शुक्रवार, 22 जून 2018

👉 सादा जीवन उच्च विचार अन्योन्याश्रित (भाग 5)

🔶 चुनाव दो में से एक का करना है। निकृष्ट विचार रखकर घिनौना जीवन जिया जाय, संकीर्ण स्वार्थपरता की सड़ी कीचड़ में कुलबुलाते-तिलमिलाते कीड़ों जैसा शिश्नोदर परायण बना जाय या फिर उत्कृष्ट स्तर की विचारणा अपनाकर सादगी का सौम्य सात्विक निस्पृह रहकर महानता को वरण किया जाय। दोनों में मौलिक अन्तर एक ही है। निकृष्टता आरम्भ में आकर्षक लगती है किन्तु परिणाम की दृष्टि से विघातक, विष जैसी कष्ट दायक सिद्ध होती है। इसके विपरीत उत्कृष्टता का मार्ग है जिसका आरम्भ बीज की तरह गलने जैसा होता है किन्तु कुछ समय उपरान्त, अंकुरित होने, लहलहाने एवं फूलने-फलने के अवसर निश्चित रूप में उपलब्ध होने लगते हैं। अदूरदर्शी तात्कालिक आकर्षण के लिए आतुर होते है और आटे के लोभ में गला फँसाकर बेमौत मरने वाली मछली का उदाहरण बनते हैं। दूसरे वे है जो किसान माली, विद्यार्थी या व्यवसायी की तरह अपनी श्रम साधना सत्प्रयोजन के लिए लगाते और अन्ततः बहुमूल्य फसल से अपने कोठे भरते हैं।

🔷 सादा जीवन उच्च विचार का राजमार्ग हर किसी के लिए श्रेयस्कर है। उसमें आवश्यकताओं और सुविधाओं पर इतना अंकुश लगाना पड़ता है, जिसमें शरीर को मात्र औसत नागरिक जितनी व्यवस्था जुट सके। वैयक्तिक आकाँक्षाओं को इतना ही स्वल्प एवं सीमित रहना चाहिए ताकि संसार में जितने साधन हैं उन्हें मिल बाँटकर खाया जा सके। हर किसी के हिस्से में गुजारे जितना आ सके। ऊँची दीवार उठाने के लिए कहीं न कहीं गड्ढा करना पड़ता है। अमीर बनने में, विलास वैभव जुटाने में जिस सम्पदा की आवश्यकता पड़ती है उसका संचय बिना दूसरों का रक्त पीये अपनी कोठी तिजोरी की शोभा बढ़ाने के लिए जमा हो ही नहीं सकती।

🔶 जो अधिक उपार्जन करने योग्य हैं उनके ऊपर एक अतिरिक्त उत्तरदायित्व यह आता है कि सादगी से गुजारा करने के उपरान्त जो बचता है उसे सत्प्रयोजनों के लिए हाथों हाथ लौटा दें। वरिष्ठता के बदले श्रेय मिलने का सौभाग्य ही पर्याप्त है। उपार्जन अभिवर्धन की, कौशल व्यवस्था और सूझबूझ की विशेषता का प्रतिफल इतना ही हो सकता है कि उन्हें सराहा, सम्मानित किया और श्रेय दिया जाय। इसके बदले उन्हें अधिक सम्पदा सुविधाओं जैसे लाभों की न तो माँग ही करनी चाहिए और न वैसा कुछ उन पर लादकर गरिमा का अपहरण ही होना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

गुरुवार, 21 जून 2018

👉 सादा जीवन उच्च विचार अन्योन्याश्रित (भाग 4)

🔷 कौशल, पराक्रम, श्रम समय और वैभव यह सभी विभूतियाँ ईश्वर प्रदत्त हैं। इसी को समाज प्रदत्त भी कहा जा सकता है। अन्यथा एकाकी स्थिति में तो वन-मनुष्य जैसी आदिम स्थिति में भी रहा जा सकता है। जिसने दिया है उसे कृतज्ञता पूर्वक लौटा देने में ही भलमनसाहत है। इसे अपनाने में जो दुराचरण के प्रवाह प्रचलन को चीरकर अपनी शालीनता का परिचय दे पाता है वह सराहा जाता है। यह औचित्य का निर्वाह भर है। तो भी चोरों की नगरी में एक ईमानदार को भी देवता माना जाता है। आलसियों के गाँव में एक पुरुषार्थी भी मुक्त कंठ से सराहा जाता है। औसत नागरिक जैसा निर्वाह ऐसा ही औचित्य है, जिसे अपनाने के लिए नीतिमत्ता, विवेकशीलता और सद्भावना का प्रत्येक प्रतिपादन विवश करता है।

