बुधवार, 22 नवंबर 2017

👉 युग-मनीषा जागे, तो क्रान्ति हो (भाग 5)

🔶 जब मैं शिलांग, डिब्रूगढ़ की तरफ अपने मिशन के लिए दौरा कर रहा था तो मेरी इच्छा हुई कि नागालैण्ड जाऊँ। नागा कैसे होते हैं? जरा देखकर आऊँ। हमारे कार्यकर्ता साथ चले, बोले हम दुभाषिए का काम करेंगे। उनकी जीप में बैठकर मैं नागालैण्ड चला गया। उन लोगों के बीच जो रेलगाड़ी पलट देते थे, तीर-कमानों से जिन्होंने सेना की नाक में दम कर रखा था। नागाओं के एक गाँव में जाकर एक चबूतरे पर मेरे मित्रों ने बिठा दिया व नागाओं से उनकी भाषा में कहा, ये हमारे गुरुजी हैं, महात्मा हैं, आशीर्वाद देते हैं। किसी का कोई दुःख हो तो इनसे कह लीजिए। ये नहीं कहा कि ये विद्वान हैं, कोई मिशन चलाते हैं। बस यही कहा कि कोई मनोकामना हो तो इनसे कहिए। कोई पचास-सौ नागा वहाँ बैठे थे। एक ने दूसरे से कहा, दूसरे ने तीसरे से कहा। सब ने आपस में पूछताछ कर ली व कहा कि हमारा तो कोई दुःख नहीं है, रोटी मिल जाती है। सोने के लिए फूस के मकान हैं, पहनने के लिए लोमड़ी के खाल है, मौज करते हैं। हमें दुःख काहे का।
             
🔷 एक-दूसरे की ओर देखा तो बुड्ढा नागा उठा व दुभाषिए से बोला कि इन स्वामी जी से पूछिए कि इनको कोई दुःख तो नहीं है। हमसे बोले, ‘‘हमें तो कोई परेशानी नहीं किन्तु आप भूखे हों तो हमारे यहाँ चावल हैं, भूखे नहीं जाएँ हमारे दरवाजे से। पहनने के कपड़े न हों तो खालें ले जाएँ। हमारा अपना कोई कष्ट नहीं। हम तो प्रसन्न हैं। स्वामीजी को कोई दुःख हो तो हम दूर कर देंं।’’ मैं समझ गया आदमी का दर्शन यह है। नागाओं ने नागालैण्ड बना लिया। क्या वजह हो सकती है? यह उस बिरादरी का दर्शन है। जो कुछ हमारे पास है, उससे खुशी की जिन्दगी जिएँगे। उसे देखकर के खाएँगे। मस्ती का जीवन जिएँगे। यह दर्शन है। कौमें, बिरादरियाँ, समय और जातियाँ हमेशा दर्शन के आधार पर उठी हैं। यह दर्शन पैदा करना मनीषा का काम है। दर्शन को बनाने वाली माँ का नाम है ‘मनीषा’। मनीषा कैसी होती है? मनीषा ऐसी होती है जैसी कि बुद्ध के भीतर से पैदा हुई थी।
 
🔶 बुद्ध ने जमाने को देखा था। बड़ा वाहियात जमाना, बड़ा फूहड़ जमाना। माँस, मदिरा, मद्य, मुद्रा, मैथुन—ये पाँच चीजें ही उस समय जीवन का आधार बनी हुई थीं। यही उस समय का धर्म था। जो आज के समय का वाममार्ग है, वही उस समय का दर्शन ऐसी परिस्थितियों में एक बुद्ध नाम का आदमी उठ खड़ा हुआ। बुद्ध किसे कहते हैं? बुद्ध विचारशीलता का, भावनाशीलता का प्रतीक है। लोगों को दिशा देने वाले को बुद्ध कहते हैं। कथावाचक, धर्मोपदेशक उस जमाने में भी थे लेकिन मनीषी के रूप में अकेले बुद्ध सामने आए। उन्होंने लोगों से कहा, ‘‘बुद्धं शरणं गच्छामि’’—बुद्धि की, विवेक की, समझदारी की पकड़ में आ जाओ। क्यों और कैसे के सवाल पूछो।

....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Who Shapes the Course of Human Ascent?

🔶 Uncountable waves of lives emerge out of and submerge back into the eternal ocean of Nature. The March of Life records none of these into its incessant flow. Rare are those divine souls, whose lives engrave immortal imprints in the glorious chapters of human history.  Few years of their life-spans stand as beacons of light, faith and inspiration in the annals of humanity.

🔷 Ethics of humanity teach us that –– “an altruistic life of a poor man is far more blissful and liberated than that of a mighty king”; and “sacrificing self interest is always superior to oppressing others.”  Though these ethical values have been preached throughout the ages, only a few have lived them. It is the inner strength of such great characters, which has upheld the edifice of morality age after age.

