बुधवार, 26 दिसंबर 2018

👉 परेशानियों का हल

एक व्यक्ति काफी दिनों से चिंतित चल रहा था जिसके कारण वह काफी चिड़चिड़ा तथा तनाव में रहने लगा था। वह इस बात से परेशान था कि घर के सारे खर्चे उसे ही उठाने पड़ते हैं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी के ऊपर है, किसी ना किसी रिश्तेदार का उसके यहाँ आना जाना लगा ही रहता है, उसे बहुत ज्यादा INCOME TAX देना पड़ता है आदि - आदि।

इन्ही बातों को सोच सोच कर वह काफी परेशान रहता था तथा बच्चों को अक्सर डांट देता था तथा अपनी पत्नी से भी ज्यादातर उसका किसी न किसी बात पर झगड़ा चलता रहता था।

एक दिन उसका बेटा उसके पास आया और बोला पिताजी मेरा स्कूल का होमवर्क करा दीजिये, वह व्यक्ति पहले से ही तनाव में था तो उसने बेटे को डांट कर भगा दिया लेकिन जब थोड़ी देर बाद उसका गुस्सा शांत हुआ तो वह बेटे के पास गया तो देखा कि बेटा सोया हुआ है और उसके हाथ में उसके होमवर्क की कॉपी है। उसने कॉपी लेकर देखी और जैसे ही उसने कॉपी नीचे रखनी चाही, उसकी नजर होमवर्क के टाइटल पर पड़ी।

होमवर्क का टाइटल था ••• वे चीजें जो हमें शुरू में अच्छी नहीं लगतीं लेकिन बाद में वे अच्छी ही होती हैं। इस टाइटल पर बच्चे को एक पैराग्राफ लिखना था जो उसने लिख लिया था। उत्सुकतावश उसने बच्चे का लिखा पढना शुरू किया बच्चे ने लिखा था

मैं अपने फाइनल एग्जाम को बहुंत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये बिलकुल अच्छे नहीं लगते लेकिन इनके बाद स्कूल की छुट्टियाँ पड़ जाती हैं। मैं ख़राब स्वाद वाली कड़वी दवाइयों को बहुत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये कड़वी लगती हैं लेकिन ये मुझे बीमारी से ठीक करती हैं।

मैं सुबह - सुबह जगाने वाली उस अलार्म घड़ी को बहुत धन्यवाद् देता हूँ जो मुझे हर सुबह बताती है कि मैं जीवित हूँ। मैं ईश्वर को भी बहुत धन्यवाद देता हूँ जिसने मुझे इतने अच्छे पिता दिए क्योंकि उनकी डांट मुझे शुरू में तो बहुत बुरी लगती है लेकिन वो मेरे लिए खिलौने लाते हैं, मुझे घुमाने ले जाते हैं और मुझे अच्छी अच्छी चीजें खिलाते हैं और मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मेरे पास पिता हैं क्योंकि मेरे दोस्त सोहन के तो पिता ही नहीं हैं।

बच्चे का होमवर्क पढने के बाद वह व्यक्ति जैसे अचानक नींद से जाग गया हो। उसकी सोच बदल सी गयी। बच्चे की लिखी बातें उसके दिमाग में बार बार घूम रही थी। खासकर वह last वाली लाइन। उसकी नींद उड़ गयी थी। फिर वह व्यक्ति थोडा शांत होकर बैठा और उसने अपनी परेशानियों के बारे में सोचना शुरू किया।

मुझे घर के सारे खर्चे उठाने पड़ते हैं, इसका मतलब है कि मेरे पास घर है और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से बेहतर स्थिति में हूँ जिनके पास घर नहीं है। मुझे पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, इसका मतलब है कि मेरा परिवार है, बीवी बच्चे हैं और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से ज्यादा खुशनसीब हूँ जिनके पास परिवार नहीं हैं और वो दुनियाँ में बिल्कुल अकेले हैं।

मेरे यहाँ कोई ना कोई मित्र या रिश्तेदार आता जाता रहता है, इसका मतलब है कि मेरी एक सामाजिक हैसियत है और मेरे पास मेरे सुख दुःख में साथ देने वाले लोग हैं। मैं बहुत ज्यादा INCOME TAX भरता हूँ, इसका मतलब है कि मेरे पास अच्छी नौकरी/व्यापार है और मैं उन लोगों से बेहतर हूँ जो बेरोजगार हैं या पैसों की वजह से बहुत सी चीजों और सुविधाओं से वंचित हैं।

