शनिवार, 23 जून 2018

👉 "आओ करें गुरु को हृदयंगम"

🔷 स्वयं में आपको समहित हम कर सकें.......
गुरुवर ज्यादा नहीं आपके चरणों के धूल भी हम बन सकें......
कुछ ऐसा प्रयास करने की प्रेरणा मिल सके........
आपको हृदयंगम करने की जागृति यदि मिले......
हम कुरीतियों से लड़ सके..........

🔶 न मधुमास चाहिए......
न ही प्रसिद्धि अगाध चाहिए......
कठिन से कठिन परिस्थिति में बस आपका साथ चाहिए........
करते हैं आज ,आपको स्वयं को अर्पण...........
शायद इसे ही कहते हैं समर्पण......

🔷 चरणों में सफलता का आभाष हो न हो...........
आपके आंखों में खुशी देख सकें,
वो छोटे छोटे कृत्यों को करने का
अनुराग हमें हो.......
नभ को छूने की चाह नहीं......
पर धरती पर ही नभ को उतारने का विश्वास हमें हो.......

🔶 हम क्या थे.........
यह मात्र आप जानते हैं......
हमें पारश बनने का आप आश्वासन देते हैं..........
अपने प्रज्ञा पुत्र पुत्रियों को आराधक कहते हो......
हम आपके हैं और आप हमारे.....
यह विश्वास हमें चाहिए......
गुरुवर आपको हृदयंगम कर सकें
 वह अनुशासन हम बांध सकें.....
आपके बलिदानों का मान हम रख सकें.......
वह आस हमें चाहिए.......
आपको दुबारा सशरीर पाने के लिए.......
हम गुरुवर आपको हृदयंगम कर सकें.......
वो निष्ठा हमें दे दीजिए......

👉 आज का सद्चिंतन 23 June 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 June 2018


👉 अभागा राजा और भाग्यशाली दास

🔷 एक बार एक गुरुदेव अपने शिष्य को अहंकार के ऊपर एक शिक्षाप्रद कहानी सुना रहे थे। एक विशाल नदी जो की सदाबहार थी उसके दोनो तरफ दो सुन्दर नगर बसे हुये थे! नदी के उस पार महान और विशाल देव मन्दिर बना हुआ था! नदी के इधर एक राजा था राजा को बड़ा अहंकार था कुछ भी करता तो अहंकार का प्रदर्शन करता वहाँ एक दास भी था बहुत ही विनम्र और सज्जन!

🔶 एक बार राजा और दास दोनो नदी के वहाँ गये राजा ने उस पार बने देव मंदिर को देखने की ईच्छा व्यक्त की दो नावें थी रात का समय था एक नाव मे राजा सवार हुआ और दुजि मे दास सवार हुआ दोनो नाव के बीच मे बड़ी दूरी थी!

🔷 राजा रात भर चप्पू चलाता रहा पर नदी के उस पार न पहुँच पाया सूर्योदय हो गया तो राजा ने देखा की दास नदी के उसपार से इधर आ रहा है! दास आया और देव मन्दिर का गुणगान करने लगा तो राजा ने कहा की तुम रातभर मन्दिर मे थे! दास ने कहा की हाँ और राजाजी क्या मनोहर देव प्रतिमा थी पर आप क्यों नही आये!

🔶 अरे मेने तो रात भर चप्पू चलाया पर ..... गुरुदेव ने शिष्य से पुछा वत्स बताओ की राजा रातभर चप्पू चलाता रहा पर फिर भी उसपार न पहुँचा ? ऐसा क्यों हुआ ? जब की उसपार पहुँचने मे एक घंटे का समय ही बहुत है!

🔷 शिष्य - हॆ नाथ मैं तो आपका अबोध सेवक हुं मैं क्या जानु आप ही बताने की कृपा करे देव! ऋषिवर - हॆ वत्स राजा ने चप्पू तो रातभर चलाया पर उसने खूंटे से बँधी रस्सी को नही खोला!

🔶 और तुम जिन्दगी भर चप्पू चलाते रहना पर जब तक अहंकार के खूंटे को उखाड़कर नही फेकोगे आसक्ति की रस्सी को नही काटोगें तुम्हारी नाव देव मंदिर तक नही पहुंचेगी!

🔷 हॆ वत्स जब तक जीव स्वयं को सामने रखेगा तब तक उसका भला नही हो पायेगा! ये न कहो की ये मैने किया ये न कहो की ये मेरा है ये कहो की जो कुछ भी है वो सद्गुरु और समर्थ सत्ता का है मेरा कुछ भी नही है जो कुछ भी है सब उसी का है!

