रविवार, 13 अक्टूबर 2019

👉 आभास

एक बार एक व्यक्ति की उसके बचपन के टीचर से मुलाकात होती है, वह उनके चरण स्पर्श कर अपना परिचय देता है।

वे बड़े प्यार से पुछती है, 'अरे वाह, आप मेरे विद्यार्थी रहे है, अभी क्या करते हो, क्या बन गए हो?'

'मैं भी एक टीचर बन गया हूं ' वह व्यक्ति बोला,' और इसकी प्रेरणा मुझे आपसे ही मिली थी जब में 7 वर्ष का था।'

उस टीचर को बड़ा आश्चर्य हुआ, और वे बोली कि,' मुझे तो आपकी शक्ल भी याद नही आ रही है, उस उम्र में मुझसे कैसी प्रेरणा मिली थी??'

वो व्यक्ति कहने लगा कि ....

'यदि आपको याद हो, जब में चौथी क्लास में पढ़ता था, तब एक दिन सुबह सुबह मेरे सहपाठी ने उस दिन उसकी महंगी घड़ी  चोरी होने की आपसे शिकायत की थी, आपने क्लास का दरवाज़ा बन्द करवाया और सभी बच्चो को क्लास में पीछे एक साथ लाइन में खड़ा होने को कहा था, फिर आपने सभी बच्चों की जेबें टटोली थी, मेरी जेब से आपको घड़ी मिल गई थी, जो मैंने चुराई थी, पर चूंकि आपने सभी बच्चों को अपनी आंखें बंद रखने को कहा था तो किसी को पता नहीं चला कि घड़ी मैंने चुराई थी।

टीचर उस दिन आपने मुझे लज्जा व शर्म से बचा लिया था, और इस घटना के बाद कभी भी आपने अपने व्यवहार से मुझे यह नही लगने दिया कि मैंने एक गलत कार्य किया था, आपने बगैर कुछ कहे मुझे क्षमा भी कर दिया और दूसरे बच्चे मुझे चोर कहते इससे भी बचा लिया था।'

ये सुनकर टीचर बोली,
'मुझे भी नही पता था बेटा कि वो घड़ी किसने चुराई थी' वो व्यक्ति बोला,'नहीं टीचर, ये कैसे संभव है? आपने स्वयं अपने हाथों से चोरी की गई घड़ी मेरे जेब से निकाली थी।'

टीचर बोली.....
'बेटा मैं जब सबके पॉकेट चेक कर रही थी, उस समय मैने कहा था कि सब अपनी आंखे बंद रखेंगे, और वही मैंने भी किया था, मैंने स्वयं भी अपनी आंखें बंद रखी थी'

मित्रो....
किसी को उसकी ऐसी शर्मनाक परिस्थिति से बचाने का इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है?

यदि हमें किसी की कमजोरी मालूम भी पड़ जाए तो उसका दोहन करना तो दूर, उस व्यक्ति को ये आभास भी ना होने देना चाहिये कि आपको इसकीं जानकारी भी है।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 13 Oct 2019




👉 आलस्य एक प्रकार की आत्म-हत्या ही है (भाग १)

 ‘आलस्य एक घोर पाप है’—ऐसा सुनकर कितने ही आश्चर्य में पड़कर सोच सकते हैं क्या अजीब-सी बात है! भला आलस्य किस प्रकार पाप हो सकता है? पाप तो चोरी, डकैती, लूट-खसोट, विश्वासघात, हत्या, व्यभिचार आदि कुकर्म ही होते हैं। इनसे मनुष्य का नैतिक पतन होता है और वह धर्म से गिर जाता है। आलस्य किस प्रकार पाप माना जा सकता है? आलसी व्यक्ति तो चुपचाप एक स्थान पर पड़ा-पड़ा जिन्दगी के दिन काटा करता है। वह न तो अधिक काम ही करता है और न समाज में घुलता-मिलता है, इसलिये उससे पाप हो सकने की सम्भावना नहीं के समान ही नगण्य रहती है।

पाप क्या है? वह हर आचार-व्यवहार एवं विचार पाप ही है जिससे किसी को अनुचित रीति से शारीरिक अथवा मानसिक कष्ट अथवा हानि हो। आत्म-हिंसा अथवा आत्म-हानि एक जघन्य-पाप कहा गया है। आलसी सबसे पहले इसी पाप का भागी होता है। मनुष्य को शरीररूपी धरोहर मिली हुई है। निष्क्रिय पड़ा रहकर आलसी इसे बरबाद किया करता है जबकि उसे ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है। यदि कोई समझदार व्यक्ति उससे इस अपराध का उपालम्भ करता है तो वह बड़े दम्भ से यही कहता है कि शरीर उसका अपना है। रखता है या बर्बाद करता है—इस बात से किसी दूसरे का क्या सम्बन्ध हो सकता है?

