शनिवार, 30 सितंबर 2017

👉 व्यवहारिक ज्ञान भी चाहिए।

🔴 एक पण्डित जी को नाव से नदी पार करनी थी। कोई और यात्री था नहीं। अकेले पण्डित जी को लेकर चलने में मल्लाह तैयार नहीं हो रहा था। पंडित जी का जाना आवश्यक था। मल्लाह ने कहा- कुछ अतिरिक्त मजदूरी मिले तो चलूँ। पंडित जी ने कहा- उतराई के पैसों के अतिरिक्त तुम्हें बड़े सुन्दर ज्ञान भरे उपदेश भी दूँगा। मल्लाह ने बैठे से बेगार भली वाली बात सोचकर नाव खोली और पंडित जी को उस पर ले चला।

🔵 रास्ते में पंडित जी उपदेश करने लगे। उन्होंने मल्लाह से पूछा- तुम कुछ पूजा पाठ जानते हो? उसने उत्तर दिया, "नहीं महाराज"। पंडित जी बोले- तब तो तुम्हारे जीवन का एक तिहाई भाग व्यर्थ चला गया। पंडित ने फिर पूछा- कुछ पढ़ना लिखना जानते हो? मल्लाह ने कहा- नहीं महाराज। पंडित जी ने कहा- तो तुम्हारे जीवन का एक तिहाई भाग और व्यर्थ चला गया। अब दो तिहाई जीवन व्यर्थ गँवा देने के बाद एक तिहाई ही शेष है, उसका सदुपयोग करो।

🔴 पंडित जी का उपदेश चल ही रहा था कि नाव एक चट्टान से टकराकर टूट गई और पंडित जी पानी में डूबने लगे। उन्हें पकड़ते हुए मल्लाह ने पूछा- महाराज तैरना जानते हो? उनने कहा- नहीं मल्लाह उन्हें पीठ पर रखकर पार लगाने लगा और बोला- महाराज! तैरना न जानने के कारण आपका तो पूरा ही जीवन व्यर्थ चला गया होता। उपदेश करना सीखने के साथ-साथ कुछ हाथ पैर चलाना भी सीखना चाहिए था।

🔵 केवल दार्शनिक ज्ञान ही पर्याप्त नहीं, मनुष्य को जीवन समस्याओं को सुलझाने की व्यवहारिक योग्यता भी प्राप्त करनी चाहिए।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 आज का सद्चिंतन 30 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 Sep 2017


👉 जीवन के दुःख

🔴 एक बार एक नवयुवक किसी संत के पास पहुंचा और बोला.......
                 
🔵 “महात्मा जी, मैं अपनी ज़िन्दगी से बहुत परेशान हूँ, कृपया इस परेशानी से निकलने का उपाय बताएं...

🔴 संत बोले, “पानी के ग्लास में एक मुट्ठी नमक डालो और उसे पीयो ” युवक ने ऐसा ही किया...

🔵 “इसका स्वाद कैसा लगा?”, संत ने पुछा...?

🔴 “बहुत ही खराब … एकदम खारा .” – युवक थूकते हुए बोला .

🔵 संत मुस्कुराते हुए बोले , “एक बार फिर अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक लेलो और मेरे पीछे -पीछे आओ.. “दोनों धीरे -धीरे आगे बढ़ने लगे और थोड़ी दूर जाकर स्वच्छ पानी से बनी एक झील के सामने रुक गए ...

🔴 चलो, अब इस नमक को पानी में दाल दो .”, संत ने निर्देश दिया।

🔵 युवक ने ऐसा ही किया...

🔴 “अब इस झील का पानी पियो .” , संत बोले...

🔵 युवक पानी पीने लगा …,

🔴 एक बार फिर संत ने पूछा ,: “ बताओ इसका स्वाद कैसा है , क्या अभी भी तुम्हे ये खरा लग रहा है...?”

🔵 “नहीं, ये तो मीठा है, बहुत अच्छा है ”, युवक बोला....