🔶 यहाँ चर्चा धन वैभव की ही नहीं हो रही है। उसमें कौशल और पराक्रम को भी सम्मिलित रखा जाता है। विद्या, बुद्धि, कला, कौशल, प्रतिभा, बलिष्ठता आदि की दृष्टि से कितनों को ही विशिष्टता प्राप्त है। समय प्रत्यक्ष धन है। पसीने के बदले ही सम्पदा कमाई जाती है या कमाई जानी चाहिए। लॉटरी से लेकर जुए, सट्टे का, जमीन में गड़ा, उत्तराधिकार से मिला या उजड्डपन से बटोरा वैभव औचित्य की मर्यादाओं से हटकर होने के कारण अग्राह्य एवं अवांछनीय है। वस्तुतः धन मनुष्य के श्रम, समय और कौशल का ही प्रतिफल होना चाहिए। इसलिए विभिन्न स्तर की विशेषताएँ विभूतियाँ भी वैभव में ही सम्मिलित होती हैं और वह अनुशासन उन पर भी लागू होता है। उसके अनुसार न्यूनतम अपने लिए और अधिकतम सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के निमित्त लगना चाहिए। मानवी गरिमा इससे कम में सधती ही नहीं। मनुष्य की मान मर्यादा इससे कम में बनती ही नहीं। इससे कम निर्धारण में वह सुयोग बनता ही नहीं।

🔷 जिस प्रकार सम्पन्नता उपार्जन के लिए अपना सब कुछ न सही बहुत कुछ नियोजित करना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार महानता अर्जित करने के लिए भी श्रम, समय एवं मनोयोग का बहुत बड़ा भाग नियोजित करना पड़ता है। यदि उन विभूतियों पर पहले से ही लोभ लिप्सा ने आधिपत्य जमा रखा हो तो फिर महानता अर्जित करने के लिए, खरीदने के लिए जिन साधनों की आवश्यकता पड़ती है वे पास में होंगे ही नहीं। तब फिर मनोरथ कैसे पूरे हो सकेंगे। मात्र कामना कल्पना करने से, पूजा पाठ करने भर से कोई भी श्रेष्ठता का वरण नहीं कर सका है। ईश्वर भक्त भी महामानवों की पंक्ति में बैठ सकने में समर्थ नहीं हुए हैं। उत्कृष्टता तो मूल्य देकर खरीदी जा सकती है। इस खरीद के दिए जो चाहिए उसे सम्पन्नता की ललक पर अंकुश लगाकर ही बढ़ाया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 आज का सद्चिंतन 21 June 2018



👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 June 2018

बुधवार, 20 जून 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 20 June 2018


👉 प्रगति सद्गुणों पर निर्भर है।

🔶 मानव जीवन की प्रगति उसके सद्गुणों पर निर्भर है। जिनके गुण कर्म स्वभाव का निर्माण एवं विकास ठीक प्रकार हुआ है वे सुसंयत व्यक्तित्व वाले सज्जन मनुष्य अनेकों बाधाओं और कठिनाइयों को पार करते हुए अपनी प्रगति का रास्ता ढूँढ़ लेते हैं। विपरीत परिस्थितियों एवं बुरे स्वभाव के व्यक्तियों को भी, प्रतिकूलताओं को भी सुसंस्कृत मनुष्य अपने प्रभाव एवं व्यवहार से बदल सकता है और उन्हें अनुकूलता में परिणत कर सकता है। इसके विपरीत जिसके स्वभाव में दोष दुर्गुण भरे पड़े होंगे वह अपने दूषित दृष्टिकोण के कारण अच्छी परिस्थितियों को भी दूषित कर देगा। संयोगवश उन्हें अनुकूलता द्वारा सुविधा प्राप्त भी हो तो दुर्गुणों के आगे वह देर तक ठहर न सकेगी। दूषित दृष्टिकोण जहाँ भी होगा वहाँ नारकीय वातावरण बना रहेगा। अनेकों विपत्तियाँ वहाँ से उलझती रहेंगी।

