सोमवार, 23 अप्रैल 2018
👉 शरीर भगवान का मन्दिर
🔷 मन्दिर को सजाने-सँवारने में भगवान को भुला देना निरी है । किन्तु देवालयों को गन्दा, तिरस्कृत, जीर्ण-शीर्ण रखना भी पाप माना जाता है । इसी प्रकार शरीर को नश्वर कहकर उसकी उपेक्षा करना अथवा उसे ही सजाने-सॅंवारने में सारी शक्ति खर्च कर देना, दोनों ही ढंग अकल्याणकारी हैं हमें सन्तुलन का मार्ग अपनाना चाहिए । शारीरिक आरोग्य के मुख्य आधार आत्म-संयम एवं नियमितता ही हैं, इनकी उपेक्षा करके मात्र औषधियों के सहारे आरोग्य लाभ का प्रयास मृगमरीचिका के अतिरिक्त और कुछ नहीं है ।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (५.५)
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (५.५)
👉 The Body – A Temple of God
🔷 In efforts of decorating the temple, neglecting God himself is a gross mistake, and at the same time, keeping temples neglected and shabby is considered a sin. Similarly, neglecting this human body, thinking it as transient, or over indulgence in adorning it - both the approaches are harmful. We have to strike a balance between the two. The basic foundation of sound physical health is self-control and discipline only, hence neglecting them and desiring better health with medicines and tonics is nothing but an illusion, a mirage.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana – The Vision, Structure and the Program – 66 (5.5)
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana – The Vision, Structure and the Program – 66 (5.5)
👉 बहुमूल्य जीवन
🔷 मित्रो ! अभागों की दुनियाँ अलग है और सौभाग्यवानों की अलग। अभागे जिस-तिस प्रकार लालच को पोषते, अविवेकी प्रजनन में निरत रहकर कमर तोडऩे वाला बोझ लादते, व्यामोह में तथाकथित अपनों को कुसंस्कारी बनाते, अपव्ययी, असंयमी रहकर दुव्र्यसनों के शिकार बनते, अहंता के परिपोषण में समय बिताते हैं। रोते-कलपते, खीजते-खिजाते, डरते-डराते, छेड़ते-पीटते लोगों के ठट्ठ के ठट्ठ हर गली चौराहों पर खड़े देखे जा सकते हैं। इन्हीं दुर्दशाग्रस्तों की भीड़ में जा घुसना समझदारी कहाँ है?
🔶 भगवान किसी को उच्च शिक्षा से वंचित भले ही रखे पर इतनी समझ तो दे कि हित-अनहित में अंतर करना आए। भले ही शूर-वीर योद्धा बनने का श्रेय किसी को न मिले पर इतनी सूझ-बूझ तो रहे कि मनुष्य जीवन बहुमूल्य है और उसे सार्थक बनाने के लिए भीड़ के साथ न चलने और अपना रास्ता आप चुनने जितना विवेक तो चाहिए ही।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग धर्म पृष्ठ नं-८
🔶 भगवान किसी को उच्च शिक्षा से वंचित भले ही रखे पर इतनी समझ तो दे कि हित-अनहित में अंतर करना आए। भले ही शूर-वीर योद्धा बनने का श्रेय किसी को न मिले पर इतनी सूझ-बूझ तो रहे कि मनुष्य जीवन बहुमूल्य है और उसे सार्थक बनाने के लिए भीड़ के साथ न चलने और अपना रास्ता आप चुनने जितना विवेक तो चाहिए ही।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग धर्म पृष्ठ नं-८
👉 Lord Jagannath
🔷 It was the time of aarti. The temple of Lord Jagannath was reverberating with the elevating sounds of conch-blowing and bell-ringing. Standing by the side of Garuda-pillar, Mahaprabhu Chaitanya was immersed in singing the glory of God. The gathering of devotees inside was swelling by the moment.
🔶 Fresh arrivals were finding it difficult to get a darshan (view) of the Lord’s image. An oriya woman, having exhausted all the attempts at darshan, climbed the Guruda pillar, planted one leg on the Mahaprabhu could not stand this audacity of the woman and started rebuking her. But the Mahaprabhu stopped him and said: “Why interfere? Let her continue with her darshan. Alas! Had I too possessed her intense thirst for darshan, I would have been blessed.”
🔷 As soon as Mahaprabhu had spoken these words, the women jumped down and fell at his feet begging forgiveness. Mahaprabhu withdrew his feet and consoled her: “Arey! What are you doing? It is I who should bow at your jeet so that I, too, may be filled with the devout longing for the Lord as you are”.
📖 From Akhand Jyoti
🔶 Fresh arrivals were finding it difficult to get a darshan (view) of the Lord’s image. An oriya woman, having exhausted all the attempts at darshan, climbed the Guruda pillar, planted one leg on the Mahaprabhu could not stand this audacity of the woman and started rebuking her. But the Mahaprabhu stopped him and said: “Why interfere? Let her continue with her darshan. Alas! Had I too possessed her intense thirst for darshan, I would have been blessed.”
🔷 As soon as Mahaprabhu had spoken these words, the women jumped down and fell at his feet begging forgiveness. Mahaprabhu withdrew his feet and consoled her: “Arey! What are you doing? It is I who should bow at your jeet so that I, too, may be filled with the devout longing for the Lord as you are”.
📖 From Akhand Jyoti
👉 गुरुगीता (भाग 92)
👉 सत् चित् आनन्दमयी सद्गुरु की सत्ता
🔷 इस सम्बन्ध में एक अनुभूत कथा है। यह कथा सन्त हरिहर बाबा के एक शिष्य जगतराम की है। यह जगतराम बनारस के पास एक गाँव का अनपढ़-गँवार लड़का था। अपने गाँव में गाय-भैंस आदि जानवर चराया करता था। न जाने किस प्रेरणा से बाबा के पास आ गया। उसके पास इतनी बुद्धि नहीं थी कि उसे कुछ विशेष समझाया जा सके, लेकिन फिर भी उसे भगवान् की भक्ति करने की लगन थी, पर भगवान् को तो वह जानता नहीं था। सो उसने अपने गुरुदेव हरिहर बाबा को ही भगवान् मान लिया था। बस, उसे बाबा की एक बात समझ में न जाने कैसे आ गई थी कि इंसान जो सोचता है, एक दिन वही बन जाता है। इसलिए जो तुम चाहते हो, सो सोचा करो। बड़ी आसान और सहज बात थी, यह मन में जम गई। सरल चित्त जगतराम को तो अपने गुरु में भगवान् को पाना था। उसे गुरुभक्ति में भगवद्भक्ति करनी थी।
