शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019
👉 शुक्राना करने का फल
रूप सिंह बाबा ने अपने गुरु अंगद देव जी की बहुत सेवा की। 20 साल सेवा करते हुए बीत गए। गुरु रूप सिंह जी पर प्रसन्न हुए और कहा मांगो जो माँगना है। रूप सिंह जी बोले गुरुदेव मुझे तो मांगने ही नहीं आता। गुरु के बहुत कहने पर रूप सिंह जी बोले मुझे एक दिन का वक़्त दो घरवाले से पूछ्के कल बताता हु। घर जाकर माँ से पुछा तो माँ बोली जमीन माँग ले।
मन नहीं माना। बीवी से पुछा तो बोली इतनी गरीबी है पैसे मांग लो। फिर भी मन नहीं माना।
छोटी बिटिया थी उनको उसने बोला पिताजी गुरु ने जब कहा है कि मांगो तो कोई छोटी मोटी चीज़ न मांग लेना। इतनी छोटी बेटी की बात सुन के रूप सिंह जी बोले कल तू ही साथ चल गुरु से तू ही मांग लेना।
अगले दिन दोनो गुरु के पास गए। रूप सिंह जी बोले गुरुदेव मेरी बेटी आपसे मांगेगी मेरी जगह।
वो नन्ही बेटी बहुत समझदार थी। रूप सिंह जी इतने गरीब थे के घर के सारे लोग दिन में एक वक़्त का खाना ही खाते। इतनी तकलीफ होने के बावजूद भी उस नन्ही बेटी ने गुरु से कहा गुरुदेव मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप के हम लोगो पे बहुत एहसान है। आपकी बड़ी रहमत है। बस मुझे एक ही बात चाहिए कि आज हम दिन में एक बार ही खाना खाते है। कभी आगे एसा वक़्त आये के हमे चार पांच दिन में भी अगर एक बार खाए तब भी हमारे मुख से शुक्राना ही निकले। कभी शिकायत ना करे।
शुकर करने की दान दो।
इस बात से गुरु महाराज इतने प्रसन्न हुए के बोले जा बेटा अब तेरे घर के भंडार सदा भरे रहेंगे। तू क्या तेरे घर पे जो आएगा वोह भी खाली हाथ नहीं जाएगा।
तो यह है शुकर करने का फल।
सदा शुकर करते रहे।
सुख में सिमरन।
दुःख में अरदास।
हर वेले शुकराना।
मन नहीं माना। बीवी से पुछा तो बोली इतनी गरीबी है पैसे मांग लो। फिर भी मन नहीं माना।
छोटी बिटिया थी उनको उसने बोला पिताजी गुरु ने जब कहा है कि मांगो तो कोई छोटी मोटी चीज़ न मांग लेना। इतनी छोटी बेटी की बात सुन के रूप सिंह जी बोले कल तू ही साथ चल गुरु से तू ही मांग लेना।
अगले दिन दोनो गुरु के पास गए। रूप सिंह जी बोले गुरुदेव मेरी बेटी आपसे मांगेगी मेरी जगह।
वो नन्ही बेटी बहुत समझदार थी। रूप सिंह जी इतने गरीब थे के घर के सारे लोग दिन में एक वक़्त का खाना ही खाते। इतनी तकलीफ होने के बावजूद भी उस नन्ही बेटी ने गुरु से कहा गुरुदेव मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप के हम लोगो पे बहुत एहसान है। आपकी बड़ी रहमत है। बस मुझे एक ही बात चाहिए कि आज हम दिन में एक बार ही खाना खाते है। कभी आगे एसा वक़्त आये के हमे चार पांच दिन में भी अगर एक बार खाए तब भी हमारे मुख से शुक्राना ही निकले। कभी शिकायत ना करे।
शुकर करने की दान दो।
इस बात से गुरु महाराज इतने प्रसन्न हुए के बोले जा बेटा अब तेरे घर के भंडार सदा भरे रहेंगे। तू क्या तेरे घर पे जो आएगा वोह भी खाली हाथ नहीं जाएगा।
तो यह है शुकर करने का फल।
सदा शुकर करते रहे।
सुख में सिमरन।
दुःख में अरदास।
हर वेले शुकराना।
👉 मंदबुद्धि से प्रख्यात बुद्धिमान
मस्तिष्क की स्मरण शक्ति और बुद्धि प्रखरता बढ़ाने में इंग्लैंड के डब्ल्यू.जे.एम. बाटन की कोई सानी नहीं रखता। इंग्लैंड के केंट कस्बे में जन्मा बाटन आरंभ में इतना मंदबुद्धि था कि उसे पढ़ी हुई कोई बात याद नहीं रहती। कमजोर भी काफी था और कमजोरी, बीमारी के कारण उसे 11 वर्ष की आयु में ही स्कूल छोड़ देना पड़ा। अब वह इधर-उधर की बातें याद कर लेता और उनका स्थान, समय, घटना क्रम आदि का ठीक-ठीक विवरण बताकर लोगों पर अपनी स्मरण शक्ति का रौबद्धि के विकास की क्या कल्पना या आशा की जा सकती थी। लेकिन इस स्थिति में भी बाटन ने अपने पिता की प्रेरणा से मनोरंजन का एक शौक बढ़ाया जमाता।
धीरे-धीरे उसने अपनी स्मरण शक्ति को इतना अधिक विकसित कर लिया कि वह चलता फिरता विश्वकोश समझा जाने लगा। यह अभ्यास उसने इस लक्ष्य के प्रति गाँठ-बाँधकर किया कि उसे अपनी याददास्त को बढ़ाना है। पूरी तत्परता के साथ इस दिशा में लगे रहने के बाद उसने अपनी याददास्त को इतना तेज कर लिया कि उसकी ख्याति चारों दिशाओं में फैलने लगी।
एक बार उससे यूरोप के प्रमुख ज्योतिषियों, राजनीतिज्ञों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने ऐसी घटनाओं के विवरण पूछे जो विस्मृति के गर्त में गुम गए ही प्रतीत होते थे, पर उसने पूछी गई सारी घटनाओं को सिलसिलेवार सन्, तारीख सहित इस प्रकार बताया कि पूछने वालों को आश्चर्य चकित रह जाना पड़ा। बाटन अपने समय में इतना प्रसिद्ध हो गया था कि उसकी मृत्यु के बाद अमेरिका के एक स्वास्थ्य संस्थान ने उसका सिर 10 हजार डालर में खरीदा ताकि उसकी मस्तिष्कीय विलक्षणताओं का रहस्य मालूम किया जा सके।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृष्ठ 20
धीरे-धीरे उसने अपनी स्मरण शक्ति को इतना अधिक विकसित कर लिया कि वह चलता फिरता विश्वकोश समझा जाने लगा। यह अभ्यास उसने इस लक्ष्य के प्रति गाँठ-बाँधकर किया कि उसे अपनी याददास्त को बढ़ाना है। पूरी तत्परता के साथ इस दिशा में लगे रहने के बाद उसने अपनी याददास्त को इतना तेज कर लिया कि उसकी ख्याति चारों दिशाओं में फैलने लगी।
