रविवार, 8 जुलाई 2018

👉 हाथी या भौंरा?

🔶 एक आदमी ने रास्ते में सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा। हाथियों के पैर में रस्सी बंधी थी। उसे आश्चर्य हुआ कि हाथी जैसा विशाल जानवर केवल एक छोटी सी रस्सी से बंधा था। हाथी इस बंधन को जब चाहे तब तोड़ सकता था, लेकिन वो ऐसा नहीं कर रहा था। उस आदमी ने हाथी के ट्रेनर से पूछा कि कैसे हाथी जैसा विशाल जानवर रस्सी से बंधा शांत खड़ा है और भागने की कोशिश नहीं कर रहा?

🔷 ट्रेनर ने बताया कि इन हाथियों को बचपन से इन रस्सियों से ही बांधा जाता है। उस समय इनके पास इतनी शक्ति नहीं होती कि वे रस्सियों को तोड़ सकें। बार-बार प्रयास करने के बाद इन रस्सियों के न टूटने से इनको यकीन हो जाता है कि ये रस्सियों को नहीं तोड़ सकते और बड़े होने के बाद भी उनका यह यकीन बना रहता है इसलिए वो रस्सी तोडऩे का प्रयास ही नहीं करते।

🔶 दूसरी ओर भंवरा है, जिसके शरीर के भार और उसके पंखों के बीच कोई भी संतुलन नहीं है। साइंस का ऐसा मानना है कि भंवरे उड़ नहीं सकते, लेकिन भंवरे को लगता है कि वो उड़ सकता है, इसलिए वह लगातार कोशिश करता है और बार-बार असफल होने पर भी वह हार नहीं मानता। आखिरकार भंवरा उडऩे में सफल हो ही जाता है। भंवरा मानता है कि वह उड़ सकता है, इसलिए वह उड़ पाता है और हाथी मानता है कि वह रस्सी नहीं तोड़ सकता, इसलिए वह रस्सी को नहीं तोड़ पाता है।

🔷 हमें भी कुछ लोग बताते हैं कि यह मत करो, वो मत करो, तुमसे ये नहीं होगा, वो नहीं होगा। कभी-कभी हम कोशिश भी करते हैं और अगर असफल हो गए तो हमें यकीन हो जाता है कि यह काम नहीं हो पाएगा। फिर यही बातें हमारे थॉट्स, बिहेवियर, एक्शन को कंट्रोल करने लगती हैं। दिक्कत यह है कि हम लगातार प्रयास नहीं करते। यह मान लें कि आपके पास इतनी समझ, इतनी बुद्धि, इतना साहस है कि आप अपने किसी भी वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। बस पहले आप खुद इस बात को मानें।

👉 आज का सद्चिंतन 8 July 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 July 2018


👉 ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं (अन्तिम भाग)

🔶 परिजन हम लोगों का संयुक्त जीवन अखण्ड-दीपक का प्रतीक मानकर उसे आत्म सत्ता की साकार प्रतिमा मानते रहे। वही हम लोगों के लिए मत्स्य बेध जैसा लक्ष्यबेध करने वाले शब्दबेधी बाण की तरह आराध्य बनकर रही है। साथ ही साधना का सम्बल भी। शरीर परिवर्तन की बेला आते ही यों तो हमें साकार से निराकार होना पड़ेगा; पर क्षण भर में उस स्थिति से अपने को उबार लेंगे और दृश्यमान प्रतीक के रूप में उसी अखण्ड दीपक की ज्वलन्त ज्योति में समा जायेंगे, जिसके आधार पर अखण्ड-ज्योति नाम से सम्बोधन अपनाया गया है। शरीरों के निष्प्राण होने के उपरान्त जो चर्म चक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे, वे इसी अखण्ड-ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे। दो शरीर अब तक द्वैत की स्थिति में रहे है। भविष्य में दोनों की सत्ता एक में विलीन हो जायगी और उसे तेल-बाती की पृथक सत्ताओं की एक ही लौ में समावेश होने की तरह अद्वैत रूप में गंगा-यमुना के संगम रूप में देखा जा सकेगा। इसे .... श्रद्धा का एकीकरण भी समझा जा सकेगा।