🔶 बस, इसी लगन के साथ वह अपनी सोच में तल्लीन हो गया। उसे आसन, बन्ध, मुद्राएँ, प्राणायाम एवं ध्यान आदि क्रियाएँ तो आती न थीं। शास्त्र को न तो उसने पढ़ा था और न सुना था। कठिन-कठिन बातें उसे समझ में न आती थीं। बस, एक बात मन में थी, जो चाहिए उसे सोचो। जो सोचोगे, वैसा अपने आप मिलेगा। हरिहर बाबा के इस कथन को उसने अपने जीवन का महामंत्र मान लिया। उसे जब भी समय मिलता, गंगा किनारे बैठकर हरिहर बाबा की छवि का ध्यान करते हुए मन ही मन उनकी पूजा किया करता। मंदिर में पूजा होती उसने देखी थी, बस, वह अपने गुरु की वैसी ही पूजा करता। धूप, दीप, नैवेद्य, आरती सब कुछ मंदिर की भाँति वह मन ही मन करता, लेकिन प्रत्यक्ष में उसके पास न तो कोई साधन होता और न सामान। अपने इस काम में उसे न तो दिन दीखता और न रात।
🔷 चिलचिलाती धूप हो या फिर कड़ाके की ठण्ड, सुबह का उजाला हो या शाम का अँधेरा या फिर घनी काली रात, उसे तो बस अपने गुरु की भावपूजा भाती थी। इस पूजा में वह अपने सारे भाव उड़ेल देता। ऐसी पूजा करते हुए कई बरस बीत गये। एक रात जब वह भावपूजा में लीन था, तो उसे ऐसा लगा, जैसे कि हरिहर बाबा सचमुच ही उसके पास आ खड़े हुए हों। बस, इस आ खड़े होने में फरक यह था कि यह उनका प्रकाश शरीर था। उसे ऐसा लग रहा था, जैसे हरिहर बाबा के शरीर के सारे अंग प्रकाश के बने हों। बड़ी भक्ति से वह मन ही मन अपने गुरुदेव को निहारता रहा। इस प्रक्रिया में उसे कितना समय बीता याद नहीं। याद तो उसे तब आई, जब उसे अनुभव हुआ कि गुरुदेव का सम्पूर्ण प्रकाश शरीर एकाएक बिखर कर उसके रोम-रोम में समा गया।
🔶 सम्पूर्ण प्रकाश न केवल उसमें लीन हुआ, बल्कि लीन होकर उसके ही अन्दर घनीभूत होने लगा। हृदय स्थल पर वह सम्पूर्ण प्रकाशज्योति के रूप में घनीभूत हो गया। यह सारा वाकया कुछ ही समय में घटित हो गया। हृदय मध्य में अंगुष्ठज्योति प्रकाशित हो उठी और साथ ही सुनाई दी हरिहर बाबा की चिर-परिचित वाणी-‘बेटा जगत! अब से तू ज्योति के बारे में सोचा कर। इसी को निहार, इसी को देख, इसी की भक्ति कर।’ जो आज्ञा बाबा! कहते हुए जगतराम ने अपने कार्यक्रम में थोड़ा फेरबदल कर लिया। स्थिति वही रही, बस सोचने का केन्द्रबिन्दु बदल गया। इस अंगुष्ठज्योति को निहारने में दिन-रात बीतने लगे। सालोंसाल यही क्रिया चलती रही। जाड़ा-गरमी, धूप-छाँव पहले की ही भाँति गुजर गये। उसे होश तब आया, जब फिर से एक रात्रि को दृश्य बदला।
🔷 अब की बार उसने अनुभव किया कि उसकी वही हृदयज्योति अचानक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो गई। सृष्टि का कण-कण उसी से प्रकाशित है। इस प्रकाश की धाराएँ उसे न जाने कब से कब तक नहलाती रहीं। वह अनूठी भावसमाधि में बेसुध बना रहा। उसके तन, मन, प्राण, भाव, बुद्धि सब प्रकाशित हो गये। जब उसे होश आया, तब उसने देखा कि उसके गुरु हरिहर बाबा खड़े हैं, जो उसे बड़े प्यार से निहार रहे हैं। उनकी आँखों में अपूर्व वात्सल्य था। इसी वात्सल्य से सने स्वरों में वे उससे बोले- ‘बेटा! जो गुरु है—वही आत्मा है, जो आत्मा है—वही परमात्मा है।’ जो इन तीनों को एक मानता है, वही सचमुच का ज्ञानी है। उनकी यह वाणी शिष्यों की धरोहर बन गई।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 138
🔷 इस सम्बन्ध में एक अनुभूत कथा है। यह कथा सन्त हरिहर बाबा के एक शिष्य जगतराम की है। यह जगतराम बनारस के पास एक गाँव का अनपढ़-गँवार लड़का था। अपने गाँव में गाय-भैंस आदि जानवर चराया करता था। न जाने किस प्रेरणा से बाबा के पास आ गया। उसके पास इतनी बुद्धि नहीं थी कि उसे कुछ विशेष समझाया जा सके, लेकिन फिर भी उसे भगवान् की भक्ति करने की लगन थी, पर भगवान् को तो वह जानता नहीं था। सो उसने अपने गुरुदेव हरिहर बाबा को ही भगवान् मान लिया था। बस, उसे बाबा की एक बात समझ में न जाने कैसे आ गई थी कि इंसान जो सोचता है, एक दिन वही बन जाता है। इसलिए जो तुम चाहते हो, सो सोचा करो। बड़ी आसान और सहज बात थी, यह मन में जम गई। सरल चित्त जगतराम को तो अपने गुरु में भगवान् को पाना था। उसे गुरुभक्ति में भगवद्भक्ति करनी थी।
🔶 बस, इसी लगन के साथ वह अपनी सोच में तल्लीन हो गया। उसे आसन, बन्ध, मुद्राएँ, प्राणायाम एवं ध्यान आदि क्रियाएँ तो आती न थीं। शास्त्र को न तो उसने पढ़ा था और न सुना था। कठिन-कठिन बातें उसे समझ में न आती थीं। बस, एक बात मन में थी, जो चाहिए उसे सोचो। जो सोचोगे, वैसा अपने आप मिलेगा। हरिहर बाबा के इस कथन को उसने अपने जीवन का महामंत्र मान लिया। उसे जब भी समय मिलता, गंगा किनारे बैठकर हरिहर बाबा की छवि का ध्यान करते हुए मन ही मन उनकी पूजा किया करता। मंदिर में पूजा होती उसने देखी थी, बस, वह अपने गुरु की वैसी ही पूजा करता। धूप, दीप, नैवेद्य, आरती सब कुछ मंदिर की भाँति वह मन ही मन करता, लेकिन प्रत्यक्ष में उसके पास न तो कोई साधन होता और न सामान। अपने इस काम में उसे न तो दिन दीखता और न रात।
🔷 चिलचिलाती धूप हो या फिर कड़ाके की ठण्ड, सुबह का उजाला हो या शाम का अँधेरा या फिर घनी काली रात, उसे तो बस अपने गुरु की भावपूजा भाती थी। इस पूजा में वह अपने सारे भाव उड़ेल देता। ऐसी पूजा करते हुए कई बरस बीत गये। एक रात जब वह भावपूजा में लीन था, तो उसे ऐसा लगा, जैसे कि हरिहर बाबा सचमुच ही उसके पास आ खड़े हुए हों। बस, इस आ खड़े होने में फरक यह था कि यह उनका प्रकाश शरीर था। उसे ऐसा लग रहा था, जैसे हरिहर बाबा के शरीर के सारे अंग प्रकाश के बने हों। बड़ी भक्ति से वह मन ही मन अपने गुरुदेव को निहारता रहा। इस प्रक्रिया में उसे कितना समय बीता याद नहीं। याद तो उसे तब आई, जब उसे अनुभव हुआ कि गुरुदेव का सम्पूर्ण प्रकाश शरीर एकाएक बिखर कर उसके रोम-रोम में समा गया।
🔶 सम्पूर्ण प्रकाश न केवल उसमें लीन हुआ, बल्कि लीन होकर उसके ही अन्दर घनीभूत होने लगा। हृदय स्थल पर वह सम्पूर्ण प्रकाशज्योति के रूप में घनीभूत हो गया। यह सारा वाकया कुछ ही समय में घटित हो गया। हृदय मध्य में अंगुष्ठज्योति प्रकाशित हो उठी और साथ ही सुनाई दी हरिहर बाबा की चिर-परिचित वाणी-‘बेटा जगत! अब से तू ज्योति के बारे में सोचा कर। इसी को निहार, इसी को देख, इसी की भक्ति कर।’ जो आज्ञा बाबा! कहते हुए जगतराम ने अपने कार्यक्रम में थोड़ा फेरबदल कर लिया। स्थिति वही रही, बस सोचने का केन्द्रबिन्दु बदल गया। इस अंगुष्ठज्योति को निहारने में दिन-रात बीतने लगे। सालोंसाल यही क्रिया चलती रही। जाड़ा-गरमी, धूप-छाँव पहले की ही भाँति गुजर गये। उसे होश तब आया, जब फिर से एक रात्रि को दृश्य बदला।