🔴 संत युवक के बगल में बैठ गए और उसका हाथ थामते हुए बोले, “जीवन के दुःख बिलकुल नमक की तरह हैं; न इससे कम ना ज्यादा . जीवन में दुःख की मात्र वही रहती है, बिलकुल वही. लेकिन हम कितने दुःख का स्वाद लेते हैं ये इस पर निर्भर करता है कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं. इसलिए जब तुम दुखी हो तो सिर्फ इतना कर सकते हो कि खुद को बड़ा कर लो… ग़्लास मत बने रहो झील बन जाओ !!!

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

👉 Cat sees a dream

🔴 A cat dreams that she has become a tiger and is hunting a fat goat. Barely had she tasted it when a fat dog came pouncing on her. She left the goat and ran and hid near her owner.

🔵 In the second dream she saw that she was a dog and has entered into her owner’s kitchen to taste the dishes kept there. Just then the owner came and started beating it black and blue. The owner came and woke up the crying cat. The cat woke up and realized that it was a dream. She said to her owner, “I’ll be what I am. Changing identity is full of dangers.”

🔴 We should always remember our original identity.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 Sep 2017

🔵 लोगों की बुराई-भलाई इतना महत्व नहीं रखती जितनी हमारी दृष्टि, दृष्टि में दोष उत्पन्न हो जाए तो हर चीज अटपटी दिखाई देगी। रंगीन काँच का चश्मा पहन लिया जाए तो हर चीज उसी रंग की दिखाई देगी। पीलिया रोग वाले का चेहरा खून एवं मल-मूत्र ही पीला नहीं होता वरन् सभी चीजें उसे पीली दिखाई देने लगती हैं। कई व्यक्ति हर घड़ी किसी न किसी की निन्दा करते सुने जाते हैं, दूसरों के दोषों का वर्णन करने में उन्हें बड़ा मजा आता है, ऐसे लोग बहुधा अपने आपको आलोचक या सुधारक कहते हैं पर वस्तुतः बात दूसरी ही होती है। उनके मन में दूसरों के प्रति घृणा और द्वेष के भाव भरे होते हैं, वे ही दूसरों की निन्दा के रूप से बाहर निकलते रहते हैं।

🔴 जो आदमी लहसुन खाकर या शराब पीकर आया है, उसके मुँह में से इन पदार्थों की दुर्गन्ध स्पष्ट रूप से आती है। इसी प्रकार दुर्भावना युक्त ओछे आदमियों के मुख में से निन्दा, बुराई, दोष दर्शन, छिद्रान्वेषण की धारा ही प्रवाहित होती रहेगी। ऐसे लोग किसी की भलाई या सद्भावना पर विश्वास नहीं कर सकते, उन्हें सभी धूर्त या दुष्ट दिखाई देते हैं। ऐसे लोगों को दोष दृष्टा ही कहा जायेगा। उनकी अपनी दुर्बलता उनके चारों ओर धूर्तता दुष्टता के रूप में बिखरी दिखाई पड़ती है।

🔵 दोषदर्शी दृष्टिकोण मनुष्य के लिए एक भारी विपत्ति के समान है। प्रेम और द्वेष छिपाये नहीं छिपते। दुर्भावों में वह शक्ति है कि जिसके प्रति उस तरह के भाव रखे जायें तो उस तक किसी न किसी प्रकार जा ही पहुँचते हैं और वह किसी दिन जान ही लेता है कि अमुक व्यक्ति मेरा निन्दक या द्वेषी है। यह जान लेने पर उसके मन में भी प्रतिक्रिया होती ही, वह भी शत्रुता करेगा। इस प्रकार उस दोष दर्शी के शत्रु ही चारों ओर बढ़ते जायेंगे। शत्रुता के साथ विपत्ति जुड़ी हुई है, जिसके जितने ज्यादा शत्रु होंगे वह उतना ही चिंतित, परेशान एवं आपत्तिग्रस्त रहेगा। उसके मार्ग में समय-समय पर अनेकों बाधाएं आती ही रहेंगी। उन्नति के मार्ग में सहयोग देने वालों की अपेक्षा रोड़े अटकाने वाले ही अधिक होंगे। ऐसी स्थिति अपने लिए उत्पन्न कर लेना कोई बुद्धिमता की बात नहीं है। निन्दात्मक दृष्टिकोण अपनाये रखना एक अबुद्धिमत्ता पूर्ण कार्य ही कहा जा सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 29 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 Sep 2017