आलसी का यह अहंकार स्वयं एक पाप है। उसका यह कथन उसकी अनधिकारिक अहमन्यता को घोषित करता है। शरीर किसी की अपनी संपत्ति नहीं। वह ईश्वर-प्रदत्त एक साधन है जो भव बन्धन में बँधी आत्मा को इस शरीर रूपी साधन को उद्देश्य-दिशा में उपभोग करने क  कर्तव्य भर ही मिला है। उसे अपना समझने अथवा बरबाद करने का अधिकार किसी को नहीं है। आलसी निरन्तर इस अनधिकार चेष्टा को करता हुआ पाप करता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 23

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/November/v1.23

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७९)

👉 अथर्ववेदीय चिकित्सा पद्धति के प्रणेता युगऋषि

आध्यात्मिक चिकित्सा के आचार्य परम पूज्य गुरुदेव ने वैदिक महर्षियों की परम्परा के इस युग में नवजीवन दिया। उन्होंने अध्यात्म चिकित्सा के वैदिक सूत्रों, सत्यों एवं रहस्यमय प्रयोगों की कठिन साधना दुर्गम हिमालय में सम्पन्न की। उनके द्वारा दिए गए संकेतों के अनुसार यह जटिल साधना स्वयं वैदिक युग के महर्षियों के सान्निध्य में सम्पन्न हुई। वामदेव, कहोड़, अथर्वण एवं अंगिरस आदि ये महर्षि अभी भी अपने अप्रत्यक्ष शरीर से देवात्मा हिमालय में निवास करते हैं। परम गुरु स्वामी सर्वेश्वरानन्द जी ने पूज्य गुरुदेव को उनसे मिलवाया था। उन सबने गुरुदेव की पात्रता, पवित्रता व प्रामाणिकता परख कर उन्हें अध्यात्म चिकित्सा के सभी रहस्यों से अवगत कराया।

यूं तो ऐसी रहस्यात्मक चर्चाएँ गुरुदेव कम ही किया करते थे। फिर भी यदा- कदा प्रश्रों के समाधान के क्रम में उनके मुख से ऐसे रहस्यात्मक संकेत उभर आते थे। ऐसे ही क्रम में एक दिन उन्होंने कहा था कि अध्यात्म चिकित्सा की बातें बहुत लोग करते हैं, लेकिन इसका मर्म बहुत इने- गिने लोग जानते हैं। अध्यात्म चिकित्सा दरअसल वेदविद्या है। यूं तो इसका प्रारम्भ ऋग्वेद से ही हो जाता है, यजुष और साम में भी इसके प्रयोग मिलते हैं। लेकिन इसका समग्र व संवर्धित रूप अथर्ववेद में मिलता है। इस अथर्वण विद्या को सही व सम्यक् ढंग से जानने पर ही अध्यात्म चिकित्सा के सभी रहस्य जाने जा सकते हैं। यह बताने के बाद उन्होंने धीमे स्वर में कहा कि मैंने स्वयं महर्षि अथर्वण एवं महर्षि अंगिरस से इन रहस्यों का ज्ञान प्राप्त किया है।

शब्द व्युत्पत्ति के आधार पर ‘अथर्वा’ शब्द का अर्थ ‘अचंचलता की स्थिति’ है। ‘थर्व इति गतिर्नाम न थर्व इति अथर्वा’। थर्व का मतलब गति है और गति का अर्थ चंचलता है। शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक आदि सभी प्रकार की चंचलता को अथर्वविद्या की अध्यात्म चिकित्सा से नियंत्रित करके साधक सम्पूर्ण स्वस्थ व स्थितप्रज्ञ बनाया जाता है। परम पूज्य गुरुदेव के मुख से हमने एक और बात सुनी है। वह कहते थे कि वैदिक वाङ्मय में अथर्ववेद के ‘ब्रह्मवेद’, ‘भैषज्यवेद’ आदि कई नाम मिलते हैं। इन्हीं में से एक नाम ‘अथर्वाङ्गिरस’ भी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १११