🔷 अब की बार उसने अनुभव किया कि उसकी वही हृदयज्योति अचानक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो गई। सृष्टि का कण-कण उसी से प्रकाशित है। इस प्रकाश की धाराएँ उसे न जाने कब से कब तक नहलाती रहीं। वह अनूठी भावसमाधि में बेसुध बना रहा। उसके तन, मन, प्राण, भाव, बुद्धि सब प्रकाशित हो गये। जब उसे होश आया, तब उसने देखा कि उसके गुरु हरिहर बाबा खड़े हैं, जो उसे बड़े प्यार से निहार रहे हैं। उनकी आँखों में अपूर्व वात्सल्य था। इसी वात्सल्य से सने स्वरों में वे उससे बोले- ‘बेटा! जो गुरु है—वही आत्मा है, जो आत्मा है—वही परमात्मा है।’ जो इन तीनों को एक मानता है, वही सचमुच का ज्ञानी है। उनकी यह वाणी शिष्यों की धरोहर बन गई।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 138
शनिवार, 21 अप्रैल 2018
👉 टकराव के तीन सिद्धांत
🔶 टकराव का लक्ष्य अन्य व्यक्ति को नीचा दिखाना अथवा व्याकुल करना नहीं है।
🔷 किसी का सामना करना कठिन होता है, क्योंकि कई बार इस का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति संताप में डूब जाता है। आप जिस से टकराव कर रहे हैं वह व्यक्ति असहमति प्रकट कर सकता है, विरोध कर सकता है, अथवा यदि वह ईमानदार हो तो क्षमा भी मांग सकता है। परंतु यह संवाद कभी भी इतना सरल एवं सुखद नहीं होता। यह संवाद दो दलों या सरकारों के बीच हो सकता है, या फिर पती-पत्नी, माता-पिता और संतान, दो मित्र या एक प्रबंधक एवं कार्यकर्ता के बीच हो सकता है। कभी कभी सकारात्मक एवं रचनात्मक रूप से आमना सामना करना ही असहमति को दूर करने का एक मात्र मार्ग होता है। किसी से टकराव करना एक प्रकार का संवाद है – एक अवांछनीय संवाद जिस से व्यक्ति अपने को दोषी, लज्जित एवं क्रोधित महसूस कर सकता है। तो लीजिए मैं आप के सामने प्रस्तुत करता हूँ टकराव के तीन अमूल्य सिद्धांत।
🔶 ऊँचे स्वर में बात न करें
🔷 यदि आप किसी भी सकारात्मक परिणाम की आशा कर रहे हैं तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि आप चिल्लायें नहीं। इस विषय पर विचार करें – हम किसी का सामना इसलिए करते हैं क्योंकि हम चाहते हैं कि वह हमारी बात सुने तथा अपनी लापरवाही को स्वीकार करे अथवा यह स्वीकार करे कि उस के कारण हमे पीड़ा पहुँची है। इस का एक मात्र मार्ग है कि आप ऊँचे स्वर में बात न करें। क्यों? मानव मन सुखद वार्तालाप करने के लिए स्वाभाविक रूप से उत्सुक है। जब आप धीमे स्वर में बात करेंगे तो हो सकता है कि वे आप से सहमत ना हों, परंतु उनका मस्तिष्क उन्हें आप की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देगा। वार्तालाप करने और विवाद करने में प्राथमिक अंतर स्वर की ध्वनि एवं प्रबलता है। वार्तालाप एवं विवाद दोनों करते समय असहमति हो सकती है परंतु बहस के समय दोनों व्यक्ति केवल स्वयं बात करने में मग्न रहते हैं, दूसरों की सुन ने में नहीं। जब आप किसी पर चिल्लाते हैं, वे तुरंत ही मानसिक रूप से स्वयं को आप से दूर कर देते हैं। उनका मन वार्तालाप को छोड़ विषय से दूर हट जाता है अथवा आत्मरक्षात्मक हो जाता है। परंतु यदि आप सामान्य स्वर में बात करें, हो सकता है कि आप को लगे वे स्थिति की गंभीरता को समझ नहीं पा रहे हैं, किंतु अवश्य ही आप के शब्द उन के मन में घुस जाएंगे। हाँ इस का यह अर्थ नहीं कि वे अपना व्यवहार अवश्य ही बदल देंगे।
🔶 आक्रामक रूप से बात न करें
🔷 याद रखें कि किसी का सामना करने का लक्ष्य यह है कि वह व्यक्ति आप के दृष्टिकोण को समझ सके तथा वह अपना व्यवहार बदले। आक्रामक रूप से बात कर के या उनकी निंदा कर के आप इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। उन्हें प्रायश्चित करने का अवसर दें। आप यह मान कर चलें कि उन से एक भूल हो गई। फिर वार्तालाप को इस विषय पर केंद्रित रखें कि कैसे उनका व्यवहार आप को या आप दोनों के रिश्ते को हानी पहुँचा रहा है अथवा कैसे यह उनके हित में नहीं है। ऐसा करने पर वह आप की बात और ध्यान से सुनेंगे। किंतु यदि हम उनकी आक्रामक रूप की आलोचना करें, उन्हें दोषी ठहरायें तब हम स्वतः दोनों के बीच एक विशाल बाधा खड़ा कर देते हैं। वे आत्मरक्षात्मक हो जाते हैं तथा अपनी सुरक्षा के लिए प्रत्याक्रमण करते हैं। इस कारण दोनों व्यक्तियों में दूरी और बढ़ जाती है, वे क्रोधित हो जाते हैं और टकराव करने के उद्देश्य की पूर्ती ही नहीं हो पाती।
🔶 विषय से न भटकें
🔷 तीनों सिद्धांतों में यही सबसे कठिन है। कई बार जब हम किसी से टकराव करते हैं वे उस विषय को टालना या उस से दूर रहना चाहते हैं। किसी प्रकार के स्पष्टीकरण, क्षमा याचना या परिणामों से बचने के लिए, वास्तविक मुद्दे से भटकने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। यदि दोनों व्यक्ति भावनात्मक हो कर विषय से भटकने लगें तो वार्तालाप में किसी प्रकार की संवेदनशीलता बनाए रखना असंभव हो जाता है। शीघ्र ही ऐसा वार्तालाप एक बहस अथवा एक कटुतापूर्ण असहमति बन जाएगा। जब अन्य व्यक्ति विषय से भटकने लगते हैं, तो आप सम रहकर उन्हें बात पूरी कर लेने दें, फिर विनम्रता से वार्तालाप को प्राथमिक विषय पर ले आएं। यदि आप भी विषय से भटकते हैं तो यह केवल एक व्यर्थ वाद विवाद बन कर रह जाएगी जिसका कोई सफल परिणाम नहीं होगा। यह अति आवश्यक है कि आप केवल मुद्दे पर ही केंद्रित रहें तथा संक्षिप्त रूप से बात करें। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी से उन के देर से आने के विषय में बात करना चाहते हैं, तो केवल वर्तमान उदाहरण के विषय में ही बात करें। यह ना कहें कि वे सदैव देर से आते हैं, या वे कुशल या सक्षम नहीं हैं।