🔷 अभी हम लोगों के शरीर शान्ति-कुंज में रहते हैं। पीछे भी वे इस परिकर के कण-कण में समाये हुए रहेंगे। इसकी अनुभूति निवासियों और आगन्तुकों को समान रूप से होती रहेगी। पर इसका अर्थ यह न समझा जाय कि यह युग चेतना किसी क्षेत्र विशेष में सीमाबद्ध होकर रह जायगी। जब स्थूल शरीर ने समस्त विश्व की प्रतिमाओं को झकझोरा है और उन्हें प्रसुप्ति से उबार कर कर्म क्षेत्र में कुरुक्षेत्र में ला खड़ा किया है, तो यह हम लोगों की तृप्ति-तुष्टि और शान्ति का केन्द्र क्यों अपनी कक्षा छोड़कर किसी अन्य मार्ग को अपनायेगा। स्थूल शरीर की अपेक्षा सूक्ष्म की शक्ति हजारों-लाखों गुनी अधिक होती है। हम लोग कुछ आगे-पीछे एक ही मोर्चे पर एकत्व अपनाकर कार्यरत बने रहेंगे।

🔶 अपनी अपेक्षा कार्यक्षेत्र को हजारों गुना बढ़ा लेंगे। सफलता भी अत्यन्त उच्चस्तरीय अर्जित करेंगे। हमारी प्रवृत्तियाँ मरेंगी नहीं, वरन् अखण्ड-ज्योति की बढ़-चढ़ कर अभिनव भूमिका सम्पन्न करेगी। इसलिए शरीर परिवर्तन की बात सोचने पर न हमें कुछ खिन्नता होती है और न हम लोगों का वास्तविक स्वरूप समझने वाले अन्य किसी स्वजन, परिजन को होनी चाहिए मिशन तीर की तरह सनसनाता हुआ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेगा। हम लोगों की स्थिति प्रत्यंचा की तरह अभी भी तनी है और भविष्य में भी वैसी ही बनी रहेगी। अखण्ड-ज्योति की ज्योति ज्वाला प्रेरणाप्रद लेखों में अबकी ही तरह भविष्य में भी प्राणवान बनी रहें, इसके लिए अगले बीस वर्षों के लिए अभी से सुनिश्चित संग्रह करके रख दिया गया है। सूत्र संचालकों ने इसमें पूरा सहयोग दिया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 30
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/January/v1.30

शनिवार, 7 जुलाई 2018

👉 आस्तिकता का स्वरूप

🔷 आस्तिकता का अर्थ है विश्वास। अविश्वासी ही मस्तिष्क कहा जा सकता है। संसार चक्र को नियमबद्ध नियंत्रण में रखकर चलाने वाली परम सत्ता पर विश्वास करना आस्तिकता का चिह्न है। कर्म फल सुनिश्चित है, जो किया है वह भोगना पड़ेगा यह मानना आस्तिकता का ही स्वरूप है। सब प्राणियों का अंततः कल्याण ही होगा, सब एक दिन विकास की मंजिल पूरी करते हुए परम मंगल को प्राप्त करेंगे यह मान्यता भी आस्तिकता के अनुरूप हैं।

🔶 यह विश्व परमात्मा से ही ओत-प्रोत है। यह उसी का एक प्रत्यक्ष रूप है। जो कुछ हमें दिखाई पड़ता है वह उसी प्रभु के एक अंश का दर्शन है। उसकी न तो उपेक्षा की जानी चाहिए और न घृणा। यह घृणा या उपेक्षा वस्तुतः परमात्मा के एक अंश के प्रति व्यक्त की हुई मानी जाएगी।

👉 आज का सद्चिंतन 7 July 2018


👉 संत और अहंकार

🔷 महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर, नामदेव तथा मुक्ताबाई के साथ तीर्थाटन करते हुए प्रसिद्ध संत गोरा के यहां पधारे। संत समागम हुआ, वार्ता चली।

🔶 तपस्विनी मुक्ताबाई ने पास रखे एक डंडे को लक्ष्य कर गोरा कुम्हार से पूछा- 'यह क्या है?'