हे! मेरे भगवान् ! तेरा बहुंत बहुंत शुक्रिया••• मुझे माफ़ करना, मैं तेरी कृपा को पहचान नहीं पाया।

इसके बाद उसकी सोच एकदम से बदल गयी, उसकी सारी परेशानी, सारी चिंता एक दम से जैसे ख़त्म हो गयी। वह एकदम से बदल सा गया। वह भागकर अपने बेटे के पास गया और सोते हुए बेटे को गोद में उठाकर उसके माथे को चूमने लगा और अपने बेटे को तथा ईश्वर को धन्यवाद देने लगा।

हमारे सामने जो भी परेशानियाँ हैं, हम जब तक उनको नकारात्मक नज़रिये से देखते रहेंगे तब तक हम परेशानियों से घिरे रहेंगे लेकिन जैसे ही हम उन्हीं चीजों को, उन्ही परिस्तिथियों को सकारात्मक नज़रिये से देखेंगे, हमारी सोच एकदम से बदल जाएगी, हमारी सारी चिंताएं, सारी परेशानियाँ, सारे तनाव एक दम से ख़त्म हो जायेंगे और हमें मुश्किलों से निकलने के नए - नए रास्ते दिखाई देने लगेंगे।

👉 कैसे मज़बूत बनें (भाग 5)

7 काम और मनोरंजन, आराम और काम में समन्वय बिठाएँ:

यह काम तो कर सकते हैं न आप? लोग इसकी ओर ध्यान नहीं देते क्योंकि उनको यह भ्रम रहता है कि यह बहुत मुश्किल काम है। या तो हम इतना काम करते हैं कि उसके बोझ तले ही दब जाते हैं, या फिर आराम से, हिप्पो के अंदाज में, बेकार बैठे रह कर अवसर का इंतजार करते रहते हैं। काम और मनोरंजन, आराम और काम में अच्छा समन्वय बैठाने से आपको इन सबका महत्त्व समझ में आएगा। आपको नदी के दूसरे तरफ की घास ज्यादा हरी है, ऐसा दिखना बंद हो जायेगा।

8 आपके पास जो है उसके लिए शुक्रगुजार बनें, कृतज्ञ रहें:


जिंदगी कठिन है, परंतु यदि आप जिंदगी को नजदीक से देखेंगे तो पाएंगे कि आपके पास ऐसी अनगिनत चीजें हैं जिनके लिए आपको शुक्रगुजार होना चाहिए। वह बातें जो बीते समय में आपको खुश रखती थीं, उनको याद करने से आपको वर्तमान समय में भी अच्छी अनुभूति होगी। अपने इर्द-गिर्द की दुनिया से आनंद आप प्राप्त करते हैं, वही आपको वो शक्ति प्रदान करती है जिससे कि मुश्किल हालातों का सामना कर लेते हैं। इसलिए, आपके पास जो है, उसपर ध्यान दीजिये और उसका भरपूर आनंद उठाईये। हो सकता है आपके पास आपकी पसंद का वह नया शर्ट नहीं हो, या ऐसा और भी कुछ हो सकता जिसकी आप इच्छा रखते हैं, परंतु वह आपके पास नहीं है, तो कम से कम यह कंप्यूटर तो है जो इंटरनेट से जुड़ा है और जिसका उपयोग करना आप जानते हैं। कुछ लोगों के पास घर नहीं, कंप्यूटर नहीं, शिक्षा-दीक्षा नहीं। उनके विषय में सोचिये।

.....क्रमशः जारी

👉 आज का सद्चिंतन 26 Dec 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Dec 2018

👉 In the Shrine of the Heart

Whenever you feel woeful, distressed or helpless in tragic circumstances or adversities around, whenever you feel demoralized by failures, whenever you see despair and darkness all around and are anxious about your future, whenever you are trapped in a dilemma and unable to think discreetly – don’t astray anymore in negativity. Remember, when a fox is surrounded by wild dogs and sees no rescue, it runs swiftly back in to its den and feels relaxed and safe.

You should also throw away all thoughts and worries of your mind instantly and take shelter in the depths of your heart (the inner core of emotions, the inner self). Take a deep breath and just forget about everything; think as though nothing, not even your existence is there. As you would leave out these things at its doorsteps and enter deeper into the ‘shrine’ or your heart, you would that all the burden, all the worries and sufferings that were troubling you have evaporated. You have become light and floating like a thin piece of cotton. The calmness of your heart will sooth you like a moonlight shadow or a snow chamber to someone dying of heat in the sun of summer.