🔶 याद रखें कि किसी से टकराव करने का उद्देश्य यह है कि आप उस व्यक्ति को यह अहसास दिला सकें कि आप उसके कुछ कार्यों से असहमत हैं तथा उन कार्यों को नापसंद करते हैं। उद्देश्य उन को नीचा दिखाना नहीं है। इसलिए परिणाम इस पर निर्भर है कि आप किन शब्दों का प्रयोग करते हैं, किस स्वर में बात करते हैं, ठीक किस समय बात करते हैं तथा आप के शरीर के हाव-भाव कैसे हैं। किंतु यदि आप को बार बार एक ही विषय पर किसी का सामना करना पड़े, फिर तो उन में परिवर्तन लाने की आशा बहुत कम है, क्योंकि बुद्धिमान के लिए तो संकेत ही पर्याप्त है। यदि वह व्यक्ति स्वयं की भूल को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं, तो किसी भी प्रकार के संवाद का कोई परिणाम नहीं निकल सकता।
🔷 मुल्ला नसरुद्दीन से उसका गधा उधार लेने के लिए उस का एक मित्र उस के पास आया। “मेरा गधा तो कल रात को ही भाग गया। और अब मुझे वह मिल नहीं रहा है”, मुल्ला ने कहा। संशयपूर्ण ढंग से उसके मित्र ने उसे देखा। मुल्ला ने अविचलित एवं शांत चेहरा बनाए रखा। तभी उसका गधा चिल्लाने लगा। “मुल्ला! तुम्हारे घर से मुझे तुम्हारे गधे की आवाज़ सुनाई दे रही है। तुमने मुझसे झूठ बोला! मैं समझता था कि तुम मेरे सच्चे मित्र हो।” “निस्संदेह! क्या तुम्हे अपने मित्र के शब्दों से अधिक एक गधे की आवाज़ पर विश्वास है।”
🔶 जीवन रंगीन एवं आकर्षक इसलिए है क्योंकि इस में विभिन्न रंग हैं; सभी रंग केवल श्वेत नहीं हो सकते, ना ही केवल लाल या केवल काला। उसी प्रकार सभी संवाद सुखद नहीं हो सकते हैं। व्यावसायिक एवं व्यक्तिगत रिश्तों में सफलता इस पर निर्भर है कि आप अप्रिय संवाद तथा मतभेद से कैसे निपटते हैं।
🔷 किसी का सामना करना कठिन होता है, क्योंकि कई बार इस का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति संताप में डूब जाता है। आप जिस से टकराव कर रहे हैं वह व्यक्ति असहमति प्रकट कर सकता है, विरोध कर सकता है, अथवा यदि वह ईमानदार हो तो क्षमा भी मांग सकता है। परंतु यह संवाद कभी भी इतना सरल एवं सुखद नहीं होता। यह संवाद दो दलों या सरकारों के बीच हो सकता है, या फिर पती-पत्नी, माता-पिता और संतान, दो मित्र या एक प्रबंधक एवं कार्यकर्ता के बीच हो सकता है। कभी कभी सकारात्मक एवं रचनात्मक रूप से आमना सामना करना ही असहमति को दूर करने का एक मात्र मार्ग होता है। किसी से टकराव करना एक प्रकार का संवाद है – एक अवांछनीय संवाद जिस से व्यक्ति अपने को दोषी, लज्जित एवं क्रोधित महसूस कर सकता है। तो लीजिए मैं आप के सामने प्रस्तुत करता हूँ टकराव के तीन अमूल्य सिद्धांत।
🔶 ऊँचे स्वर में बात न करें
🔷 यदि आप किसी भी सकारात्मक परिणाम की आशा कर रहे हैं तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि आप चिल्लायें नहीं। इस विषय पर विचार करें – हम किसी का सामना इसलिए करते हैं क्योंकि हम चाहते हैं कि वह हमारी बात सुने तथा अपनी लापरवाही को स्वीकार करे अथवा यह स्वीकार करे कि उस के कारण हमे पीड़ा पहुँची है। इस का एक मात्र मार्ग है कि आप ऊँचे स्वर में बात न करें। क्यों? मानव मन सुखद वार्तालाप करने के लिए स्वाभाविक रूप से उत्सुक है। जब आप धीमे स्वर में बात करेंगे तो हो सकता है कि वे आप से सहमत ना हों, परंतु उनका मस्तिष्क उन्हें आप की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देगा। वार्तालाप करने और विवाद करने में प्राथमिक अंतर स्वर की ध्वनि एवं प्रबलता है। वार्तालाप एवं विवाद दोनों करते समय असहमति हो सकती है परंतु बहस के समय दोनों व्यक्ति केवल स्वयं बात करने में मग्न रहते हैं, दूसरों की सुन ने में नहीं। जब आप किसी पर चिल्लाते हैं, वे तुरंत ही मानसिक रूप से स्वयं को आप से दूर कर देते हैं। उनका मन वार्तालाप को छोड़ विषय से दूर हट जाता है अथवा आत्मरक्षात्मक हो जाता है। परंतु यदि आप सामान्य स्वर में बात करें, हो सकता है कि आप को लगे वे स्थिति की गंभीरता को समझ नहीं पा रहे हैं, किंतु अवश्य ही आप के शब्द उन के मन में घुस जाएंगे। हाँ इस का यह अर्थ नहीं कि वे अपना व्यवहार अवश्य ही बदल देंगे।
🔶 आक्रामक रूप से बात न करें
🔷 याद रखें कि किसी का सामना करने का लक्ष्य यह है कि वह व्यक्ति आप के दृष्टिकोण को समझ सके तथा वह अपना व्यवहार बदले। आक्रामक रूप से बात कर के या उनकी निंदा कर के आप इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। उन्हें प्रायश्चित करने का अवसर दें। आप यह मान कर चलें कि उन से एक भूल हो गई। फिर वार्तालाप को इस विषय पर केंद्रित रखें कि कैसे उनका व्यवहार आप को या आप दोनों के रिश्ते को हानी पहुँचा रहा है अथवा कैसे यह उनके हित में नहीं है। ऐसा करने पर वह आप की बात और ध्यान से सुनेंगे। किंतु यदि हम उनकी आक्रामक रूप की आलोचना करें, उन्हें दोषी ठहरायें तब हम स्वतः दोनों के बीच एक विशाल बाधा खड़ा कर देते हैं। वे आत्मरक्षात्मक हो जाते हैं तथा अपनी सुरक्षा के लिए प्रत्याक्रमण करते हैं। इस कारण दोनों व्यक्तियों में दूरी और बढ़ जाती है, वे क्रोधित हो जाते हैं और टकराव करने के उद्देश्य की पूर्ती ही नहीं हो पाती।
🔶 विषय से न भटकें
🔷 तीनों सिद्धांतों में यही सबसे कठिन है। कई बार जब हम किसी से टकराव करते हैं वे उस विषय को टालना या उस से दूर रहना चाहते हैं। किसी प्रकार के स्पष्टीकरण, क्षमा याचना या परिणामों से बचने के लिए, वास्तविक मुद्दे से भटकने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। यदि दोनों व्यक्ति भावनात्मक हो कर विषय से भटकने लगें तो वार्तालाप में किसी प्रकार की संवेदनशीलता बनाए रखना असंभव हो जाता है। शीघ्र ही ऐसा वार्तालाप एक बहस अथवा एक कटुतापूर्ण असहमति बन जाएगा। जब अन्य व्यक्ति विषय से भटकने लगते हैं, तो आप सम रहकर उन्हें बात पूरी कर लेने दें, फिर विनम्रता से वार्तालाप को प्राथमिक विषय पर ले आएं। यदि आप भी विषय से भटकते हैं तो यह केवल एक व्यर्थ वाद विवाद बन कर रह जाएगी जिसका कोई सफल परिणाम नहीं होगा। यह अति आवश्यक है कि आप केवल मुद्दे पर ही केंद्रित रहें तथा संक्षिप्त रूप से बात करें। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी से उन के देर से आने के विषय में बात करना चाहते हैं, तो केवल वर्तमान उदाहरण के विषय में ही बात करें। यह ना कहें कि वे सदैव देर से आते हैं, या वे कुशल या सक्षम नहीं हैं।