🔶 स्वयं को सामने मत रखो समर्थ सत्ता को सामने रखो! और समर्थ सत्ता या तो सद्गुरु है या फिर इष्टदेव है , यदि नारायण के दरबार मे राजा बनकर रहोगे तो काम नही चलेगा वहाँ तो दास बनकर रहोगे तभी कोई मतलब है!

🔷 जो अहंकार से ग्रसित है वो राजा बनकर चलता है और जो दास बनकर चलता है वो सदा लाभ मे ही रहता है!

🔶 इसलिये नारायण के दरबार मे राजा नही दास बनकर चलना!

http://awgpskj.blogspot.com/2016/09/blog-post_3.html

👉 सादा जीवन उच्च विचार अन्योन्याश्रित (अन्तिम भाग)

🔷 घर के बड़े या कमाऊ लोग मात्र अधिक श्रेय पाकर संतुष्ट हो जाते हैं। व्यक्तिगत उपभोग के लिए अधिक सम्पत्ति उड़ाते रहने की छूट नहीं माँगते। वे जानते हैं कि संयुक्त परिवार में सभी का समान हक है। कमाऊ हीरे मोतियों से लदें और बिना कमाऊ चीथड़े लपेटकर घूमें, तो यह संयुक्त परिवार कहाँ रहा? यह समूचा समाज एक परिवार है। उसके वरिष्ठों को कनिष्ठों का अधिक ध्यान रखना चाहिए।

🔶 अभिभावक स्वयं दूध न पीकर भी बच्चों के लिए उसे किसी प्रकार जुटाते हैं। मरीज के लिए फलों का प्रबन्ध किया जाता है, जबकि समर्थ दाल और नमक के सहारे भी रोटी गले उतारते रहते है। यदि समर्थ का विशेष अधिकार माना जाय तो फिर असमर्थों का ईश्वर ही रक्षक है। उस आपा धापी के रहते मनुष्य समाज की सभ्यता, संस्कृति, नीति, उदारता जैसे आदर्शों की चर्चा करने का हक न रह जायेगा। जिसकी लाठी तिसकी भैंस का जंगली कानून यदि मनुष्यों में भी चल पड़ा और सुयोग्यों ने अधिक सुविधा साधन हड़पना आरम्भ कर दिया तो समझना चाहिए कि मनुष्य ने अपनी नैतिक वरिष्ठता गँवा दी और प्रेत पिशाच जैसी रीति-नीति अपना ली।

🔷 सादा जीवन-उच्च विचार का सिद्धान्त मानवी नैतिकता की सही व्याख्या करता है। जिसके ऊँचे विचार हों, जो भावना के क्षेत्र में उत्कृष्टता संजोये हो, उसे अपने ऊपर यह अनुबन्ध कठोरता पूर्वक लागू करना चाहिए कि जीवन चर्या सादगी एवं मितव्ययता से पूर्ण हो। मितव्ययता का अर्थ कृपणता बरतना और कुपात्रों के लिए सम्पदा जमा करते जाना नहीं वरन् यह है कि औसत नागरिक का स्तर शिरोधार्य करते हुए पूरी सामर्थ्य के साथ श्रम किया जाय और जो निर्वाह से अधिक हो उसे हाथों-हाथ सत्प्रयोजनों के लिए लगा दिया जाय।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 महान् योगी अनन्ता बाबा

🔷 गुरूभक्त साधक महान् योगी अनन्ता बाबा का मार्मिक प्रंसग है। जिस समय बाबा ने अपना यह प्रंसग सुनाया ,वह एक आदिवासी गाँव में रहते थे। आदिवासी उन्हें अपने देवता मानकर पूजते थे, श्रद्धा करते थे। बाबा उनके लिए माता- पिता ,एवं भगवान् थे। बाबा भी इन ग्रामवासियों का ध्यान अपने बच्चों की तरह रखते थे। बहुत पढ़े- लिखे न होने पर भी उन्होंने इन भोले गाँववासियों को शिक्षा का संस्कार देने की कोशिश की थी। अपने साधारण ज्ञान एवं असाधारण आध्यात्मिक ऊर्जा के द्वारा वह इन सरल ग्रामीण का कल्याण करते रहते थे।

