बुधवार, 13 फ़रवरी 2019
👉 ईमानदारी तथा बेईमानी
कुछ लोग संसार में ईमानदारी से जीते हैं, और बहुत से लोग झूठ छल कपट बेईमानी करते हैं। ईमानदार लोगों को धन, सम्मान आदि कम मिलता है। झूठे बेईमान लोग जैसे तैसे छल कपट से चालाकी से बहुत सा धन भी इकट्ठा कर लेते हैं और उनके बड़े-बड़े शौक भी पूरे हो जाते हैं।
ईमानदार लोगों के पास धन संपत्ति सुविधाएं कम होने से, वे अपने सारे शौक पूरे नहीं कर पाते। कोई बात नहीं।
किसी भी शौक को पूरा करने से जो सुख मिलता है वह क्षणिक होता है थोड़ी देर का होता है। उसमें पूर्ण तृप्ति का अनुभव नहीं होता। परंतु जो ईमानदारी से थोड़े साधन संपत्ति में भी संतोष करके जीते हैं, उनके सभी शौक भले ही पूरे नहीं होते, फिर भी वे चिंता रहित तनाव रहित मस्त जीवन जीते हैं।
यदि ईमानदारी तथा बेईमानी, इन दोनों की तुलना करें, तो ईमानदारी वाला जीवन अधिक अच्छा है। इसलिए ऐसे लोग सदा आनंदित रहते हैं। उनको भूख अच्छी लगती है, नींद अच्छी आती है, और वे अपने जीवन को सफलतापूर्वक जीते हैं। आप भी सोचिए दो में से कौन-सा जीवन अपनाना चाहेंगे।
मंत्र कैसे काम करता है
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/BzPGs2I8iac
ईमानदार लोगों के पास धन संपत्ति सुविधाएं कम होने से, वे अपने सारे शौक पूरे नहीं कर पाते। कोई बात नहीं।
किसी भी शौक को पूरा करने से जो सुख मिलता है वह क्षणिक होता है थोड़ी देर का होता है। उसमें पूर्ण तृप्ति का अनुभव नहीं होता। परंतु जो ईमानदारी से थोड़े साधन संपत्ति में भी संतोष करके जीते हैं, उनके सभी शौक भले ही पूरे नहीं होते, फिर भी वे चिंता रहित तनाव रहित मस्त जीवन जीते हैं।
यदि ईमानदारी तथा बेईमानी, इन दोनों की तुलना करें, तो ईमानदारी वाला जीवन अधिक अच्छा है। इसलिए ऐसे लोग सदा आनंदित रहते हैं। उनको भूख अच्छी लगती है, नींद अच्छी आती है, और वे अपने जीवन को सफलतापूर्वक जीते हैं। आप भी सोचिए दो में से कौन-सा जीवन अपनाना चाहेंगे।
मंत्र कैसे काम करता है
डॉ चिन्मय पंड्या
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मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019
👉 दिल करीब होते हैं
एक हिन्दू सन्यासी अपने शिष्यों के साथ गंगा नदी के तट पर नहाने पहुंचा. वहां एक ही परिवार के कुछ लोग अचानक आपस में बात करते-करते एक दूसरे पर क्रोधित हो उठे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे. संयासी यह देख तुरंत पलटा और अपने शिष्यों से पूछा; “क्रोध में लोग एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं ?”
शिष्य कुछ देर सोचते रहे, एक ने उत्तर दिया, “क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं इसलिए !” “पर जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है, जो कहना है वो आप धीमी आवाज़ में भी तो कह सकते हैं”, सन्यासी ने पुनः प्रश्न किया.
कुछ और शिष्यों ने भी उत्तर देने का प्रयास किया पर बाकी लोग संतुष्ट नहीं हुए.
अंततः सन्यासी ने समझाया…
“जब दो लोग आपस में नाराज होते हैं तो उनके दिल एक दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं. और इस अवस्था में वे एक दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुन सकते… वे जितना अधिक क्रोधित होंगे उनके बीच की दूरी उतनी ही अधिक हो जाएगी और उन्हें उतनी ही तेजी से चिल्लाना पड़ेगा.
क्या होता है जब दो लोग प्रेम में होते हैं ? तब वे चिल्लाते नहीं बल्कि धीरे-धीरे बात करते हैं, क्योंकि उनके दिल करीब होते हैं, उनके बीच की दूरी नाम मात्र की रह जाती है.”
सन्यासी ने बोलना जारी रखा,” और जब वे एक दूसरे को हद से भी अधिक चाहने लगते हैं तो क्या होता है ? तब वे बोलते भी नहीं, वे सिर्फ एक दूसरे की तरफ देखते हैं और सामने वाले की बात समझ जाते हैं.”
गुरुदेव का आशीर्वाद जिस जिस को मिला वो निहाल हो गया।
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/3NaRdsNuyxU
शिष्य कुछ देर सोचते रहे, एक ने उत्तर दिया, “क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं इसलिए !” “पर जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है, जो कहना है वो आप धीमी आवाज़ में भी तो कह सकते हैं”, सन्यासी ने पुनः प्रश्न किया.
कुछ और शिष्यों ने भी उत्तर देने का प्रयास किया पर बाकी लोग संतुष्ट नहीं हुए.
अंततः सन्यासी ने समझाया…
“जब दो लोग आपस में नाराज होते हैं तो उनके दिल एक दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं. और इस अवस्था में वे एक दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुन सकते… वे जितना अधिक क्रोधित होंगे उनके बीच की दूरी उतनी ही अधिक हो जाएगी और उन्हें उतनी ही तेजी से चिल्लाना पड़ेगा.
क्या होता है जब दो लोग प्रेम में होते हैं ? तब वे चिल्लाते नहीं बल्कि धीरे-धीरे बात करते हैं, क्योंकि उनके दिल करीब होते हैं, उनके बीच की दूरी नाम मात्र की रह जाती है.”
सन्यासी ने बोलना जारी रखा,” और जब वे एक दूसरे को हद से भी अधिक चाहने लगते हैं तो क्या होता है ? तब वे बोलते भी नहीं, वे सिर्फ एक दूसरे की तरफ देखते हैं और सामने वाले की बात समझ जाते हैं.”