👉 सबसे बड़ा पुण्य:-

🔴 एक गांव मे एक बहुत गरीब सेठ रहता था जो कि किसी जमाने बहुत बड़ा धनवान था जब सेठ धनी था उस समय सेठ ने बहुत पुण्य किए। गउशाला बनवाई गरीबों को खाना खिलाया अनाथ आश्रम बनवाए और भी बहुत से पुण्य किए थे लेकिन जैसे जैसे समय गुजरा सेठ निर्धन हो गया।
                 
🔵 एक समय ऐसा आया कि राजा ने ऐलान किया कि यदि किसी व्यक्ति ने कोई पुण्य किए हैं तो वह अपने पुण्य बताए और अपने पुण्य का जो भी उचित फल है ले जाए।

🔴 यह बात जब सेठानी ने सुनी तो सेठानी सेठ को क़हा कि हमने तो बहुत पुण्य किए हैं तुम राजा के पास जाओ और अपने पुण्य बताकर उनका जो भी फल मिले ले आओ।

🔵 सेठ इस बात के लिए सहमत हो गया और दुसरे दिन राजा के महल जाने के लिए तैयार हो गया।

🔴 जब सेठ महल जाने लगा तो सेठानी ने सेठ के लिए चार रोटी बनाकर बांध दी कि रास्ते मे जब भुख लगी तो रोटी खा लेना.सेठ राजा के महल को रवाना हो गया गर्मी का समय दोपहर हो गई सेठ ने सोचा सामने पानी की कुंड भी है वृक्ष की छाया भी है क्यों ना बैठकर थोड़ा आराम किया जाए व रोटी भी खा लूंगा।

🔵 सेठ वृक्ष के नीचे रोटी रखकर पानी से हाथ मुंह धोने लगा।

🔴 तभी वहां पर एक कुतिया अपने चार पांच छोटे छोटे बच्चों के साथ पहुंच गई और सेठ के सामने प्रेम से दुम हिलाने लगी क्यों कि कुतिया को सेठ के पास के अनाज की खुशबु आ रही थी।

🔵 कुतिया को देखकर सेठ को दया आई सेठ ने दो रोटी निकाल कुतिया को डाल दी अब कुतिया भुखी थी और बिना समय लगाए कुतिया दोनो रोटी खा गई और फिर से सेठ की तरफ देखने लगी।

🔴 सेठ ने सोचा कि कुतिया के चार पांच बच्चे इसका दुध भी पीते है दो रोटी से इसकी भुख नही मिट सकती और फिर सेठ ने बची हुई दोनो रोटी भी कुतिया को डाल कर पानी
पीकर अपने रास्ते चल दिया।

🔵 सेठ राजा के दरबार मे हाजिर हो गया और अपने किए गए पुण्य के कामों की गिनती करने लगा और सेठ ने अपने द्वारा किए गए सभी पुण्य कर्म विस्तार पुर्वक राजा को बता दिए और अपने द्वारा किए गए पुण्य का फल देने बात कही।

🔴 तब राजा ने कहा कि आपके इन पुण्य का कोई फल नही है यदि आपने कोई और पुण्य किया है तो वह भी बताएं शायद उसका कोई फल मै आपको दे पाऊं।

🔵 सेठ कुछ नही बोला और यह कहकर बापिस चल दिया कि यदि मेरे इतने पुण्य का कोई फल नही है तो और पुण्य गिनती करना बेकार है अब मुझे यहां से चलना चाहिए।

🔴 जब सेठ वापिस जाने लगा तो राजा ने सेठ को आवाज लगाई कि सेठ जी आपने एक पुण्य कल भी किया था वह तो आपने बताया ही नही, सेठ ने सोचा कि कल तो मैनें कोई पुण्य किया ही नही राजा किस पुण्य की बात कर रहा है क्यों कि सेठ भुल चुका था कि कल उसने कोई पुण्य किया था।

🔵 सेठ ने कहा कि राजा जी कल मैनें को ई पुण्य नहीं किया, तो राजा ने सेठ को कहा कि कल तुमने एक कुतिया को चार रोटी खिलाई और तुम उस पुण्य कर्म को भुल गए?