🔷 इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमें सद्गुणों की जननी आस्तिकता को धैर्य और विवेकपूर्वक अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए। ईश्वर का भय मनुष्य को नेक रास्ते पर चलाते रहने में सबसे बड़ा नियंत्रण है। राजकीय कानून या सामाजिक दंड की दुस्साहसी लोग उपेक्षा करते रहते है। अपराधों और अपराधियों का बाहुल्य, पुलिस और जेल का भय भी इन्हें कम नहीं कर पाता। पर यदि किसी को ईश्वर पर पक्का विश्वास हो, अपने चारों ओर प्रत्येक प्राणी में कण-कण में ईश्वर को समाया हुआ देखे, तो उसके लिए किसी के साथ अनुचित व्यवहार कर सकना संभव नहीं हो सकता। कर्मफल की ईश्वरीय अविचल व्यवस्था पर जिसे आस्था होगी वह अपना भविष्य अन्धकारमय बनाने के लिए कुमार्ग पर बढ़ने का साहस कैसे कर सकेगा? दूसरों को ठगने या परेशान करने का अर्थ है ईश्वर को ठगना या परेशान करना। ऐसी भूल उससे नहीं हो सकती जिसके मन में ईश्वर का विश्वास, भय और कर्मफल की अनिवार्यता का निश्चय गहराई तक जमा हुआ है।

🔶 सच्चरित्रता को आस्तिकता का पर्यायवाची शब्द माना जा सकता है। ढोंग जैसी झूठी भक्ति, जिसमें साढ़े  तेईस घंटे पाप करते रहने और आधे घंटे पूजा-पत्री करके सारे पापों से छुटकारा मिलने की प्रवंचना सिखाई जाती है, उपहासास्पद हो सकती है। इसी प्रकार देव दर्शन से सकल मनोरथ सहज ही पूरे जो जाने की मान्यता भी धृष्टता कही जा सकती है पर सच्चे अध्यात्म का सच्ची आस्तिकता का महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं होता। ईश्वर विश्वास का आस्तिकता का प्रतिफल एक ही होना चाहिए- सन्मार्ग का अवलम्बन और कुमार्ग का त्याग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म और कर्तव्य का अनुशासन स्थापित करने के लिए ईश्वर विश्वास से बढ़कर और कोई प्रभावशाली माध्यम हो नहीं सकता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.6

👉 Control and Refinement of Hormones – Part 2

🔶 Excessive secretion of this hormone also causes a variety of problems: the ‘engine’ –– source of energy of the body gets ‘over-charged’ and, as a result, different metabolic and biochemical reactions and physiological functions are accelerated untimely. This often gives rise to increase in pulse rate, professed perspiration, high blood pressure, excitation, hypersensitivity, mental restlessness and irritation etc.

🔷 The chemical processing of extraction of energy from the food constituents begins as soon as it reaches in the stomach.  Starch and sugar are converted into glucose. Part of this glucose goes in the blood stream and helps energize the body and maintain temperature. The remaining quantity of glucose is stored in the liver in the form of glycogen, making a stock for future energy-requirements.

🔶 In diabetic patients, the sugar level in the blood increases and the corresponding shortage of energy supplied by glucose gradually weakens the body.  This disorder in blood sugar arises due to the deficiency of insulin –– a hormone secreted by the pancreas. In healthy blood, the normal level of sugar is about one sixtieth ounce per liter.  This small amount is the fuel (source of energy) that keeps the cellular and muscular machinery warm and active.  Insulin along with another hormone adrenaline helps regulate this function.