गुरुदेव का आशीर्वाद जिस जिस को मिला वो निहाल हो गया।
डॉ चिन्मय पंड्या
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👉 “गुरु कृपा चार प्रकार से होती है ।”
01 स्मरण से
02 दृष्टि से
03 शब्द से
04 स्पर्श से
जैसे कछुवी रेत के भीतर अंडा देती है पर खुद पानी के भीतर रहती हुई उस अंडे को याद करती रहती है तो उसके स्मरण से अंडा पक जाता है।
ऐसे ही गुरु की याद करने मात्र से शिष्य को ज्ञान हो जाता है।
यह है स्मरण दीक्षा।।
दूसरा जैसे मछली जल में अपने अंडे को थोड़ी थोड़ी देर में देखती रहती है तो देखने मात्र से अंडा पक जाता है।
ऐसे ही गुरु की कृपा दृष्टि से शिष्य को ज्ञान हो जाता है।
यह दृष्टि दीक्षा है ।।
तीसरा जैसे कुररी पृथ्वी पर अंडा देती है,
और आकाश में शब्द करती हुई घूमती है तो उसके शब्द से अंडा पक जाता है।
ऐसे ही गुरु अपने शब्दों से शिष्य को ज्ञान करा देता है।
यह शब्द दीक्षा है।।
चौथा जैसे मयूरी अपने अंडे पर बैठी रहती है तो उसके स्पर्श से अंडा पक जाता है।
ऐसे ही गुरु के हाथ के स्पर्श से शिष्य को ज्ञान हो जाता है।
यह स्पर्श दीक्षा है।।
गायत्री मंत्र की महत्ता
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/0R0E7FMA1RA
02 दृष्टि से
03 शब्द से
04 स्पर्श से
जैसे कछुवी रेत के भीतर अंडा देती है पर खुद पानी के भीतर रहती हुई उस अंडे को याद करती रहती है तो उसके स्मरण से अंडा पक जाता है।
ऐसे ही गुरु की याद करने मात्र से शिष्य को ज्ञान हो जाता है।
यह है स्मरण दीक्षा।।
दूसरा जैसे मछली जल में अपने अंडे को थोड़ी थोड़ी देर में देखती रहती है तो देखने मात्र से अंडा पक जाता है।
ऐसे ही गुरु की कृपा दृष्टि से शिष्य को ज्ञान हो जाता है।
यह दृष्टि दीक्षा है ।।
तीसरा जैसे कुररी पृथ्वी पर अंडा देती है,
और आकाश में शब्द करती हुई घूमती है तो उसके शब्द से अंडा पक जाता है।
ऐसे ही गुरु अपने शब्दों से शिष्य को ज्ञान करा देता है।
यह शब्द दीक्षा है।।
चौथा जैसे मयूरी अपने अंडे पर बैठी रहती है तो उसके स्पर्श से अंडा पक जाता है।
ऐसे ही गुरु के हाथ के स्पर्श से शिष्य को ज्ञान हो जाता है।
यह स्पर्श दीक्षा है।।
गायत्री मंत्र की महत्ता
डॉ चिन्मय पंड्या
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👉 कैसे बनें दिव्यकर्मी और कैसे हों बंधनमुक्त दिव्यकर्मी कौन?:-
जिसकी समस्त वासनाएँ ज्ञान की अग्रि में जलकर भस्म हो गई हों, जो कार्य करते हुए कभी उत्तेजित न हो तथा जिस कार्य को भी हाथ में ले उसे दिव्यता के शिखर पर ले जाए—श्री भगवान् के अनुसार वह पंडित है, ज्ञानी है, बुद्धिमान है।
जब संकल्प व्यष्टि से हटकर समष्टि से जुड़ जाते हैं, तो कामनारहित हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति सही अर्थों में साधक बन जाता है। मात्र वह ज्ञानी ही नहीं होता, अंदर- बाहर से पवित्रता से घनीभूत हो वह ईश्वर का सच्चापुत्र भी बन जाता है। ऐसे दिव्यकर्मी के विषय में, स्वयं प्रभु श्रीकृष्ण बीसवें श्लोक में कहते हैं—
‘‘ऐसा व्यक्ति सब प्रकार की कर्मफल आसक्ति छोड़कर सदैव प्रभु में तृप्त रहता है, प्रभु के अतिरिक्त किसी अन्य पर आश्रित न होकर वह सब प्रकार के कर्मों को करता हुआ भी वस्तुतः कुछ भी नहीं करता’’ (कर्म में अकर्म)। (कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः) ४/२०।
एक दिव्यकर्मी के विषय में भगवान् कह रहे हैं कि वह अपनी स्वाध्यायजनित समझ- बूझ के माध्यम से हर क्षण प्रभु में ही लीन होकर कार्य करता है। वह जो भी कार्य करता है, चूँकि उसकी उसके फल के प्रति आसक्ति नहीं है, वह करता हुआ भी उसे न करने वाला बन जाता है।
संत वस्तुतः ऐसे ही व्यक्तियों को कहा जाता है। इन्हें दुनिया में दुःखी दिखाई देते हैं। वे दुःखों के निवारण का प्रयास करते हैं। दूसरी ओर दुःखी भी वे ही होते हैं, जिनकी कामनाएँ अतृप्त होती हैं। उन्हें भोग- विलास में ही सब कुछ नजर आता है। हमारे पास यह सब साधन होते तो कितना अच्छा होता! यही सब सोच- सोचकर वे दुःखी होकर विकर्म कर बैठते हैं और फिर पाप के भागी बनते हैं।
📖 अखण्ड ज्योति -मार्च 1942
संसार क्या है और हम कैसा जीवन जिये?
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/LerMVZHI8CE
जब संकल्प व्यष्टि से हटकर समष्टि से जुड़ जाते हैं, तो कामनारहित हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति सही अर्थों में साधक बन जाता है। मात्र वह ज्ञानी ही नहीं होता, अंदर- बाहर से पवित्रता से घनीभूत हो वह ईश्वर का सच्चापुत्र भी बन जाता है। ऐसे दिव्यकर्मी के विषय में, स्वयं प्रभु श्रीकृष्ण बीसवें श्लोक में कहते हैं—
‘‘ऐसा व्यक्ति सब प्रकार की कर्मफल आसक्ति छोड़कर सदैव प्रभु में तृप्त रहता है, प्रभु के अतिरिक्त किसी अन्य पर आश्रित न होकर वह सब प्रकार के कर्मों को करता हुआ भी वस्तुतः कुछ भी नहीं करता’’ (कर्म में अकर्म)। (कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः) ४/२०।
एक दिव्यकर्मी के विषय में भगवान् कह रहे हैं कि वह अपनी स्वाध्यायजनित समझ- बूझ के माध्यम से हर क्षण प्रभु में ही लीन होकर कार्य करता है। वह जो भी कार्य करता है, चूँकि उसकी उसके फल के प्रति आसक्ति नहीं है, वह करता हुआ भी उसे न करने वाला बन जाता है।
संत वस्तुतः ऐसे ही व्यक्तियों को कहा जाता है। इन्हें दुनिया में दुःखी दिखाई देते हैं। वे दुःखों के निवारण का प्रयास करते हैं। दूसरी ओर दुःखी भी वे ही होते हैं, जिनकी कामनाएँ अतृप्त होती हैं। उन्हें भोग- विलास में ही सब कुछ नजर आता है। हमारे पास यह सब साधन होते तो कितना अच्छा होता! यही सब सोच- सोचकर वे दुःखी होकर विकर्म कर बैठते हैं और फिर पाप के भागी बनते हैं।
📖 अखण्ड ज्योति -मार्च 1942
संसार क्या है और हम कैसा जीवन जिये?