एक बार उससे यूरोप के प्रमुख ज्योतिषियों, राजनीतिज्ञों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने ऐसी घटनाओं के विवरण पूछे जो विस्मृति के गर्त में गुम गए ही प्रतीत होते थे, पर उसने पूछी गई सारी घटनाओं को सिलसिलेवार सन्, तारीख सहित इस प्रकार बताया कि पूछने वालों को आश्चर्य चकित रह जाना पड़ा। बाटन अपने समय में इतना प्रसिद्ध हो गया था कि उसकी मृत्यु के बाद अमेरिका के एक स्वास्थ्य संस्थान ने उसका सिर 10 हजार डालर में खरीदा ताकि उसकी मस्तिष्कीय विलक्षणताओं का रहस्य मालूम किया जा सके।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृष्ठ 20
👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७८)
👉 अचेतन की चिकित्सा करने वाला एक विशिष्ट सैनिटोरियम
सूक्ष्म में विद्यमान सद्गुरु की सत्ता के संकेतों के अनुसार संचालित ऐसों की साधना अदृश्य की प्राण ऊर्जा को सधन करती है। युगऋषि के महाप्राणों में विलीन होने वाले उनके प्रण दृश्य में प्रेरणा बनकर उभरते हैं। इन प्रेरणाओं से विचार तंत्र प्रशिक्षित होता है और व्यवहार रूपान्तरित। मानव जीवन में शान्तिकुञ्ज की अदृश्य संवेदनाएँ एवं दृश्य क्रियाकलाप चौंकाने वाले प्रभाव उत्पन्न करते हैं। ये प्रभाव किसी एक की विचार संकल्पना नहीं, बल्कि देव संस्कृति विश्वविद्यालय के अनेकों शोधार्थियों के अनुसंधान का निष्कर्ष है।
पिछले सत्र में देव संस्कृति विश्वविद्यालय के मानव चेतना व योग विज्ञान विभाग एवं नैदानिक मनोविज्ञान विभाग के विद्यार्थियों ने अपने लघुशोध अध्ययन के लिए शान्तिकुञ्ज को विषय चुना था। इन शोध करने वाले छात्र- छात्राओं की संख्या ७५ थी और इनमें से आधे से अधिक छात्र- छात्राओं के शोध की विषयवस्तु यही थी कि शान्तिकुञ्ज किस भाँति आध्यात्मिक चिकित्सा का कार्य कर रहा है। यहाँ का वातावरण, यहाँ का प्रशिक्षण, यहाँ की जीवनशैली किस भाँति यहाँ आने वाले लोगों की शारीरिक व मानसिक व्याधियों का शमन करते हैं।
इसके लिए शोध छात्र- छात्राओं ने शान्तिकुञ्ज के आध्यात्मिक अनुभूतियों के काव्य को अध्यात्म के वैज्ञानिक प्रयोगों में रूपान्तरित किया। इस रूपान्तरण में उन्होंने शान्तिकुञ्ज की अदृश्य एवं दृश्य गतिविधियों के निम्र आयामों की व्याख्या की। इन शोध विद्यार्थियों ने इस आध्यात्मिक चिकित्सा केन्द्र में संवेदित अदृश्य के दिव्य स्पन्दनों को अभिप्रेरक कारकों (मोटीवेशन फैक्टर्स) के रूप में स्वीकारा। उन्होंने यहाँ स्वयं रहकर अनुभव किया कि शान्तिकुञ्ज में प्रवेश करते ही कोई दिव्य प्रेरणा हृदय में हिलोरे की तरह उठती है और आदर्शवादी दिशा में कुछ विशेष करने के लिए प्रेरित करती है। इनके अनुसार इन प्रेरणाओं में इतना प्राण बल होता है कि वे अभिवृत्तियों में परिवर्तन लाती हैं।
इसी के साथ इन शोधार्थियों ने यह कहा कि शान्तिकुञ्ज के दृश्य क्रियाकलापों में सर्वप्रथम यहाँ चलने वाला प्रशिक्षण है। जिसे वैज्ञानिक भाषा ‘काग्रीटिव रिस्ट्रक्चरिंग यानि कि बोध तंत्र का पुनर्निर्माण कह सकते हैं। व्यक्ति के जीवन की प्रधान समस्या है- विचार तंत्र की गड़बड़ी, जिसके कारण ही उसके जीवन में शारीरिक- मानसिक परेशानियाँ आ खड़ी हुई हैं। इन शोध विद्यार्थियों ने अपने शोध कार्यों में यह अनुभव किया है। शान्तिकुञ्ज के प्रशिक्षण के द्वारा सफलतापूर्वक काग्नीटिव रिस्ट्रक्चरिंग होती है। इससे चिंतन को नयी दृष्टि मिलती है और यहाँ आने वालों को मनोरोगों से छुटकारा मिलता है।
शान्तिकुञ्ज के क्रियाकलापों का अगला आयाम यहाँ की जीवन शैली है। जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘बिहैवियरल मॉडीफिकेशन’ या व्यावहारिक बदलाव की प्रक्रिया कहा जा सकता है। यह सच है कि व्यावहारिक तकनीकों द्वारा मनुष्य को अनेकों रोगों से मुक्त किया जा सकता है। शान्तिकुञ्ज की जीवनशैली के ये चमत्कार शोध प्रयासों के निष्कर्ष के रूप में सामने आये। इन निष्कर्षों में पाया यही गया है कि यहाँ नौ दिवसीय एवं एक मासीय में आने वाले लोग असाधारण रूप से अपने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को उपलब्ध करते हैं। एक- दो नहीं, दो दर्जन से भी अधिक शोध निष्कर्षों से आध्यात्मिक चिकित्सा केन्द्र के रूप में शान्तिकुञ्ज की सफलता प्रभावित हुई है और यह सब इस महान् ऊर्जा केन्द्र के संस्थापक आध्यात्मिक चिकित्सा के परमाचार्य युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव की सक्रिय तपश्चेतना का सुफल है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०९
सूक्ष्म में विद्यमान सद्गुरु की सत्ता के संकेतों के अनुसार संचालित ऐसों की साधना अदृश्य की प्राण ऊर्जा को सधन करती है। युगऋषि के महाप्राणों में विलीन होने वाले उनके प्रण दृश्य में प्रेरणा बनकर उभरते हैं। इन प्रेरणाओं से विचार तंत्र प्रशिक्षित होता है और व्यवहार रूपान्तरित। मानव जीवन में शान्तिकुञ्ज की अदृश्य संवेदनाएँ एवं दृश्य क्रियाकलाप चौंकाने वाले प्रभाव उत्पन्न करते हैं। ये प्रभाव किसी एक की विचार संकल्पना नहीं, बल्कि देव संस्कृति विश्वविद्यालय के अनेकों शोधार्थियों के अनुसंधान का निष्कर्ष है।
