शुक्रवार, 3 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 04 March 2017


👉 आसान होता गया शान्तिकुञ्ज का सफर

🔴 जब मैं पहली बार शान्तिकुञ्ज जा रहा था तो पत्नी बहुत रोई थी। उसे किसी ने कह दिया था वहाँ जाने वाले लौटते नहीं, वहीं के हो जाते हैं। उसे संदेह था- कहीं मैं संन्यासी न बन जाऊँ। मैंने समझाया- गुरुदेव स्वयं गृहस्थ हैं। वे हमेशा कहा करते हैं, गृहस्थ एक तपोवन है। सबसे बड़ी तपस्या वहीं होती है, फिर मुझे संन्यास की जरूरत ही क्या है? मैं तो केवल उनके दर्शन करने जा रहा हूँ। इस प्रकार की ढेर सारी बातें करके उसे बड़ी मुश्किल से मना पाया था।

🔵 मैं उन दिनों गायत्री परिवार से पहले- पहल जुड़ा था। गुरुदेव का सत्साहित्य पढ़ता रहा था। सन् १९८६ में जब गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना चल रही थी, उन्हीं दिनों दीवार लेखन तथा अखण्ड ज्योति वितरण का कार्य मुझे मिला। इसी वर्ष ३ फरवरी को गर्दनीबाग, पटना के नौ कुण्डीय यज्ञ में मैंने दीक्षा ली थी। उसी समय श्री चन्द्रशेखर प्रसाद जी (अब स्वर्गवासी) का सान्निध्य प्राप्त हुआ। ये गुरुदेव के समर्पित शिष्यों में से थे। इनके व्यक्तित्व से मैं काफी प्रभावित था।

🔴 एक दिन अचानक प्रसाद जी ने मुझसे कहा- आप हरिद्वार चलें। उन्हीं से मालूम हुआ- गुरुदेव ने अपनी सूक्ष्मीकरण साधना के समापन पर सभी नैष्ठिक शिष्यों को पास बुलाया है। उनके पास पत्र आया था, वे चाहते थे मैं भी साथ चलूँ। मैं तो पहले ही अखण्ड ज्योति और युग निर्माण साहित्य से इतना प्रभावित था कि इनके सूत्रधार इस युगपुरुष के दर्शनों के लिए आतुर- सा था। मैं सानन्द चलने को तैयार हो गया।

🔵 होली के बाद पटना से रवाना होना था। होली के अगले दिन घर से चला, खजूरिया चौक पहुँचकर देखा कोई यात्री वाहन नहीं चल रहा है। एक ट्रक वाले से अनुरोध किया तो उसने मुजफ्फरपुर तक पहुँचा देना स्वीकार किया। रास्ते में ड्राइवर को गायत्री मंत्र के विषय में बताया तो उसने उत्साहपूर्वक मुझसे स्टीकर लेकर गाड़ी में चिपका लिया, जबकि वह ड्राइवर मुस्लिम था।

🔴 मुजफ्फरपुर में जहाँ ट्रक से उतरा वहीं तत्काल कार वाले एक साहब ने लिफ्ट दे दी। इस तरह बिना किसी अड़चन के मैं पटना पहुँच गया। अगले दिन सुबह हम चार लोग पटना से रवाना हुए। यहाँ भी अकल्पनीय रूप से हम सभी को खाली बर्थ मिल गई, जबकि हमारा रिजर्वेशन नहीं था। मन आनंद और उमंग से भरा था। विपरीत परिस्थिति रहते हुए भी मार्ग में सर्वत्र अनुकूलता बनती चली गई। ऐसा लग रहा था जैसे गुरुदेव ने मुझे भी बुलाया हो, तभी तो रास्ते के सारे अवरोध सारी प्रतिकूलताएँ अपने आप ही दूर होती जा रही हैं।       

