बुधवार, 10 जुलाई 2019

👉 मन को जानें:-

फ्रायड ने अपनी जीवन कथा में एक छोटा-सा उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि एक बार वह बगीचे में अपनी पत्नी और छोटे बच्चे के साथ घूमने गया। देर तक वह पत्नी से बातचीत करता रहा, टहलता रहा। फिर जब सांझ होने लगी और बगीचे के द्वार बंद होने का समय करीब हुआ, तो फ्रायड की पत्नी को खयाल आया कि ‘उसका बेटा न-मालूम कहां छूट गया है? इतने बड़े बगीचे में वह पता नहीं कहां होगा? द्वार बंद होने के करीब हैं, उसे कहां खोजूं?’ फ्रायड की पत्नी चिंतित हो गयी, घबड़ा गयी।

फ्रायड ने कहा, ‘‘घबड़ाओ मत! एक प्रश्र मैं पूछता हूँ तुमने उसे कहीं जाने से मना तो नहीं किया? अगर मना किया है तो सौ में निन्यानबे मौके तुम्हारे बेटे के उसी जगह होने के हैं, जहां जाने से तुमने उसे मना किया है।

”उसकी पत्नी ने कहा, ‘‘मना तो किया था कि फव्वारे पर मत पहुंच जाना।’

फ्रायड ने कहा, ” अगर तुम्हारे बेटे में थोड़ी भी बुद्धि है, तो वह फव्वारे पर ही मिलेगा। वह वहीं होगा। क्योंकि कई बेटे ऐसे भी होते हैं, जिनमें बुद्धि नहीं होती। उनका हिसाब रखना फिजूल है। ” फ्रायड की पत्नी बहुत हैरान हो गयी। वे गये दोनों भागे हुए फव्वारे की ओर। उनका बेटा फव्वारे पर पानी में पैर लटकाए बैठा पानी से खिलवाड़ कर रहा था।

फ्रायड की पत्नी ने कहा, ‘‘बड़ा आश्‍चर्य! तुमने कैसा पता लगा लिया कि हमारा बेटा यहां होगा? फ्रायड ने कहा, "आश्चर्य इसमें कुछ भी नहीं है। मन को जहां जाने से रोका जाये, मन वहीं जाने के लिए आकर्षित होता है। जहां के लिए कहा जाये, मत जाना वहां, एक छिपा हुआ रहस्य शुरू हो जाता है कि मन वहीं जाने को तत्‍पर हो जाता है।

” फ्रायड ने कहा, यह तो आश्‍चर्य नहीं है कि मैंने तुम्हारे बेटे का पता लगा लिया, आश्‍चर्य यह है कि मनुष्य-जाति इस छोटे-से सूत्र का पता अब तक नहीं लगा पायी। और इस छोटे-से सूत्र को बिना जाने जीवन का कोई रहस्य कभी उदघाटित नहीं हो पाता। इस छोटे-से सूत्र का पता न होने के कारण मनुष्य-जाति ने अपना सारा धर्म; सारी नीति, सारे समाज की व्यवस्था सप्रेशन पर, दमन पर खड़ी की हुई है।

👉 आज का सद्चिंतन 10 July 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 July 2019


👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 26)

👉 प्रारब्ध का स्वरूप एवं चिकित्सा में स्थान

हमारे कर्म की तीव्रता का आधार होते हैं भाव एवं विचार। क्योंकि इन्हीं से इच्छा एवं संकल्प की सृष्टि होती है। इच्छा और संकल्प के तीव्र व सबल होने पर कर्म भी प्रबल हो जाते हैं। ऐसे प्रबल कर्म अल्प समयावधि में प्रारब्ध में परिवर्तित होकर अपना फल देने की स्थिति में आ जाते हैं। जबकि सामान्य इच्छा के साथ की जाने वाली क्रियाएँ कर्म तो बनती है, परन्तु प्रारब्ध के रूप में इनका रूपान्तरण काफी लम्बे समय बाद होता है। कभी- कभी तो इनके प्रारब्ध बनने में जन्म एवं जीवन भी लग जाते हैं। यहाँ जो बताया जा रहा है वह सुपरीक्षित सत्य है। इसे बार- बार अनुभव किया गया है।