🔶 उनके पास आश्चर्यकारी शक्तियाँ थीं। एक बार जब किसी ने उनसे पूछा कि उनको ये अद्भुत विद्याएँ कहाँ से मिलीं? तो उन्होंने अपने पुराने झोले से एक फटी हुई पुस्तक निकाली। यह पुस्तक गुरूगीता की थी। उन्होंने इस पुस्तक को अपने माथे से लगाया। ऐसा करते हुए उनकी आँखें भर आयीं। वह अपने अतीत की यादों में खो गये और जब उबरे, तब उनकी आँखों में गुरूभक्ति का प्रकाश था। समूचे मुख पर श्रद्धा की अनोखी दीप्ति थी। अपनी स्मृतियों को कुरेदते हुए उन्होंने कहा कि- बचपन से ही प्रभु ने मुझे अपना रखा था। शायद तभी उन्होंने मुझे संसार में रमने नहीं दिया। एक के बाद एक अनेक कष्ट मेरे जीवन में आते चले गये।

🔷 छोटा ही था, तब घाघरा नदी की बाढ़ में सब कुछ बह गया था। माता- पिता, स्वजन- परिजन मुझे अपने कहने वाला कोई न था। बाढ़ मुझे भी बहा ले गयी थी ,पर मुझे जब होश आया, तब मैंने स्वयं को एक सुनसान स्थान में बने शिव मंदिर में पाया। मेरा सिर एक वृद्ध महात्मा की गोद में था और वे बड़े प्यार से मेरे माथे पर हाथ फेर रहे थे। मेरे आँखें खोलने पर उन्होंने मेरी स्थिति जानी कुछ हलवा खाने को दिया। कई दिन बाद जब मैं स्वस्थ हुआ, तो उन्होंने मुझे पढ़ाना शुरू किया। संस्कृत व हिन्दी का साधारण ज्ञान देने के बाद एक दिन उन्होंने मुझे गुरूगीता की पोथी थमायी और बोले -बेटा! इसी ने मेरा कल्याण किया है और यही तुम्हारा भी कल्याण करेगी। मेरा कोई शिष्य नहीं है, तुम भी नहीं हो सकते। भगवान् भोलेनाथ सबके गुरू हैं, उन्हें ही अपना गुरू एवं ईश्वर मानो। गुरूगीता उन्हीं की वाणी है, इसकी साधना से उन सर्वेश्वर को प्रसन्न करो।

🔶 इसी के साथ उनहोंने बतायी गुरूगीता की पाठविधि। साथ ही उन्होंने कहा कि कोई साधना कठिन तप एवं पवित्र भावना के बिना सफल नहीं होती। उन महान् सन्त के सान्निध्य में यह साधना चलती गयी। अंतःकरण के कोनों में आध्यात्मिक उजाले की किरणें भरती गयीं। गुरूगीता की कृपा से सब कुछ स्वतः प्राप्त होता गया। समय के साथ अंतस् की संवेदना इतनी व्यापक होती गयी कि सभी कुछ मिलता गया। जब उन महान् सन्त ने अपना शरीर छोड़ा ,तब मैं वहाँ से चलकर यहाँ आ गया और जीव सेवा को ही शिव सेवा मान लिया। प्रभु की कृपा से मुझे सब कुछ सहज प्राप्त है। गुरूगीता के अंतर रहस्यों को जो भी जान लेगा, उसे भी ऐसा ही दिव्य अनुदान मिल जायेगा।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 195

👉 Control and Refinement of Hormones (Last Part)

🔷 Growth of the body is maintained by the pineal gland in the brain. Drastic changes in one’s growth –– especially of height, are caused by the disorderly functioning of this small ‘dot’ sized endocrine gland. Despite having excellent physique and charming appearance, do not have the natural masculine (or feminine) tendencies because of the abnormal levels of certain hormones.

🔶 Impotency is also attributed to hormonal disorders in general. Whenever the germs and viruses or any substance, which is ‘foreign’ or ‘toxic’ to its normal functioning, invades the body, some of the hormones secreted by the endocrine glands react instantaneously. These stimulate the B-cells in the blood to recognize the antigens and harmful microphages and produce specific antibodies to eliminate the invaders.

🔷 The hormones also participate in the struggle of the body to fight the infections/diseases during this defensive activity. This struggle of hormones induces psychological effects that are manifested as –– restlessness, irritation, anger and anguish in the diseased persons. As stated earlier, the endocrine glands are affected by internal state of the mind and emotions and accordingly generate the feelings of joy, enthusiasm, courage and alacrity, or that of dole, dullness, despair and apprehension etc.

