गुरुवार, 23 मार्च 2017
👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (अंतिम भाग)
🌹 आगे बढ़ें और लक्ष्य तक पहुँचें
🔴 इस सन्दर्भ में सबसे बड़ा सुयोग इन दिनों है, जबकि नव-सृजन के लिए प्रचण्ड वातावरण बन रहा है; उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में नियन्ता का सारा ध्यान और प्रयास नियोजित है। ऐसे में हम भी उसके सहभागी बनकर अन्य सत्परिणामों के साथ ही प्रतिभा-परिष्कार का लाभ हाथों-हाथ नकद धर्म की तरह प्राप्त होता हुआ सुनिश्चित रूप से अनुभव करेंगे।
🔵 सृजन-शिल्पियों के समुदाय को अग्रगामी बनाने में लगी हुई केन्द्रीय शक्ति अपने और दूसरों के अनेकानेक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह विश्वास दिलाती है, कि यह पारस से सटने का समय है, कल्पवृक्ष की छाया में बैठ सकने का अवसर है। प्रभात पर्व में जागरूकता का परिचय देकर हममें से हर किसी को प्रसन्नता, प्रफुल्लता और सफलता की उपलब्धियों का भरपूर लाभ मिल सकता है, साथ ही परिष्कृत-प्रतिभायुक्त व्यक्तित्व सँजोने का भी।
🔴 प्रस्तुत पुस्तक को ज्यादा से ज्यादा प्रचार-प्रसार कर अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने एवं पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने का अनुरोध है।
🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 जहर की पुड़िया रखी रह गई
🔴 मेरे दादा जी की गिनती इलाके के खानदानी अमीरों में होती थी। वे सोने-चाँदी की एक बड़ी दुकान के मालिक थे। एक बार किसी लेन-देन को लेकर दादाजी और पिताजी में ऐसा विवाद हुआ कि हमारे पिताजी हम चार भाई बहनों को छोड़कर घर से निकल गए। उनका आज सन् २०११ तक कुछ पता नहीं है। पिताजी के चले जाने के बाद माँ की घर में बहुत उपेक्षा होने लगी। एक समय स्थिति ऐसी आई कि हमारे नाना जी हम बच्चों के साथ माँ को विदिशा लेकर चले गए। उनका अपना भी परिवार था, अतः हम सबके भरण-पोषण में काफी दिक्कत होने लगी। अन्त में माँ को हम बच्चों की परवरिश के लिए दूसरों के घर बर्तन धोना व झाडू-पोछा का काम करना पड़ा।
🔵 सन् १९८९ई. में हमारी बुआ रामकली सोनी कलेक्ट्रेट में काम करती थीं। उनके माध्यम से गायत्री परिजन श्री रमेश अभिलाषी व रागिनी आन्टी के घर झाडू़-पोछा का काम माँ को मिला। रागिनी आन्टी देवकन्या के रूप में शान्तिकुंज में रह चुकी थीं। उनसे प्रभावित होकर हम लोग भी गायत्री मन्दिर के यज्ञों में भाग लेने लगे। तब मैं पाँचवीं कक्षा में था। मैं यज्ञ में स्वाहा शब्द का जोर से उच्चारण करता। भाई श्री रमेश जी उस उच्चारण से मेरी ओर आकर्षित हुए। उन्होंने मुझे रोज मंदिर आने की प्रेरणा दी। मैंने नियमित रूप से मंदिर जाना शुरू कर दिया। बाद में तो मैं मंदिर में ही रहने लगा। वहाँ का जो काम मुझे बताया जाता, उसे मन लगाकर पूरा करता।
🔴 समय बीतता गया। मैं पढ़ाई और मंदिर में काम के साथ पेपर बाँटने का काम करने लगा। कुछ और बड़ा होकर मजदूरी की, बाइंडिंग का काम किया, किराना दुकान, कपड़े की दुकान में काम किया और अपने घर की जिम्मेदारी यथासाध्य पूरी करने की कोशिश करता रहा।
🔵 बहनें बड़ी हुईं। सबसे बड़ी बहन की शादी राजस्थान के श्री मुरली मनोहर सोनी जी के साथ तय हुई। सगाई सम्पन्न हुई। सुसंस्कृत परिवार था इसलिए उन्होंने कुछ माँगा नहीं, पर शादी तो शादी होती है। कई तरह के छोटे-बड़े खर्च करने ही होते हैं। मेहनत मजदूरी करके घर के खर्चे ही बड़ी मुश्किल से पूरे हो पाते थे। बहन की शादी के लिए कभी कुछ जोड़ ही नहीं सका। अब कैसे क्या व्यवस्था होगी, इन्हीं चिन्ताओं को लेकर शादी के कार्ड छपवाये।
🔴 सभी रिश्तेदार चाचा, ताऊ, फूफा पिताजी के घनिष्ठ मित्रों के यहाँ कार्ड दिया और सहायता माँगी। सभी ने आश्वासन दिए। उनके भरोसे मैं आगे बढ़ता रहा। दिन बीतते गए, पर कहीं से कोई सहायता नहीं मिली। नाना जी हमेशा से ही हमारे दुःख-सुःख के साथी थे। उन्होंने आंशिक सहयोग किया, किन्तु वह शादी हेतु अपर्याप्त था।
🔵 जब शादी के एक दिन पहले एक-एक करके सभी ने सहायता हेतु हाथ खड़े कर दिए तो मेरे हाथ पैर ठण्डे होने लगे। समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या होगा। अगले दिन बारात आने वाली थी और अभी तक उनके ठहरने, खाने का कोई इन्तजाम नहीं हो सका। यहाँ तक कि बहिन के लिए एक जोड़ी साड़ी तक नहीं खरीदी जा सकी। ऐसे में तो निश्चित ही दरवाजे से बारात वापस लौट जाएगी। यही सब सोचते हुए मैं पूज्य गुरुदेव के चित्र के सामने बैठकर खूब रोया।
🔴 मैं लड़का ही था अप्रैल सन् २००० में। एक कागज पर लिखा-मैं मेरी माँ व बहन तीनों आत्महत्या कर रहे हंै। हमने उसे गुरुदेव की पूजा चौकी पर पीछे की ओर रख दिया और बाजार से जहर ले आया। तय कर चुका था कि रात को सबके खाने में मिला दूँगा। रात के आठ बजे मैंने माँ से कहा- भूख लग रही है माँ! खाना निकालो। आज हम सब साथ बैठकर खाएँगे।
🔵 माँ खाना निकालने ही जा रही थी कि एक ही साथ पूरा गायत्री परिवार घर पर आ गया। मैंने सबको बाहर बिछी हुई दरी पर बिठाया। रमेश भाई साहब ने मुझसे पूछा-पैसे की क्या व्यवस्था है? मैं उदास-उदास आँखों से उनकी ओर देखता रहा। मुझसे कुछ भी बोलते नहीं बन रहा था। मेरी हालत देखकर वे बोले- इस तरह टकककी लगाकर क्या देख रहा है, कुछ बोलता क्यों नहीं?
🔴 उनका इतना कहना था कि मैं उनसे चिपक कर जोर-जोर से रोने लगा। उन्होंने बड़ी मुश्किल से मुझे चुप कराते हुए कहा-हमें यहाँ गुरुजी ने भेजा है। हम सबके मन में अचानक ऐसी प्रेरणा हुई कि लड़का परेशान है तुरंत जाकर देखो। सही-सही बताओ, सारा इन्तजाम करने में बताओ तुम्हें कितना पैसा चाहिए?
