गुरुवार, 1 जून 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 Jun 2017



 

होली की हिलोरें

👉होली की हिलोरें

    🔵होली आई है, तो इसकी हिलोरें भी उठेंगी ही। इनकी छुअन हर एक के मन को अपने रस में भिगो देती है, डुबो देती है। अंतराल में स्नेहानुभूति के अक्षय स्रोत से खुलने लगते हैं। ये हिलोरे जिन्हें भी छूती हैं उन्हीं को लगता है कि वे किसी हिंडोले में झूल रहे हैं। होली के उल्लास के महासिंधु में खुद भी हिलोरें ले रहे हैं। कुछ ऐसा लगता है जैसे जीवन के हर अँखुवे से नई शाख फूट पड़ी हो। उमंग में उमगते हुए मन आतुर-आकुल होने लगता है, इस उल्लास को बाँटने के लिए। बस क्या दे डालूँ? यही व्याकुलता-व्याकुल करने लगती है सभी को।

    🔴प्रेमानुभूति में सनी-मस्ती में डूबी यह व्याकुलता अति दुर्लभ है। जीवन में अनेकों भाव पनपते हैं और तिरोहित हो जाते हैं। इनके प्रभाव व सीमाएँ भी सीमित होती हैं। खुशियाँ अन्य दिनों में भी आती हैं, प्रेमरस से अन्य दिनों में भी मन भीगता है, पर इसकी परिधि प्रायः व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन तक सिमटी-सिकुड़ी रहती है। पर होली में तो जैसे प्रेमभरी मस्ती का महासिंधु हिलोरें लेता है। जिसकी प्रत्येक लहर के छूने भर से जाति, धर्म, वंश, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब आदि सभी भेद-भाव की दीवारें टूटती-ढहती-विनष्ट होती चली जाती हैं। होली की उमंगें बढ़ें और विकसित हों, यह आवश्यक है, पर जितनी प्रबल वह हो, उतनी ही सबल जीवनसाधना भी होनी चाहिए। प्रबल धारा को सबल किनारे ही दिशा दे सकते हैं। धारा धीमी हो अथवा कूल कमजोर, दोनों ही अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति में बाधक हैं। दोनों सबल और सशक्त हों, तो प्रेम की महाशक्ति का महाप्रयोग हो सकने की व्यवस्था बनती है।

    🔵प्रेम की महाशक्ति का अमर्यादित उपयोग अथवा सीमाबद्ध रह जाना अकल्याणकारी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है। होली की हिलोरें जीवनसाधना के स्पर्श से सुनियोजित और सुव्यवस्थित हो जाती हैं। फिर उन्हें जहाँ जितनी मात्रा में प्रवाहित करना हो, किया जा सकता है। ऐसा यदि बन सके, तो संसार की विविधता-विषमता के रूप में नहीं, होली की रंग-रँगीली मस्ती के रूप में सामने आएगी। मन के मलाल धुल जाएँगे, स्नेह का गुलाल सब पर छा जाएगा, बस आनंद आ जाएगा। जो सामने आए, मन का मैल मिटाकर उसी पर अपना प्रेम उँड़ेल दें। दोनों सराबोर हो जाएँ, होली की हिलोरें यदि इस तरह हमें भिगो दें, तो जीवन पहेली नहीं एक रँगोली बन जाए।


🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 79
 


बुधवार, 31 मई 2017

👉 आज का सद्चिंतन 31 May 2017


नववर्ष का नया संकल्प


 👉नववर्ष का नया संकल्प


    🔵नववर्ष की पहली सुबह का सूर्य हिमालय के हिमशिखरों पर उदित हुआ। श्वेताभ शिखरों की शुभ्रता स्वर्णिम हो उठी। ध्यान में रत साधक के अंतर्जगत् में भी सविता देव उदित हुए। समूचा अंतःकरण उनके दिव्य आलोक से भर उठा। प्रेरक पुंज के प्रेरणास्वर गूँजने लगे-‘‘आलस्य और शिथिलता में पिछले काफी वर्ष बीत चुके। पिछला साल भी कुछ यूँ ही गुजरा। अब नए संकल्प की आवश्यकता है। अब तक तुम अपने चिंतन को पूर्णतः आचरण में नहीं ला सके। इसके लिए निराश होने की बजाय मन में वज्रसंकल्प करो। नया वर्ष तुम्हारे जीवन की नई राहें खोल रहा है, उन पर वीरतापूर्वक आगे बढ़ो। जिसने अपने जीवनलक्ष्य की प्राप्ति का दृढ़ संकल्प कर लिया है, उसके मार्ग में कौन बाधा डाल सकता है।’’

    🔴‘‘जब तुम संकल्पवान् होओगे, तब महाकाल स्वयं तुम्हारा सहचर होगा। परमसत्ता मित्र होगी, सर्वस्व होगी। ईश्वर के सान्निध्य का और अधिक बोध हो सके, इसके लिए अन्य सभी प्रकार की दुर्बलताओं का त्याग कर देना ही अच्छा है। जब तुम अपनी निम्न प्रवृत्तियों का त्याग कर दोगे, तब प्रकृति स्वयं अपने सौंदर्य को तुम्हारे सामने प्रकट कर देगी। ऐसे में तुम्हारे लिए सभी कुछ आध्यात्मिक हो जाएगा। फिर घास का एक तिनका भी तुमसे आत्मा की ही बात कहेगा।’’

