गुरुवार, 3 जनवरी 2019

👉 सावित्रीबाई फुले

पूरा नाम    –   सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले
जन्म        –   3 जनवरी 1831
जन्मस्थान   –  नायगांव, महाराष्ट
पिता        –   खंडोजी नावसे पाटिल
माता        –   लक्ष्मीबाई
विवाह       –   ज्योतिराव फुले

सावित्रीबाई फुले का जन्म महाराष्ट्र के नायगांव में 1831 को हुआ था. उनके परिवार में सभी खेती करते थे. 9 साल की आयु में ही उनका विवाह 1840 में 12 साल के ज्योतिराव फुले से हुआ. सावित्रीबाई और ज्योतिराव को दो संताने है. जिसमे से यशवंतराव को उन्होंने दत्तक लिया है जो एक विधवा ब्राह्मण का बेटा था।

सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले भारतीय समाजसुधारक और कवियित्री थी. अपने पति, ज्योतिराव फुले के साथ उन्होंने भारत में महिलाओ के अधिकारो को बढ़ाने में महत्वपूर्ण काम किये है. उन्होंने 1848 में पुणे में देश की पहली महिला स्कूल की स्थापना की. सावित्रीबाई फुले जातिभेद, रंगभेद और लिंगभेद के सख्त विरोध में थी।

सावित्रीबाई एक शिक्षण सुधारक और समाज सुधारक दोनों ही तरह का काम करती थी. ये सभी काम वह विशेष रूप से ब्रिटिश कालीन भारत में महिलाओ के विकास के लिये करती थी. 19 वि शताब्दी में कम उम्र में ही विवाह करना हिन्दूओ की परंपरा थी. इसीलिये उस समय बहोत सी महिलाये अल्पायु में ही विधवा बन जाती थी, और धार्मिक परम्पराओ के अनुसार महिलाओ का पुनर्विवाह नही किया जाता था. 1881 में कोल्हापुर की गज़ेटि में ऐसा देखा गया की विधवा होने के बाद उस समय महिलाओ को अपने सर के बाल काटने पड़ते थे, और बहोत ही साधारण जीवन जीना पड़ता था।

सावित्रीबाई और ज्योतिराव ऐसी महिलाओ को उनका हक्क दिलवाना चाहते थे. इसे देखते हुए उन्होंने नाईयो के खिलाफ आंदोलन करना शुरू किया और विधवा महिलाओ को सर के बाल कटवाने से बचाया।

उस समय महिलाओ को सामाजिक सुरक्षा न होने की वजह से महिलाओ पर काफी अत्याचार किये जाते थे, जिसमे कही-कही तो घर के सदस्यों द्वारा ही महिलाओ पर शारीरिक शोषण किया जाता था. गर्भवती महिलाओ का कई बार गर्भपात किया जाता था, और बेटी पैदा होने के डर से बहोत सी महिलाये आत्महत्या करने लगती।

एक बार ज्योतिराव ने एक महिला को आत्महत्या करने से रोका, और उसे वादा करने लगाया बच्चे के जन्म होते ही वह उसे अपना नाम दे. सावित्रीबाई ने भी उस महिला और अपने घर रहने की आज्ञा दे दी और गर्भवती महिला की सेवा भी की. सावित्रीबाई और ज्योतिराव ने उस बच्चे को अपनाने के बाद उसे यशवंतराव नाम दिया. यशवंतराव बड़ा होकर डॉक्टर बना. महिलाओ पर हो रहे अत्याचारो को देखते हुए सावित्रीबाई और ज्योतिराव ने महिलाओ की सुरक्षा के लिये एक सेंटर की स्थापना की, और अपने सेंटर का नाम “बालहत्या प्रतिबंधक गृह” रखा. सावित्रीबाई महिलाओ की जी जान से सेवा करती थी और चाहती थी की सभी बच्चे उन्ही के घर में जन्म ले।

घर में सावित्रीबाई किसी प्रकार का रंगभेद या जातिभेद नही करती थी वह सभी गर्भवती महिलाओ का समान उपचार करती थी।
सावित्रीबाई फुले 19 वि शताब्दी की पहली भारतीय समाजसुधारक थी और भारत में महिलाओ के अधिकारो को विकसित करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

सावित्रीबाई फुले और दत्तक पुत्र यशवंतराव ने वैश्विक स्तर 1897 में मरीजो का इलाज करने के लिये अस्पताल खोल रखा था. उनका अस्पताल पुणे के हडपसर में सासने माला में स्थित है. उनका अस्पताल खुली प्राकृतिक जगह पर स्थित है. अपने अस्पताल में सावित्रीबाई खुद हर एक मरीज का ध्यान रखती, उन्हें विविध सुविधाये प्रदान करती. इस तरह मरीजो का इलाज करते-करते वह खुद एक दिन मरीज बन गयी. और इसी के चलते 10 मार्च 1897 को उनकी मृत्यु हो गयी।

सावित्रीबाई पूरे देश की महानायिका हैं. हर बिरादरी और धर्म के लिये उन्होंने काम किया. जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर तक फैंका करते थे. सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं. अपने पथ पर चलते रहने की प्रेरणा बहुत अच्छे से देती हैं।

उनका पूरा जीवन समाज में वंचित तबके खासकर महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष में बीता. उनकी एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है जिसमें वह सबको पढ़ने लिखने की प्रेरणा देकर जाति तोड़ने की बात करती है:-

जाओ जाकर पढ़ो-लिखो, बनो आत्मनिर्भर,
बनो मेहनती
काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो
ज्ञान के बिना सब खो जाता है, ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है
इसलिए, खाली ना बैठो, जाओ, जाकर शिक्षा लो
तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है,
इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो.