डॉ चिन्मय पंड्या
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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Feb 2019
गुरुदेव गायत्री माता को लोगो के हृदय में बैठाना चाहते थे।
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/7mTA7K4TAiU
👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 1 से 4
॥अथ प्रथमोSघ्याय:॥
लोककल्याण-जिज्ञासा प्रकरण
लोककल्याणकृद् धर्मधारणासंप्रारक: ।
व्रती यायावरो मान्यो देवर्षिऋषिसत्तम: ॥१॥
अव्याहतगतिं प्राप गन्तुं विष्णुपदं सदा ।
नारदो ज्ञानचर्चार्थं स्थित्वा वैकुण्ठसन्निधौं॥२॥
लोककल्याणमेवायमात्मकल्याणवद् यत:।
मेने परार्थपारीण: सुविधामन्यदुर्लभाम् ॥३॥
काले काले गतस्तत्र स्मस्या: कालिकी मृशन् ।
मतं निश्चित्य स्वीचक्रे भाविनीं कार्यपद्धतिम् ॥४॥
टीका:- लोक कल्याण के लिए जन-जन तक धर्म धारणा का प्रसार-विस्तार करने का व्रत लेकर निरन्तर विचरण करने वाले नारद ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ गिने गये और देवर्षि के मूर्धन्य सम्मान से विभूषित हुए। एक मात्र उन्हीं को यह सुविधा प्राप्त थी किं कभी भी बिना किसी रोक-टोक विष्णुलोक पहुँचें और भगवान के निकट बैठकर अभीष्ट समय तक प्रत्यक्ष ज्ञानचर्चा करें। यह विशेष सुविधा उन्हें लोक-कल्याण को ही आत्म-कल्याण मानने की परमार्थ परायणता के कारण मिली? वे समय-समय पर भगवान् के समीप पहुँचते और सामयिक समस्याओं पर विचार करके तदनुरूप अपना मत बनाते और भावी कार्यक्रम निर्धारित करते॥१-४॥
व्याख्या:- परमार्थ में सच्ची लगन यदि किसी में हो तो उसे पुण्य अर्जन के अतिरिक्त आत्मकल्याण का लाभ मिलता हैं। ऐसे व्यक्ति दूसरों को तारते हैं, स्वयं अपनी नैया भी जीवन सागर में खेले जाते हैं।
नारद ऋषि को भगवान् की विशेष अनुकम्पा इसी कारण मिली कि उन्होंने परहित को अपना जीवनौद्दश्य माना। इसके लिए वे निरन्तर भ्रमण करते, जब चेतना जगाते व सत्परामर्श देकर लोगों को सन्मार्ग की राह दिखाते थे। ध्रुव, प्रह्लाद तथा पार्वती को अपने सामयिक मार्गदर्शन द्वारा उन्होंने लक्ष्य प्राप्ति की ओर अग्रसर किया। इसी लोक परायणता ने उन्हें देवर्षि पद सें सम्मानित करवाया तथा भगवान् के सामीप्य का लाभ भी उन्हें मिला। चूँकि वे सतत् जन सम्पर्क में रहते थे व लोक-कल्याण में रत रहते थे, इसी कारण सामयिक जन समस्याओं के समाधान हेतु वे परामर्श-मार्गदर्शन हेतु प्रभु के पास पहुँचते थे व मार्गदर्शन प्राप्त कर अपनी भावी नीति का क्रियान्वयन करते थे ऐसे परमार्थ परायण व्यक्ति जहाँ भी होते हैं, सदैव श्रद्धा-सम्मान पाते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 5
!! यज्ञ किस भावना के साथ करे !!
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/TiUc7lRYa78
लोककल्याण-जिज्ञासा प्रकरण
लोककल्याणकृद् धर्मधारणासंप्रारक: ।
व्रती यायावरो मान्यो देवर्षिऋषिसत्तम: ॥१॥
अव्याहतगतिं प्राप गन्तुं विष्णुपदं सदा ।
नारदो ज्ञानचर्चार्थं स्थित्वा वैकुण्ठसन्निधौं॥२॥
लोककल्याणमेवायमात्मकल्याणवद् यत:।
मेने परार्थपारीण: सुविधामन्यदुर्लभाम् ॥३॥
काले काले गतस्तत्र स्मस्या: कालिकी मृशन् ।
मतं निश्चित्य स्वीचक्रे भाविनीं कार्यपद्धतिम् ॥४॥
टीका:- लोक कल्याण के लिए जन-जन तक धर्म धारणा का प्रसार-विस्तार करने का व्रत लेकर निरन्तर विचरण करने वाले नारद ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ गिने गये और देवर्षि के मूर्धन्य सम्मान से विभूषित हुए। एक मात्र उन्हीं को यह सुविधा प्राप्त थी किं कभी भी बिना किसी रोक-टोक विष्णुलोक पहुँचें और भगवान के निकट बैठकर अभीष्ट समय तक प्रत्यक्ष ज्ञानचर्चा करें। यह विशेष सुविधा उन्हें लोक-कल्याण को ही आत्म-कल्याण मानने की परमार्थ परायणता के कारण मिली? वे समय-समय पर भगवान् के समीप पहुँचते और सामयिक समस्याओं पर विचार करके तदनुरूप अपना मत बनाते और भावी कार्यक्रम निर्धारित करते॥१-४॥
व्याख्या:- परमार्थ में सच्ची लगन यदि किसी में हो तो उसे पुण्य अर्जन के अतिरिक्त आत्मकल्याण का लाभ मिलता हैं। ऐसे व्यक्ति दूसरों को तारते हैं, स्वयं अपनी नैया भी जीवन सागर में खेले जाते हैं।
नारद ऋषि को भगवान् की विशेष अनुकम्पा इसी कारण मिली कि उन्होंने परहित को अपना जीवनौद्दश्य माना। इसके लिए वे निरन्तर भ्रमण करते, जब चेतना जगाते व सत्परामर्श देकर लोगों को सन्मार्ग की राह दिखाते थे। ध्रुव, प्रह्लाद तथा पार्वती को अपने सामयिक मार्गदर्शन द्वारा उन्होंने लक्ष्य प्राप्ति की ओर अग्रसर किया। इसी लोक परायणता ने उन्हें देवर्षि पद सें सम्मानित करवाया तथा भगवान् के सामीप्य का लाभ भी उन्हें मिला। चूँकि वे सतत् जन सम्पर्क में रहते थे व लोक-कल्याण में रत रहते थे, इसी कारण सामयिक जन समस्याओं के समाधान हेतु वे परामर्श-मार्गदर्शन हेतु प्रभु के पास पहुँचते थे व मार्गदर्शन प्राप्त कर अपनी भावी नीति का क्रियान्वयन करते थे ऐसे परमार्थ परायण व्यक्ति जहाँ भी होते हैं, सदैव श्रद्धा-सम्मान पाते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 5
!! यज्ञ किस भावना के साथ करे !!
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/TiUc7lRYa78
👉 Self-confidence is the key to success
If you consider someone as happy and successful, then closely study the course of his life. If possible, ask him directly – ‘Have you never encountered any problems in your life?’ Then you will know that peace and prosperity have not been showered on him randomly from the sky. His life has also been tested and tried by difficulties and problems as yours is being tested now. When you realize this truth, again try to investigate – ‘Who liberated him from that web of distress?’ Did any magician come and wave his magic wand and all his problems vanished? On exploring deeply, you will find that it is his self-confidence that has been mainly helpful in overcoming the problems. When all the near and dear ones had left him alone, it was this self-confidence that assured him that there was hope and inspired him to resolutely go on trying against all odds.
Believe me! Your present problems are the result of your lack of will and self-confidence. You have accepted defeat without fight. You have developed a negative attitude that you cannot do anything; you cannot overcome the distress. You are finding darkness all around. There is no one to show you the light; there seems no way for you to get rid of the suffering. Now awaken your self-confidence, and with an optimistic attitude evaluate the resources at hand, though they might appear relatively meager, and try to utilize them to solve your problems. Within a short time you will find that the circumstances have started changing for the better; the hopelessness has turned into hope and failure has started turning into success.
