सोमवार, 10 अप्रैल 2017

👉 आज का सद्चिंतन 11 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 April 2017


👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 33)

🌹 बड़े प्रयोजन के लिये प्रतिभावानों की आवश्यकता

🔵 कहा जा चुका है कि युगसृजन जैसा महान् उत्तरदायित्व पूरा करने में स्रष्टा की उच्चस्तरीय सृजन-शक्तियाँ ही प्रमुख भूमिका संपन्न करेंगी। मनुष्य की औसत उपलब्धि तो यही रही है कि वह बनाता कम और बिगाड़ता अधिक है, पर जहाँ बनाना-ही-बनाना एकमात्र लक्ष्य हो, वहाँ तो स्रष्टा की सृजन-सेना ही अग्रिम मोर्चा सँभालती दिखाई देगी। हर सैनिक के लिये अपने ढंग का अस्त्र-शस्त्र होता है। युगसृजन में आदर्शों के प्रति सघन श्रद्धा चाहिये और ऐसी लगन, जिसे कहीं किन्हीं आकर्षण या दबाव से विचलित न किया जा सके। ऐसे व्यक्तियों को ही देवमानव कहते हैं और उन्हीं के द्वारा ऐसे कार्य कर गुजरने की आशा की जाती है। जिन तथाकथित, कुण्ठाग्रस्त व मायाग्रस्त लोगों को सुनने-विचारने तक की फुरसत नहीं होती, उनसे तो कुछ बन पड़ेगा ही कैसे!                      

🔴 ईश्वर का स्वरूप न समझने वाले उसे मात्र मनोकामनाओं की पूर्ति का ऐसा माध्यम मानते हैं, जो किसी की पात्रता देखे बिना आँखें बंद करके योजनाओं की पूर्ति करता रहता है; भले ही वे उचित हों या अनुचित, किंतु जिन्हें ब्रह्मसत्ता की वास्तविकता का ज्ञान है, वे जानते हैं कि आत्मपरिष्कार और लोककल्याण को प्रमुखता देने वाले ही ईश्वर-भक्त कहे जाने योग्य हैं। इसके बदले में अनुग्रह के रूप में सजल श्रद्धा और प्रखर प्रज्ञा के अनुदान मिलते हैं। उनकी उपस्थिति से ही पुण्य प्रयोजन के लिये ऐसी लगन उभरती है, जिसे पूरा किये बिना चैन ही नहीं पड़ता। 

🔵 उस ललक के रहते वासना, तृष्णा और अहंता की मोह-निद्रा या तो पास ही नहीं फटकती या फिर आकर वापस लौट जाती है। नररत्न ऐसों को ही कहते हैं। प्रेरणाप्रद इतिहास का ऐसे ही लोग सृजन करते हैं। उनके चरणचिह्नों का अनुसरण करते हुए सामान्य सामर्थ्य वाले लोग परमलक्ष्य तक पहुँच कर रहते हैं। यही उत्पादन यदि छोटे-बड़े रूप में उभरता दीख पड़े तो अनुमान लगाना चाहिये कि भावभरा बदलाव आने ही वाला है। कोपलें निकली तो कलियाँ बनेंगी, फूल खिलेंगे, वातावरण शोभायमान होगा और उस स्थिति के आते भी देर न लगेगी, जिससे वृक्ष फलों से लदते और अपनी उपस्थिति का परिचय देकर हर किसी को प्रमुदित करते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 4)

🌹 समय का सदुपयोग करें

🔴 हेनरी किरक व्हाट को सबसे बड़ा समय का अभाव रहता था, पर घर से दफ्तर तक पैदल आने और जाने का समय सदुपयोग करके उसने ग्रीक भाषा सीखी। फौजी डॉक्टर बनने का अधिकतर समय घोड़े की पीठ पर बीतता था। उसने उस समय को भी व्यर्थ न जाने दिया और रास्ता पार करने के साथ-साथ उसने इटेलियन और फ्रेंच भाषायें भी पढ़ लीं। यह याद रखने की बात है कि—‘‘परमात्मा एक समय में एक ही क्षण हमें देता है और दूसरा क्षण देने से पूर्व उस पहले वाले क्षण को छीन लेता है। यदि वर्तमान काल में उपलब्ध क्षणों का हम सदुपयोग नहीं करते तो वे एक-एक करके छिनते चले जायेंगे और अन्त में खाली हाथ ही रहना पड़ेगा’’।

🔵 एडवर्ड वटलर लिटन ने अपने एक मित्र को कहा था—लोग आश्चर्य करते हैं कि मैं राजनीति तथा पार्लियामेंट के कार्यक्रमों में व्यस्त रहते हुए भी इतना साहित्यिक कार्य कैसे कर लेता हूं? 60 ग्रन्थों की रचना मैंने कर ली? पर इसमें आश्चर्य की बात नहीं। यह नियन्त्रित दिनचर्या का चमत्कार है। मैंने प्रतिदिन तीन घण्टे का समय पढ़ने और लिखने के लिये नियत किया हुआ है। इतना समय मैं नित्य ही किसी न किसी प्रकार अपने साहित्यक कार्यों के लिये निकाल लेता हूं। बस इस थोड़े से नियमित समय ने ही मुझे हजारों पुस्तकें पढ़ डालने और साठ ग्रन्थों के प्रणयन का अवसर ला दिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भविष्य का सतयुगी समाज

🔵 बूंदें अलग-अलग रह कर अपनी श्री गरिमा का परिचय नहीं दे सकती। उन्हें हवा का एक झोंका भर सुखा देने में समर्थ होता है। पर जब वे मिलकर एक विशाल जलाशय का रूप धारण करती है, तो फिर उनकी समर्थता और व्यापकता देखते ही बनती है। इस तथ्य को हमें समूची मानव जाति को एकता के केन्द्र पर केन्द्रित करने के लिए साहसिक तत्परता अपनाते हुए संभव कर दिखाना होगा।

🔴 धर्म सम्प्रदाओं की विभाजन रेखा भी ऐसी है जो अपनी मान्यताओं को सच और दूसरों के प्रतिपादनों को झूठा सिद्ध करने में अपने बुद्धि वैभव से शास्त्रार्थों, टकरावों के आ पड़ने पर उतरती रही है। अस्त्र शस्त्रों वाले युद्धों ने कितना विनाश किया है, उसका प्रत्यक्ष होने के नाते लेखा जोखा लिया जा सकता है। पर अपनी धर्म मान्यता दूसरों पर थोपने के लिए कितना दबाव और कितना प्रलोभन, कितना पक्षपात और कितना अन्याय कामों में लगाया गया है, इसकी परोक्ष विवेचना किया जाना संभव हो तो प्रतीत होगा कि इस क्षेत्र के आक्रमण भी कम दुखदायी नहीं रहे है। आगे भी उसका इसी प्रकार परिपोषण और प्रचलन होता रहा तो विवाद, विनाश और विषाद घटेंगे नहीं बढ़ते ही रहेंगे। अनेकता में एकता खोज निकालने वाली दूरदर्शिता को सम्प्रदायवाद के क्षेत्र में भी प्रवेश करना चाहिए।