🔶 Talent, skill, perseverance, wisdom, charisma and courage are necessary for nurturing aplomb and self-esteem. Leading others too cannot be effective and inspiring without inculcation in oneself the requisite virtues and attributes. Those devoid of such potentials cannot vaunt of altruist renunciation. Dullness and lethargy cannot masquerade as austerity, contentment and peace. How can the glow of moral eminence shine in the darkness of ignorance and inactivity? Great are those who, despite being endowed with brilliant talents, courage and strength, do not waste their precious efforts in the pursuit of egoistic aims. Their sagacity and potentials are creatively used towards the welfare and evolution of humanity.

🔷 Ideals must not be compromised to suit the weakness of our wavering minds, nor can they be put on as mere masks. The peaks of immortal glory cannot be conquered without traversing through the Everest of perennially uplifting values.

👉 आत्मचिंतन के क्षण 22 Nov 2017

🔶 हमारे भोगों, उपलब्धियों और प्रवृत्तियों के एकमात्र सूत्र संचालक हमारे स्वयं के कर्म ही हैं। तब फिर देवताओं और विधाता को प्रसन्न करने की चिन्ता करते रहना कहाँ की बुद्धिमत्ता है? हमारा साध्य और असाध्य तो कर्म ही है। वही वन्दनीय-अभिवन्दनीय है, वही वरण और आचरण के योग्य है। दैवी विधान भी उससे भिन्न और उसके विरुद्ध कुछ कभी नहीं करता। कर्म ही सर्वोपरि है। परिस्थितियों और मनःस्थितियों का वही निर्माता है। उसी की साधना से अभीष्ट की उलपब्धि सम्भव है।     

🔷 आप जीवन के प्रति अपनी धारणा बदल डालिए। विश्वास तथा ज्ञान में ही अपना जीवन भवन निर्माण कीजिए। यदि वर्तमान आपत्तिग्रस्त है, तो उसका यह अर्थ नहीं है कि भविष्य भी अन्धकारमय है। आपका भविष्य उज्ज्वल है। विचारपूर्वक देखिए कि जो कुछ आपके पास है, उसका सबसे अच्छा उपयोग कर रहे हैं अथवा नहीं? क्योंकि यदि प्रस्तुत साधनों का दुरुपयोग करते हैं, तो चाहे वह कितनी ही तुच्छ और सारहीन क्यों न हो, आप उसके भी अधिकारी न रहेंगे। वह भी आपसे दूर भाग जायेंगे या छीन लिए जावेंगे।

🔶 यदि हम क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या, लोभ आदि असंगत मानसिक दोषों के शिकार होते हुए भी उन्नति पूर्ण स्वस्थ जीवन की कल्पना करते हैं तो यह असम्भव बात का स्वप्र देखना मात्र है। यदि हम वास्तव में अपने जीवन को सुखी एवं उन्नतिशील देखना चाहते हैं तो क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या आदि कुविचारों को घटाने और हटाने के लिए प्रयत्न करना होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 22 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 Nov 2017

सोमवार, 20 नवंबर 2017

👉 अनोखा फैसला

🔷 एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था... कि इस साधु ने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबला जा रहा था तो मौसम के हिसाब से दूसरी कढ़ाई में गरमा गरम जलेबियां तैयार हो रही थी

🔶 साधु कुछ क्षणों के लिए वहाँ रुक गया..... शायद भूख का एहसास हो रहा था या मौसम का असर था.... साधु हलवाई की भट्ठी को बड़े गौर से देखने लगा साधु कुछ खाना चाहता था लेकिन साधु की जेब ही नहीं थी तो पैसे भला कहां से होते....

🔷 साधु कुछ पल भट्ठी से हाथ सेंकने के बाद चला ही जाना चाहता था..... कि नेक दिल हलवाई से रहा न गया और एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियां साधु को दें दी...

🔶 साधु ने गरम जलेबियां गरम दूध के साथ खाई और फिर हाथों को ऊपर की ओर उठाकर हलवाई के लिऐ प्रार्थना की..... फिर आगे चल दिया..... साधु बाबा का पेट भर चुका था दुनिया के दु:खों से बेपरवाह वे फिर इक नए जोश से बारिश के गंदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था.......

🔷 वह इस बात से बेखबर था कि एक युवा नव विवाहिता जोड़ा भी वर्षा के जल से बचता बचाता उसके पीछे चला आ रहें है ...... एक बार इस मस्त साधु ने बारिश के गंदले पानी में जोर से लात मारी..... बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली युवती के कपड़ों को भिगो गया उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गये.....

🔶 उसके युवा पति से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई..... इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और साधु के कपड़ो से पकड़ कर कहने लगा अंधा है...... तुमको नज़र नहीं आता तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गऐ हैं और कीचड़ से भर गऐ हैं.....

🔷 साधु हक्का-बक्का सा खड़ा था.... जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना नाखुशगवार गुजर रहा था..... महिला ने आगे बढ़कर युवा के हाथों से साधु को छुड़ाना भी चाहा.... लेकिन युवा की आंखों से निकलती नफरत की चिंगारी देख वह भी फिर पीछे खिसकने पर मजबूर हो गई.....

🔶 राह चलते राहगीर भी उदासीनता से यह सब दृश्य देख रहे थे लेकिन युवा के गुस्से को देखकर किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रोक पाते और आख़िर जवानी के नशे मे चूर इस युवक ने एक जोरदार थप्पड़ साधु के चेहरे पर जड़ दिया बूढ़ा मलंग थप्पड़ की ताब ना झेलता हुआ.... लड़खड़ाता हुऐ कीचड़ में जा पड़ा.....