🔴 कल किए गए तेरे पुण्य के बदले तुम जो भी मांगना चाहते हो मांग लो वह तुझे मिल जाएगा।

🔵 सेठ ने पूछा कि राजा जी ऐसा क्यों मेरे किए पिछले सभी कर्म का कोई मूल्य नही है और एक कुतिया को डाली गई चार रोटी का इतना मोल क्यों?

🔴 राजा ने कहा हे सेठ! जो पुण्य करके तुमने याद रखे और गिनकर लोंगों को बता दिए वह सब बेकार है क्यों कि तेरे अन्दर मै बोल रही है कि यह मैनें किया।

🔵 तेरा सब कर्म व्यर्थ है जो तू करता है और लोगों को सुना रहा है, जो सेवा कल तुमने रास्ते मे कुतिया को चार रोटी पुण्य करके की वह तेरी सबसे बड़ी सेवा है, उसके बदले तुम मेरा सारा राज्य भी ले लो वह भी बहुत कम है।

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (अन्तिम भाग)

🌹  तो फिर हमें क्या करना चाहिए?

🔴 भोग प्रधान आकांक्षाएँ रखने से मनुष्यों की अतृप्ति बढ़ जाती है और वे अधिक सुख सामग्री की माँग करते हैं। स्वार्थ के कारण ही छीना झपटी और चालाकी बेईमानी बढ़ती है। श्रम से बचने और मौज करने की इच्छाएँ जब तीव्र हो जाती है, तो उचित-अनुचित का विचार छोड़कर लोग कुमार्ग पर चलने लगते हैं, जिसका परिणाम उनके स्वयं के लिए ही नहीं सारे समाज के लिए भी घातक होता है। इस अदूरदर्शितापूर्ण प्रक्रिया को अपनाने से ही संसार में सर्वत्र दुःख-दैन्य का विस्तार हुआ है।
     
🔵 पतन का निवारण करने के लिए मानवीय दृष्टिकोण में परिवर्तन करना आवश्यक है और उस परिवर्तन के लिए मनुष्य का जीवन-दर्शन भी ऊँचा बनाया जाना चाहिए। पतित भावनाओं वाले व्यक्ति के लिए लाँछना एवं आत्म-ग्लानि की व्यथा कष्टदायक नहीं होती, वह निर्लज्ज बना कुकर्म करता रहता है। जब लोक मानस का स्तर भावनात्मक दृष्टि से ऊँचा उठेगा तब ही जीवन में श्रेष्ठता आएगी और उसी के आधार पर विश्व शांति की मंगलमय परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी।

🔴 आज का मनुष्य सभ्यता के क्षेत्र में विकास करने के साथ-साथ इतना विचारशील भी बना है कि यदि उसे तथ्य समझाए जाएँ, तो वह उन्हें समझने और मानने के लिए तैयार हो जाता है। लोकसेवियों को इस प्रयोजन के लिए घर-घर जाना चाहिए और लोगों की आस्थाएँ, मान्यताएँ तथा विचारणाएँ परिष्कृत करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

🔵 प्रत्येक व्यक्ति इतना बुद्धिमान और प्रतिभाशाली नहीं होता कि वह तथ्यों को सही-सही समझा सके और किस परिस्थितियों में क्या किया जाना चाहिए, इसका मार्गदर्शन कर सके। इसके लिए सुलझी विचारधारा का साहित्य लेकर निकलना चाहिए तथा लोगों को उसे पढ़ने तथा विचार करने की प्रेरणा देनी चाहिए, उसके साथ अशिक्षित व्यक्तियों के लिए पढ़कर सुनाने या परामर्श द्वारा प्रेरणा देने की प्रक्रिया चलाई जानी चाहिए। आरंभ में सभी लोगों की रुचि इस ओर नहीं हो सकती। अतः जो लोग ज्ञानयज्ञ की आवश्यकता समझते हैं, उन्हें चाहिए कि वे ऐसा विचार-साहित्य लोगों तक स्वयं लेकर पहुँचें।