📖 Akhand Jyoti- June- 2003

👉 आस्तिकता का वातावरण

🔷 प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन को सार्थक एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने की आधारशिला-आस्तिकता को जीवन में प्रमुख स्थान देने का प्रयत्न करे। ईश्वर को अपना साथी, सहचर मानकर हर घड़ी निर्भय रहे और सन्मार्ग से ईश्वर की कृपा एवं कुमार्ग से ईश्वर की सजा प्राप्त होने के अविचल सिद्धान्त को हृदयंगम करता हुआ अपने विचारों और आचरणों को सज्जनोचित बनाने का प्रयत्न करता रहे। इसी प्रकार जिसे अपने परिवार में, स्त्री बच्चों से सच्चा प्रेम हो, उसे भी यही प्रयत्न करना चाहिए कि घर के प्रत्येक सदस्य के जीवन में किसी न किसी प्रकार आस्तिकता का प्रवेश हो। परिवार का बच्चा-बच्चा ईश्वर विश्वासी बने।

🔶 अपने परिवार के लोगों के शरीर और मन को विकसित करने के लिए जिस प्रकार भोजन और शिक्षण की व्यवस्था की जाती है उसी प्रकार आत्मिक दृष्टि से स्वस्थ बनाने के लिए घर में बाल-वृद्ध सभी की उपासना में निष्ठा एवं अभिरुचि बनी रहे। इसके लिए समझाने - बुझाने का तरीका सबसे अच्छा है। गृहपति का अनुकरण भी परिवार के लोग करते है इसलिए स्वयं नित्य नियमपूर्वक नियत समय पर उपासना करने के कार्यक्रम को ठीक तरह निबाहते रहा जाय। घर के लोगों से जरा जोर देकर भी उनकी ढील पोल को दूर किया जा सकता है।

🔷 आमतौर से अच्छी बातें पसन्द नहीं की जातीं और उन्हें उपहास तथा उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। यही वातावरण अपने घर में भी धुला हुआ हो सकता है, पर उसे हटाया तो जाना ही चाहिए। देर तक सोना, गंदे रहना, पढ़ने में लापरवाही करना, ज्यादा खर्च करना, बुरे लोगों की संगति आदि बुराइयां घर के किसी सदस्य में हो तो उन्हें छुड़ाने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है। क्योंकि यह बातें उनके भविष्य को अन्धकारमय बनाने वाली, अहितकर सिद्ध हो सकती हैं। उसी प्रकार नास्तिकता और उपासना की उपेक्षा जैसे आध्यात्मिक दुर्गुणों को भी हटाने के लिए घर के लोगों को जरा अधिक सावधानी और सफाई से कहा सुना जाय तो भी उसे उचित ही माना जाएगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 6


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.6

शुक्रवार, 22 जून 2018

👉 सादा जीवन उच्च विचार अन्योन्याश्रित (भाग 5)

🔶 चुनाव दो में से एक का करना है। निकृष्ट विचार रखकर घिनौना जीवन जिया जाय, संकीर्ण स्वार्थपरता की सड़ी कीचड़ में कुलबुलाते-तिलमिलाते कीड़ों जैसा शिश्नोदर परायण बना जाय या फिर उत्कृष्ट स्तर की विचारणा अपनाकर सादगी का सौम्य सात्विक निस्पृह रहकर महानता को वरण किया जाय। दोनों में मौलिक अन्तर एक ही है। निकृष्टता आरम्भ में आकर्षक लगती है किन्तु परिणाम की दृष्टि से विघातक, विष जैसी कष्ट दायक सिद्ध होती है। इसके विपरीत उत्कृष्टता का मार्ग है जिसका आरम्भ बीज की तरह गलने जैसा होता है किन्तु कुछ समय उपरान्त, अंकुरित होने, लहलहाने एवं फूलने-फलने के अवसर निश्चित रूप में उपलब्ध होने लगते हैं। अदूरदर्शी तात्कालिक आकर्षण के लिए आतुर होते है और आटे के लोभ में गला फँसाकर बेमौत मरने वाली मछली का उदाहरण बनते हैं। दूसरे वे है जो किसान माली, विद्यार्थी या व्यवसायी की तरह अपनी श्रम साधना सत्प्रयोजन के लिए लगाते और अन्ततः बहुमूल्य फसल से अपने कोठे भरते हैं।

🔷 सादा जीवन उच्च विचार का राजमार्ग हर किसी के लिए श्रेयस्कर है। उसमें आवश्यकताओं और सुविधाओं पर इतना अंकुश लगाना पड़ता है, जिसमें शरीर को मात्र औसत नागरिक जितनी व्यवस्था जुट सके। वैयक्तिक आकाँक्षाओं को इतना ही स्वल्प एवं सीमित रहना चाहिए ताकि संसार में जितने साधन हैं उन्हें मिल बाँटकर खाया जा सके। हर किसी के हिस्से में गुजारे जितना आ सके। ऊँची दीवार उठाने के लिए कहीं न कहीं गड्ढा करना पड़ता है। अमीर बनने में, विलास वैभव जुटाने में जिस सम्पदा की आवश्यकता पड़ती है उसका संचय बिना दूसरों का रक्त पीये अपनी कोठी तिजोरी की शोभा बढ़ाने के लिए जमा हो ही नहीं सकती।