🔵 मैंने अटकते हुए कहा-मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। रिश्तेदारों के भरोसे शादी तय कर दी लेकिन कल सभी ने हाथ खड़े कर दिए। बाजार से जहर लेकर आया था कि खाकर चैन से सो जाऊँगा।
🔴 इतना सुनते ही वे आग-बबूला हो उठे। देर तक मुझे लताड़ते रहे। फिर शान्त होकर कहा-फिर कभी भूलकर भी ऐसा नहीं सोचना, हम सब हंै किस दिन के लिए। ज्योति केवल तुम्हारी बहन ही नहीं, हमारी बेटी भी है। कितने लाख रुपये चाहिए अभी बोलो? मैंने कहा-सिर्फ इतना ही, जिससे बारात का स्वागत-सत्कार हो जाए और मैं अपनी बहिन को सम्मानजनक ढंग से विदा कर सकूँ।
🔵 उसी पल सभी परिजनों ने कुर्ते की जेब में हाथ डालकर रुपये निकालने शुरू किए और कुछ ही क्षणों में मेरे सामने नोटों का ढेर लग गया। जान-पहचान की दुकान खुलवाई गई और रातों-रात सारा इन्तजाम हो गया। ज्योति की विदाई शानदार ढंग से हुई।
🔴 मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि गुरुदेव अपने शिष्यों का कष्ट इस प्रकार भाँप लेते हैं और तत्काल निवारण के उपाय भी कर देते हंै।
🌹 मनोज सोनी राँची (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
👉 साहस के रास्ते हजार
🔴 भाई परमानंद क्रांतिकारियों में अप्रतिम साहस के लिए प्रसिद्ध थे। कैसी भी संकटपूर्ण घडी में भी उन्होंने भयभीत होना नहीं सीखा था। इसलिए कई बार वह ऐसे काम भी कर लाते थे जो और कोई भी बुद्धिमान् क्रांतिकारी नही कर पाता था।
🔵 साहस को इसी से तो मनुष्य जीवन की सबसे बडी योग्यता कहा गया है। हिम्मत न हो तो बडी से बडी योजनाएँ धरी की धरी ही रह जाती है। पर साहसी व्यक्ति रेत में भी फूल उगा लेते है।
🔴 बम बनाने की योजना बन गई। विस्फोटक आदि सब सामान तो जुटा लिया गया, पर बमों के लिए लोहे के खोल (शेल) कहाँ से आयें, यह एक समस्या थी। ऐसी घडी में भाई परमानंद को याद किया गया।
🔵 बडी देर तक विचार करने के बाद उन्होंने एक योजना बना ही डाली। काम था तो जोखिम का पर "हिम्मते मरदॉं मददे खुदा" वाली कहावत सामने थी, भाई परमानंद ने अमरसिंह को साथ लिया और वहाँ से चल पडे।
🔴 उन्होने अमरसिंह को सारी योजना समझाई। अमरसिंह को एकाएक तो विश्वास नहीं हुआ कि एक अंग्रेज को चकमा देकर बमों के खोल कैसे बनवाए जा सकते हैं, पर वह परमानन्द की हिम्मत को जानते थे, इसलिए साथ-साथ जीने-मरने के लिए तैयार हो गए। अगले ही क्षण वे एक लोहा फैक्ट्री के सामने खडे हुए थे।
🔵 सब कुछ स्वाभाविक तरीके से ही हो सकता था। बातचीत से लेकर हाव-भाव तक नकली बात तभी चल सकती थी, जब वह पूरी हिम्मत के साथ बयान की गई हो। थोडा भी सकपका जाने या अस्वाभाविक प्रतीत होने पर तुरंत गिरफ्तार होने का भय था, सो तो था ही एक बडी भारी योजना के विफल हो जाने का अपयश भी था।
🔴 परमानद भाई नकली माली और अमरसिंह मजदूर बनकर, गये थे। अंग्रेज मैनेजर से बोले-साहब सर सुंदरसिंह मजीठिया के बगीचे को सजाने के लिए लोहे के खंभे लगाए गए हैं। आपने देखा ही होगा, हमारे साहब की इच्छा है कि उनके ऊपर लोहे के गुंबज लगाए जाएँ ताकि शोभा और बढे ?
🔵 सर सुंदरसिंह मजीठिया हिंदुस्तानी पर अंग्रेजी ''सर '' की उपाधि प्राप्त-साहब बहादुर भला इनकार कैसे करते ? बोले कितने खोल चाहिए, हिसाब लगाने में जरा भी कम अकली से अंग्रेज मैनेजर को संदेह हो सकता था। साहस की यही तो पहचान है कि हृदय और मुख में जरा शिकन न आए भय पास न फटके।
🔴 यही दो हजार आवश्यक होंगे, नकली माली बने परमानंद ने कहा- अफसर थोड़ा चौंका तो पर परमानंद के साहस ने सब कुछ ढॉप लिया। आर्डर तय हो गया। १ सप्ताह में खोल बन जाने की साई तय हो गई।
🔵 ठीक एक सप्ताह बाद उसी तरह बमों के खोल ले आए और मैनेजर को कुछ भी भान न हुआ। वह तो कभी पता न चलता यदि कुछ क्रांतिकारी बंदी न बना लिए जाते और उनके साथ की बात का भंडा-फोड़ न हो जाता।
🔴 मुकदमा चला। कचहरी में अग्रेज मैनेजर भी उपस्थित हुआ। उसने अपनी भूल तो स्वीकार कर ली, पर यह कहे बिना वह भी न रहा-परमानंद सचमुच गजब का साहसी है, मुझे भी धोखा दे गया।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 95, 96
👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 44)
🌹 सर्वश्रेष्ठ साधना
🔴 वास्तविक सुख शान्ति पाने के लिए विचारों की साधना करनी होगी। सामान्य लोगों की अपेक्षा दार्शनिक, विचारक, विद्वान्, सन्त और कलाकार लोग अधिक निर्धन और अभावग्रस्त होते हैं तथापि उनकी अपेक्षा कहीं अधिक सन्तुष्ट, सुखी और शान्त देखे जाते हैं। इसका एक मात्र कारण यही है कि सामान्य जन सुख-शान्ति के लिए अधिकारी होते थे। सुख-शान्ति के अन्य निषेध उपायों का न करते हुए भारतीय ऋषि-मुनि अपने समाज को धर्म का अवलम्बन लेने के लिए विशेष निर्देशन किया करते थे। जनता की इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उन्होंने जिन वेदों, पुराणों, शास्त्रों उपनिषदों आदिक धर्म-ग्रन्थों का प्रणयन किया है, उनमें मन्त्रों, तर्कों, सूत्रों व सूक्तियों द्वारा विचार साधना का ही पथ प्रशस्त किया है।
🔵 मन्त्रों का निरन्तर जाप करने से साधक के पुराने कुसंस्कार नष्ट होते और उनका स्थान नये कल्याणकारी संस्कार लेने लगते हैं। संस्कारों के आधार पर अन्तःकरण का निर्माण होता है। अन्तःकरण के उच्च स्थिति में आते ही सुख-शान्ति के सारे कोष खुल जाते हैं। जीवन में जिनका प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है। मन्त्र वास्तव में अन्तःकरण को उच्च स्थिति में लाने के गुप्त मनोवैज्ञानिक प्रयोग हैं। जैसा कि पूर्व प्रकरण में कहा जा चुका है कि न तो सुख शान्ति का निवास किसी वस्तु अथवा व्यक्ति में है और न स्वयं ही उनकी कोई स्थिति है। वह वास्तव में मनुष्य के अपने विचारों की ही एक स्थिति है। सुख-दुःख, उन्नति-अवनति का आधार मनुष्य की शुभ अथवा अशुभ मनःस्थिति ही है। जिसकी रचना तदनुरूप विचार साधना से ही होती है।