The purity of inner self is an edifice of peace and spiritual light. It is the source of ultimate realization and is therefore likened with “Brahmloka”. God has graciously endowed us with this paradise to experience divine bliss. But we remain unaware of it and astray externally because of our ignorance.

📖 Akhand Jyoti, March 1941

👉 हृदय-मंदिर के अंदर संतोष

जब कभी किसी दु:खद घटना से तुम्हारा मन खिन्न हो रहा हो, निराशा के बादल चारों ओर से छाए हों, असफलता के कारण चित्त दु:खी बना हुआ हो, भविष्य की भयानक आशंका सामने खड़ी हुई हो, बुद्धि किंकर्त्तवयविमूढ़ हो रही हो, तो इधर-उधर मत भटको। उस लोमड़ी को देखो, जो शिकारी कुत्तों से घिरने पर भाग कर अपनी गुफा में घुस जाती है और वहाँ संतोष की साँस लेती है।

ऐसे विषय अवसरों पर सब ओर से अपने चित्त को हटा लो और अपने हृदय-मंदिर में चले आओ। बाहर की समस्त बातों को बिलकुल भूल जाओ। पाप-तापों को द्वार पर छोड़ कर जब भीतर जाने लगोगे तो मालूम पड़ेगा कि एक बड़ा भारी बोझ, जिसके भार से गरदन टूटी जा रही थी, उतर गया और तुम बहुत ही हलके, रुई के टुकड़े की तरह हलके हो गए हो। हृदय-मंदिर में इतनी शांति मिलेगी, जितनी ग्रीष्म से तपे हुए व्यक्ति को बर्फ से भर हुए कमरे में मिलती है। कुछ ही देर में आनंद की झपकियाँ लेने लगोगे।

हृदय के इस सात्विक स्थान को ब्रह्मलोक या गोलोक भी कहते हैं क्योंकि इसमें पवित्रता, प्रकाश और शांति का ही निवास है। परमात्मा ने हमें स्वर्ग-सोपान सुख प्राप्त करने के लिए दिया है, किंतु अज्ञानतावश मनुष्य उसे जान नहीं पाते।

📖 अखण्ड ज्योति -मार्च 1941

👉 आत्मचिंतन के क्षण 26 Dec 2018

◾ ईश्वर मनुष्य को एक साथ इकट्ठा जीवन न देकर क्षणों के रूप में देता है। एक नया क्षण देने के पूर्व वह पुराना क्षण वापस ले लेता है। अतएव मिले हुए प्रत्येक क्षण का ठीक-ठीक सदुपयोग करो, जिससे तुम्हें नित्य नये क्षण मिलते रहें।

◾ सीखने की इच्छा रखने वाले के लिए पग-पग पर शिक्षक मौजूद हैं, पर आज सीखना कौन चाहता है? सभी तो अपनी अपूर्णता के अहंकार के मद में ऐंठे-ऐंठे से फिरते हैं। सीखने के लिए हृदय का द्वार खोल दिया जाय तो बहती हुई वायु की तरह शिक्षा, सच्ची शिक्षा स्वयमेव हमारे हृदय में प्रवेश करने लगे।

◾ जीवन के आधार स्तम्भ सद्गुण है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव को श्रेष्ठ बना लेना अपनी आदमों को श्रेष्ठ सज्जनों की तरह ढाल लेना वस्तुतः ऐसी बड़ी सफलता है, जिसकी तुना किसी भी अन्य सांसारिक लाभ से नहीं की जा सकती। इसलिए सबसे अधिक ध्यान हमें इस बात पर देना चाहिए कि हम गुणहीन ही न बने रहें। सद्गुणों की शक्ति और विशेषताओं से अपने को सुसज्जित करने का प्रयत्न करें।

◾ अपव्ययी अपनी ही बुरी आदतों से अपनी संपत्ति गँवा बैठता है और फिर दर-दर का भिखारी बना ठोकरें खाता फिरता है। व्यसनी अपना सारा समय निरर्थक के शौक पूरे करने में बर्बाद करता रहता है। जिस बहुमूल्य समय में वह कुछ कहने लायक काम कर सकता था, वह तो व्यसन पूरे करने में ही चला जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (अन्तिम भाग)