📖 Pt. Shriram Sharma Acharya
आज हमारी मानवता किस दिशा में आगे बढ़ रही है
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/CozPCrSnmtk
Believe me! Your present problems are the result of your lack of will and self-confidence. You have accepted defeat without fight. You have developed a negative attitude that you cannot do anything; you cannot overcome the distress. You are finding darkness all around. There is no one to show you the light; there seems no way for you to get rid of the suffering. Now awaken your self-confidence, and with an optimistic attitude evaluate the resources at hand, though they might appear relatively meager, and try to utilize them to solve your problems. Within a short time you will find that the circumstances have started changing for the better; the hopelessness has turned into hope and failure has started turning into success.
📖 Pt. Shriram Sharma Acharya
आज हमारी मानवता किस दिशा में आगे बढ़ रही है
डॉ चिन्मय पंड्या
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👉 कृष्ण के वरण की छूट
भगवान श्रीकृष्ण के पास दुर्योधन व अर्जुन दोनों पहुँचे। महाभारत युद्ध पूर्व कौरव व पाण्डव दोनों ही कृष्ण को अपने पक्ष में करना चाहते थे। दुर्योधन पहले पहुँचे व अहंकारवश सो रहे श्रीकृष्ण के सिरहाने बैठ गये। बाद में अर्जुन आये व अपनी अहज श्रद्धा- भावना वश पैरों के पास बैठ गये। श्रीकृष्ण जागे। अर्जुन पर उनकी दृष्टि पडी। कुशल क्षेम पूछकर अभिप्राय पूछने ही जा रहे थे कि दुर्योधन बोल उठा- "पहले मैं आया हूँ, मेरी बात सुनी जाय। " श्रीकृष्ण असमंजस में पडे़। बोले- 'अर्जुन छोटे हैं इसलिए प्राथमिकता तो उन्हीं को मिलेगी, पर माँग तुम्हारी भी पूरी करुँगा। एक तरफ मैं हूँ, दूसरी तरफ मेरी विशाल चतुरंगिणी सेना। बोलो अर्जुन? तुम दोनों में से क्या लोगे?' चयन की स्वतन्त्रता थी- यह विवेक पर निर्भर था, कौन क्या माँगता है- भगवत् कृपा अथवा उनका वैभव?
अर्जुन बोले- "भगवन्! मै तो आपको ही लूँगा। भले ही आप युद्ध न करें- बस साथ भर बने रहें। " दुर्योधन मन ही मन अर्जुन की इस मूर्खता पर प्रसन्न हुआ और श्रीकृष्ण की विशाल अपराजेय सेना पाकर फूला न समाया। अनीतिवादी दुर्योधन, ईश्वरीय समर्थन वाले अर्जुन जिसके पास श्रीकृष्ण भी निरस्त्र थे, से हारा ही नहीं महाभारत के युद्ध में बन्धु- बांधवों सहित मारा भी गया। दुर्योधन जैसे अनीति का चयन करने वाले एवं अर्जुन जैसे ईश्वरीय कृपा को वरण करने वाले तत्व हर मनुष्य के भीतर विद्यमान हैं- एक को विवेक या सुबुद्धि एवं दूसरे को अविवेक या दुर्बुद्धि कह सकते हैं। किसका चयन व्यक्ति करता है, यह उसकी स्वतन्त्रता है।
📖 प्रज्ञा पुराण भाग १
!! हम कठिनाइयों का घबराएँ नहीं उनका सामना करे
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/F3iq2Zk3FSg
अर्जुन बोले- "भगवन्! मै तो आपको ही लूँगा। भले ही आप युद्ध न करें- बस साथ भर बने रहें। " दुर्योधन मन ही मन अर्जुन की इस मूर्खता पर प्रसन्न हुआ और श्रीकृष्ण की विशाल अपराजेय सेना पाकर फूला न समाया। अनीतिवादी दुर्योधन, ईश्वरीय समर्थन वाले अर्जुन जिसके पास श्रीकृष्ण भी निरस्त्र थे, से हारा ही नहीं महाभारत के युद्ध में बन्धु- बांधवों सहित मारा भी गया। दुर्योधन जैसे अनीति का चयन करने वाले एवं अर्जुन जैसे ईश्वरीय कृपा को वरण करने वाले तत्व हर मनुष्य के भीतर विद्यमान हैं- एक को विवेक या सुबुद्धि एवं दूसरे को अविवेक या दुर्बुद्धि कह सकते हैं। किसका चयन व्यक्ति करता है, यह उसकी स्वतन्त्रता है।
📖 प्रज्ञा पुराण भाग १
!! हम कठिनाइयों का घबराएँ नहीं उनका सामना करे
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/F3iq2Zk3FSg
👉 अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये (भाग 1)
अपने कार्यकारी जीवन में लोग कई तरह की अशुभ आशंकाओं से आतंकित रहते हैं। रोजगार ठीक से चलेगा या नहीं, कहीं व्यापार में हानि तो नहीं हो जाएगी, नौकरी से हटा तो नहीं दिया जायेगा, अधिकारी नाराज तो नहीं हो जायेंगे जैसी चिन्ताएँ लोगों के मन मस्तिष्क पर हावी होने लगती हैं तो वह जो काम हाथ में होता है, उसे भी सहज ढंग से नहीं कर पाता। इन अशुभ आशंकाओं के करते रहने से मन में जो स्थाई गाँठ पड़ जाती है उसकी का नाम भय है।
भय का एक सामान्य रूप यह भी होता है कि अन्धेरे में जाते ही डर लगता है, अकेले यात्रा करने में किसी अनिष्ट की सम्भावना दिखाई देती है, रोगी होने बीमार पड़ने पर रोग के ठीक न होने तथा उसी के कारण मृत्युद्वार तह पहुँच जाने का डर रहता है। यह भी भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं का ही छोटा रूप है। अँधेरे में जाते समय जी क्यों काँपने लगाता है? इसलिए कि आशंका होती है कहीं कोई कीड़ा-काँटा न बैठा हो या कोई भूत-प्रेत ही न पकड़ ले। अकेले यात्रा करने में भी चोर डाकुओं द्वारा सताये जाने, लूट लेने की आशंका ही डराती है। इस तरह के डर भी एक तरह से भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं के परिणाम ही हैं।
इस तरह की आशंकाएँ स्वभाव बन कर भय के रूप में परिणत हो जाती हैं और इन आशंकाओं या भयों का एक ही कारण है- मन की दुर्बलता। भय और कुछ नहीं मन की दुर्बलता से उत्पन्न हुआ भूत ही है। इस सम्बन्ध में एक जापानी लोक कथा प्रचलित है। किसी व्यक्ति को एक डरावना जिन्न सताया करता था। वह जागता था तो जिन्न सामने खड़ा रहता था और उसे तरह-तरह से सताया करता था, सोता था तो सपने में डरावनी हरकतों से उसे परेशान करता था। एक दिन उसने हिम्मत कर जिन्न से पूछ ही लिया, ‘तुम कहाँ से आ गए हो? क्यों मुझे इतना सताते रहते हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?