पिछले सत्र में देव संस्कृति विश्वविद्यालय के मानव चेतना व योग विज्ञान विभाग एवं नैदानिक मनोविज्ञान विभाग के विद्यार्थियों ने अपने लघुशोध अध्ययन के लिए शान्तिकुञ्ज को विषय चुना था। इन शोध करने वाले छात्र- छात्राओं की संख्या ७५ थी और इनमें से आधे से अधिक छात्र- छात्राओं के शोध की विषयवस्तु यही थी कि शान्तिकुञ्ज किस भाँति आध्यात्मिक चिकित्सा का कार्य कर रहा है। यहाँ का वातावरण, यहाँ का प्रशिक्षण, यहाँ की जीवनशैली किस भाँति यहाँ आने वाले लोगों की शारीरिक व मानसिक व्याधियों का शमन करते हैं।
इसके लिए शोध छात्र- छात्राओं ने शान्तिकुञ्ज के आध्यात्मिक अनुभूतियों के काव्य को अध्यात्म के वैज्ञानिक प्रयोगों में रूपान्तरित किया। इस रूपान्तरण में उन्होंने शान्तिकुञ्ज की अदृश्य एवं दृश्य गतिविधियों के निम्र आयामों की व्याख्या की। इन शोध विद्यार्थियों ने इस आध्यात्मिक चिकित्सा केन्द्र में संवेदित अदृश्य के दिव्य स्पन्दनों को अभिप्रेरक कारकों (मोटीवेशन फैक्टर्स) के रूप में स्वीकारा। उन्होंने यहाँ स्वयं रहकर अनुभव किया कि शान्तिकुञ्ज में प्रवेश करते ही कोई दिव्य प्रेरणा हृदय में हिलोरे की तरह उठती है और आदर्शवादी दिशा में कुछ विशेष करने के लिए प्रेरित करती है। इनके अनुसार इन प्रेरणाओं में इतना प्राण बल होता है कि वे अभिवृत्तियों में परिवर्तन लाती हैं।
इसी के साथ इन शोधार्थियों ने यह कहा कि शान्तिकुञ्ज के दृश्य क्रियाकलापों में सर्वप्रथम यहाँ चलने वाला प्रशिक्षण है। जिसे वैज्ञानिक भाषा ‘काग्रीटिव रिस्ट्रक्चरिंग यानि कि बोध तंत्र का पुनर्निर्माण कह सकते हैं। व्यक्ति के जीवन की प्रधान समस्या है- विचार तंत्र की गड़बड़ी, जिसके कारण ही उसके जीवन में शारीरिक- मानसिक परेशानियाँ आ खड़ी हुई हैं। इन शोध विद्यार्थियों ने अपने शोध कार्यों में यह अनुभव किया है। शान्तिकुञ्ज के प्रशिक्षण के द्वारा सफलतापूर्वक काग्नीटिव रिस्ट्रक्चरिंग होती है। इससे चिंतन को नयी दृष्टि मिलती है और यहाँ आने वालों को मनोरोगों से छुटकारा मिलता है।
शान्तिकुञ्ज के क्रियाकलापों का अगला आयाम यहाँ की जीवन शैली है। जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘बिहैवियरल मॉडीफिकेशन’ या व्यावहारिक बदलाव की प्रक्रिया कहा जा सकता है। यह सच है कि व्यावहारिक तकनीकों द्वारा मनुष्य को अनेकों रोगों से मुक्त किया जा सकता है। शान्तिकुञ्ज की जीवनशैली के ये चमत्कार शोध प्रयासों के निष्कर्ष के रूप में सामने आये। इन निष्कर्षों में पाया यही गया है कि यहाँ नौ दिवसीय एवं एक मासीय में आने वाले लोग असाधारण रूप से अपने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को उपलब्ध करते हैं। एक- दो नहीं, दो दर्जन से भी अधिक शोध निष्कर्षों से आध्यात्मिक चिकित्सा केन्द्र के रूप में शान्तिकुञ्ज की सफलता प्रभावित हुई है और यह सब इस महान् ऊर्जा केन्द्र के संस्थापक आध्यात्मिक चिकित्सा के परमाचार्य युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव की सक्रिय तपश्चेतना का सुफल है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०९
👉 रत्नों से श्रेष्ठ चक्का:-
एक राजा ने महात्मा को अपने हीरे-मोतियों से भरा खजाना दिखाया। महात्मा ने पूछा- 'इन पत्थरों से आपको कितनी आय होती है? राजा ने कहा- आय नहीं होती बल्कि इनकी सुरक्षा पर व्यय होता है? महात्मा राजा को एक किसान की झोपड़ी में ले गया। वहाँ एक स्त्री चक्की से अनाज पीस रही थी। महात्मा ने उसकी ओर संकेत कर कहा- पत्थर तो चक्की भी है और तुम्हारे हीरे मोती भी। परन्तु इसका उपयोग होता है और यह नित्य पूरे परिवार का पोषण करने योग्य राशि दे देती है। तुम्हारे हीरे-मोती तो उपयोग हीन है। उन्हें यदि परमार्थ में खर्च करोगे तो सुरक्षा-व्यय तो बचा ही लोगे बदले में जन श्रद्धा, दैवी अनुदान अजस्र मात्रा में पाओगे।''
👉 तीन प्रकार के धनिक:-
एक बार एक भक्त ने नानक से पूछा आप कहते है कि सब पैसे वाले एक से नहीं होते। इसका क्या तात्पर्य है।' नानक बोले- 'उत्तम लोग वे है जो उपार्जन को सत्प्रयोजनों के निमित्त खर्च कर देते हैं। मध्यम श्रेणी के व्यक्ति वे है जो कमाते है, जमा करते हैं पर सदुपयोग करना भी जानते है। तीसरी श्रेणी उनकी है जो कमाते नहीं, कहीं से पा जाते है और उडा़ जाते हैं। ऐसे लोग संसार में पतन का कारण बनते है।
📖 प्रज्ञा पुराण भाग १ से
👉 तीन प्रकार के धनिक:-
एक बार एक भक्त ने नानक से पूछा आप कहते है कि सब पैसे वाले एक से नहीं होते। इसका क्या तात्पर्य है।' नानक बोले- 'उत्तम लोग वे है जो उपार्जन को सत्प्रयोजनों के निमित्त खर्च कर देते हैं। मध्यम श्रेणी के व्यक्ति वे है जो कमाते है, जमा करते हैं पर सदुपयोग करना भी जानते है। तीसरी श्रेणी उनकी है जो कमाते नहीं, कहीं से पा जाते है और उडा़ जाते हैं। ऐसे लोग संसार में पतन का कारण बनते है।
📖 प्रज्ञा पुराण भाग १ से
गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019
👉 हार-जीत का फैसला!