👉 बोल तु मीठे बोल:-

दास प्रथा के दिनों में एक मालिक के पास अनेकों गुलाम हुआ करते थे। उन्हीं में से एक था लुक़मान। लुक़मान था तो सिर्फ एक गुलाम लेकिन वह बड़ा ही चतुर और बुद्धिमान था। उसकी ख्याति दूर दराज़ के इलाकों में फैलने लगी थी।

एक दिन इस बात की खबर उसके मालिक को लगी। मालिक ने लुक़मान को बुलाया और कहा- “सुनते हैं, कि तुम बहुत बुद्धिमान हो। मैं तुम्हारी बुद्धिमानी की परीक्षा लेना चाहता हूँ। अगर तुम इम्तिहान में पास हो गए तो तुम्हें गुलामी से छुट्टी दे दी जाएगी।

अच्छा जाओ, एक मरे हुए बकरे को काटो और उसका जो हिस्सा बढ़िया हो, उसे ले आओ।“ लुक़मान ने आदेश का पालन किया और मरे हुए बकरे की जीभ लाकर मालिक के सामने रख दी। कारण पूछने पर कि जीभ ही क्यों लाया ! लुक़मान ने कहा- “अगर शरीर में जीभ अच्छी हो तो सब कुछ अच्छा-ही-अच्छा होता है।“

मालिक ने आदेश देते हुए कहा- “अच्छा! इसे उठा ले जाओ और अब बकरे का जो हिस्सा बुरा हो उसे ले आओ।”

लुक़मान बाहर गया, थोड़ी ही देर में उसने उसी जीभ को लाकर मालिक के सामने फिर रख दिया। फिर से कारण पूछने पर लुक़मान ने कहा- “अगर शरीर में जीभ अच्छी नहीं तो सब बुरा-ही-बुरा है।"

उसने आगे कहते हुए कहा- “मालिक! वाणी तो सभी के पास जन्मजात होती है, परन्तु बोलना किसी-किसी को ही आता है…क्या बोलें? कैसे शब्द बोलें, कब बोलें.. इस एक कला को बहुत ही कम लोग जानते हैं। एक बात से प्रेम झरता है और दूसरी बात से झगड़ा होता है।

कड़वी बातों ने संसार में न जाने कितने झगड़े पैदा किए हैं। इस जीभ ने ही दुनिया में बड़े-बड़े कहर ढाए हैं। जीभ तीन इंच का वो हथियार है जिससे कोई छः फिट के आदमी को भी मार सकता है तो कोई मरते हुए इंसान में भी प्राण फूंक सकता है। संसार के सभी प्राणियों में वाणी का वरदान मात्र मानव को ही मिला है। उसके सदुपयोग से स्वर्ग पृथ्वी पर उतर सकता है और दुरूपयोग से स्वर्ग भी नरक में परिणत हो सकता है। भारत के विनाशकारी महाभारत का युद्ध वाणी के गलत प्रयोग का ही परिणाम था। “

मालिक, लुक़मान की बुद्धिमानी और चतुराई भरी बातों को सुनकर बहुत खुश हुए; आज उनके गुलाम ने उन्हें एक बहुत बड़ी सीख दी थी और उन्होंने उसे आजाद कर दिया।

मित्रों, मधुर वाणी एक वरदान है जो हमें लोकप्रिय बनाती है वहीँ कर्कश या तीखी बोली हमें अपयश दिलाती है और हमारी प्रतिष्ठा को कम करती है। आपकी वाणी कैसी है? यदि वो तीखी है या सामान्य भी है तो उसे मीठा बनाने का प्रयास करिये। आपकी वाणी आपके व्यत्कित्व का प्रतिबिम्ब है, उसे अच्छा होना ही चाहिए।

👉 आज का सद्चिंतन 3 Jan 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Jan 2019


👉 आत्मचिंतन के क्षण 3 Jan 2019

◾ किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो।

स्वामी विवेकानन्द

◾ आदर्श विहीन उस नाविक की तरह है जिसने बिना पतवार के गहन तूफान में अपनी नाव खोल दी हो। उसे यह ज्ञान नहीं कि किधर जाना है? लक्ष प्राप्त करने के लिए हमें किसी आध्यात्मिक गुरु की स्थापना अवश्य करनी चाहिए।

◾ कुछ व्यक्ति सोचते हैं, “हमें कौन पूछने वाला है? हम किस गणना में हैं? हमसे क्या होना जाना है?” इस प्रकार मनःस्थिति से वे अपनी तुच्छता तथा हीनता की कुत्सित ग्रन्थि को और सुदृढ़ करते हैं और कायरता दब्बूपन तथा घोर निराशा में निरत रहते हैं

◾ लेखों और भाषणों का युग अब बीत गया। गाल बजाकर लम्बी चौड़ी डींग हाँक कर या बड़े बड़े कागज काले करके संसार के सुधार की आधा करना व्यर्थ है। इन साधनों से थोड़ी मदद मिल सकती है, पर उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। संसार को सुधारने का प्रधान साधन यही हो सकता है कि हम अपना मानसिक स्तर ऊँचा उठायें, चरित्रात्मक दृष्टि से अपेक्षाकृत उत्कृष्ट बनें। अपने आचरण से ही दूसरों को प्रभावशाली शिक्षा दी जा सकती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपना मूल्याँकन, आप कीजिये (भाग 2)

जीवन में कई बार अनपेक्षित परिस्थितियाँ आती हैं, जिनके कारण अपने प्रति विश्वास डगमगाने लगता है और व्यक्ति उन परिस्थितियों में किंकर्तव्य विमूढ़ होकर उपलब्ध साधनों का उपयोग करने में संकोच करने लगता है अथवा यह सोचने लगता है कि वह इन साधनों के योग्य नहीं है। एक घटना नैपोलियन के सम्बन्ध में विख्यात है, उसका एक सैनिक अपने सेनापति के पास कोई महत्वपूर्ण सन्देश लेकर भेजा गया था। सन्देश इतना महत्वपूर्ण था कि जितना जल्दी हो सके उसे पहुँचाना और उसका उत्तर लेकर तुरन्त वापस आना आवश्यक था। सौंपे गये दायित्व को तत्परता से पूरा करने के लिए उस सैनिक ने अपना घोड़ा इतनी तेजी से दौड़ाया कि गंतव्य स्थल पर पहुँचते ही उसने दम तोड़ दिया।