इस सिद्धान्त के अनुसार आध्यात्मिक कर्म, तप आदि साधनात्मक प्रयोग तीव्रतम कर्म माने गए हैं। क्योंकि इनमें भावों एवं विचारों की तीव्रता अधिकतम होती है। इच्छा और संकल्प प्रबलतम होते हैं। ऐसे कर्मों का जब सविधि अनुष्ठान किया जाता है, तो वे तुरन्त ही प्रारब्ध में परिवर्तित होकर अपने फल को प्रकट कर देते हैं। कोई भी अवरोध इसमें आड़े नहीं आता। जिनके कठिन तप प्रयोगों का अभ्यास है, उनके लिए यह नित्य प्रति का अनुभव है। वे अपने दैनिक जीवन में इस सत्य का साक्षात्कार करते रहते हैं।

प्रारब्ध के सिद्धान्त एवं विज्ञान में एक महत्त्वपूर्ण सच और भी है। वह यह कि कर्म बीज से प्रारब्ध बनने की प्रक्रिया यदि अभी पूरी नहीं हो सकी है तो उसे किसी विशेष आध्यात्मिक प्रयोग से कम किया जा सकता है अथवा टाला जा सकता है। परन्तु यदि यह प्रक्रिया पूरी हो गयी है और प्रारब्ध ने अपना पूर्ण आकार ले लिया है तो फिर यह अटल और अनिवार्य हो जाता है। फिर इसमें थोड़ा बहुत परिवर्तन भले कर दिया जाय, परन्तु इसका टल पाना किसी भी तरह सम्भव नहीं हो पाता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 39

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 33)

MISFORTUNES ARE NOT ALWAYS
RESULTS OF PAST MISDEEDS

Sometimes, the virtuous samskars accumulated on account of our past karmas also produce unhappy events. Virtuous karmas also act as shields to ward off sinful temptations. The former do not permit the sinful tendencies to dominate and offer stiff resistance. Many a times commitment of sin is foiled by some unforeseen obstacle. If a thief breaks his leg while goings for theft, it should be
taken as a consequence of his past virtuous karmas.

Those who work hard for moral or social upliftment of the society and meticulously follow their course of duty, face stupendous problems, hardships and lack of resources. They also have to face antagonism of people who find such activities detrimental to their vested interests. Besides, they are tormented by unscrupulous in many ways. Persons treading the royal highway of righteousness
have to face hardships at each step. Misfortunes are like goldsmith’s furnace, in which the validity of past virtues and tolerance to hardships undertaken for virtuous deeds are tempered. After going through misfortunes, the character and personality of an upright person becomes all the more lustrous.

Hence while going through misfortunes, do not be under the impression that you are a sinner and a wretched person deserving Divine Wrath. It could be that the distress is a blessing in disguise, with hidden boons, which you are unable to foresee at the moment because of lack of clear vision.

Innocent persons may be found suffering because of unfair ideologies or oppression by others. Any one may become a victim of exploitation, suppression and injustice. The exploiter has to face the consequences of his karmas in due course of time, but the sufferer should not take such trials as outcome of his prarabdha.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 54

👉 Moments of self-expression 10 July 2019

■  दुष्कर्म करना हो तो उसे करते हुए कितनी बार विचारों और उसे आज की अपेक्षा कल-परसों पर छोड़ों, किन्तु यदि कुछ शुभ करना हो तो पहले ही भावना तरंग को कार्यान्वित होने दो। कल वाले काम को आज ही निपटाने का प्रयत्न करो। पाप तो रोज ही अपना जाल लेकर हमारी घात में फिरता रहता है, पर पुण्य का तो कभी-कभी उदय होता है, उसे निराश लौटा दिया तो न जाने फिर कब आवे।

◇ दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, पर अपना मन अपनी बात न माने यह कैसे हो सकता है। हम अपने आपको तो सुधार ही सकते हैं-अपने को सन्मार्ग पर चला ही सकते हैं। इसमें दूसरा कोई क्या बाधा डाले? हम ऊँचे उठना भी चाहते हैं और उसका साधन भी हमारे हाथ में है तो आत्म-सुधार के लिए, आत्म-निर्माण के लिए और आत्म-विकास के लिए क्यों कटिबद्ध न हों?