बहुत समय पहले की बात है। आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच सोलह दिन तक लगातार शास्त्रार्थ चला। शास्त्रार्थ मे निर्णायक थी- मंडन मिश्र की धर्म पत्नी देवी भारती। हार-जीत का निर्णय होना बाक़ी था, इसी बीच देवी भारती को किसी आवश्यक कार्य से कुछ समय के लिये बाहर जाना पड़ गया।
लेकिन जाने से पहले देवी भारती ने दोनो ही विद्वानो के गले मे एक-एक फूल माला डालते हुए कहा, ये दोनो मालाएं मेरी अनुपस्थिति मे आपके हार और जीत का फैसला करेगी। यह कहकर देवी भारती वहाँ से चली गई। शास्त्रार्थ की प्रकिया आगे चलती रही।
कुछ देर पश्चात् देवी भारती अपना कार्य पुरा करके लौट आई। उन्होने अपनी निर्णायक नजरो से शंकराचार्य और मंडन मिश्र को बारी- बारी से देखा और अपना निर्णय सुना दिया। उनके फैसले के अनुसार आदि शंकराचार्य विजयी घोषित किये गये और उनके पति मंडन मिश्र की पराजय हुई थी।
सभी दर्शक हैरान हो गये कि बिना किसी आधार के इस विदुषी ने अपने पति को ही पराजित करार दे दिया। एक विद्वान ने देवी भारती से नम्रतापूर्वक जिज्ञासा की- हे! देवी आप तो शास्त्रार्थ के मध्य ही चली गई थी फिर वापस लौटते ही आपने ऐसा फैसला कैसे दे दिया ?
देवी भारती ने मुस्कुराकर जवाब दिया- जब भी कोई विद्वान शास्त्रार्थ मे पराजित होने लगता है, और उसे जब हार की झलक दिखने लगती है तो इस वजह से वह क्रुध्द हो उठता है और मेरे पति के गले की माला उनके क्रोध की ताप से सूख चुकी है जबकि शंकराचार्य जी की माला के फूल अभी भी पहले की भांति ताजे है। इससे ज्ञात होता है कि शंकराचार्य की विजय हुई है।
विदुषी देवी भारती का फैसला सुनकर सभी दंग रह गये, सबने उनकी काफी प्रशंसा की।
दोस्तो क्रोध मनुष्य की वह अवस्था है जो जीत के नजदीक पहुँचकर हार का नया रास्ता खोल देता है। क्रोध न सिर्फ हार का दरवाजा खोलता है बल्कि रिश्तो मे दरार का कारण भी बनता है। इसलिये कभी भी अपने क्रोध के ताप से अपने फूल रूपी गुणों को मुरझाने मत दीजिये।
लेकिन जाने से पहले देवी भारती ने दोनो ही विद्वानो के गले मे एक-एक फूल माला डालते हुए कहा, ये दोनो मालाएं मेरी अनुपस्थिति मे आपके हार और जीत का फैसला करेगी। यह कहकर देवी भारती वहाँ से चली गई। शास्त्रार्थ की प्रकिया आगे चलती रही।
कुछ देर पश्चात् देवी भारती अपना कार्य पुरा करके लौट आई। उन्होने अपनी निर्णायक नजरो से शंकराचार्य और मंडन मिश्र को बारी- बारी से देखा और अपना निर्णय सुना दिया। उनके फैसले के अनुसार आदि शंकराचार्य विजयी घोषित किये गये और उनके पति मंडन मिश्र की पराजय हुई थी।
सभी दर्शक हैरान हो गये कि बिना किसी आधार के इस विदुषी ने अपने पति को ही पराजित करार दे दिया। एक विद्वान ने देवी भारती से नम्रतापूर्वक जिज्ञासा की- हे! देवी आप तो शास्त्रार्थ के मध्य ही चली गई थी फिर वापस लौटते ही आपने ऐसा फैसला कैसे दे दिया ?
देवी भारती ने मुस्कुराकर जवाब दिया- जब भी कोई विद्वान शास्त्रार्थ मे पराजित होने लगता है, और उसे जब हार की झलक दिखने लगती है तो इस वजह से वह क्रुध्द हो उठता है और मेरे पति के गले की माला उनके क्रोध की ताप से सूख चुकी है जबकि शंकराचार्य जी की माला के फूल अभी भी पहले की भांति ताजे है। इससे ज्ञात होता है कि शंकराचार्य की विजय हुई है।
विदुषी देवी भारती का फैसला सुनकर सभी दंग रह गये, सबने उनकी काफी प्रशंसा की।
दोस्तो क्रोध मनुष्य की वह अवस्था है जो जीत के नजदीक पहुँचकर हार का नया रास्ता खोल देता है। क्रोध न सिर्फ हार का दरवाजा खोलता है बल्कि रिश्तो मे दरार का कारण भी बनता है। इसलिये कभी भी अपने क्रोध के ताप से अपने फूल रूपी गुणों को मुरझाने मत दीजिये।
👉 प्रभु की माया
जो जानता है कि मैं नहीं जानता, पर कहता है कि मैं जानता हूँ, वह झूठा है। जो जानता है कि मैं अंश रूप में जानता हूँ और कहता है कि मैं जानता हूँ, वह वास्तव में नहीं जानता है, कारण कि पूर्णरूपेण जानना वास्तव में असंभव ही है।
जो जानता है कि मैं नहीं जानता और कहता है कि मैं नहीं जानता हूँ, वह सत्य कहता है। जो जनता है कि मैं अंश रूप में जानता हूँ और कहता है कि मैं नहीं जानता हूँ, वह कुछ जानता है, पर है वह अधूरा ही। यह भी प्रभु की माया है।
जो जानता है कि मैं जानता भी हूँ और नहीं भी जानता और यही कहता भी है, वह औरों से अधिक जानता है, परंतु जो जानता है कि मैं जानता भी हूँ और नहीं भी जानता, इसी कारण चुप रहता है, किसी से कुछ नहीं कहता, वह वास्तव में बहुत जानता है। इतना जानकर भी जो प्रभु के प्रेम में सब कुछ भूल जाता है, वह प्रभु में लय हो जाता है। वह धन्य है।
वही पूर्णतया जानता है, जो जानकर भी भूल गया है, जो भक्त है, अनन्य प्रेमी है। वह अब क्या बताए? उसके पास बताने की कोई बात ही नहीं है, उसके द्वंद्व मिट चुके हैं। अब कौन बताए और किसे बताए, बताने को धरा ही क्या है? यही प्रभु की माया है। उसकी माया वही जाने। प्रभु की महिमा अपरंपार है।