🔵 प्रातःकाल हरिद्वार पहुँचा, और फिर मेरे सामने था बहुप्रतीक्षित अपना वह गुरुद्वारा- गायत्री तीर्थ, शांतिकुंज! कितनी पवित्र शांति! गंगा की गोद में बसा यह तीर्थ- दर्शन कर निहाल हो गया। गंगा स्नान के बाद भोजन प्रसाद लिया। अब, बस इस बात की प्रतीक्षा थी कि कब गुरुदेव के दर्शन हों।

🔴 दोपहर साढ़े बारह बजे गोष्ठी थी। यात्रा से सभी थके हुए थे, वे सोने की तैयारी कर रहे थे। मैं सोना नहीं चाहता था। भय था कहीं गहरी नींद सो जाऊँ, तो अवसर चूक सकता है। सोचा, गोष्ठी के बाद सो लूँगा। लेकिन इतनी विकल प्रतीक्षा के बावजूद रात्रि की थकान ने असर दिखाया और कब सो गया, इसका पता ही नहीं चला। अचानक ऐसा लगा कि किसी ने झकझोरकर जगाया हो- गोष्ठी में नहीं जाना क्या? मेरी नींद खुल गई, देखा आसपास कोई नहीं है, जल्दी- जल्दी हाथ- मुँह धोकर गोष्ठी में पहुँचा।

🔵 गोष्ठी के पहले घोषणा की गई- जिन्हें गुरुदेव का पत्र मिला है, वे अपना नाम दें- गुरुदेव ने माँगा है। मैं निराश हो गया- मुझे तो पत्र नहीं मिला था, द्वार तक पहुँचकर भी दर्शन से वंचित रह गया- सोचकर अंतर तक व्यथित हो उठा, आँखों में आँसू आ गए। परन्तु अगले ही क्षण फिर घोषणा हुई- यदि कोई व्यक्ति स्वयं को क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम समझते हैं, तो वे भी अपना नाम दें। उम्मीद जगी, मैंने अपना नाम दे दिया और इस तरह गुरुदेव के पास जाने की व्यवस्था बन गई।

🔴 गुरुदेव के सम्मुख पहुँचा तो पुरुषार्थ की उस प्रतिमा को देख कर ऐसा लगा कि ये तो स्वयं महाकाल हैं। दर्शन पाकर धन्य हो गया। उन्होंने कहा था- बेटा, मैं व्यक्ति नहीं, एक शक्ति हूँ। यह जो हाड़- मांस का पुतला देख रहे हो, यह मेरा स्थूल रूप है।

🔵 उनका निर्देश था- जीवन में स्वाध्याय और सत्संग कभी मत छोड़ना। दुनिया पेट और प्रजनन में मर खप जाती है। तुम उससे अलग हटकर रहना। गुरुदेव की प्रेरणा मुझे आज भी अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का संबल देती है। 

🌹 मनोजित दासगुप्ता टाटा- जमशेदपुर (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/aasan

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 11)

🌹 प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं   

🔴 नेपोलियन भयंकर युद्ध में फँसा था। साथ में एक साथी था। सामने से गोली चल रही थी। घबराने लगा तो नेपोलियन ने कहा-डरो मत, वह गोली अभी किसी फैक्टरी में ढली नहीं है, जो मेरा सीना चीरे।’ वह उसी संकट में घिरा होने पर भी दनदनाता चला गया और एक ही हुंकार में समूची शत्रुसेना को अपना सहायक एवं अनुयायी बना लिया। प्रतिभा ऐसी ही होती है।            

🔵 अमेरिका का अब्राहम लिंकन, जार्ज वाशिंगटन, इटली के गैरीबाल्डी आदि की गाथाएँ भी ऐसी हैं कि वे गई-गुजरी परिस्थितियों का सामना करते हुए जनमानस पर छाए और राष्ट्रपति पद तक पहुँचने में सफल हुए। लेनिन के बारे में जो जानते हैं, उन्हें विदित है कि साम्यवाद के सूत्रधार के रूप में उसने क्या से क्या करके दिखा दिया।     