🔷 गोरा ने उत्तर दिया- “इससे ठोककर अपने घड़ों की परीक्षा करता हूं कि वे पक गए हैं या कच्चे ही रह गए हैं।“

🔶 मुक्ताबाई हंस पड़ीं और बोलीं- “हम भी तो मिट्टी के ही पात्र हैं। क्या इससे हमारी परीक्षा कर सकते हो?”

🔷 “हां, क्यों नहीं” - कहते हुए गोरा उठे और वहां उपस्थित प्रत्येक महात्मा का मस्तक उस डंडे से ठोकने लगे।

🔶 उनमें से कुछ ने इसे विनोद माना, कुछ को रहस्य प्रतीत हुआ। किंतु नामदेव को बुरा लगा कि एक कुम्हार उन जैसे संतों की एक डंडे से परीक्षा कर रहा है। उनके चेहरे पर क्रोध की झलक भी दिखाई दी।

🔷 जब उनकी बारी आई तो गोरा ने उनके मस्तक पर डंडा रखा और बोले- “यह बर्तन कच्चा है।“

🔶 फिर नामदेव से आत्मीय स्वर में बोले- “तपस्वी श्रेष्ठ! आप निश्चय ही संत हैं, किंतु आपके हृदय का अहंकार रूपी सर्प अभी मरा नहीं है, तभी तो मान-अपमान की ओर आपका ध्यान तुरंत चला जाता है। यह सर्प तो तभी मरेगा, जब कोई सद्गुरु आपका मार्गदर्शन करेगा।“

🔷 संत नामदेव को बोध हुआ। स्वयं स्फूर्त ज्ञान में त्रुटि देख उन्होंने संत विठोबा खेचर से दीक्षा ली, जिससे अंत में उनके भीतर का अहंकार मर गया।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 July 2018


👉 ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं (भाग 4)

🔷 जहाँ तक हम दोनों की भावी नियति के बारे में भविष्य बोध कराया गया है, वह सन्तोषजनक और उत्साहवर्धक है। कहा गया है कि पिछले पचास वर्ष से हम दोनों “दो शरीर-एक प्राण” बनकर नहीं, वरन एक ही सिक्के के दो पहलू बनकर रहे है। शरीरों का अन्त तो सभी का होता है; पर हम लोग वर्तमान वस्त्रों को उतार देने के उपरान्त भी अपनी सत्ता में यथावत बने रहेंगे और जो कार्य सौंपा गया है, से तब तक पूरा करने में लगे रहेंगे, जब तक कि लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती। युग परिवर्तन एक लक्ष्य है जनमानस की परिष्कार और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन उसके दो कार्यक्रम।

🔶 अगली शताब्दी इक्कीसवीं सदी अपने गर्भ में उन महती सम्भावनाओं को संजोये हुए है, जिनके आधार पर मानवी गरिमा को पुनर्जीवित करने की बात सोची जा सकती है। दूसरे शब्दों में इसे वर्तमान विभीषिकाओं का आत्यंतिक समापन कर देने वाला सार्वभौम कायाकल्प भी कह सकते है। इस प्रयोजन के लिए हम दोनों की साधना स्वयंभू मनु और शतरूपा जैसी वशिष्ठ-अरुन्धती स्तर की .... जिसका इन दिनों शुभारम्भ किया गया हैं पौधा लगाने के बाद माली अपने उद्यान को छोड़कर भाग नहीं जाता। फिर हमीं क्यों यात्रा छोड़कर पलायन करने की बात सोचेंगे और क्यों उस के लिए उत्सुकता प्रदर्शित करेंगे?