📖 अखण्ड ज्योति-जनवरी 1941
जो जानता है कि मैं नहीं जानता और कहता है कि मैं नहीं जानता हूँ, वह सत्य कहता है। जो जनता है कि मैं अंश रूप में जानता हूँ और कहता है कि मैं नहीं जानता हूँ, वह कुछ जानता है, पर है वह अधूरा ही। यह भी प्रभु की माया है।
जो जानता है कि मैं जानता भी हूँ और नहीं भी जानता और यही कहता भी है, वह औरों से अधिक जानता है, परंतु जो जानता है कि मैं जानता भी हूँ और नहीं भी जानता, इसी कारण चुप रहता है, किसी से कुछ नहीं कहता, वह वास्तव में बहुत जानता है। इतना जानकर भी जो प्रभु के प्रेम में सब कुछ भूल जाता है, वह प्रभु में लय हो जाता है। वह धन्य है।
वही पूर्णतया जानता है, जो जानकर भी भूल गया है, जो भक्त है, अनन्य प्रेमी है। वह अब क्या बताए? उसके पास बताने की कोई बात ही नहीं है, उसके द्वंद्व मिट चुके हैं। अब कौन बताए और किसे बताए, बताने को धरा ही क्या है? यही प्रभु की माया है। उसकी माया वही जाने। प्रभु की महिमा अपरंपार है।
📖 अखण्ड ज्योति-जनवरी 1941
👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७७)
👉 अचेतन की चिकित्सा करने वाला एक विशिष्ट सैनिटोरियम
आध्यात्मिक चिकित्सा केन्द्र के रूप में शान्तिकुञ्ज द्वारा की जा रही सेवाएँ विश्वविदित हैं। ब्रह्ममुहूर्त से ही यहाँ मानवीय चेतना के जागरण के स्वर ध्वनित होने लगते हैं। गायत्री महामंत्र के जप एवं भगवान् सूर्य के ध्यान के साथ यहाँ रहने वाले व यहाँ आये अनगिन साधक अरुणोदय का अभिनन्दन करते हैं। और इन्हीं क्षणों में मिलती है उन्हें उस प्रकाश दीप की प्रेरणा जिसे शान्तिकुञ्ज के संस्थापक ने सन् १९२६ ई. के वसन्त पर्व पर देवात्मा हिमालय की दिव्य विभूति की साक्षी में जलाया था। जो तब से लेकर अब तक अखण्ड जलते हुए असंख्य जनों को प्रकाशभरी प्रेरणाएँ बाँट रहा है। अनन्त अनुभूतियाँ इसकी साक्षी में उभरीं और चिदाकाश की धरोहर बनी हैं। यह अविरल कथा- गाथा आज भी कही जा रही है।
सूर्योदय के साथ ही इसके मद्धम स्वर मेघमन्द्र हो जाते हैं। शिवालिक पर्वतमालाओं की घाटियों में बसे शान्तिकुञ्ज के मध्य बनी यज्ञशाला में वैदिक मंत्रों के सविधि सस्वर गान के साथ स्वाहा की गूँज उभरती है तो न जाने कितने लोगों की शारीरिक- मानसिक व्याधियाँ एक साथ भस्म हो जाती हैं। यह स्वाहा का महाघोष ऐसा होता है जैसे भगवान् महाकाल ने विश्व के महारोगों को भस्मीभूत करने के लिए महास्वाहा का उच्चारण किया हो। पवित्र यज्ञ के अनन्तर यहाँ आये हुए लोग विशिष्ट साधकों के पवित्र वचनों को सुनते हैं। इससे उनकी विचार चेतना नया प्रशिक्षण पाती है। इन विचार औषधियों के बाद उन्हें माँ गायत्री का महाप्रसाद मिलता है।
महाप्रसाद के अनन्तर साधक- साधिकाएँ यहाँ अपने प्रशिक्षण का नया क्रम प्रारम्भ करते हैं। इसके द्विआयामी दृश्य है। पहले आयाम में नव दिवसीय सत्र के कार्यक्रम हैं जो व्यक्ति की आत्मचेतना को परिष्कृत व प्रशिक्षित करने के लिए हैं। दूसरा आयाम एक मासीय सत्र के कार्यक्रमों का है, जो सामूहिक लोकचेतना को परिष्कृत व प्रशिक्षित करने के लिए है। यह प्रशिक्षण सम्पूर्ण दिवस चलता रहता है। साँझ होते ही भगवान् भुवन भास्कर तो विश्व के दूसरे गोलार्ध को प्रकाशित करने चले जाते हैं। परन्तु जाते- जाते वे यहाँ के साधकों को आशीष देना नहीं भूलते। उनके आशीष की यह लालिमा काफी समय तक साधकों के मन को अपने रंग में रँगती रहती है।
इसी के साथ साधकों के रंग में रँगी साँझ साधकों के अन्तर्गगन में विलीन होती है। और निशा के प्रथम प्रहर में साधकों के प्रशिक्षण का शेष भाग पूरा होता है। इसके बाद सभी विधाता का स्मरण करते हुए निद्रालीन होने लगते हैं। लेकिन इनमें कुछ ऐसे होते हैं, जो अपने अन्तराल में सद्गुरु के संकेतों को पल- पल अवतरित होते हुए अनुभव करते हैं। इस अकथनीय अनुभवों के साथ उनकी निशीथ कालीन साधना प्रारम्भ होती है। ये साधक अपने आराध्य गुरुदेव को दिये गये वचन के अनुसार महानिशा में शयन को महापाप समझते हैं। जो सचमुच में साधक हैं वे महानिशा में कभी सोते नहीं। उनके लिए यह समय सघन साधना में विलीन विसर्जित होने के लिए है, न कि मोह निद्रा के महापाश में बँधने के लिए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०७
आध्यात्मिक चिकित्सा केन्द्र के रूप में शान्तिकुञ्ज द्वारा की जा रही सेवाएँ विश्वविदित हैं। ब्रह्ममुहूर्त से ही यहाँ मानवीय चेतना के जागरण के स्वर ध्वनित होने लगते हैं। गायत्री महामंत्र के जप एवं भगवान् सूर्य के ध्यान के साथ यहाँ रहने वाले व यहाँ आये अनगिन साधक अरुणोदय का अभिनन्दन करते हैं। और इन्हीं क्षणों में मिलती है उन्हें उस प्रकाश दीप की प्रेरणा जिसे शान्तिकुञ्ज के संस्थापक ने सन् १९२६ ई. के वसन्त पर्व पर देवात्मा हिमालय की दिव्य विभूति की साक्षी में जलाया था। जो तब से लेकर अब तक अखण्ड जलते हुए असंख्य जनों को प्रकाशभरी प्रेरणाएँ बाँट रहा है। अनन्त अनुभूतियाँ इसकी साक्षी में उभरीं और चिदाकाश की धरोहर बनी हैं। यह अविरल कथा- गाथा आज भी कही जा रही है।