    🔵‘‘दूसरों के मतों की चिंता क्यों करते हो? इस मनोवृत्ति से क्या लाभ? जब तुम दूसरों के मत की अपेक्षा करते हो, तब जान लो कि तुम्हारे अंदर संकल्प का अभाव है। सुदृढ़ संकल्प के स्वामी बनो। फिर दूसरे लोग कुछ भी कहें, तुम उनकी चिंता नहीं करोगे। दूसरों पर निर्भर मत रहो, अपने संकल्प की पूर्ति करो। जीवनलक्ष्य प्राप्ति का यह नया संकल्प ही तुम्हें राह दिखा सकता है। अपने समय को व्यर्थ की चर्चा में नष्ट न करो। इससे तुम्हें कुछ भी लाभ न होगा। मार्गदर्शन के लिए ध्यान की गहराई में उतरो, स्वयं अपनी ही आत्मा में निमग्न हो, यही सच्चा मार्ग है- भटकन से कोई लाभ नहीं।’’

    🔴‘‘जीवनलक्ष्य को पाकर रहोगे। नववर्ष का यह नया संकल्प तुम्हें दृढ़ता प्रदान करेगा। तुम्हें लक्ष्य पर पहुँचा देगा। तुम्हारी संकल्पनिष्ठा तुम्हें दृढ़प्रतिज्ञा करेगी तथा तुम्हें सभी प्रकार की बाधाओं पर विजय प्रदान करेगी।’’ सवितादेव से उभरती प्रेरणा की इस अनुगूँज में नववर्ष का नया संकल्प आकार लेने लगा- जीवनलक्ष्य प्राप्ति का संकल्प- उसके लिए अपने सर्वस्व की आहुति का संकल्प- गुरुसत्ता के प्रति समग्र समर्पण का संकल्प।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 81

शनिवार, 27 मई 2017

👉 पूज्यवर का अनुरोध एवं आश्वासन

🔵 हमें अनेक जन्मों का स्मरण है। लोगों को नहीं जिनके साथ पूर्व जन्मों से सघन संबंध रहे हैं, उन्हें संयोगवश या प्रयत्न पूर्वक हमने परिजनों के रूप में एकत्रित कर लिया है और जिस- तिस कारण हमारे इर्द- गिर्द जमा हो गए हैं।
   
🔴 बच्चों को प्रज्ञा परिजनों के संबंध में चलते- चलाते हमारा इतना ही आश्वासन है कि वे यदि अपने भाव- संवेदना क्षेत्र को थोड़ा और परिष्कृत कर लें तो निकटता अब की अपेक्षा और भी अधिक गहरी अनुभव करने लगेंगे।
  
🔵 कठिनाइयों में सहयता करने और बालकों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने की हमारी प्रकृति में राई- रत्ती भी अन्तर नहीं होने जा रहा है। वह लाभ पहले की अपेक्षा और भी अधिक मिलता रह सकता है।
  
🔴 जो अपनी भाव- संवेदना बढ़ा सकेंगे वे भविष्य में हमारी निकटता अपेक्षाकृत और भी अच्छी तरह अनुभव करते रहेंगे।

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 107)

🌹 ब्राह्मण मन और ऋषि कर्म

🔵  अपने समय के विभिन्न ऋषिगणों ने अपने हिस्से के काम सँभाले और पूरे किए थे। उन दिनों ऐसी परिस्थितियाँ, अवसर और इतना अवकाश भी था कि समय की आवश्यकता के अनुरूप अपने-अपने कार्यों को वे धैर्यपूर्वक संचित समय में सम्पन्न करते रह सकें, पर अब तो आपत्तिकाल है। इन दिनों अनेक काम एक ही समय में द्रुतगति से निपटाने हैं। घर में अग्निकाण्ड हो तो जितना बुझाने का प्रयास बन पड़े उसे स्वयं करते हुए, बच्चों को, कपड़ों को, धनराशि को निकालने-ढोने का काम साथ-साथ ही चलता है।

🔴 हमें ऐसे ही आपत्तिकाल का सामना करना पड़ा है और ऋषियों द्वारा हमारी हिमालय यात्रा में सौंपे गए कार्यों में से प्रायः प्रत्येक को एक ही समय में बहुमुखी जीवन जीकर संभालना पड़ा है। इसके लिए प्रेरणा, दिशा और सहायता हमारे समर्थ मार्गदर्शक की मिली है और शरीर से जो कुछ भी हम कर सकते थे, उसे पूरी तरह तत्परता और तन्मयता के साथ सम्पन्न किया है। उसमें पूरी-पूरी ईमानदारी का समावेश किया है। फलतः वे सभी कार्य इस प्रकार सम्पन्न होते चले हैं मानों वे किए हुए ही रखे हों। कृष्ण का रथ चलाना और अर्जुन का गाण्डीव उठाना पुरातन इतिहास होते हुए भी हमें अपने संदर्भ में चरितार्थ होते दीखता रहा है।

🔵 युग परिवर्तन जैसा महान कार्य होता तो भगवान् की इच्छा, योजना एवं क्षमता के आधार पर ही है, पर उसका श्रेय वे ऋषि, कल्प जीवनमुक्त आत्माओं को देते रहते हैं। यही उनकी साधना का-पात्रता का सर्वोत्तम उपहार है। हमें भी इस प्रकार का श्रेय उपहार देने की भूमिका बनी और हम कृत-कृत्य हो गए। हमें सुदूर भविष्य की झाँकी अभी से दिखाई पड़ती है, इसी कारण हमें यह लिख सकने में संकोच रंचमात्र भी नहीं होता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/brahman