Akhand Jyoti – June- 2003

👉 सादा जीवन उच्च विचार अन्योन्याश्रित (भाग 3)

🔶 अनावश्यक वैभव की भी ठीक ऐसी ही दुर्गति होती है। यह स्वयं तो हजार छेद बनाकर अपनी बिरादरी वालों से मिलने दौड़ता ही है, साथ ही जहाँ से भागता है वहाँ भी अनेकानेक रिसते घाव छोड़ जाता है, जो जन्म-जन्मान्तरों तक रिसते और कसकते हैं। इसलिए आदर्शों की बात सोचने वालों को सर्वप्रथम वैभव विसर्जन की तैयारी करने का परामर्श दिया जाता हैं। अन्यथा लिप्सा बनी रहने पर परमार्थ के नाम पर चित्र-विचित्र विडम्बनाएँ रचते रहने के अतिरिक्त और कुछ बन नहीं पड़ेगा। महानता और सम्पन्नता में एक प्रकार से शत्रुता है, जहाँ एक के पैर जमेंगे वहाँ दूसरे को पलायन करना पड़ेगा। तथ्य की यथार्थता एवं गम्भीरता को समझने वाले वाजिश्रवा जैसे सर्वमेध यज्ञ रचाते और अपने शरीर के कपड़े तक उतारकर परमार्थ प्रयोजन के लिए दान करते रहे हैं।

🔷 ऋषि परम्परा यही है। बुद्ध गाँधी को ही नहीं, प्रत्येक साधु और ब्राह्मण परम्परा अपनाने वालों को अपना प्रयास यही से आरम्भ करना पड़ा है। विसर्जन समर्पण बन पड़े तो ही यह आशा बँधती है कि महान के साथ एकत्व अद्वैत की स्थिति बन सके। जिस त्याग वैराग्य की शास्त्रकारों ने श्रेय मार्ग पर चलने वालों के निमित्त पग-पग पर आवश्यकता बताई है, उसमें यही रहस्य है कि जब तक तृष्णा से पिण्ड न छूटेगा तब तक श्रेष्ठता में न मन लगेगा और न तन जुटेगा। लगन कहीं लगी रहे तो फिर लकीर पीटने भर की विडम्बना ही शेष रह जाती है। उस झुनझुने से अपने आपको बहलाया फुसलाया भर जा सकता है।

🔶 परस्पर घोर मतभेद रखने वाले अध्यात्मवाद और साम्यवाद को इस केन्द्र पर सर्वथा एक मत देखा जा सकता है कि व्यक्ति को औसत नागरिक स्तर का निर्वाह क्रम अपनाने के लिए बाध्य किया जाय। अध्यात्म क्षेत्र में इसके लिए पुण्य परमार्थ का, त्याग वैराग्य का, स्वर्ग मुक्ति का दार्शनिक चक्रव्यूह रचा है। साम्यवाद ने झटके की नीति अपनाई है और आदमी की भलमनसाहत को अस्वीकार करते हुए गरदन दबोचकर जो पास पल्ले है उसे समाज की सम्पदा मानने के लिए बाधित किया है। तरीके अपने-अपने हैं। नींद की गोली खाकर मरा जाय या तलवार से गरदन कटे, मात्र तरीकों में ही भिन्नता है। आदर्शवाद की किसी भी धारा को यह स्वीकार नहीं कि मनुष्य विलासी, संग्रही, अपव्ययी बने, उद्धत विडम्बना रचे और मुफ्तखोरों के लिए उत्तराधिकार छोड़ मरे। हर दृष्टि से यह अनैतिक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 समर्पण

🔷 एक तपस्वी किसी धर्मात्मा राजा के महल में पहुँचे। राजा गदगद हो गए और कहे, "आज मेरी इच्छा है कि आपको मुँह माँगा उपहार दूँ"। तपस्वी ने कहा, "आप ही अपने मन से सबसे अधिक प्रिय वस्तु दे दें, मैं क्या माँगूँ"।

🔶 राजा ने कहा, "अपने राज्य का समर्पण कर दूँ"। तपस्वी बोले, "वह तो प्रजाजनों का है। आप तो संरक्षक मात्र हैं"।

🔷 राजा ने बात मानी और दूसरी बात कही, "महल, सवारी आदि तो मेरे हैं, इन्हें ले लें"। तपस्वी हँस पड़े और कहा, "राजन् आप भूल जाते हैं। यह सब भी प्रजाजनों का है। आपको कार्य की सुविधा के लिए दिया गया है"।

🔶 अबकी बार राजा ने अपना शरीर दान देने का विचार व्यक्त किया। उसके उत्तर में तपस्वी ने कहा, "यह भी आपके बाल−बच्चों का है, इसे कैसे दे पाएँगे"।

