बुधवार, 16 अगस्त 2017

👉 दिखावा ना करे!

🔵 मैनेजमेंट की शिक्षा प्राप्त एक युवा नौजवान की नौकरी लग जाती है, उसे कंपनी की और सेकाम करने के लिए अलग से एक केबिन दे दिया जाता है। वह नौजवान जब पहले दिन ऑफिस जाता है और बैठ कर अपने शानदार केबिन को निहार रहा होता है तभी दरवाजा खट-खटाने कीआवाज आती है दरवाजे पर एक साधारण सा व्यक्ति रहता है, पर उसे अंदर आने कहने के बजाय वह युवा व्यक्ति उसे आधा घँटा बाहर इंतजार करने के लिए कहता है। आधा घँटा बीतने के पश्चात वह आदमी पुन: ऑफिस के अंदर जाने की अनुमति मांगता है, उसे अंदर आते देख युवक टेलीफोन से बात करना शुरु कर देता है वह फोन पर बहुत सारे पैसो की बाते करता है,अपने ऐशो आराम के बारे मे कई प्रकार की डींगें हाँकने लगता है, सामने वाला व्यक्ति उसकी सारी बाते सुन रहा होता है, पर वो युवा व्यक्ति फोन पर बड़ी-बड़ी डींगें हांकनाजारी रखता है।

🔴 जब उसकी बाते खत्म हो जाती है तब जाकर वह उस साधारण व्यक्ति से पूछता है है कि तुम यहाँ क्या करने आये हो?

🔵 वह आदमी उस युवा व्यक्ति को विनम्र भाव से देखते हुए कहता है, “साहब, मै यहाँ टेलीफोन रिपेयर करने के लिए आया हुँ, मुझे खबर मिली है कि आप जिस टेलीफोन से बात कर रह थे वो हफ्ते भर से बँद पड़ा है इसीलिए मै इस टेलीफोन को रिपेयर करने के लिए आया हूँ।”

🔴 इतना सुनते ही युवा व्यक्ति शर्म से लाल हो जाता है और चुप-चाप कमरे से बाहर चला जाता है। उसे उसके दिखावे का फल मिल चुका होता है।

🔵 कहानी का सार यह है कि जब हम सफल होते है एक लेवल हासिल करते हैं, तब हम अपने आप पर बहुत गर्व होता है और यह स्वाभाविक भी है। गर्व करने से हमे स्वाभिमानी होने का एहसास होता है लेकिन  एक सीमा के बाद ये अहंकार का रूप ले लेता है और आप स्वाभिमानी से अभिमानी बन जाते हैं और अभिमानी बनते ही आप दुसरो के सामने दिखावा करने लगते हैं, और जो लोग ऐसा करते हैं वो उसी लेवल पर या उससे भी निचे आ जाते हैं |

🔴 अतः हमें ध्यान रखना चाहिए कि हम चाहे कितने भी सफल क्यों ना हो जाएं व्यर्थ के अहंकार और झूठे दिखावे में ना पड़ें अन्यथा उस युवक की तरह हमे भी कभी न कभी शर्मिदा होना पड़ सकता है। हमे हमेशा एक लेवल हासिल करने के बाद दुसरे फिर तीसरे और इस तरह से हमे अपने सर्वश्रेस्ट लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए लगातार काम करते रहना चाहियें

👉 आज का सद्चिंतन 16 Aug 2017

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

👉 क्या मैं शरीर ही हूँ-उससे भिन्न नहीं? (भाग 4)

🔵 अरे स्वजन और मित्र कहलाने वाले लोगों-इस अत्याचार से मुझे बचाओ। अपनी आँखों के आगे ही मुझे इस तरह जलाया जाना तुम देखते रहोगे। मेरी कुछ भी सहायता न करोगे। अरे यह क्या-बचाना तो दूर उलटे तुम्हीं मुझमें आग लगा रहे हो। नहीं-नहीं, मुझे जलाओ मत-मुझे मिटाओ मत। कल तक मैं तुम्हारा था- तुम मेरे थे-आज ही क्या हो गया जो तुम सबने इस तरह मुझे त्याग दिया? इतने निष्ठुर तुम सब क्यों बन गये? मैं और मेरा संसार क्या इस चिता की आग में ही समाप्त हुआ? सपनों का अन्त-अरमानों का विनाश-हाय री चिता-हत्यारी चिता- तू मुझे छोड़। मरने का जलने का मेरा जरा भी जी नहीं है। अग्नि देवता, तुम तो दयालु थे। सारी निर्दयता मेरे ही ऊपर उड़ेलने के लिए क्यों तुल गये?
 