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 May 2017


👉 आदर्शोन्मुखी व्यक्तित्व

🔵 सृष्टि की प्रवाहमान जीवनधारा में अनंत व्यक्ति जन्मते हैं, जीते हैं और बह जाते हैं। लेकिन इस अंतविहीन इतिहास के पन्नों पर कुछ ऐसे व्यक्तित्व भी हैं, जिनके जीवन की स्याही कभी धुँधली नहीं पड़ती। वे सदा चमकते रहते हैं और वर्तमान से भी ज्यादा आने वाले कल के लिए सदैव अपना उजला प्रकाश बिखेरते होंगे। काल का प्रचंड प्रवाह जिनको बहा न सका, जिनके बीस-तीस वर्षों को हजार-हजार वर्ष भी ओझल व धूमिल न कर सकें, उन व्यक्तियों की आदर्शोन्मुखी आस्था का ही यह सुफल है।

🔴 व्यष्टि में समष्टि है। समष्टि की समग्रता का अहसास व्यक्ति की अंतश्चेतना में होता है। इस अहसास में जीने वाले को यह सहज समझ होती है कि बटोरने की अपेक्षा छोड़ने का मूल्य है। जलाने की अपेक्षा जलने का मूल्य है। शासक की अपेक्षा अकिंचन का मूल्य है। ये मूल्य आज भी हैं, कल भी थे और कल भी रहेंगे। जिन्होंने मूल्यों का आस्थापूर्वक आचरण किया, वे इतिहासपुरुष बन गए। जिन्होंने केवल इन मूल्यों पर प्रवचन किए, आचरण नहीं किया, वे इतिहास के गर्त में समा गए।

🔵 हालाँकि बटोरना सहज नहीं है, जलाने में साहस की अपेक्षा है, शासक बनने के लिए प्रचुर चतुराई की जरूरत है; पर जिनमें यह साहस है, चातुर्य है, क्षमता है और इसके बावजूद जो बटोरते नहीं, जलाते नहीं, राज्य नहीं करते, मूल्यों का विश्वास उन्हीं में दीप्तिमान् होता है। जिनमें क्षमता और  साहस ही नहीं, उनमें मूल्यों का प्रकाश कहाँ से और कैसे प्रदीप्त होगा! उनमें क्लीवता का काला अँधेरा जो व्याप्त है।

🔴 मारने वाला वीर हो सकता है, लेकिन नहीं मारने वाला महावीर होता है। अपने हृदय की दृढ़ अहिंसा के साथ समस्त प्राणियों के प्रति सजल करुणा हो। मरने वाले तथा मारने वाले दोनों में समान प्राणों-अद्वैत का भाव हो, तभी इसकी सार्थकता है। लेकिन यदि मन में भय हो, स्वयं के प्राणों का व्यामोह एवं कायरता छाई हो, तब उसे अहिंसा का नाम देना आदर्श को पतनोन्मुख बनाना है।

🔵 ऊँचे आदर्शों को खींचकर मन के कमजोर भावों को छिपाने तथा संतुष्ट करने के लिए उन्हें नीचा न किया जाए, यह अत्यंत आवश्यक है। हर क्षेत्र के अपने कुछ शाश्वत मूल्य हैं। अपनी महत्त्वाकांक्षा तथा स्वार्थ की क्षुद्रता में उन मूल्यों का अवमूल्यन नहीं किया जाना चाहिए। मूल्यों के अवमूल्यन को इतिहास कभी क्षमा नहीं करता। इतिहासपुरुष बनने का गौरव तो सच्चे, सार्थक एवं शाश्वत मूल्यों के हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर चढ़ने से ही प्राप्त होता है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 80

👉 भगवान पर विश्वास:-

🔴 एक समय की बात है किसी गाँव  में एक साधु रहता था, वह भगवान का बहुत बड़ा भक्त था और निरंतर एक पेड़ के नीचे बैठ कर तपस्या  किया करता  था। उसका  भगवान पर अटूट विश्वास था और गाँव वाले भी उसकी इज्ज़त करते थे।

🔵 एक बार गाँव में बहुत भीषण बाढ़ आ गई। चारो तरफ पानी ही पानी दिखाई देने लगा, सभी लोग अपनी जान बचाने के लिए ऊँचे स्थानों की तरफ बढ़ने लगे। जब लोगों ने देखा कि साधु महाराज अभी भी पेड़ के नीचे बैठे भगवान का नाम जप  रहे हैं तो उन्हें यह जगह छोड़ने की सलाह दी। पर साधु ने कहा तुम लोग अपनी  जान बचाओ मुझे तो मेरा भगवान बचाएगा!

🔴 धीरे-धीरे पानी  का  स्तर बढ़ता गया, और पानी साधु के कमर तक आ पहुंचा, इतने में वहां से एक नाव गुजरी मल्लाह ने कहा- ” हे साधू महाराज आप इस नाव पर सवार हो जाइए मैं आपको सुरक्षित स्थान तक पहुंचा दूंगा, नहीं, मुझे तुम्हारी मदद की आवश्यकता नहीं है, मुझे तो मेरा भगवान बचाएगा, साधु ने उत्तर दिया।

🔵 कुछ देर बाद बाढ़ और प्रचंड हो गयी, साधु ने पेड़ पर चढ़ना उचित समझा और वहां बैठ कर ईश्वर को याद करने लगा। तभी अचानक उन्हें गड़गडाहट की आवाज़ सुनाई दी, एक हेलिकोप्टर उनकी मदद के लिए आ पहुंचा, बचाव दल  ने एक रस्सी लटकाई  और साधु को उसे जोर से पकड़ने का आग्रह किया, पर साधु फिर बोला मैं इसे नहीं पकडूँगा, मुझे तो मेरा भगवान बचाएगा।

🔴 उनकी हठ के आगे बचाव दल भी उन्हें लिए बगैर वहां से चला गया
।
🔴 कुछ ही देर में पेड़ बाढ़ की धारा में बह गया और साधु की मृत्यु हो गयी, मरने  के  बाद  साधु महाराज स्वर्ग पहुचे और भगवान  से बोले  हे  प्रभु मैंने  तुम्हारी पूरी लगन के साथ आराधना की, तपस्या की पर जब मै पानी में डूब कर मर रहा था तब तुम मुझे बचाने नहीं आये, ऐसा क्यों प्रभु?