.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1981 पृष्ठ 21
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1981/January/v1.21
यह राह नहीं फूलो की (गीत)
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https://youtu.be/QPFMNdsWlno
भय का एक सामान्य रूप यह भी होता है कि अन्धेरे में जाते ही डर लगता है, अकेले यात्रा करने में किसी अनिष्ट की सम्भावना दिखाई देती है, रोगी होने बीमार पड़ने पर रोग के ठीक न होने तथा उसी के कारण मृत्युद्वार तह पहुँच जाने का डर रहता है। यह भी भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं का ही छोटा रूप है। अँधेरे में जाते समय जी क्यों काँपने लगाता है? इसलिए कि आशंका होती है कहीं कोई कीड़ा-काँटा न बैठा हो या कोई भूत-प्रेत ही न पकड़ ले। अकेले यात्रा करने में भी चोर डाकुओं द्वारा सताये जाने, लूट लेने की आशंका ही डराती है। इस तरह के डर भी एक तरह से भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं के परिणाम ही हैं।
इस तरह की आशंकाएँ स्वभाव बन कर भय के रूप में परिणत हो जाती हैं और इन आशंकाओं या भयों का एक ही कारण है- मन की दुर्बलता। भय और कुछ नहीं मन की दुर्बलता से उत्पन्न हुआ भूत ही है। इस सम्बन्ध में एक जापानी लोक कथा प्रचलित है। किसी व्यक्ति को एक डरावना जिन्न सताया करता था। वह जागता था तो जिन्न सामने खड़ा रहता था और उसे तरह-तरह से सताया करता था, सोता था तो सपने में डरावनी हरकतों से उसे परेशान करता था। एक दिन उसने हिम्मत कर जिन्न से पूछ ही लिया, ‘तुम कहाँ से आ गए हो? क्यों मुझे इतना सताते रहते हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?
.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1981 पृष्ठ 21
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1981/January/v1.21
यह राह नहीं फूलो की (गीत)
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https://youtu.be/QPFMNdsWlno
सोमवार, 11 फ़रवरी 2019
👉 प्रज्ञा पुराण (भाग १) प्राक्कथन
👉 प्राक्कथन
भारतीय इतिहास-पुराणों में ऐसे अगणित उपाख्यान है, जिनसे मनुष्य के सम्मुख आने वाली अगणित समास्याओं के समाधान विघमान है। उन्हीं में से सामयिक परिस्थिति एवं आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए कुछ का ऐसा चयन किया गया है,जो युग समस्याओं के समाधान में आज की स्थिति के अनुरुप योगदान दे सकें।
सर्ववदित है कि दार्शनिक और विवेचनात्मक प्रवचन-प्रतिपादन उन्हीं के गले उतरते है,जिनकी सुविकसित मनोभूमि है, परंतु कथानकों की यह विशेषता है कि बाल, वृद्ध, नर-नारी, शिक्षित अशिक्षित सभी की समझ में आते है और उनके आधार पर ही किसी निष्कर्ष तक पहूँच सकना सम्भव होता है। लोकरंजन के साथ लोकमंगल का यह सर्वसुलभ लाभ है।
कथा साहित्य की लोकप्रियता के संबंध में कुछ कहना व्यर्थ होगा। प्राचीन काल १८ पुराण लिखे गए। उनसे भी कान न चला तो १८ उपपुराणों की रचना हुई। इन सब में कुल मिलाकर १०,०००,००० श्लोक है,जबकी चारों वेदों में मात्र बीस हजार मंत्र है। इसके अतिरिक्त भी संसार भर में इतना कथा साहित्य सृजा गया है कि उन सबको तराजू के एक पलड़े पर रखा जाय और अन्य साहित्य को दूसरे पर तो कथाएँ ही भरी पड़ेगी। फिल्मों की लोकप्रियता का कारण भी उनके कथानक ही है।
समय परिवर्तनशील है। उसकी परिस्थितियों मान्यताएँ, प्रथाएँ,समस्याएँ एवं आवश्यकताऐं भी बदलती रहती है। तदनुरुप ही उसके समाधान खोजने पड़ते है। इस शाश्वत सृष्टिक्रम को ध्यान में रखते हुए ऐसे युग साहित्य की आवश्यकता पड़ती रही है। जिसमें प्रस्तुत प्रसंगों से उपयुक्त प्रकाश एवं मार्गदर्शन उपलब्ध हो सके। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अनुकानेक मन:स्थिति वालों के लिए उनकी परिस्थिति के अनुरुप समाधान ढूँढ़ निकालने में सुविधा दे सकने की दृष्टि से इस ग्रंथ के सृजन का प्रयास किया गया है।
भविष्य का हमारा कार्यक्रम एवं जीवन काल अनिश्चित है। लेखनी तो सतत क्रियाशील रहेगी, चिन्तन हमारा ही सक्रिया रहेगा, हाथ भले ही किन्हीं के भी हों । यदि अवसर मिल सका, तो और भी अनेकों खण्ड प्रकाशित होते चले जायेंगे। कामना तो यह है कि युग पुराण के प्रज्ञा-पुराणों के भी पुरातन १८ पुराणों की तरह १८ खण्डों का सृजन बन पड़े।
संस्कृत श्लोकों तथा उसके अथों के उपनिषद् पक्ष के साथ उसकी व्याख्या एवं कथानकों के प्रयोजनों का स्पष्टीकरण करने का प्रयास इस पुराण में किया गया है। वस्तुत; इसमें युग दर्शन का मर्म निहित है। सिद्धांतों एवं तथ्यों को महत्व देने वालों के लिए यह अंग भी समाधानकारक होगा। जो संस्कृत नहीं जानते, उनके लिए अर्थ व उसकी व्याख्या पढ़ लेने से भी काम चल सकता है। इन श्लोकों की रचना नवीन है, पर जिन तथ्यों का समावेश किया गया है, वे शाश्वत है।
प्रस्तुत ग्रन्थ का पठन निजी स्वाध्याय के रूप में भी किया जा सकता है और सामूहिक सत्संग के रूप में भी। रात्रि के समय पारिवारिक लोक शिक्षण की दृष्टि से भी इसका उपयोग हो सकता है। बच्चे कथाऐं सुनने को उत्सुक रहते हैं। बड़ों को धर्म परम्पराऐं समझने की इच्छा रहती है। इनकी पूर्ति भी घर में इस आधार पर कथा क्रम और समय निर्धारित करके की जा सकती है।
प्रथम खण्ड में युग समस्याओं के कारण उद्भूत आस्था संकट का विवरण है एवं उससे उबर कर प्रज्ञा युग लाने की प्रक्रिया रूपी अवतार सत्ता द्वारा प्रणीत सन्देश है । भ्रष्ट चिन्तन एवं दुष्ट आचरण से जूझने हेतु अध्यात्म दर्शन को किस तरह व्यावहारिक रूप से अपनाया जाना चाहिए, इसकी विस्तृत व्याख्या है एवं अन्त में महाप्रज्ञा के अवलम्बन से संभावित सतयुगी परिस्थितियों की झाँकी है ।
✍🏻 प्रज्ञा पुराण (भाग १)
📖 श्रीराम शर्मा आचार्य
Sansaar Me Sabhi Tarah Ke Log Hai
Dr Chinmay Pandya
👇👇👇
https://youtu.be/pZ3oeh9CPp0
भारतीय इतिहास-पुराणों में ऐसे अगणित उपाख्यान है, जिनसे मनुष्य के सम्मुख आने वाली अगणित समास्याओं के समाधान विघमान है। उन्हीं में से सामयिक परिस्थिति एवं आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए कुछ का ऐसा चयन किया गया है,जो युग समस्याओं के समाधान में आज की स्थिति के अनुरुप योगदान दे सकें।