🔷 इस बीच छोटे से व्यवधान की आशंका रहती है, जो यथार्थ भी है। प्रकृति के नियम नहीं बदले जा सकते। पदार्थों का उद्भव, अभिवर्धन और परिवर्तन होते रहना एक शाश्वत क्रम है। इस नियति चक्र से हम लोगों के शरीर भी नहीं बच सकते। बदन बदलने के समय में अब बहुत देर नहीं है। पर वस्तुतः यह कोई बड़ी घटना नहीं है। अविनाशी चेतना के रूप में आत्मा सदा अजर-अमर है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 29
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/January/v1.29

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

👉 ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं (भाग 3)

🔶 अखण्ड-ज्योति का कलेवर छपे कागजों के छोटे पैकेट जैसा लग सकता है, पर वास्तविकता यह है कि उसके पृष्ठों पर किसी की प्राण चेतना लहराती है और पढ़ने वालों को अपने आँचल में समेटती है, कहीं-से-कहीं पहुँचाती है। बात लेखन तक नहीं सीमित हो जाती, उसका मार्गदर्शन और अनुग्रह अवतरण किसी ऊपर की कक्षा से होता है। इसका अधिक विवरण जानना हो, तो एक शब्द में इतना ही कहा जा सकता है कि यह हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में निवास करने वाले ऋषि चेतना का समन्वित अथवा उसके किसी प्रतिनिधि का सूत्र संचालन है, अन्यथा साधना विहीन एकाकी, व्यवहार कुशलता की दृष्टि से पिछड़ा हुआ व्यक्ति बड़े सपने तो देख सकता है; पर बड़े कामों का भार अपने दुर्बल कंधों पर नहीं उठा सकता। विशेषतया उन कामों का जिनकी कल्पनाएँ करते रहने वाले, योजनाएँ बनाते रहने वाले थोड़े बहुत कदम बढ़ाते रहने पर भी हवा में उड़ने वाले गुब्बारों की तरह कुछ ही समय में ठण्डे होते और अपने अस्तित्व को समाप्त करते देखे गये।

🔷 सोचा जाता है कि गुरुजी 80 वर्ष का आयुष्य पूरा करना चाहते है। इस दृष्टि से माताजी भी उतनी आयु का लाभ ले सकेंगी, जितनी कि गुरुदेव। इस महाप्रयाण का समय अब बहुत दूर नहीं है। हाथ के नीचे वाले वाले अनिवार्य कामों को जल्दी-जल्दी निपटाने की बात बनते ही चार्ज दूसरों के हाथों चला जायगा। सन्देह है कि उस दशा में वर्तमान प्रगति रुक सकती है और व्यवस्था बिगड़ सकती है। ऐसे लोग व्यवस्था में आने वाले उतार–चढ़ावों के आधार पर अनुमान लगाते है। उनमें ही प्रतिभावान व्यक्तियों के हट जाने पर भट्ठा बैठ जाता है और सरंजाम बिखर जाता है; पर यहाँ वैसी कोई बात नहीं। न व्यक्ति विशेष ने कुछ असाधारण किया है, और न ही उसे भूतकाल पर गर्व है। न वर्तमान को देखते हुए उत्साह और न भविष्य की गिरावट सम्बन्धी कोई आशंका। कारण स्पष्ट है।

🔶 कठपुतली न अपने अभिनय पर गर्व करती है, और न पिटारी में बन्द कर दिये जाने की शिकायत। यदि वह समझ होती, तो निश्चित ही उसकी सोच यही होती कि वह बाजीगर की उँगलियों में बँधे हुए धागों से हलचल करने वाली लकड़ी की टुकड़ी मात्र है। उसे गर्व किस बात का होना चाहिए और अपने भविष्य की चिन्ता क्यों करनी चाहिए? यह काम बाजीगर का है। वही कोई गड़बड़ी होते देखेगा और तत्परतापूर्वक सुधारेगा। आखिर लाभ-हानि तो उसी का है। लकड़ी के टुकड़े तो निर्जीव एवं निमित्त मात्र है। मिशन के भविष्य के सम्बन्ध में भी हर किसी को इसी प्रकार सोचना चाहिए और निराशा जैसे अशुभ चिन्तन को पास भी नहीं फटकने देना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 29