🔵 भगवान बोले हे साधु महात्मा मै तुम्हारी रक्षा करने एक नहीं बल्कि तीन बार आया पहला, ग्रामीणों के रूप में, दूसरा नाव वाले के रूप में और तीसरा हेलीकाप्टर बचाव दल के रूप में किन्तु तुम मेरे  इन अवसरों को पहचान नहीं पाए।

शुक्रवार, 26 मई 2017

👉 सर्वसमर्थ गायत्री माता

🔵 यह मई १९७० की बात है। मैं अपने छोटे भाई महावीर सिंह के साथ चार दिन के शिविर में मथुरा गया हुआ था। उस दौरान गुरुदेव ने मुझसे कहा कि तेरी कोई पीड़ा हो तो मुझे बतला। मैंने कहा- गुरुदेव मेरा एक छोटा भाई है। उसके हाथ पैर में जान नहीं है। हिलते डुलते भी नहीं है। पूज्यवर ने कहा- बेटा वह उसके पिछले जन्म का प्रारब्ध है। जिसका परिणाम भुगत रहा है। मैंने कहा- गुरुदेव अगर वह अच्छा नहीं हो सकता है तो ऐसी कृपा करें कि वह मर जाय। हम लोगों से उसका कष्ट देखा नहीं जाता। गुरुदेव बोले- मैं तो ब्राह्मण हूँ, किसी को मार कैसे सकता हूँ! फिर कुछ सोचते हुए धीरे से बोले- जब मनुष्य किसी को जिन्दा नहीं कर सकता तो मारने का अधिकार उसे कैसे मिल सकता है? मैंने कहा- कम से कम चलने फिरने लग जाय.....। गुरुदेव कुछ देर मौन हो गए। उसके पश्चात् बोले बेटा गायत्री माता से कहूँगा, वह ठीक हो जाएगा। भस्मी ले जा, भस्मी से उसकी मालिश करना और मेरा काम करना।
      
🔴 मैंने भस्मी ले जाकर अपनी माँ को दी और बताया कि गुरुदेव की कृपा से भैय्या ठीक हो जाएगा। इस बात पर ज्यादा विश्वास किसी को नहीं हुआ। मेरे पिताजी को तो बिल्कुल विश्वास नहीं था। उन्होंने कहा- अगर यह लड़का ठीक हो जाएगा तो हम गुरुजी की शक्ति को मानेंगे। आसपास के लोगों में यह बात फैल गई थी। सभी लोग उसको देखने आते। डॉक्टर लोग भी बच्चे की स्थिति जानने के लिए आते। मेरी माँ ने भस्म को भाई के अविकसित हाथ पैर में रोजाना लगाना शुरु किया और महामृत्युंजय मंत्र का जप उसने निमित्त शुरू किया। थोड़े ही दिनों में उसके मसल्स बनने लगे।
        
🔵 इस तरह देखते- देखते करीब चार महीने बीत गए। लोगों की उत्सुकता बढ़ रही थी। हाथ पैरों में धीरे- धीरे जान आने लगी। धीरे- धीरे वह चारपाई पकड़कर उठने- बैठने लगा और कुछ ही महीनों में वह एकदम सामान्य बच्चे की तरह हो गया। किसी को विश्वास नहीं होता था कि यह वही बच्चा है। हम लोगों की खुशी का ठिकाना न रहा। पिताजी गाँव भर घूमते, लोगों को बताते कि गुरुदेव ने मेरे बच्चे को हाथ पैर दे दिए हैं। उन दिनों गायत्री यज्ञ के लिए कोई तैयार नहीं होता था, पर इस घटना ने हमें यज्ञ करने हेतु बाध्य कर दिया। ठाठरिया (चूरू) राजस्थान में ६ से ९ मई १९७२ तक एक विशाल यज्ञ का निर्धारण किया गया। उस यज्ञ में दूर- दूर से लोग आए। जो भी आता वह व्यक्ति पूज्यवर की सिद्धियों से अधिक गायत्री यज्ञ के तत्वदर्शन से प्रभावित होता। हजारों लोग दीक्षा लेकर गए। हजारों का साहित्य बिका। उस क्षेत्र में करीब पचास शाखाएँ खुल गईं।
    
🔴 इस घटना के बाद मेरा पूरा परिवार गुरुदेव से गहराई से जुड़ गया। मैंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर २२ अगस्त १९९८ को स्थायी रूप से सेवा दे दी। तब से उनके चरणों में रहकर उन्हीं का कार्य कर रहा हूँ।

🌹 रामसिंह राठौर -शान्तिकुञ्ज (उत्तराखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/mata

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 106)

🌹 ब्राह्मण मन और ऋषि कर्म

🔵 इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने में बहुत देर नहीं लगती। देव मानवों का पुरातन इतिहास इसके लिए प्रमाण उदाहरणों की एक पूरी शृंखला लाकर खड़ी कर देता है। उनमें से जो भी प्रिय लगे, अनुकूल पड़े, अपने लिए चुना, अपनाया जा सकता है। केवल दैत्य ही हैं जिनकी इच्छाएँ आवश्यकताएँ पूरी नहीं होतीं। कामनाएँ, वासनाएँ, तृष्णाएँ कभी किसी की पूरी नहीं हुई हैं। साधनों के विपुल भण्डार जमा करने और उन्हें अतिशय मात्रा में भोगने की योजनाएँ तो अनेकों ने बनाईं, पर हिरण्याक्ष से लेकर सिकंदर तक कोई उन्हें पूरी नहीं कर सका।