🔵 यह ठीक है कि कुआँ प्यासे के पास नहीं जाता, प्यासे को ही कुआँ के पास जाकर पानी पीना पड़ता है। गर्मियों में जब व्यापक जल संकट उत्पन्न हो जाता है, तो बादलों को ही जगह-जगह जाकर बरसना पड़ता है। लोक-सेवियों को भी सद्विचारों और सद्प्रेरणाओं की शीतल सुखद जलवृष्टि के लिए जन-जन तक पहुँचना चाहिए। उसके लिए उन व्यक्तियों में पहल सद्विचारों के प्रति भूख जगाना आवश्यक है। भूख उत्पन्न करने का यह कार्य सम्पर्क द्वारा ही संभव होता है। उसके बाद सद्विचारों और सत्प्रेरणाओं को उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। यह आवश्यकता साहित्य और निम्न सेवा कार्यों द्वारा पूरी की जा सकती है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी का निर्मल अन्तःकरण (अंतिम भाग)

🔴 स्त्री को जीतने और सुधारने का एकमात्र अस्त्र उनके प्रति गहरी ममता, आत्मीयता, उदारता, करुणा, एवं हित कामना ही है। जिसके मन में यह भावना होंगी वह नारी की बुरी से बुरी आदतों को स्वल्प प्रयास से दूर करके उसके पूर्ण अनुकूल एवं उपयोगी बना सकेगा। इसके विपरीत जो उससे विरानेपन का, बदले का, अनुदारता का, स्वामित्व का एवं उसकी कमजोरों से नाजायज लाभ उठाने का प्रयत्न करते हैं वे उसे कदापि नहीं सुधार सकते हैं और वरन् ऐसे प्रयत्नों से उलटा विद्वेष बढ़ाते हैं और अपने भविष्य को अन्धकारमय बना लेते हैं।

🔵 गृहस्थ जीवन की 90 प्रतिशत सफलता नारी की अनुकूलता पर निर्भर रहती है। और नारी की अनुकूलता पुरुष की उदारता एवं सच्ची आत्मीयता पर निर्भर है। यदि नारी में कोई कमी भी है तो उसके निर्मल हृदय को प्रेम से जीता जा सकता है। हीरे के अंगूठी से यदि कोई अशुद्ध वस्तु लग जाय तो उसे कोई तोड़ नहीं डालता वरन् उस अशुद्धि को हटाकर उस मूल्यवान वस्तु को पूर्ववत् प्रेमपूर्वक रखा जाता है, इसी प्रकार नारी की छोटी-मोटी त्रुटियों, बुराइयों से निराश या विक्षुब्ध होने की आवश्यकता नहीं है, वरन् रोगी के प्रति डॉक्टर या परिचर्या करने वाले की जो भावना होती है उसी भावना के साथ उसे सुधारने की आवश्यकता है।

🔴 गायत्री के ‘रे’ अक्षर में नारी के प्रति उदारता और सहृदयता का व्यवहार करने के लिए आदेश दिया गया है। इस आदेश को पालन करने से हमारे गृहस्थ जीवन में स्वर्गीय शान्ति, समृद्धि एवं उन्नति के अनेकों अवसर उत्पन्न हो सकते हैं। आज लड़की के पिता से दहेज माँगा जाता है, ठहराव कम दहेज मिलने पर वधू का अपमान किया जाता है, कन्याओं की शिक्षा पर, उनके स्वास्थ पर माँ बाप पूरा ध्यान नहीं देते, ससुराल में लड़की को छोटी-छोटी बातों पर अपमानित होना पड़ता है, उसकी इच्छा को कोई महत्व नहीं दिया जाता, उसे स्वावलम्बी तथा उन्नतिशील बनाने के लिए भी किसी का ध्यान नहीं होता, केवल उससे अधिकाधिक सेवा लेने की ही सबकी दृष्टि रहती है। इस प्रकार की अनुदारता बन्द करके ओर उदार एवं सहृदय व्यवहार करने का आदेश गायत्री मन्त्र में दिया गया है। यदि हम इस आदेश को मानें तो निस्सन्देह नारी अन्तःकरण निर्मल नर्मदा नदी के समान स्वच्छ, शीतल एवं शान्तिमय बन सकता है और वह साक्षात् लक्ष्मी बन कर हमारे जीवन को स्वर्गीय आनन्द से परिपूर्ण कर सकती है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1952 पृष्ठ 