👉 गुरुवर की वाणी

आज की विषम परिस्थितियों में युग निर्माण परिवार के व्यक्तियों को महाकाल ने बड़े जतन से ढूंढ़-खोजकर निकाला है। आप सभी बड़े ही महत्त्वपूर्ण एवं सौभाग्यशाली हैं। इस समय कुछ खास जिम्मेदारियों के लिए आपको महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी है। भगवान् के कार्य में भागीदारी निभानी है। आप धरती पर केवल बच्चे पैदा करने और पेट भरने के लिए नहीं आए हैं, बल्कि आज की इन विषम परिस्थितियों को बदलने में भगवान् की मदद करने के लिए आए हैं।

भगवान् अगर किसी पर प्रसन्न होते हैं, तो उसे बहुत सारी धन-सम्पत्ति देते हैं तथा औलाद देते हैं, यह बिलकुल गलत ख्याल है। वास्तविकता यह है कि जो भगवान् के नजदीक होते हैं उन्हें धन-सम्पत्ति एवं औलाद से अलग कर दिया जाता है। ऐसी परिस्थितियों में ही उनके द्वारा यह संभव हो सकता है कि वे भगवान् का काम करने के लिए अपना साहस एकत्रित कर सकें और श्रेय प्राप्त कर सके। इससे कम कीमत पर किसी को भी श्रेय नहीं मिला है।

हमारी उनसे प्रार्थना है, जो जागरूक हैं। जो सोये हुए हैं उनसे हम क्या कह सकते हैं। आपसे कहना चाहते हैं कि फिर कोई ऐसा समय नहीं आयेगा, जिसमें आपको औलाद या धन से वंचित रहना पड़े, परन्तु अभी इस जन्म में इन दोनों की बाबत न सोचें। विराम लगा दें। आपको भगवान् के काम के अन्तर्गत रोटी, कपड़ा और मकान की आवश्यकता सदा पूरी होती रहेगी, इसके लिए किसी प्रकार की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है।

अगले दिनों धन का संग्रह कोई नहीं कर सकेगा, क्योंकि आने वाले दिनों में धन के वितरण पर लोग जोर देंगे। शासन भी अगले दिनों आपको कुछ जमा नहीं करने देगा। अतः आप मालदार बनने का विचार छोड़ दें। आप अगर जमाखोरी का विचार छोड़ देंगे तो इसमें कुछ हर्ज नहीं है। अगर आप पेट भरने-गुजारे भर की बात सोचें तो कुछ हर्ज नहीं है। आप सन्तान के लिए धन जमा करने, उनके लिए व्यवस्था बनाने की चिन्ता छोड़ देंगे। उन्हें उनके ढंग से जीने दें। संसार में जो आया है, वह अपना भाग्य लेकर आया है।

आगामी दिनों प्रज्ञावतार का कार्य विस्तार होने वाला है। उस काम की जिम्मेदारी केवल ब्राह्मण तथा संत ही पूरा कर सकते हैं। आपको इन दो वर्गों में आकर खड़ा हो जाना चाहिए तथा प्रज्ञावतार के सहयोगी बनकर उनके कार्य को पूरा करना चाहिए। अगर आप अपने खर्च में कटौती करके तथा समय में से कुछ बचत करके इस ब्राह्मण एवं सन्त परम्परा को जीवित कर सकें, तो आने वाली पीढ़ियां आप पर गर्व करेंगी। अगर समस्याओं के समाधान करने के लिए खर्चे में कुछ कमी आती है, तो हम आपको सहयोग करेंगे।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
सितम्बर-1980 शान्तिकुंज में उद्बोधन

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019

Karmphal Ka Siddhant | कर्मफल का सिद्धांत | Dr Chinmay Pandya



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Intercession & its Significance | Pt Shriram Sharma Acharya



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👉 शुक्राना करने का फल

रूप सिंह बाबा ने अपने गुरु अंगद देव जी की बहुत सेवा की। 20 साल सेवा करते हुए बीत गए। गुरु रूप सिंह जी पर प्रसन्न हुए और कहा मांगो जो माँगना है। रूप सिंह जी बोले गुरुदेव मुझे तो मांगने ही नहीं आता। गुरु के बहुत कहने पर रूप सिंह जी बोले मुझे एक दिन का वक़्त दो घरवाले से पूछ्के कल बताता हु। घर जाकर माँ से पुछा तो माँ बोली जमीन माँग ले।