🔴 आत्मा और परमात्मा का मध्यवर्ती एक मिलन-विराम है, जिसे देवमानव कहते हैं। इसके और भी कई नाम हैं-महापुरुष, संत, सुधारक और शहीद आदि। पुरातन काल में इन्हें ऋषि कहते थे। ऋषि अर्थात वे-जिनका निर्वाह न्यूनतम में चलता हो और बची हुई सामर्थ्य सम्पदा को ऐसे कामों में नियोजित किए रहते हों, जो समय की आवश्यकता पूरी करें। वातावरण में सत्प्रवृत्तियों का अनुपात बढ़ाएँ। जो श्रेष्ठता की दिशा में बढ़ रहे हैं, उन्हें मनोबल अनुकूल मिले। जो विनाश को आतुर हैं, उनके कुचक्रों को सफलता न मिले। संक्षेप में यही हैं वे कार्य निर्धारण जिनके लिए ऋषियों के प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रयास अनवरत गति से चलते रहते हैं। निर्वाह से बची हुई क्षमता को वे इन्हीं कार्यों में लगाते रहते हैं। फलतः जब कभी लेखा-जोखा लिया जाता है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि वे कितना कार्य कर चुके, कितनी लम्बी मंजिल पार कर ली। यह एक-एक कदम चलते रहने का परिणाम है। एक-एक बूँद जमा करते रहने की गति की ही परिणति है।

🔵 अपनी समझ में वह भक्ति नहीं आई, जिसमें मात्र भावोन्माद ही हो, आचरण की दृष्टि से सब कुछ क्षम्य हो। न उनका कोई सिद्धांत जँचा, न उस कथन के औचित्य को विवेक ने स्वीकारा। अतएव जब-जब भक्ति उमंगती रही ऋषियों का मार्ग ही अनुकरण के योग्य जँचा और जो समय हाथ में था, उसे पूरी तरह ऋषि परम्परा में खपा देने का प्रयत्न चलता रहा। पीछे मुड़कर देखते हैं कि अनवरत प्रयत्न करते रहने वाले कण-कण करके मनों जोड़ लेते हैं। चिड़िया तिनका-तिनका बीनकर अच्छा-खासा घोंसला बना लेती है। अपना भी कुछ ऐसा ही सुयोग्य सौभाग्य है कि ऋषि परम्परा का अनुकरण करने के लिए कुछ कदम बढ़ाए तो उनकी परिणति ऐसी हुई कि जिसे समझदार व्यक्ति शानदार कहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/brahman

👉 आज का सद्चिंतन 27 May 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 May 2017


👉 प्रेरणा का स्रोत

🔴 दोस्तों, जिंदगी है तो संघर्ष हैं, तनाव है, काम का दबाब है, ख़ुशी है, डर है! लेकिन अच्छी बात यह है कि ये सभी स्थायी नहीं हैं! समय रूपी नदी के प्रवाह में से सब प्रवाहमान हैं! कोई भी परिस्थिति चाहे ख़ुशी की हो या ग़म की, कभी स्थाई नहीं होती, समय के अविरल प्रवाह में विलीन हो जाती है!

🔵 ऐसा अधिकतर होता है की जीवन की यात्रा के दौरान हम अपने आप को कई बार दुःख, तनाव,चिंता, डर, हताशा, निराशा, भय, रोग इत्यादि के मकडजाल में फंसा हुआ पाते हैं हम तत्कालिक परिस्थितियों के इतने वशीभूत हो जाते हैं कि दूर-दूर तक देखने पर भी हमें कोई प्रकाश की किरण मात्र भी दिखाई नहीं देती, दूर से चींटी की तरह महसूस होने वाली परेशानी हमारे नजदीक आते-आते हाथी के जैसा रूप धारण कर लेती है और हम उसकी विशालता और भयावहता के आगे समर्पण कर परिस्थितियों को अपने ऊपर हावी हो जाने देते हैं, वो परिस्थिति हमारे पूरे वजूद को हिला डालती है, हमें हताशा,निराशा के भंवर में उलझा जाती है…एक-एक क्षण पहाड़ सा प्रतीत होता है और हममे से ज्यादातर लोग आशा की कोई  किरण ना देख पाने के कारण  हताश होकर परिस्थिति के आगे हथियार डाल देते हैं! 

🔴 अगर आप किसी अनजान, निर्जन रेगिस्तान मे फँस जाएँ तो उससे निकलने का एक ही उपाए है, बस -चलते रहें! अगर आप नदी के बीच जाकर हाथ पैर नहीं चलाएँगे तो निश्चित ही डूब जाएंगे! जीवन मे कभी ऐसा क्षण भी आता है, जब लगता है की बस अब कुछ भी बाकी नहीं है, ऐसी परिस्थिति मे अपने आत्मविश्वास और साहस के साथ सिर्फ डटे रहें क्योंकि- हर चीज का हल होता है,आज नहीं तो कल होता है।

🔵 एक बार एक राजा की सेवा से प्रसन्न होकर एक साधू नें उसे एक ताबीज दिया और कहा की राजन  इसे अपने गले मे डाल लो और जिंदगी में कभी ऐसी परिस्थिति आये की जब तुम्हे लगे की बस अब तो सब ख़तम होने वाला है, परेशानी के भंवर मे अपने को फंसा पाओ, कोई प्रकाश की किरण नजर ना आ रही हो, हर तरफ निराशा और हताशा हो तब तुम इस ताबीज को खोल कर इसमें रखे कागज़ को पढ़ना, उससे पहले नहीं!