🔶 याद रखें कि किसी से टकराव करने का उद्देश्य यह है कि आप उस व्यक्ति को यह अहसास दिला सकें कि आप उसके कुछ कार्यों से असहमत हैं तथा उन कार्यों को नापसंद करते हैं। उद्देश्य उन को नीचा दिखाना नहीं है। इसलिए परिणाम इस पर निर्भर है कि आप किन शब्दों का प्रयोग करते हैं, किस स्वर में बात करते हैं, ठीक किस समय बात करते हैं तथा आप के शरीर के हाव-भाव कैसे हैं। किंतु यदि आप को बार बार एक ही विषय पर किसी का सामना करना पड़े, फिर तो उन में परिवर्तन लाने की आशा बहुत कम है, क्योंकि बुद्धिमान के लिए तो संकेत ही पर्याप्त है। यदि वह व्यक्ति स्वयं की भूल को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं, तो किसी भी प्रकार के संवाद का कोई परिणाम नहीं निकल सकता।
🔷 मुल्ला नसरुद्दीन से उसका गधा उधार लेने के लिए उस का एक मित्र उस के पास आया। “मेरा गधा तो कल रात को ही भाग गया। और अब मुझे वह मिल नहीं रहा है”, मुल्ला ने कहा। संशयपूर्ण ढंग से उसके मित्र ने उसे देखा। मुल्ला ने अविचलित एवं शांत चेहरा बनाए रखा। तभी उसका गधा चिल्लाने लगा। “मुल्ला! तुम्हारे घर से मुझे तुम्हारे गधे की आवाज़ सुनाई दे रही है। तुमने मुझसे झूठ बोला! मैं समझता था कि तुम मेरे सच्चे मित्र हो।” “निस्संदेह! क्या तुम्हे अपने मित्र के शब्दों से अधिक एक गधे की आवाज़ पर विश्वास है।”
🔶 जीवन रंगीन एवं आकर्षक इसलिए है क्योंकि इस में विभिन्न रंग हैं; सभी रंग केवल श्वेत नहीं हो सकते, ना ही केवल लाल या केवल काला। उसी प्रकार सभी संवाद सुखद नहीं हो सकते हैं। व्यावसायिक एवं व्यक्तिगत रिश्तों में सफलता इस पर निर्भर है कि आप अप्रिय संवाद तथा मतभेद से कैसे निपटते हैं।
👉 An unhealthy mind
🔶 Mental health or the lack of it can not be observed with the naked eye, we are often quite unaware of it as a result. On a careful and deeper look, though, we will find that our minds are more unhealthy than our bodies. Mental illnesses such as insomnia, memory issues, headaches, mental fogginess and delirium are on a rapid rise. Our lives are getting pushed into a downward spiral due to mental disorders like excessive worrying, fear, despondency, and apathy.
🔷 Emotional disturbances are depriving us of human qualities of joy, happiness, grit, courage, generosity, kindness and compassion. As a result of this deprivation, our human soul is reduced to a subhuman existence, unable to exploit the God-given human possibilities. If only we could cultivate the generous and grand human emotions, we could live an extraordinary life filled with happiness and joy paralleling that of the great souls, even within ordinary circumstances.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama 66:1.33
🔷 Emotional disturbances are depriving us of human qualities of joy, happiness, grit, courage, generosity, kindness and compassion. As a result of this deprivation, our human soul is reduced to a subhuman existence, unable to exploit the God-given human possibilities. If only we could cultivate the generous and grand human emotions, we could live an extraordinary life filled with happiness and joy paralleling that of the great souls, even within ordinary circumstances.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama 66:1.33
👉 मानसिक अस्वस्थता
🔶 मानसिक अस्वस्थता ऑंखों से दिखाई नहीं पड़ती, इसलिए लोग उसके संबंध में प्राय: बेखबर रहते हैं। पर यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो शरीर से भी कहीं अधिक रुग्ण एवं दुर्बल मन पाए जायेंगे। अनिद्रा, सिरदर्द, स्मरण शक्ति की कमी, मूढ़ता, उन्माद जैसे मस्तिष्कीय रोगों की तो बाढ़ ही आ रही है। चिंता, भय, निराशा, आवेश, निरुत्साह जैसे मनोविकार अधिकतर लोगों को अपना शिकार बनाए हुए अनेक व्यक्तिगत जीवनों को पतनोन्मुख बनाए हुए हैं।
🔷 भावनात्मक अस्वस्थता के कारण अधिकांश लोग प्रफुल्लता, उल्लास, साहस, पुरुषार्थ, उदारता, वीरता, सहृ्दयता, सज्जनता जैसे मानवोचित गुणों से वंचित हो रहे हैं। फलस्वरूप मनुष्य के शरीर में रहते हुए भी उनकी जीवात्मा पाशविक स्तर का जीवनयापन कर रही है। ईश्वर प्रदत्त महान महत्ताओं से वह तनिक भी लाभ नहीं उठा पाती है। काश, मनुष्य की भावनाएँ उद्दात्त एवं उत्कृष्ट रही होतीं तो सामान्य परिस्थितियों और सामान्य साधनों के रहते हुए भी उसने महापूरुषों जैसा, नर-रत्नों जैसा प्रकाश एवं आनंदमय जीवन जिया होता।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (३.१६)
🔷 भावनात्मक अस्वस्थता के कारण अधिकांश लोग प्रफुल्लता, उल्लास, साहस, पुरुषार्थ, उदारता, वीरता, सहृ्दयता, सज्जनता जैसे मानवोचित गुणों से वंचित हो रहे हैं। फलस्वरूप मनुष्य के शरीर में रहते हुए भी उनकी जीवात्मा पाशविक स्तर का जीवनयापन कर रही है। ईश्वर प्रदत्त महान महत्ताओं से वह तनिक भी लाभ नहीं उठा पाती है। काश, मनुष्य की भावनाएँ उद्दात्त एवं उत्कृष्ट रही होतीं तो सामान्य परिस्थितियों और सामान्य साधनों के रहते हुए भी उसने महापूरुषों जैसा, नर-रत्नों जैसा प्रकाश एवं आनंदमय जीवन जिया होता।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (३.१६)
👉 Poet Kalidas
🔶 In the course of their stroll in the royal gardens, king Vikramaditya suddenly remarked to the great poet Kalidas: “How creative and talented you are! You are a litterateur par excellence. I wish God had given you a matching and handsome body”. The satire was not lost on the wise Kalidas. He did not say anything at that time. On return to the palace, he ordered for two pots, one of clay and the other of gold. Both were filled with water.
🔷 After some time, Kalidas asked the king. “Now tell us, which of the two waters is cooler”? “That of the clay pot”, replied Vikramaditya. A smiling Kalidas then said: “Just as coolness does not depend on the pot’s outer shell; even so, talent too is unrelated to the physical appearance of the body. O King! One should look at the inner qualities, not the external beauty. It is the beauty of the soul that is supreme. Learning and greatness are linked with the soul, not the body.