मन नहीं माना। बीवी से पुछा तो बोली इतनी गरीबी है पैसे मांग लो। फिर भी मन नहीं माना।

छोटी बिटिया थी उनको उसने बोला पिताजी गुरु ने जब कहा है कि मांगो तो कोई छोटी मोटी चीज़ न मांग लेना। इतनी छोटी बेटी की बात सुन के रूप सिंह जी बोले कल तू ही साथ चल गुरु से तू ही मांग लेना।

अगले दिन दोनो गुरु के पास गए। रूप सिंह जी बोले गुरुदेव मेरी बेटी आपसे मांगेगी मेरी जगह।

वो नन्ही बेटी बहुत समझदार थी। रूप सिंह जी इतने गरीब थे के घर के सारे लोग दिन में एक वक़्त का खाना ही खाते। इतनी तकलीफ होने के बावजूद भी उस नन्ही बेटी ने गुरु से कहा गुरुदेव मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप के हम लोगो पे बहुत एहसान है। आपकी बड़ी रहमत है। बस मुझे एक ही बात चाहिए कि आज हम दिन में एक बार ही खाना खाते है। कभी आगे एसा वक़्त आये के हमे चार पांच दिन में भी अगर एक बार खाए तब भी हमारे मुख से शुक्राना ही निकले। कभी शिकायत ना करे।

शुकर करने की दान दो।

इस बात से गुरु महाराज इतने प्रसन्न हुए के बोले जा बेटा अब तेरे घर के भंडार सदा भरे रहेंगे। तू क्या तेरे घर पे जो आएगा वोह भी खाली हाथ नहीं जाएगा।

तो यह है शुकर करने का फल।
सदा शुकर करते रहे।
सुख में सिमरन।
दुःख में अरदास।
हर वेले शुकराना।

👉 मंदबुद्धि से प्रख्यात बुद्धिमान

मस्तिष्क की स्मरण शक्ति और बुद्धि प्रखरता बढ़ाने में इंग्लैंड के डब्ल्यू.जे.एम. बाटन की कोई सानी नहीं रखता। इंग्लैंड के केंट कस्बे में जन्मा बाटन आरंभ में इतना मंदबुद्धि था कि उसे पढ़ी हुई कोई बात याद नहीं रहती। कमजोर भी काफी था और कमजोरी, बीमारी के कारण उसे 11 वर्ष की आयु में ही स्कूल छोड़ देना पड़ा। अब वह इधर-उधर की बातें याद कर लेता और उनका स्थान, समय, घटना क्रम आदि का ठीक-ठीक विवरण बताकर लोगों पर अपनी स्मरण शक्ति का रौबद्धि के विकास की क्या कल्पना या आशा की जा सकती थी। लेकिन इस स्थिति में भी बाटन ने अपने पिता की प्रेरणा से मनोरंजन का एक शौक बढ़ाया जमाता।

धीरे-धीरे उसने अपनी स्मरण शक्ति को इतना अधिक विकसित कर लिया कि वह चलता फिरता विश्वकोश समझा जाने लगा। यह अभ्यास उसने इस लक्ष्य के प्रति गाँठ-बाँधकर किया कि उसे अपनी याददास्त को बढ़ाना है। पूरी तत्परता के साथ इस दिशा में लगे रहने के बाद उसने अपनी याददास्त को इतना तेज कर लिया कि उसकी ख्याति चारों दिशाओं में फैलने लगी।

एक बार उससे यूरोप के प्रमुख ज्योतिषियों, राजनीतिज्ञों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने ऐसी घटनाओं के विवरण पूछे जो विस्मृति के गर्त में गुम गए ही प्रतीत होते थे, पर उसने पूछी गई सारी घटनाओं को सिलसिलेवार सन्, तारीख सहित इस प्रकार बताया कि पूछने वालों को आश्चर्य चकित रह जाना पड़ा। बाटन अपने समय में इतना प्रसिद्ध हो गया था कि उसकी मृत्यु के बाद अमेरिका के एक स्वास्थ्य संस्थान ने उसका सिर 10 हजार डालर में खरीदा ताकि उसकी मस्तिष्कीय विलक्षणताओं का रहस्य मालूम किया जा सके।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृष्ठ 20

