मंगलवार, 21 मार्च 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 21)

🌹 जीवन-साधना एवं ईश-उपासना

🔵 नैवेद्य चढ़ाने का तात्पर्य है-अपने स्वभाव और व्यवहार में मधुरता का अधिकाधिक समावेश करना। जप का उद्देश्य है-अपने मन:क्षेत्र में निर्धारित प्रकाश परिपूर्णता का समावेश करने के लिये उसकी रट लगाये रहना। ध्यान का अर्थ है-अपनी मानसिकता को लक्ष्य-विशेष पर अविचल भाव से केन्द्रीभूत किये रहना। प्राणायाम का प्रयोजन है-अपने आपको हर दृष्टि से प्राणवान्, प्रखर व प्रतिभा संपन्न बनाये रहना।          

🔴 समूचे साधना विज्ञान का तत्त्वदर्शन इस बात पर केन्द्रीभूत है कि जीवनचर्या का बहिरंग और अंतरंग-पक्ष निरंतर मानवीय गरिमा के उपयुक्त साँचे में ढलता रहे-कषाय-कल्मषों के दोष-दुर्गुण जहाँ भी छिपे हुए हों, उनका निराकरण होता चले। मनुष्य जितना ही निर्मल होता है, उसे उसी तत्परता के साथ आत्मा के दर्पण में ईश्वर की झाँकी होने लगती है। इसी को प्रसुप्ति का जागरण में परिवर्तित होना कहते हैं। आत्मज्ञान की उपलब्धि या आत्म-साक्षात्कार यही है। इस दिशा में जो जितना बढ़ पाते हैं, उन्हें उसी स्तर का सुविकसित सिद्धपुरुष या महामानव समझा जाता है।

🔵  सड़क चलने में सहायता तो करती है, पर उसे पार करने के लिये पैरों का पुरुषार्थ ही काम देता है। भजन-पूजन तो एक प्रकार का जलस्नान है, जिससे शरीर पर जमी हुई मलीनता दूर होती है। यह आवश्यक होते हुए भी समग्र नहीं है। जीवन धारण किये रहने के लिये तो खाना-पीना सोना-जागना आदि भी आवश्यक है। पूजा-अर्चा का महत्त्व समझा जाये किन्तु यह मान बैठने की भूल न की जाये कि आत्मिक प्रगति में पात्रता और प्रामाणिकता की उपेक्षा की जाने लगे या मान लिया जाये कि क्रिया-कृत्यों से ही अध्यात्म का समस्त प्रयोजन पूरा हो जाएगा। यदि वरिष्ठता और महत्ता की जाँच-पड़ताल करनी हो तो एक ही बात खोजनी चाहिये कि व्यक्ति सामान्यजनों की अपेक्षा अपने व्यक्तित्व, चिंतन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता का अधिक समावेश कर सका या नहीं?          
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 को धर्मानुद्धरिष्यसि?

हिमालय के हिमशिखरों से बहती हुई बासन्ती बयार हमारे दिलों को छूने आज फिर आ पहुँची है। इस बयार में दुर्गम हिमालय में महातप कर रहे महा-ऋषिय...