★ पाप की अवहेलना न करो। वह थोड़ा दिखते हुए भी बड़ा अनिष्ट कर डालता है। जैसे आग की छोटी सी चिनगारी भी मूल्यवान् वस्तुओं के ढेर को जलाकर राख कर देती है। पला हुआ साँप कभी भी डस सकता है। उसी प्रकार मन में छिपा हुआ पाप कभी भी हमारे उज्ज्वल जीवन का नाश कर सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 9 जुलाई 2019

👉 कहाँ छुपी हैं शक्तियां!

एक बार देवताओं में चर्चा हो रहो थी, चर्चा का विषय था मनुष्य की हर मनोकामनाओं को पूरा करने वाली गुप्त चमत्कारी शक्तियों को कहाँ छुपाया जाये। सभी देवताओं में इस पर बहुत वाद- विवाद हुआ। एक देवता ने अपना मत रखा और कहा कि इसे हम एक जंगल की गुफा में रख देते हैं। दूसरे देवता ने उसे टोकते हुए कहा नहीं- नहीं हम इसे पर्वत की चोटी पर छिपा देंगे। उस देवता की बात ठीक पूरी भी नहीं हुई थी कि कोई कहने लगा, न तो हम इसे कहीं गुफा में छिपाएंगे और न ही इसे पर्वत की चोटी पर हम इसे समुद्र की गहराइयों में छिपा देते हैं यही स्थान इसके लिए सबसे उपयुक्त रहेगा।

सबकी राय खत्म हो जाने के बाद एक बुद्धिमान देवता ने कहा क्यों न हम मानव की चमत्कारिक शक्तियों को मानव -मन की गहराइयों में छिपा दें। चूँकि बचपन से ही उसका मन इधर -उधर दौड़ता रहता है, मनुष्य कभी कल्पना भी नहीं कर सकेगा कि ऐसी अदभुत और विलक्षण शक्तियां उसके भीतर छिपी हो सकती हैं। और वह इन्हें बाह्य जगत में खोजता रहेगा अतः इन बहुमूल्य शक्तियों को हम उसके मन की निचली तह में छिपा देंगे। बाकी सभी देवता भी इस प्रस्ताव पर सहमत हो गए। और ऐसा ही किया गया, मनुष्य के भीतर ही चमत्कारी शक्तियों का भण्डार छुपा दिया गया, इसलिए कहा जाता है मानव मवन में अद्भुत शक्तियां निहित हैं।

दोस्तों इस कहानी का सार यह है कि मानव मन असीम ऊर्जा का कोष है। इंसान जो भी चाहे वो हासिल कर सकता है। मनुष्य के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है। लेकिन बड़े दुःख की बात है उसे स्वयं ही विश्वास नहीं होता कि उसके भीतर इतनी शक्तियां विद्यमान हैं। अपने अंदर की शक्तियों को पहचानिये, उन्हें पर्वत, गुफा या समुद्र में मत ढूंढिए बल्कि अपने अंदर खोजिए और अपनी शक्तियों को निखारिए। हथेलियों से अपनी आँखों को ढंककर अंधकार होने का शिकायत मत कीजिये। आँखें खोलिए, अपने भीतर झांकिए और अपनी अपार शक्तियों का प्रयोग कर अपना हर एक सपना पूरा कर डालिये।

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 25)