🔷 राजा को असमंजस में देखकर तपस्वी ने कहा, "आप अपने मन का अहंकार दान कर दें। अहंकार ही सबसे बड़ा बंधन है"।

🔶 राजा दूसरे दिन से अनासक्त योगी की तरह रहने लगा। तपस्वी की इच्छा पूर्ण हो गई।

मंगलवार, 19 जून 2018

👉 ईश्वर भक्त लडकी जीनल

🔶 एक राजा बहुत दिनो से पुत्र की प्राप्ती के लिये आशा लगाये बैठा था,पर पुत्र नही हुआ। उसके सलाहकारों ने तांत्रिकों से सहयोग की बात बताई। सुझाव मिला कि किसी बच्ची की बलि दे दी जाये तो पुत्र प्राप्ति हो जायेगी। राजा ने राज्य में ये बात फैलाई कि जो अपनी बेटी देगा उसे बहुत सारे धन दिये जायेगे।

🔷 एक परिवार में कई बच्चें थे, गरीबी भी थी, एक ऐसी बच्ची भी था जो ईश्वर पर आस्था रखती थी जिसका नाम जीनल था तथा वो सन्तों के संग सत्संग में ज्यादा समय देती थी। परिवार को लगा कि इसे राजा को दे दिया जाये क्योंकि ये कुछ काम भी नही करती है, हमारे किसी काम की भी नही। इससे राजा प्रसन्न होकर बहुत सारा धन देगा। ऐसा ही किया गया जिनल को राजा को दे दिया गया।

🔶 राजा के तात्रिकों द्वारा जीनल की बलि की तैयारी हो गई, राजा को भी बुलाया गया, बच्चे से पुछा गया कि तुम्हारी आखरी इच्छा क्या है? क्योंकि अाज तुम्हारा जीवन का अन्तिम दिन है। जीनल ने कहा कि ठीक है मेरे लिये रेत मँगा दिया जाये, रेत अा गया। जीनल ने रेत से चार ढ़ेर बनाये, एक-एक करके तीन रेत के ढ़ेर को तोड़ दिया और चौथे के सामने हाथ जोड़कर बैठ गई और कहा कि अब जो करना है करे। ये सब देखकर तॉत्रिक डर गये बोले कि ये तुमने क्या किया है पहले बताओं।

🔷 राजा ने भी पुछा तो जीनल ने कहा कि पहली ढ़ेरी मेरे माता पिता की है, मेरी रक्षा करना उनका कर्तव्य था पर उन्होने पैसे के लिये मुझे बेच दिया। इसलिये मैने ये ढ़ेरी तोड़ी, दुसरा मेरे सगे-सम्बन्धियों का था, उन्होंने भी मेरे माता-पिता को नही समझाया तीसरा आपका है राजा क्योंकि राज्य के सभी इंसानों की रक्षा करना राजा का ही काम होता है पर राजा ही मेरी बलि देना चाह रहा है तो ये ढ़ेरी भी मैने तोड़ दी। अब सिर्फ मेरे सदगुरुदेव और ईश्वर पर मुझे भरोसा है इसलिये ये एक ढ़ेरी मैने छोड़ दी है।

🔶 राजा ने सोचा कि पता नही बच्ची की बलि से बाद भी पुत्र प्राप्त हो या न हो क्यों ना इस लडकी को ही अपनी पुत्री बना ले, इतनी समझदार और ईश्वर भक्त लडकी है। राजा ने उस बच्ची को अपनी बेटी बना ली और वो राजकुमारी बन गई और जीनल की ईश्वर भक्त के परिणाम राजा के वहा बच्चे का जन्म हुआ।

🔷 कहानी का भाव कि जो ईश्वर और सदगुरुदेव पर यकीन रखते है, उनका बाल भी बांका नही होता है, हर मुश्किल में एक का ही जो आसरा लेते है उनका कही से किसी प्रकार का कोई अहित नही होता है।

👉 आज का सद्चिंतन 19 June 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 June 2018


👉 सादा जीवन उच्च विचार अन्योन्याश्रित (भाग 2)