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 11 Oct 2019



👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७८)

👉 अचेतन की चिकित्सा करने वाला एक विशिष्ट सैनिटोरियम

सूक्ष्म में विद्यमान सद्गुरु की सत्ता के संकेतों के अनुसार संचालित ऐसों की साधना अदृश्य की प्राण ऊर्जा को सधन करती है। युगऋषि के महाप्राणों में विलीन होने वाले उनके प्रण दृश्य में प्रेरणा बनकर उभरते हैं। इन प्रेरणाओं से विचार तंत्र प्रशिक्षित होता है और व्यवहार रूपान्तरित। मानव जीवन में शान्तिकुञ्ज की अदृश्य संवेदनाएँ एवं दृश्य क्रियाकलाप चौंकाने वाले प्रभाव उत्पन्न करते हैं। ये प्रभाव किसी एक की विचार संकल्पना नहीं, बल्कि देव संस्कृति विश्वविद्यालय के अनेकों शोधार्थियों के अनुसंधान का निष्कर्ष है।

पिछले सत्र में देव संस्कृति विश्वविद्यालय के मानव चेतना व योग विज्ञान विभाग एवं नैदानिक मनोविज्ञान विभाग के विद्यार्थियों ने अपने लघुशोध अध्ययन के लिए शान्तिकुञ्ज को विषय चुना था। इन शोध करने वाले छात्र- छात्राओं की संख्या ७५ थी और इनमें से आधे से अधिक छात्र- छात्राओं के शोध की विषयवस्तु यही थी कि शान्तिकुञ्ज किस भाँति आध्यात्मिक चिकित्सा का कार्य कर रहा है। यहाँ का वातावरण, यहाँ का प्रशिक्षण, यहाँ की जीवनशैली किस भाँति यहाँ आने वाले लोगों की शारीरिक व मानसिक व्याधियों का शमन करते हैं।

इसके लिए शोध छात्र- छात्राओं ने शान्तिकुञ्ज के आध्यात्मिक अनुभूतियों के काव्य को अध्यात्म के वैज्ञानिक प्रयोगों में रूपान्तरित किया। इस रूपान्तरण में उन्होंने शान्तिकुञ्ज की अदृश्य एवं दृश्य गतिविधियों के निम्र आयामों की व्याख्या की। इन शोध विद्यार्थियों ने इस आध्यात्मिक चिकित्सा केन्द्र में संवेदित अदृश्य के दिव्य स्पन्दनों को अभिप्रेरक कारकों (मोटीवेशन फैक्टर्स) के रूप में स्वीकारा। उन्होंने यहाँ स्वयं रहकर अनुभव किया कि शान्तिकुञ्ज में प्रवेश करते ही कोई दिव्य प्रेरणा हृदय में हिलोरे की तरह उठती है और आदर्शवादी दिशा में कुछ विशेष करने के लिए प्रेरित करती है। इनके अनुसार इन प्रेरणाओं में इतना प्राण बल होता है कि वे अभिवृत्तियों में परिवर्तन लाती हैं।

इसी के साथ इन शोधार्थियों ने यह कहा कि शान्तिकुञ्ज के दृश्य क्रियाकलापों में सर्वप्रथम यहाँ चलने वाला प्रशिक्षण है। जिसे वैज्ञानिक भाषा ‘काग्रीटिव रिस्ट्रक्चरिंग  यानि कि बोध तंत्र का पुनर्निर्माण कह सकते हैं। व्यक्ति के जीवन की प्रधान समस्या है- विचार तंत्र की गड़बड़ी, जिसके कारण ही उसके जीवन में शारीरिक- मानसिक परेशानियाँ आ खड़ी हुई हैं। इन शोध विद्यार्थियों ने अपने शोध कार्यों में यह अनुभव किया है। शान्तिकुञ्ज के प्रशिक्षण के द्वारा सफलतापूर्वक काग्नीटिव रिस्ट्रक्चरिंग होती है। इससे चिंतन को नयी दृष्टि मिलती है और यहाँ आने वालों को मनोरोगों से छुटकारा मिलता है।