🔴 लो, सचमुच मर गया। मेरी काया का अन्त हो ही गया। स्मृतियाँ भी धुँधली हो चलीं। कुछ दिन चित्र फोटो जिये। श्राद्ध तर्पण का सिलसिला कुछ दिन चला। दो तीन पीढ़ी तक बेटे पोतों को नाम याद रहे। पचास वर्ष भी पूरे न हो पाये कि सब जगह से नाम निशान मिट गया। अब किसी को बहुत कहा जाय कि इस दुनिया में ‘मैं’ पैदा हुआ था। बड़े अरमानों के साथ जिया था, जीवन को बहुत सँजोया, सँभाला था, उसके लिए बहुत कुछ जिया था, पर वह सारी दौड़, धूप ऐसे ही निरर्थक चली गई। मेरी काया तक ने मेरा साथ न दिया-जिसमें मैं पूरी तरह घुल गया था। जिस काया के सुख को अपना सुख और जिसके दुःख को अपना दुःख समझा। सच तो यह है कि मैं ही काया था-और काया ही मैं था हम दोनों की हस्ती एक हो गई थी; पर यह क्या अचम्भा हुआ, मैं अभी भी मौजूद हूँ।

🔵 वायुभूत हुआ आकाश में मैं अभी भी भ्रमण कर रहा हूँ। पर वह मेरी अभिन्न सहचरी लगने वाली काया न जाने कहाँ चली गई। अब वह मुझे कभी नहीं मिलेगी क्या? उसके बिना मैं रहना नहीं चाहता था, रह नहीं सकता था, पर हाय री निर्दय नियति। तूने यह क्या कर डाला। काया चली गई। माया चली गई। मैं अकेला ही वायुभूत बना भ्रमण कर रहा हूँ। एकाकी-नितान्त एकाकी। जब काया ने ही साथ छोड़ दिया तो उसके साथ जुड़े हुए परिवारी भी क्या याद रखते-क्यों याद रखते? याद रखे भी रहे हों तो अब उससे अपना बनना भी क्या है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/March/v1.4

👉 आज का सद्चिंतन 15 Aug 2017

सोमवार, 14 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 43)

🌹  अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।

🔴 जिसे हम बुरा समझते हैं, उसे स्वीकार न करना सत्याग्रह है और यह किसी भी प्रियजन, संबंधी या बुजुर्ग के साथ किया जा सकता है। इसमें अनुचित या अधर्म रत्तीभर नहीं है। इतिहास में ऐसे उदाहरण पग-पग पर भरे पड़े हैं। प्रह्लाद, भरत, विभीषण, बलि आदि की अवज्ञा प्रख्यात है। अर्जुन को गुरुजनों से लड़ना पड़ा था। मीरा ने पति का कहना नहीं माना था। मोहग्रस्त अभिभावक अपने बच्चों को अनेक तरह के कुकृत्य करने के लिए विवश करते हैं। बेईमानी का धंधा करने वाले बुजुर्ग अपने बच्चों से भी वही कराते हैं। अपनी मूढ़ता और रूढ़िवादिता की रीति-नीति अपनाने के लिए भी दबाते हैं, न मानने पर नाराज होते हैं, अवज्ञा का आरोप लगाते हैं, ऐसी दशा में किंकर्तव्यविमूढ़ होने की जरूरत नहीं है। आदर्श यही रहना चाहिए कि केवल औचित्य को ही स्वीकार किया जाएगा, चाहे वह किसी के पक्ष में जाता हो।
 