सर्ववदित है कि दार्शनिक और विवेचनात्मक प्रवचन-प्रतिपादन उन्हीं के गले उतरते है,जिनकी सुविकसित मनोभूमि है, परंतु कथानकों की यह विशेषता है कि बाल, वृद्ध, नर-नारी, शिक्षित अशिक्षित सभी की समझ में आते है और उनके आधार पर ही किसी निष्कर्ष तक पहूँच सकना सम्भव होता है। लोकरंजन के साथ लोकमंगल का यह सर्वसुलभ लाभ है।
कथा साहित्य की लोकप्रियता के संबंध में कुछ कहना व्यर्थ होगा। प्राचीन काल १८ पुराण लिखे गए। उनसे भी कान न चला तो १८ उपपुराणों की रचना हुई। इन सब में कुल मिलाकर १०,०००,००० श्लोक है,जबकी चारों वेदों में मात्र बीस हजार मंत्र है। इसके अतिरिक्त भी संसार भर में इतना कथा साहित्य सृजा गया है कि उन सबको तराजू के एक पलड़े पर रखा जाय और अन्य साहित्य को दूसरे पर तो कथाएँ ही भरी पड़ेगी। फिल्मों की लोकप्रियता का कारण भी उनके कथानक ही है।
समय परिवर्तनशील है। उसकी परिस्थितियों मान्यताएँ, प्रथाएँ,समस्याएँ एवं आवश्यकताऐं भी बदलती रहती है। तदनुरुप ही उसके समाधान खोजने पड़ते है। इस शाश्वत सृष्टिक्रम को ध्यान में रखते हुए ऐसे युग साहित्य की आवश्यकता पड़ती रही है। जिसमें प्रस्तुत प्रसंगों से उपयुक्त प्रकाश एवं मार्गदर्शन उपलब्ध हो सके। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अनुकानेक मन:स्थिति वालों के लिए उनकी परिस्थिति के अनुरुप समाधान ढूँढ़ निकालने में सुविधा दे सकने की दृष्टि से इस ग्रंथ के सृजन का प्रयास किया गया है।
भविष्य का हमारा कार्यक्रम एवं जीवन काल अनिश्चित है। लेखनी तो सतत क्रियाशील रहेगी, चिन्तन हमारा ही सक्रिया रहेगा, हाथ भले ही किन्हीं के भी हों । यदि अवसर मिल सका, तो और भी अनेकों खण्ड प्रकाशित होते चले जायेंगे। कामना तो यह है कि युग पुराण के प्रज्ञा-पुराणों के भी पुरातन १८ पुराणों की तरह १८ खण्डों का सृजन बन पड़े।
संस्कृत श्लोकों तथा उसके अथों के उपनिषद् पक्ष के साथ उसकी व्याख्या एवं कथानकों के प्रयोजनों का स्पष्टीकरण करने का प्रयास इस पुराण में किया गया है। वस्तुत; इसमें युग दर्शन का मर्म निहित है। सिद्धांतों एवं तथ्यों को महत्व देने वालों के लिए यह अंग भी समाधानकारक होगा। जो संस्कृत नहीं जानते, उनके लिए अर्थ व उसकी व्याख्या पढ़ लेने से भी काम चल सकता है। इन श्लोकों की रचना नवीन है, पर जिन तथ्यों का समावेश किया गया है, वे शाश्वत है।
प्रस्तुत ग्रन्थ का पठन निजी स्वाध्याय के रूप में भी किया जा सकता है और सामूहिक सत्संग के रूप में भी। रात्रि के समय पारिवारिक लोक शिक्षण की दृष्टि से भी इसका उपयोग हो सकता है। बच्चे कथाऐं सुनने को उत्सुक रहते हैं। बड़ों को धर्म परम्पराऐं समझने की इच्छा रहती है। इनकी पूर्ति भी घर में इस आधार पर कथा क्रम और समय निर्धारित करके की जा सकती है।
प्रथम खण्ड में युग समस्याओं के कारण उद्भूत आस्था संकट का विवरण है एवं उससे उबर कर प्रज्ञा युग लाने की प्रक्रिया रूपी अवतार सत्ता द्वारा प्रणीत सन्देश है । भ्रष्ट चिन्तन एवं दुष्ट आचरण से जूझने हेतु अध्यात्म दर्शन को किस तरह व्यावहारिक रूप से अपनाया जाना चाहिए, इसकी विस्तृत व्याख्या है एवं अन्त में महाप्रज्ञा के अवलम्बन से संभावित सतयुगी परिस्थितियों की झाँकी है ।
✍🏻 प्रज्ञा पुराण (भाग १)
📖 श्रीराम शर्मा आचार्य
Sansaar Me Sabhi Tarah Ke Log Hai
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👉 इंकार,,
एक नदी के किनारे दो पेड़ थे,, उस रास्ते एक छोटी सी चिड़िया गुजरी और,, पहले पेड़ से पूछा,,
बारिश होने वाला है,, क्या मैं, और मेरे बच्चे तुम्हारे टहनी में घोसला बनाकर रह सकते हैं,, लेकिन उस पेड़ ने मना कर दिया,, चिड़िया फिर दूसरे पेड़ के पास गई और वही सवाल पूछा,,
दूसरा पेड़ मान गया,,
चिड़िया अपने बच्चों के साथ खुशी-खुशी दूसरे पेड़ में घोसला बना कर रहने लगी,,
एक दिन इतनी अधिक बारिश हुई कि बारिश की वजह से पहला पेड़ जड़ से उखड़ कर पानी मे बह गया,, जब चिड़िया ने उस पेड़ को बहते हुए देखा तो कहा,,
जब तुमसे मैं और मेरे बच्चे, शरण के लिये आये तब तुमने मना कर दिया था,, अब देखो तुम्हारे उसी रूखे बर्ताव की सजा तुम्हे मिल रही है,,
जिसका उत्तर पेड़ ने मुस्कुराते हुए दिया,, मैं जानता था मेरी जड़ें कमजोर है,, और इस बारिश में मै टिक नहीं पाऊंगा,, मैं तुम्हारी और बच्चे की जान खतरे में नहीं डालना चाहता था,, मना करने के लिए मुझे क्षमा कर दो,, और ये कहते-कहते पेड़ बह गया,,
किसी के इंकार को, हमेशा उनकी कठोरता न समझे,,
क्या पता उसके उसी इंकार से आप का भला हो,,
कौन किस परिस्थिति में है शायद हम नहीं समझ पाए,,
Adhyatam Ke Sutra
Dr Chinmay Pandya
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https://youtu.be/cWLiKhV9YiM
कौन किस परिस्थिति में है शायद हम नहीं समझ पाए,,
Adhyatam Ke Sutra
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👉 कर सकते थे, किया नहीं
रावण तथा विभीषण एक ही कुल में उत्पन्न हुए सगे भाई थे, दोनों विद्वान- पराक्रमी थे। एक ने अपनी दिशा अलग चुनी व दूसरे ने प्रवाह के विपरीत चलकर अनीति से टकराने का साहस किया। धारा को मोड़ सकने तक की क्षमता भगवान ने मनुष्य को दी ही इसलिए है ताकि वह उसका सहयोगी बन सके।
भगवान ने मनुष्य को इच्छानुसार वरदान माँगने का अधिकार भी दिया है। रावण शिव का भक्त था। उसने अपने इष्ट से वरदान सामर्थ्यवान होने का माँगा पर साथ ही यह भी कि मरूँ तो मनुष्य के हाथों। उसकी अनीति को मिटाने, उसका संहार करने के लिए स्वयं भगवान को राम के रूप में जन्म लेना पड़ा। राम शिव के इष्ट थे। यदि असाधारण अधिकार प्राप्त रावण प्रकाण्ड विद्वान् होते हुए भी अपने इष्ट भगवान शिव से सत्परामर्श लेना नहीं चाहता तो अन्त तो उसका सुनिशित होगा ही। यह भगवान का सहज रूप है जो मनुष्य को स्वतन्त्र इच्छा देकर छोड़ देता है।