🔷 युवक ने जब साधु को नीचे गिरता देखा तो मुस्कुराते हुए वहां से चल दिया.. बूढे साधु ने आकाश की ओर देखा और उसके होठों से निकला वाह मेरे भगवान कभी गरम दूध जलेबियां और कभी गरम थप्पड़....

🔶 लेकिन जो तू चाहे मुझे भी वही पसंद है........यह कहता हुआ वह एक बार फिर अपने रास्ते पर चल दिया.... दूसरी ओर वह युवा जोड़ा अपनी मस्ती को समर्पित अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो गया.....

🔷 थोड़ी ही दूर चलने के बाद वे एक मकान के सामने पहुंचकर रुक गए......वह अपने घर पहुंच गए थे.... वे युवा अपनी जेब से चाबी निकाल कर अपनी पत्नी से हंसी मजाक करते हुए ऊपर घर की सीढ़ियों तय कर रहा था....

🔶 बारिश के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी अचानक युवा का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से नीचे गिरने लगा.... महिला ने बहुत जोर से शोर मचा कर लोगों का ध्यान अपने पति की ओर आकर्षित करने लगी जिसकी वजह से काफी लोग तुरंत सहायता के लिये युवा की ओर लपके.....

🔷 लेकिन देर हो चुकी थी युवक का सिर फट गया था और कुछ ही देर मे ज्यादा खून बह जाने के कारण इस नौजवान युवक की मौत हो चुकी थी कुछ लोगों ने दूर से आते साधु बाबा को देखा तो आपस में कानाफुसी होने लगीं कि निश्चित रूप से इस साधु बाबा ने थप्पड़ खाकर युवा को श्राप दिया है....

🔶 अन्यथा ऐसे नौजवान युवक का केवल सीढ़ियों से गिर कर मर जाना बड़े अचम्भे की बात लगती है..... कुछ मनचले युवकों ने यह बात सुनकर साधु बाबा को घेर लिया एक युवा कहने लगा कि आप कैसे भगवान के भक्त हैं जो केवल एक थप्पड़ के कारण युवा को श्राप दे बैठे......

🔷 भगवान के भक्त मे रोष व गुस्सा हरगिज़ नहीं होता ....आप तो जरा सी असुविधा पर भी धैर्य न कर सकें..... साधु बाबा कहने लगा भगवान की क़सम मैंने इस युवा को श्राप नहीं दिया....

🔶 अगर आप ने श्राप नहीं दिया तो ऐसा नौजवान युवा सीढ़ियों से गिरकर कैसे मर गया?

🔷 तब साधु बाबा ने दर्शकों से एक अनोखा सवाल किया कि आप में से कोई इस सब घटना का चश्मदीद गवाह मौजूद है? एक युवक ने आगे बढ़कर कहा..... हाँ मैं इस सब घटना का चश्मदीद गवाह हूँ

🔶 साधु ने अगला सवाल किया.....मेरे क़दमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़े को दागी किया था? युवा बोला..... नहीं.... लेकिन महिला के कपड़े जरूर खराब हुए थे

🔷 मलंग ने युवक की बाँहों को थामते हुए पूछा.. फिर युवक ने मुझे क्यों मारा? युवा कहने लगा...... क्योंकि वह युवा इस महिला का प्रेमी था और यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे..... इसलिए उस युवक ने आपको मारा....

🔶 युवा बात सुनकर साधु बाबा ने एक जोरदार ठहाका बुलंद किया और यह कहता हुआ वहाँ से विदा हो गया..... तो भगवान की क़सम मैंने श्राप कभी किसी को नहीं दिया लेकिन कोई है जो मुझ से प्रेम रखता है....

🔷 अगर उसका यार सहन नहीं कर सका तो मेरे यार को कैसे बर्दाश्त होगा कि कोई मुझे मारे और... वह इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है ....

🔶 उस परमात्मा की लाठी दीख़ती नही और आवाज भी नही करती लेकिन पडती हैं तों बहुत दर्द देंती हैं।

🔷 हमारें कर्म ही हमें उसकी लाठ़ी से बचातें हैं बस़ कर्म अच्छें होंने चाहीये.....