सृष्टि के मुकुटमणि कहे जाने वाले मनुष्य का गौरव इसमें है कि उसकी चेतना व्यापक क्षेत्र में सुविस्तृत हो। शरीर और परिवार का उचित निर्वाह करते हुए भी श्रम, समय, चिन्तन और साधनों का इतना अंश बचा रहता है कि उससे परमार्थ प्रयोजनों की भूमिका निबाही जाती रह सके। आत्मीयता का विस्तार होने से शरीर और कुटुम्बियों की ही तरह सभी प्राणी अपनेपन की भावश्रद्धा में बँध जाते हैं और सबका दुःख अपना दुःख और सबका सुख अपना सुख बन जाता है। वसुधैव कुटुम्बकम् की विश्व परिवार की आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावनाएँ बलवती होने पर मनुष्य का स्वार्थ-परमार्थ में परिणत हो जाता है।

जो अपने लिए चाहा जाता था वही सब को मिल सके ऐसी आकांक्षा जगती है। जो व्यवहार, सहयोग दूसरों से अपने लिए पाने का मन रहता है। उसी को स्वयं दूसरों के लिए देने की भावना उमड़ती रहती है। लोक-मंगल की- जन-कल्याण की- सेवा साधना की इच्छाएँ जगती हैं और योजनाएँ बनती है। ऐसी स्थिति में पहुँचा हुआ व्यक्ति ससीम न रह कर असीम बन जाता है और उसका कार्यक्षेत्र व्यापक परिधि में सत्प्रवृत्तियों को संवर्धन बन जाता है।  ऐसे व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षाओं को पैरों तले कुचल कर फेंक देते हैं। अपनी आवश्यकताओं को घटाते हैं ओर निर्वाह को न्यूनतम आवश्यकताएँ पूरी करने के उपरान्त अपनी सत्प्रयोजनों में लगाये रहते हैं। देश, धर्म, समाज, संस्कृति के उत्कर्ष के लिए किये गये प्रयत्नों में उन्हें इतना आनन्द आता है जितना स्वार्थ परायण व्यक्तियों को विपुल धन प्राप्त करने पर भी नहीं मिल सकता।

संसार के इतिहास में- आकाश में महामानवों के जो उज्ज्वल चरित्र झिलमिला रहें हैं वे सभी इसी आत्म-विकास के मार्ग का अवलम्बन करते हुए महानता के उच्च शिखर पर पहुँचे थे। सन्त सुधारक, शहीद यह तीन सामाजिक जीवन के सर्वोच्च सम्मान है। महात्मा, देवात्मा और परमात्मा यह तीन अध्यात्म जीवन की समग्र प्रगति के परिचायक स्तर हैं। इन्हें प्राप्त करने के लिए आत्मविकास के सिवाय और कोई मार्ग नहीं। व्यक्तिवाद को समूहवाद में विकसित कर लेना विश्वशान्ति को आधार माना गया है। अपनेपन को हम जितने व्यापक क्षेत्र में विस्तृत कर लेते हैं उतने ही विश्वास पूर्वक यह कह सकते हैं कि मनुष्य जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने का सुनिश्चित मार्ग मिल गया।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 12
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/January/v1.12

सोमवार, 24 दिसंबर 2018

👉 परमात्मा के साथ

एक 6 साल का छोटा सा बच्चा अक्सर परमात्मा से मिलने की जिद किया करता था। उसे परमात्मा के बारे में कुछ भी पता नही था पर मिलने की तमन्ना, भरपूर थी। उसकी चाहत थी की एक समय की रोटी वो परमात्मा के सांथ खाये।

एक दिन उसने 1 थैले में 5,6 रोटियां रखीं और परमात्मा को को ढूंढने निकल पड़ा। चलते चलते वो बहुत दूर निकल आया संध्या का समय हो गया। उसने देखा नदी के तट पर एक बुजुर्ग बूढ़ा बैठा हैं,जिनकी आँखों में बहुत गजब की चमक थी, प्यार था,और ऐसा लग रहा था जैसे उसी के इन्तजार में वहां बैठा उसका रास्ता देख रहा हों।

वो 6 साल का मासूम बालक बुजुर्ग बूढ़े के पास जा कर बैठ गया, अपने थैले में से रोटी निकाली और खाने लग गया।और उसने अपना रोटी वाला हाँथ बूढे की ओर बढ़ाया और मुस्कुरा के देखने लगा, बूढे ने रोटी ले ली, बूढ़े के झुर्रियों वाले चेहरे पे अजीब सी ख़ुशी आ गई आँखों में ख़ुशी के आंसू भी थे,,

बच्चा बुढ़े को देखे जा रहा था , जब बुढ़े ने रोटी खा ली बच्चे ने 1 और रोटी बूढ़े  को दी। बूढ़ा अब बहुत खुश था। बच्चा भी बहुत खुश था। दोनों ने आपस में बहुत प्यार और स्नेह केे पल बिताये।,,,,

जब रात घिरने लगी तो बच्चा इजाजत ले घर की ओर चलने लगा वो बार बार पीछे मुड  कर देखता ! तो पाता बुजुर्ग बूढ़ा उसी की ओर देख रहा था। बच्चा घर पहुंचा तो माँ ने अपने बेटे को आया देख जोर से गले से लगा लिया और चूमने लगी, बच्चा बहूत खुश था। माँ ने अपने बच्चे को इतना खुश पहली बार देखा तो ख़ुशी का कारण पूछा, तो बच्चे ने बताया!