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/January/v1.29

👉 Rise! Have Courage

🔶 Please Note! Adversities and obstructions are there for your own good. They occur to activate your strength and trigger its constructive use. Hidden beneath them is the spring of joy. Those who have never faced any hindrances or struggled against hardships would not know the real taste of happiness and success in life. Only those who have accepted these challenges with courage and stability and conquered over against struggles in their lives are worthy of being called achievers, distinguished heroes. It is only the lives of such great people that deserve to be dignified.

🔷 So don’t loose heart. Awaken! Rise! And look at the Almighty – the Divine Light of your Life-Force. God has not sent you in human form without any purpose. He has endowed you with immense potentials; it’s your duty to make use of them. Sufferings and sorrows surface in our world only until we don’t sacrifices our narrow self-interests for greater aims in life. A sapling sprouts and a tree grows from only that seed which dissolves self-existence in the soil; flowers and fruits illustrate its accomplishments and expand its glory.

🔶 So, Be Happy and face all testing moments with smile and courage. Have unflinching faith in the eternal truth that your soul is omnipotent. This is what corresponds to having faith in God. The force of this intrinsic faith would wane out all your fears and weaknesses. Its impetus will awaken your inner strength by which you can eliminate all hindrances and win all battles of life.

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1940

👉 अखंड ज्योति का प्रधान उद्देश्य (अन्तिम भाग)

🔶 हम प्रत्येक धर्मप्रेमी से करबद्ध प्रार्थना करते हैं कि धर्म के वर्तमान विकृत रूप में संशोधन करें और उसको सुव्यवस्थित करके पुनरुद्धार करें। धर्माचार्यों और आध्यात्म शास्त्र के तत्वज्ञानियों पर इस समय बड़ा भारी उत्तरदायित्व है, देश को मृत से जीवित करने का, पतन के गहरे गर्त में से उठाकर समुन्नत करने की शक्ति उनके हाथ में है, क्योंकि जिस वस्तु से-समय और धन से-कौमों का उत्थान होता है, वह धर्म के निमित्त लगी हुई हैं। जनता की श्रद्धा धर्म में है। उनका प्रचुर द्रव्य धर्म में लगता है, धर्म के लिये छप्पन लाख साधु संत तथा उतने ही अन्य धर्मजीवियों की सेना पूरा समय लगाये हुए है।

🔷 करीब एक करोड़ मनुष्यों की धर्म सेना, करीब तीन अरब रुपया प्रतिवर्ष की आय, कोटि-कोटि जनता की आन्तरिक श्रद्धा, इस सब का समन्वय धर्म में है। इतनी बड़ी शक्ति यदि चाहे तो एक वर्ष के अन्दर-अन्दर अपने देश में रामराज्य उपस्थित कर सकती है, और मोतियों के चौक पुरने, घर-घर वह सोने के कलश रखे होने तथा दूध दही की नदियाँ बहने के दृश्य कुछ ही वर्षों में दिखाई दे सकते हैं। आज के पददलित भारतवासियों की सन्तान अपने प्रातः स्मरणीय पूर्वजों की भाँति पुनः गौरव प्राप्त कर सकती है।

🔶 अखंड ज्योति धर्माचार्यों को सचेत करती है कि वे राष्ट्र की पंचमाँश शक्ति के साथ खिलवाड़ न करें। टन-टन पों-पों में, ताता थइया में, खीर-खाँड़ के भोजनों में, पोथी पत्रों में, घुला-घुला कर जाति को और अधिक नष्ट न करे, वरन् इस ओर से हाथ रोककर इस शक्ति को देश की शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक, मानसिक शक्तियों की उन्नति में नियोजित कर दें। अन्यथा भावी पीढ़ी इसका बड़ा भयंकर प्रतिशोध लेगी।