👉 आज का सद्चिंतन 21 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 Nov 2017


👉 आत्मचिंतन के क्षण 21 Nov 2017

🔶 जो दूसरों को कष्ट में देखकर दया से द्रवित हो जाता है, जो असहायों की सहायता के लिए सदा तत्पर रहता है, जो संसार के सुख में अपना सुख अनुभव करता है, दूसरों को हानि पहुँचाने की जिसे कभी इच्छा नहीं होती, जिसे पर स्त्री माता के तुल्य है, इन्द्रियों को जो मर्यादा से बाहर नहीं जाने देता, चुगली, निन्दा, ईर्ष्या, एवं कुढ़न से जो दूर रहता है, संयम जिसका व्रत है, प्रेम करना जिसका स्वभाव है, मधुरता जिसके होठों से टपकती है, स्नेह एवं सज्जनता से जिसकी आँखें भरी रहती हैं, जिसके मन में केवल सद्भाव ही निवास करते हैं, ऐसे पवित्र आत्मा व्यक्ति इस लोक के देवता हैं।    

🔷 हर मनुष्य में अपने प्रति पक्षपात करने की दुर्बलता पाई जाती है। आँखें बाहर को देखती हैं, भीतर का कुछ पता नहीं। कान बाहर के शब्द सुनते हैं, अपने हृदय और फेफडों से कितना अनवरत ध्वनि प्रवाह गुंजित होता है, उसे सुन ही नहीं पाते। इसी प्रकार दूसरों के गुण-अवगुण देखने में रुचि भी रहती है और प्रवीणता भी, पर ऐसा अवसर कदाचित ही आता है जब अपने दोषों को निष्पक्ष रूप से देखा और स्वीकारा जा सके। आमतौर से अपने गुण ही गुण दीखते हैं, दोष तो एक भी नजर नहीं आता। कोई दूसरा बताता है तो वह शत्रुवत् प्रतीत होता है। आत्म समीक्षा कोई कब करता है। वस्तुतः दोष दुर्गुणों के सुधर के लिए अपने आपसे संघर्ष करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं।

🔶 जीवन ताश के खेल की तरह है। हमने खेल का आविष्कार नहीं किया है और न ताश के पत्तों के नमूने ही हमने बनाये हैं। हमने इस खेल के नियम भी खुद नहीं बनाये और न हम ताश के पत्तों के बँटवारे पर ही नियंत्रण रख सकते हैं। पत्ते हमें बाँट दिये जाते हैं, चाहे वे अच्छे हों या बुरे। इस सीमा तक नियतिवाद का शासन है। परन्तु हम खेल को बढ़िया ढंग से या खराब ढंग से खेल सकते हैं। हो सकता है कि किसी कुशल खिलाड़ी के पास खराब पत्ते आये हों और फिर भी वह खेल में जीत जाये। यह भी संभव है कि किसी खराब खिलाड़ी के पास अच्छे पत्ते आये हों और फिर भी वह खेल का नाश करके रख दे। हमारा जीवन परवशता और स्वतंत्रता, दैवयोग और चुनाव का मिश्रण है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 What is Love?

🔶 To love is to find happiness in making others happy. It is to understand what others think and feel and need. It is to say and do the things that make them eager to be with us and to do these things not in hope of gaining some good, but because doing them is natural for us.

🔷 It is to know their weaknesses yet see them as strong and, because of our high vision and our unfailing faith, to inspire them to be stronger than they are while inspiring us to be stronger too.

🔶 It is to accept others as they are and, if they should fail our aspirations for them or spurn our outstretched hands, to keep open the “door” of our hearts.

🔷 It is to appreciate the importance of others and to help them appreciate their own importance.

🔶 It is to grow into the hearts of others and to become a part of their lives yet not bind their hearts nor limit their lives.

🔷 It is to loose ourselves in something greater, as a small spark loses itself in other sparks and becomes a star.

🔶 Love is like the Sun. It gives out of its own substance and its own self and, by giving itself, becomes a source of life and light.

✍🏻 James Dillet Freeman

👉 युग-मनीषा जागे, तो क्रान्ति हो (भाग 4)

🔶 सुकरात ने अपने समय में अपने समाज को एक ही दिशा देना शुरू किया, जिसका ताम था ‘दर्शन’। विचार नहीं। विचार तो अखबारों में, गन्दी किताबों में रोज छपते रहते हैं। कितना भ्रामक अज्ञान फैलाने वाले अख़बार रोज निकलते रहते हैं। इनकी बाबत मैं आपसे नहीं कहता। मैं आपसे कहता हूँ—‘दर्शन’ की बाबत। सुकरात का दर्शन जिन दिनों पैदा होने लगा और विद्यार्थियों को पढ़ाया जाने लगा तो हुकूमत काँप उठी। हुकुम दिया गया कि यह आदमी बागी है। इस आदमी को जहर पिला देना चाहिए। डाकू-चोर एक या दो पूरे समाज को हिलाकर रख देता है। दार्शनिक दुनिया को उलट-पलट देता है। ईसा सन्त थे, नहीं दार्शनिक थे।
             
🔷 सन्त तो समाज में ढेर सारे हैं, जो एक पाँव पर खड़े रहते हैं, पानी नहीं पीते, दूध नहीं पीते। बाबाजी की बात नहीं कह रहा मैं। ईसा कौन थे? दार्शनिक थे। उन्होंने अपने समय को बदलने वाला दर्शन दिया था। दर्शन वह, जो आदमी के अन्तरंग को छूने वाला दर्शन जब कभी आता है तो गजब करके रख देता है। लेखक भी, कवि भी ढेर सारे हैं, मालदार आदमी बहुत हुए हैं परन्तु दार्शनिक जब भी कभी हुए हैं तो मजा आ गया है। गजब हो गया हैं, समाज को हिला दिया गया है।
 