👉 प्रारब्ध का स्वरूप एवं चिकित्सा में स्थान

प्रारब्ध के सुयोग- दुर्योग जीवन में सुखद- दुःखद परिस्थितियों की सृष्टि करते हैं। प्रारब्ध का सुयोग उदय होने से अनायास ही सुख- सौभाग्य एवं स्वास्थ्य की घटाएँ छा जाती है। जबकि कहीं यदि प्रारब्ध का दुर्योग उदय हुआ तो जीवन में दुःख- दुर्भाग्य एवं रोग- शोक की घटाएँ घिरने लगती हैं। मानव जीवन में प्रारब्ध का यह सिद्धान्त भाग्यवादी कायरता नहीं बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि की सूक्ष्मता व पारदर्शिता है। यह ऐसा सच है जिसे हर पल- हर क्षण सभी अनुभव करते हैं। सुख- दुःख के हिंडोले में झूलते हुए इनमें से कुछ इस सच्चाई को पारम्परिक रूप से स्वीकारते हैं। जबकि कई अपनी बुद्धिवादी अहमन्यता के कारण इसे सिरे से नकार देते हैं। थोड़े से तपस्वी एवं विवेकी लोगों को आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त होती है, वे इस सूक्ष्म सत्य को साफ- साफ देख पाते हैं। इसे पूरी पारदर्शिता के साथ अनुभव करते हैं।

जिन्हें यह अनुभूति होती है और हो रही है वे इस सम्बन्ध में सभी के सभी तरह के सवालों का जवाब देने में सक्षम हैं। ज्यादातर जनों की जिज्ञासा होती है- प्रारब्ध है क्या? तो इसका सरल समाधान है- प्रारब्ध का अर्थ है- परिपक्व कर्म। हमारे पूर्वकृत कर्मों में जो जब जिस समय परिपक्व हो जाते हैं, उन्हें प्रारब्ध की संज्ञा मिल जाती है। यह सिलसिला कालक्रम के अनुरूप चलता रहता है। इसमें वर्ष भी लगते हैं और जन्म भी। कई बार क्रिया भाव में और विचारों का इतना तीव्रतम संयोग होता है कि वे तुरन्त, प्रारब्ध कर्म का रूप ले लेते हैं। और अपना फल प्रकट करने में सक्षम सिद्ध होते हैं। ये पंक्तियाँ अपने पाठकों को थोड़ा अचरज में डाल सकती है। किन्तु यह सभी तर्कों से परे अनुभूत सत्य है। आध्यात्मिक चिकित्सा में प्रारब्ध के स्वरूप एवं सिद्धान्त को समझना बहुत महत्त्वपूर्ण है।

इस क्रम में सबसे प्रथम बिन्दु यह है कि हमारे द्वारा किया जाने वाला प्रत्येक कर्म अविनाशी है। यह अच्छा हो या बुरा समयानुसार परिपक्व होकर प्रारब्ध में बदले बिना नहीं रहेगा। और प्रारब्ध का अर्थ ही है वह कर्म जिसका फल भोगने से हम बच नहीं सकते। इसे सामान्य जीवन क्रम के बैंक और उसके फिक्स डिपॉजिट के उदाहरण से समझा जा सकता है। हम सभी जानते हैं कि बैंक में अपने धन को निश्चित समय अवधि में जमा करने की प्रथा है। इस प्रक्रिया में अलग- अलग जमा पूंजी एक निश्चित अवधि में डेढ़ गुनी- दो गुनी हो जाती है। इस प्रकार बैंक में हम अपने ढाई हजार रुपये जमा करके पांच साल में पांच हजार पाने के हकदार हो जाते हैं।

बस यही प्रक्रिया कर्मबीजों की है- जो जीवन चेतना की धरती पर अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित होकर अपना फल प्रकट करने की स्थिति में आते रहते हैं। कौन कर्म किस समय फल बनकर सामने आएगा? इसमें कई कारक क्रियाशील होते हैं। उदाहरण के लिए सबसे पहले कर्म की तीव्रता क्या है? कितनी है? ध्यान देने की बात यह है कि प्रत्येक क्रिया कर्म नहीं होती। जो हम अनजाने में करते हैं, जिसमें हमारी इच्छा या संकल्प का योग नहीं होता, उसे कर्म नहीं कहा जा सकता। इसका कोई सुफल या कुफल भी नहीं होगा। इसके विपरीत जिस क्रिया में हमारी इच्छा एवं संकल्प का सुयोग जुड़ता है, वह कर्म का रूप धारण करती है। और इसका कोई न कोई फल अवश्य होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 38