🔶 जन मनोविज्ञान को समझने वाले जानते है कि साथियों की तुलना में बहुत अधिक विलास वैभव एकत्रित करना, गरिमा अर्जित नहीं कर पाता, वरन् आक्रोश उत्पन्न करता है जिसकी चपेट में न जाने कितने आक्रमण सहने और कष्ट उठाने पड़ते हैं। इसलिए दूरदर्शिता सदा यही कहती रही है कि सम्पन्नता अॢजत करने के अनेक खतरे हैं, जबकि सादगी अपनाने पर महानता उभरती है और जन-जन का स्नेह सहयोग घसीट लाती है।

🔷 सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त ऐसा है जिसमें जीवन की सार्थकता, सफलता और जुड़ी हुई अति प्रसन्नता के समस्त सूत्रों का समावेश है। हलका-फुलका जीवन अर्थात् सादगी, मितव्ययता और बिना विलास वैभव का सीधा सादा निर्वाह। इसके लिए औसत भारतीय स्तर को मापदण्ड मानकर चलना होता है अन्यथा यह पता ही न चलेगा कि जिस वैभव का उपभोग चल रहा है वह आवश्यक है या अनावश्यक, उचित है या अनुचित। जिसकी अपनी तृष्णा आकाश चूमती हो उसके लिए यह अनुमान लगा सकना कठिन है कि औसत मनुष्य को किस स्तर का निर्वाह अपनाना पड़ता है। वे सदा धन कुबेरों के सपने देखते है और तस्करों, लोलुपों और निष्ठुरों के द्वारा अपनाये जाने जैसे विलास वैभव को स्वाभाविक मानते हैं।

🔶 इस राह पर चलते तो अनेकों हैं, जो चल नहीं पाते वे भी ललक वैसी ही सँजोये रहते हैं। परिणति स्पष्ट हैं, साधनों के रहते हुए भी उनका इच्छित रसास्वादन तो कदाचित ही कोई कर पाते हों। मधुमक्खियों के वैभव को कौन सहन करता है। छत्ता तोड़ने के लिए बहेलिये ही नहीं, गिद्ध और बन्दर तक घात लगाये रहते हैं। यह अपहरण चापलूसी के औजार से किया गया या गला मरोड़ने वाले नागपाश से, यह बात दूसरी है।

🔷 बढ़ा हुआ वैभव रुदन के अतिरिक्त और कुछ उत्पन्न नहीं कर सकता। उससे दुर्व्यसन और अहंकार समान रूप में बढ़ते हैं। यह दोनों ही ऐसे हैं जो शहतीर में लगे घुन की तरह उसे गुप-चुप खोखला करते और धराशायी करने तक अपने प्रयास में निरत रहते हैं। अधिक जोड़ने की, अधिक भोगने की ललक में मनुष्य कुकृत्य तो करते ही हैं, उसका खर्च भी सीधे रास्ते नहीं होता। या तो मनुष्य स्वयं उसे दुर्व्यसनों में उड़ाता है या फिर ईर्ष्यालुओं के आक्रमण का शिकार बनता है। पारा किसी को पचता नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Control and Refinement of Hormones

🔶 At a superficial level, it appears that some chemical processing of the food intakes generates blood, and that the flow of blood is the source of heat and energy in the body.  However, deeper analysis has shown that there is a separate mechanism at the root of all functions inside the body, which gives rise to the formation of blood and maintenance of body-energy.  The auto-regulatory system of the neurons and the influence of the conscious and unconscious mind on it are also now regarded as a manifestation of some subtler processes.

🔷 The hormone secreting endocrine glands constitute this subtle system, which is now found to be the basic controller of all functions, qualities, abilities or disabilities of the bodily and mental functions. The thyroid gland secrets a hormone called thyroxin, which enters the blood stream and reaches different parts of the body. Deficiency of this hormone reduces the absorption rate of oxygen, which often results in disruption of metabolic functions, excessive fatigue, loss of memory and bluntness of mind.

🔶 Also, the skin and hair become dry, lips and eyelids become lose and appear as pulled downwards. The body fattens and its plumpness is such that pressing a finger makes a groove (depression) in the swollen part. One is unable to bear chill and feels tired because of the reduced level of this hormone.  Growth of the thyroid gland results in a swollen, protuberant throat and gives rise to the diseases like goiter. The reasons for abnormal shrinkage or growth of this gland are not fully understood. It may malfunction even if one’s diet is balanced and the daily routine is also maintained at a level, which is normally prescribed for a healthy person.