🔶 कुछ हवाले दूँ आपको। रूसो नाम का एक दार्शनिक हुआ है, जिसने सबसे पहले एक विचार दिया, अन्तरंग को छूने वाला, आदमी के मस्तिष्क को छूने वाला, समाज की व्यवस्था पर असर डालने वाला। दर्शन दिया रूसो ने जिसे डेमोक्रेसी नाम दिया गया। डेमोक्रेसी के बारे में मजाक उड़ाया गया था। जिन दिनों यह दर्शन प्रस्तुत किया गया, कहा गया कि यह पागलों की बातें हैं। लेकिन पागलों की बात आप देखते हैं? सारी दुनिया में घुमा-फिरा के डेमोक्रेसी आ गई है। यह विचार एक दार्शनिक ने दिया था और उसने सारी दुनिया को हिलाकर रख दिया और हवाले दूँ आपको। एक नाम है नीत्से। उसका वह हिस्सा तो नहीं बताऊँगा जिसमें उसने यह कहा था कि खुदा खत्म हो गया, खुदा को हमने जमीन में गाड़ दिया पर यह वह आदमी था जिसने कहा था कि आदमी को सुपरमैन बनना चाहिए।

🔷 आदमी को गई-गुजरी स्थिति में नहीं रहना चाहिए। अपने आपका विकसित करना चाहिए और दूसरों को ऊँचा उठाने की अपनी सामर्थ्य एकत्रित करनी चाहिए। यह किसकी फिलॉसफी है? नीत्से की। आपको मैं इतिहास इसीलिए बता रहा हूँ कि आप समझें कि दर्शन कितनी जबर्दस्त चीज है? दर्शन उस चीज का नाम है जो कौमों को बदलकर रख देता है, बिरादरियों को, मुल्कों को, परिस्थितियों को बदल देता है। दर्शन बड़े शानदार होते हैं। वे भले हों अथवा बुरे हों, कितनी ताकत होती है उनमें, यह आपको जानना चाहिए। मैं आपको अपने जीवन की एक घटना सुना दूँ दर्शन की बाबत।

....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 उदारता और कठोरता

🔷 दूसरों के साथ उदारता का व्यवहार केवल वे कर सकते है जो अपने प्रति कठोर होते है। जो अपने साथ रियायत चाहते है उन्हें दूसरों के साथ कठोर बनना पड़ता है। तराजू का एक पलड़ा ही झुक सकता है और वह भी तब, जब दूसरा ऊपर उठता है। यदि मनुष्य अपने लिए अधिक सुविधायें चाहेगा तो स्वभावतः उसे दूसरों की उपेक्षा करनी पड़ेगी दूसरों के प्रति जितनी अधिक ममता और करुणा होगी उतनी ही अपनी जरूरतें घटाकर, अपनी सुविधाएँ हटा कर उन्हें जरूरतमन्दों के लिए लगाने का भाव जागेगा उदार हृदय व्यक्ति अन्ततः बिल्कुल खाली हाथ और निरन्तर सेवा परायण हो जाता है। इसलिए उसकी महानता है।

🔶 जब तक आक्रमण की, प्रतिहिंसा की, बदला लेने की या किसी को चोट पहुँचाकर सन्तुष्ट होने की इच्छा जीवित है तब तक हमारे अन्दर असुरता एवं दुष्टता विद्यमान है यह मानना होगा। जब इस दिशा में उत्पन्न होने वाला उत्साह उपेक्षा में बदलने लगे तो समझना चाहिये वह दुष्टता शांत होती जाती है। जब दूसरों की भूलों के प्रति क्षमा का, दूसरों के प्रति करुणा का, और दूसरों के अभावों के प्रति सहानुभूति का भाव उदय होने लगे तो समझना चाहिए कि मानवता विकसित हो रही है। यह विकास इस सीमा तक पहुँच जाय कि हानि पहुँचाने और शत्रुता रखने वालों को भी सुख पहुँचाने का प्रयत्न किया जाय तो समझना चाहिए कि साधुता प्रकट होने लगी।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 गुड़िया

🔷 मैं एक दुकान में खरीददारी कर रहा था, तभी मैंने उस दुकान के कैशियर को एक 5-6 साल की लड़की से बात करते हुए देखा।

🔶 कैशियर बोला :~ "माफ़ करना बेटी, लेकिन इस गुड़िया को खरीदने के लिए तुम्हारे पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं।" फिर उस छोटी सी लड़की ने मेरी ओर मुड़ कर मुझसे पूछा:~ "अंकल, क्या आपको भी यही लगता है कि मेरे पास पूरे पैसे नहीं हैं?''

🔷 मैंने उसके पैसे गिने और उससे कहा:~ "हाँ बेटे, यह सच है कि तुम्हारे पास इस गुड़िया को खरीदने के लिए पूरे पैसे नहीं हैं"।

🔶 वह नन्ही सी लड़की अभी भी अपने हाथों में गुड़िया थामे हुए खड़ी थी। मुझसे रहा नहीं गया। इसके बाद मैंने उसके पास जाकर उससे पूछा कि यह गुड़िया वह किसे
देना चाहती है?