🔵 अनौचित्य करे ही हालत में अस्वीकार किया जाएगा, चाहे किसी ने भी उसके लिए कितना ही दबाव क्यों न डाला हो। आज की सामाजिक कुरीतियों के अंधानुकरण में पुरानी पीढ़ी ही अग्रणी है। बच्चों का जल्दी विवाह कर उन्हें स्वास्थ्य तथा शिक्षा से वंचित करना, उनका मिथ्या मोह मात्र है। नम्रतापूर्वक ऐसे अवसरों पर अपनी हठ, असहमति व्यक्त की जा सकती है। दृढ़तापूर्वक स्पष्ट शब्दों में यह कह दिया जाए कि हमें किसी भी शर्त पर खर्चीला विवाहोन्माद स्वीकार नहीं। जब करना होगा तो बिना दहेज, जेवर तथा बिना धूमधाम का विवाह ही करेंगे। देखने भर में यह अवज्ञा है, पर वस्तुतः इसमें हर किसी का केवल हित साधन ही सन्निहित है। इसलिए बुरा लगने पर भी कड़वी दवा की तरह यह अवज्ञा सबके लिए श्रेयस्कर है। अतएव उसे किसी प्रकार अनुचित अथवा अधर्म नहीं कहा जा सकता।
    
🔴 दोस्ती के नाम पर लोग सिगरेट, शराब, जुआ, सिनेमा आदि के कुमार्ग पर घसीटना चाहते हैं। ऐसे अवसरों पर भी अपनी सहमति को स्पष्ट और कड़े शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं। दोस्ती का मतलब मित्र को कुमार्ग से छुड़ाना है। पथ-भ्रष्ट करने के लिए घसीट ले जाना नहीं। इसी प्रकार कर्ज माँगने वाले, भीख के लिए अड़ने वाले, अनीति का विरोध न करके चुप रहने का आग्रह करने वाले लोग आए दिन सामने आते रहते हैं और चतुरतापूर्वक अपने तर्क तथा प्रतिभा का ऐसा प्रयोग करते हैं कि अनिच्छा होने पर भी उनके प्रभाव में आकर वैसा ही करने को विवश होते हैं। ऐसे अवसरों पर हमारा साहस इतना प्रखर होना चाहिए कि नम्र किंतु स्पष्ट शब्दों में इनकार कर सकें। इनकार, असहयोग, विरोध और संघर्ष इन चार शस्त्रों से हम अनीति और विवेक का सामना कर सकते हैं। सत्य और न्याय के लिए इन शस्त्रों का प्रयोग हमें साहसी शूरवीर योद्धा की तरह करते भी रहना चाहिए।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.59

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.9

👉 आज का सद्चिंतन 14 Aug 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Aug 2017


शनिवार, 12 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 42)

🌹  अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।

🔴 हम एक-एक करके सताए जाते हैं, इसका एक ही कारण है कि सामूहिक प्रतिरोध की क्षमता खो गई। उसे जगाया जाना चाहिए। आज जो एक पर बीत रही है, वह कल अपने पर भी बीत सकती है। दूसरे पर होने वाले अत्याचार का प्रतिरोध हम न करेंगे तो हमारी सहायता के लिए क्यों आएगा? यह सोचकर व्यक्तिगत सुरक्षा की इस चपेट में अपने को भी चोट लगे, आर्थिक तथा दूसरे प्रकार की क्षति उठानी पड़े तो भी इसे मनुष्यता के उत्तरदायित्व का मूल्य समझकर चुकाना चाहिए। इसे सहन करना ही चाहिए। शूरवीरों को आघात सहने का ही पुरस्कार मिलता है और वे इसी आधार पर लोक-श्रद्धा के अधिकारी बनते हैं।
 