👉 आज का सद्चिंतन 28 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Sep 2017


बुधवार, 27 सितंबर 2017

👉 अल्पाहार करने वाला

चौ कम खुदन तवीअत शुद कसेरा।
चौ सख्ती पेशश आयद सहस गीरद॥ (1)॥

वगर तन पर दरस्त अन्दर फराखी।
चौ तंगी वीनद अज सख्ती बमीरद ॥ (2)॥

🔵 ‘अल्पाहार करने वाला आसानी से तकलीफों को सहन कर लेता है। पर जिसने सिवाय शरीर पालने के और कुछ किया ही नहीं, उस पर सख्ती की जाती है तो वह मर जाता है।” खुरासान के दो फकीरों में खूब गाढ़ी दोस्ती थी। वे साथ-साथ सफर करते थे। उनमें से एक दुर्बल और दूसरा हट्टा-कट्टा था। जो दुर्बल था वह दो दिन तक उपवास करता और जो पुष्ट था, वह दिन में तीन बार खाता। दैव योग से ऐसा हुआ कि वे दोनों जासूस समझे जाकर, नगर के फाटक पर गिरफ्तार कर लिये गये और एक ही कोठरी में कैद कर लिये गये जिस कोठरी में वे दोनों कैद किए गए, उसका द्वार भी मिट्टी से बंद कर दिया गया।

🔴 पंद्रह दिन पीछे मालूम हुआ, कि वे दोनों निर्दोष ही कैद किये गये हैं। इसलिए द्वार खोल कर बाहर निकाले गये। उनमें से जो मोटा-ताजा था वह तो मरा हुआ मिला और जो दुबला-पतला था, वह जिंदा मिला। इस घटना से लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। इस पर एक हकीम ने कहा कि यदि मोटा मनुष्य जीता रहता और दुर्बल मर जाता तो और भी अधिक आश्चर्य की बात होती, क्योंकि वह शख्स जो बहुत खाने वाला था उपवास नहीं कर सकता था। जो मनुष्य दुर्बल था, वह उपवासों का अभ्यासी था और अपनी काया को वश में रख सकता था, इसी से वह बच गया।

🔵 जो मनुष्य थोड़ा खाने का आदी होता है वह सुख से संकट सह लेता है, लेकिन जो सुख के दिनों में नाक तक ठूँस-ठूँस कर खाता है, उसके दुख के दिनों में अपनी आदत में डूब कर मरना पड़ता है। तात्पर्य यह है कि जो थोड़े ही में संतुष्ट रहते हैं, उन्हें संसारी यातनाएं नहीं सताती।

🌹 अखण्ड ज्योति 1950 नवम्बर

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 141)

🌹  स्थूल का सूक्ष्म शरीर में परिवर्तन सूक्ष्मीकरण

🔵 यह सूक्ष्म शरीरों की, सूक्ष्म लोक की सामान्य चर्चा हुई। प्रसंग अपने आपे को विकसित करने का है। यह विषम वेला है। इसमें प्रत्यक्ष शरीर वाले, प्रत्यक्ष उपाय-उपचारों से जो कर सकते हैं, सो कर ही रहे हैं। करना भी चाहिए, पर दीखता है कि उतने भर से काम चलेगा नहीं। सशक्त सूक्ष्म शरीरों को बिगड़ों को अधिक न बिगड़ने देने के लिए अपना जोर लगाना पड़ेगा। सँभालने के लिए जो प्रक्रिया चल रही है, वह पर्याप्त न होगी। उसे और भी अधिक सरल-सफल बनाने के लिए अदृश्य सहायता की आवश्यकता पड़ेगी। यह सामूहिक समस्याओं के लिए भी आवश्यक होगा और व्यक्तिगत रूप से सत्प्रयोजनों में संलग्न व्यक्तित्वों को अग्रगामी-यशस्वी बनाने की दृष्टि से भी।