माँ,....आज मैंने परमात्मा के साथ बैठ क्ऱ रोटी खाई, आपको पता है उन्होंने भी मेरी रोटी खाई,,, माँ परमात्मा् बहुत बूढ़े हो गये हैं,,, मैं आज बहुत खुश हूँ माँ उस तरफ बुजुर्ग बूढ़ा भी जब अपने गाँव पहूँचा तो गाव वालों ने देखा बूढ़ा बहुत खुश हैं,तो किसी ने उनके इतने खुश होने का कारण पूछा??

बूढ़ा बोलां,,,, मैं 2 दिन से नदी के तट पर अकेला भूखा बैठा था,, मुझे पता था परमात्मा आएंगे और मुझे खाना खिलाएंगे। आज भगवान् आए थे, उन्होंने मेरे सांथ बैठ के रोटी खाई मुझे भी बहुत प्यार से खिलाई, बहुत प्यार से मेरी और देखते थे, जाते समय मुझे गले भी लगाया, परमात्मा बहुत ही मासूम हैं बच्चे की तरह दिखते हैं।

👉 कैसे मज़बूत बनें (भाग 4)

5  परेशानियों को पहचानें:

यह समझने की कोशिश करें कि जो बात आपको परेशान कर रही है, क्या वह सचमुच परेशान होने वाली बात है? किसी साथी ने कोई सवाल किया, या सड़क पर किसी ड्राईवर ने अपनी गाड़ी को गलत तरीके से चला कर आपको परेशानी दी, तो देखें कि क्या यह सचमुच इतना परेशान होने की बात है? यह देखें कि ऐसी बातें आपके लिए क्या मायने रखती हैं। अपना ध्यान सिर्फ उन बातों पर केंद्रित रखें जो आपके जीवन के लिए सही मायने में महत्वपूर्ण हैं और इसके अलावा किसी और बात की व्यर्थ चिंता न करें। जैसा कि सिल्विया रॉबिंसन ने कहा है- "कुछ लोग सोचते हैं कि बात को दिल में बिठाए रखने से इंसान मजबूत बनता है, पर इसके उलट बहुत बार ऐसा, बातों को भुला देने से होता है।"

6  जो लोग आपके जीवन में अहम् हैं, उनसे संपर्क बनायें:

परिवार और दोस्तों के साथ-साथ, उन लोगों के साथ भी समय व्यतीत करें जो सकारात्मक और सहयोगी स्वभाव के हैं। अगर इस तरह के लोग आपके इर्द-गिर्द न हों, तो नए दोस्त बनाएं। अगर इस तरह के दोस्त न मिलें, तो उनको मदद करिये जिनको आपसे ज्यादा मदद की जरूरत हो। कभी-कभी, जब हम अपनी स्थिति को सुधार पाने की स्थिति में नहीं होते, तो ऐसे में बहुत बार दूसरों के लिए कुछ करने से इंसान न सिर्फ अच्छा महसूस करता है, बल्कि इससे उसको अपने अंदर की ताकत का भी अहसास होता है। ऐसा करने से इंसान को अपने आप को, अपनी ताकतों को पहचानने में मदद मिलती है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है- इसमें शक की गुंजाईश नहीं। विभिन्न अध्यन और विज्ञानं, सभी बताते हैं कि इंसान का सामाजिक स्वास्थ्य उसके भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अगर आपको समाज के साथ घुल-मिल कर रहने में दिक्कत होती है, तो यह एक समस्या है। आपको इसका इलाज ढूंढना चाहिए। कैसे, यह हम आपको नीचे बताते हैं:

◾ किसी के साथ बहुत ही अच्छी, सकारात्मक और विचारोत्तेजक बातचीत करें।
◾ आपसे जो गलतियां हुईं, उनको भूलिए- उनको दिलो-दिमाग में घर मत बनाने दीजिये।
◾ जब कोई रिश्ता टूटे, तो अपने आप को संभालिये और इस ग़म से बाहर आएं।
◾ शर्मीलापन, हिचक, झिझक से पीछा छुड़ाईए।
◾ बहिर्मुखी व्यक्ति बनिए।