🔵 आरंभिक दिनों में सर्व-धर्म-समभाव, सहिष्णुता, बिना टकराये अपनी-अपनी मर्जी पर चलने की स्वतंत्रता अपनाए रहना ठीक है काम चलाऊ नीति है। अन्ततः विश्व मानव का एक ही मानव-धर्म होगा। उसके सिद्धान्त चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के साथ जुड़ने वाली आदर्शवादिता पर अवलम्बित होंगे। मान्यताओं और परम्पराओं में से प्रत्येक को तर्क, तथ्य, प्रमाण, परीक्षण एवं अनुभव की कसौटियों पर करने के उपरान्त ही विश्व धर्म की मान्यता मिलेगी। संक्षेप में उसे आदर्शवादी व्यक्तित्व और न्यायोचित निष्ठा पर अवलम्बित माना जाएगा। विश्व धर्म की बात आज भले ही सघन तमिस्रा में कठिन मालूम पड़ती हो पर वह समय दूर नहीं, जब एकता का सूर्य उगेगा और इस समय जो अदृश्य है, असंभव प्रतीत होता है, वह उस बेला में प्रत्यक्ष एवं प्रकाशवान होकर रहेगा। यहीं है आने वाली सतयुगी समाज व्यवस्था की कुछ झलकियाँ जो हर आस्तिक को भविष्य के प्रति आशावान् बनाती है।

🌹 पूज्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
🌹 अखण्ड ज्योति, नवम्बर 1988 पृष्ठ 54

👉 मूर्तिमान् सांस्कृतिक स्वाभिमानी

🔴 एक बडे विद्यालय में, जिसमें अधिकांश छात्र अप दू डेट फैशन वाले दिखाई पडते थे। एक नये विद्यार्थी ने प्रवेश लिया। प्रवेश के समय उसकी पोशाक धोती, कुर्ता, टोपी, जाकेट और पैरों में साधारण चप्पल।

🔵 विद्यालय के छात्रों के लिए सर्वथा नया दृश्य था। कुछ इस विचित्रता पर हँसे, कुछ ने व्यंग्य किया- तुम कैसे विद्यार्थी हो ? तुम्हें अप टू डेट रहना भी नहीं आता ? कम-से-कम अपना पहनावा तो ऐसा बनाओ, जिससे लोग इतना तो जान सकें कि तुम एक बड़े विद्यालय के विद्यार्थी हो।

🔴 छात्र ने हँसकर उत्तर दिया अगर पोशाक पहनने से ही व्यक्तित्व ऊपर उठ जाता है तो पैंट और कोट पहनने वाले हर अंग्रेज महान् पंडित होते, मुझे तो उनमें ऐसी कोई
विशेषता नहीं देती। रही शान घटने की बात तो अगर सात समुद्र पार से आने वाले और भारतवर्ष जैसे गर्म देश में ठंडे मुल्क के अंग्रेज केवल इसलिए अपनी पोशाक नही बदल सकते कि वह इनकी संस्कृति का अंग। है, तो मैं ही अपनी संस्कृति को क्यों हेय होने दूँ ? मुझे अपने मान, प्रशंसा और प्रतिष्ठा से ज्यादा धर्म प्यारा है, संस्कृति प्रिय है, जिसे जो कहना हो कहे, मैं अपनी संस्कृति का परित्याग नहीं कर सकता। भारतीय पोशाक छोड देना मेरे लिए मरणतुल्य है।''

🔵 लोगों को क्या पता था कि साधारण दिखाई देने वाला छात्र लौहनिष्ठा का प्रतीक है। इसके अंतःकरण मे तेजस्वी विचारों की ज्वालाग्नि जल रही है। उसने व्यक्तित्व और विचारों से विद्यालय को इतना प्रभावित किया कि विद्यालय के छात्रों ने उसे अपना नेता बना लिया, छात्र-यूनियन का अध्यक्ष निर्वाचित किया। इस विद्यार्थी को सारा देश गणेश शंकर विद्यार्थी के नाम से जानता है।

🔴 गणेश शंकर अपनी संस्कृति के जितने भक्त थे उतने ही न्यायप्रिय भी थे। इस मामले में किसी भी कठोर टक्कर से वह नही घबराते थे और न ही जातीय या सांप्रदायिक भेदभाव आने देते थे।

🔵 उन दिनो पोस्टकार्ड का टिकट काटकर कागज में चिपका कर भेजना कानून-विरुद्ध न था। गणेश शंकर विद्याथी ने ऐसा ही एक टिकट चिपकाया हुआ पोस्ट कार्ड प्रेषित किया। पोस्टल डिपार्टमेंट ने उसे बैरंग कर दिया। युवक ने इसके लिये फड़फडाती लिखा-पढी की, जिससे घबराकर अधिकारियों को अपनी भूल स्वीकार करनी पडी।

🔴 न्याय और निष्ठा के पुजारी विद्यार्थी जी मानवीय एकता और सहृदयता के भी उतने ही समर्थक थे। इस दृष्टि से तो यह युवक-संत कहलाने योग्य हैं। अत्याचार वे किसी पर भी नहीं देख सकते थे। १९३१ में जब हिंदू-मुसलमानों के बीच दंगा फैला तो गणेश शंकर जी ने बडी बहादुरी के साथ उसे मिटाने का प्रयास किया। जिन मुसलमान बस्तियों में अकेले जाने की हिम्मत अधिकारियों की भी न होती थी वहाँ विद्यार्थी जी बेखटके चले जाते थे। कानपुर मे उन्होंने हजारों हिंदू-मुसलमानों को कटने से बचाया।

🔵 दुर्भाग्य से एक धर्मांध मुसलमान के हाथों वह शहीद हो गये, पर अल्पायु में ही वह मानवीय एकता न्याय और संस्कृतिनिष्ठा का जो पाठ पढा गये वह अभूतपूर्व है। उससे अंनत भविष्य तक हमारे समाज में गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे युवक जन्म लेते रहेगे, तब तक भारतीय संस्कृति का मुख भी उज्जल बना रहेगा।

👉 टूटे हुए हाथ से दी गई परीक्षा

🔴 १३ दिसम्बर २०१०ई. की बात है। बी.एससी. के प्रथम सेमेस्टर की मेरी परीक्षा चल रही थी। सभी पेपर अच्छे जा रहे थे। बस अंतिम तीन पेपर बचे थे। अगले दिन के पेपर की तैयारी चल रही थी। कुछ साथी तो सो गए थे, पर मैं कुछ साथियों के साथ देर रात तक पढ़ाई करता रहा।

🔵 हम अपनी पढ़ाई समाप्त करने की सोच ही रहे थे कि मेरा एक मित्र किसी और का मोबाइल लेकर आ पहुँचा। हम लोग पढ़ाई की थकान को मिटाने के लिए उसके मोबाइल से गाना सुनने लगे।

🔴 गाना सुनते- सुनते मैंने वह मोबाइल अपने हाथ में ले लिया। थोड़ी देर बाद उस मित्र ने मोबाइल लेकर वापस जाने की बात कही। गाना रुचिकर लग रहा था, इसलिए मैंने उससे कुछ देर और रुकने का आग्रह किया। लेकिन वह मेरी बात नहीं मानकर मेरे हाथ से मोबाइल छीनने लगा।