🔴 शुभ और दृढ़ विचार मन में धारण करने से, उनका चिंतन और मनन करते रहने से मनोदशा में सात्विक भाव की वृद्धि होती है। मनुष्य का आचरण उदात्त तथा उन्नत होता है। मानसिक शक्ति का विकास होता है, गुणों की प्राप्ति होती है। जिसका मन दृढ़ और बलिष्ठ है, जिसमें गुणों का भण्डार भरा है, उसको सुख-शान्ति के अधिकार से संसार में कौन वंचित कर सकता है। भारतीय मंत्रों का अभिमत दाता होने का रहस्य यही है कि बार-बार जपने से उनमें निवास करने वाला दिव्य विचारों का सार मनुष्य अन्तःकरण में भर जाता है, जो बीज की तरह वृद्धि पाकर मनोवांछित फल उत्पन्न कर देते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 23)
🌹 जीवन-साधना एवं ईश-उपासना
🔵 जिस प्रकार कुछ भी उपार्जन करने में मनुष्य समर्थ है, उसी प्रकार उसकी इच्छा पर यह भी निर्भर है कि उसका सदुपयोग या दुरुपयोग करने लगे। कर्मफल अवश्य ही नियंता ने अपने हाथ में रखा है, फिर भी जहाँ तक कर्तव्य का संबंध है, वहाँ तक मनुष्य अपनी मनमर्जी बरतने में स्वतंत्र है। अर्जित प्राणशक्ति के बारे में भी यही बात है। दैत्य स्तर के लोग भौतिक सामर्थ्यों की तरह आत्मिक विभूतियों का दुरुपयोग कर सकते हैं। तांत्रिक, अघोरी, कापालिक आदि ऐसे ही उद्धत प्रयोग करते रहे हैं।
🔴 प्राणशक्ति को भौतिक लाभ के लिये भी प्रयोग किया जा सकता है। जीवट वाले सामान्य परिस्थितियों में पैदा होने पर भी अपने लिये अपने उपयुक्त वातावरण बनाते और व्यवहारकुशलता का परिचय देते हुए अभीष्ट क्षेत्र की प्रगति अर्जित करते हैं। धनवान् बलवान्, विद्वान् व कलाकार स्तर के लोग अपनी तत्परता, तन्मयता, कुशलता और जागरूकता के सहारे अपनी इच्छित सफलताएँ अर्जित करते हैं, जबकि अनगढ़ स्तर के लोग किसी प्रकार अपना गुजारा भर चला पाते हैं-कई बार तो ऐसे जाल-जंजाल बुन लेते हैं, जिनके कारण उन्हें अनेकानेक विग्रहों-संकटों का सामना करना पड़ता है। असावधान और अव्यावहारिक लोग अकसर लोकव्यवहार में भी इतनी भूलें करते देखे गये हैं, जिनके कारण उनके लिये चैन से दिन गुजारना भी कठिन पड़ जाता है, सफलता और समृद्धियाँ प्राप्त कर सकना तो दूर की बात बन जाती है।
🔵 भौतिक क्षेत्र में अपने जीवट का सुनियोजन करने वाले आमतौर से अभीष्ट सफलता की दिशा में ही बढ़ते हैं। संपत्तिवान प्रगतिशील सफलताओं के अधिष्ठाता कहलाते हैं। कभी-कभी ऐसे लोग चालाकी भी अपनाते हैं, पर इतना तो निश्चित है कि जीवट का धनी हुए बिना कोई उस स्थिति तक नहीं पहुँच सकता, जिसे उन्नतिशील कहलाने का श्रेय मिल सके।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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बुधवार, 22 मार्च 2017
👉 आँखें फट पड़ीं आँखों के डाक्टर की
🔴 वर्ष १९६३ की घटना है। अचानक ही मेरी आँखें दुखने लग गई थीं। शुरू में मैंने इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया। अध्ययन-अध्यापन से जुड़े होने के कारण मेरी आँखों की परेशानी दिन ब दिन कम होती चली गई। पढ़ना शुरू करते ही आँखों में जलन सी महसूस होती और पानी गिरने लगता था। इसी कारण हमेशा सिरदर्द भी बना रहता था।
🔵 आखिरकार मैंने स्थानीय डॉक्टर से आँखों की जाँच कराई। डाक्टर ने बताया कि आँखों से ज्यादा काम लेने के कारण ही ऐसी स्थिति है। आँखों को अधिक से अधिक आराम देने की सलाह के साथ उन्होंने कुछ दवायें लिख दीं। लेकिन उन दवाओं से कुछ लाभ नहीं हुआ। धीरे-धीरे देखने में भी दिक्कत महसूस होने लगी। तब जाकर मैं अलीगढ़ आई हॉस्पिटल पहुँचा। वहाँ आधुनिकतम मशीनों से कई प्रकार की जाँच की गई। जाँच की रिपोर्ट देखकर मुझे तुरंत हॉस्पीटल में भर्ती कर लिया गया। लगातार इलाज चलता रहा।
🔴 महीनों अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा, लेकिन रोग था कि ठीक होने का नाम ही नहीं लेता। धीरे-धीरे एक आँख की रोशनी समाप्त सी हो चली। इलाज करने वाले डाक्टर भी हिम्मत हार चुके थे। जाँच की प्रक्रिया फिर से शुरू हुई। एक दिन नेत्र विभाग के मुख्य चिकित्सक प्रो. बी. आर. शुक्ला ने कहा कि वैसे तो हम अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन रिपोर्ट कहती है कि आपकी दूसरी आँख भी खराब हो सकती है। उनके ये शब्द सुनकर मुझे काठ मार गया। बहुत कुछ कहना चाहकर भी मैं कुछ बोल नहीं सका। डॉ. शुक्ला मेरा कन्धा थपथपाते हुए आगे बढ़ गए।
🔵 मैं अन्दर ही अन्दर इस चिन्ता से घुला जा रहा था कि अगर मैं अन्धा हो गया तो मेरा शेष जीवन कैसे बीतेगा, मेरे परिवार का भरण-पोषण कौन करेगा। तभी मुझे पता चला कि आचार्यश्री उज्जैन आए हुए हैं। मैं तुरंत उनके दर्शन करने चल पड़ा। उनके सामने पहुँचा, तो उन्हें प्रणाम करके मैंने अपनी व्यथा सुनाई। सारा वृत्तांत सुनकर गरुदेव ने मेरी ओर गहरी नजर से देखा और कहा-तेरा डॉक्टर क्या कहता है, यह मैं नहीं जानता। पर मैं कहता हूँ कि तेरी दूसरी आँख खराब नहीं हो सकती।
🔴 पूज्य गुरुदेव के इस आश्वासन से मेरी आँखें डबडबा गईं। मैंने उन्हें डॉक्टर का पर्चा दिखाया। दवाएँ भी हाथ में ही लिए था। मैंने कहा-गुरुदेव, ये सब.....। गुरुदेव ने मेरा आशय समझकर कहा-तेरी मरजी। रखे रख, फेंके फेंक दे। उनकी बातों पर विश्वास न करने का कोई प्रश्न ही नहीं था। मैंने उसी वक्त डॉक्टर का पर्चा फाड़कर फेंक दिया।
🔵 तब से लेकर आज तक मैंने कोई दवा नहीं खाई। आज भी मेरी आँख की रोशनी बनी हुई है। आश्चर्य तो यह है कि युगऋषि के उस आश्वासन के बाद मैंने दिन-रात एक करके पीएच.डी. तक पूरा किया।
🔴 इस बीच मैं अलीगढ़ जाकर प्रो. शुक्ला से मिला। आँख की हालत सुधरती देखकर उन्होंने मुझसे पूछा-भाई, तुम कौन-सी दवा ले रहे हो, किस डॉक्टर का इलाज चल रहा है? मैंने कहा-दवा लेना तो मैंने कब का छोड़ दिया है। भगवान सरीखे मेरे गुरुदेव ने मेरी आँख की जाती हुई रोशनी वापस लौटा दी है। अब मैं पढ़ाई-लिखाई ही नहीं, बारीक से बारीक काम भी बड़े मजे में कर लेता हूँ। पूज्य गुरुदेव के इस अद्भुत, अविस्मरणीय अनुदान की बात सुनकर डॉ. शुक्ला आश्चर्यचकित रह गए।