🔶 जो अधिक उपार्जन करने योग्य हैं उनके ऊपर एक अतिरिक्त उत्तरदायित्व यह आता है कि सादगी से गुजारा करने के उपरान्त जो बचता है उसे सत्प्रयोजनों के लिए हाथों हाथ लौटा दें। वरिष्ठता के बदले श्रेय मिलने का सौभाग्य ही पर्याप्त है। उपार्जन अभिवर्धन की, कौशल व्यवस्था और सूझबूझ की विशेषता का प्रतिफल इतना ही हो सकता है कि उन्हें सराहा, सम्मानित किया और श्रेय दिया जाय। इसके बदले उन्हें अधिक सम्पदा सुविधाओं जैसे लाभों की न तो माँग ही करनी चाहिए और न वैसा कुछ उन पर लादकर गरिमा का अपहरण ही होना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

गुरुवार, 21 जून 2018

👉 सादा जीवन उच्च विचार अन्योन्याश्रित (भाग 4)

🔷 कौशल, पराक्रम, श्रम समय और वैभव यह सभी विभूतियाँ ईश्वर प्रदत्त हैं। इसी को समाज प्रदत्त भी कहा जा सकता है। अन्यथा एकाकी स्थिति में तो वन-मनुष्य जैसी आदिम स्थिति में भी रहा जा सकता है। जिसने दिया है उसे कृतज्ञता पूर्वक लौटा देने में ही भलमनसाहत है। इसे अपनाने में जो दुराचरण के प्रवाह प्रचलन को चीरकर अपनी शालीनता का परिचय दे पाता है वह सराहा जाता है। यह औचित्य का निर्वाह भर है। तो भी चोरों की नगरी में एक ईमानदार को भी देवता माना जाता है। आलसियों के गाँव में एक पुरुषार्थी भी मुक्त कंठ से सराहा जाता है। औसत नागरिक जैसा निर्वाह ऐसा ही औचित्य है, जिसे अपनाने के लिए नीतिमत्ता, विवेकशीलता और सद्भावना का प्रत्येक प्रतिपादन विवश करता है।

🔶 यहाँ चर्चा धन वैभव की ही नहीं हो रही है। उसमें कौशल और पराक्रम को भी सम्मिलित रखा जाता है। विद्या, बुद्धि, कला, कौशल, प्रतिभा, बलिष्ठता आदि की दृष्टि से कितनों को ही विशिष्टता प्राप्त है। समय प्रत्यक्ष धन है। पसीने के बदले ही सम्पदा कमाई जाती है या कमाई जानी चाहिए। लॉटरी से लेकर जुए, सट्टे का, जमीन में गड़ा, उत्तराधिकार से मिला या उजड्डपन से बटोरा वैभव औचित्य की मर्यादाओं से हटकर होने के कारण अग्राह्य एवं अवांछनीय है। वस्तुतः धन मनुष्य के श्रम, समय और कौशल का ही प्रतिफल होना चाहिए। इसलिए विभिन्न स्तर की विशेषताएँ विभूतियाँ भी वैभव में ही सम्मिलित होती हैं और वह अनुशासन उन पर भी लागू होता है। उसके अनुसार न्यूनतम अपने लिए और अधिकतम सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के निमित्त लगना चाहिए। मानवी गरिमा इससे कम में सधती ही नहीं। मनुष्य की मान मर्यादा इससे कम में बनती ही नहीं। इससे कम निर्धारण में वह सुयोग बनता ही नहीं।

🔷 जिस प्रकार सम्पन्नता उपार्जन के लिए अपना सब कुछ न सही बहुत कुछ नियोजित करना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार महानता अर्जित करने के लिए भी श्रम, समय एवं मनोयोग का बहुत बड़ा भाग नियोजित करना पड़ता है। यदि उन विभूतियों पर पहले से ही लोभ लिप्सा ने आधिपत्य जमा रखा हो तो फिर महानता अर्जित करने के लिए, खरीदने के लिए जिन साधनों की आवश्यकता पड़ती है वे पास में होंगे ही नहीं। तब फिर मनोरथ कैसे पूरे हो सकेंगे। मात्र कामना कल्पना करने से, पूजा पाठ करने भर से कोई भी श्रेष्ठता का वरण नहीं कर सका है। ईश्वर भक्त भी महामानवों की पंक्ति में बैठ सकने में समर्थ नहीं हुए हैं। उत्कृष्टता तो मूल्य देकर खरीदी जा सकती है। इस खरीद के दिए जो चाहिए उसे सम्पन्नता की ललक पर अंकुश लगाकर ही बढ़ाया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 आज का सद्चिंतन 21 June 2018



👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 June 2018

बुधवार, 20 जून 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 20 June 2018


👉 प्रगति सद्गुणों पर निर्भर है।

🔶 मानव जीवन की प्रगति उसके सद्गुणों पर निर्भर है। जिनके गुण कर्म स्वभाव का निर्माण एवं विकास ठीक प्रकार हुआ है वे सुसंयत व्यक्तित्व वाले सज्जन मनुष्य अनेकों बाधाओं और कठिनाइयों को पार करते हुए अपनी प्रगति का रास्ता ढूँढ़ लेते हैं। विपरीत परिस्थितियों एवं बुरे स्वभाव के व्यक्तियों को भी, प्रतिकूलताओं को भी सुसंस्कृत मनुष्य अपने प्रभाव एवं व्यवहार से बदल सकता है और उन्हें अनुकूलता में परिणत कर सकता है। इसके विपरीत जिसके स्वभाव में दोष दुर्गुण भरे पड़े होंगे वह अपने दूषित दृष्टिकोण के कारण अच्छी परिस्थितियों को भी दूषित कर देगा। संयोगवश उन्हें अनुकूलता द्वारा सुविधा प्राप्त भी हो तो दुर्गुणों के आगे वह देर तक ठहर न सकेगी। दूषित दृष्टिकोण जहाँ भी होगा वहाँ नारकीय वातावरण बना रहेगा। अनेकों विपत्तियाँ वहाँ से उलझती रहेंगी।

🔷 इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमें सद्गुणों की जननी आस्तिकता को धैर्य और विवेकपूर्वक अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए। ईश्वर का भय मनुष्य को नेक रास्ते पर चलाते रहने में सबसे बड़ा नियंत्रण है। राजकीय कानून या सामाजिक दंड की दुस्साहसी लोग उपेक्षा करते रहते है। अपराधों और अपराधियों का बाहुल्य, पुलिस और जेल का भय भी इन्हें कम नहीं कर पाता। पर यदि किसी को ईश्वर पर पक्का विश्वास हो, अपने चारों ओर प्रत्येक प्राणी में कण-कण में ईश्वर को समाया हुआ देखे, तो उसके लिए किसी के साथ अनुचित व्यवहार कर सकना संभव नहीं हो सकता। कर्मफल की ईश्वरीय अविचल व्यवस्था पर जिसे आस्था होगी वह अपना भविष्य अन्धकारमय बनाने के लिए कुमार्ग पर बढ़ने का साहस कैसे कर सकेगा? दूसरों को ठगने या परेशान करने का अर्थ है ईश्वर को ठगना या परेशान करना। ऐसी भूल उससे नहीं हो सकती जिसके मन में ईश्वर का विश्वास, भय और कर्मफल की अनिवार्यता का निश्चय गहराई तक जमा हुआ है।

🔶 सच्चरित्रता को आस्तिकता का पर्यायवाची शब्द माना जा सकता है। ढोंग जैसी झूठी भक्ति, जिसमें साढ़े  तेईस घंटे पाप करते रहने और आधे घंटे पूजा-पत्री करके सारे पापों से छुटकारा मिलने की प्रवंचना सिखाई जाती है, उपहासास्पद हो सकती है। इसी प्रकार देव दर्शन से सकल मनोरथ सहज ही पूरे जो जाने की मान्यता भी धृष्टता कही जा सकती है पर सच्चे अध्यात्म का सच्ची आस्तिकता का महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं होता। ईश्वर विश्वास का आस्तिकता का प्रतिफल एक ही होना चाहिए- सन्मार्ग का अवलम्बन और कुमार्ग का त्याग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म और कर्तव्य का अनुशासन स्थापित करने के लिए ईश्वर विश्वास से बढ़कर और कोई प्रभावशाली माध्यम हो नहीं सकता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.6

👉 Control and Refinement of Hormones – Part 2

🔶 Excessive secretion of this hormone also causes a variety of problems: the ‘engine’ –– source of energy of the body gets ‘over-charged’ and, as a result, different metabolic and biochemical reactions and physiological functions are accelerated untimely. This often gives rise to increase in pulse rate, professed perspiration, high blood pressure, excitation, hypersensitivity, mental restlessness and irritation etc.

🔷 The chemical processing of extraction of energy from the food constituents begins as soon as it reaches in the stomach.  Starch and sugar are converted into glucose. Part of this glucose goes in the blood stream and helps energize the body and maintain temperature. The remaining quantity of glucose is stored in the liver in the form of glycogen, making a stock for future energy-requirements.