🔶 Happiness always looks small while you hold it in your hands, but let it go, and you learn at once how big and precious it is.
📖 From Akhand Jyoti
🔷 After some time, Kalidas asked the king. “Now tell us, which of the two waters is cooler”? “That of the clay pot”, replied Vikramaditya. A smiling Kalidas then said: “Just as coolness does not depend on the pot’s outer shell; even so, talent too is unrelated to the physical appearance of the body. O King! One should look at the inner qualities, not the external beauty. It is the beauty of the soul that is supreme. Learning and greatness are linked with the soul, not the body.
🔶 Happiness always looks small while you hold it in your hands, but let it go, and you learn at once how big and precious it is.
📖 From Akhand Jyoti
👉 गुरुगीता (भाग 91)
👉 सत् चित् आनन्दमयी सद्गुरु की सत्ता
🔶 ध्यान की यह अवधि एवं प्रक्रिया क्या हो, भगवान् महेश्वर अगले प्रकरण में स्पष्ट करते हैं-
अंगुष्ठमात्रपुरुषं ध्यायतश्चिन्मयं हृदि। तत्र स्फुरति भावो यः शृणु तं कथयाम्यहम्॥ ११५
अगोचरं तथाऽगम्यं नामरूपविवर्जितम्। निःशब्दं तद्विजानीयात् स्वभावं ब्रह्म पार्वति॥ ११६॥
यथा गंधः स्वभावेन कर्पूरकुसुमादिषु। शीतोष्णादिस्वभावेन तथा ब्रह्म च शाश्वतम्॥ ११७॥
स्वयं तथाविधो भूत्वा स्थातव्यं यत्र कुत्रचित्। कीटभ्रमरवत् तत्र ध्यानं भवति तादृशम्॥ ११८॥
गुरुध्यानं तथा कृत्वा स्वयं ब्रह्ममयो भवेत्। पिण्डे पदे तथा रूपे मुक्तोऽसौ नात्र संशयः॥ ११९॥
🔷 हृदय में चिन्मय आत्मज्योति के अंगुष्ठ मात्र स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। इस ध्यान की गहनता, सघनता व प्रगाढ़ता से जो भाव स्फुरित होते हैं, उन्हें सुनो॥ ११५॥ भगवान् शिव कहते हैं-हे पार्वती! इन्द्रियों से परे, सब भाँति अगम्य, नाम-रूप आदि विशेषताओं से परे, शब्द से रहित ब्रह्म का अनुभव अपने ही स्वरूप में होता है॥ ११६॥ जिस तरह से कर्पूर एवं पुष्प आदि सुगन्धित पदार्थों में स्वाभाविक ही सुगन्ध व्याप्त है। जिस भाँति सर्दी एवं गर्मी स्वाभाविक है, उसी भाँति ब्रह्म शाश्वत है॥ ११७॥ अपनी आत्मचेतना में ध्यान करते रहने से कीट-भ्रमर सान्निध्य की भाँति यह जीवात्मा ब्रह्म के ध्यान से स्वयं ब्रह्म हो जाता है॥ ११८॥ यह ब्रह्म का ध्यान यथार्थ में गुरु का ध्यान ही है। शिष्य अपने चित्त में गुरु का ध्यान करने से, गुरु की निराकार ज्योति का ध्यान करते रहने से सर्वथा मुक्त एवं ब्रह्ममय हो जाता है॥ ११९॥
🔶 गुरुगीता में बताई ध्यान की विधियों में यह विधि अनूठी है। इसमें कहा गया है कि सद्गुरु का ध्यान हृदय में करो और उसे अंगुष्ठ मात्र चिन्मयज्योति के रूप में अनुभव करो। ऐसा करने से स्वयं ही ब्रह्मानुभूति हो जायेगी। ध्यान के इस उपदेश में एक विलक्षणता है और वह विलक्षणता यह है कि हृदय में भावमय भगवान् के सगुण रूप का ध्यान करते हैं। निराकार यह ज्योतिर्ध्यान आज्ञाचक्र या भू्र-मध्य में किया जाता है; परन्तु यहाँ अंगुष्ठ मात्र ज्योति पुरुष का ध्यान हृदय में करने का निर्देश है। इस निर्देश में कई संकेत निहित हैं। इन संकेतों पर ध्यान दें, तो पता चलता है कि जीवात्मा-परमात्मा एवं सद्गुुरु की चेतना तात्विक रूप से एक ही है। यदि कोई साधक हृदयस्थल में इस अंगुष्ठ मात्र ज्योति का ध्यान करता है, तो स्वयं ही सद्गुरु की भगवत्ता की उपलब्धि कर लेता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 137
🔶 ध्यान की यह अवधि एवं प्रक्रिया क्या हो, भगवान् महेश्वर अगले प्रकरण में स्पष्ट करते हैं-
अंगुष्ठमात्रपुरुषं ध्यायतश्चिन्मयं हृदि। तत्र स्फुरति भावो यः शृणु तं कथयाम्यहम्॥ ११५
अगोचरं तथाऽगम्यं नामरूपविवर्जितम्। निःशब्दं तद्विजानीयात् स्वभावं ब्रह्म पार्वति॥ ११६॥
यथा गंधः स्वभावेन कर्पूरकुसुमादिषु। शीतोष्णादिस्वभावेन तथा ब्रह्म च शाश्वतम्॥ ११७॥
स्वयं तथाविधो भूत्वा स्थातव्यं यत्र कुत्रचित्। कीटभ्रमरवत् तत्र ध्यानं भवति तादृशम्॥ ११८॥
गुरुध्यानं तथा कृत्वा स्वयं ब्रह्ममयो भवेत्। पिण्डे पदे तथा रूपे मुक्तोऽसौ नात्र संशयः॥ ११९॥
🔷 हृदय में चिन्मय आत्मज्योति के अंगुष्ठ मात्र स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। इस ध्यान की गहनता, सघनता व प्रगाढ़ता से जो भाव स्फुरित होते हैं, उन्हें सुनो॥ ११५॥ भगवान् शिव कहते हैं-हे पार्वती! इन्द्रियों से परे, सब भाँति अगम्य, नाम-रूप आदि विशेषताओं से परे, शब्द से रहित ब्रह्म का अनुभव अपने ही स्वरूप में होता है॥ ११६॥ जिस तरह से कर्पूर एवं पुष्प आदि सुगन्धित पदार्थों में स्वाभाविक ही सुगन्ध व्याप्त है। जिस भाँति सर्दी एवं गर्मी स्वाभाविक है, उसी भाँति ब्रह्म शाश्वत है॥ ११७॥ अपनी आत्मचेतना में ध्यान करते रहने से कीट-भ्रमर सान्निध्य की भाँति यह जीवात्मा ब्रह्म के ध्यान से स्वयं ब्रह्म हो जाता है॥ ११८॥ यह ब्रह्म का ध्यान यथार्थ में गुरु का ध्यान ही है। शिष्य अपने चित्त में गुरु का ध्यान करने से, गुरु की निराकार ज्योति का ध्यान करते रहने से सर्वथा मुक्त एवं ब्रह्ममय हो जाता है॥ ११९॥
🔶 गुरुगीता में बताई ध्यान की विधियों में यह विधि अनूठी है। इसमें कहा गया है कि सद्गुरु का ध्यान हृदय में करो और उसे अंगुष्ठ मात्र चिन्मयज्योति के रूप में अनुभव करो। ऐसा करने से स्वयं ही ब्रह्मानुभूति हो जायेगी। ध्यान के इस उपदेश में एक विलक्षणता है और वह विलक्षणता यह है कि हृदय में भावमय भगवान् के सगुण रूप का ध्यान करते हैं। निराकार यह ज्योतिर्ध्यान आज्ञाचक्र या भू्र-मध्य में किया जाता है; परन्तु यहाँ अंगुष्ठ मात्र ज्योति पुरुष का ध्यान हृदय में करने का निर्देश है। इस निर्देश में कई संकेत निहित हैं। इन संकेतों पर ध्यान दें, तो पता चलता है कि जीवात्मा-परमात्मा एवं सद्गुुरु की चेतना तात्विक रूप से एक ही है। यदि कोई साधक हृदयस्थल में इस अंगुष्ठ मात्र ज्योति का ध्यान करता है, तो स्वयं ही सद्गुरु की भगवत्ता की उपलब्धि कर लेता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 137
शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018
👉 हमेशा अच्छा करो
🔷 एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोज़ाना भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहाँ से गुजरने वाले किसी भी भूखे के लिए पकाती थी..। वह उस रोटी को खिड़की के सहारे रख दिया करती थी, जिसे कोई भी ले सकता था..।
🔶 एक कुबड़ा व्यक्ति रोज़ उस रोटी को ले जाता और बजाय धन्यवाद देने के अपने रस्ते पर चलता हुआ वह कुछ इस तरह बड़बड़ाता- "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा..।"