शान्तिकुञ्ज के क्रियाकलापों का अगला आयाम यहाँ की जीवन शैली है। जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘बिहैवियरल मॉडीफिकेशन’ या व्यावहारिक बदलाव की प्रक्रिया कहा जा सकता है। यह सच है कि व्यावहारिक तकनीकों द्वारा मनुष्य को अनेकों रोगों से मुक्त किया जा सकता है। शान्तिकुञ्ज की जीवनशैली के ये चमत्कार शोध प्रयासों के निष्कर्ष के रूप में सामने आये। इन निष्कर्षों में पाया यही गया है कि यहाँ नौ दिवसीय एवं एक मासीय में आने वाले लोग असाधारण रूप से अपने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को उपलब्ध करते हैं। एक- दो नहीं, दो दर्जन से भी अधिक शोध निष्कर्षों से आध्यात्मिक चिकित्सा केन्द्र के रूप में शान्तिकुञ्ज की सफलता प्रभावित हुई है और यह सब इस महान् ऊर्जा केन्द्र के संस्थापक आध्यात्मिक चिकित्सा के परमाचार्य युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव की सक्रिय तपश्चेतना का सुफल है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०९

👉 रत्नों से श्रेष्ठ चक्का:-

एक राजा ने महात्मा को अपने हीरे-मोतियों से भरा खजाना दिखाया। महात्मा ने पूछा- 'इन पत्थरों से आपको कितनी आय होती है? राजा ने कहा- आय नहीं होती बल्कि इनकी सुरक्षा पर व्यय होता है? महात्मा राजा को एक किसान की झोपड़ी में ले गया। वहाँ एक स्त्री चक्की से अनाज पीस रही थी। महात्मा ने उसकी ओर संकेत कर कहा- पत्थर तो चक्की भी है और तुम्हारे हीरे मोती भी। परन्तु इसका उपयोग होता है और यह नित्य पूरे परिवार का पोषण करने योग्य राशि दे देती है। तुम्हारे हीरे-मोती तो उपयोग हीन है। उन्हें यदि परमार्थ में खर्च करोगे तो सुरक्षा-व्यय तो बचा ही लोगे बदले में जन श्रद्धा, दैवी अनुदान अजस्र मात्रा में पाओगे।''

👉 तीन प्रकार के धनिक:-

एक बार एक भक्त ने नानक से पूछा आप कहते है कि सब पैसे वाले एक से नहीं होते। इसका क्या तात्पर्य है।' नानक बोले- 'उत्तम लोग वे है जो उपार्जन को सत्प्रयोजनों के निमित्त खर्च कर देते हैं। मध्यम श्रेणी के व्यक्ति वे है जो कमाते है, जमा करते हैं पर सदुपयोग करना भी जानते है। तीसरी श्रेणी उनकी है जो कमाते नहीं, कहीं से पा जाते है और उडा़ जाते हैं। ऐसे लोग संसार में पतन का कारण बनते है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १ से

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

Nari Ki Mahima Nari Shaktiyan | नारी की महिमा नारी शक्तियाँ



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मैं ढूँढ़ता तुझे था, जब कुञ्ज और वन में | Mai Dhundta Tujhe Tha | Pragya...



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👉 हार-जीत का फैसला!

बहुत समय पहले की बात है। आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच सोलह दिन तक लगातार शास्त्रार्थ चला। शास्त्रार्थ मे निर्णायक थी- मंडन मिश्र की धर्म पत्नी देवी भारती। हार-जीत का निर्णय होना बाक़ी था, इसी बीच देवी भारती को किसी आवश्यक कार्य से कुछ समय के लिये बाहर जाना पड़ गया।

लेकिन जाने से पहले देवी भारती ने दोनो ही विद्वानो के गले मे एक-एक फूल माला डालते हुए कहा, ये दोनो मालाएं मेरी अनुपस्थिति मे आपके हार और जीत का फैसला करेगी। यह कहकर देवी भारती वहाँ से चली गई। शास्त्रार्थ की प्रकिया आगे चलती रही।

कुछ देर पश्चात् देवी भारती अपना कार्य पुरा करके लौट आई। उन्होने अपनी निर्णायक नजरो से शंकराचार्य और मंडन मिश्र को बारी- बारी से देखा और अपना निर्णय सुना दिया। उनके फैसले के अनुसार आदि शंकराचार्य विजयी घोषित किये गये और उनके पति मंडन मिश्र की पराजय हुई थी।

सभी दर्शक हैरान हो गये कि बिना किसी आधार के इस विदुषी ने अपने पति को ही पराजित करार दे दिया। एक विद्वान ने देवी भारती से नम्रतापूर्वक जिज्ञासा की- हे! देवी आप तो शास्त्रार्थ के मध्य ही चली गई थी फिर वापस लौटते ही आपने ऐसा फैसला कैसे दे दिया ?