🔷 आज के धर्माचार्य कल गली-गली में दुत्कारे जायेंगे और भारत-भूमि की अन्तरात्मा उन पर घृणा के साथ थूकेगी कि मेरी घोर दुर्दशा में भी यह ब्रह्मराक्षस कुत्तों की तरह अपने पेट पालने में देश की सर्वोच्च शक्ति को नष्ट करते रहे थे। साथ ही अखंड-ज्योति सर्वसाधारण से निवेदन करती है कि वे धर्म के नाम पर जो भी काम करें उसे उस कसौटी पर कस लें कि “सद्भावनाओं से प्रेरित होकर आत्मोद्धार के लिये लोकोपकारी कार्य होता है या नहीं।” जो भी ऐसे कार्य हों वे धर्म ठहराये जावें इनके शेष को अधर्म छोड़ कर परित्याग कर दिया जाय।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितंबर 1942 पृष्ठ 7

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/September/v1.7

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 July 2018


👉 आज का सद्चिंतन 6 July 2018


👉 समझदार बहू....

🔶 शाम को गरमी थोड़ी थमी तो मैं पड़ोस में जाकर निशा के पास बैठ गई। उसकी सासू माँ कई दिनों से बीमार है। सोचा ख़बर भी ले आऊँ और बैठ भी आऊँ। मेरे बैठे-बैठे उसकी तीनों देवरानियाँ भी आ गईं। "अम्मा जी, कैसी हैं?" शिष्टाचारवश पूछ कर इतमीनान से चाय-पानी पीने लगी।

🔷 फिर एक-एक करके अम्माजी की बातें होने लगी। सिर्फ़ शिकायतें, जब मैं आई तो अम्माजी ने ऐसा कहा, वैसा कहा, ये किया, वो किया। आधा घंटे बाद सब यह कहकर चली गईं कि उन्होंने शाम का खाना बनाना है। बच्चे इन्तज़ार कर रहे हैं। कोई भी अम्माजी के कमरे तक भी न गया।

🔶 उनके जाने के बाद मैं निशा से पूछ बैठी, निशा अम्माजी, आज एक साल से बीमार हैं और तेरे ही पास हैं। तेरे मन में नहीं आता कि कोई और भी रखे या इनका काम करे, माँ तो सबकी है।

🔷 उसका उत्तर सुनकर मैं तो जड़-सी हो गई। वह बोली, "बहनजी, मेरी सास सात बच्चों की माँ है। अपने बच्चो को पालने में उनको अच्छी जिंदगी देने में कभी भी अपने सुख की परवाह नही की सबकी अच्छी तरह से परवरिश की। ये जो आप देख रही हैं न मेरा घर, पति, बेटा, शानो-शौकत सब मेरी सासुजी की ही देन है।

🔶 अपनी-अपनी समझ है। मैं तो सोचती हूँ इन्हें क्या-क्या खिला-पिला दूँ, कितना सुख दूँ, मेरे बेटे बेटी अपनी दादी मां के पास सुबह-शाम बैठते हैं, उन्हे देखकर वो मुस्कराती हैं, अपने कमजोर हाथो से वो उनका माथा चेहरा ओर शरीर सहलाकर उन्हे जी भरकर दुआएँ देती हैँ।

🔷 जब मैं इनको नहलाती, खिलाती-पिलाती हूँ, ओर इनकी सेवा करती हूँ तो जो संतुष्टि के भाव मेरे पति के चेहरे पर आते है उसे देखकर मैं धन्य हो जाती हूँ। मन में ऐसा अहसास होता है, जैसे दुनिया का सबसे बड़ा सुख मिल गया हो।

🔶 और फिर वह बड़े ही उत्साह से बोली, एक बात और है ये जहाँ भी रहेंगी, घर में खुशहाली ही रहेगी, ये तो मेरा "तीसरा बच्चा बन चुकी हैं।" और ये कहकर वो सुबक-सुबक कर रो पड़ी।

🔷 मैं इस ज़माने में उसकी यह समझदारी देखकर हैरान थी, मैने उसे अपनी छाती से लगाया और मन ही मन उसे नमन किया और उसकी सराहना की। कि कैसे कुछ निहित स्वार्थी ओर अपने ही लोग तरह-तरह के बहाने बना लेते है तथा अपनी आज़ादी और ऐशो अय्याशी के लिए, अपनी प्यार एवं ममता की मूरत को ठुकरा देते हैं।

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

👉 भाई कब मरेगा?