🔴 राजा ने वह ताबीज अपने गले मे पहन लिया! एक बार राजा अपने सैनिकों के साथ शिकार करने घने जंगल मे गया! एक शेर का पीछा करते करते राजा अपने सैनिकों से अलग हो गया और दुश्मन राजा की सीमा मे प्रवेश कर गया, घना जंगल और सांझ का समय, तभी कुछ दुश्मन सैनिकों के घोड़ों की टापों की आवाज राजा को आई और उसने भी अपने घोड़े को एड लगाई, राजा आगे आगे दुश्मन सैनिक पीछे पीछे!   बहुत दूर तक भागने पर भी राजा उन सैनिकों से पीछा नहीं छुडा पाया!  भूख  प्यास से बेहाल राजा को तभी घने पेड़ों के बीच मे एक गुफा सी दिखी, उसने तुरंत स्वयं और घोड़े को उस गुफा की आड़ मे छुपा लिया! और सांस रोक कर बैठ गया, दुश्मन के घोड़ों के पैरों की आवाज धीरे धीरे पास आने लगी!  दुश्मनों से घिरे हुए अकेले राजा को अपना अंत नजर आने लगा, उसे लगा की बस कुछ ही क्षणों में दुश्मन उसे पकड़ कर मौत के घाट उतार देंगे! वो जिंदगी से निराश हो ही गया था, की उसका हाथ अपने ताबीज पर गया और उसे साधू की बात याद आ गई! उसने तुरंत ताबीज को खोल कर कागज को बाहर निकाला और पढ़ा!   उस पर्ची पर लिखा था —यह भी कट जाएगा

🔴 राजा को अचानक  ही जैसे घोर अन्धकार मे एक  ज्योति की किरण दिखी, डूबते को जैसे कोई सहारा मिला! उसे अचानक अपनी आत्मा मे एक अकथनीय शान्ति का अनुभव हुआ! उसे लगा की सचमुच यह भयावह समय भी कट ही जाएगा, फिर मे क्यों चिंतित होऊं!  अपने प्रभु और अपने पर विश्वासरख उसने स्वयं से कहा की हाँ, यह भी कट जाएगा!

🔵 और हुआ भी यही, दुश्मन के घोड़ों के पैरों की आवाज पास आते आते दूर जाने लगी, कुछ समय बाद वहां शांति छा गई! राजा रात मे गुफा से निकला और किसी तरह अपने राज्य मे वापस आ गया!

🔴 दोस्तों, यह सिर्फ किसी राजा की कहानी नहीं है यह हम सब की कहानी है! हम सभी परिस्थिति,काम,नाव के दवाव में इतने जकड जाते हैं की हमे कुछ सूझता नहीं है, हमारा डर हम पर हावी होने लगता है, कोई रास्ता, समाधान दूर दूर तक नजर नहीं आता, लगने लगता है की बस, अब सब ख़तम, है ना?

🔵 जब ऐसा हो तो 2 मिनट शांति से बेठिये,थोड़ी गहरी गहरी साँसे लीजिये!  अपने आराध्य को याद कीजिये और स्वयं से जोर से कहिये –यह भी कट जाएगा!  आप देखिएगा एकदम से जादू सा महसूस होगा, और आप उस परिस्थिति से उबरने की शक्ति अपने अन्दर महसूस करेंगे!

👉 आओ! हम भी युगज्योति का स्पर्श पाएँ

🔵 सब तरफ हाहाकार-चीत्कार-चारों ओर अंधकार-ही-अंधकार। साधन बहुत, शक्ति बहुत, किंतु अंधकार में उनका उपयोग कैसे हो? जिन्हें कुछ चाहिए, कुछ-का-कुछ उठा ले रहे हैं। जिनके पास कुछ देने को है, उन्हें पता नहीं किसे देना है। हर कार्य और उसके लिए हर वस्तु, पर इससे क्या-सभी बेठिकाने-अनर्थ तो होगा ही-कारण अंधकार। इस अंधकार को दूर करो, इसे निकाल बाहर करो, चारों ओर यही चीख-पुकार। यही हमें सब ओर से घेरे है।

🔴 एक नन्हा-सा दीपक मुसकराया- कहाँ है अंधकार? हर तरफ से आवाजें उठीं-यहाँ-यहाँ। दीपक पहुँचा-पूछा, कहाँ? उत्तर मिला-हर तरफ। दीपक ने कहा- पर अभी तो कहा जा रहा था ‘यहाँ’! पर यहाँ तो कहीं नहीं है। लोगों ने चारों ओर देखा, सारी स्थिति साफ-साफ दीख रही थी। अपनी बात सही न साबित होते देख सभी दीपक पर ही बिगड़ उठे-तुम हमें झूठ साबित करने आए हो। हमारी चोटें देखो, हमारी हालत देखो, यह क्या बिना अंधकार के संभव है? दीपक शांतभाव से बोला- तुम्हे झूठा सिद्ध करने का नहीं, अपना सत्य समझाने का विचार है, पर जो समझे, उसी को तो समझाऊँ। तुमने अपनी चोटें देख लीं- उनमें मलहम लगाओ, मैं अन्य स्थान देखूँ।

🔵 दीपक हर आवाज पर गया, पर कहीं अंधकार नहीं मिला। सब जगह वही क्रम दोहराया गया। लोगों ने देखा, अरे सचमुच अंधकार तो दीपक के पहुँचते ही भाग जाता है। जहाँ दीपक होता है, वहाँ साफ-साफ दिखाई पड़ने लगता है। दीपक के चारो ओर भीड़ लग गई। सब प्रसन्नचित्त अपना-अपना काम करने लगे।