.... क्रमशः जारी

👉 आज का सद्चिंतन 25 Dec 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Dec 2018


👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 Dec 2018

◾ भविष्य की कल्पना करते समय शुभ और अशुभ दोनों ही विकल्प सामने हैं। यह अपनी ही इच्छा पर निर्भर है कि शुभ सोचा जाय अथवा अशुभ। शुभ को छोड़कर कोई व्यक्ति अशुभ कल्पनाएँ करता है, तो इसमें किसी और का दोष नहीं है। दोषी है तो वह स्वयं ही, इसलिए कि उसने शुभ चिंतन का विकल्प सामने रहते हुए भी अशुभ चिंतन को ही अपनाया।

◾ निर्बलता कोई स्थिति नहीं है, बल्कि वह आलस्य और अकर्मण्यता की ही परिणति है। यही कारण है कि निर्बलता चाहे किसी भी प्रकार की क्यों न हो, शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक या आत्मिक मनुष्य किसी भी दृष्टि से निर्बल हो तो उसे संबंधित क्षेत्र में प्रत्येक प्रयत्न का विपरीत परिणाम भुगतना पड़ता है।

◾ बेईमानी और चालाकी से अर्जित किये गये वैभव का रौब और दबदबा बालू की दीवार ही होता है। जो थोड़ी सी हवा बहने पर ढह जाता है तथा यह भी कि वह प्रतिष्ठा, दिखावा, छलावा मात्र होती है, क्योंकि स्वार्थ सिद्ध करने के उद्देश्य से कतिपय लोग उनके मुँह पर उनकी प्रशंसा अवश्य कर देते हैं, परन्तु हृदय में उनके भी आदर भाव नहीं होता।

◾ किसी को यदि परोपकार द्वारा सुखी करते हैं और किसी को अपने क्रोध का लक्ष्य बनाते हैं, तो एक ओर का पुण्य दूसरे ओर के पाप से ऋण होकर शून्य रह जायेगा। गुण, कर्म, स्वभाव तीनों का सामंजस्य एवं अनुरूपता ही यह विशेषता है, जो जीवन जीने की कला में सहायक होती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Awakening the Inner Strength

Human life is a turning point in the evolution of consciousness. One who loses this opportunity and does not attempt awakening his inner self, knowing his soul, is the biggest loser. He cannot attain peace – neither in this life, nor in the life beyond. Thus, if we are truly desirous of ascent, beatifying bliss and peace, we must begin to look inwards. Joy is not there in the outer world, not in any achievement or possession of power and enormous resources. It is the soul, which is the origin and ultimate goal of this intrinsic quest.

Just think! Happiness is a virtue of consciousness, how could then the inanimate things of this world give us joy? It is after all the “individual self”, which aspires for unalloyed joy and enjoys it. Then how could it be so dependent upon others for this natural spirit of the Consciousness Force? How could the world, which is ever changing and perishable, be the source of fulfilling our eternal quest? On the contrary, the sensual pleasures, the worldly joys, which delude us all the time, mostly consume our strength and weaken the life force of our sense organs and our mind.

This fact should be remembered again and again that the quest, the feeling of blissfulness are there because of the soul and it is only the awakened force of the soul, the inner strength that can lead the evolution of the individual self to the highest realms of eternal beatitudeous bliss.

📖 Akhand Jyoti, Oct. 1940

👉 आत्मशक्ति का विकास

मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास करना है। जो प्राणी इस मनुष्य देह को धारण करके भी अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास नहीं करता, अपनी आत्मा के समीप नहीं पहुँचता, वह न इस संसार में शांति प्राप्त कर सकता है और न परलोक को ही सुखमय बना सकता है। इसलिए यदि मनुष्य चाहता है कि उसे सच्ची शांति प्राप्त हो, उसका जीवन सुखमय बने, तो उसे अवश्य अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास करना चाहिए, क्योंकि आत्मा ही पूर्ण शांति और सुख का भंडार है।

हम भूल करके संसार के विषयों में सुख का अन्वेषण करते हैं, किन्तु संसार के विषयों में सुख कहाँ? वे तो जड़ हैं। भला जड़ पदार्थों में सुख कहाँ? जबकि `सुख’ गुण की चेतन पदार्थ का है, जड़ का नहीं, तो वह बेचारा जड़ पदार्थ हमें कैसे दुख देगा? जो वस्तु स्वयं ही क्षणभंगुर है, वह हमें शाश्वत शांति कैसे देगी?