🔷 दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा.. वो कुबड़ा रोज रोटी लेके जाता रहा और इन्ही शब्दों को बड़बड़ाता - "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा.।"
🔶 वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन ही मन खुद से कहने लगी की-"कितना अजीब व्यक्ति है,एक शब्द धन्यवाद का तो देता नहीं है, और न जाने क्या-क्या बड़बड़ाता रहता है, मतलब क्या है इसका.।"
🔷 एक दिन क्रोधित होकर उसने एक निर्णय लिया और बोली-"मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूंगी।"
🔶 और उसने क्या किया कि उसने उस रोटी में ज़हर मिला दिया जो वो रोज़ उसके लिए बनाती थी, और जैसे ही उसने रोटी को को खिड़की पर रखने कि कोशिश की, कि अचानक उसके हाथ कांपने लगे और रुक गये और वह बोली- "हे भगवन, मैं ये क्या करने जा रही थी.?" और उसने तुरंत उस रोटी को चूल्हे कि आँच में जला दिया..। एक ताज़ा रोटी बनायीं और खिड़की के सहारे रख दी..।
🔷 हर रोज़ कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी ले के: "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा, और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा" बड़बड़ाता हुआ चला गया..। इस बात से बिलकुल बेख़बर कि उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है..।
🔶 हर रोज़ जब वह महिला खिड़की पर रोटी रखती थी तो वह भगवान से अपने पुत्र कि सलामती और अच्छी सेहत और घर वापसी के लिए प्रार्थना करती थी, जो कि अपने सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए कहीं बाहर गया हुआ था..। महीनों से उसकी कोई ख़बर नहीं थी..।
🔷 ठीक उसी शाम को उसके दरवाज़े पर एक दस्तक होती है.. वह दरवाजा खोलती है और भोंचक्की रह जाती है.. अपने बेटे को अपने सामने खड़ा देखती है..। वह पतला और दुबला हो गया था.. उसके कपडे फटे हुए थे और वह भूखा भी था, भूख से वह कमज़ोर हो गया था..।
🔶 जैसे ही उसने अपनी माँ को देखा, उसने कहा- "माँ, यह एक चमत्कार है कि मैं यहाँ हूँ.. आज जब मैं घर से एक मील दूर था, मैं इतना भूखा था कि मैं गिर गया.. मैं मर गया होता..।
🔷 लेकिन तभी एक कुबड़ा वहां से गुज़र रहा था.. उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया.. भूख के मरे मेरे प्राण निकल रहे थे.. मैंने उससे खाने को कुछ माँगा.. उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कह कर दे दी कि- "मैं हर रोज़ यही खाता हूँ, लेकिन आज मुझसे ज़्यादा जरुरत इसकी तुम्हें है.. सो ये लो और अपनी भूख को तृप्त करो.।"
🔶 जैसे ही माँ ने उसकी बात सुनी, माँ का चेहरा पीला पड़ गया और अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाज़े का सहारा लीया..। उसके मस्तिष्क में वह बात घुमने लगी कि कैसे उसने सुबह रोटी में जहर मिलाया था, अगर उसने वह रोटी आग में जला के नष्ट नहीं की होती तो उसका बेटा उस रोटी को खा लेता और अंजाम होता उसकी मौत..?
🔷 और इसके बाद उसे उन शब्दों का मतलब बिलकुल स्पष्ट हो चूका था-
जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा,और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा।।
" निष्कर्ष "
🔶 हमेशा अच्छा करो और अच्छा करने से अपने आप को कभी मत रोको, फिर चाहे उसके लिए उस समय आपकी सराहना या प्रशंसा हो या ना हो..।
🔶 एक कुबड़ा व्यक्ति रोज़ उस रोटी को ले जाता और बजाय धन्यवाद देने के अपने रस्ते पर चलता हुआ वह कुछ इस तरह बड़बड़ाता- "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा..।"
🔷 दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा.. वो कुबड़ा रोज रोटी लेके जाता रहा और इन्ही शब्दों को बड़बड़ाता - "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा.।"
🔶 वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन ही मन खुद से कहने लगी की-"कितना अजीब व्यक्ति है,एक शब्द धन्यवाद का तो देता नहीं है, और न जाने क्या-क्या बड़बड़ाता रहता है, मतलब क्या है इसका.।"
🔷 एक दिन क्रोधित होकर उसने एक निर्णय लिया और बोली-"मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूंगी।"
🔶 और उसने क्या किया कि उसने उस रोटी में ज़हर मिला दिया जो वो रोज़ उसके लिए बनाती थी, और जैसे ही उसने रोटी को को खिड़की पर रखने कि कोशिश की, कि अचानक उसके हाथ कांपने लगे और रुक गये और वह बोली- "हे भगवन, मैं ये क्या करने जा रही थी.?" और उसने तुरंत उस रोटी को चूल्हे कि आँच में जला दिया..। एक ताज़ा रोटी बनायीं और खिड़की के सहारे रख दी..।
🔷 हर रोज़ कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी ले के: "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा, और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा" बड़बड़ाता हुआ चला गया..। इस बात से बिलकुल बेख़बर कि उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है..।
🔶 हर रोज़ जब वह महिला खिड़की पर रोटी रखती थी तो वह भगवान से अपने पुत्र कि सलामती और अच्छी सेहत और घर वापसी के लिए प्रार्थना करती थी, जो कि अपने सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए कहीं बाहर गया हुआ था..। महीनों से उसकी कोई ख़बर नहीं थी..।
🔷 ठीक उसी शाम को उसके दरवाज़े पर एक दस्तक होती है.. वह दरवाजा खोलती है और भोंचक्की रह जाती है.. अपने बेटे को अपने सामने खड़ा देखती है..। वह पतला और दुबला हो गया था.. उसके कपडे फटे हुए थे और वह भूखा भी था, भूख से वह कमज़ोर हो गया था..।
🔶 जैसे ही उसने अपनी माँ को देखा, उसने कहा- "माँ, यह एक चमत्कार है कि मैं यहाँ हूँ.. आज जब मैं घर से एक मील दूर था, मैं इतना भूखा था कि मैं गिर गया.. मैं मर गया होता..।
🔷 लेकिन तभी एक कुबड़ा वहां से गुज़र रहा था.. उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया.. भूख के मरे मेरे प्राण निकल रहे थे.. मैंने उससे खाने को कुछ माँगा.. उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कह कर दे दी कि- "मैं हर रोज़ यही खाता हूँ, लेकिन आज मुझसे ज़्यादा जरुरत इसकी तुम्हें है.. सो ये लो और अपनी भूख को तृप्त करो.।"
🔶 जैसे ही माँ ने उसकी बात सुनी, माँ का चेहरा पीला पड़ गया और अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाज़े का सहारा लीया..। उसके मस्तिष्क में वह बात घुमने लगी कि कैसे उसने सुबह रोटी में जहर मिलाया था, अगर उसने वह रोटी आग में जला के नष्ट नहीं की होती तो उसका बेटा उस रोटी को खा लेता और अंजाम होता उसकी मौत..?