जीव विशुद्ध रूप में जल की बूँद के समान इस धरती पर आता है। एक ओर जल की बूँद धरती पर गिरकर कीचड बन जाती हैं व दूसरी ओर जीव माया में लिप्त हो जाता है। यह तो जीव के ऊपर है जो स्वयं को माया से दूर रख समुद्र में पडी बूंद के आत्म विस्तरण की तरह सर्वव्यापी हो मेघ बनकर समाज पर परमार्थ की वर्षा करे अथवा कीचड़ में पड़ा रहे।
मनुष्य को इस विशिष्ट उपलब्धि को देने के बाद विधाता ने यह सोचा भी नहीं होगा कि वह ऊर्ध्वगामी नहीं उर्ध्वगामी मार्ग चुन लेगा। अन्य जीवों, प्राणियों का जहाँ तक सवाल है वे तो बस ईश्वरीय अनुशासन- व्यवस्था के अन्तर्गत अपना प्राकृतिक जीवनक्रम भर पूरा कर पाते हैं। आहार ग्रहण, विसर्जन- प्रजनन यही तक उनका जीवनोद्देश्य सीमित रहता है। परन्तु बहुसंख्य मानव ऐसे होते हैं जो इन्हीं की तरह जीवन बिताते और अदूरदर्शिता का परिचय देते सिर धुन- धुनकर पछताते देखे जाते हैं। इनकी तुलना चासनी में कूद पड़ने वाली मक्खी से की जा सकती है।
चासनी के कढाव को एक बारगी चट कर जाने के लिए आतुर मक्खी बेतरह उसमें कूदती है और अपने पर- पैर उस जंजाल में लपेट कर बेमौत मरती है। जबकि समझदार मक्खी किनारे पर बैठ कर धीरे- धीरे स्वाद लेती, पेट भरती और उन्मूक्त आकाश में बेखटके बिचरती है। अधीर आतुरता ही मनुष्य को तत्काल कुछ पाने के लिए उत्तेजित करती है और उतने समय तक ठहरने नहीं देती जिसमें कि नीतिपूर्वक उपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति सरलतापूर्वक सम्भव हो सके।
मछली वंशी में लिपटी आटे की गोली भर को देखती है। उसे उतना अवकाश या धीरज नहीं होता कि यह ढूँढ़- समझ सके कि इसके पीछे कहीं कोई खतरा तो नहीं है। घर बैठे हाथ लगा प्रलोभन उसे इतना सुहाता है कि गोली को निगलते ही बनता है। परिणाम सामने आने में देर नहीं लगती। काँटा आँतों में उलझता है और प्राण लेने के उपरान्त ही निकलता है।
📖 प्रज्ञा पुराण भाग १
Hamara Samarpan Kitna Ghara Hai
Dr Chinmay Pandya
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https://youtu.be/rtRzgdg1Wxk
भगवान ने मनुष्य को इच्छानुसार वरदान माँगने का अधिकार भी दिया है। रावण शिव का भक्त था। उसने अपने इष्ट से वरदान सामर्थ्यवान होने का माँगा पर साथ ही यह भी कि मरूँ तो मनुष्य के हाथों। उसकी अनीति को मिटाने, उसका संहार करने के लिए स्वयं भगवान को राम के रूप में जन्म लेना पड़ा। राम शिव के इष्ट थे। यदि असाधारण अधिकार प्राप्त रावण प्रकाण्ड विद्वान् होते हुए भी अपने इष्ट भगवान शिव से सत्परामर्श लेना नहीं चाहता तो अन्त तो उसका सुनिशित होगा ही। यह भगवान का सहज रूप है जो मनुष्य को स्वतन्त्र इच्छा देकर छोड़ देता है।
जीव विशुद्ध रूप में जल की बूँद के समान इस धरती पर आता है। एक ओर जल की बूँद धरती पर गिरकर कीचड बन जाती हैं व दूसरी ओर जीव माया में लिप्त हो जाता है। यह तो जीव के ऊपर है जो स्वयं को माया से दूर रख समुद्र में पडी बूंद के आत्म विस्तरण की तरह सर्वव्यापी हो मेघ बनकर समाज पर परमार्थ की वर्षा करे अथवा कीचड़ में पड़ा रहे।
मनुष्य को इस विशिष्ट उपलब्धि को देने के बाद विधाता ने यह सोचा भी नहीं होगा कि वह ऊर्ध्वगामी नहीं उर्ध्वगामी मार्ग चुन लेगा। अन्य जीवों, प्राणियों का जहाँ तक सवाल है वे तो बस ईश्वरीय अनुशासन- व्यवस्था के अन्तर्गत अपना प्राकृतिक जीवनक्रम भर पूरा कर पाते हैं। आहार ग्रहण, विसर्जन- प्रजनन यही तक उनका जीवनोद्देश्य सीमित रहता है। परन्तु बहुसंख्य मानव ऐसे होते हैं जो इन्हीं की तरह जीवन बिताते और अदूरदर्शिता का परिचय देते सिर धुन- धुनकर पछताते देखे जाते हैं। इनकी तुलना चासनी में कूद पड़ने वाली मक्खी से की जा सकती है।
चासनी के कढाव को एक बारगी चट कर जाने के लिए आतुर मक्खी बेतरह उसमें कूदती है और अपने पर- पैर उस जंजाल में लपेट कर बेमौत मरती है। जबकि समझदार मक्खी किनारे पर बैठ कर धीरे- धीरे स्वाद लेती, पेट भरती और उन्मूक्त आकाश में बेखटके बिचरती है। अधीर आतुरता ही मनुष्य को तत्काल कुछ पाने के लिए उत्तेजित करती है और उतने समय तक ठहरने नहीं देती जिसमें कि नीतिपूर्वक उपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति सरलतापूर्वक सम्भव हो सके।
मछली वंशी में लिपटी आटे की गोली भर को देखती है। उसे उतना अवकाश या धीरज नहीं होता कि यह ढूँढ़- समझ सके कि इसके पीछे कहीं कोई खतरा तो नहीं है। घर बैठे हाथ लगा प्रलोभन उसे इतना सुहाता है कि गोली को निगलते ही बनता है। परिणाम सामने आने में देर नहीं लगती। काँटा आँतों में उलझता है और प्राण लेने के उपरान्त ही निकलता है।
📖 प्रज्ञा पुराण भाग १
Hamara Samarpan Kitna Ghara Hai
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👉 Scientific Spirituality
Scientific spirituality is a virtuous fusion of scientific outlook and spiritual vision. In the scientific attitude, there is no place for prejudice, traditions, superstitions or dogma. Herein only those thoughts and actions are honored that are logical, appropriate and aim at investigating the truth. Instead of a convention or tradition, only the results of experimental findings are considered authentic. In short, the scientific outlook relies more on discernment than tradition. The seer of Manduka Upnishada declares the same as ‘Satyameva Jayate’ (meaning -Truth alone triumphs).
This scientific outlook is perfected by the refined perception of the spiritual values of life. It is this perception that gives birth to all kinds of noble virtues. Wherever this perception is absent, nobility will also be absent there. Sometimes, due to confusion, the truth and this kind of inner vision are considered irreconcilably opposite. Truth and intuitive vision, like science and spirituality, are not opposite but complementary to each other. The truth makes the perception resolute and the perception makes truth purposeful.