नैपोलियन ने उसकी कर्तव्यनिष्ठा को सराहा तथा पत्र का उत्तर लेकर उसी शीघ्रता से जाने के लिए कहा लेकिन सैनिक का घोड़ा तो मर चुका था। नैपोलियन को यह मालूम था। सैनिक को असमंजस में देखकर वह बोला, यह लो मेरा घोड़ा और जल्दी से यह उत्तर ले जाओ।’ सैनिक भौंचक्का होकर अपने सेनापति की ओर देखने लगा। उसने कहा, ‘लेकिन श्रीमान्...........’ सैनिक ने यह दो शब्द ही कहे थे कि नैपोलियन बीच में टोकते हुए बोला, ‘मैं जानता हूँ तुम क्या कहना चाहते हो? पर याद रखो कि दुनिया का कोई भी घोड़ा ऐसा नहीं है, जिसकी सवारी तुम न कर सको।

घटना छोटी-सी है, पर उन सभी लोगों के लिए लागू होती है जो स्वयं को किसी महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए अयोग्य समझते हैं। दुनिया उस सिपाही जैसे असंख्य लोगों से भरी पड़ी है जो यह सोचते हैं कि अधिकांश सुख उनकी पहुँच से बाहर है। इस सम्बन्ध में एक विचारक का कथन है कि, ‘दुनिया के कई लोग अपने आपको उन सौभाग्यशाली लोगों से अलग समझते हैं जो महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त कर चुके हैं। ऐसा सोचना कितना हानिकारक है, इसका अनुमान सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि ऐसे विचार मात्र व्यक्ति को कई ऊँचाइयों पर पहुँचने से रोक देते हैं। अपने आपको बौना समझने वाला व्यक्ति देवता कैसे बन सकता है?”

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1981 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1981/January/v1.13

👉 माला की जरूरत है।

अक्सर यह कहा जाता है कि- ’माला जपने की क्या जरूरत है? मन से जप करना ही पर्याप्त है।’ यह ठीक है, कि जप का सीधा सम्बन्ध मन से ही है, यदि मन में जप की एकाग्र भावनाएं न हों तो केवल माला के मनके सरकाना कुछ अर्थ नहीं रखता। सिर खुजलाते रहना या ऐसा जप करते रहना, बराबर ही कहा जायगा।

लेकिन जो लोग सच्चे मन से जप करना चाहते हैं, उनके लिये माला एक उपयोगी और आवश्यक साधन है! घास खोदने वाला यदि चाहे तो उंगलियों से भी घास उखाड़ता रह सकता है, पर उसे अपना काम सुव्यवस्थित, जल्दी और सुविधापूर्वक करना है तो हंसिया या खुरपी की सहायता लेनी पड़ेगी। ठीक इसी प्रकार माला की जरूरत है। सब कोई जानते हैं कि चित्त का स्वभाव चंचल है स्वभावतः वह एक जगह पर नहीं टिकता। अभी यहाँ है तो अभी उड़कर कहीं दूसरी जगह चला जायगा। उसे एक जगह पर बराबर जोते रहने के लिये एक भौतिक प्रक्रिया की आवश्यकता है और वह प्रक्रिया माला के रूप में हम लोग प्रयोग करते हैं।

शरीर की बाह्य क्रियाओं पर मन का कुछ न कुछ भाग अवश्य लगा रहता है। जैसे चाकू से कलम बनावे तो उसे मन किसी दूसरी कल्पना में जा सकता है, पर उसका अधिक भाग कलम बनाने की क्रिया में अवश्य उलझा रहेगा। इसी प्रकार केवल मन ही मन में जप करने पर चित्त दूसरी जगह उड़ जा सकता है। पर मुख से मन्त्र उच्चारण करने एवं हाथ से माला जपने की शक्ति न होने मन का कुछ न कुछ भाग भजन में जरूर उलझा रहेगा। पूर्ण अभ्यासियों को समाधि आनन्द लेते समय भले ही उसकी आवश्यकता न हो, परन्तु निश्चय ही आरम्भिक साधकों के लिये तो माला जपना आवश्यक है।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1943 पृष्ठ 14

👉 Enrich Your Heart

Great personalities do not accumulate wealth, neither do they desire for it; because, they have a generous heart full of a treasure that is bigger than that of Kuber (the God of wealth). It is said that there is no place for the one who is poor (miser) at heart; if there is no compassion in one’s heart, he will have no abode (of peace) – neither in this world, nor in the sublime world beyond… A materialistically poor man may have many chances of getting wealthy but the one whose heart is merciless will remain a beggar who will get scorn from everywhere.

Who can be a follower of truth and sainthood? Who is worthy of seeing God? The one, whose heart pulsates with generosity and love… Harsh, dry-hearted, cruel ones are infirm, they are impaired despite having healthy body, mind and resourceful life; they won’t be able to enjoy even the nectar kept in their closed vicinity. ‘O’ tyrants, just think before terrorizing others! What will happen the day when you will be in the place of your victims? Why be blinded by selfish passions, ego and follow apathy? You will have to bear the painful retribution life after life…Mother earth is a witness to this law of eternity; sooner or later the sinners have to face the dreadful punishments of the hell right here. Therefore, be gentle, sensitive, kind and helpful to others.

Those who possess the light of compassion in their hearts will never wander in the dark. So open your eyes to look inside and illumine your heart with the glow of kindness. Be considerate and compassionate to every one around you.

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1942

👉 दूसरों पर दया करो

महान् पुरुषों के पास पैसा नहीं होता और न वे उसकी इच्छा करते हैं, क्योंकि दया से लबालब भरा हुआ हृदय उनके पास कुबेर के भंडार की तरह मौजूद रहता है। कहते हैं कि इस दुनिया में गरीब का कोई ठिकाना नहीं। निश्चय समझो, परलोक में उनका कोई ठिकाना न होगा, जिनके मन में दया नहीं है। दरिद्र मनुष्य एक दिन संपन्न हो सकता है, परंतु वह भिखमंगा इसी तरह दर-दर पर दुत्कार खाता फिरेगा, जिसका हृदय दया से रहित है। सत्य को कौन प्राप्त करेगा?