📖 Akhand Jyoti- June- 2003

👉 ईश्वर उपासना

🔶 ईश्वर उपासना मानव जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है। आत्मिक स्तर को सुविकसित, सुरक्षित एवं व्यवस्थित रखने के लिए हमारी मनोभूमि में ईश्वर के लिए समुचित स्थान रहना चाहिए और यह तभी संभव है जब उसका अधिक चिन्तन, मनन, अधिक सामीप्य, सान्निध्य प्राप्त करते रहा जाय। भोजन के बिना शरीर का काम नहीं चल सकता, साँस लिए बिना रक्ताभिषरण की प्रक्रिया बिगड़ जाती है। इसी प्रकार ईश्वर की उपेक्षा करने के उपरान्त आन्तरिक स्तर भी नीरस, चिन्ताग्रस्त, अनिश्चित, अनैतिक, अव्यवस्थित एवं आशंकित बना रहता है। यह हानि कुछ कम हानि नहीं है। दीखने वाली हानियों को लोग आसानी से समझ लेते हैं, पर इस जीवन के सारे आनन्द और उद्देश्य को ही नष्ट कर देने वाली हानि को हम न तो देख पाते हैं और न समझते ही हैं। यह कैसे दुर्भाग्य की बात है।

🔷 मानव जीवन की प्रगति और सुख-शान्ति आन्तरिक स्तर की उत्कृष्टता पर निर्भर रहते हैं। इस उत्कृष्टता की पुष्टि एवं अभिवृद्धि के लिए ही उपासना तंत्र का आविर्भाव हुआ हैं। भौतिक सुख- साधन, बाहुबल और बुद्धिबल के आधार पर कमाये जा सकते हैं पर गुण-कर्म-स्वभाव की उत्कृष्टता पर निर्धारित समस्त विभूतियाँ हमारे आन्तरिक स्तर पर ही निर्भर रहती हैं। इस स्तर के सुदृढ़ और समुन्नत बनाने में उपासना का भारी योग रहता है। इसलिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों की भाँति ही उपासना को दैनिक कार्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, आहार, विश्राम, सफाई, गृहस्थ पालन, विद्याध्ययन, मनोरंजन आदि का ध्यान रखा जाता है, वैसा ही ध्यान उपासना का भी रखा जाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.5

सोमवार, 18 जून 2018

👉 Concentration – an essential pre-requisite for spiritual unfoldment (Part 2)

🔷 The goal of a sadhak is to become more and more introspective. Therefore, closing the eyes, the mind should be fixed on the import of a mantra. The recitation of mantra should be done along with meditation. A japa done in this awakened manner helps in controlling the waywardness of mind and in making it introspective. The acrobats of a circus perform miraculous feats as a result of their concentration and practice. Siddha purushas with concentration of their spiritual and mental energies are able to become the masters of several siddhis.

🔶 The scattered sunrays cannot burn even a thread, but when the same rays are focused with the help of a convex lens, a spark of fire is produced, capable of burning anything. Similarly when five karmendriyas and five gyanendriyas are not attracted towards their objects of desire, the mind becomes stable. In meditation, when the external world of objects and the false ego-self are forgotten, it should be assumed that the mind is getting quietened. Thus regular sadhana of concentration will lead the sadhak to higher dimensions of consciousness beyond the ordinary mind, instinct with paranormal ranges of light, life and bliss.

🔷 There are several unique occult powers lying dormant in the deeper layers of our consciousness. If the gunpowder is scattered on the ground and is lit, it will burn like ordinary things and nothing special will happen. But if the same gunpowder is fired through the barrel of a gun it can even pierce through the hardest steel. In the same way, if our mind remains shallow and scattered, it will be ineffective in attaining anything worthwhile and we will lead a life without purpose.