🔵 कुछ दिनों बाद जब मैं गुरुदेव के दर्शन करने शांतिकुंज आया तो वे सूक्ष्मीकरण साधना में थे। इस दौरान आचार्यश्री से सामान्यतया परिजनों का मिलना संभव नहीं रह गया था, किन्तु फिर भी वन्दनीया माता जी ने मुझ पर विशेष कृपा करते हुए मुझे पूज्य गुरुदेव से मिलने भेज दिया। उन्हें प्रणाम करने के बाद मैं कुछ कह पाता, उसके पहले ही वे बोल पड़े-कैसे हो कर्मयोगी? तुम्हारी आँख ठीक है न? मैने कहा-गुरुदेव यह रोशनी तो आप ही की दी हुई है। मेरे ऐसा कहने पर उन्होंने अपनी छाती ठोककर कहा- हाँ, मैंने इसकी जिम्मेदारी ले रखी है। आँख की रोशनी जीवन के अन्तिम क्षण तक बनी रहेगी।
🔴 पूज्य गुरुदेव की वह बात आज भी सच साबित हो रही है। आज मैं ८० वर्ष आयु पार कर रहा हूँ, लेकिन घण्टों लिखने-पढ़ने का काम करने के बाद भी मेरी आँखें कभी नहीं थकती हैं।
🌹 डॉ. आर.पी. कर्मयोगी, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 28)
🌹 आगे बढ़ें और लक्ष्य तक पहुँचें
🔴 आत्म-विश्वास बड़ी चीज है। वह रस्सी को साँप और साँप को रस्सी बना सकने में समर्थ है। दूसरे लोगों का साथ न मिले, यह हो सकता है, किन्तु अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को मनमर्जी के अनुरूप सुधारा-उभारा जा सकता है। सङ्कल्प-शक्ति की विवेचना करने वाले कहते हैं कि वह चट्टान को भी चटका देती है, कठोर को भी नरम बना देती है और उन साधनों को खींच बुलाती है, जिनकी आशा अभिलाषा में जहाँ-तहाँ प्यासे कस्तूरी हिरण की तरह मारा-मारा फिरना पड़ता है।
🔵 मनुष्य यदि उतारू हो जाए, तो दुष्कर्म भी कर गुजरता है। आत्महत्या तक के लिए उपाय अपना लेता है, फिर कोई कारण नहीं कि उत्थान का अभिलाषी अभीष्ट अभ्युदय के लिए सरञ्जाम न जुटा सके? दूसरों पर विश्वास करके उन्हें मित्र-सहयोगी बनाया जा सकता है। श्रद्धा के सहारे पाषाण-प्रतिमा में देवता प्रकट होते देखे गये हैं, फिर कोई कारण नहीं कि अपनी श्रेष्ठता को समझा-उभारा और सँजोया जा सके, तो व्यक्ति ऐसी समुन्नत स्थिति तक न पहुँच सके, जिस तक जा पहुँचने वाले हर स्तर की सफलता अर्जित करके दिखाते हैं।
🔴 आत्म निरीक्षण को सतर्कतापूर्वक सँजोया जाता रहे, तो वे खोटें भी दृष्टिगोचर होती हैं, जो आमतौर से छिपी रहती हैं और सूझ नहीं पड़ती; किन्तु जिस प्रकार दूसरों का छिद्रान्वेषण करने में अभिरुचि रहती है, वैसी ही अपने दोष-दुर्गुणों को बारीकी से खोजा और उन्हें निरस्त करने के लिए समुचित साहस दिखाया जाए, तो कोई कारण नहीं कि उनसे छुटकारा पाने के उपरान्त अपने को समुचित और सुसंस्कृत न बनाया जा सके। इसी प्रकार औरों की अपेक्षा अपने में जो विशिष्टताएँ दिख पड़ती हैं, उन्हें सींचने-सम्भालने में उत्साहपूर्वक निरत रहा जाए, तो कोई कारण नहीं कि व्यक्तित्व अधिक प्रगतिशील, अधिक प्रतिभासम्पन्न न बनने की दशा अपनाई जा सके।
🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 हाँ हाँ, मैं बहरा था, बहरा हूँ और बहरा रहूँगा,.......तुम लोगों के लिए………
🔴 एक बार एक सीधे पहाड़ में चढ़ने की प्रतियोगिता हुई. बहुत लोगों ने हिस्सा लिया. प्रतियोगिता को देखने वालों की सब जगह भीड़ जमा हो गयी. माहौल में सरगर्मी थी , हर तरफ शोर ही शोर था. प्रतियोगियों ने चढ़ना शुरू किया। लेकिन सीधे पहाड़ को देखकर भीड़ में एकत्र हुए किसी भी आदमी को ये यकीन नहीं हुआ कि कोई भी व्यक्ति ऊपर तक पहुंच पायेगा…
🔵 हर तरफ यही सुनाई देता …“ अरे ये बहुत कठिन है. ये लोग कभी भी सीधे पहाड़ पर नहीं चढ़ पायंगे, सफलता का तो कोई सवाल ही नहीं, इतने सीधे पहाड़ पर तो चढ़ा ही नहीं जा सकता और यही हो भी रहा था, जो भी आदमी कोशिश करता, वो थोडा ऊपर जाकर नीचे गिर जाता, कई लोग दो -तीन बार गिरने के बावजूद अपने प्रयास में लगे हुए थे …पर भीड़ तो अभी भी चिल्लाये जा रही थी, ये नहीं हो सकता, असंभव और वो उत्साहित प्रतियोगी भी ये सुन-सुनकर हताश हो गए और अपना प्रयास धीरे धीरे करके छोड़ने लगे,
🔴 लेकिन उन्हीं लोगों के बीच एक प्रतियोगी था, जो बार -बार गिरने पर भी उसी जोश के साथ ऊपर पहाड़ पर चढ़ने में लगा हुआ था ….वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता रहा और अंततः वह सीधे पहाड़ के ऊपर पहुच गया और इस प्रतियोगिता का विजेता बना. उसकी जीत पर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ, सभी लोग उसे घेर कर खड़े हो गए और पूछने लगे, तुमने ये असंभव काम कैसे कर दिखाया, भला तुम्हे अपना लक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति कहाँ से मिली, ज़रा हमें भी तो बताओ कि तुमने ये विजय कैसे प्राप्त की?
🔵 तभी पीछे से एक आवाज़ आई … अरे उससे क्या पूछते हो, वो तो बहरा है तभी उस व्यक्ति ने कहा कि हर नकारात्मक बात के लिए -
" मैं बहरा था, बहरा हूँ और बहरा रहूँगा "।
🔴 मित्रों, अक्सर हमारे अन्दर अपना लक्ष्य प्राप्त करने की काबीलियत होती है, पर हम अपने चारों तरफ मौजूद नकारात्मकता की वजह से खुद को कम आंक बैठते हैं और हमने जो बड़े-बड़े सपने देखे होते हैं उन्हें पूरा किये बिना ही अपनी ज़िन्दगी गुजार देते हैं।
🔵 मित्रों, आवश्यकता इस बात की है हमें कमजोर बनाने वाली हर एक आवाज के प्रति बहरे और ऐसे हर एक दृश्य के प्रति अंधे होना पड़ेगा और तभी हमें सफलता के शिखर पर पहुँचने से कोई नहीं रोक पायेगा।
👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 43)
🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार
🔴 इस प्रकार के उत्साही तथा सदाशयता पूर्ण चिंतन करते रहने से एक दिन आपका अवचेतन प्रबुद्ध हो उठेगा, आपकी सोई शक्तियां जाग उठेंगी, आप के गुण कर्म स्वभाव का परिष्कार हो जायेगा और आप परमार्थ पथ पर उन्नति के मार्ग पर अनायास ही चल पड़ेंगे। और तब न आपको चिन्ता, न निराश और न असफलता का भय रहेगा न लोक परलोक की कोई शंका। उसी प्रकार शुद्ध-बुद्ध तथा पवित्र बन जायेंगे जिस प्रकार के आपके विचार होंगे और जिन के चिन्तन को आप प्रमुखता दिये होंगे।