🔷 एक गांव था जहां सभी धर्म-जाति के लोग निवास करते थे। उसी गांव में एक गरीब किसान अपने परिवार के साथ रहता था।  यह दर्दनाक घटना उसी किसान परिवार की है जिसमें परिवार का मुखिया, उसकी पत्नी और  दो बच्चे थे। घर का मुखिया एक लम्बे अर्से से बीमार था जो जमा पूंजी थी, वह डाक्टरों की फीस व दवाखानों में खत्म हो चुकी थी लेकिन वह अभी भी चारपाई से लगा हुआ था और एक दिन इसी हालत में अपने बच्चों को अनाथ कर इस दुनिया से चला गया।

🔶 मुसीबत का मारा परिवार खाने-पीने का मोहताज हो गया मगर लोग अपने काम-धंधों में लग चुके थे। किसी ने भी इस परिवार की ओर ध्यान नहीं दिया। बच्चे अक्सर बाहर निकल कर सामने वाले मकान की चिमनी से निकलने वाले धुएं को आस लगाए देखते रहते। नादान बच्चे समझ रहे थे कि उनके लिए खाना तैयार हो रहा है। पर मां तो मां होती है उसने घर में रोटी के कुछ सूखे टुकड़े ढूंढ निकाले। इन टुकड़ों से बच्चों को जैसे-तैसे बहला-फुसला कर सुला दिया।

🔷 अगले दिन फिर भूख सामने खड़ी थी। घर में था ही क्या, जिसे बेचा जाता, फिर भी काफी देर खोज के बाद चार चीजें निकल आईं जिन्हें बेचकर शायद दो समय के भोजन की व्यवस्था हो गई। बाद में वह पैसा भी खत्म हो गया। भूख से तड़पते बच्चों का चेहरा मां से देखा नहीं गया। सातवें दिन मां अपने बच्चों के लिए मोहल्ले के पास वाली दुकान पर जा खड़ी हुई। दुकानदार से महिला ने उधार कुछ राशन मांगा तो दुकानदार ने साफ इंकार कर दिया। एक तो पिता के मरने से अनाथ होने का दुख और ऊपर से लगातार भूख से तड़पने के कारण उसके सात साल के बेटे की हिम्मत जवाब दे गई और वह बुखार से पीड़ित होकर चारपाई पर पड़ गया।

🔶 बेटे के लिए दवा कहां से लाती, खाने तक का तो ठिकाना था नहीं। तीनों एक घर के कोने में सिमटे पड़े थे। मां बुखार से आग बने बेटे के सिर पर पानी की पट्टियां रख रही थी। तब पांच साल की छोटी बहन अचानक उठी, मां के कान से मुंह लगाकर बोली, ‘‘मां भाई कब मरेगा?’’

🔷 मां के दिल पर मानो जैसे तीर चल गया, तड़प कर उसे छाती से लिपटा लिया और पूछा, ‘‘मेरी बच्ची तुम यह क्या कह रही हो?’’

🔶 बच्ची मासूमियत से बोली, ‘‘हां मां! भाई मरेगा तो लोग खाना देने आएंगे न?’’