🔴 जब हमें यह काम सौंपा गया तो उसे करने में आना-कानी कैसी? दिव्य सत्ता के संकेतों पर चिरकाल से चलते चले आ रहे और जब तक आत्मबोध जागृत रहेगा तब तक यही स्थिति बनी रहेगी। यही गतिविधि चलेगी। यह विषम बेला है, इन दिनों दृश्य और अदृश्य क्षेत्र में जो विषाक्तता भरी हुई है, उसके परिशोधन का प्रयास करना अविलम्ब आवश्यक हो गया है, तो संजीवनी बूटी लाने के लिए पर्वत उखाड़ लाने और सुषेन वैद्य की खोज में जाने के लिए जो करना पड़े करना चाहिए। यह कार्य स्थूल शरीर को प्रसुप्त से जाग्रत स्थिति में लाने के लिए हमें अविलम्ब जुटना पड़ा और विगत दो वर्षों में कठोर तपश्चर्या का-एकांत साधना का अवलंबन लेना पड़ा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.160

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.20

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 75)

🌹  तो फिर हमें क्या करना चाहिए?
🔴 इस पुस्तक को पढ़कर आपके मन एवं अंतःकरण में स्वयं के लिए, देश, धर्म और संस्कृति के लिए कुछ करने की उत्कंठा अवश्य जाग्रत हुई होगी। आप सोच रहे होंगे, आखिर हम क्या करें? घबराइए नहीं, श्रेष्ठ जीवन के लिए दैनिक जीवन में बहुत जटिलता की आवश्यकता नहीं होती। सरल सहज जीवन जीते हुए भी आप सुख-शांति अनुभव कर सकते हैं। व्यक्तित्व के सम्पूर्ण विकास के लिए तीन उपक्रम अपनाने होंगे-उपासना साधना, आराधना। उपासना के लिए नित्य १५ मिनट अथवा ३० मिनट का समय प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर निकालें। देव मंदिर में ईश्वर के सान्निध्य में बैठें और देव शक्तियों के आशीर्वाद एवं कृपा की वर्षा का भाव रखते हुए अपने अंदर देवत्व की वृद्धि कर अनुभव करें।
     
🔵 आपकी श्रद्धा जिस देवता, जिस मंत्र, जिस उपासना में अपने इष्ट के दैवीय गुणों के अपने अंदर वृद्धि का भाव अवश्य रखें। साधना प्रतिपल करनी होती है। ज्ञान और विवेक का दीपक निरंतर अपने अंतर में प्रज्ज्वलित रखें। निकृष्टता से बचने एवं उत्कृष्टता की ओर बढ़ने हेतु मनोबल रहें। दुर्गुणों से बचने एवं उत्कृष्टता की ओर बढ़ने हेतु मनोबल बढ़ाते रहें। दुर्गुणों से बचने एवं सद्गुणों को धारण करने में समर्थ बनें। यही साधना का स्वरूप है। इसके लिए प्रतिपल सतर्कता एवं जागृति आवश्यक है। देश, समाज, धर्म और संस्कृति के उत्थान के हेतु किए गए सेवा कार्य आराधना कहलाते हैं।

🔴 पतन का निराकरण ही सर्वोत्कृष्ट सेवा है। सेवा साधना से पतन का निराकरण तब ही संभव है, जब व्यक्ति के चिंतन में आई आकृतियों और अवांछनीयताओं का उन्मूलन हो जाए। सेवा की उमंग है और सर्वोत्कृष्ट रूप की सेवा करने के लिए लगन है, तो इसी स्तर का सेवा कार्य आरंभ करना और चलाना चाहिए।