🔵 लोक-श्रद्धा के अधिकारी तीन ही हैं-१ संत, (२) सुधारक, (३) शहीद। जिन्होंने अपने आचरणों, विचारों और भावनाओं में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता का समावेश कर रखा है, वे संत हैं। विपन्न परिस्थितियों को बदलकर जो सुव्यवस्था उत्पन्न करने में संलग्न हैं-अनौचित्य के स्थान पर औचित्य की प्रतिष्ठापना कर रहे हैं, वे सुधारक हैं। अन्याय से जूझने में जिन्होंने आघात सहे और बर्बादी हो हँसते हुए शिरोधार्य किया है, वे शहीद हैं। ऐसे महामानवों के प्रति मनुष्यता सदा कृतज्ञ रही है और इतिहास उनका सदा अभिनंदन करता रहा है। भले ही आपत्ति सहनी पड़े, पर इस गौरव से गौरवान्वित हो सकता हो, उसे अपने को धन्य ही मानना चाहिए। अनीति का सामूहिक प्रतिरोध करने की प्रवृत्ति हमें जन-मानस में जाग्रत करनी चाहिए और जिन्होंने इस संदर्भ में कुछ कष्ट सहा हो, शौर्य दिखाया हो, त्याग किया हो, उनका भाव भरा सार्वजनिक अभिनंदन किया जाना चाहिए, ताकि वैसा प्रोत्साहन दूसरों को भी मिले और जन-जीवन में अनीति से लड़ने की उमंग उठ पड़े।
    
🔴 हमें कई बार ऐसी बात मानने और ऐसे काम करने के लिए विवश किया जाता है, जिन्हें स्वीकार करने को अपनी आत्मा नहीं कहती, फिर भी हम दबाव में आ जाते हैं और इंकार नहीं कर पाते। इच्छा न होते हुए भी उस दबाव में आकर वह करने लगते हैं, जो न करना चाहिए। ऐसे दबावों में मित्रों या बुजुर्गों का निर्देश इतने आग्रहपूर्वक सामने आता है कि गुण-दोष का ध्यान रखने वाला असमंजस में पड़ जाता है। क्या करें, क्या न करें? कुछ सूझ नहीं पड़ता। कमजोर प्रकृति के मनुष्य प्रायः ऐसे अवसरों पर ‘ना’ नहीं कह पाते और इच्छा न रहते हुए भी वैसा करने लगते हैं। इस बुरी स्थिति में साहसपूर्वक इनकार कर देना चाहिए।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.57

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.9

👉 आज का सद्चिंतन 12 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Aug 2017


शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

👉 उद्देश्यों की पूर्ति हेतु साधन और उनकी पूर्ति

🔵 यह हमारी वास्तविकता की परीक्षा वेला है। अज्ञान- असुर के विरुद्ध लड़ने के लिए प्रचुर साधनों की आवश्यकता पड़ेगी। जनशक्ति, बुद्धिशक्ति, धनशक्ति जितनी भी जुटाई जा सके उतनी कम है। बाहर के लोग आपाधापी की दलदल में आकंठ मग्न हैं। इस युग पुकार को अखण्ड ज्योति परिवार ही पूरा करेगा।

🔴 जिनको पारिवारिक उत्तरदायित्वों का न्यूनतम निर्वाह करने के लिए जितना समय लगाना अनिवार्य है, वे उस कार्य में उतना ही लगाएँ और शेष समय अज्ञान के असुर से लड़ने के लिए लगाएँ। जिनके बच्चे बड़े हो चुके, जिनके घर में निर्वाह व्यवस्था करने वाले दूसरे लोग मौजूद हैं वे वह उत्तरदायित्व उन लोगों पर मिल- जुलकर पूरा करने की व्यवस्था बनाएँ। जिनने संतान के उत्तरदायित्व पूरे कर लिए वे पूरी तरह वानप्रस्थ में प्रवेश करें और परिव्राजक बनकर जन- जागरण का अलख जगाएँ। जगह- जगह छोटे- छोटे आश्रम बनाने की आवश्यकता नहीं है। इस समय तो हमें परिव्राजक बनकर भ्रमण करने के अतिरिक्त दूसरी बात सोचनी ही नहीं चाहिए।