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 32)

MISFORTUNES ARE NOT ALWAYS
RESULTS OF PAST MISDEEDS

For most of us misfortunes are unwelcome. These are popularly believed to be the result of past sins and displeasure of God. However, this view is only partially correct. It is true that one of the reasons for unhappiness is past sins, but all unhappy events do not necessarily have their roots in past misdeeds. It may appear paradoxical, that at times misfortunes also befall us because of the grace of God and accumulation of past virtues. Unhappiness may also be felt while undergoing hardships in course of virtuous activities. When God shows His condescension towards a highly evolved soul and wills to release that soul from the bondage of sins of materialism, He creates distressful situations in life. Such unhappy events jolt the individual out of his slumber and to realize the futility of attachment to worldly things. The shock of unhappiness in such cases serves as a Divine Wake-Up-Call.

Our addiction to worldly attachments, infatuations and passions is so strong and alluring that we cannot be easily de-addicted by a casual approach. There are fleeting moments of wisdom in life when man thinks that life is extremely valuable and must be used for achieving some lofty objective, but soon thereafter attractions of the world drag him back to the erstwhile lowly routine of animal-like existence. Through misfortunes, God exerts a strong pull to extricate the devotee from the self-created quagmire of ignorance. Mishaps wake us up from our slumber in ignorance and darkness.

Unpleasant, heartbreaking happenings, such as a near fatal accident or disease, death of an intimate friend or relative, sudden financial loss, humiliation, or treachery by a trusted friend, may occur to give a strong shock treatment so that one may correct the course of his life.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 53

👉 आत्मचिंतन के क्षण Moments of self-expression 9 July 2019

■ संसार की सेवा का एक रूप अपनी सेवा भी माना गया है। अपनी सेवा से तात्पर्य अपने शरीर मात्र की सेवा से नहीं है, न भोग-विलास और सुख-साधनों में लगा रहना ही सेवा है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार ही अपनी सच्ची सेवा है। अपने सुधार द्वारा हम जितना-जितना अपने को सुधारते चलेंगे, उतनी-उतनी ही समस्त संसार की सेवा होती चलेगी। हम javascript:openFiles()सब इस विराट् विश्व की एक इकाई हैं। इसलिए अपनी सेवा भी संसार की सेवा ही कही जाएगी।

◇ पक्षपात की मात्रा जितनी बढ़ेगी, उतनी ही विग्रह की संभावना बढ़ेगी। उचित-अनुचित का भेद कर सकना, तथ्य को ढूँढना और न्याय की माँग को सुन सकना पक्षपात के आवेश में संभव ही नहीं हो पाता। अपने पक्ष की अच्छाइयाँ ही दीखती हैं और प्रतिपक्षी की बुराइयाँ ही सामने रहती हैं। अपनों की भूलें और विरानों के न्याय-तथ्य भी समझ में नहीं आते। तब एक पक्षीय चिंतन उद्धत बन जाता है। ऐसी दशा में आक्रमण-प्रत्याक्रमण का क्रम चल पड़ने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं रह जाता। यदि तथ्यों को खोज निकालने की दूरदर्शिता अपनाये रहा जाय, कारणभूत तथ्यों को ढूँढ़ निकाला जाय और न्यायोचित समाधान के लिए प्रयास किया जाय, तो तीन-चौथाई लड़ाइयाँ सहज ही निरस्त हो सकती हैं।

★ संसार में कोई व्यक्ति बुरा नहीं है। सबमें श्रेष्ठताएँ भरी हुर्ह हैं। आवश्यकता एक ऐसे व्यक्ति  की है, जो अच्छाई को लगातार प्रोत्साहन देकर बढ़ाता रहे। कैसे दुःख की बात है कि हम मनुष्य को उसकी त्रुटियों के लिए तो सजा देते हैं, पर उसकी अच्छाई के लिए प्रशंसा में कंजूसी करते हैं। आप विश्वास के साथ दूसरों को अच्छा कहें तो निश्चय ही वह श्रेष्ठ बनेगा। मन को अच्छाई पर जमाइए, सर्वत्र अच्छाई ही बढ़ेगी। आपके तथा दूसरे के मन में बैठे हुए देव जाग्रत् और चैतन्य होंगे तो उनसे देवत्व बढ़ेगा।