ईश्वर के दर्शन कौन करेगा? वह, जिसके हृदय में दया है। निर्दयी मनुष्य तो अपाहिज हैं, वे अपनी बगल में रखे हुए उत्तमोत्तम पदार्थों को भी न ले सकेंगे। अरे ओ निर्दयी मनुष्यों, ठहरो! दूसरों को सताने से पहले जरा सोचो तो सही कि जब इसी तरह तुम भी सताए जाओगे तब तुम्हारी क्या दशा होगी! दया का परित्याग करके क्रूरता और पाप के पथ पर आरूढ़ क्यों होते हो? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि इन दुष्ट कर्मों का फल तुम्हें जन्म-जन्मांतरों तक घुट-घुट कर भुगतना पड़ेगा? धरती माता साक्षी हैं कि नारकीय यंत्रणाएँ पापियों के लिए ही हैं, दयालुओं के लिए नहीं।

जिनके हृदय में दया है, वे अंधकार में न भटकेंगे। इसलिए ऐ आँख वाले! देखो और अपने मन में दया को स्थान दो। दूसरों के साथ दयालुता का व्यवहार करो।

📖 अखण्ड ज्योति -फरवरी 1942 पृष्ठ 19

बुधवार, 2 जनवरी 2019

👉 समोसे वाला

एक बडी कंपनी के गेट के सामने एक प्रसिद्ध समोसे की दुकान थी, लंच टाइम मे अक्सर कंपनी के कर्मचारी वहाँ आकर समोसे खाया करते थे।

एक दिन कंपनी के एक मैनेजर समोसे खाते खाते समोसे वाले से मजाक के मूड मे आ गये।

मैनेजर साहब ने समोसे वाले से कहा, "यार गोपाल, तुम्हारी दुकान तुमने बहुत अच्छे से maintain की है, लेकीन क्या तुम्हे नही लगता के तुम अपना समय और टैलेंट समोसे बेचकर बर्बाद कर रहे हो.? सोचो अगर तुम मेरी तरह इस कंपनी मे काम कर रहे होते तो आज कहा होते.. हो सकता है शायद तुम भी आज मैंनेजर होते मेरी तरह.."

इस बात पर समोसेवाले गोपाल ने बडा सोचा, और बोला, " सर ये मेरा काम आपके काम से कही बेहतर है, 10 साल पहले जब मै टोकरी मे समोसे बेचता था तभी आपकी जाॅब लगी थी, तब मै महीना हजार रुपये कमाता था और आपकी पगार थी 10 हजार।

इन 10 सालो मे हम दोनो ने खूब मेहनत की..
आप सुपरवाइजर से मॅनेजर बन गये.
और मै टोकरी से इस प्रसिद्ध दुकान तक पहुँच गया.
आज आप महीना 50,000 कमाते है
और मै महीना 2,00,000

लेकिन इस बात के लिए मै मेरे काम को आपके काम से बेहतर नही कह रहा हूँ।

ये तो मै बच्चों के कारण कह रहा हूँ।

जरा सोचिए सर मैने तो बहुत कम कमाई पर धंधा शुरू किया था, मगर मेरे बेटे को यह सब नही झेलना पडेगा।

मेरी दुकान मेरे बेटे को मिलेगी, मैने जिंदगी मे जो मेहनत की है, वो उसका लाभ मेरे बच्चे उठाएंगे। जबकी आपकी जिंदगी भर की मेहनत का लाभ आपके मालिक के बच्चे उठाएंगे।

अब आपके बेटे को आप डाइरेक्टली अपनी पोस्ट पर तो नही बिठा सकते ना.. उसे भी आपकी ही तरह जीरो से शुरूआत करनी पडेगी.. और अपने कार्यकाल के अंत मे वही पहुच जाएगा जहाँ अभी आप हो।

जबकी मेरा बेटा बिजनेस को यहा से और आगे ले जाएगा..
और अपने कार्यकाल मे हम सबसे बहुत आगे निकल जाएगा..

अब आप ही बताइये किसका समय और टैलेंट बर्बाद हो रहा है ?"

मैनेजर साहब ने समोसे वाले को 2 समोसे के 20 रुपये दिये और बिना कुछ बोले वहाँ से खिसक लिये.......!!!

👉 आज का सद्चिंतन 2 Jan 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Jan 2019


👉 Not run away from challenges

One day, Swami Vivekananda was returning from temple of Ma Kali. On the path, Swamiji saw a number of monkeys who were not allowing him to pass through it. Whenever Swamiji would take a step forward, those monkeys would make a lot of noise and make angry face, showing their anger by shrieking near his feet.

As Swami Vivekananda took a step forward, monkeys got close to him. Swamiji began to run and the monkeys started chasing him. Faster Swamiji ran, bolder monkey got and tried to catch him and bite him.
Just then an old Sanyasi shouted from a distance, "Face them…"

Those words brought Swamiji to senses and he stopped running. He turned back to boldly face them. As soon as Swamiji did that, the monkeys ran away and left.

Moral: We should not run away from challenges; instead we should face them boldly.

👉 आत्मवत् सर्व भूतेषु

यदि हम अपने से चन्द सवाल पूछें और जो उत्तर उन सवालों का हम दूसरों के लिए दें, उन्हें ही अपने ऊपर लागू करें तो हमें सच्चे नागरिक बनने में देर न लगे। यदि मुझ से कोई वस्तु माँग ले जाय तो मैं यह चाहता हूँ या नहीं, कि वह वापिस मिल जाय और वैसी ही अच्छी हालत में जिस हालत में मैंने दी थी? यदि मुझसे किसी ने कोई वायदा किया है तो मैं चाहता हूँ या नहीं, कि वह ठीक तरह से समय पर उसे पूरा करे? यदि मैं सड़क पर चलता हूँ तो मैं चाहता हूँ या नहीं, कि किसी के फेंके हुए केले के छिलके से मैं फिसल न पड़ूं और यदि फिसल पड़ूं तो कोई मेरी सहायता कर मुझे उठा दे और मेरी फिक्र करे न कि मेरा उपहास? मैं चाहता हूँ या नहीं, कि यदि मेरा बच्चा कहीं रास्ता भूल गया हो तो उसे कोई मेरे घर पहुँचा दे और उसे इधर-उधर भटकता न छोड़ दे? यदि मैं किसी सभा में जा रहा हूँ, तो मैं चाहता हूँ या नहीं, कि लोग इस प्रकार बैठे हों, कि मुझे भीतर जाकर बैठने की जगह हो और व्यर्थ एक तरफ भीड़ और दूसरी तरफ कुर्सियाँ खाली न हों? यदि किसी के घर मेरा निमन्त्रण है तो मैं चाहता हूँ या नहीं, कि मेरे पहिले पहुँचने वाले लोगों ने जूता इस तरह उतारा हो कि मुझे भी अपने जूतों को रखने की जगह मिल जाय?