सूर्योदय के साथ ही इसके मद्धम स्वर मेघमन्द्र हो जाते हैं। शिवालिक पर्वतमालाओं की घाटियों में बसे शान्तिकुञ्ज के मध्य बनी यज्ञशाला में वैदिक मंत्रों के सविधि सस्वर गान के साथ स्वाहा की गूँज उभरती है तो न जाने कितने लोगों की शारीरिक- मानसिक व्याधियाँ एक साथ भस्म हो जाती हैं। यह स्वाहा का महाघोष ऐसा होता है जैसे भगवान् महाकाल ने विश्व के महारोगों को भस्मीभूत करने के लिए महास्वाहा का उच्चारण किया हो। पवित्र यज्ञ के अनन्तर यहाँ आये हुए लोग विशिष्ट साधकों के पवित्र वचनों को सुनते हैं। इससे उनकी विचार चेतना नया प्रशिक्षण पाती है। इन विचार औषधियों के बाद उन्हें माँ गायत्री का महाप्रसाद मिलता है।
महाप्रसाद के अनन्तर साधक- साधिकाएँ यहाँ अपने प्रशिक्षण का नया क्रम प्रारम्भ करते हैं। इसके द्विआयामी दृश्य है। पहले आयाम में नव दिवसीय सत्र के कार्यक्रम हैं जो व्यक्ति की आत्मचेतना को परिष्कृत व प्रशिक्षित करने के लिए हैं। दूसरा आयाम एक मासीय सत्र के कार्यक्रमों का है, जो सामूहिक लोकचेतना को परिष्कृत व प्रशिक्षित करने के लिए है। यह प्रशिक्षण सम्पूर्ण दिवस चलता रहता है। साँझ होते ही भगवान् भुवन भास्कर तो विश्व के दूसरे गोलार्ध को प्रकाशित करने चले जाते हैं। परन्तु जाते- जाते वे यहाँ के साधकों को आशीष देना नहीं भूलते। उनके आशीष की यह लालिमा काफी समय तक साधकों के मन को अपने रंग में रँगती रहती है।
इसी के साथ साधकों के रंग में रँगी साँझ साधकों के अन्तर्गगन में विलीन होती है। और निशा के प्रथम प्रहर में साधकों के प्रशिक्षण का शेष भाग पूरा होता है। इसके बाद सभी विधाता का स्मरण करते हुए निद्रालीन होने लगते हैं। लेकिन इनमें कुछ ऐसे होते हैं, जो अपने अन्तराल में सद्गुरु के संकेतों को पल- पल अवतरित होते हुए अनुभव करते हैं। इस अकथनीय अनुभवों के साथ उनकी निशीथ कालीन साधना प्रारम्भ होती है। ये साधक अपने आराध्य गुरुदेव को दिये गये वचन के अनुसार महानिशा में शयन को महापाप समझते हैं। जो सचमुच में साधक हैं वे महानिशा में कभी सोते नहीं। उनके लिए यह समय सघन साधना में विलीन विसर्जित होने के लिए है, न कि मोह निद्रा के महापाश में बँधने के लिए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०७
👉 The Illusive Reality
One who knows that he knows not, but claims he knows – is a liar. One who knows little bit but thinks he knows – is ignorant. One who knows not and knows and accepts that he knows not – is sincere. One who knows partially and knows that he knows not – is a learner. But none can know it because it is impossible to know it. This is what, is the maya – the ‘grand illusion’ of our perception of the gigantic creation of God.
One who knows that he knows and also knows that he does not – is wise. He does not say it despite knowing a lot. Because he knows a lot and therefore knows that nothing could be said or discussed about it. One who knows that it is undecipherable infinity and immerses and ‘illusion’ of self-identity into devotion of the Omniscient – is enlightened…
His existence is unified with the devotion and love of god. He has realized the absolute void in the infinity (of maya – the illusive creation) and the infinity (of God) in the void (sublime). What doubts or queries he would have? Nothing! What he would know and about what? Nothing! He says nothing. What he would say and to whom? He knows God and knows that God alone knows his maya.
📖 Akhand Jyoti, Jan. 1941
One who knows that he knows and also knows that he does not – is wise. He does not say it despite knowing a lot. Because he knows a lot and therefore knows that nothing could be said or discussed about it. One who knows that it is undecipherable infinity and immerses and ‘illusion’ of self-identity into devotion of the Omniscient – is enlightened…
His existence is unified with the devotion and love of god. He has realized the absolute void in the infinity (of maya – the illusive creation) and the infinity (of God) in the void (sublime). What doubts or queries he would have? Nothing! What he would know and about what? Nothing! He says nothing. What he would say and to whom? He knows God and knows that God alone knows his maya.