🔵 छीना- झपटी कुछ ही देर में हाथापाई में बदल गई। उस हाथापाई में मेरा हाथ डोरमेटरी की दीवार से जोर से जा लगा। मेरे अँगूठे और कलाई के बीच के ज्वाइंट पर गहरी चोट लगी। उस समय तो आवेश में मुझे जरा भी महसूस नहीं हुआ, परन्तु झगड़ा समाप्त होने के बाद मेरे हाथ में दर्द शुरू हुआ। कुछ ही पलों में पीड़ा असहनीय हो गई। कराहते हुए मैंने यह बात अपने मित्र प्रणव को बतायी। उसने देखा कि मेरे हाथ में सूजन आ गई है।

🔴 जैसे ही उसने मेरा हाथ छुआ, मेरी चीख निकल गयी। पीड़ा की अधिकता से मुझ पर बेहोशी छाने लगी थी। उसने मुझे अपने हाथ से पानी पिलाया, फिर बिस्तर पर लिटाकर मेरे हाथ में एक क्रेप बैन्डेज बाँध दिया और कहा- सो जाओ।

🔵 रात का लगभग एक बज रहा था। उस वक्त कहीं, किसी डॉक्टर के पास भी नहीं जा सकते थे। प्रणव मेरी बिगड़ती हुई हालत को देखकर गुरुदेव से मेरे लिए प्रार्थना करने लगा। मैंने सोने की कोशिश की, लेकिन पीड़ा के कारण सो नहीं सका।

🔴 रात भर यही सोचता रहा कि अब क्या होगा, सुबह मैं इम्तहान कैसे दूँगा? जैसे- तैसे सुबह हुई, रात भर में ही मेरा हाथ फूलकर तुम्बा बन गया था। मुझे लग रहा था कि अब मैं परीक्षा नहीं दे पाऊँगा।

🔵 मैंने पूज्य गुरुदेव से मन ही मन कहा- गुरुदेव, जब आपने मुझे रात में बार- बार बेहोश होने से बचाया है, तो अब परीक्षा देने की भी शक्ति दे दीजिए। कुछ ही पलों में मेरा आत्मविश्वास वापस लौट आया। मैंने दृढ़ निश्चय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं परीक्षा अवश्य दूँगा।

🔴 परीक्षा भवन में जब प्रश्न पत्र बाँटे जा चुके, तो मैंने एक बार फिर पूज्य गुरुदेव को याद किया और दाँत भींचकर कलम को बैंडेज के अन्दर घुसा दिया। जब मैंने तीन उँगलियों से कलम को पकड़ा, तो दर्द से बिलबिला उठा, लिखने की कोशिश की तो जान निकलने लगी। दो- तीन कोशिशों के बाद मैं लिखने में कामयाब हो गया। लिखते- लिखते तीन घण्टे कैसे बीत गए, मुझे पता तक नहीं चला।

🔵 परीक्षा भवन से बाहर आने के बाद मेरा ध्यान हाथ की तरफ गया। मैंने महसूस किया कि तीन घण्टे तक तेजी से लिखने के बाद भी दर्द बढ़ने के बजाय कुछ हद तक घट ही गया है। बाकी के बचे दो पेपर्स की परीक्षाएँ भी गुरुदेव की अनुकम्पा से पूरी हो गईं।   

🔴 परीक्षा खत्म होने के बाद मैंने रामकृष्ण परमहंस हॉस्पिटल, कनखल में अपना हाथ डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने चेकअप करने के बाद एक्स- रे कराने की सलाह दी। एक्स- रे रिपोर्ट से पता चला कि हाथ में सीवियर फ्रेक्चर है, हड्डी डिस्प्लेस्ड हो गई है, जिसको ऑपरेशन के द्वारा ही ठीक किया जा सकता है।

🔵 ऑपरेशन का नाम सुनते ही मैं घबरा उठा। परीक्षा तो बीत ही गई थी। छुट्टियों की घोषणा हो गई थी। सभी बच्चे अपने- अपने घर जा रहे थे। मैं भी घर चला गया। वहाँ पहुँचने पर पिताजी ने मुझे एक बड़े हॉस्पिटल में दिखाया। वहाँ के डॉक्टर ने भी यही कहा कि ऑपरेशन जरूरी है।

🔴 २० दिसम्बर की दोपहर का ठीक १२ बजे का समय ऑपरेशन के लिए तय हुआ। १५ मिनट पहले मुझे हरे रंग का ड्रेसिंग गाऊन पहनाकर ऑपरेशन थियेटर ले जाया गया।

🔵 एक बार फिर मैंने आँखें बन्द कीं और पूज्य गुरुदेव पर अपने जीवन तथा इस ऑपरेशन का पूरा भार सौंप दिया। अगले ही पल मुझे लगा कि पूज्य गुरुदेव ऑपरेशन थियेटर में मेरे सिरहाने खड़े होकर मेरा सिर सहला रहे हैं।

🔴 ऑपरेशन को लेकर मेरा सारा डर पल भर में भाग गया। थोड़ी देर बाद डॉक्टर साहब आए, आते ही उन्होंने हाथ में एक- एक करके छः इंजेक्शन लगा दिए। फिर मेरे हाथ पर फोकस करके स्क्रीन पर उसकी अन्दरूनी हालत देखते रहे। मैं भी सामने रखे उस कंप्यूटर स्क्रीन पर हाथ की जगह- जगह से टूटी हड्डियों को मजे ले- लेकर देख रहा था। अब ऑपरेशन शुरू हुआ। सबसे पहले ड्रिल मशीन से हाथ की हड्डी में कई जगह गहरे छेद किए गए, फिर उनमें स्टील के रॉड डालकर मशीन से फिक्स किये गए। ड्रिल करते समय खून की धारा में हड्डियों के बुरादे तैरते हुए निकल रहे थे।

🔵 पीड़ा तो मर्मान्तक हुई, पर पास में गुरुदेव के मौजूद होने से मनोबल बना रहा। मैंने दाँत भींचकर आँसुओं में डूबी हुई आँखों से गुरुदेव की ओर देखा। वे मुझे ही देख रहे थे। उनसे आँखें मिलते ही मेरी सारी पीड़ा एक पल में समाप्त हो गई।

🔴 ऑपरेशन बड़े आराम से पूरा हुआ। आज मैं अपने इस हाथ से सारे काम अच्छी तरह से कर लेता हूँ। अब तो मुझे लगने लगा है कि बड़े हाथी का न सही, लेकिन हाथी के बच्चे का बल तो मेरे इस हाथ में आ ही गया है।                   
  
🌹 नितेश शर्मा, बहराइच  (उ.प्र.
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/exam.1

रविवार, 9 अप्रैल 2017

👉 आज का सद्चिंतन 10 April 2017



👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 April 2017


👉 आकाश में खड़ा था अदृश्य गोवर्धन?