🔴 एक ने पूछा-अंधकार किसने भगाया? उत्तर मिला- इस ज्योति ने। एक बोला- तो ज्योति हमें दे दो, अपने घर ले जाएँगे। दूसरा बोला- नहीं, मुझे दो और मुझे-मुझे का शोर मच गया। दीपक ने कहा- ज्योति सभी के साथ जा सकती है, पर उसकी अपनी शर्त है, कीमत है। लोग हर्ष से पुकार उठे- हम कीमत देंगे, शर्त पूरी करेंगे, ज्योति लेंगे।

🔵 तो सुनो, ज्योति वर्तिका पर ठहरती है, पर उसे स्नेहसिक्त होना चाहिए और हाँ उसे धारण करने के लिए ऐसा पात्र जो सीधा रह सके और स्नेह को स्वयं ही न पी जाए। यह सब कर सको, तो फिर करो ज्योति पाने की तैयारी। कुछ ने सार्थक प्रयास किया, दीपक ने उन्हें स्पर्श किया, वे प्रकाशित हुए और चल पड़े। शेष शिकायत करते रहे।

🔴 आज भी हर व्यक्ति के लिए कुछ ऐसा ही अवसर है। युगज्योति हममें से हर एक का आह्वान कर रही है। पर हम हैं कि लाभ उठाने की कोशिश कम, शिकायतें अधिक कर रहे हैं। अच्छा हो, इसके लिए जीवन में साधन जुटाएँ, युगज्योति के संपर्क में आने की साधना करे। फिर तो युगज्योति का स्पर्श पाते ही, जीवन में अंधकार खोजने पर भी नहीं मिलेगा।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 79

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 May

🔴 कर्म और कर्मफल में आसक्ति रहने से मनुष्य को अनुकूल-प्रतिकूल स्थितियों से गुजरना पड़ता है और इसी के अनुसार आशा-निराशा का भी सामना करना पड़ता है और इससे मनुष्य की शक्ति यों का काफी क्षय होता है। अपने कर्म और कर्मफल को ईश्वर पर छोड़ देने से निराशा, चिन्ता, असन्तोष का कोई स्थान नहीं रह जाता, मनुष्य का आशावाद ही एकमेव अजर-अमर रहता है । तत्ववेत्ता अरस्तू ने लिखा है—”अपने कर्मों और उसके फल को ईश्वर पर छोड़ देने से आशावाद अजर-अमर बनता है। ईश्वर सभी तरह आशावाद का केन्द्र है। आशावाद और ईश्वरवाद एक ही है।”

🔵 मनुष्य की अपनी विशेष अनुभूतियां, मानसिक स्थिति में ही सुख-दुःख का जन्म होता है। बाह्य परिस्थितियों से इसका कोई सम्बन्ध नहीं। क्योंकि जिन परिस्थितियों में एक दुःखी रहता है तो दूसरा उनमें खुशियाँ मनाता है, सुख अनुभव करता है। वस्तुतः सुख-दुःख मनुष्य की अपनी अनुभूति के निर्णय हैं, और इन दोनों में से किसी एक के भी प्रवाह में बह जाने पर मनुष्य की स्थिति असन्तुलित एवं विचित्र-सी हो जाती है। उसके सोचने समझने तथा मूल्याँकन करने की क्षमता नष्ट हो जाती है।        
                                                
🔴 किसी भी परिस्थिति में सुख का अनुभव करके अत्यन्त प्रसन्न होना, हर्षातिरेक हो जाना तथा दुःख के क्षणों में रोना बुद्धि के मोहित हो जाने के लक्षण हैं। कई लोग व्यक्ति विशेष को अपना अत्यन्त निकटस्थ मान लेते हैं। फिर अधिकार- भावनायुक्त व्यवहार करते हैं। विविध प्रयोजनों का आदान-प्रदान होने लगता है। एक दूसरे से कुछ न कुछ अपेक्षायें रखने लगते हैं। जब तक गाड़ी भली प्रकार चलती रहती है तो लोग सुख का अनुभव करते हैं। लेकिन जब दूसरों से अपनी अपेक्षायें पूरी न हों या जैसा चाहते हैं वैसा प्रतिदान उनसे नहीं मिले तो मनुष्य दुःखी होने लगता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भक्ति की साधना

🔵 सतत समर्पण ही भक्ति है। आत्मा का परमात्मा के प्रति, व्यक्ति का समाज के प्रति, शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण में भक्ति की यथार्थता और सार्थकता है। निष्काम और निःस्वार्थ भक्ति ही फलती है। तभी भक्त भगवान् का साक्षात्कार प्राप्त करता है, तभी व्यक्ति जनचेतना अथवा राष्ट्रभावना का पर्याय बन जाता है और तभी शिष्य में गुरुत्व कृतार्थ हो उठता है। भक्ति कभी अकारथ होती ही नहीं, जितना निष्फल अंश लोगों को उसमें दिखाई देता है, वह भक्ति का नहीं, भक्त की न्यूनता का प्रतिबिंब होता है। भक्त में जितने अंशों में भी स्वार्थ, आकांक्षा एवं लिप्सा का भाव शेष रहता है, वही भाव उतने ही अंशों में भक्ति को निष्फल करता है।