🔷 मां यह सुन कर तड़प उठी। इसलिए अपनी दौलत को धर्म के नाम पर चढ़ावा चढ़ाने की बजाय किसी असहाय भूखे को खाना खिलाकर पुण्य प्राप्त करें, इससे सारे जहां के मालिक भी खुश होंगे और आपके मन को भी सुकून मिलेगा।

👉 आज का सद्चिंतन 5 July 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 July 2018


👉 Worship Interrupted to Help the Needy

🔷 King Vikramaditya had gone out for hunting. He lost his way in a very dense and dark forest. His soldiers were left behind and he was all alone. In the dreadful forest the King could not find water and his throat was choking with thirst. Suddenly he saw a hut nearby. He went in and saw a holy man in deep meditation. The King then fell down and lost his consciousness.

🔶 When King Vikramaditya regained his consciousness he was surprised to see that the holy man was washing his face, fanning him and gave him water to drink. The King quickly stood up and asked with folded hands, "O Holy one, why did you interrupt your meditation and the worship of God for me?" The saint replied in a soft voice, "Son, it is the wish of God that no one in this world should suffer. Fulfillment of God's wish is very important for me. Worship of God can succeed only by the service of mankind"

📖 From Pragya Puran

👉 ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं (भाग 2)

🔷 इन दोनों की सफलता का श्रेय समर्पित प्रतिभाओं को ही दिया जाता है। वे अपने आप ही नहीं उपज पड़ी थीं, वरन किन्हीं चतुर चितेरों द्वारा गढ़ी गई थीं। अपने को कुछ बना लेना एक बात है, किन्तु अपने समकक्ष सहधर्मी-सहकर्मी विनिर्मित कर देना सर्वथा दूसरी। ऐसी संस्थापनाएँ यदा-कदा ही कोई विरले कर पाते है। उन्हीं को देखकर सर्वसाधारण को यह अनुभव होता है कि परिष्कृत व्यक्तित्वों की कार्य क्षमता किस स्तर की कितनी सक्षम होती है और वह जनमानस के उलटी दिशा में बहते प्रवाह को किस सीमा तक उलट सकने में समर्थ होती है।

🔶 कई सोचते है कि वर्तमान विभूतियाँ सफलताएँ गुरु जी-माताजी की प्रचण्ड जीवन साधना और प्रबल पुरुषार्थ को दिशाबद्ध रखने का प्रतिफल है। जबकि बात दूसरी है। शरीर ही प्रत्यक्षतः सारे क्रियाकृत्य करते दीखता है, पर सूक्ष्मदर्शी जानते है कि यह उसके भीतर अदृश्य रूप से विद्यमान प्राण चेतना का प्रतिफल है। जिन्हें मिशन के सूत्र संचालक की सराहना करने का मन करें उन्हें एक क्षण रुकना चाहिए और खोजना चाहिए कि क्या एकाकी व्यक्ति बिना किसी अदृश्य सहायता के लंका जलाने, पहाड़ उखाड़ने और समुद्र लाँघने जैसे चमत्कार दिखा सकता है। उपरोक्त घटनाएँ हनुमान के शरीर द्वारा भले ही सम्पन्न की गई हो; पर उनके पीछे राम का अदृश्य अनुदान काम कर रहा था। निजी रूप से तो हनुमान वही सामान्य वानर थे जो बालि के भय से भयभीत जान बचाने के लिए छिपे हुए सुग्रीव की टहल चाकरी करते थे और राम-लक्ष्मण के उस क्षेत्र में पहुँचने पर वेष बदल कर नव आगन्तुकों की टोह लेने पहुँचे थे।

🔷 बीज के वृक्ष बनने का चमत्कार सभी देखते है, पर अनेक बार क्षुद्र को महान, नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनते भी देखा जाता है। ऐसे कायाकल्पों में किसी अदृश्य सत्ता की परोक्ष भूमिका काम करती पाई जाती है। शिवाजी और चन्द्रगुप्त किन्हीं अदृश्य सूत्र संचालकों के अनुग्रह से वैसा कुछ करने में समर्थ हुए, जिसके लिए उन्हें असाधारण श्रेय और यश मिला। विवेकानन्द की कथा-गाथा भी ठीक ऐसी ही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 28
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/January/v1.28

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...