🔷 इस पर उसने उत्तर दिया कि यह वो गुड़िया है, जो उसकी बहन को बहुत प्यारी है। और वह इसे, उसके जन्मदिन के लिए उपहार में देना चाहती है।

🔶 बच्ची ने कहा यह गुड़िया पहले मुझे मेरी मम्मी को देना है, जो कि बाद में मम्मी जाकर मेरी बहन को दे देंगी"।

🔷 यह कहते-कहते उसकी आँखें नम हो आईं थी मेरी बहन भगवान के घर गयी है...

🔶 और मेरे पापा कहते हैं कि मेरी मम्मी भी जल्दी-ही भगवान से मिलने जाने वाली हैं। तो, मैंने सोचा कि क्यों ना वो इस गुड़िया को अपने साथ ले जाकर, मेरी बहन को दे दें...।"

🔷 मेरा दिल धक्क-सा रह गया था। उसने ये सारी बातें एक साँस में ही कह डालीं और फिर मेरी ओर देखकर बोली - "मैंने पापा से कह दिया है कि मम्मी से कहना कि वो अभी ना जाएँ।

🔶 वो मेरा, दुकान से लौटने तक का इंतजार करें।

🔷 फिर उसने मुझे एक बहुत प्यारा- सा फोटो दिखाया जिसमें वह खिलखिला कर हँस रही थी।

🔶 इसके बाद उसने मुझसे कहा:~ "मैं चाहती हूँ कि मेरी मम्मी, मेरी यह फोटो भी अपने साथ ले जायें, ताकि मेरी बहन मुझे भूल नहीं पाए।

🔷 मैं अपनी मम्मी से बहुत प्यार करती हूँ और मुझे नहीं लगता कि वो मुझे ऐसे छोड़ने के लिए राजी होंगी, पर पापा कहते हैं कि मम्मी को मेरी छोटी बहन के साथ रहने के लिए जाना ही पड़ेगा क्योंकि वो बहुत छोटी है, मुझसे भी छोटी है। उसने धीमी आवाज मैं बोला।

🔶 इसके बाद फिर से उसने उस गुड़िया को ग़मगीन आँखों-से खामोशी-से देखा।

🔷 मेरे हाथ जल्दी से अपने बटुए ( पर्स ) तक पहुँचे और मैंने उससे कहा:~

🔶 "चलो एक बार और गिनती करके देखते हैं कि तुम्हारे पास गुड़िया के लिए पर्याप्त पैसे हैं या नहीं?''

🔷 उसने कहा-:"ठीक है। पर मुझे लगता है शायद मेरे पास पूरे पैसे हैं"।

🔶 इसके बाद मैंने उससे नजरें बचाकर कुछ पैसे उसमें जोड़ दिए और फिर हमने उन्हें गिनना शुरू किया।

🔷 ये पैसे उसकी गुड़िया के लिए काफी थे यही नहीं, कुछ पैसे अतिरिक्त बच भी गए थे।

🔶 नन्ही-सी लड़की ने कहा:~ "भगवान का लाख-लाख शुक्र है मुझे इतने सारे पैसे देने के लिए!

🔷 फिर उसने मेरी ओर देख कर कहा कि मैंने कल रात सोने से पहले भगवान् से प्रार्थना की थी कि मुझे इस गुड़िया को खरीदने के लिए पैसे दे देना, ताकि मम्मी इसे
मेरी बहन को दे सकें। और भगवान् ने मेरी बात सुन ली।

🔶 इसके अलावा मुझे मम्मी के लिए एक सफ़ेद गुलाब खरीदने के लिए भी पैसे चाहिए थे, पर मैं भगवान से इतने ज्यादा पैसे मांगने की हिम्मत नहीं कर पायी थी पर भगवान् ने तो मुझे इतने पैसे दे दिए हैं कि अब मैं गुड़िया के साथ-साथ एक सफ़ेद गुलाब भी खरीद सकती हूँ ! मेरी मम्मी को सफेद गुलाब बहुत पसंद हैं|

🔷 "फिर हम वहा से निकल गए। मैं अपने दिमाग से उस छोटी- सी लड़की को निकाल नहीं पा रहा था।

🔶 फिर, मुझे दो दिन पहले स्थानीय समाचार पत्र में छपी एक घटना याद आ गयी जिसमें एक शराबी ट्रक ड्राईवर के बारे में लिखा था।

🔷 जिसने नशे की हालत में मोबाईल फोन पर बात करते हुए एक कार-चालक महिला की कार को टक्कर मार दी थी, जिसमें उसकी 3 साल की बेटी की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गयी थी और वह महिला कोमा में चली गयी थी। अब एक महत्वपूर्ण निर्णय उस परिवार को ये लेना था कि, उस महिला को जीवन रक्षक मशीन पर बनाए रखना है अथवा नहीं?

🔶 क्योंकि वह कोमा से बाहर आकर, स्वस्थ हो सकने की अवस्था में नहीं थी। दोनों पैर, एक हाथ,आधा चेहरा कट चुका था। आॅखें जा चुकी थी। "क्या वह परिवार इसी छोटी-
लड़की का ही था?"