🔶 In diabetic patients, the sugar level in the blood increases and the corresponding shortage of energy supplied by glucose gradually weakens the body.  This disorder in blood sugar arises due to the deficiency of insulin –– a hormone secreted by the pancreas. In healthy blood, the normal level of sugar is about one sixtieth ounce per liter.  This small amount is the fuel (source of energy) that keeps the cellular and muscular machinery warm and active.  Insulin along with another hormone adrenaline helps regulate this function.

Akhand Jyoti – June- 2003

👉 सादा जीवन उच्च विचार अन्योन्याश्रित (भाग 3)

🔶 अनावश्यक वैभव की भी ठीक ऐसी ही दुर्गति होती है। यह स्वयं तो हजार छेद बनाकर अपनी बिरादरी वालों से मिलने दौड़ता ही है, साथ ही जहाँ से भागता है वहाँ भी अनेकानेक रिसते घाव छोड़ जाता है, जो जन्म-जन्मान्तरों तक रिसते और कसकते हैं। इसलिए आदर्शों की बात सोचने वालों को सर्वप्रथम वैभव विसर्जन की तैयारी करने का परामर्श दिया जाता हैं। अन्यथा लिप्सा बनी रहने पर परमार्थ के नाम पर चित्र-विचित्र विडम्बनाएँ रचते रहने के अतिरिक्त और कुछ बन नहीं पड़ेगा। महानता और सम्पन्नता में एक प्रकार से शत्रुता है, जहाँ एक के पैर जमेंगे वहाँ दूसरे को पलायन करना पड़ेगा। तथ्य की यथार्थता एवं गम्भीरता को समझने वाले वाजिश्रवा जैसे सर्वमेध यज्ञ रचाते और अपने शरीर के कपड़े तक उतारकर परमार्थ प्रयोजन के लिए दान करते रहे हैं।

🔷 ऋषि परम्परा यही है। बुद्ध गाँधी को ही नहीं, प्रत्येक साधु और ब्राह्मण परम्परा अपनाने वालों को अपना प्रयास यही से आरम्भ करना पड़ा है। विसर्जन समर्पण बन पड़े तो ही यह आशा बँधती है कि महान के साथ एकत्व अद्वैत की स्थिति बन सके। जिस त्याग वैराग्य की शास्त्रकारों ने श्रेय मार्ग पर चलने वालों के निमित्त पग-पग पर आवश्यकता बताई है, उसमें यही रहस्य है कि जब तक तृष्णा से पिण्ड न छूटेगा तब तक श्रेष्ठता में न मन लगेगा और न तन जुटेगा। लगन कहीं लगी रहे तो फिर लकीर पीटने भर की विडम्बना ही शेष रह जाती है। उस झुनझुने से अपने आपको बहलाया फुसलाया भर जा सकता है।

🔶 परस्पर घोर मतभेद रखने वाले अध्यात्मवाद और साम्यवाद को इस केन्द्र पर सर्वथा एक मत देखा जा सकता है कि व्यक्ति को औसत नागरिक स्तर का निर्वाह क्रम अपनाने के लिए बाध्य किया जाय। अध्यात्म क्षेत्र में इसके लिए पुण्य परमार्थ का, त्याग वैराग्य का, स्वर्ग मुक्ति का दार्शनिक चक्रव्यूह रचा है। साम्यवाद ने झटके की नीति अपनाई है और आदमी की भलमनसाहत को अस्वीकार करते हुए गरदन दबोचकर जो पास पल्ले है उसे समाज की सम्पदा मानने के लिए बाधित किया है। तरीके अपने-अपने हैं। नींद की गोली खाकर मरा जाय या तलवार से गरदन कटे, मात्र तरीकों में ही भिन्नता है। आदर्शवाद की किसी भी धारा को यह स्वीकार नहीं कि मनुष्य विलासी, संग्रही, अपव्ययी बने, उद्धत विडम्बना रचे और मुफ्तखोरों के लिए उत्तराधिकार छोड़ मरे। हर दृष्टि से यह अनैतिक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 समर्पण

🔷 एक तपस्वी किसी धर्मात्मा राजा के महल में पहुँचे। राजा गदगद हो गए और कहे, "आज मेरी इच्छा है कि आपको मुँह माँगा उपहार दूँ"। तपस्वी ने कहा, "आप ही अपने मन से सबसे अधिक प्रिय वस्तु दे दें, मैं क्या माँगूँ"।

🔶 राजा ने कहा, "अपने राज्य का समर्पण कर दूँ"। तपस्वी बोले, "वह तो प्रजाजनों का है। आप तो संरक्षक मात्र हैं"।