📖 Akhand Jyoti Mar-2002

👉 सादा जीवन उच्च विचार अन्योन्याश्रित (भाग 1)

🔷 निर्वाह की दृष्टि से जीवन क्रम हलका-फुलका होना चाहिए। लिप्सा लालसाओं से लदी जिन्दगी बहुत भारी पड़ती है। महत्त्वाकांक्षी लोग न चैन से बैठते है न दूसरों को बैठने देते हैं। बड़प्पन का नशा विज्ञात नशों में सबसे बुरा है। कुबेर और इन्द्र बनने की ललक में रावण और हिरण्यकश्यपु जैसा वैभव बटोरने की रट लगाते-लगाते कितने चंगेज खाँ और सिकन्दर इस दुनिया से हाथ मलते उठ गये, फिर अपने जैसे मक्खी मच्छरों की क्या स्थिति, जिनके पास न कौशल है, न पराक्रम, न साधन। वितृष्णा इतना ही कर सकती है कि इस चन्द दिन तक जीने के लिए मिले हुए सुयोग का अपहरण कर ले। मृगतृष्णा में भटकने वाले दिवास्वप्न देखते और निराशा, खीज़, थकान भर पल्ले पड़ने से मूर्खता पर सिर धुनते हैं।

🔶 यदि विलास और वैभव ही सब कुछ रहे और अहंता के प्रदर्शन बिना चैन न पड़े तो एक बात और भी गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि इस प्रयास में उन सभी सम्भावनाओं को समाप्त करना होगा जो हर घड़ी प्रसन्नता बनाये रहती हैं। जिसके कारण चेहरे पर मुस्कान और अन्तराल में संतोष भरे उल्लास को छलकते देखा जाता है। मानवी गरिमा को अक्षुण्ण और सुविकसित बनाये रहने के लिए बहुत कुछ सोचना और बहुत कुछ करना होता है। इस हेतु जिन साधनों की आवश्यकता पड़ती है उन्हें पूरी तरह वह व्यामोह अजगर की तरह निगल जाता है, जिसमें दर्प के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं।

🔷 साथियों को नीचा दिखाकर अपनी गरिमा सिद्ध करने वाले ठाट-बाट तो बना लेते हैं, पर जिस लोक सम्मान की आशा से वह सब किया गया था, उसे मिलने की कोई आशा की किरण दीखती नहीं। उलटी ईर्ष्या भड़कती है। भूखों की मण्डली में बैठकर जब एक कोई रबड़ी चाटता है तो सौभाग्यशाली कहलाने का श्रेय कहाँ बटोर पाता है। उलटा आक्रोश बरसता है और निष्ठुरता का लांछन लगता है। लगे हाथों कहने वाले यह भी कहते है कि यह अनीति उपार्जन है, अन्यथा ईमानदार होने पर तो यह हमारे जैसा ही रहता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 आध्यात्मिकता की मुसकान

🔷 इस संसार में सब कुछ हँसने को लिए उपजाया गया है। जो बुरा और अशुभ है वह हमारी प्रखरता की चुनौती के रूप में है। परीक्षा के प्रश्न पत्रों के देखकर जो छात्र रोने लगे, उसे अध्ययनशील नहीं माना जा सकता। जिसने थोड़ी-सी आपत्ति-असफलता एवं प्रतिकूलता को देखकर रोना-धोना शुरू कर दिया, उसकी आध्यात्मिकता पर कौन विश्वास कर सकता है? प्रतिकूलता हमारा साहस बढ़ाने, धैर्य को मजबूत करने और सामर्थ्य को विकसित करने आती है। सरल जिन्दगी यदि संयत हो सके तो वह सबसे भद्दे ढंग की ही होगी क्योंकि वह जो सरलता पूर्वक दिन गुजारता रहता है उसमें न तो किसी प्रकार की विशेषता रह जाती है और न प्रतिभा। संघर्ष के बिना भी भला कहीं, इस दुनिया में किसी का जीना सम्भव हुआ है।

🔶 नई उपलब्धियों में हमें हँसना चाहिए, अब तक मिल चुका उससे सन्तोष व्यक्त करना चाहिए और भविष्य की शुभ सम्भावनाओं की कल्पना करके सदा प्रमुदित होते रहना चाहिए। रोना एक अभिशाप है जो केवल अविवेकी लोगों को शोभा देता है। जिसे आत्मा के स्वरूप का ज्ञान है और परमात्मा की महत्ता, कुशलता और विनोद को समझता है उसे हँसने मुस्कराने की परिस्थितियों के अतिरिक्त और कुछ इस जीवन में अनुभव ही क्या हो सकता है?
        
✍🏻 ~ महर्षि रमण
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 1

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