🔵 सभी का प्रयत्न रहता है कि उनका जीवन सुखी और समृद्ध बने। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए लोग पुरुषार्थ करते, धन-सम्पत्ति कमाते, परिवार बसाते और आध्यात्मिक साधना करते हैं। किन्तु क्या पुरुषार्थ करने, धन दौलत कमाने, परिवार बसाने और धर्म-कर्म करने मात्र से लोग सुख-शान्ति के अपने उद्देश्य में सफल हो जाते हैं। सम्भव है इस प्रकार प्रयत्न करने से कई लोग सुख शान्ति की उपलब्धि कर लेते हों, किन्तु बहुतायत में तो यही दीखता है कि धन-सम्पत्ति और परिवार परिजन के होते हुए भी लोग दुःखी और त्रस्त दीखते हैं। धर्म-कर्म करते हुए भी असन्तुष्ट और अशान्त हैं।
🔴 सुख-शान्ति की प्राप्ति के लिए धन-दौलत अथवा परिवार परिजन की उतनी आवश्यकता नहीं है। जितनी आवश्यकता सद्विचारों की होती है। वास्तविक सुख-शान्ति पाने के लिए विचार साधना की ओर उन्मुख होना होगा। सुख-शान्ति न तो संसार की किसी वस्तु में है और न व्यक्ति में। उसका निवास मनुष्य के अन्तःकरण में है। जोकि विचार रूप से उसमें स्थित रहता है। सुख-शान्ति और कुछ नहीं, वस्तुतः मनुष्य के अपने विचारों की एक स्थिति है। जो व्यक्ति साधना द्वारा विचारों को उस स्थिति में रख सकता है, वही वास्तविक सुख-शान्ति का अधिकारी बन सकता है। अन्यथा, विचार साधना से रहित धन-दौलत से शिर मारते और मेरा-तेरा, इसका-उसका करते हुए एक झूठे सुख, मिथ्या शान्ति के मायाजाल में लोग यों ही भटकते हुए जीवन बिता रहे हैं और आगे भी बिताते रहेंगे।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 22)
🌹 जीवन-साधना एवं ईश-उपासना
🔵 सोने को कसौटी पर कसने के अतिरिक्त आग में भी तपाया जाता है, तब पता चलता है कि उसके खरेपन में कहीं कोई कमी तो नहीं हैं। इसी प्रकार देखा यह भी जाना चाहिये कि सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन जैसे लोकमंगल-कार्यों में किसका कितना बढ़ा-चढ़ा अनुदान रहा। अद्यावधि संसार के इतिहास में महामानवों तथा ईश्वर-भक्तों का इतिहास इन्हीं दो विशेषताओं से जुड़ा हुआ रहा है। इनने इन्हीं दो चरणों को क्रमबद्ध रूप से उठाते हुए उत्कृष्टता के उच्च लक्ष्य तक पहुँच सकना संभव बनाया है। अन्य किसी के लिये भी इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है। कोई ऐसा शार्टकट कहाँ है, जिसे पकड़कर जीवन के स्तर को घटिया बनाये रखकर भी कोई ठोस सार्थक प्रगति की जा सके।
🔴 चतुरता के हथकण्डों में से कई ऐसे हैं तो सही, जो बाजीगरों जैसे चमत्कार दिखाकर भोले दर्शकों को अपने कुतूहलों से चमत्कृत कर देते हैं। बेईमानी से भी कभी-कभी कोई कुछ सफलता प्राप्त कर लेता है, पर इस तथ्य को भुला न दिया जाए कि बाजीगर हथेली पर सरसों जमा तो देते हैं, पर उसका तेल निकालते और लाभ मिलते किसी ने नहीं देखा। पानी के बबूले कुछ ही देर उछल-कूद करते और फिर सदा के लिये अपना अस्तित्व गँवा बैठते हैं।
🔵 धातुओं की खदानें जहाँ कहीं होती हैं, उस क्षेत्र के अपने सजातीय कणों को धीरे-धीरे खींचती और एकत्र करती रहती हैं। उनका क्रमिक विस्तार इसी प्रकार हो जाता है। जहाँ सघन वृक्षावली होती है, वहाँ भी हरीतिमा का चुंबकत्व आकाश से बादलों को खींचकर अपने क्षेत्र में बरसने के लिये विवश किया करता है। खिले हुए फूलों पर तितलियाँ न जाने कहाँ-कहाँ से उड़-उड़कर आ जाती हैं।
🔴 इसी प्रकार प्रामाणिकता और उदारता की विभूतियाँ जहाँ-कहीं भी सघन हो जाती हैं वे अपने आप में एक चुंबक की भूमिका निभाती हैं और अखिल ब्रह्मांड में अपनी सजातीय चेतना को आकर्षित करके अवधारण कर लेती हैं। ईश्वरीय अंश इसी प्रकार मनुष्यों की अपेक्षा निश्चित रूप से प्राणवानों में अधिक पाया जाता है। सामान्य प्राण को महाप्राण में परिवर्तित करना ही ईश्वर-उपासना का उद्देश्य है। इसी के फलित होने पर मनुष्य को मनीषी, क्षुद्र को महान् और नर को नारायण बनने का अवसर मिलता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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मंगलवार, 21 मार्च 2017
👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 27)
🌹 आगे बढ़ें और लक्ष्य तक पहुँचें
🔴 स्वर्ग की देवियाँ ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में उसके आगे-पीछे फिरती हैं और आज्ञानुवर्ती बनकर मिले हुए आदेशों का पालन करती हैं। यह भूलोक सौरमण्डल के समस्त ग्रह-गोलकों से अधिक जीवन्त, सुसम्पन्न और शोभायमान माना जाता है; पर भुलाया यह भी नहीं जा सकता कि आदिकाल के इस अनगढ़ ऊबड़-खाबड़ धरातल को आज जैसी सुसज्जित स्थिति तक पहुँचाने का श्रेय केवल मानवी पुरुषार्थ को ही है। वह अनेक जीव-जन्तुओं पशु-पक्षियों का पालनकर्ता और आश्रयदाता है। फिर कोई कारण नहीं कि अपनी प्रस्तुत समर्थता को जगाने-उभारने के लिए यदि समुचित रूप से कटिबद्ध हो चले, तो उस प्रतिभा का धनी न बन सके, जिसकी यश-गाथा गाने में लेखनी और वाणी को हार माननी पड़ती है।
🔵 मनुष्य प्रभावशाली तो है; पर साथ ही वह सम्बद्ध वातावरण से प्रभाव भी ग्रहण करता है। दुर्गंधित साँस लेने से सिर चकराने लगता है और सुगन्धि का प्रभाव शान्ति, प्रसन्नता और प्रफुल्लता प्रदान करता है। बुरे लोगों के बीच, बुराई से सञ्चालित घटनाओं के मध्य समय गुजारने वाले, उनमें रुचि लेने वाला व्यक्ति क्रमश: पतन और पराभव के गर्त में ही गिरता जाता है, साथ ही यह भी सही है कि मनीषियों, चरित्रवानों, सत्साहसी लोगों के सम्पर्क में रहने पर उनका प्रभाव-अनुदान सहज ही खिंचता चला आता है और व्यक्ति को उठाने-गिराने में असाधारण सहायता करता है। इन दिनों व्यक्ति और समाज में हीनता और निकृष्टता का ही बाहुल्य है। जहाँ इस प्रकार का वातावरण बहुलता लिए हो, उससे यथासम्भव बचना और असहयोग करना ही उचित है।