The continuity of the experiments of scientific spirituality keeps the life busy in finding truth without losing the intuitive awareness of reality. It maintains a balance between the genius of a scientist and the intuition of a saint present in a human being. If this practice
Chota Sankalp Bhi Kese Bada Ho Sakta Hai
Dr Chinmay Pandya
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https://youtu.be/h7gipKIQeXQ
This scientific outlook is perfected by the refined perception of the spiritual values of life. It is this perception that gives birth to all kinds of noble virtues. Wherever this perception is absent, nobility will also be absent there. Sometimes, due to confusion, the truth and this kind of inner vision are considered irreconcilably opposite. Truth and intuitive vision, like science and spirituality, are not opposite but complementary to each other. The truth makes the perception resolute and the perception makes truth purposeful.
The continuity of the experiments of scientific spirituality keeps the life busy in finding truth without losing the intuitive awareness of reality. It maintains a balance between the genius of a scientist and the intuition of a saint present in a human being. If this practice
Chota Sankalp Bhi Kese Bada Ho Sakta Hai
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👉 तृष्णाएँ छोड़ो
कामनाएँ पूर्ण होने पर भी संतोष नहीं होता, वरन् पहले से भी और अधिक प्यास बढ़ती है। कहते हैं कि मनुष्य अपूर्ण हैं, किंतु यदि वह अपनी वासनाएँ छोड़ दे, तो इसी जीवन में पूर्ण हो सकता है। तृष्णा एक बंधन है, जो आत्मा को जन्म-मरण के जाल में जकड़े हुए हैं। जिसे सांसारिक वस्तुओं की तृष्णा हरदम सताती रहती है, भला वह भवबंधनों से किस प्रकार पार हो सकेगा? प्रपंच का फेरा तभी तब है जब तक कि विभिन्न प्रकार की इच्छाओं ने प्राणी को बाँध रखा है।
जिन्हें मुक्ति की आकांक्षा है, जिन्हें पूर्ण सत्य की खोज करनी है, उनके लिए सर्वोत्तम साधन यह है कि अपनी इच्छा को वश में करें। इस संसार में संतोष से बढ़ कर और कोई धन नहीं है। स्वर्ग में भी कोई संपदा इसकी समता नहीं कर सकती। कोई मनुष्य देखने में कितना ही स्वाधीन क्यों न प्रतीत हो, पर वह बेचारा वास्तव में एक कैदी के समान है, जिसके मन में तृष्णा का डेरा पड़ा हुआ है। चाहे वह कितना ही बड़ा धनी क्यों न हो, भिखारी से ही उसकी तुलना की जा सकती है।
यदि तुम संसार में कुछ श्रेष्ठ कर्म करना चाहते हो तो आवश्यक है कि तृष्णा और वासनाओं का परित्याग कर दो। कर्म करो, अपने कर्त्तव्य में त्रुटि मत रखो, परंतु फल के लिए प्यासे मत फिरो। जो करेगा उसे मिलेगा, किंतु जो पाने के लिए व्याकुल फिरेगा, उसे आपत्तियों के पहाड़ सिर पर उठाने पड़ेंगे।
📖 अखण्ड ज्योति -मार्च 1942
Bachho Jaisa Jivan Jiye
Dr Pranav Pandya
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https://youtu.be/282b7qWexVs
जिन्हें मुक्ति की आकांक्षा है, जिन्हें पूर्ण सत्य की खोज करनी है, उनके लिए सर्वोत्तम साधन यह है कि अपनी इच्छा को वश में करें। इस संसार में संतोष से बढ़ कर और कोई धन नहीं है। स्वर्ग में भी कोई संपदा इसकी समता नहीं कर सकती। कोई मनुष्य देखने में कितना ही स्वाधीन क्यों न प्रतीत हो, पर वह बेचारा वास्तव में एक कैदी के समान है, जिसके मन में तृष्णा का डेरा पड़ा हुआ है। चाहे वह कितना ही बड़ा धनी क्यों न हो, भिखारी से ही उसकी तुलना की जा सकती है।
यदि तुम संसार में कुछ श्रेष्ठ कर्म करना चाहते हो तो आवश्यक है कि तृष्णा और वासनाओं का परित्याग कर दो। कर्म करो, अपने कर्त्तव्य में त्रुटि मत रखो, परंतु फल के लिए प्यासे मत फिरो। जो करेगा उसे मिलेगा, किंतु जो पाने के लिए व्याकुल फिरेगा, उसे आपत्तियों के पहाड़ सिर पर उठाने पड़ेंगे।
📖 अखण्ड ज्योति -मार्च 1942
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शनिवार, 9 फ़रवरी 2019
👉 बेटे की शादी में केवल 18 हजार रुपये खर्च करेंगे आईएएस अधिकारी
हाइलाइट्स
IAS अधिकारी पी. बसंत कुमार बेटे की शादी में खर्च करेंगे 18 हजार
बेटी की शादी में मात्र 16 हजार तथा अपनी में ढाई हजार किया था खर्च
बैंक मैनेजर है बेटा और वधू डॉक्टर, दोनों पक्ष करेंगे 18-18 हजार खर्च
शोऑफ के इस जमाने में जहां सामान्य परिवार भी शादियों में लाखों रुपये खर्च करने से नहीं चूकते हैं, वहीं आंध्र प्रदेश के एक आईएएस अधिकारी अपने बेटे की शादी में मात्र 18 हजार रुपये खर्च करने जा रहे हैं। बसंत कुमार नामक अधिकारी ने अपनी शादी में भी ढाई हजार रुपये का ही खर्च किया था।
विशाखापत्तनम मेट्रोपॉलिटन रीजन डिवेलपमेंट अथॉरिटी (वीएमआरडीए) के आयुक्त पटनाला बसंत कुमार अपने बेटे की शादी पर सिर्फ 18 हजार रुपये खर्च करेंगे। पटनाला के बेटे की शादी 10 फरवरी को होनी है। बेटे अभिनव बैंक मैनेजर हैं, जबकि वधू लावन्या पेशे से डॉक्टर हैं। हमारे सहयोगी टीओआई से बातचीत में उन्होंने बताया, 'यह मेरे सहयोगियों, राधा स्वामी सत्संग सभा के सदस्यों तथा अन्य लोगों के सहयोग से ही संभव हुआ है।'
उन्होंने बताया, 'राधा स्वामी सत्संग का फॉलोअर होने की वजह से मैं बेटे की शादी में 18 हजार से अधिक की राशि खर्च नहीं कर सकता था। शादी में वर और वधू दोनों के परिवार 18 हजार रुपये प्रत्येक खर्च वहन करेंगे, जिसमें अतिथियों का दोपहर का भोज भी शामिल है। दोनों पक्ष मिलाकर 100 से अधिक गेस्ट नहीं होंगे। खाने-पीने पर भी 15 से 20 रुपये प्रति प्लेट का खर्च किया जाएगा। पुजारी को एक हजार रुपये दिए जाएंगे।'
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के राज्यपाल ई.एस.एल नरसिम्हन शुक्रवार को एक सादे समारोह में जोड़े को आशीर्वाद देंगे। बसंत कुमार ने 2017 में अपनी बेटी की शादी भी इसी सादगी के साथ सिर्फ 16,100 रुपये में की थी।
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026
शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...


