■ पुस्तकालय सच्चे देव मंदिर हैं। उनमें महापुरुषों की आत्माएँ पुस्तकों के रूप में प्रतिष्ठित रहती हैं। सत्संग के लिए पुस्तकालयों से बढ़कर विद्वान् और निर्मल चरित्र व्यक्ति दूसरा नहीं मिल सकता। अपने वंशजों के लिए एक उत्कृष्ट पुस्तकालय से मूल्यवान् वस्तु और कुछ हो ही नहीं सकती। उत्तराधिकार में और कुछ छोड़ें अथवा नहीं, पर एक अच्छे प्रेरणाप्रद पुस्तकालय की घर में स्थापना करके उस धरोहर को बच्चों, वंशजों के लिए छोड़ ही जाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 8 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 24)

👉 पूर्वजन्म के दुष्कर्मों का परिमार्जन जरूरी

इस युग के महानतम् आध्यात्मिक चिकित्सक ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव इस प्रक्रिया में सिद्धहस्त थे। उन्होंने असंख्य जनों के पूर्वजन्म को जानकर उनके जीवन को पीड़ा, परेशानी से मुक्त किया। ऐसी ही एक घटना- शिव नारायण कुलकर्णी के जीवन की है। उन दिनों श्री कुलकर्णी की युवावस्था थी। और अभी हाल में ही उन्होंने एम.एस- सी. (भौतिक विज्ञान) में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया था। उनके स्वजन उन्हें शोध अध्ययन के लिए अमेरिका भेजना चाहते थे। पासपोर्ट, वीज़ा आदि की सारी तैयारियाँ हो चुकी थी। खर्च का भी इन्तजाम हो गया था। लेकिन तभी उन्हें पागलपन का दौरा पड़ा। स्वजनों ने मेडिकल कॉलेज के साइकिएट्री विभाग में उनका इलाज कराया। पर स्थिति सुधरी नहीं। चिकित्सक एवं चिकित्सालय बदलते गए और स्थिति बिगड़ती गयी।

हारे को हरिनाम, मुसीबत पड़े तो श्रीराम। कहीं से ढूँढ खोजकर वे गुरुदेव के पास आ गए। गुरुदेव ने उनको बड़े ध्यान से देखा और उनकी आँखें छलक आयी। युवक श्री शिवनारायण कुलकर्णी के माता- पिता ने जानना चाहा, कि उनके इस लड़के का क्या होगा। घर- परिवार में सबसे होनहार बालक इतने बुरे पागलपन के चपेट में आ गया है। उन चिन्तित माता- पिता की ओर देखते हुए गुरुदेव बोले- बेटा तुम्हारे पुत्र की समस्या गम्भीर है और इसका ठीक होना लगभग असम्भव है। ऐसा करो कि तुम लोग अभी शान्तिकुञ्ज में ठहरो। और मेरे पास कल आना। तब कुछ समाधान सोचेंगे।

बड़ी से बड़ी आपदाओं को चुटकियों में हलकर देने वाले गुरुदेव ऐसा क्यों कह रहे हैं? यह राज पास बैठे हुए कार्यकर्त्ता को समझ में न आया। उसने जिज्ञासावश पूछा, गुरुदेव इस युवक के जीवन में कोई गम्भीर बात है क्या? इस प्रश्र पर पहले तो गुरुदेव मौन रहे फिर बोले- बेटा! इसने पूर्वजन्म में बहुत ही बड़ा अपराध किया है, उसी का फल इस रूप में प्रकट हो रहा है। इसे कोई भी ठीक नहीं कर सकता। तब क्या होगा? देखेंगे, कहकर वह मौन साध गए।