🔴 सज्जनता का सान्निध्य कठिन तो है और सत्प्रवृत्तियों की भी अपनी समर्थता जहाँ-तहाँ ही दिखाई देती है। ऐसी दशा में पुरातन अथवा अर्वाचीन सदाशयता का परिचय पुस्तकों के प्रसंगों के समाचारों के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है और उन संस्मरणों को आत्मसात करते हुए ऐसा अनुभव किया जा सकता है, मानों देवलोक के नन्दनवन में विचरण किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में स्वाध्याय और सत्संग का सहारा लिया जा सकता है। इतिहास में से वे पृष्ठ ढूँढ़े जा सकते हैं, जो स्वर्णाक्षरों में लिखे हुए हैं और मानवी गरिमा को महिमामण्डित करते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 स्वर्ग की देवियाँ ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में उसके आगे-पीछे फिरती हैं और आज्ञानुवर्ती बनकर मिले हुए आदेशों का पालन करती हैं। यह भूलोक सौरमण्डल के समस्त ग्रह-गोलकों से अधिक जीवन्त, सुसम्पन्न और शोभायमान माना जाता है; पर भुलाया यह भी नहीं जा सकता कि आदिकाल के इस अनगढ़ ऊबड़-खाबड़ धरातल को आज जैसी सुसज्जित स्थिति तक पहुँचाने का श्रेय केवल मानवी पुरुषार्थ को ही है। वह अनेक जीव-जन्तुओं पशु-पक्षियों का पालनकर्ता और आश्रयदाता है। फिर कोई कारण नहीं कि अपनी प्रस्तुत समर्थता को जगाने-उभारने के लिए यदि समुचित रूप से कटिबद्ध हो चले, तो उस प्रतिभा का धनी न बन सके, जिसकी यश-गाथा गाने में लेखनी और वाणी को हार माननी पड़ती है।
🔵 मनुष्य प्रभावशाली तो है; पर साथ ही वह सम्बद्ध वातावरण से प्रभाव भी ग्रहण करता है। दुर्गंधित साँस लेने से सिर चकराने लगता है और सुगन्धि का प्रभाव शान्ति, प्रसन्नता और प्रफुल्लता प्रदान करता है। बुरे लोगों के बीच, बुराई से सञ्चालित घटनाओं के मध्य समय गुजारने वाले, उनमें रुचि लेने वाला व्यक्ति क्रमश: पतन और पराभव के गर्त में ही गिरता जाता है, साथ ही यह भी सही है कि मनीषियों, चरित्रवानों, सत्साहसी लोगों के सम्पर्क में रहने पर उनका प्रभाव-अनुदान सहज ही खिंचता चला आता है और व्यक्ति को उठाने-गिराने में असाधारण सहायता करता है। इन दिनों व्यक्ति और समाज में हीनता और निकृष्टता का ही बाहुल्य है। जहाँ इस प्रकार का वातावरण बहुलता लिए हो, उससे यथासम्भव बचना और असहयोग करना ही उचित है।
🔴 सज्जनता का सान्निध्य कठिन तो है और सत्प्रवृत्तियों की भी अपनी समर्थता जहाँ-तहाँ ही दिखाई देती है। ऐसी दशा में पुरातन अथवा अर्वाचीन सदाशयता का परिचय पुस्तकों के प्रसंगों के समाचारों के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है और उन संस्मरणों को आत्मसात करते हुए ऐसा अनुभव किया जा सकता है, मानों देवलोक के नन्दनवन में विचरण किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में स्वाध्याय और सत्संग का सहारा लिया जा सकता है। इतिहास में से वे पृष्ठ ढूँढ़े जा सकते हैं, जो स्वर्णाक्षरों में लिखे हुए हैं और मानवी गरिमा को महिमामण्डित करते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 21)
🌹 जीवन-साधना एवं ईश-उपासना
🔵 नैवेद्य चढ़ाने का तात्पर्य है-अपने स्वभाव और व्यवहार में मधुरता का अधिकाधिक समावेश करना। जप का उद्देश्य है-अपने मन:क्षेत्र में निर्धारित प्रकाश परिपूर्णता का समावेश करने के लिये उसकी रट लगाये रहना। ध्यान का अर्थ है-अपनी मानसिकता को लक्ष्य-विशेष पर अविचल भाव से केन्द्रीभूत किये रहना। प्राणायाम का प्रयोजन है-अपने आपको हर दृष्टि से प्राणवान्, प्रखर व प्रतिभा संपन्न बनाये रहना।
🔴 समूचे साधना विज्ञान का तत्त्वदर्शन इस बात पर केन्द्रीभूत है कि जीवनचर्या का बहिरंग और अंतरंग-पक्ष निरंतर मानवीय गरिमा के उपयुक्त साँचे में ढलता रहे-कषाय-कल्मषों के दोष-दुर्गुण जहाँ भी छिपे हुए हों, उनका निराकरण होता चले। मनुष्य जितना ही निर्मल होता है, उसे उसी तत्परता के साथ आत्मा के दर्पण में ईश्वर की झाँकी होने लगती है। इसी को प्रसुप्ति का जागरण में परिवर्तित होना कहते हैं। आत्मज्ञान की उपलब्धि या आत्म-साक्षात्कार यही है। इस दिशा में जो जितना बढ़ पाते हैं, उन्हें उसी स्तर का सुविकसित सिद्धपुरुष या महामानव समझा जाता है।
🔵 सड़क चलने में सहायता तो करती है, पर उसे पार करने के लिये पैरों का पुरुषार्थ ही काम देता है। भजन-पूजन तो एक प्रकार का जलस्नान है, जिससे शरीर पर जमी हुई मलीनता दूर होती है। यह आवश्यक होते हुए भी समग्र नहीं है। जीवन धारण किये रहने के लिये तो खाना-पीना सोना-जागना आदि भी आवश्यक है। पूजा-अर्चा का महत्त्व समझा जाये किन्तु यह मान बैठने की भूल न की जाये कि आत्मिक प्रगति में पात्रता और प्रामाणिकता की उपेक्षा की जाने लगे या मान लिया जाये कि क्रिया-कृत्यों से ही अध्यात्म का समस्त प्रयोजन पूरा हो जाएगा। यदि वरिष्ठता और महत्ता की जाँच-पड़ताल करनी हो तो एक ही बात खोजनी चाहिये कि व्यक्ति सामान्यजनों की अपेक्षा अपने व्यक्तित्व, चिंतन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता का अधिक समावेश कर सका या नहीं?
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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सोमवार, 20 मार्च 2017
👉 गुरुर्वाक्यं ब्रह्मवाक्यं
🔵 मैं बचपन से ही बहुत तार्किक स्वभाव का था। ज्यादा पूजा पाठ या साधू बाबा आदि के आडम्बरों से बहुत दूर रहता था। मुझे समाज निर्माण से जुड़े नैतिक और सामाजिक कार्यों में रुचि थी। मुझे आर्यसमाज से जुड़ी हुई कुछ चीजें पसन्द थीं, विशेषकर गायत्री मंत्र। १९७६ की बात है। उन्हीं दिनों मैं पहली बार इस मिशन से परिचित हुआ। मेरे बड़े भाई के समान श्री मंगल प्रसाद लोहिया जी एक दिन मेरे पास आए और बोले कि आपको सोनी माता जी के यहाँ गायत्री यज्ञ में चलना है। चूँकि मेरी गायत्री मंत्र में श्रद्धा पूर्व से ही थी, मैं सहर्ष तैयार हो गया।
🔴 मैं सोनी माता जी के यहाँ यज्ञ में पहुँचा। यज्ञ श्री कोलेश्वर तिवारी जी करा रहे थे। मैंने प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ किया। यज्ञ के बाद तिवारी जी बोले अब कुछ दक्षिणा दो। मैं दक्षिणा का अर्थ ठीक से नहीं समझ पाया, तो उन्होंने बताया कि अपने अन्दर की कुछ बुराई यज्ञ भगवान की साक्षी में छोड़ दो। मैंने पान, नॉनवेज तथा आलस्य आदि छोड़ दिया और प्रतिदिन गायत्री मंत्र की उपासना करने लगा। लगभग १५ दिन के अन्दर ही मुझे हरिद्वार जाने की प्रेरणा हुई।