देवी भारती ने मुस्कुराकर जवाब दिया- जब भी कोई विद्वान शास्त्रार्थ मे पराजित होने लगता है, और उसे जब हार की झलक दिखने लगती है तो इस वजह से वह क्रुध्द हो उठता है और मेरे पति के गले की माला उनके क्रोध की ताप से सूख चुकी है जबकि शंकराचार्य जी की माला के फूल अभी भी पहले की भांति ताजे है। इससे ज्ञात होता है कि शंकराचार्य की विजय हुई है।

विदुषी देवी भारती का फैसला सुनकर सभी दंग रह गये, सबने उनकी काफी प्रशंसा की।

दोस्तो क्रोध मनुष्य की वह अवस्था है जो जीत के नजदीक पहुँचकर हार का नया रास्ता खोल देता है। क्रोध न सिर्फ हार का दरवाजा खोलता है बल्कि रिश्तो मे दरार का कारण भी बनता है। इसलिये कभी भी अपने क्रोध के ताप से अपने फूल रूपी गुणों को  मुरझाने मत दीजिये।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 10 Oct 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 10 Oct 2019


👉 प्रभु की माया

जो जानता है कि मैं नहीं जानता, पर कहता है कि मैं जानता हूँ, वह झूठा है। जो जानता है कि मैं अंश रूप में जानता हूँ और कहता है कि मैं जानता हूँ, वह वास्तव में नहीं जानता है, कारण कि पूर्णरूपेण जानना वास्तव में असंभव ही है।

जो जानता है कि मैं नहीं जानता और कहता है कि मैं नहीं जानता हूँ, वह सत्य कहता है। जो जनता है कि मैं अंश रूप में जानता हूँ और कहता है कि मैं नहीं जानता हूँ, वह कुछ जानता है, पर है वह अधूरा ही। यह भी प्रभु की माया है।

जो जानता है कि मैं जानता भी हूँ और नहीं भी जानता और यही कहता भी है, वह औरों से अधिक जानता है, परंतु जो जानता है कि मैं जानता भी हूँ और नहीं भी जानता, इसी कारण चुप रहता है, किसी से कुछ नहीं कहता, वह वास्तव में बहुत जानता है। इतना जानकर भी जो प्रभु के प्रेम में सब कुछ भूल जाता है, वह प्रभु में लय हो जाता है। वह धन्य है।

वही पूर्णतया जानता है, जो जानकर भी भूल गया है, जो भक्त है, अनन्य प्रेमी है। वह अब क्या बताए? उसके पास बताने की कोई बात ही नहीं है, उसके द्वंद्व मिट चुके हैं। अब कौन बताए और किसे बताए, बताने को धरा ही क्या है? यही प्रभु की माया है। उसकी माया वही जाने। प्रभु की महिमा अपरंपार है।

📖 अखण्ड ज्योति-जनवरी 1941

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७७)

👉 अचेतन की चिकित्सा करने वाला एक विशिष्ट सैनिटोरियम

आध्यात्मिक चिकित्सा केन्द्र के रूप में शान्तिकुञ्ज द्वारा की जा रही सेवाएँ विश्वविदित हैं। ब्रह्ममुहूर्त से ही यहाँ मानवीय चेतना के जागरण के स्वर ध्वनित होने लगते हैं। गायत्री महामंत्र के जप एवं भगवान् सूर्य के ध्यान के साथ यहाँ रहने वाले व यहाँ आये अनगिन साधक अरुणोदय का अभिनन्दन करते हैं। और इन्हीं क्षणों में मिलती है उन्हें उस प्रकाश दीप की प्रेरणा जिसे शान्तिकुञ्ज के संस्थापक ने सन् १९२६ ई. के वसन्त पर्व पर देवात्मा हिमालय की दिव्य विभूति की साक्षी में जलाया था। जो तब से लेकर अब तक अखण्ड जलते हुए असंख्य जनों को प्रकाशभरी प्रेरणाएँ बाँट रहा है। अनन्त अनुभूतियाँ इसकी साक्षी में उभरीं और चिदाकाश की धरोहर बनी हैं। यह अविरल कथा- गाथा आज भी कही जा रही है।