🔷 राजा ने बात मानी और दूसरी बात कही, "महल, सवारी आदि तो मेरे हैं, इन्हें ले लें"। तपस्वी हँस पड़े और कहा, "राजन् आप भूल जाते हैं। यह सब भी प्रजाजनों का है। आपको कार्य की सुविधा के लिए दिया गया है"।

🔶 अबकी बार राजा ने अपना शरीर दान देने का विचार व्यक्त किया। उसके उत्तर में तपस्वी ने कहा, "यह भी आपके बाल−बच्चों का है, इसे कैसे दे पाएँगे"।

🔷 राजा को असमंजस में देखकर तपस्वी ने कहा, "आप अपने मन का अहंकार दान कर दें। अहंकार ही सबसे बड़ा बंधन है"।

🔶 राजा दूसरे दिन से अनासक्त योगी की तरह रहने लगा। तपस्वी की इच्छा पूर्ण हो गई।

मंगलवार, 19 जून 2018

👉 ईश्वर भक्त लडकी जीनल

🔶 एक राजा बहुत दिनो से पुत्र की प्राप्ती के लिये आशा लगाये बैठा था,पर पुत्र नही हुआ। उसके सलाहकारों ने तांत्रिकों से सहयोग की बात बताई। सुझाव मिला कि किसी बच्ची की बलि दे दी जाये तो पुत्र प्राप्ति हो जायेगी। राजा ने राज्य में ये बात फैलाई कि जो अपनी बेटी देगा उसे बहुत सारे धन दिये जायेगे।

🔷 एक परिवार में कई बच्चें थे, गरीबी भी थी, एक ऐसी बच्ची भी था जो ईश्वर पर आस्था रखती थी जिसका नाम जीनल था तथा वो सन्तों के संग सत्संग में ज्यादा समय देती थी। परिवार को लगा कि इसे राजा को दे दिया जाये क्योंकि ये कुछ काम भी नही करती है, हमारे किसी काम की भी नही। इससे राजा प्रसन्न होकर बहुत सारा धन देगा। ऐसा ही किया गया जिनल को राजा को दे दिया गया।

🔶 राजा के तात्रिकों द्वारा जीनल की बलि की तैयारी हो गई, राजा को भी बुलाया गया, बच्चे से पुछा गया कि तुम्हारी आखरी इच्छा क्या है? क्योंकि अाज तुम्हारा जीवन का अन्तिम दिन है। जीनल ने कहा कि ठीक है मेरे लिये रेत मँगा दिया जाये, रेत अा गया। जीनल ने रेत से चार ढ़ेर बनाये, एक-एक करके तीन रेत के ढ़ेर को तोड़ दिया और चौथे के सामने हाथ जोड़कर बैठ गई और कहा कि अब जो करना है करे। ये सब देखकर तॉत्रिक डर गये बोले कि ये तुमने क्या किया है पहले बताओं।

🔷 राजा ने भी पुछा तो जीनल ने कहा कि पहली ढ़ेरी मेरे माता पिता की है, मेरी रक्षा करना उनका कर्तव्य था पर उन्होने पैसे के लिये मुझे बेच दिया। इसलिये मैने ये ढ़ेरी तोड़ी, दुसरा मेरे सगे-सम्बन्धियों का था, उन्होंने भी मेरे माता-पिता को नही समझाया तीसरा आपका है राजा क्योंकि राज्य के सभी इंसानों की रक्षा करना राजा का ही काम होता है पर राजा ही मेरी बलि देना चाह रहा है तो ये ढ़ेरी भी मैने तोड़ दी। अब सिर्फ मेरे सदगुरुदेव और ईश्वर पर मुझे भरोसा है इसलिये ये एक ढ़ेरी मैने छोड़ दी है।

🔶 राजा ने सोचा कि पता नही बच्ची की बलि से बाद भी पुत्र प्राप्त हो या न हो क्यों ना इस लडकी को ही अपनी पुत्री बना ले, इतनी समझदार और ईश्वर भक्त लडकी है। राजा ने उस बच्ची को अपनी बेटी बना ली और वो राजकुमारी बन गई और जीनल की ईश्वर भक्त के परिणाम राजा के वहा बच्चे का जन्म हुआ।

🔷 कहानी का भाव कि जो ईश्वर और सदगुरुदेव पर यकीन रखते है, उनका बाल भी बांका नही होता है, हर मुश्किल में एक का ही जो आसरा लेते है उनका कही से किसी प्रकार का कोई अहित नही होता है।

👉 आज का सद्चिंतन 19 June 2018


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