🔵 संयोग से मंगल जी शान्तिकुञ्ज जा रहे थे, मैं भी उनके साथ हो लिया। ट्रेन से सुबह ही पहुँच गया था। स्नान आदि के बाद मैं गुरुजी के प्रवचन में पहुँच गया। मुझे शान्तिकुञ्ज के वातावरण से लगा मैं स्वर्ग में पहुँच गया हूँ। उसके बाद जब गुरुदेव का प्रवचन सुना तो लगा मैं बहुत सौभाग्यशाली हूँ, जो ऐसे भगवान स्वरूप गुरु के दर्शन हुए।
🔴 प्रवचन समाप्त होने के बाद मंगल जी ने मंच के पीछे मुझे गुरुदेव से मिलाया और मेरा परिचय दिया। गुरुदेव ने कुशल क्षेम पूछा। उनके सरल व्यक्तित्व से मैं बहुत प्रभावित हुआ। वे ऐसे बात कर रहे थे जैसे मुझे बहुत पहले से जानते हों। उनका अपनापन देखकर मेरे हृदय में उनके प्रति अटूट श्रद्धा हो गई।
🔵 उसके पश्चात् मैं गुरुदेव से उनके कमरे में मिला। गुरुदेव ने मुझे अपने पास बिठाया। घर परिवार का हाल पूछा। मैं असमंजस में पड़ गया कि क्या उत्तर दूँ। मुझे निरुत्तर देख वे बोले ‘तुम हमारा काम करो, हम तुम्हारा काम करेंगे।’ तुम्हारी दुकानदारी, बीमारी, परेशानी सबकी जिम्मेदारी मेरी है। बस तुम मन लगाकर कार्य करना। इतना बड़ा आश्वासन पाकर मैं कृतार्थ हो गया। उस समय तो दो- तीन दिन वहाँ रहकर मैं घर वापस आ गया। लेकिन शान्तिकुञ्ज का आकर्षण बराबर अनुभव होता रहता। मैंने उस समय ३ शिविर १- १ महीने के कर डाले। इस तरह से मैं किसी न किसी रूप में शान्तिकुञ्ज हमेशा महीने- दूसरे महीने पहुँच ही जाता।
🔴 सन् १९८६ की घटना है। मुझे हार्ट में कुछ परेशानी मालूम पड़ने लगी। इधर- उधर कुछ दिखाया, लेकिन आराम नहीं मिला। मेरे मित्र अरविन्द निगम जी को इस बात का पता चला। वे तुरन्त मुझे लखनऊ मेडिकल कालेज लेकर गए। वहाँ डॉक्टरों ने बताया कि हार्ट में प्रॉबलम है। चूँकि इसमें दवा काम नहीं करेगी इसलिए एक छोटा सा ऑपरेशन करेंगे। ऑपरेशन का खर्च लगभग ७० हजार रुपए बताया गया।
🔵 खर्च की राशि सुनते ही जैसे लगा कि पैरों के तले की धरती ही खिसक गई। मेरे पास ५ हजार रुपये भी नहीं हैं। ७० हजार कहाँ से लाऊँगा। मैं घर वापस चला गया। मैं मानसिक रूप से बहुत परेशान था। मेरी इतनी बड़ी हैसियत भी नहीं थी कि उधार लेकर ऑपरेशन कराता। वापस करता भी तो कैसे? यह मेरे लिए उस समय असंभव ही था। मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। अचानक मुझे गुरुदेव के वे शब्द याद आये कि बेटा ‘तुम हमारा काम करो, हम तुम्हारा काम करेंगे।’
🔴 तुरन्त मैंने हरिद्वार जाने की व्यवस्था बनाई। शान्तिकुञ्ज पहुँचकर डॉ० प्रणव पण्ड्या जी भाई साहब को अपनी रिपोर्ट दिखाई। दवा आदि का पर्चा भी दिखाया। डॉ० साहब भी बोले, स्थिति तो ऑपरेशन की ही बन रही है। फिर मैं गुरुदेव के पास गया। उनसे सारी बातें बताई। रिपोर्ट और सारे पर्चे भी दिखाए। गुरुदेव बोले- तुम्हें कुछ नहीं होगा। तुम्हें कोई बीमारी नहीं है। जाओ मन लगाकर काम करो। खूब साइकिल चलाना। तुम्हें कुछ नहीं होगा।
🔵 कहते हैं, गुरु का वाक्य ब्रह्मवाक्य होता है। गुरुदेव का वह वाक्य सचमुच मेरे लिए ब्रह्मवाक्य बन गया। मैं आज तक पूरी तरह स्वस्थ हूँ। मुझे किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं है। गुरुदेव की कृपा से मेरा जीवन संकट बड़ी आसानी से टल गया। मैं उस परमसत्ता का बहुत ऋणी हूँ, जिन्होंने मुझ अकिंचन पर अहैतुक कृपा की। मैं आज भी तन- मन से गुरु कार्य में संलग्न हूँ।
🌹 बिजलेश्वरी प्रसाद कसेरा चौक बाजार, बलरामपुर (उ.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/guru.1
🔴 मैं सोनी माता जी के यहाँ यज्ञ में पहुँचा। यज्ञ श्री कोलेश्वर तिवारी जी करा रहे थे। मैंने प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ किया। यज्ञ के बाद तिवारी जी बोले अब कुछ दक्षिणा दो। मैं दक्षिणा का अर्थ ठीक से नहीं समझ पाया, तो उन्होंने बताया कि अपने अन्दर की कुछ बुराई यज्ञ भगवान की साक्षी में छोड़ दो। मैंने पान, नॉनवेज तथा आलस्य आदि छोड़ दिया और प्रतिदिन गायत्री मंत्र की उपासना करने लगा। लगभग १५ दिन के अन्दर ही मुझे हरिद्वार जाने की प्रेरणा हुई।
🔵 संयोग से मंगल जी शान्तिकुञ्ज जा रहे थे, मैं भी उनके साथ हो लिया। ट्रेन से सुबह ही पहुँच गया था। स्नान आदि के बाद मैं गुरुजी के प्रवचन में पहुँच गया। मुझे शान्तिकुञ्ज के वातावरण से लगा मैं स्वर्ग में पहुँच गया हूँ। उसके बाद जब गुरुदेव का प्रवचन सुना तो लगा मैं बहुत सौभाग्यशाली हूँ, जो ऐसे भगवान स्वरूप गुरु के दर्शन हुए।
🔴 प्रवचन समाप्त होने के बाद मंगल जी ने मंच के पीछे मुझे गुरुदेव से मिलाया और मेरा परिचय दिया। गुरुदेव ने कुशल क्षेम पूछा। उनके सरल व्यक्तित्व से मैं बहुत प्रभावित हुआ। वे ऐसे बात कर रहे थे जैसे मुझे बहुत पहले से जानते हों। उनका अपनापन देखकर मेरे हृदय में उनके प्रति अटूट श्रद्धा हो गई।
🔵 उसके पश्चात् मैं गुरुदेव से उनके कमरे में मिला। गुरुदेव ने मुझे अपने पास बिठाया। घर परिवार का हाल पूछा। मैं असमंजस में पड़ गया कि क्या उत्तर दूँ। मुझे निरुत्तर देख वे बोले ‘तुम हमारा काम करो, हम तुम्हारा काम करेंगे।’ तुम्हारी दुकानदारी, बीमारी, परेशानी सबकी जिम्मेदारी मेरी है। बस तुम मन लगाकर कार्य करना। इतना बड़ा आश्वासन पाकर मैं कृतार्थ हो गया। उस समय तो दो- तीन दिन वहाँ रहकर मैं घर वापस आ गया। लेकिन शान्तिकुञ्ज का आकर्षण बराबर अनुभव होता रहता। मैंने उस समय ३ शिविर १- १ महीने के कर डाले। इस तरह से मैं किसी न किसी रूप में शान्तिकुञ्ज हमेशा महीने- दूसरे महीने पहुँच ही जाता।
🔴 सन् १९८६ की घटना है। मुझे हार्ट में कुछ परेशानी मालूम पड़ने लगी। इधर- उधर कुछ दिखाया, लेकिन आराम नहीं मिला। मेरे मित्र अरविन्द निगम जी को इस बात का पता चला। वे तुरन्त मुझे लखनऊ मेडिकल कालेज लेकर गए। वहाँ डॉक्टरों ने बताया कि हार्ट में प्रॉबलम है। चूँकि इसमें दवा काम नहीं करेगी इसलिए एक छोटा सा ऑपरेशन करेंगे। ऑपरेशन का खर्च लगभग ७० हजार रुपए बताया गया।