🔴 घटना २४ दिसम्बर २०१० से २ जनवरी २०११ के बीच की है।  अहमदाबाद के सोला रोड पर पारस नगर के पास के ग्राउण्ड में गायत्री शक्तिपीठ शाहीबाग द्वारा एक विशाल पुस्तक मेले का आयोजन किया गया।

🔵 देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्रद्धेय डॉ. साहब ने मेले की भव्यता देख कर कहा कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा विशाल पुस्तक मेला दूसरा नहीं देखा।

🔴 इस मेले में परम पूज्य गुरुदेव की ३२०० पुस्तकों में से २८०० पुस्तकों की प्रदर्शनी लगी थी। इसके अतिरिक्त १३२ स्टॉलों पर सवा करोड़ रुपये मूल्य की पुस्तकें  विक्रय के लिए लगी थीं। इन स्टॉलों पर दस हजार व्यक्ति एक साथ खड़े होकर साहित्य खरीद सकते थे। पुस्तक मेला के मण्डप के विस्तार का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता था कि इसमें १५,००० व्यक्तियों के एक साथ बैठने की व्यवस्था भी की गई थी। साथ ही, विशिष्ट अतिथियों के लिए सभागार तथा वाचनालय भी बनाए गए थे। पूरा मण्डप बारीक चमकीले कपड़े से बना था, जिससे उसकी सुन्दरता अवर्णनीय हो गई थी।

🔵 प्रतिदिन सुबह नौ बजे से रात के दस बजे तक मेले में प्रतिनिधियों का ताँता लगा रहता था। एक स्टॉल पर दस कार्यकर्त्ता पुस्तक विक्रय के कार्य में संलग्न रहते थे। इस प्रकार व्यवस्था सम्बन्धी अन्य कार्यों में संलग्न व्यक्तियों को लेकर लगभग १,५०० कार्यकर्त्ता दो अलग- अलग पालियों में आते थे।

🔴 बात २८ दिसम्बर की रात की है। रोज की भाँति दूसरी पाली के १,५०० कार्यकर्त्ताओं ने रात के दस बजे अपना- अपना काम समेटा और भोजनोपरान्त घर को चले। दूर- दराज से आने वाले कार्यकर्त्ताओं के लिए वाहन की व्यवस्था की गई थी। फिर भी पंडाल की किताबों को व्यवस्थित करने के बाद घर पहुँचते- पहुँचते उन्हें रात के बारह बज जाया करते थे। उस रात भी दिन भर के थके- माँदे ये सभी कार्यकर्ता घर पहुँचते ही गहरी नींद में सो गए।

🔵 मेला आयोजकों में मैं भी शामिल था। इसलिए सभी कुछ व्यवस्थित कर अंतिम टोली के साथ मैं घर के लिए चला। दिनभर की थकावट के कारण बिस्तर पर जाते ही गहरी नींद में सो गया। अचानक रात के डेढ़ बजे मेरी नींद टूटी। बाहर जाकर देखा- आसमान में गहरे बादल छाए हुए थे। मौसम का मिजाज देख मुझे काठ मार गया। मैं जडवत खड़ा था। अचानक बारिश की कुछ बूदें मेरी हथेली पर आ गिरीं। घबराकर जैसे चेतना पूरी तरह सजग हो उठी। तेज बारिश हुई, तो झीने कपड़े की छत के नीचे रखी हुई सवा करोड़ मूल्य की अनूठी पुस्तकों का क्या होगा। मैं तेजी से घर के अन्दर आया और पुस्तक मेला के पास में रह रहे परिजन, ट्रस्टी श्री वी.पी. सिन्हा को फोन करके जगाया।   

🔴 वस्तुस्थिति जानकर सिन्हा जी काँप उठे। उन्होंने समर्पित युवा कार्यकर्त्ता श्री हेमराज त्रिवेदी को फोन मिलाया। सुबह से देर रात तक की भाग दौड़ से थक कर त्रिवेदी जी बेसुध सोए पड़े थे। बार- बार फोन मिलाने पर आखिरकार फोन की घंटी ने उन्हें जगा ही दिया। स्थिति की विकटता को समझते ही वे तेजी से हरकत में आए। आसपास के सौ से अधिक लोगों को फोन मिलाकर कहा कि वे सभी तुरंत पुस्तक मेला कम्पाउण्ड में पहुँचें।       

🔵 अब तक मूसलाधार वर्षा होने लगी थी। वर्षा में भागे- भागे आसपास के आठ- दस युवकों को लेकर अपने वाहन से मेला स्थल पर पहुँचे। गाड़ी रोक कर हम सभी तेजी से भाग कर पंडाल में आये और भोजनालय तथा इधर- उधर से प्लास्टिक सीट उठा कर पुस्तकों को ढकने लगे। वहाँ पर उपलब्ध प्लास्टिक की चादरों से किसी तरह आधी पुस्तकें ढकी जा सकीं। शेष आधी पुस्तकों के लिए क्या किया जाय- इस चिंता में जब हमने इधर- उधर नजर दौड़ाई, देखा कि जिस पंडाल के नीचे हम खड़े हैं उस पंडाल पर पानी की एक बूँद भी नहीं पड़ी है।

🔴 सामने की सड़क के उस पार मूसलाधार वर्षा हो रही है। मुख्य ट्रस्टी बहिन दीना को भी फोन करके वस्तुस्थिति की जानकारी दी गई थी। जब उन्हें इस प्राकृतिक प्रकोप से बचने का कोई उपाय नहीं सूझा, तब वह परम पूज्य गुरुदेव का ध्यान करके इन्द्रदेव के प्रकोप से रक्षा करने की प्रार्थना करने लगीं।

🔵 गुरुसत्ता ने उनकी प्रार्थना सुनी। उनके द्वारा अनमोल पुस्तकों के भंडार को बचाया गया, ठीक वैसे ही जैसे गोवर्द्धन की आड़ में गोकुल की रक्षा हुई थी। पंडाल के पीछे की ओर इंजीनियरिंग कॉलेज के पास के पूरे क्षेत्र में बादल गरज- गरज कर बरस रहा है। उधर पुस्तक मेला के नीचे पण्डाल के नीचे सारी देव प्रतिमाएँ पूरी तरह सुरक्षित हैं। एक- एक कर सौ से अधिक युवा कार्यकर्ता एकत्र हो चुके थे। पंडाल को पूरी तरह सुरक्षित देखकर भी उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। वे अंधों की तरह टटोल- टटोल कर काउन्टर पर सजी हुई किताबों को देख रहे थे।

🔴 सारी की सारी किताबें पूरी तरह से सूखी और सुरक्षित थीं। महाकाल के अवतार की इस अनिर्वचनीय अनुकम्पा से हम सभी अभिभूत थे। एक करोड़ से भी अधिक के निश्चित नुकसान से बच जाने की खुशी हमसे सम्हाले नहीं सम्हल रही थी। सभी की आँखों में खुशी के आँसू तैरने लगे थे।                   
  
🌹 एस. के. पाण्डेय, आरा (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/sky

👉 बंजर

🔴 चौधरी साहब की हवेली में आज बड़ी रौनक थी। ढोलक की थाप पूरे घर में गूँज रही थी। आज उनके घर उनकी छोटी बहू की मुहं दिखाई थी। सुनीता बहुत व्यस्त थी। सभी मेहमानों के आवभगत की ज़िम्मेदारी उसी पर थी। सभी सुनीता की तारीफ कर रहे थे। वाही थी जो अपनी छोटी चचेरी बहन प्रभा को अपनी देवरानी बना कर लाई थी। प्रभा के रूप और व्यवहार ने आते ही सब पर अपना जादू चला दिया था।