दूसरे दिन दोपहर में वह युवक और उसके माता- पिता फिर से आए। यह कार्यकर्त्ता भी काम से पूज्यवर के पास पहुँचा था। गुरुदेव ने उसके माता- पिता को सम्बोधित करते हुए कहा, हम तुम्हें निराश नहीं करना चाहते। इस लड़के की आयु भी अभी कम है। हम इसे ठीक तो कर देंगे, पर इसमें समय लगेगा। स्थिति कठिन तो जरूर है, पर हम स्वयं इसके द्वारा पूर्वजन्म के किए गए महापाप का प्रायश्चित्त करेंगे। साथ ही अपनी आध्यात्मिक शक्ति से इसके मन- मस्तिष्क की शल्यचिकित्सा करेंगे। यह प्रक्रिया कई चरणों में चलेगी। और इसमें लगभग दो- ढाई साल लगेंगे।

गुरुदेव की इन बातों ने युवक के माता- पिता को आश्वस्त कर दिया। बीच- बीच में वे गुरुदेव से मिलने शान्तिकुञ्ज आते रहे। उस युवक में समय के साथ परिवर्तन प्रारम्भ हो गए। और समय के साथ वह ठीक भी हो गया। पूज्यवर की आध्यात्मिक चिकित्सा के विज्ञान को उस युवक के साथ उसके माता- पिता ने भी अनुभव किया। साथ ही यह भी जान सके कि पूर्वजन्म में हुए दुष्कर्म और उससे उपजे रोग- शोक का परिमार्जन आध्यात्मिक ढंग से ही सम्भव है। इसी विधि से प्रारब्ध के सुयोग- दुर्योग बदले जा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

रविवार, 7 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 23)

👉 पूर्वजन्म के दुष्कर्मों का परिमार्जन जरूरी

आध्यात्मिक चिकित्सा के इस सिद्धान्त को कई आधुनिक मनोचिकित्सकों ने स्वीकारा है। इन्हीं में से एक डॉ. ब्रायन वीज़ हैं। जो अमेरिका में फ्लोरिडा क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले मियामी शहर में मनोचिकित्सा कर रहे हैं। डॉ. वीज़ ने अपने चिकित्सा कार्य में कई बार पाया कि रोगी के दुःख द्वन्द्व के कारण उसके व्यक्तित्व की अतल गहराइयों में है। पहले तो उन्होंने प्रचलित विधियों का प्रयोग करके तह तक जाने की कोशिश की। पर उन्हें कोई खास सफलता न लगी। हां उन्हें इतना जरूर अहसास हुआ कि अभी ज्यादा गहरे उत्खनन की जरूरत है। और उन्होंने नयी विधियों की खोज करके अपने रोगी के पिछले जीवन में झांकने की कोशिश की। इस कोशिश ने उन्हें न केवल सफल बनाया, बल्कि इस तरह वे पूर्वजन्म की वैज्ञानिकता को जानने में सफल रहे।

डॉ. वीज़ ने अपने इन प्रायोगिक निष्कर्षों को अलग- अलग ढंग से पुस्तकों में प्रकाशित किया। इन पुस्तकों में ‘मैसेजेस फ्राम दि मास्टर्स, मैनी लाइव्स, मैनी मास्टर्स, ओनली लव इज़ रियल एवं थ्रू टाइम इन्टू हीङ्क्षलग’ मुख्य है। उनके इस वैज्ञानिक रचना से संसार में आध्यात्मिक चिकित्सा की हकीकत जानी- समझी एवं पढ़ी जा सकती है। साथ ही यह भी अनुभव किया जा सकता है कि किसी भी रोगी की सफल आध्यात्मिक चिकित्सा के लिए उसके पूर्वजन्म के ज्ञान का क्या महत्त्व है। डॉ. वीज़ के ये प्रायोगिक निष्कर्ष न केवल सामान्य पाठक को अभिभूत करते हैं, बल्कि इन सत्यों की जानकारी ने उन्हें स्वयं को अभिभूत कर दिया है। इसी का सुखद परिणाम है कि मनोचिकित्सक के रूप में अपने व्यवसाय का प्रारम्भ करने वाले डॉ. ब्रायन वीज़ आज स्वयं को आध्यात्मिक चिकित्सक कहलाने में गर्व महसूस करते हैं।