📖 Akhand Jyoti, Jan. 1941
👉 दो मित्र की की गति परिणति
दो मित्र एक साथ खेले, बड़े हुए। पढ़ाई में भी दोनों आगे रहते थे। एक धनी घर का था और उसे खर्च की खुली छूट थी। दूसरा निर्धन पर संस्कारवान घर से आया था व सदैव सीमित खर्च करता। धनी मित्र जब तक साथ रहा उसे अपनी फिजूलखर्ची में साथ रहने को आमंत्रित करता रहा। पर उसने उसकी यही बात न मानी शेष बातों पर सदैव परामर्श लेता भी रहा और उसे सुझाव देता भी कि अक्षय सम्पदा होते हुए भी तुम्हें खर्च अनावश्यक नहीं करना चाहिए।
दोनों कालान्तर में अलग हुए। निर्धन मित्र ने अध्यापक की नौकरी स्वीकार कर ली व धनी मित्र ने व्यापार में धन लगाकर अपना कारोबार अलग बना लिया। १० वर्ष बाद दोनों की सहसा मुलाकात एक औषधालय में हुई। धनी मित्र अपना धन तो चौपट कर ही चुका था, अन्य दुव्यर्सनों के कारण जिगर खराब होने से औषधालय में चिकित्सार्थ भर्ती था। दूसरी ओर उसका मित्र अब एक विद्यालय का प्रधानाचार्य था। पति-पत्नी व एक बालक सीमित खर्च में निर्वाह करते थे। प्रसन्न उल्लास युक्त जीवन जीते थे। दोनों ने एक दूसरे की कथा-गाथा सुनी। धनी मित्र की आँखों से आँसू लुढ़क पड़े "मित्र ! मैंने तुम्हारा कहा माना होता तो आज मेरी यह स्थिति न होती। अनावश्यक खर्च की मेरी वृत्ति ने आज मुझे यहाँ तक पहुँचा दिया।'' दूसरे ने सहानुभूति दर्शायी, यथा सम्भव आर्थिक सहयोग देकर उसे नये सिरे से जीवन जीने योग्य बना दिया।
धनार्जने यथा बुद्धेरपेक्षा व्ययकर्मणि।
ततोऽधिकैव सापेक्ष्या तत्रौचित्सस्य निश्चये।। प्रज्ञा पुराण ।।
धन कमाने में जितनी बुद्धिमत्ता की आवश्यकता पड़ती है, उससे अनेक गुनी व्यय के औचित्य का निर्धारण करते समय लगनी चाहिए।।
सही तरीके से कमाना व सही कामों में औचित्य-अनौचित्य का ध्यान रखकर खर्च करना ही लक्ष्मी का सम्मान है। इसलिए अर्थ संतुलन के मितव्ययिता पक्ष को प्रधानता दी जाती है। ध्यान यही रखा जाय कि जो भी बचाया जाय उसको उचित प्रयोजनों में नियोजित कर दें।
📖 प्रज्ञा पुराण भाग १ से
दोनों कालान्तर में अलग हुए। निर्धन मित्र ने अध्यापक की नौकरी स्वीकार कर ली व धनी मित्र ने व्यापार में धन लगाकर अपना कारोबार अलग बना लिया। १० वर्ष बाद दोनों की सहसा मुलाकात एक औषधालय में हुई। धनी मित्र अपना धन तो चौपट कर ही चुका था, अन्य दुव्यर्सनों के कारण जिगर खराब होने से औषधालय में चिकित्सार्थ भर्ती था। दूसरी ओर उसका मित्र अब एक विद्यालय का प्रधानाचार्य था। पति-पत्नी व एक बालक सीमित खर्च में निर्वाह करते थे। प्रसन्न उल्लास युक्त जीवन जीते थे। दोनों ने एक दूसरे की कथा-गाथा सुनी। धनी मित्र की आँखों से आँसू लुढ़क पड़े "मित्र ! मैंने तुम्हारा कहा माना होता तो आज मेरी यह स्थिति न होती। अनावश्यक खर्च की मेरी वृत्ति ने आज मुझे यहाँ तक पहुँचा दिया।'' दूसरे ने सहानुभूति दर्शायी, यथा सम्भव आर्थिक सहयोग देकर उसे नये सिरे से जीवन जीने योग्य बना दिया।
धनार्जने यथा बुद्धेरपेक्षा व्ययकर्मणि।
ततोऽधिकैव सापेक्ष्या तत्रौचित्सस्य निश्चये।। प्रज्ञा पुराण ।।
धन कमाने में जितनी बुद्धिमत्ता की आवश्यकता पड़ती है, उससे अनेक गुनी व्यय के औचित्य का निर्धारण करते समय लगनी चाहिए।।
सही तरीके से कमाना व सही कामों में औचित्य-अनौचित्य का ध्यान रखकर खर्च करना ही लक्ष्मी का सम्मान है। इसलिए अर्थ संतुलन के मितव्ययिता पक्ष को प्रधानता दी जाती है। ध्यान यही रखा जाय कि जो भी बचाया जाय उसको उचित प्रयोजनों में नियोजित कर दें।
📖 प्रज्ञा पुराण भाग १ से
मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019
👉 माँ
एक दिन अचानक मेरी पत्नी मुझसे बोली - "सुनो, अगर मैं तुम्हे किसी और के साथ डिनर और फ़िल्म के लिए बाहर जाने को कहूँ तो तुम क्या कहोगे"। मैं बोला - " मैं कहूँगा कि अब तुम मुझे प्यार नहीं करती"।
उसने कहा - "मैं तुमसे प्यार करती हूँ, लेकिन मुझे पता है कि यह औरत भी आपसे बहुत प्यार करती है और आप के साथ कुछ समय बिताना उनके लिए सपने जैसा होगा"।
वह अन्य औरत कोई और नहीं मेरी माँ थी। जो मुझ से अलग अकेली रहती थी। अपनी व्यस्तता के कारण मैं उन से मिलने कभी कभी ही जा पाता था। मैंने माँ को फ़ोन कर उन्हें अपने साथ रात के खानेे और एक फिल्म के लिए बाहर चलने के लिए कहा।
"तुम ठीक तो हो,ना। तुम दोनों के बीच कोई परेशानी तो नहीं" माँ ने पूछा। मेरी माँ थोडा शक्की मिजाज़ की औरत थी। उनके लिए मेरा इस किस्म का फ़ोन मेरी किसी परेशानी का संकेत था।
नहीं कोई परेशानी नहीं। बस मैंने सोचा था कि आप के साथ बाहर जाना एक सुखद अहसास होगा" मैंने जवाब दिया और कहा 'बस हम दोनों ही चलेंगे"। उन्होंने इस बारे में एक पल के लिए सोचा और फिर कहा, 'ठीक है।'
शुक्रवार की शाम को जब मैं उनके घर पर पहुंचा तो मैंने देखा है वह भी दरवाजे पर इंतजार कर रही थी। वो एक सुन्दर पोशाक पहने हुए थी और उनका चहेरा एक अलग सी ख़ुशी में चमक रहा था।
कार में माँ ने कहा " 'मैंने अपनी दोस्त को बताया कि मैं अपने बेटे के साथ बाहर खाना खाने के लिए जा रही हूँ। वे काफी प्रभावित थी"। हम लोग माँ की पसंद वाले एक रेस्तरां पहुचे जो बहुत सुरुचिपूर्ण तो नहीं मगर अच्छा और आरामदायक था। हम बैठ गए, और मैं मेनू देखने लगा। मेनू पढ़ते हुए मैंने आँख उठा कर देखा तो पाया कि वो मुझे ही देख रहीं थी और एक उदास सी मुस्कान उनके होठों पर थी।
'जब तुम छोटे थे तो ये मेनू मैं तुम्हारे लिए पढ़ती थी' उन्होंने कहा। 'माँ इस समय मैं इसे आपके लिए पढना चाहता हूँ,' मैंने जवाब दिया।
खाने के दौरान, हम में एक दुसरे के जीवन में घटी हाल की घटनाओं पर चर्चा होंने लगी। हम ने आपस में इतनी ज्यादा बात की, कि पिक्चर का समय कब निकल गया हमें पता ही नही चला।
बाद में वापस घर लौटते समय माँ ने कहा कि अगर अगली बार मैं उन्हें बिल का पेमेंट करने दूँ, तो वो मेरे साथ दोबारा डिनर के लिए आना चाहेंगी। मैंने कहा "माँ जब आप चाहो और बिल पेमेंट कौन करता है इस से क्या फ़र्क़ पड़ता है।
माँ ने कहा कि फ़र्क़ पड़ता है और अगली बार बिल वो ही पे करेंगी।
"घर पहुँचने पर पत्नी ने पूछा" - कैसा रहा।
"बहुत बढ़िया, जैसा सोचा था उससे कही ज्यादा बढ़िया" - मैंने जवाब दिया।
इस घटना के कुछ दिन बाद, मेरी माँ का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। यह इतना अचानक हुआ कि मैं उनके लिए कुछ नहीं कर पाया ।
माँ की मौत के कुछ समय बाद, मुझे एक लिफाफा मिला जिसमे उसी रेस्तरां की एडवांस पेमेंट की रसीद के साथ माँ का एक ख़त था जिसमे माँ ने लिखा था " मेरे बेटे मुझे पता नहीं कि मैं तुम्हारे साथ दोबारा डिनर पर जा पाऊँगी या नहीं इसलिए मैंने दो लोगो के खाने के अनुमानित बिल का एडवांस पेमेंट कर दिया है। अगर मैं नहीं जा पाऊँ तो तुम अपनी पत्नी के साथ भोजन करने जरूर जाना।
उस रात तुमने कहा था ना कि क्या फ़र्क़ पड़ता है। मुझ जैसी अकेली रहने वाली बूढी औरत को फ़र्क़ पड़ता है, तुम नहीं जानते उस रात तुम्हारे साथ बीता हर पल मेरे जीवन के सबसे बेहतरीन समय में एक था।
भगवान् तुम्हे सदा खुश रखे।
I love you".