🔵 चाचा चाची के निधन के बाद प्रभा सुनीता के घर रह कर ही पली थी। सुनीता ने उस अनाथ लड़की को सदैव अपनी छोटी बहन सा स्नेह दिया था। यही कारण था कि उसे अपनी देवरानी बनाने की उसने पूरी कोशिश की थी। अपनी कोशिश में वह सफल भी हो गई।

🔴 दो वर्ष पूर्व सुनीता इस घर की बड़ी बहू बन कर आई थी। अपने सेवाभाव और हंसमुख स्वाभाव से वह सास ससुर पति देवर सबकी लाडली बन गई थी। पूरे घर पर उसका ही राज था। उसकी सलाह से ही सब कुछ होता था। कमी यदि थी तो बस यही कि अब तक वह माँ नहीं बन पाई थी। हालांकि उसके घरवालों ने कभी भी इस बात का ज़िक्र नहीं किया था किंतु आस पड़ोस में होने वाली कानाफूसी उसके कान में पड़ती रहती थी।

🔵 ब्याह के कुछ महीनों के बाद ही प्रभा के पांव भारी हो गए। पूरे घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई। सुनीता भी खुश थी। प्रभा को सुनीता के माँ ना बन पाने का दुःख था। उस अनाथ लड़की को स्नेह देने वाली सुनीता ही थी। अतः जब प्रभा ने अपने बेटे को जन्म दिया तो उसे सुनीता की गोद में ही सौंप दिया।

🔴 बच्चा सबको अपनी तरफ आकर्षित करता था। अतः उसका नाम मोहन रखा गया। मोहन सुनीता को ही अपनी माँ मानता था। उसी के हांथों से खाता और उसी की गोद में सोता था।

🔵 मोहन चार वर्ष का हो गया था। यूँ तो सब सही चल रहा था। किंतु धीरे धीरे सुनीता को यह महसूस होने लगा था कि घर में अब उसका वह स्थान नहीं रहा है जो पहले था। उस स्थान को अब प्रभा ने ले लिया है। इंसानी स्वभाव बड़ा विचित्र होता है। अपनी खुशियाँ बाँट कर हम गौरवान्वित होते हैं किंतु दूसरों को ख़ुद से अधिक प्रसन्न देख हमें ईर्ष्या होती है। सुनीता के साथ भी ऐसा ही हुआ। प्रभा की ख़ुशी से अब उसे ईर्ष्या होने लगी थी।

🔴 उसकी ईर्ष्या की परिणिति क्रोध में हो रही थी। जिसका केंद्र मोहन था। उसे लगता था कि प्रभा के बढ़ते रुतबे का कारण मोहन है। जहाँ पहले उसके ह्रदय में ममता का सागर हिलोरे मारता था वहीं अब केवल विष रह गया था। वह मोहन को रास्ते से हटाने की बात सोंचने लगी थी।

🔵 जल्दी ही उसे इसका मौका भी मिल गया। उसके ससुराल में किसी करीबी रिश्तेदार की शादी थी। सभी जाने को तैयार थे किंतु तभी मोहन को ज्वर हो गया। सुनीता ने सबसे कहा कि वो लोग चले जाएँ वह मोहन की देखभाल कर लेगी। प्रभा अपने बेटे को छोड़ कर जाना नहीं चाहती थी। किंतु सुनीता ने यह कह कर उसे मना लिया की वह उस पर यकीन रखे। प्रभा भारी मन से चली गई।

🔴 आधी रात को सुनीता आँगन में टहल रही थी। उसे किसी की प्रतीक्षा थी। कुछ देर बाद किसी ने धीरे से कुंडी खटखटाई। सुनीता ने द्वार खोल दिया। एक व्यक्ति ने अपनी पोटली से निकाल कर उसे एक टोकरी दी जिस पर ढक्कन लगा था। सुनीता ने उसे पैसे दिए और दरवाज़ा बंद कर लिया।

🔵 कमरे में मोहन सोया हुआ था। सुनीता ने टोकरी का ढक्कन खोल कर उसे फर्श पर रख दिया। एक काला ज़हरीला नाग निकल कर मोहन की तरफ बढ़ा। रात के सन्नाटे को चीरती हुई एक ह्रदय विदारक चीख ने आस पड़ोस को दहला दिया " हाय मेरे लाल को सांप ने डस लिया। " देखते ही देखते लोग घर में जमा हो गए। आँगन में बैठी सुनीता अपनी छाती पीट रही थी।

🔴 मोहन के जाने से पूरा घर हिल गया था। प्रभा स्वयं को कोसती थी कि क्यों वह अपने बीमार बच्चे को छोड़ कर चली गई।

🔵 जब सुनीता के दिल में छाए ईर्ष्या के बादल छंटे और क्रोध की ज्वाला शांत हुई तब उसे एहसास हुआ कि वह क्या कर बैठी है। उसने अपने ही हांथों खुद को बाँझ बना दिया। अब वह गुमसुम रहती थी। किसी से कुछ नहीं बोलती थी। उसके भीतर के सारे भाव सूख गए थे। वो बंजर हो गई थी।

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 3)

🌹 समय का सदुपयोग करें
🔴 ईश्वरचन्द्र विद्यासागर समय के बड़े पाबन्द थे। जब वे कॉलेज जाते तो रास्ते के दुकानदार अपनी घड़ियां उन्हें देखकर ठीक करते थे। वे जानते थे कि विद्यासागर कभी एक मिनट भी आगे पीछे नहीं चलते।

🔵 एक विद्वान ने अपने दरवाजे पर लिख रखा था। ‘‘कृपया बेकार मत बैठिये। यहां पधारने की कृपा की है तो मेरे काम में कुछ मदद भी कीजिये।’’ साधारण मनुष्य जिस समय को बेकार की बातों में खर्च करते रहते हैं, उसे विवेकशील लोग किसी उपयोगी कार्य में लगाते हैं। यही आदत हैं जो सामान्य श्रेणी के व्यक्तियों को भी सफलता के उच्च शिखर पर पहुंचा देती हैं। माजार्ट ने हर घड़ी उपयोगी कार्य में लगे रहना अपने जीवन का आदर्श बना लिया था। वह मृत्यु शैय्या पर पड़ा-पड़ा भी कुछ करता रहा। रेक्यूम नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ उसने मौत से लड़ते-लड़ते पूरा किया।

🔴 ब्रिटिश कॉमनवेल्थ और प्रोटेक्टरेट के मन्त्री का अत्यधिक व्यस्त उत्तरदायित्त्व वहन करते हुए मिल्टन ने ‘पैराडाइस लास्ट’ की रचना की। राजकाज से उसे बहुत कम समय मिल पाता था, तो भी जितने कुछ मिनट वह बचा पाता उसी में उस काव्य की रचना कर लेता। ईस्ट इंडिया हाउस की क्लर्की करते हुए जान स्टुआर्ट मिल ने अपने सर्वोत्तम ग्रन्थों की रचना की। गैलेलियो दवादारू बेचने का धंधा करता था तो भी उसने थोड़ा-थोड़ा समय बचाकर विज्ञान के महत्वपूर्ण आविष्कार कर डाले।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 32)