🔷 मेरा मन रोम-रोम काँप उठा। मेरी उस नन्ही लड़की के साथ हुई मुलाक़ात के 2 दिनों बाद मैंने अखबार में पढ़ा कि उस महिला को बचाया नहीं जा सका, मैं अपने आप को रोक नहीं सका और अखबार में दिए पते पर जा पहुँचा, जहाँ उस महिला को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था वह महिला श्वेत धवल कपड़ों में थी- अपने हाथ में एक सफ़ेद गुलाब और उस छोटी-सी लड़की का वही हॅसता हुआ फोटो लिए हुए और उसके सीने पर रखी हुई थी वही गुड़िया।

🔶 मेरी आँखे नम हो गयी। दुकान में मिली बच्ची और सामने मृत ये महिला से मेरा तो कोई वास्ता नही था लेकिन हूं तो इंसान ही। ये सब देखने के बाद अपने आप को सभांलना एक बडी चुनौती थी मैं नम आँखें लेकर वहाँ से लौटा।

🔷 उस नन्ही-सी लड़की का अपनी माँ और उसकी बहन के लिए जो बेपनाह अगाध प्यार था, वह शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

🔶 और ऐसे में, एक शराबी चालक ने अपनी घोर लापरवाही से क्षण-भर में उस लड़की से उसका सब कुछ छीन लिया था....!!!

🔷 ये दुख रोज कितने परिवारों की सच्चाई बनता है हमें पता नहीं!!!!  शायद ये मार्मिक घटना सिर्फ एक पैग़ाम देना चाहती है कि:::::::::::::

🔶 कृपया~ कभी भी शराब पीकर और मोबाइल पर बात करते समय वाहन ना चलायें क्यूँकि आपका आनन्द किसी के लिए श्राप साबित हो सकता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 Nov 2017


👉 आज का सद्चिंतन 20 Nov 2017


👉 आत्मचिंतन के क्षण 20 Nov 2017

🔶 यदि हम क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या, लोभ आदि असंगत मानसिक दोषों के शिकार होते हुए भी उन्नति पूर्ण स्वस्थ जीवन की कल्पना करते हैं तो यह असम्भव बात का स्वप्र देखना मात्र है। यदि हम वास्तव में अपने जीवन को सुखी एवं उन्नतिशील देखना चाहते हैं तो क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या आदि कुविचारों को घटाने और हटाने के लिए प्रयत्न करना होगा।        

🔷 गलती करना बुरा नहीं है; बल्कि गलती को न सुधारना बुरा है। संसार के महान् पुरुषों ने अनेक प्रकार की गलतियाँ की हैं। रावण जैसा विद्वान् अपने दुष्कृत्यों से राक्षस जैसा बन गया। वाल्मीकि डकैत रहे हैं। सुर, तुलसी, कबीर, मीरा, रसखान आदि सांसारिक जीवन में गलती करते रहे थे, लेकिन इन्होंने गलती को सुधारा और आगे बढ़कर महापुरुष बने। स्मरण रखिए कि एक गलती को सुधारकर आप किसी न किसी क्षेत्र में आगे बढ़ जाते हैं।  

🔶 इस संसार का यह विचित्र नियम है कि बाजार में वस्तुओं की कीमत दूसरे लोग निर्धारित करते हैं, पर मनुष्य अपना मूल्यांकन स्वयं करता है और वह अपना जितना मूल्यांकन करता है उससे अधिक सफलता उसे कदापित नहीं मिल पाती। प्रत्येक व्यक्ति जो आगे बढ़ने की आकांक्षा रखते हैं, उन्हें यह मानकर चलना चाहिए कि परमात्मा ने उसे मनुष्य के रूप में इस पृथ्वी पर भेजते समय उसकी चेतना में समस्त सम्भावनाओं के बीज डाल दिये हैं। इतना ही नहीं, उसके अस्तित्व में सभी सम्भावनाओं के बीज डालने के साथ-साथ उनके अंकुरित होने की क्षमताएँ भी भर दी है। लेकिन प्रायः देखने में यह आता है कि अधिकांश व्यक्ति अपने प्रति ही अविश्वास से भरे होते हैं तथा उन क्षमताओं और सम्भावनाओं के बीजों को विकसित तथा अंकुरित करने की चेष्टा तो दूर रही, उनके सम्बन्ध में विचार तक नहीं करना चाहते।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 युग-मनीषा जागे, तो क्रान्ति हो (भाग 3)

🔶 आज आदमी की सभ्यता सिर्फ एक है। उसका नाम है दर्शन की भ्रष्टता। उसके पास चीजों की कमी नहीं है। आदमी के पास जरूरत से ज्यादा चीजें हैं, पर मुझे ये लगता है कि आदमी इनको खा भी सकेगा कि नहीं, हजम भी कर सकेगा कि नहीं। आदमी का दर्शन घिनौना हो जाने की वजह से इतनी ज्यादा चीजें होते हुए भी मालूम पड़ता है कि बहुत कम है। गरीबी उसके ऊपर हावी हो गई है। परिस्थितियाँ, दरिद्रता, मुसीबतें उसके दर्शन के कारण उस पर हावी हो गई हैं। दर्शन सारे व्यक्तियों का, सारे समाज का, सारे विश्व का भ्रष्ट होता चला गया है और आदमी दुष्ट होता चला गया है। दुष्टों को पकड़ना, रोकना व मारकर ठीक करना चाहिए। मच्छरों को मारना चाहिए पर एक-एक मच्छर को मारने के पहले उस गन्दगी से निपटना चाहिए जो मच्छर पैदा करती है।
            