डॉ. वीज़ के इस सच को भगवद्भूमि भारत ने युग- युगान्तर से अनुभव किया है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में इस सत्य को बताते हुए कहा है-
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वैत्थ परंतप॥

हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ।
यह जानना किसी आध्यात्मिक चिकित्सक की योग्यता को प्रामाणित करता है। यदि किसी में यह योग्यता नहीं है तो उसकी आध्यात्मिक चिकित्सा भी उसी की तरह अधूरी एवं अप्रामाणिक रहेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

Hosh Me Aana, Meditation होश में आना, ध्यान । Shraddhey Dr. Pranav Pandya



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शनिवार, 6 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 22)

👉 पूर्वजन्म के दुष्कर्मों का परिमार्जन जरूरी

पूर्वजन्म में वर्तमान जीवन के रहस्यों की जड़ें हैं। इन्हें खोदे बिना, इन्हें समझे बिना जिन्दगी की सूक्ष्मताओं का भेद नहीं पाया जा सकता। अचेतन के अविष्कार को आधुनिक मनोविज्ञान अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानता है। मनोवैज्ञानिक अनुसन्धानों के सारे दरो- दीवार इसी नींव पर टिके हैं। किसी भी पीड़ा- परेशानी का कारण मनोचिकित्सक अचेतन में ढूँढने की कोशिश करते हैं। आज के वैज्ञानिक समुदाय में इस सच को स्वीकारा जाता है कि जिन्दगी की समस्याओं की जड़ें इन्सान के मन में है। अनगिनत शोध प्रयासों ने इस तथ्य को प्रामाणिकता दी है कि रोग शारीरिक हों या मानसिक, इनके बीज इन्सान के अचेतन मन की परतों में छुपे होते हैं। इस सर्वमान्य स्वीकारोक्ति को विशेषज्ञों ने कई तरह से जाँच- परखकर सही पाया है। इसमें न कोई मतभेद है और न मनभेद।

हां, सवाल इसका जरूर है कि अचेतन मन क्या है? तो मनोवैज्ञानिक इसके उत्तर में कहते हैं कि यह और कुछ नहीं बस हमारा बीता हुआ कल है। बीते हुए कल में हमने जो कुछ किया, सोचा अथवा जो भावानुभूतियाँ पायी उसकी गहरी लकीरें हमारे अचेतन मन में अभी भी बनी हैं। इसे यूं भी कह सकते हैं कि हमारे बीते हुए कल की अनुभूतियाँ ही अचेतन का निर्माण करती हैं। यदि इन अनुभूतियों में कटुता, तिक्तता या कसक बाकी रही है, तो वह रोग- शोक के रूप में प्रकट होती है। इसी से अनेकों दुःखद घटनाक्रम जन्म लेते हैं। यदि अचेतन की स्थिति सुधरी- संवरी है, तो जीवन के सुखमय होने के आसार भी बनते हैं।

प्रायः सभी मनोचिकित्सक अचेतन की इस परिभाषा एवं प्रभाव से सहमत हैं। किन्तु आध्यात्मिक चिकित्सक इस सत्य को अपेक्षाकृत व्यापक परिदृश्य में देखते हैं। इनका कहना है कि बीते हुए कल की सीमाएँ केवल वर्तमान के क्षण से लेकर बचपन तक सिमटी नहीं हैं। इसके दायरे काफी बड़े हैं। ये इतने ज्यादा व्यापक हैं कि इसमें हमारे पूर्वजन्म की अनुभूतियाँ भी समायी हुई हैं। पूर्वजीवन में हमारे द्वारा किए गए कर्म, गहनता से सोचे गए विचार एवं प्रगाढ़ता से पोषित हुई भावनाएँ भी अपनी स्थिति के अनुरूप वर्तमान जीवन में सुखद या दुःखद स्थिति को जन्म देती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

Siddhiyan Kahan Aur Kaise Prapt Karen | सिद्धियाँ कहाँ है और कैसे प्राप्...



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तुम दीपक से जलते जाओ



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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...