थोड़े में यदि हम सदा यह याद रखें, कि जो हम दूसरों से अपने लिए चाहते हैं, वही दूसरे हम से चाहते हैं, जिससे उन्हें भी आराम और आशाइश मिले और यदि हम उसी के अनुसार कार्य करें तो हम सच्चे और अच्छे नागरिक फौरन बन सकते हें। चाहे हम कितने ही छोटे आदमी क्यों न हों, हम भी काफी हिस्सा देश के लिए सच्चा स्वराज्य प्राप्त करने में ले सकते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार है कि वह आशा रखे कि उसके प्रति जो समुचित कर्तव्य दूसरों का है, वे उसका पालन करेंगे। जब हम सड़क पर चलते हैं, तो हमें इसका अधिकार है कि हमको समुचित सुविधा अन्य सब चलने वालों से मिले। पर हमको सदा भय रहता है कि हम पर कोई अपने मकान के ऊपर से कूड़ा फेंक देगा, कोई केले का छिलका इस तरह से फेंकेगा, कि हम उस पर से फिसल कर गिर जायेंगे, कोई साहब आगे से छाता इस तरह से कन्धे पर रखकर चलते होंगे, कि हमारी आँख में उसकी नोंक चुभ जायगी। ऐसा ही भय हम से अन्य भाइयों को रहता है। मेरी तो दृढ़ भावना है, कि जो केले का छिलका सड़क पर फेंकता है, या ठीक तरह से छाता लेकर नहीं चलता, वह स्वराज्य के रास्ते में रोड़ा अटकाता है और स्वराज्य के आने में देर कराता है।

रेल पर चलने वालों का भी यही अनुभव है कि खिड़की के बाहर न थूक कर लोग डब्बे के भीतर थूकते हैं, खाने-पीने के सकोरे पत्तल बाहर न फेंक, भीतर ही छोड़ देते हैं, जिससे दूसरे मुसाफिरों को तकलीफ होती है। जगह रहते भी रात को जो मुसाफिर गाड़ी में आते हैं, वे व्यर्थ ही इतना शोर मचाते हैं, दरवाजा इतने जोर से खोलते बन्द करते हैं, कि दूसरों को बेमतलब कष्ट पहुँचता है। कोई किसी को भीतर नहीं आने देता, आये हुए लोगों को बैठने नहीं देता, स्वयं उतरते समय दरवाजा खुला छोड़ जाता है। यदि हम केवल यह छोटा सा उसूल सदा याद रखें, कि हमें भी दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिए जैसा हम चाहते हैं कि दूसरे हमारे साथ करें, तो हम ऐसी भूल न करेंगे जिसके कारण हम भरोसे के योग्य नहीं रह जाते।

अखण्ड ज्योति मार्च 1943 पृष्ठ 7

👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 Jan 2019

◾ अपनी सफलता को ऐतिहासिक स्त्री पुरुषों के कार्यों से तुलना करके नम्रता सीखो। ऊँट तभी तक अपने को ऊँचा समझता है, जब तक पहाड़ के नीचे नहीं आता। अपने से बड़े प्रसिद्ध पुरुषों से मिलते जुलते रहते का उद्योग करो। इस प्रकार की मित्रता आपको अत्यन्त प्रभाव पूर्ण नम्रता की शिक्षा देगी।

◾ आपके शरीर का रचयिता कोई दूसरा नहीं है, आप स्वयं अपने शरीर के रचयिता हैं। आपके भाग्य का रचयिता कोई दूसरा नहीं है अपने भाग्य के विधाता आप स्वयं हैं। विधाता के वचन में जो शक्ति है वही आपके वचन में हैं। विश्वास के साथ जो कहियेगा अवश्य पूरा होगा।

◾ जो वस्तु जितनी ही उत्तम है वह उतने ही कठिन प्रयास से मिलती है। जिनमें दृढ़ता, साहस, पौरुष, पराक्रम लगन की परिश्रम शीलता है वे ही इस सम्पदा के अधिकारी होते हैं। साधना से सिद्धि मिलती है। जो लोग एकाग्रता पूर्वक अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहते हैं वे ही विजयीश्री को प्राप्त करते हैं।

◾ किसी भूल अथवा बुरे काम के संबंध में पश्चाताप करना उत्तम है, लेकिन यह तारक होना चाहिए। भविष्य में ऐसा न करने का संकल्प करके सदैप उससे बचते रहने का प्रयत्न करना, ऐसे वातावरण, संग-साथ एवं साधनों से दूर रहना जो बुराई की ओर प्रवृत्त करें, इसके लिए आवश्यक होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपना मूल्याँकन, आप कीजिये (भाग 1)

एक साधारण परिवार में पल कर अपनी योग्यता, लगन व पुरुषार्थ के बल पर बैजापिनडिजरायली ब्रिटेन के पार्लियामेंट में सदस्य चुने गए, तो धनी परिवार से आये साँसद उन्हें बड़ी उपेक्षा से देखने लगे। न जाने क्यों पुराने सांसद उन्हें अपने पास तक नहीं फटकने देते। शायद इसलिए कि डिजरायली का वेष विन्यास अथवा रहन-सहन राजसी नहीं था। वे साधारण वस्त्र पहनते और गरीब लोगों की तरह रहते। अर्थ प्रधान दृष्टिकोण वाले लोग गरीब व्यक्ति का क्यों कर सम्मान करते? उलटे उनके साथी साँसद उनकी इतनी उपेक्षा करते कि जब वे सदन में बोलने के लिए उठते थे तो उन्हें बोलने तक नहीं देते। लेकिन इन परिस्थितियों में भी डिजरायली का मनोबल नहीं डिगा। जब उनके भाषणों में व्यवधान उपस्थित किया जाता तो वे कहते, आपको एक दिन मेरी बातें अवश्य सुननी पड़ेगी।

