साप्ताहिक रूप से शक्तिपीठ / प्रज्ञापीठ / केन्द्र की स्वच्छता करना। स्नानगृह, शौचालय अनिवार्य रूप से स्वच्छ रखना। प्रज्ञा संस्थान दूर हो तो ग्राम के ही देवालय की स्वच्छता करना। समय बचाने हेतु वाटस्एप एवं अन्य सोशल मीडिया का विवेकयुक्त उपयोग करना।
5. अखण्ड जप/दीपयज्ञ :: इन चालीस दिनों में प्रत्येक साधक अपने निवास पर एक दिन का अखण्ड- जप रखे जिसका समापन दीपयज्ञ से होगा। इस तरह 24000 अखण्ड जप एवं इतने ही दीपयज्ञ भी संपन्न होंगे।
6. अंशदान :: चाय का खर्चा बचा कर 5 रु प्रतिदिन जमा कर रू 200.00 पूर्णाहुति में लगायें। यह क्रम वर्ष भर एवं निरंतर चलने दें। इसका उपयोग विद्या विस्तार में करें।
7. विशेष :: साधना के दौरान सूतक, अशौच इत्यादि की बाधा आवे तो उतने दिन आगे बढ़ा देवें परंतु इसे बहाना न बनावें। ये समस्त अनुशासन घर के लिये हैं, यात्रा, कार्यक्रम, बीमारी आदि में आपद्धर्म का पालन करें। अपनी ही माला से जप करें, हो सके तो अपना ही आसन लें। गोमुखी का प्रयोग अर्थात् माला को ढंक कर जप करें। स्वच्छ वस्त्रों में, संभव हो तो पीले में ही जप करें। अनुष्ठान के पूर्व यज्ञोपवीत को बदल लें। साप्ताहिक रूप से घर पर, संभव हो तो शक्तिपीठ पर यज्ञ में भाग लेवें।
8. चिन्तन :: साधना में हैं तो सारे काम बंद, ऐसा न करें। गुरु कार्य हेतु ही साधना कर रहे हैं, अत: गुरु कार्य ही जीवन साधना है इसका ध्यान रहे। हर सुबह नया जीवन- हर रात नई मौत का चिंतन, आत्म बोध, तत्व बोध की साधना हो। अन्य विषयों पर बेकार की चर्चा में भाग न लें, विनम्रतापूर्वक वहाँ से हट जायें।
9. मौन साधना :: चालीस दिनों में एक बार, एक दिन के मौन शिविर में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।
10. वृक्ष गंगा अभियान :: 24000 साधक, तरुपुत्र / तरुमित्र योजना में भाग लेकर वृक्ष देव की स्थापना का संकल्प करें। वृक्ष को पितृवत्, मित्रवत् पालने, रक्षा करने एवं संवर्धन करने हेतु तत्पर हों।
11. पूर्णाहुति :: समस्त शक्तिपीठों में एक साथ एक समय पर संपन्न होगी। न्यूनतम 108 आहुतियाँ देनी ही हैं। साधकों के यज्ञ में कृपणता न हो। लोक जागरण के यज्ञ सादगी, मितव्ययिता के साथ संपन्न करावें किंतु इस पूर्णाहुति को भाव श्रद्धा से युक्त होकर करें। समस्त साधक अपने घर पर तैयार किये गये मिष्ठान्न का गायत्री माता को भोग लगायें। पूर्णाहुति पर कार्यकर्ता सम्मेलन में अनुयाज के संकल्प किये जायें।
12. ब्रह्मभोज :: अनुष्ठान के समापन पर ब्रह्मभोज हेतु सत्साहित्य का वितरण करें।
13. अनुयाज :: 24000 साधक 10 याजकों को प्रशिक्षित कर न्यूनतम दस घरों में 7 मई 2020, गुरुवार ( वैशाख पूर्णिमा- बुद्ध पूर्णिमा ) को गृहे- गृहे यज्ञ अभियान में यज्ञ करावें तो व्यक्ति निर्माण के साथ वातावरण परिशोधन का क्रम एक साथ चल पड़ेगा एवं कार्यकर्ताओं का सुनियोजन भी होगा।
14. उपरोक्त अनुशासनों के पालन में अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें, अधिक कठोर अभ्यास से स्वास्थ्य संबंधी कष्ट हो सकता है अत: तदनुसार कार्य करें।
‘तुम्हारी शपथ हम, निरंतर तुम्हारे, चरण चिन्ह की राह चलते रहेंगे॥’
आईये, प्रखर साधना अभियान हेतु आपको भाव- भरा आमंत्रण ॥
Registration,@
www.awgp.org http://diya.net.in/
https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSd9pL7DFc8ybxUFpWQj5wK2ERbVn1BnlGyfRCI6NFdYMKXG5w/viewform
विस्तृत मार्गदर्शन हेतु प.पू गुरुदेव द्वारा लिखित गायत्री की अनुष्ठान एवं पुरश्चरण साधनाएँ, का सन्दर्भ लें|
शंका समाधान हेतु शान्तिकुन्ज से पत्र अथवा मेल से सम्पर्क करें।
Contact US :
For any Question Mail Us:-
youthcell@awgp.org
Contact No - 9258360652,
9258360600
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9258360600
पूर्ण शान्ति की प्राप्ति
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
Poorn Shanti Ki Prapti
Pt Shriram Sharma Acharya
👇👇👇
https://youtu.be/XWDPHgjYpEg
हे प्रभो जीवन हमारा यज्ञ मय कर दीजिये
प्रज्ञा गीत संगीत
श्रद्धेया शैलबाला पंड्या जीजी
👇👇👇
https://youtu.be/dg1ixwuvNvc
देवत्व को बचाने, संघर्ष भी किये हैं।
Devatwa Ko Bachane Sangharsh Bhi Kiye Hai
प्रज्ञा गीत संगीत
श्रद्धेया शैलबाला पंड्या जीजी
👇👇👇
https://youtu.be/7nHWFLcWZS0
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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हे प्रभो जीवन हमारा यज्ञ मय कर दीजिये
प्रज्ञा गीत संगीत
श्रद्धेया शैलबाला पंड्या जीजी
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देवत्व को बचाने, संघर्ष भी किये हैं।
Devatwa Ko Bachane Sangharsh Bhi Kiye Hai
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