संसार के विषय-भोग तो बालक नचिकेता के कथनानुसार, ``कल तक रहने वाले हैं।’’ उनसे सुख मिलना तो दूर, वे तो हमारी इंद्रियों के तेज और सामर्थ्य को भी नष्ट करने वाले हैं। सांसारिक विषयों में जो कुछ थोड़ा सुख का भाव भी होता है, वह भी हमारी आत्मा का ही सुख है, उन जड़ पदार्थों का नहीं। हम अपनी आत्मा के ही सुख को संसार का सुख समझकर उनमें भटकते फिरते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति-अक्टूबर 1940

👉 आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (भाग 8)

धन उपार्जन में जितनी तत्परता बरतनी पड़ती है उससे कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही तत्परता सद्गुणों का, स्वभाव का अंग बनाने में बरतनी पड़ती है। धन तो उत्तराधिकार में- स्वरूप श्रम से- संयोगवश अथवा ऋण अनुदान से भी मिल सकता है, पर सद्गुणों की सम्पदा एकत्रित करने में तो तिल-तिल करके अपने ही प्रयत्न जुटाने पड़ते हैं। यह पूर्णतया अपने ही अध्यवसाय का प्रतिफल है। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाये रहने पर यह सम्पदा क्रमिक गति से संचित होती है। चंचल बुद्धि वाले नहीं संकल्प-निष्ठ सतत् प्रयत्नशील और धैर्यवान् व्यक्ति ही इस वैभव का उपार्जन कर सकने में समर्थ होते हैं। चक्की के दोनों पाटों के बीच में गुजरने वाला अन्न ही आटा बनता है। सद्विचार और सत्कर्म के दबाव से व्यक्तित्व का सुसंस्कृत बन सकना सम्भव होता है। अपना लक्ष्य यदि आदर्श मनुष्य बनना हो तो इसके लिए आवश्यक उपकरण अलंकार जुटाये जाते रहेंगे इन्हीं प्रयत्नों का परिणाम समयानुसार आत्म-निर्माण के रूप में परिलक्षित होता दिखाई देगा।

आत्मोत्कर्ष की अन्तिम सीढ़ी आत्म-विकास है। इसका अर्थ होता है आत्मभाव की परिधि का अधिकाधिक विस्तृत क्षेत्र में विकसित होना। जिनका स्वार्थ अपने शरीर और मन की सुविधा तक सीमित है उन्हें नर-कीटक कहा जाता है। जो इससे कुछ आगे बढ़ कर ममता को परिवार के लोगों तक सीमाबद्ध किये हुए हैं, वे नर-पशु की श्रेणी में आते हैं। आमतौर से सामान्य मनुष्य इन्हीं वर्गों में गिने जाने योग्य चिन्तन एवं क्रिया-कलाप अपनाये रहते हैं। उनका स्वार्थ इस परिधि से आगे नहीं बढ़ता। जीवन सम्पदा का इसी कुचक्र में भ्रमण करते हुए कोल्हू के बैल जैसी जिन्दगी पूरी कर लेते हैं। मनुष्य का पद बड़ा है।

अन्य प्राणियों की तुलना में ईश्वर ने उसे अनेकों असाधारण क्षमता दिव्य धरोहर की तरह दी है और अपेक्षा की है कि उन्हें इस संसार को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने के लिए प्रयुक्त किया जाय। मानवी कलेवर ईश्वर की इस संसार की सबसे श्रेष्ठ कलाकृति है। इसका सृजन उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हुआ है। इस निर्माण के पीछे जो श्रम लगा है उसमें सृष्टा का यह उद्देश्य है कि मनुष्य उसके सहयोगी की तरह सृष्टि की सुव्यवस्था में संलग्न रह कर उसका हाथ बटाये। यदि इस जीवन रहस्य को भुला दिया जाय और पेट प्रजनन के लिए-लोभ-मोह के लिए-वासना-तृष्णा के लिए ही इस दिव्य अनुदान को समाप्त कर दिया जाय तो समझना चाहिए पिछड़ी योनियों के तुल्य ही बने रहा गया और जीवन का उद्देश्य नष्ट हो गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/January/v1.11

रविवार, 23 दिसंबर 2018

👉 आज का सद्चिंतन 24 Dec 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Dec 2018


👉 कैसे मज़बूत बनें (भाग 3)

3 जीवन के प्रति अपने उत्साह को पुनर्जीवित करें:

भावनात्मक रूप से मजबूत व्यक्ति हर और हरेक दिन को एक तोहफा, एक सौगात समझते हैं। वो अपने समय का उपयोग इतने सकारात्मक ढ़ंग से करते हैं कि उनके इस तोहफे का समुचित और भरपूर उपयोग होता है। याद करें की बचपन में आप कितनी छोटी-छोटी बातों से रोमांचित हो जाते थे- पतझड़ के मौसम में पत्तों से खेलना, किसी जानवर की काल्पनिक तस्वीर बनाना, किसी चीज को ज्यादा खा लेना- इन छोटी-छोटी बातों में कितना आनंद आता था! अपने अंदर के उस बच्चे को ढूँढिये। अपने अंदर के उस बच्चे को जीवित रखिये। आपकी मानसिक और भावनात्मक मजबूती इस पर निर्भर करती है।

4 अपने ऊपर भरोसा रखिये:

आपने इतना कुछ किया है जीवन में: आप एक बार फिर ऐसा कर सकते हैं। आज की आज सोचेंगे, कल की कल- इस सोच के साथ आप मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति से पार पा सकते हैं। ऐसी सोच को विकसित करना आसान काम नहीं है; ऐसा कहना बहुत आसान है, करना उतना ही मुश्किल। मगर, जब आप अभ्यास करेंगे तो यह संभव हो जायेगा। जब कभी आपको ऐसा लगे कि बस अब सब कुछ खत्म होने वाला है, तो आँखें बंद करिये और एक गहरी सांस लीजिये। आप अपने प्रयास में अवश्य ही सफल होंगे, बस नीचे लिखी इन बातों का ध्यान रखिये:

नकारात्मक सोच वालों की बातों को अनसुनी करिये। कुछ लोग आदतन आप पर, आपकी क्षमताओं पर संदेह करते रहेंगे। आपको बस उनकी अनदेखी करनी है, उनको अनसुना करना है और उनको गलत सिद्ध करना है। नाउम्मीद लोग आपको भी नाउम्मीद और निराश न बना दें- इसका ख्याल रखना है। वास्तविकता तो यह है कि दुनिया आपसे कह रही है कि आओ, मुझे बदलो! फिर किस बात का इंतजार कर रहे हैं आप?

अपनी सफलताओं को याद करिये। यह आपके आत्मविश्वास को जगायेगा, आपके सफ़र में उत्साह लाएगा। चाहे वह आपके पढाई-लिखाई की सफलता हो, चाहे किसी मशहूर व्यक्ति से की गयी आपकी बातचीत या फिर आपके बच्चे के जन्म लेने की खुशी- इन सभी अच्छे पलों को अपने आप को मजबूत बनाने के अपने प्रयासों में मददगार बनाइये। सफल होने के लिए सकारात्मक होना जरूरी है और जैसी हमारी सोच होती है, दरअसल, हमारी जिंदगी वैसी ही होती है।

किसी भी हाल में प्रयास करना न छोड़ें। ऐसा कई बार होगा कि आपको अपने क्षमताओं पर संदेह होगा, क्योंकि कई बार ऐसा होगा कि आप प्रयास करेंगे परंतु आपको सफलता नहीं मिलेगी। इस बात का ध्यान रखिये की यह इस प्रक्रिया में होने वाली सामान्य सी बात है। सिर्फ इस वजह से कि आपको अपने प्रयासों में एकाध बार असफलता मिली, निराश मत होइए और प्रयास करना मत छोड़िये। दीर्घकालिक नजरिया रखिये और सोच को विशाल बनाये रखिये। फिर से प्रयास करिये। याद रखें, असफलता की सीढियाँ ही इंसान को सफलता के शिखर पर ले जाती हैं।

.... क्रमशः जारी

👉 "Honesty in Thoughts and Transactions

Innocent nature is essential for development of mental power. One well-known English proverb describes stupidity of clever people, reflecting two contradictory forms of a personality. Only he can understand his true self, who has uniformity and harmony in thoughts and actions. Truthfulness in these two aspects only can lead him to the highest standard of behavior.

A person, who never tries to hide his own faults, naturally clears away all flaws of his character. Results of old mistakes and sins also vanish once truth prevails in our attitude and mentality. Concealed sin corrupts our mind, but once disclosed and confessed, the sin can do no harm. Deliberating over one’s own behavior again and again refines the nature making one more generous and kind. Only such a person can acquire higher spiritual powers.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Atmagyaan aur Atmakalyaan (Self-realization and Self-benefit), Page 22

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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