यह डिजरायली नहीं उनका आत्मविश्वास बोल रहा था। उन्हें अपनी आन्तरिक शक्तियों पर पूरा विश्वास था। वे अपना उचित मूल्याँकन करना जानते थे। भविष्य के सम्बन्ध में उनके सामने एक सुनिश्चित योजना थी और उस योजना को भी दृढ़तापूर्वक क्रियान्वित करने के लिए वे कृत संकल्प था। इसी का परिणाम था कि अपने प्रयत्न और परिश्रम के बल पर वे एक दिन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन गये। लोगों ने उनके प्रति, उनकी योग्यताओं के प्रति इतना विश्वास व्यक्त किया, उन्हें इतना ठीक-ठीक पहचाना कि वे ब्रिटेन के सफल तथा योग्यतम प्रधानमंत्री सिद्ध हुये। पहले जो लोग उनका उपहास किया करते थे वे ही उनके प्रशंसक बन गये और उनका गुणगान करने लगे।

यदि डिजरायली अपने साथियों द्वारा की जाने वाली उपेक्षा से, उनके द्वारा हुए उपहास से हतोत्साहित होकर चुपचाप बैठ जाते, तो संसार उन्हें उस रूप में नहीं जान पाता, जिस रूप में आज जानता है। उनकी सफलता का एक ही कारण है कि उन्होंने अपनी योग्यताओं को पहचाना, अपना मूल्याँकन किया और उसके बल पर सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गये। इस संसार का यह विचित्र नियम है कि बाजार में वस्तुओं की कीमत दूसरे लोग निर्धारित करते हैं, पर मनुष्य अपना मूल्याँकन स्वयं करता है और वह अपना जितना मूल्याँकन करता है, उससे अधिक सफलता उसे कदापि नहीं मिल पाली है, प्रत्येक व्यक्ति को, जो जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तथा आगे बढ़ने की आकाँक्षा रखते हैं उन्हें यह मानकर चलना चाहिए कि परमात्मा ने उसे मनुष्य के रूप में इस पृथ्वी पर भेजते समय उसकी चेतना में समस्त सम्भावनाओं के बीज डाल दिये हैं। इतना ही नहीं उसके अस्तित्व में सभी सम्भावनाओं के बीज डालने के साथ-साथ उनके अंकुरित होने की क्षमताएं भी भर दी है। लेकिन प्रायः देखने में यह आता है कि अधिकाँश व्यक्ति अपने प्रति ही अविश्वास से भरे होते हैं तथा उन क्षमताओं और सम्भावनाओं के बीजों को विकसित तथा अंकुरित करने की चेष्टा तो दूर रही उनके सम्बन्ध में विचार तक नहीं करना चाहते।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1981 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1981/January/v1.13

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

👉 Darkness to Light

Truth! Truth!! Truth!!! What a force and impact this word carries that even uttering this word seems to sooth the tongue, thought of it itself gives some light to the mind and feeling of it rejuvenates the heart. The transition from falsehood to truth is an ascent from filthy mire to pious skies, a transmutation from beastly instincts, devilish darkness to divine virtues and eternal light.

Truth is absolute, eternal. God is Truth, the Soul is Truth, God’s creation of Nature is Truth; Truth is Omnipresent. It is the ultimate goal of life; truth is the ceaseless perennial quest of the individual self, for which it takes birth, life after life, Age after Age… This life is bestowed upon us as yet another opportunity to realize the ultimate truth and savor the nectar of infinite bliss.

It is pitiable that we remain ignorant of this fact that – what we think of the world around (and die hunting for the mirage of joy in it) is not true; it is nothing but the image of our own perception. Once you understand this fact, you will turn towards truth. You will become a follower of Truth; it will be your ideal; an integral part of your character. “Truth” will then show you the divine radiance of your inner self.

If every word, every deed of yours is truthful, the world will truthfully honor you and you will inspire many others towards its noble path. The Vedic teaching reminds all of us to follows the path of truth – “Asato Ma Sadgamaya”, as this is the only source of auspicious welfare of all…

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1942

👉 असत्य की ओर नहीं, सत्य की ओर

सत्य! सत्य!! सत्य!!! अहा, कितना सुंदर शब्द है। उच्चारण करते ही जिह्वा को शांति मिलती है, विचार करते ही मस्तिष्क शीतल हो जाता है, हृदयंगम करने से कलेजा ठंडक अनुभव करता है। झूठ के मायावी प्रपंचों में उलझ कर ईश्वर का राजकुमार-मनुष्य मानवता से पतित होकर पशु बन गया है। सत्य की अवहेलना करने का अभिशाप वह भुगत रहा है।

ईश्वर सत्य है, आत्मा सत्य है, प्रभु की त्रिगुणमयी लीला सत्य है, सर्वत्र सत्य ही सत्य व्याप्त हो रहा है। जीवन के कण-कण की एक ही प्यास है-`सत्य’। हमारा जीवन इसलिए है कि अखिल सत्य तत्त्व में विचरण करते हुए अमृत का पान करें। प्रभु ने कृपा करके हमें अपने संसार की सत्यरूपी वाटिका में भ्रमण करके आनंद लाभ करने के लिए भेजा है, परंतु हाय, हम तो अपने को बिलकुल ही भूले जा रहे हैं। वास्तव में दुनिया कुछ नहीं है। अपनी छाया ही संसार के दर्पण में प्रतिबिंबित हो रही है।