🔵 खर्च की राशि सुनते ही जैसे लगा कि पैरों के तले की धरती ही खिसक गई। मेरे पास ५ हजार रुपये भी नहीं हैं। ७० हजार कहाँ से लाऊँगा। मैं घर वापस चला गया। मैं मानसिक रूप से बहुत परेशान था। मेरी इतनी बड़ी हैसियत भी नहीं थी कि उधार लेकर ऑपरेशन कराता। वापस करता भी तो कैसे? यह मेरे लिए उस समय असंभव ही था। मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। अचानक मुझे गुरुदेव के वे शब्द याद आये कि बेटा ‘तुम हमारा काम करो, हम तुम्हारा काम करेंगे।’
🔴 तुरन्त मैंने हरिद्वार जाने की व्यवस्था बनाई। शान्तिकुञ्ज पहुँचकर डॉ० प्रणव पण्ड्या जी भाई साहब को अपनी रिपोर्ट दिखाई। दवा आदि का पर्चा भी दिखाया। डॉ० साहब भी बोले, स्थिति तो ऑपरेशन की ही बन रही है। फिर मैं गुरुदेव के पास गया। उनसे सारी बातें बताई। रिपोर्ट और सारे पर्चे भी दिखाए। गुरुदेव बोले- तुम्हें कुछ नहीं होगा। तुम्हें कोई बीमारी नहीं है। जाओ मन लगाकर काम करो। खूब साइकिल चलाना। तुम्हें कुछ नहीं होगा।
🔵 कहते हैं, गुरु का वाक्य ब्रह्मवाक्य होता है। गुरुदेव का वह वाक्य सचमुच मेरे लिए ब्रह्मवाक्य बन गया। मैं आज तक पूरी तरह स्वस्थ हूँ। मुझे किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं है। गुरुदेव की कृपा से मेरा जीवन संकट बड़ी आसानी से टल गया। मैं उस परमसत्ता का बहुत ऋणी हूँ, जिन्होंने मुझ अकिंचन पर अहैतुक कृपा की। मैं आज भी तन- मन से गुरु कार्य में संलग्न हूँ।
🌹 बिजलेश्वरी प्रसाद कसेरा चौक बाजार, बलरामपुर (उ.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/guru.1
👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 26)
🌹 आगे बढ़ें और लक्ष्य तक पहुँचें
🔴 उन दिनों जर्मनी मित्र राष्ट्रों के साथ पूरी शक्ति झोंककर लड़ रहा था। इंग्लैण्ड के साथ रूस और अमेरिका भी थे। वे बड़ी मार से अचकचाने लगे और हर्जाना देकर पीछा छुड़ाने की बात सोचने लगे। बात इंग्लैण्ड के प्रधानमन्त्री चर्चिल के सामने आई, तो उन्होंने त्यौरी बदलकर कहा आप लोग जैसा चाहें सोच या कर सकते हैं; पर इंग्लैण्ड कभी हारने वाला नहीं है। वह आप दोनों के बिना भी अपनी लड़ाई आप लड़ लेगा और जीतकर दिखा देगा। इस प्रचण्ड आत्मविश्वास को देखकर दोनों साथी भी ठिठक गए और लड़ाई छोड़ भागने से रुक गए। डार्विन के कथनानुसार बन्दर की औलाद बताया गया मनुष्य, आज इसी कारण सृष्टि का मुकुटमणि बन चुका है और धरती या समुद्र पर ही नहीं, अन्तरिक्ष पर भी अपना आधिपत्य जमा रहा है। कभी के समर्थ देवता चन्द्रमा को उसने अपने पैरों तले बैठने के लिए विवश कर दिया है।
🔵 लकड़ी का लट्ठा पानी में तभी तक डूबा रहता है, जब तक कि उसकी पीठ पर भारी पत्थर बँधा हो। यदि उस वजन को उतार दिया जाए, तो छुटकारा पाते ही नदी की लहरों पर तैरने लगता है और भँवरों को पार करते हुए दनदनाता हुआ आगे बढ़ता है। राख की मोटी परत चढ़ जाने पर जलता हुआ अंगारा भी नगण्य मालूम पड़ता है; पर परत हटते ही वह अपनी जाज्वल्यमान ऊर्जा का परिचय देने लगता है। वस्तुत: मनुष्य अपने सृजेता की तरह ही सामर्थ्यवान है।
🔴 लकड़ियों को घिसकर आग पैदा कर लेने वाला मनुष्य अपने अन्दर विद्यमान सशक्त प्रतिभा को अपने बलबूते बिना किसी का अहसान लिए प्रकट न कर सके, ऐसी कोई बात नहीं। आवश्यकता केवल प्रबल इच्छा शक्ति एवं उत्कण्ठा की है। उसकी कमी न पड़ने दी जाए, तो मनुष्य अपनी उस क्षमता को प्रकट कर सकता है, जो न तो देवताओं से कम है और न दानवों से। जब वह घिनौने कार्य पर उतरता है, तो प्रेत-पिशाचों से भी भयंकर दीखता है। जब वह अपनी श्रेष्ठता को उभारने, कार्यान्वित करने में जुट जाता है, तो देवता भी उसे नमन करते हैं। मनुष्य ही है, जिसके कलेवर में बार-बार भगवान अवतार धारण करते हैं। मनुष्य ही है, जिसकी अभ्यर्थना पाने के लिए देवता लालायित रहते हैं और वैसा कुछ मिल जाने पर वरदानों से उसे निहाल करते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 उन दिनों जर्मनी मित्र राष्ट्रों के साथ पूरी शक्ति झोंककर लड़ रहा था। इंग्लैण्ड के साथ रूस और अमेरिका भी थे। वे बड़ी मार से अचकचाने लगे और हर्जाना देकर पीछा छुड़ाने की बात सोचने लगे। बात इंग्लैण्ड के प्रधानमन्त्री चर्चिल के सामने आई, तो उन्होंने त्यौरी बदलकर कहा आप लोग जैसा चाहें सोच या कर सकते हैं; पर इंग्लैण्ड कभी हारने वाला नहीं है। वह आप दोनों के बिना भी अपनी लड़ाई आप लड़ लेगा और जीतकर दिखा देगा। इस प्रचण्ड आत्मविश्वास को देखकर दोनों साथी भी ठिठक गए और लड़ाई छोड़ भागने से रुक गए। डार्विन के कथनानुसार बन्दर की औलाद बताया गया मनुष्य, आज इसी कारण सृष्टि का मुकुटमणि बन चुका है और धरती या समुद्र पर ही नहीं, अन्तरिक्ष पर भी अपना आधिपत्य जमा रहा है। कभी के समर्थ देवता चन्द्रमा को उसने अपने पैरों तले बैठने के लिए विवश कर दिया है।
🔵 लकड़ी का लट्ठा पानी में तभी तक डूबा रहता है, जब तक कि उसकी पीठ पर भारी पत्थर बँधा हो। यदि उस वजन को उतार दिया जाए, तो छुटकारा पाते ही नदी की लहरों पर तैरने लगता है और भँवरों को पार करते हुए दनदनाता हुआ आगे बढ़ता है। राख की मोटी परत चढ़ जाने पर जलता हुआ अंगारा भी नगण्य मालूम पड़ता है; पर परत हटते ही वह अपनी जाज्वल्यमान ऊर्जा का परिचय देने लगता है। वस्तुत: मनुष्य अपने सृजेता की तरह ही सामर्थ्यवान है।
🔴 लकड़ियों को घिसकर आग पैदा कर लेने वाला मनुष्य अपने अन्दर विद्यमान सशक्त प्रतिभा को अपने बलबूते बिना किसी का अहसान लिए प्रकट न कर सके, ऐसी कोई बात नहीं। आवश्यकता केवल प्रबल इच्छा शक्ति एवं उत्कण्ठा की है। उसकी कमी न पड़ने दी जाए, तो मनुष्य अपनी उस क्षमता को प्रकट कर सकता है, जो न तो देवताओं से कम है और न दानवों से। जब वह घिनौने कार्य पर उतरता है, तो प्रेत-पिशाचों से भी भयंकर दीखता है। जब वह अपनी श्रेष्ठता को उभारने, कार्यान्वित करने में जुट जाता है, तो देवता भी उसे नमन करते हैं। मनुष्य ही है, जिसके कलेवर में बार-बार भगवान अवतार धारण करते हैं। मनुष्य ही है, जिसकी अभ्यर्थना पाने के लिए देवता लालायित रहते हैं और वैसा कुछ मिल जाने पर वरदानों से उसे निहाल करते हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026
शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...



