🔷 और इसके बाद उसे उन शब्दों का मतलब बिलकुल स्पष्ट हो चूका था-
जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा,और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा।।
" निष्कर्ष "
🔶 हमेशा अच्छा करो और अच्छा करने से अपने आप को कभी मत रोको, फिर चाहे उसके लिए उस समय आपकी सराहना या प्रशंसा हो या ना हो..।
👉 सृजन के लिए साहस
🔷 मित्रो ! इमारतों का सृजन सीधा-सादा सा होता है। पुल, सड़कों बाँधों का निर्माण निर्धारित नक्शे के आधार पर चलता रहता है। पर युगों के नव सृजन में अनेकानेक पेचीदगियाँ और कठिनाइयाँ आ उड़ेली हैं। कार्य का स्वरूप ही ऐसा है, जिसमें प्रवाह के उलटने के प्रयास, जूझने की विद्या ही प्रमुख बन जाती है। विचारक्रांति, युग परिवर्तन, जनमानस का परिष्कार ऐसे संकल्प हैं, जिनकी पूर्ति में प्राय:उन सभी से टकराना पड़ता है, जो अब तक स्वजन, संबंधी, हितैषी, निकटर्वी एवं अपने प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत माने जाते थे। इसमें मार-काट न होने पर भी इसे भूतकाल में संपन्न हुए महाभारत के समतुल्य माना जा सकता है, भले ही उस टकराहट को दृश्य रूप में न देखा जा सकता हो।
🔶 आज अभिमन्यु जैसा साहस उन्हें भी अर्जित करना पड़ेगा, जो अवांछनीयता, मूढ़-मान्यता, लोभ-लिप्सा, संकीर्ण स्वार्थपरता और निकृष्ठता के व्यामोह को चीरकर नवसृजन का मार्ग बनाना चाहें।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔶 आज अभिमन्यु जैसा साहस उन्हें भी अर्जित करना पड़ेगा, जो अवांछनीयता, मूढ़-मान्यता, लोभ-लिप्सा, संकीर्ण स्वार्थपरता और निकृष्ठता के व्यामोह को चीरकर नवसृजन का मार्ग बनाना चाहें।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 Trained camel
🔷 There was a well trained camel. At the time of a festival, the camelman used to load the kettledrum on camel’s back and moved forward playing it. On becoming older and thus worthless, the camel was left free. Since he belonged to king, nobody used to beat him.
🔶 One day the camel started eating the drying grains of an old who tried to dispel him by the sound of a winnowing basket. The camel said, “For the whole life I have been hearing the clatter of a kettledrum. I can not be horrified by a winnowing basket.”
🔷 The values learnt in ones life don’t fade away in old age too. A changeover can be attained only by thinking of rising beyond these.
📖 From Akhand Jyoti
🔶 One day the camel started eating the drying grains of an old who tried to dispel him by the sound of a winnowing basket. The camel said, “For the whole life I have been hearing the clatter of a kettledrum. I can not be horrified by a winnowing basket.”
🔷 The values learnt in ones life don’t fade away in old age too. A changeover can be attained only by thinking of rising beyond these.
📖 From Akhand Jyoti
👉 हमारी भुजा बन जाओ
🔷 मित्रो ! हमारी एक ही महत्त्वाकांक्षा है कि हम सहस्रभुजा वाले सहस्रशीर्षा पुरुष बनना चाहते हैं। तुम सब हमारी भुजा बन जाओ, हमारे अंग बन जाओ, यह हमारी मन की बात है। गुरु- शिष्य एक- दूसरे से अपने मन की बात कहकर हल्के हो जाते हैं। हमने अपने मन की बात तुमसे कह दी। अब तुम पर निर्भर है कि तुम कितना हमारे बनते हो? पति- पत्नी की तरह, गुरु व शिष्य की आत्मा में भी परस्पर ब्याह होता है, दोनों एक- दूसरे से घुल- मिलकर एक हो जाते हैं। समर्पण का अर्थ है- दो का अस्तित्व मिटाकर एक हो जाना।
🔶 तुम भी अपना अस्तित्व मिटाकर हमारे साथ मिला दो व अपनी क्षुद्र महत्त्वाकांक्षाओं को हमारी अनन्त आध्यात्मिक महत्त्वाकांक्षाओं में विलीन कर दो। जिसका अहं जिन्दा है, वह वेश्या है। जिसका अहं मिट गया, वह पवित्रता है। देखना है कि हमारी भुजा, आँख, मस्तिष्क बनने के लिए तुम कितना अपने अहं को गला पाते हो? इसके लिए निरहंकारी बनो। स्वाभिमानी तो होना चाहिए, पर निरहंकारी बनकर। निरहंकारी का प्रथम चिह्न है वाणी की मिठास।
🔷 वाणी व्यक्तित्व का हथियार है। सामने वाले पर वार करना हो तो तलवार नहीं, कलाई नहीं, हिम्मत की पूछ होती है। हिम्मत न हो तो हाथ में तलवार भी हो, तो बेकार है। यदि वाणी सही है तो तुम्हारा व्यक्तित्व जीवन्त हो जाएगा, बोलने लगेगा व सामने वाले को अपना बना लेगा। अपनी विनम्रता, दूसरों का सम्मान व बोलने में मिठास, यही व्यक्तित्व के प्रमुख हथियार हैं। इनका सही उपयोग करोगे तो व्यक्तित्व वजनदार बनेगा।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय- नं 68 पेज 1.14
🔶 तुम भी अपना अस्तित्व मिटाकर हमारे साथ मिला दो व अपनी क्षुद्र महत्त्वाकांक्षाओं को हमारी अनन्त आध्यात्मिक महत्त्वाकांक्षाओं में विलीन कर दो। जिसका अहं जिन्दा है, वह वेश्या है। जिसका अहं मिट गया, वह पवित्रता है। देखना है कि हमारी भुजा, आँख, मस्तिष्क बनने के लिए तुम कितना अपने अहं को गला पाते हो? इसके लिए निरहंकारी बनो। स्वाभिमानी तो होना चाहिए, पर निरहंकारी बनकर। निरहंकारी का प्रथम चिह्न है वाणी की मिठास।
🔷 वाणी व्यक्तित्व का हथियार है। सामने वाले पर वार करना हो तो तलवार नहीं, कलाई नहीं, हिम्मत की पूछ होती है। हिम्मत न हो तो हाथ में तलवार भी हो, तो बेकार है। यदि वाणी सही है तो तुम्हारा व्यक्तित्व जीवन्त हो जाएगा, बोलने लगेगा व सामने वाले को अपना बना लेगा। अपनी विनम्रता, दूसरों का सम्मान व बोलने में मिठास, यही व्यक्तित्व के प्रमुख हथियार हैं। इनका सही उपयोग करोगे तो व्यक्तित्व वजनदार बनेगा।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय- नं 68 पेज 1.14
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026
शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...



