`सत्य’ मनुष्यों को प्रेरणा देता है कि अंतर में दृष्टि डालो, अपना दृष्टिकोण बदलो, अपना और दुनिया का स्वरूप समझो, अपने को अच्छा बना डालो, बस सारी दुनिया तुम्हारे लिए अच्छी बन जाएगी। तुम सत्यनिष्ठ बनो, दुनिया तुम्हारे साथ सत्य का आचरण करेगी। श्रुति कहती है `असतो मा सद्गमय’ असत्य की ओर नहीं, सत्य की ओर गमन कीजिए। आपका इसी में कल्याण है।

📖 अखण्ड ज्योति -जनवरी 1942 पृष्ठ 19

👉 पिशाच प्रेमी या पागल (अन्तिम भाग)

इन सब दृश्यों को जब हम देखेंगे तो अनुभव करेंगे कि ईश्वर का वेष बनाकर शैतान आ बैठा है, धर्म की आड़ में पाप बोल रहा है, गाय का चमड़ा ओढ़ कर भेड़िया विचरण कर रहा है। इन्द्रिय लिप्सा, व्यभिचार, पतन प्रोत्साहन, अन्याय वर्धन को यदि प्रेम कहा जायगा तो हम नहीं समझते तो पाप नाम की कौन सी चिड़िया इस दुनिया में शेष रहेगी।

प्रेम का अर्थ है त्याग और सेवा। सच्चा प्रेमी अपने सुखों की तनिक भी इच्छा नहीं करता वरन् जिस पर प्रेम करता है उसके सुख पर अपने को उत्सर्ग कर देता है। लेने का उसे ध्यान भी नहीं आता, देना ही एकमात्र उसका कर्तव्य हो जाता है। जिसके हृदय में प्रेम की ज्योति जलेगी वह गोरे चमड़े पर फिसल कर अपने चमारपन का परिचय न देगा और न व्यभिचार की कुदृष्टि रखकर अपनी आत्मा को पाप पंक में घसीटेगा। वह किसी स्त्री के रूप, रंग, चमक, दमक, हाव, भाव या स्वर कंठ पर मुग्ध नहीं होगा, वरन् किसी देवी में उज्ज्वल कर्तव्य का दर्शन करेगा तो उसके चरणों पर झुककर प्रणाम करेगा। स्त्रियों से प्रेम करने वाले के कमरे में अभिनेत्रियों के अधनंग चित्र नहीं होंगे वरन् सीता और सावित्री की प्रतिमायें विराजेंगीं। प्रेमी कमर लचकाकर गलियों में छैल चिकनियाँ बना हुआ न फिरेगा, वह माँ बहिनों को सती साध्वी बनाने के लिए उनमें धर्म प्रेरणा करेगा।

उसकी जिह्वा पर आशिक-माशकों के गन्दे अफसाने न होंगे वरन् राम-भरत के प्रेम की चर्चा करता हुआ गदगद हो जायेगा। प्रेमी का दिल तो बेकाबू हो सकता है पर दिमाग मुट्ठी में रहेगा, वह दूसरों के सुख के लिए आत्मत्याग करने में अपने को बेकाबू करेगा, किन्तु किसी को पतन के मार्ग पर घसीटने का स्मरण आते ही उसकी आत्मा काँप जायगी। इस दिशा में उसका एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। अपने प्रेमपात्र को बदनामी, पतन, दुख, भ्रम और नरक में घसीटने वाला व्यक्ति किसी भी प्रकार प्रेमी नहीं कहा सकता, वह तो नरक का कीड़ा है जो अपनी विषय ज्वाला में जलाने के लिए दूसरे पक्ष को घसीटता है।

स्मरण रखिए प्रेम का लक्षण त्याग है। जब आप अपने सुख को दूसरों के ऊपर निछावर करते हैं तब आप प्रेमी हैं। जब आप अपने सुख के लिए दूसरे को पतन के मार्ग में खींचते हैं तब आप पिशाच हैं। जब आप दूसरों के सुधार के लिए स्वयं कष्ट सहते हैं, बुराइयाँ ओढ़ते हैं, तप करते हैं तब आप प्रेमी हैं। जब दूसरों के कुकर्म को यों ही अनियंत्रित गति से बढ़ने देते हैं, न तो उनको रोकते हैं, न विरोध करते हैं तब आप पागल बन जाते हैं। क्योंकि भविष्य की हानि-लाभ न सोचकर केवल आज पर ही ध्यान देने वाला पागल कहा जाता है। सन्निपात ग्रस्त को मिठाई खिलाकर उसकी बीमारी बढ़ा देने वाला पागल ही कहा जायगा। प्रेमी का धर्म है त्याग और सेवा। त्यागी और सेवक ही प्रेमी कहला सकता है। जो भोगेच्छा में जलता फिरता है वह पिशाच है और जो सुधार के लिए किसी को कष्ट देना नहीं चाहता एवं सेवा के लिए उद्यत नहीं होता वह पागल है।

प्रेमियों को अपना अन्तःकरण टटोलकर निर्णय करना चाहिए कि वे पिशाच हैं? प्रेमी हैं? या पागल हैं?

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1942 पृष्ठ 12
http://literature.awgp.in/magazine/AkhandjyotiHindi/1942/May.12

👉 तनाव से मुक्ति

एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन के साथ दुर्घटना हुई और वे अस्पताल में थे। शरीर के हरेक अंग की कोई न कोई हड्डी टूटी थी।

उनके सारे चेहरे पर पट्टियाँ बँधी हुई थीं। केवल उनकी ऑंखें दिख रही थीं। उनके एक मित्र उन्हें मिलने आए और उनसे पूछा,"कैसे हो, मुल्ला?"उन्होंने कहा," मैं ठीक हूँ सिवाय इसके कि जब मैं हँसता हूँ तो दर्द होता है।" तब उनके मित्र ने उनसे पुछा, "भला, इस हालत में आप हँस कैसे सकते हैं?" मुल्ला ने जवाब दिया,"अगर मैं अब न हँसु तो मैं ज़िन्दगी में कभी हँस नहीं पाउँगा।"