सूर्योदय के साथ ही इसके मद्धम स्वर मेघमन्द्र हो जाते हैं। शिवालिक पर्वतमालाओं की घाटियों में बसे शान्तिकुञ्ज के मध्य बनी यज्ञशाला में वैदिक मंत्रों के सविधि सस्वर गान के साथ स्वाहा की गूँज उभरती है तो न जाने कितने लोगों की शारीरिक- मानसिक व्याधियाँ एक साथ भस्म हो जाती हैं। यह स्वाहा का महाघोष ऐसा होता है जैसे भगवान् महाकाल ने विश्व के महारोगों को भस्मीभूत करने के लिए महास्वाहा का उच्चारण किया हो। पवित्र यज्ञ के अनन्तर यहाँ आये हुए लोग विशिष्ट साधकों के पवित्र वचनों को सुनते हैं। इससे उनकी विचार चेतना नया प्रशिक्षण पाती है। इन विचार औषधियों के बाद उन्हें माँ गायत्री का महाप्रसाद मिलता है।

महाप्रसाद के अनन्तर साधक- साधिकाएँ यहाँ अपने प्रशिक्षण का नया क्रम प्रारम्भ करते हैं। इसके द्विआयामी दृश्य है। पहले आयाम में नव दिवसीय सत्र के कार्यक्रम हैं जो व्यक्ति की आत्मचेतना को परिष्कृत व प्रशिक्षित करने के लिए हैं। दूसरा आयाम एक मासीय सत्र के कार्यक्रमों का है, जो सामूहिक लोकचेतना को परिष्कृत व प्रशिक्षित करने के लिए है। यह प्रशिक्षण सम्पूर्ण दिवस चलता रहता है। साँझ होते ही भगवान् भुवन भास्कर तो विश्व के दूसरे गोलार्ध को प्रकाशित करने चले जाते हैं। परन्तु जाते- जाते वे यहाँ के साधकों को आशीष देना नहीं भूलते। उनके आशीष की यह लालिमा काफी समय तक साधकों के मन को अपने रंग में रँगती रहती है।

इसी के साथ साधकों के रंग में रँगी साँझ साधकों के अन्तर्गगन में विलीन होती है। और निशा के प्रथम प्रहर में साधकों के प्रशिक्षण का शेष भाग पूरा होता है। इसके बाद सभी विधाता का स्मरण करते हुए निद्रालीन होने लगते हैं। लेकिन इनमें कुछ ऐसे होते हैं, जो अपने अन्तराल में सद्गुरु के संकेतों को पल- पल अवतरित होते हुए अनुभव करते हैं। इस अकथनीय अनुभवों के साथ उनकी निशीथ कालीन साधना प्रारम्भ होती है। ये साधक अपने आराध्य गुरुदेव को दिये गये वचन के अनुसार महानिशा में शयन को महापाप समझते हैं। जो सचमुच में साधक हैं वे महानिशा में कभी सोते नहीं। उनके लिए यह समय सघन साधना में विलीन विसर्जित होने के लिए है, न कि मोह निद्रा के महापाश में बँधने के लिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०७

👉 The Illusive Reality

One who knows that he knows not, but claims he knows – is a liar. One who knows little bit but thinks he knows – is ignorant. One who knows not and knows and accepts that he knows not – is sincere. One who knows partially and knows that he knows not – is a learner. But none can know it because it is impossible to know it. This is what, is the maya – the ‘grand illusion’ of our perception of the gigantic creation of God.

One who knows that he knows and also knows that he does not – is wise. He does not say it despite knowing a lot. Because he knows a lot and therefore knows that nothing could be said or discussed about it. One who knows that it is undecipherable infinity and immerses and ‘illusion’ of self-identity into devotion of the Omniscient – is enlightened…

His existence is unified with the devotion and love of god. He has realized the absolute void in the infinity (of maya – the illusive creation) and the infinity (of God) in the void (sublime). What doubts or queries he would have? Nothing! What he would know and about what? Nothing! He says nothing. What he would say and to whom? He knows God and knows that God alone knows his maya.

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1941

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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