🌹 बड़े प्रयोजन के लिये प्रतिभावानों की आवश्यकता
🔵 इक्कीसवीं सदी में अपनी-अपनी भावना और योग्यता के अनुरूप हर किसी को कुछ न कुछ करना ही चाहिये। व्यस्तता और अभावग्रस्तता के कुहासे में कुछ करना-धरना सूझ न पड़ता हो तो फिर अपनी मन:स्थिति और परिस्थिति का उल्लेख करते हुए शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार से परामर्श कर लेना चाहिये।                      

🔴 विशेषत: इस शताब्दी में प्रखर प्रतिभाओं की बड़ी संख्या में आवश्यकता पड़ेगी। पिछली शताब्दी में प्रदूषण फैला, दुर्भाव बढ़ा और कुप्रचलन का विस्तार हुआ है। उसमें सामान्यजनों का कम और प्रतिभाशालियों द्वारा किये गये अनर्थ का दोष अधिक है। अब सुधार की वेला आई है तो कचरा बिखेरने वाले वर्ग को ही उसकी सफाई का प्रायश्चित करना चाहिये। तोड़ने वाले मजदूर सस्ते मिल जाते हैं, किन्तु कलात्मक निर्माण करने के लिये अधिक कुशल कारीगर चाहिये। नवनिर्माण में लगाई जाने वाली प्रतिभाओं की दूरदृष्टि, कुशलता और तत्परता अधिक ऊँचे स्तर की चाहिये।

🔵 उनका अंतराल भी समुज्ज्वल होना चाहिये और बाह्य दृष्टि से इतना अवकाश एवं साधन भी उनके पास होना चाहिये ताकि अनावश्यक विलंब न हो और नये युग की क्षतिपूर्ति कर नवनिर्माण वे विश्वकर्मा जैसी तत्परता के साथ कर सकें; जो एकांगी न सोचें वरन् बहुमुखी आवश्यकताओं के हर पक्ष को सँभालने में अपनी दक्षता का परिचय दे सकें। यही निर्माण आज का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है। सृजेता ही कार्य संपन्न कर दिखाता है। मूकदर्शक तो खड़े-खड़े साक्षी की तरह देखते रहते हैं। ऐसी भीड़ में असुविधा ही बढ़ती है। गंदगी और गड़बड़ी फैलाते रहना ही अनगढ़ लोगों का काम होता है।

🔴 सृजेता की सृजन-प्रेरणा किस गति से चल रही है और उज्ज्वल भविष्य की निकटता में अब कितना विलंब है, इसकी जाँच-पड़ताल एक ही उपाय से हो सकती है कि कितनों के अंत:करण में उस परीक्षा की घड़ी में असाधारण कौशल दिखाने की उमंगे उठ रही हैं तथा स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ अपनाना कितना अधिक सुदृढ़ होता चला जाता है? समय की सबसे बड़ी आवश्यकता-नवसृजन-के लिये सोच तो कोई कुछ भी सकता है, पर क्रियारूप में कुछ कर पड़ना उन्हीं के लिये संभव हो सकता है, जो निजी महत्त्वाकांक्षाओं में कटौती करके अधिक से अधिक समय, श्रम, मनोयोग एवं साधनों को नियोजित कर सकें। भवन खड़ा करने के लिये ईंट, चूना, सीमेंट, लकड़ी, लोहा आदि अनिवार्य रूप से चाहिये। युगसृजन भी ऐसे ही अनेक साधनों की अपेक्षा करता है। उन्हें जुटाने के लिये पहला अनुदान अपने से ही प्रस्तुत करने वालों को ही यह आशा करनी चाहिये कि अन्य लोग भी उसका अनुकरण करेंगे; ऐसा समर्थन-सहयोग देने में उत्साह का प्रदर्शन करेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

👉 आज का सद्चिंतन 9 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 April 2017


👉 तुम मेरा काम करो हम तुम्हारा काम करेंगे

🔴 मेरी पत्नी को प्रायः पेट में दर्द बना रहता था। उस समय मैं बिहार में सरकारी नौकरी कर रहा था। घटना सन् १९९० की है। एक दिन अचानक पत्नी के पेट में दर्द उठा, दर्द इतना असहनीय था कि घर के सभी लोग परेशान हो उठे। मैं उस समय ऑफिस में था। मेरा नाती घबराया हुआ मेरे पास आया और मुझसे बताया कि नानी की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई है। आप जल्दी चलिए। मैं तुरन्त भागकर घर पहुँचा। पत्नी को लाकर अस्पताल में भर्ती करवा दिया। अस्पताल में दवा इलाज बराबर चलता रहा, लेकिन कोई राहत नहीं मिल रही थी। तीन दिन के बाद मैंने डॉक्टर से पत्नी को डिस्चार्ज करने की पेशकश की।

🔵 चूँकि सन् १९९० के श्रद्धांजलि समारोह में मुझे हरिद्वार जाना था। रिजर्वेशन पहले से ही करवा रखा था। इस वजह से मैं बहुत परेशान था कि पत्नी का इलाज कराऊँ या हरिद्वार जाऊँ। पशोपेश की स्थिति में दिन बीतते रहे और अन्ततः वह दिन भी आ पहुँचा, जिस दिन मेरी ट्रेन जालियाँवाला बाग से हरिद्वार के लिए थी। मैं बहुत सोच में पड़ गया था कि क्या करूँ। तभी याद आया, गुरुदेव माता जी के आश्वासन तुम्हारे घर- परिवार के कुशलक्षेम का हम ध्यान रखेंगे, तुम मेरा काम करो, हम तुम्हारा काम करेंगे। मैं जिनकी शरण में हूँ वे सर्वसमर्थ हैं इस बात का संज्ञान था फिर भी असमंजस की स्थिति ऐसी थी कि कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा था।

🔴 अन्ततः निर्णय भवितव्य पर छोड़कर मैं वंदनीया माता जी का ध्यान करने बैठ गया। द्रौपदी, ग्राह- गजराज, ध्रुव- प्रह्लाद, सुदामा जैसे अनेकों उदाहरण चलचित्र की भाँति मस्तिष्क में उभरते रहे। ध्यान से उठा, तो हमारी बुद्धि निश्चयात्मक हो चुकी थी। मैंने अपनी पत्नी से बड़े विश्वास भरे शब्दों में कहा कि अब तुम्हारा सब रोग सामान्य हो जायेगा। मैं माताजी से तुम्हारे लिये प्रार्थना करूँगा। उन्होंने सहर्ष स्वीकृति प्रदान की। मैंने तुरन्त सामान उठाया तथा स्टेशन की ओर चल दिया।