तुम्हारी माँ
जीवन में कुछ भी आपके अपने परिवार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है।
अपने परिजनों को उनके हिस्से का समय दीजिए.. क्योंकि आपका साथ ही उनके जीवन में खुशियाँ का आधार है।
उसने कहा - "मैं तुमसे प्यार करती हूँ, लेकिन मुझे पता है कि यह औरत भी आपसे बहुत प्यार करती है और आप के साथ कुछ समय बिताना उनके लिए सपने जैसा होगा"।
वह अन्य औरत कोई और नहीं मेरी माँ थी। जो मुझ से अलग अकेली रहती थी। अपनी व्यस्तता के कारण मैं उन से मिलने कभी कभी ही जा पाता था। मैंने माँ को फ़ोन कर उन्हें अपने साथ रात के खानेे और एक फिल्म के लिए बाहर चलने के लिए कहा।
"तुम ठीक तो हो,ना। तुम दोनों के बीच कोई परेशानी तो नहीं" माँ ने पूछा। मेरी माँ थोडा शक्की मिजाज़ की औरत थी। उनके लिए मेरा इस किस्म का फ़ोन मेरी किसी परेशानी का संकेत था।
नहीं कोई परेशानी नहीं। बस मैंने सोचा था कि आप के साथ बाहर जाना एक सुखद अहसास होगा" मैंने जवाब दिया और कहा 'बस हम दोनों ही चलेंगे"। उन्होंने इस बारे में एक पल के लिए सोचा और फिर कहा, 'ठीक है।'
शुक्रवार की शाम को जब मैं उनके घर पर पहुंचा तो मैंने देखा है वह भी दरवाजे पर इंतजार कर रही थी। वो एक सुन्दर पोशाक पहने हुए थी और उनका चहेरा एक अलग सी ख़ुशी में चमक रहा था।
कार में माँ ने कहा " 'मैंने अपनी दोस्त को बताया कि मैं अपने बेटे के साथ बाहर खाना खाने के लिए जा रही हूँ। वे काफी प्रभावित थी"। हम लोग माँ की पसंद वाले एक रेस्तरां पहुचे जो बहुत सुरुचिपूर्ण तो नहीं मगर अच्छा और आरामदायक था। हम बैठ गए, और मैं मेनू देखने लगा। मेनू पढ़ते हुए मैंने आँख उठा कर देखा तो पाया कि वो मुझे ही देख रहीं थी और एक उदास सी मुस्कान उनके होठों पर थी।
'जब तुम छोटे थे तो ये मेनू मैं तुम्हारे लिए पढ़ती थी' उन्होंने कहा। 'माँ इस समय मैं इसे आपके लिए पढना चाहता हूँ,' मैंने जवाब दिया।
खाने के दौरान, हम में एक दुसरे के जीवन में घटी हाल की घटनाओं पर चर्चा होंने लगी। हम ने आपस में इतनी ज्यादा बात की, कि पिक्चर का समय कब निकल गया हमें पता ही नही चला।
बाद में वापस घर लौटते समय माँ ने कहा कि अगर अगली बार मैं उन्हें बिल का पेमेंट करने दूँ, तो वो मेरे साथ दोबारा डिनर के लिए आना चाहेंगी। मैंने कहा "माँ जब आप चाहो और बिल पेमेंट कौन करता है इस से क्या फ़र्क़ पड़ता है।
माँ ने कहा कि फ़र्क़ पड़ता है और अगली बार बिल वो ही पे करेंगी।
"घर पहुँचने पर पत्नी ने पूछा" - कैसा रहा।
"बहुत बढ़िया, जैसा सोचा था उससे कही ज्यादा बढ़िया" - मैंने जवाब दिया।
इस घटना के कुछ दिन बाद, मेरी माँ का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। यह इतना अचानक हुआ कि मैं उनके लिए कुछ नहीं कर पाया ।
माँ की मौत के कुछ समय बाद, मुझे एक लिफाफा मिला जिसमे उसी रेस्तरां की एडवांस पेमेंट की रसीद के साथ माँ का एक ख़त था जिसमे माँ ने लिखा था " मेरे बेटे मुझे पता नहीं कि मैं तुम्हारे साथ दोबारा डिनर पर जा पाऊँगी या नहीं इसलिए मैंने दो लोगो के खाने के अनुमानित बिल का एडवांस पेमेंट कर दिया है। अगर मैं नहीं जा पाऊँ तो तुम अपनी पत्नी के साथ भोजन करने जरूर जाना।
उस रात तुमने कहा था ना कि क्या फ़र्क़ पड़ता है। मुझ जैसी अकेली रहने वाली बूढी औरत को फ़र्क़ पड़ता है, तुम नहीं जानते उस रात तुम्हारे साथ बीता हर पल मेरे जीवन के सबसे बेहतरीन समय में एक था।
भगवान् तुम्हे सदा खुश रखे।
I love you".
तुम्हारी माँ
जीवन में कुछ भी आपके अपने परिवार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है।
अपने परिजनों को उनके हिस्से का समय दीजिए.. क्योंकि आपका साथ ही उनके जीवन में खुशियाँ का आधार है।
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