🔵 प्रश्न यह उठता है कि इस स्तर की सेवा साधना किस प्रकार की जाए? मनुष्य के स्तर में आए हुए पतन को किस प्रकार मिटाया जाए और उसे उत्थान की ओर अग्रसर किया जाए। स्पष्ट है कि यह कार्य विचारों और भावनाओं के परिष्कार द्वारा ही किया जा सकता है। इसके लिए विचार परिष्कार की प्रक्रिया चलानी चाहिए तथा उत्कृष्ट और प्रगतिशील सद्विचारों को जन-जन तक पहुँचाना चाहिए। यह सच है कि समाज में जो कुछ भी अशुभ और अवांछनीय दिखाई देता है, उसका कारण लोगों के व्यक्तिगत दोष ही हैं। उन दोषों की उत्पत्ति व्यक्ति की दूषित विचारणाओं तथा विकृत दृष्टिकोणों से होती है।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Cub between wolves

🔴 A wolf found a lion’s child in a very infant stage and kept it with his own children. The cub never recognized himself growing in the community of wolves. Once this family went for hunting. As they pounced over a dead elephant, a lion appeared. The lion asked the cub the reason for him being with the wolves and why was he getting afraid of him.

🔵 The cub was not able to understand what was going on. The lion understood the situation looking at the situation. He showed him his image in water and then again his face. Then he roared and asked him to do so. Then he realized of his original self and went back to his community and roamed fearlessly.

🔴 There are a large number of people who forget their self and wander in dreams.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 Sep 2017

🔵 सड़े गले कूड़े करकट का जब खाद रूप से सोना कमाया जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि घटिया स्वभाव के आदमियों से भी यदि हम बुद्धिमत्ता पूर्ण व्यवहार करें तो उनसे सज्जनता की प्रतिक्रिया प्राप्त न हो। जब साँप, रीछ और बन्दर जैसे अनुपयोगी जानवरों को सिखा पढ़ा कर लोग उनसे तमाशा कराते और धन कमाते हैं तो कोई कारण नहीं कि हम बुरे, ओछे और मूर्ख समझे जाने वाले लोगों को अपने लिए हानिकारक सिद्ध होने देने की अपेक्षा उन्हें उपयोगी लाभ दायक न बना सकें। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हमारा निज का दृष्टिकोण और स्वभाव सही हो।

🔴 हम अपनी निज की दुर्बलताओं के प्रवाह में बहते हैं और छोटे-छोटे कारणों को बहुत बड़ा रूप देकर कुछ-कुछ समझने लगने की भूल करते हैं, सामने वाले में केवल दोष ही दोष ढूँढ़ते हैं, तो वही मिलेगा जो हमने ढूँढ़ा था। दोष विहीन कोई वस्तु नहीं, यदि हम दोष ढूंढ़ने की आदत से ग्रसित हो रहे हैं और किसी के प्रति दुर्भावपूर्ण भावना बनाये हुए हैं तो उसके जितने दोष हैं वे सब बहुत ही बड़े-बड़े रूप में दिखाई देंगे और वह व्यक्ति दोषों के पर्वत जैसा दीखेगा। यदि इसके विपरीत हमारा दृष्टिकोण उसी व्यक्ति के प्रति आत्मीयता पूर्ण रहा होता, उसकी सज्जनता पर विश्वास करते तो उसमें अनेकों गुण ऐसे दिखाई देते जिससे उसे सज्जन एवं सत्पुरुष कहने को ही जी चाहता।

🔵 भूल हर किसी से होती है। दुर्गुणों और दुर्बलताओं से रहित भी कोई नहीं है। पर जिसे हम प्यार करते हैं, उनकी भूलों पर ध्यान नहीं देते या उन्हें बहुत छोटी मानते हैं, यदि कोई बड़ी भूल भी होती है तो उसे हंसकर सहन कर लेते हैं और उदारतापूर्वक क्षमा कर देते हैं। यह अपनी भावनाओं का ही खेल है कि दूसरों की बुराई या भलाई बहुत छोटी हो जाती है या अनेकों गुनी बढ़ी-चढ़ी दीखती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 27 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Sep 2017


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...