🔵 दूसरे दिन हरिद्वार पहुँचकर जब माताजी से मिला तो पत्नी के बारे में सारी बातें बताई। माताजी ने पत्नी का नाम तथा रोग के बारे में लिखकर देने को कहा और बोलीं सब ठीक हो जाएगा। इसके बाद मैं श्रद्धांजलि समारोह के कार्यक्रमों में इस तरह तन- मन से रम गया कि घर परिवार का फिर ध्यान ही नहीं आया। कार्यक्रम समाप्त हुआ तो मैं घर वापस आने पर पत्नी से दर्द के बारे में पूछा तो वह बोली कि आपके जाने के बाद से न जाने दर्द कहाँ चला गया। आज लगभग २१ वर्ष बीत गए लेकिन अब तक वह बिल्कुल ठीक है, दर्द की कोई शिकायत नहीं है। इस घटना से मैं इस तरह प्रभावित हुआ कि मिशन के प्रति समर्पित हो गया तथा पूज्यवर की अपेक्षाओं के अनुरूप आत्म निर्माण और लोक कल्याण के कार्यों में निरंतर लगा रहता हूँ। आज भी इसी सेवा में समर्पित हूँ।                   
  
🌹 बालेश्वर प्रसाद, पूर्वी सिंहभूम (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/tum

👉 ज्योतिष पुरुषार्थ का प्रबल शत्रु

🔵 नेपोलियन बोनापार्ट की प्रेमिका जेसोफाइन ने एक बार उसे एक पत्र लिखा-मैं देखती हूँ, जो फ्रांस एक दिन पुरुषार्थ के ढाँचे में पूरी तरह ढल चुका था, जिसे आपने पराक्रम का पाठ पढा़या था, आज उसी फ्रांस की नसें आपके देववाद के आश्रय के कारण शिथिल पडती जा रही है। मनुष्य अपनी भुजाओं, अपने शस्त्र पर भरोसा न करे और यह सोचे कि घडी, शकुन, देवता उसकी सहायता कर जायेंगे। मैं समझती इससे बड़कर मानवीय शक्ति का और कोई दूसरा अपमान नहीं ही सकता।

🔴 ऐसा पत्र लिखने का खास कारण था। एक समय था, जब नेपोलियन ज्योतिष पर बिल्कुल भी विश्वास नही करता था। उसके सेनापति चाहते थे कि नेपोलियन ज्योतिषियों से पूछकर कोई कदम बढा़या करे, किंतु नेपोलियन ने उनको डाँटकर कहा-ईश्वर यदि सहायक हो सकता है तो वह पराक्रमी और पुरुषार्थियों के लिए है। भाग्यवाद का आश्रय लेने वालों को पिसने और असफलता का मुँह देखने के अतिरिक्त हाथ कुछ नहीं लगता।

🔵 जब तक नेपोलियन अपने सिद्धांत पर दृढ़ रहा, तब तक वह अकेला ही दुश्मनों के छक्के छुड़ाता रहा, पर दुर्भाग्य, एक दिन वह स्वयं भी देववाद पर विश्वास करने लगा। वह पत्र उसी संदर्भ में लिखा गया था। नेपोलियन की यही ढील अंतत उसके पराजय का कारण बनी।

🔴 भारतीय तत्वदर्शन की अनेक शाखाओं में ज्योतिष का भी विधान है, पर वह विशुद्ध गणित के रूप है और उसका विकास होना चाहिए, किंतु उसके फलितार्थ सामूहिक रूप से सारी पृथ्वी और मानव जाति के जीवन को प्रभावित करते हैं। व्यक्तिगत जीवन में स्थान-स्थान पर ज्योतिष और भाग्यवाद के पुँछल्ले असफलता और पतन के ही कारण हो सकते है। नेपोलियन बोनापार्ट की तरह हमारे देश भारतवर्ष के साथ भी ऐसा ही हुआ। फलित के चक्कर में पड़कर सारे देश के पराक्रम की नसे ढीली पड गई और हमें सर्वत्र पराजय का मुँह देखना पडा। सोमनाथ का मंदिर लुटा तब ज्योतिषियों के अनुसार मुहूर्त नहीं था। यदि सैनिक उस पाखंड को न मानते तो भारत देश की यह दुर्गति न होती। आज भी ज्योतिष के चक्कर में पड़कर हमारी सफलता के सोमनाथ लुटते रहते है और हम अपनी उन्नति के लिये भाग्य का मुख ताकते खडे रहते हैं।

🔵 आज हमारे देश को अब्राहम लिंकन जैसे औंधे भाग्य को अपने पुरुषार्थ और पराक्रम से सीधा करने वाले होनहारों की आवश्यकता है। उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका में गृह-युद्ध शुरू हो गया था। लगता था दोनों राज्य अलग-अलग होकर ही रहेंगे। तभी अब्राहम लिंकन ने अपना एक ऐतिहासिक निर्णय दिया कि दोनों प्रदेशों की एकता सैनिक शक्ति के द्वारा अक्षुण्ण रखी जायेगी। उसने युद्ध की सारी तैयारी कर भी ली।

🔴 उसी समय उनका एक मित्र आया। उसने कहा-महोदय! अपने निर्णय पर अमल करने से पूर्व आप ज्योतिषियों से भी राय ले लें, मैं तीन ज्योतिषियों को लेकर आया हूँ। वे पास के कमरे मैं ही आपकी प्रतीक्षा कर रहे है।

🔵 लिंकन ने सोचा ज्योतिषी कभी एक राय के नही होते इसी से सिद्ध है कि वे अंतिम सत्य नही। लिंकन ने अपने सैनिक बुलाए और कहा-इस बगल के कमरे में राष्ट्र के तीन शत्रु बैठे हैं, दरवाजा बंद कर ताला लगा दो जब तक हम विजयी होकर नहीं लौटते ताला न खोला जाए। ज्योतिषवाद के भ्रम में पड़कर लिंकन अपने पराक्रम ओर पुरुषार्थ के पथ से विचलित हो जाते तो अमेरिका एकता के युद्ध का और ही दृश्य होता। हमारे जीवन में जो पग-पग पर असफलताएँ दिखाई दे रही हैं, वह हमारे भाग्यवाद के कारण ही है, यदि हम हीन भाव को भगा दें तो जीवन संग्राम में हम भी लिंकन के समान ही सर्वत्र सफलता अर्जित कर सकते है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 127, 128

👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 April

🔴 भगवान् के द्वार निजी प्रयोजनों के लिए अनेकों खटखटाते पाये जाते हैं, पर अबकी बार भगवान् ने अपना प्रयोजन पूरा करने के लिए साथी-सहयोगियों को पुकारा है। जो इसके लिए साहस जुटायेंगे वे लोक-परलोक की, सिद्धियों, विभूतियों से अलंकृत होकर रहेंगे। शान्तिकुंज के संचालकों से यही सम्पन्न किया और अपने को अति सामान्य होते हुए भी अत्यन्त महान् कहलाने का श्रेय पाया है। जाग्रत् आत्माओं से भी इन दिनों ऐसा अनुकरण करने की अपेक्षा की जा रही है।

🔵 कोरी वाणी ने कब किसका कल्याण किया है? संवेदनशील की एक ही पहचान है कि वह जो भी कहता है—आचरण से। यदि ऐसा नहीं है तो समझना चाहिए कि बुद्धि ने पुष्पित वाणी का नया जामा पहन लिया है, जो हमेशा से अप्रमाणित रहा है और रहेगा। वैभव की दीवारों और शान-शौकत की पहरेदारी में गरीबों की बिलखती आवाजें नहीं घुसा करती हैं।