ये अविरत उत्साह सम्पूर्ण स्वास्थ्य में रहने का आयाम है। संस्कृत में स्वास्थ्य के लिए शब्द है 'स्वस्ति' माने प्रबुद्ध व्यक्ति, जो स्व में स्थित है। स्व में बने रहने की पहली निशानी है उत्साह - जो हँस कर ये कह सके कि, " आज कोई काम नहीं बना।" ये कह सकने के लिए तुम्हें ऐसी मानसिक स्थिति चाहिए जो कि तनाव-मुक्त और दबाव--सिद्ध हो।

जब तुम तनाव में होते हो, तब तुम्हारो भौहें चढ़ जातीं हैं। जब तुम इस तरह त्योरी चढाते हो, तब तुम चेहरे की ७२ नसें और माँस-पेश्यियाँ उपयोग में लाते हो। लेकिन जब तुम मुस्कुराते हो तब उन में से केवल ४ का उपयोग करते हो। अधिक कार्य का अर्थ है अधिक तनाव। तनाव तुम्हारी मुस्कान को भी गायब कर देता है। तुम्हारी बॉडी लेंग्वेज तुम्हारी मानसिक स्थिति और शारीरिक तंत्र की उर्जा का संकेत दे देती है।

हम एक उर्जा के बादल में संपुटित हैं, जिसे चेतना कहते हैं। ये एक मोम बत्ती और बाती जैसा है। जब तुम मोम बत्ती पर माचिस की तीली लगाते हो, तो बाती पर ज्योत प्रकट होती है। मोम बत्ती में भी वही हाईड्रोकार्बन है। लेकिन जब उसे प्रज्वलित किया जाता है, तब ज्योति केवल उसकी चोटी पर टिमटिमाती है। इसी तरह हमारा शरीर मोम बत्ती की बाती की तरह है और इसके आसपास जो है वह चेतना है, जो हमें जीवित रखती है। तो हमें अपने मन और आत्मा का ध्यान रखना है।

हमारे अस्तित्व के ७ स्तर हैं - शरीर, श्वास, मन, बुद्धि, स्मृति, अहम् और आत्मा। मन तुम्हारी चेतना में विचार और अनुभूति की समझ है जो निरंतर बदलते रहते हैं। आत्मा हमारी अवस्था और अस्तित्व का सूक्ष्मतम पहलू है। और मन और शरीर को जो जोडती है वह हमारी साँस है। सब कुछ बदलता रहता है, हमारा शरीर बदलाव से गुज़रता है, वैसे ही मन, बुद्धि, समझ, धारणाएँ, स्मृति, अहम् भी। लेकिन ऐसा कुछ है तुम्हारे भीतर जो नहीं बदलता। और उसे आत्मा कहते हैं, जो कि सब बदलावों का सन्दर्भ बिंदु है। जब तक तुम इस सूक्ष्मतम पहलू से नाता नहीं जोड़ोगे, आयुर्वेद की प्राचीन पद्धति के अनुसार तुम एक स्वस्थ व्यक्ति नहीं माने जाओगे।

स्वास्थ्य की दूसरी निशानी है, सचेतता, सतर्क और जागरूक रहना। मन की २ स्थितियां होतीं हैं। एक तो शरीर और मन साथ में। और दूसरा शरीर और मन भिन्न दिशाओं की ओर देखते हुए। कभी जब तुम तनाव में हो, तब भी तुम सतर्क रहते हो, लेकिन ये ठीक नहीं है। तुम सतर्क और साथ ही तनाव-मुक्त भी होने चाहिए, इसी को ज्ञानोदय कहते हैं।

भावनात्मक अस्थिरता तनाव होने के कारणों में से एक है। हरेक भावना के लिए हमारी श्वास में एक विशेष लय है। धीमे और लंबे श्वास आनंद और उग्र श्वास तनाव का संकेत देते हैं। जिस तरह से एक शिशु श्वास लेता है वह एक वयस्क के श्वास लेने के तरीके से भिन्न है। यह तनाव ही है जो एक वयस्क की श्वसन पद्धति को भिन्न बनाती है।

हम अपना आधा स्वास्थ्य संपत्ति कमाने में खर्च कर देते हैं और फिर हम वह संपत्ति स्वास्थ्य को वापिस सुधारने में खर्च कर देते हैं। यह किफायती नहीं है। अगर कोई छोटी-मोटी असफलता आ जाए तो फ़िक्र मत करना, तो क्या हुआ? हरेक असफलता एक नई सफलता की ओर बड़ा कदम है। अपना उत्साह बढ़ाओ। अगर तुम में कुशलता है तो तुम किसी भी परिस्थिति में व्यंग को डाल कर उसे पूरी तरह से बदल सकते हो। तनाव - युक्त होना टालो। पशु जब गीले हो जाते हैं या धुल में खेलते हैं, तो बाहर आ कर वे क्या करते हैं? वे अपना सारा शरीर झकझोरते हैं और अपने आप से सब कुछ बाहर निकाल फेंकते हैं। लेकिन हम मनुष्य सारा कुछ, सारा तनाव पकड़ के रखते हैं। किसी कुत्ते, पिल्ले या बिल्ली को देख कर हमें सब कुछ झकझोरना आना चाहिए। जब तुम ऑफिस में आते हो, तो घर को झकझोर दो। जब तुम घर वापिस जाओ, अपनी पीठ से ऑफिस को झकझोर दो।

तनाव से मुक्त होने और हमारी उर्जा को पुनः प्राप्त करने के लिए, प्रकृति ने एक अन्तर्निहित व्यवस्था बनाई है, जो है निद्रा। किसी हद तक, निद्रा तुम्हारी थकान मिटाती है। लेकिन प्रायः शरीर प्रणाली में तनाव रह जाता है। उस प्रकार के तनावों को काबू में रखने के लिए प्राणायाम और ध्यान के तरीके हैं। ये तनाव और थकान से मुक्ति देते हैं, क्षमता बढ़ाते हैं, तुम्हारे तंत्रिका तंत्र और मन को मज़बूत बनाते हैं। ध्यान केन्द्रीकरण नहीं है। ये एक गहरा विश्राम है और जीवन को एक अधिक विशाल दृष्टि से देखना है, जिस के ३ स्वर्णिम नियम हैं - मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैं कुछ नहीं करता हूँ और मैं कुछ नहीं हूँ।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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