🔵 बूढ़े होने पर संन्यास लेने की कल्पना निरर्थक है। जब शरीर अर्द्धमृतक हो जाता है और दूसरों की सहायता के बिना दैनिक निर्वाह ही कठिन हो जाता है, तो फिर सेवा- साधना कौन करेगा। युग सैनिकों की भूमिका तो वे ही निभा सकते हैं, जिनके शरीर में कड़क मौजूद है। जो शरीर और मन से समर्थ हैं। इस तरह भी भावनाशील एवं प्रबुद्ध जनशक्ति की अधिक मात्रा में आवश्यकता है। सड़े- गले, अधपगले, हरामखोर और दुर्व्यसनी तो साधु- बाबाओं के अखाड़ों में वैसे ही बहुत भरे पड़े हैं। युग देवता को तो वह प्रखर जनशक्ति चाहिए, जो अपना बोझ किसी पर न डाले वरन् दूसरों को अपनी बलिष्ठ भुजाओं से ऊँचा उठा सकने में समर्थ हों।

🔴 अखण्ड ज्योति परिवार में से ऐसी ही समर्थ एवं सुयोग्य जनशक्ति का आह्वान किया जा रहा है। योग, तप, सेवा, पुरुषार्थ जवानों द्वारा ही किया जा सकता है। वोल्टेज कम पड़ जाने पर पंखा, बत्ती आदि सभी टिमटिम जलते हैं। नवनिर्माण के लिए भी प्रौढ़शक्ति ही काम देगी। बुड्ढे- बीमारों से वह काम भी चलने वाला नहीं है। अस्तु, आह्वान उसी समर्थ जनशक्ति का किया जा रहा है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- मार्च 1975 पृष्ठ 56-57

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 41)

🌹  अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।  

🔴 पौधे की जड़ में पानी मिलता जाएगा तो वह बढ़ता ही चलेगा। अनीति का पोषण होता रहा तो वह दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ती रहेगी। अन्याययुक्त आचरण करने वालों को प्रोत्साहन उनसे मिलता है, जो इसे सहन करते हैं। उत्पीड़ित चुपचाप सब कुछ सह लेता है, यह समझकर अत्याचारी की हिम्मत दूनी-चौगुनी हो जाती है और वह अपना मार्ग निष्कंटक समझकर और भी अधिक उत्साह से अनाचरण करने पर उतारू हो जाता है। अन्याय सहना-अपने जैसे अन्य, असंख्य को उसी तरह का उत्पीड़न सहने के लिए परिस्थितियाँ पैदा करना है। अनीति सहना प्रत्यक्षतः आततायी को प्रोत्साहन देना है
 
🔵 दूसरों को अनीति से पीड़ित होते देखकर कितने ही लोग सोचते हैं कि जिस पर बीतेगी वह भुगतेगा। हम क्यों व्यर्थ का झंझट मोल लें। एक सताया जाता रहता है-पड़ोसी चुपचाप देखता रहता है। दुष्ट लोग हमें भी न सताने लगें, यह सोचकर वे आँखें फेर लेते हैं और उद्दंडों को उद्दंडता बरतते रहने का निर्बाध अवसर मिलता रहता है। चार गुंडे सौ आदमियों की भीड़ में घुसकर सरे बाजार एक-दो को चाकुओं से गोद सकते हैं। सारी भीड़ तमाशा देखेगी, आँखें फेरेगी या भाग खड़ी होगी। कहीं हम भी चपेट में न आ जाएँ, इस भय से कोई उन चार दुष्टों को रोकने या पकड़ने का साहस न करेगा।
   