🔴 साधक और सिद्धि की एकरूपता ही भक्ति है। इस सायुज्य में दो एक हो जाते हैं- शरीर, मन, प्राण और आत्मा से। जो तू है वह मैं हूँ, जो मैं हूँ वह तू है। तेरे-मेरे का भेद जहाँ जितने अंशों में समाप्त होता है, भक्ति की सिद्धि उतनी ही निकट आती है। यह सिद्धि भक्त को प्रभुदर्शन के रूप में मिलती है। भक्त अपने भगवान् से तदाकार हो जाता है। भक्ति; भक्ति है। वह आध्यात्मिक हो सकती है और उसका रंग सामाजिक, राजनैतिक और पारिवारिक भी। प्रभुभक्त, जनभक्त, समाजभक्त, राष्ट्रभक्त के साथ पितृभक्त, मातृभक्त, आदर्श पति-पत्नी, सद्गृहस्थ आदि बहुत से प्रचलित शब्द इसके संकेत हैं। भक्ति एक योग है, एक साधना है। दूसरे के प्रति-संतान तथा माता-पिता से लेकर राष्ट्र-समाज एवं परमेश्वर तक जितना समर्पण है वह भक्ति है। हाँ, इसका क्रमिक विकास अवश्य है। इसका प्रारंभिक रूप जहाँ मातृ-पितृ भक्ति है, तो यही अपने विकसित रूप में समाजभक्ति, राष्ट्रभक्ति और अंततः प्रभुभक्ति के रूप में स्वयं को प्रकट करती है।

🔵 मार्ग अनेक हैं, मंजिल एक है। भक्त न उलझता है, न चिंतित होता है। वह सहज रूप में अनेक और अनंत को भी अपना एक बना लेता है और वह एक कपड़ा बुनते हुए कबीर को, कपड़ा सिलते हुए नामदेव को, जूते गाँठते हुए रैदास को, हजामत बनाते हुए सेना नाई को भी मिल जाता है। उस एक को प्राप्त करने वाला व्यक्ति न मोची है, न जुलाहा, वह न राजा है न रंक। वह तो सहजता, सच्चाई, प्रेम, विश्वास अपनाने वाला भक्त होता है।

🔴 भक्त के लिए तो जीवन का हर कर्म पूजा होती है, सृष्टि का हर प्राणी भगवान् होता है, धरती का कण-कण मंदिर होता है। मंदिर में भगवान् की पूजा करते हुए जितने शुद्ध भाव अनिवार्य होते हैं, उतने ही शुद्ध भाव जीवन में हर कर्म करते हुए रहें, यही भक्ति की साधना है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 78

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 26 May 2017


गुरुवार, 25 मई 2017

👉 हृदयद्वार खुले तो सच्ची शिक्षा मिले

🔵 मैं उन्हीं के बीच जाकर बैठ गया। लगा जैसे मैं भी एक फूल हूँ। यदि ये पौधे मुझे भी अपना साथी बना लें, तो मुझे भी अपने खोए बचपन को पाने का सुअवसर मिल जाए। भावना आगे बढ़ी। जब अंतराल हुलसता है, तो कुतर्की विचार भी ठंढे पड़ जाते हैं। भावों में प्रबल रचनाशक्ति है, वे अपनी दुनिया आप बना लेते हैं-काल्पनिक नहीं, पूरी तरह से शक्तिशाली और सजीव। देवों की रचना भावनाओं के बल पर ही हुई है। अपनी श्रद्धा को पिरोकर ही उन्हें महान बनाया गया है। अपने भाव फूल बनने को मचले, तो वैसा ही बनने में देर न थी। लगा कि इन पंक्ति बनाकर बैठे हुए पुष्प बालकों ने मुझे भी सहचर मानकर अपने में सम्मिलित कर लिया है।

🔴 एक गुलाबी फूल वाला पौधा बड़ा हँसोड़ और बातूनी था। अपनी भाषा में उसने कहा-दोस्त! तुम मनुष्यों में बेकार आ जन्मे। उनकी भी कोई जिंदगी है, हर समय चिंता, तनाव, उधेड़बुन, कुढ़न। अबकी बार तुम पौधे बनना और हमारे साथ रहना। देखते नहीं, हम सब कितने प्रसन्न हैं, कितने खिलखिलाते रहते हैं? जिंदगी को हँसी-खेल मानकर जीने में कितनी शांति है, यह हम लोग जानते हैं। देखते नहीं हमारे भीतर का आंतरिक उल्लास हमारी सुगंध के रूप में चारों ओर फैल रहा है। हम सबको प्यार करते हैं, सभी को प्रसन्नता प्रदान करते हैं। आनंद से जीते हैं और जो पास आता है, उसी को आनंदित कर देते हैं। यही तो जीवन जीने की कला है। इनसान बेकार में अपनी बुद्धिमानी पर घमंड करता एवं चिंता, तनाव, घुटन ही तो पाता है।
 
🔵 मेरा मस्तक उस खिलखिलाते हुए फूल के प्रति श्रद्धा से नत हो गया। मैं कहने लगा-पुष्प-मित्र तुम धन्य हो। स्वल्प साधन होते हुए भी जीवन कैसे जीना चाहिए-तुम यह जानते हो। एक हम हैं-जो उपलब्ध सौभाग्य को कुढ़न में ही व्यतीत करते रहते हैं। सखा, तुम सच्चे उपदेशक हो, वाणी से नहीं जीवन से सिखाते हो।

🔴 हँसोड़ गुलाबी फूल वाला पौधा खिलखिलाकर हँस पड़ा। सीखने की इच्छा रखने वाले के लिए पग-पग पर शिक्षक मौजूद हैं। पर आज सीखना कौन चाहता है? सभी तो अपनी उथली जानकारी के अहंकार के मद में ऐंठे-ऐंठे फिरते हैं। सीखने के लिए हृदय का द्वार खोल दिया जाए, तो बहती हुई वायु की तरह शिक्षा, सही अर्थों में विद्या स्वयं ही हमारे अंतःकरण में प्रवेश करने लगेगी।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 77

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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