🔷 हम मच्छर-मक्खी पर नहीं सकते। हम समस्याओं को कैसे मार पाएँगे? समस्याएँ आदमी के सड़े हुए दिमाग में से पैदा होती हैं, सड़े हुए दिल से पैदा होती हैं। पैसे वाले बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाते हैं कि हम गृह-उद्योग बढ़ाएँगे, नहरें खोदेंगे, बाँध बनाएँगे, ये सब ठीक है। आदमी को साक्षर बनाएँगे, हर आदमी को मालदार बनाएँगे। कोई कहता है कि आदमी को पहलवान बनाएँगे, पर इतना सब करने के बाद फिर होगा क्या? जरा विश्लेषण, पोस्टमार्टम करके देखिए कि इस सबके बावजूद विचारों की, दर्शन की भ्रष्टता यदि बनी रही तो वह करता क्या है? वह खुद जलता है, दूसरों को जलाता है। दियासलाई अपने आपको जला के खत्म कर देती है, दूसरों को जला देती है। आज हमारी आपकी जिन्दगियाँ दियासलाई के तरीके से जल रहीं हैं और अनेक को जला रही हैं।
 
🔶 आपने ब्याह कर लिया। बीबी आ गई। हाँ तो ठीक है, अब आप क्या करेंगे उसको जला दीजिए। नहीं साहब बीबी तो बहुत अच्छी मालूम पड़ती है। इसलिए तो कहते हैं कि फुलझड़ी बहुत अच्छी मालूम पड़ती तो आप दियासलाई लेकर के खत्म क्यों नहीं करते? हर चीज को आदमी आज जला रहा है। जिन्दगी को जला रहा है, समाज को जला रहा है। देश को जला रहा है, बच्चों को जला रहा है। भाइयो! आज सारा समाज जिस तरीके से भ्रष्ट-चिन्तन व दुष्ट आचरण करता चला जा रहा है इस सबका मूल कहीं खोजना हो तो एक ही जगह है, वह है आदमी के सोचने व ऊँचा उठाने वाली शैली, तरीका, विद्या जिसे ‘दर्शन’ कहते हैं।

....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Misers are Unfit for God's Kindness

🔶 This is a story of the times when saint Chedember was famous for granting wishes. One day a woman approached him to bless her with a son. The saint gave him some roasted peanuts and said, "You have come from very far. Have some peanuts and rest in the courtyard. The woman started eating the peanuts. Little children, who were playing there, looked at her and wanted some peanuts too. But, she turned her face away and continued eating. When she went to the saint to receive blessings, he said grimly, "When you can't share some peanuts with the children, how can the God give you the priceless gift of a child?" We must develop generosity to receive God's kindness.

📖 From Pragya Puran

रविवार, 19 नवंबर 2017

👉 शोभा


🔶 सुकरात ज्ञान चर्चा में लगे हुए थे कि एक उजड्ड ईर्ष्यालु ने उनकी पीठ पर लात मारी और वे औंधे मुँह गिर पड़े।

🔷 अपने को सँभाल कर सुकरात उठे और बात जहाँ से छूटी थी वहीं से फिर कहानी आरंभ कर दी।

🔶 अपमान का कुछ भी ख्याल न करते देख- उपस्थित लोगों ने कहा - इस दुष्ट को सजा क्यों न दी जाय?

🔷 सुकरात ने कहा- कोई गधा हमें लात मार दे तो क्या हमारे लिए यह शोभा की बात होगी कि हम भी उसे लात मारें ?

👉 हृदय का संस्कार

🔷 बुद्धि का संस्कार करना उचित है। पर हृदय का संस्कार करना तो नितान्त आवश्यक है। बुद्धिमान और विद्वान बनने से मनुष्य अपने लिए धन और मान प्राप्त कर सकता है। पर नैतिक दृष्टि से वह पहले दर्जे का पतित भी हो सकता है। आत्मा को ऊँचा उठाना और मानवता के आदर्शों पर चलने के लिए प्रकाश प्राप्त करना हृदय के विकास पर ही निर्भर है। बुद्धि हमें तर्क करना सिखाती है और आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन खोजती है। जैसी आकाँक्षा और मान्यता होती है उसके अनुरूप दलील खोज निकालना भी उसका काम है पर धर्म कर्तव्यों की ओर चलने की प्रेरणा हृदय से ही प्राप्त होती है।

🔶 जब कभी बुद्धि और हृदय में मतभेद हो, दोनों अलग अलग मार्ग सुझाते हो तो हमें सदा हृदय का सम्मान और बुद्धि का तिरस्कार करना चाहिए। बुद्धि धोखा दे सकता है पर हृदय के दिशासूचक यंत्र (कुतुबनुमा) की सुई सदा ठीक ही दिशा के लिए मार्ग दर्शन करेगी।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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