🔴 भक्त वही है, जिसके लिए जन-जन का दर्द उसका अपना दर्द हो। अन्यथा वह विभक्त है—भगवान् से सर्वथा अलग-थलग। बड़े वे हैं, जिनका मन सर्वसामान्य की समस्याओं से व्याकुल रहता है। जिनकी बुद्धि इन समस्याओं के नित नये प्रभावकारी समाधान खोजती है। जिनके शरीर ने ‘अहर्निश सेवामहे’ का व्रत ले लिया है। झूठे बड़प्पन और सच्ची महानता में से एक ही चुना जा सकता है—दोनों एक साथ नहीं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 2)

🌹 समय का सदुपयोग करें

🔴 हर बुद्धिमान् व्यक्ति ने बुद्धिमत्ता का सबसे बड़ा परिचय यही दिया है कि उसने जीवन के क्षणों को व्यर्थ बर्बाद नहीं होने दिया। अपनी समझ के अनुसार जो अच्छे से अच्छा उपयोग हो सकता था, उसी में उसने समय को लगाया। उसका यही कार्यक्रम अन्ततः उसे इस स्थिति तक पहुंचा सका, जिस पर उसकी आत्मा सन्तोष का अनुभव करे।

🔵 प्रतिदिन एक घण्टा समय यदि मनुष्य नित्य लगाया करे तो उतने छोटे समय से भी वह कुछ ही दिनों में बड़े महत्वपूर्ण कार्य पूरे कर सकता है। एक घण्टे में चालीस पृष्ठ पढ़ने से महीने में बारह सौ पृष्ठ और साल में करीब पन्द्रह हजार पृष्ठ पढ़े जा सकते हैं यह क्रम दस वर्ष जारी रहे तो डेढ़ लाख पृष्ठ पढ़े जा सकते हैं। इतने पृष्ठों में कई सौ ग्रन्थ हो सकते हैं। यदि वे एक ही किसी विषय के हों तो वह व्यक्ति उस विषय का विशेषज्ञ बन सकता है। एक घण्टा प्रतिदिन कोई व्यक्ति विदेशी भाषायें सीखने में लगावें तो वह मनुष्य निःसन्देह तीस वर्ष में इस संसार की सब भाषाओं का ज्ञाता बन सकता है। एक घण्टा प्रतिदिन व्यायाम में कोई व्यक्ति लगाया करे तो अपनी आयु को पन्द्रह वर्ष बढ़ा सकता है।

🔴 संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के प्रख्यात गणित के आचार्य चार्ल्स फास्ट ने प्रति दिन एक घन्टा गणित सीखने का नियम बनाया था और उस नियम पर अन्त तक डटे रह कर ही इतनी प्रवीणता प्राप्त की।

🔵 संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के प्रख्यात गणित के आचार्य चार्ल्स फास्ट ने प्रति दिन एक घन्टा गणित सीखने का नियम बनाया था और उस नियम पर अन्त तक डटे रह कर ही इतनी प्रवीणता प्राप्त की।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 31)

🌹 युग परिवर्तन प्रतिभा ही करेगी
🔵 पृथ्वी का उत्तर ध्रुव निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त पदार्थ-संपदा में से अपने लिये आवश्यक तत्त्व खींचता रहता है। वही धरती की विविध आवश्यकताएँ पूरी करता है। जो निरर्थक अंश बचा रहता है, वह पदार्थ ध्रुव-मार्ग से कचरे की तरह बाहर फेंक दिया जाता है। यही क्रम मनुष्य-शरीर का है। वह अपनी रुचि और प्रकृति के अनुरूप चेतन तत्त्व आकाश में से खींचता और छोड़ता रहता है। उसी पूँजी से अपना काम चलाता है। क्या ग्रहण करना और क्या बहिष्कृत करना है, यह मनुष्य के मानसिक चुंबकत्व पर निर्भर है। यदि अपना मानस उच्चस्तरीय बन चुका है तो उसका आकर्षण विश्वब्रह्माण्ड से अपने स्तर के सहकारी तत्त्व खींचता और भण्डार करता रहेगा, पर पूँजी अपने मनोबल के अनुरूप ही जमा होती रहती है।                     

🔴 वैसे मनुष्य को जन्मजात रूप से विभूतियों का वैभव प्रचुर मात्रा में मिला है, पर वह प्रसुप्ति की तिजोरी में बंद रहता है; ताकि आवश्यकता अनुभव होने पर ही उसे प्रयत्नपूर्वक उभारा और काम में लाया जा सके। सभी जानते हैं कि भूगर्भ में विभिन्न स्तर के रासायनिक द्रव्य भरे पड़े हैं। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि आकाश से निरंतर धरती पर प्राणतत्त्व की वर्षा होती रहती है। वनस्पतियों और प्राणियों का गुजारा इन्हीं उभयपक्षीय अनुदानों के सहारे चलता है। मानवीय व्यक्तित्व के संबंध में भी यही बात है। वह इच्छित प्रगति के लिये अपने वर्चस्व का कितना ही महत्त्वपूर्ण अंश उभार सकता है और अपने बलबूते वांछित दिशा में अग्रगमन कर सकता है। उर्वरता भूमि में होती है, पर उसके प्रकट होने के लिये ऊपर से जल बरसना भी आवश्यक है अन्यथा उर्वरता हरीतिमा का रूप धारण न कर सकेगी।

🔵 मनुष्य को अपने में सन्निहित विशेषताओं को भी ऊर्ध्वगामी बनाना चाहिये और साथ ही अदृश्य जगत् के विपुल वैभव का अंश भी अपनी आकर्षण-शक्ति से खींचकर अधिकाधिक सुसम्पन्न बनना चाहिये। अपने गुण, कर्म, स्वभाव को प्रखर-परिष्कृत बनाना और ईश्वर-सान्निध्य स्थापित करके व्यापक शक्ति के लिये कुछ उपयुक्त से खींच बुलाना, ये दोनों ही क्रियायें अपने ढंग से नियमित रूप से चलती रहें तो समझना चाहिये कि प्रगति का सुव्यवस्थित सरंजाम जुटने की समुचित व्यवस्था बन गई। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए चिंतन, चरित्र और स्वभाव को गुण, कर्म और भाव-संवेदना को दिनों-दिन अधिक उत्कृष्ट बनाते चलने की आवश्यकता को ध्यान रखने पर जोर दिया गया है; साथ ही आवश्यक यह भी है कि इस विराट् विश्व की कामधेनु की अनुकूलता प्राप्त करके अमृत भरे पयपान का लाभ उठाते रहा जाए।

🔴 प्राण अपना है, प्रतिभा भी अपनी है, पर वह अनगढ़ स्थिति में झाड़-झंखाड़ों से भरी रहती है। उसे सुरम्य उद्यान में बदलने के लिये कुशल माली जैसे अनुभव और सतर्कता भरा प्रयत्न चाहिये। जो उसे कर पाते हैं, वे ही देखते हैं कि ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’ का प्रतिपादन सोलहों आना सच है। उसमें किसी प्रकार की अत्युक्ति नहीं है। घाटे में वे रहते हैं, जो अपनी उपेक्षा आप करते हैं। जो अपनी अवमानना अवहेलना करेगा, वह दूसरों से भी तिरस्कृत होगा और स्वयं भी घाटे में रहेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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