🔴 इस जातीय दुर्बलता को समझते हुए ही आए दिन दुस्साहसिक अपराधों की, चोरी, हत्या, लूट, कत्ल, बलात्कार आदि की घटनाएँ घटित होती रहती हैं। जानकार, संबंधित और जिन्हें सब कुछ मालूम है, वे गवाही तक देने नहीं जाते और आतंकवादी अदालतों से भी छूट जाते हैं और दूने-चौगुने जोश से फिर जन-साधारण को आतंकित करते हैं। एक-एक करके विशाल जन-समूह थोड़े से उद्दंडों द्वारा सताया जाता रहता है। लोग भयभीत, आतंकित, पीड़ित रहते हैं, पर कुछ कर नहीं पाते। मन ही मन कुड़कुड़ाते रहते हैं। विशाल जन-समूह ‘निरीह’ कहलाए और थोड़े से दुष्ट-दुराचारी निर्भय होकर संत्रस्त, आतंकित करते रहें, यह किसी देश की जनता के लिए सामाजिकता के लिए भारी कलंक-कालिमा है। इससे उस वर्ग की कायरता, नपुंसकता, भीरुता, निर्जीवता ही सिद्ध होती है। ऐसा वर्ग पुरुष कहलाने का अधिकारी नहीं। पुरुषार्थ करने वाले को, साहस और शौर्य रखने वाले को पुरुष कहते हैं। जो अनीति का प्रतिरोध नहीं कर सकता, उसे नपुंसक, निर्जीव और अर्द्धमृत भी कहना चाहिए। यह स्थिति हमारे लिए अतीव लज्जाप्रद है।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.56

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.9

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 129)

🌹  चौथा और अंतिम निर्देशन

🔵 ‘‘इसके लिए जो करना होगा, समय-समय पर बताते रहेंगे। योजना को असफल बनाने के लिए, इस शरीर को समाप्त करने के लिए जो दानवी प्रहार होंगे, उससे बचाते चलेंगे। पूर्व में हुए आसुरी आक्रमण की पुनरावृत्ति कभी भी किसी रूप में सज्जनों-परिजनों पर प्रहार आदि के रूप में हो सकती है। पहले की तरह सबमें हमारा संरक्षण साथ रहेगा। अब तक जो काम तुम्हारे जिम्मे दिया है, उन्हें अपने समर्थ सुयोग्य परिजनों के सुपुर्द करते चलना, ताकि मिशन के किसी काम की चिंता या जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर न रहे। जिस महा परिवर्तन का ढाँचा हमारे मन में है, उसे पूरा तो नहीं बताते, पर उसे समयानुसार प्रकट करते रहेंगे। ऐसे विषम समय, में उस रणनीति को समय से पूर्व प्रकट करने से उद्देश्य की हानि होगी।’’

🔴 इस बार हमें अधिक समय रोका नहीं गया। बैटरी चार्ज करके बहुत दिनों तक काम चलाने वाली बात नहीं बनी। उन्होंने कहा कि ‘‘हमारी ऊर्जा अब तुम्हारे पीछे अदृश्य रूप से चलती रहेगी। अब हमें एवं जिनको आवश्यकता होगी, उन ऋषियों को तुम्हारे साथ सदैव रहना और हाथ बँटाते रहना पड़ेगा। तुम्हें किसी अभाव का, आत्मिक ऊर्जा की कमी का कभी अनुभव नहीं होगा। वस्तुतः यह ५ गुनी और बढ़ जाएगी।’’

🔵 हमें विदाई दी गई और हम शान्तिकुञ्ज लौट आए। हमारी सूक्ष्मीकरण सावित्री साधना राम नवमी १९८४ से आरम्भ हो गई।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.145

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.19

👉 विचारों से बदलेगी दुनिया

🔵 साहित्य की आज कहीं कमी है? जितनी पत्र-पत्रिकाएं आज प्रकाशित होती हैं, जितना साहित्य नित्य विश्व भर में छपता है उस पहाड़ के समान सामग्री को देखते हुए लगता है, वास्तव में मनीषी बढ़े हैं, पढ़ने वाले भी बढ़े हैं। लेकिन इन सबका प्रभाव क्यों नहीं पड़ता? क्यों एक लेखक की कलम कुत्सा भड़काने में ही निरत रहती है एवं क्यों उस साहित्य को पढ़कर तुष्टि पाने वालों की संख्या बढ़ती चली जाती है, इसके कारण ढूंढ़े जायें तो वहीं आना होगा, जहाँ कहा गया था- “पावनानि न भवन्ति”। यदि इतनी मात्रा में उच्चस्तरीय, चिन्तन को उत्कृष्ट बनाने वाला साहित्य रचा गया होता एवं उसकी भूख बढ़ाने का माद्दा जन-समुदाय के मन में पैदा किया गया होता तो क्या ये विकृतियाँ नजर आतीं जो आज समाज में विद्यमान है। दैनन्दिन जीवन की समस्याओं का समाधान यदि सम्भव हो सकता है तो वह युग-मनीषा के हाथों ही होगा।

🔴 जैसा कि हम पूर्व में भी कह चूके हैं कि नवयुग यदि आएगा तो विचार शोधन द्वारा ही, क्रान्ति होगी तो वह लहू और लोहे से नहीं विचारों की काट द्वारा होगी, समाज का नव-निर्माण होगा तो वह सद्-विचारों की प्रतिष्ठापना द्वारा ही सम्भव होगा। अभी तक जितनी मलिनता समाज में प्रविष्ट हुई है, वह बुद्धिमानों के माध्यम से ही हुई है। द्वेष-कलह, नस्लवाद-जातिवाद, व्यापक नर-संहार जैसे कार्यों में बुद्धिमानों ने ही अग्रणी भूमिका निभाई है। यदि वे सन्मार्गगामी होते, उनके अन्तःकरण पवित्र होते, तप, ऊर्जा का सम्बल उन्हें मिला होता तो उन्होंने विधेयात्मक चिन्तन प्रवाह को जन्म दिया होता, सत्साहित्य रचा होता, ऐसे आन्दोलन चलाए होते।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1984 पृष्ठ 21

👉 कर्म योग द्वारा सर्व सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। (अंतिम भाग)

🔵 तुम मालिक हो तो नौकरों को सताओ मत, अभिमान वश अपने को बड़ा न समझो, अपने स्वाँग के अनुसार नौकरों से काम लो परन्तु मन ही मन उन्हें भगवान का स्वरूप समझ कर उनके हित रूपी सेवा करने की चेष्टा करते रहो। मन से किसी का तिरस्कार न करो। लोभवश किसी की न्याय आजीवन को न काटो। उनके भले में लगे रहो। इसी से तुम पर भगवान कृपा करेंगे और तुम्हें अपना परम पद प्रदान करेंगे।

🔴 इसी प्रकार और भी सब लोगों को अपने कर्मों द्वारा भगवान की निष्काम पूजा करनी चाहिये।

🔵 उपरोक्त तथ्यों से हम यह सार निकालते हैं कि भगवान की प्रसन्नता प्राप्ति के लिए किसी विशेष धन या ऐश्वर्य की आवश्यकता नहीं है बल्कि जो काम हम करते हैं, उसी को विवेकपूर्णता से किये जायें। लोभ वृत्ति उत्पन्न करके हम छल, कपट आदि को न अपनायें। अपने ग्राहकों या व्यवहार में आने वालों को भगवत् स्वरूप मानकर चलें। हम अपने काम को हीन न समझें। उसी में सुन्दरता लाने का प्रयत्न करें। इसी से हम उन्नति के पथ पर अग्रसर हो सकते हैं, मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं, आनन्द के समुद्र में गोते लगा सकते हैं। सभी प्रकार की सिद्धियाँ उसके पैरों पर लौटती हैं।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी 1960 पृष्ठ 10

👉 आज का सद्चिंतन 11 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Aug 2017


गुरुवार, 10 अगस्त 2017

👉 Cost of body parts

🔴 A person went to a saint. ”I am unlucky. I don’t have anything. It’s better to die than to live such a life.” The saint said, “Do you have any idea of the things you have? If not then I’ll give you. What are you willing to take in return of your one arm, one leg and one eye? I am ready to give 100 gold coins for each of the parts.” The person said, “I can’t give them, how will I live without them?” The saint said, “Fool, you already have property worth crores, then also you are crying for having nothing”.

🔵 There are many such people who don’t recognize their true worth and consider themselves unlucky. They realize when some enlightened one teaches them lesson.

🌹 From Pragya Puran

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...