🔴 विनोबा का भूदान आन्दोलन, जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रान्ति सहज ही भुलाई नहीं जा सकती। भामाशाह की उदारता देश के कितने काम आई। बाबा साहब आमटे द्वारा की गई पिछड़ों की सेवा एक जीवन्त आदर्श के रूप में अभी भी विद्यमान है। विश्वव्यापी स्काउट आन्दोलन को खड़ा करने वाले वेडेन पावेल की सृजनात्मक प्रतिभा को किस प्रकार कोई विस्मृत कर सकता है। सुभाषचन्द्र बोस की आजाद हिन्द सेना अविस्मरणीय है।     

🔵 भारतीय साहित्यकारों के उत्थान की गाथाओं में कुछ के संस्मरण बड़े प्रेरणाप्रद हैं। पुस्तकों का बक्सा सिर पर रखकर फेरी लगाने वाले भगवती प्रसाद वाजपेयी, भिक्षान्न से पले बालकृष्ण शर्मा ‘‘नवीन’’ भैंस चराने वाले रामवृक्ष बेनीपुरी आदि घोर विपन्नताओं से ऊँचे उठकर मूर्धन्य साहित्यकार बने थे। शहर के कूड़ों में से चिथड़े बटोरकर गुजारा करने वाले गोर्की विश्वविख्यात साहित्यकार हो चुके हैं। यह सब प्रतिभा का ही चमत्कार है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 एकाग्रचित्त काम-बहुत बड़े परिणाम

🔴 इंग्लैंड के इतिहास में 'एल्फ्रेड' का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। एल्फ्रेड ने प्रजा की भलाई के लिए अनेक साहसिक कार्य किए जिससे वह महान् एल्फ्रेड (एल्फ्रेड द ग्रेट) के नाम से जाना जाता है।

🔵 प्रारंभ में एल्फ्रेड भी एक साधारण राजा की तरह जो बाप-दादों से होता आया है वह चाहे अच्छा या हो बुरा करने की अंधविश्वासी प्रवत्ति के कारण वह सामान्य व्यक्तियों का सा खाओ पियो और वैभव विलास में डूबे रहो ? जीवन जीने लगा। समुद्र में पडा़ तिनका जिस तरह लहरों के साथ उठता-गिरता है, वैसे ही अस्त व्यस्त जीवन एल्फ्रेड का भी था। एक दिन ऐसा भी आया, जब उसकी यह सुस्ती शत्रुओं के लिये लाभदायक सिद्ध हुई। एल्फ्रेड का राज्य औरों ने हडप लिया और उसे गद्दी से उतारकर मार गिराया।

🔴 इधर-उधर मारे-मारे फिर रहे एल्फ्रेड को एककिसान के घर नौकरी करनी पडी उसे बर्तन माँजने, पानी भरने और चौके का काम सौंपा गया, उसके काम की देख रेख किसान की स्त्री करती थी। एल्फ्रेड छिपे वेष में जिंदगी काटने लगा।

🔵 एक दिन किसान की स्त्री को किसी आवश्यक काम से बाहर जाना पड़ा। बटलोई पर दाल चढी़ थी, सो उसने एल्फ्रेड से कहा कि जब तक मैं वापिस नही आ जाती तुम बटलोई की दाल का ध्याना रखना यह कहकर स्त्री चली गई।

🔴 वहाँ से काम पूरा कर लौटी तो स्त्री ने देखा, एल्फ्रेड एक ओर बैठा कुछ सोच रहा है ओर बटलोई की सारी दाल जल चुकी है। स्त्री ने कहा-मूर्ख नवयुवक। लगता है तुझ पर एल्फ्रेड की छाया पड़ गई है, जो काम सौंपा जाता है उसे कभी एकाग्र चित्त होकर पूरा नहीं करता। तू भी उसकी तरह मारा-मारा घूमेगा।

🔵 स्त्री बेचारी को क्या पता था कि जिससे वह बात कर रही है वह एल्फ्रेड ही है, पर एल्फ्रेड को अपनी भूल का पता चल गया। उसने बात गाँठ बाँध ली, आज से जो कुछ भी करुँगा दत्तचित्त होकर करुंगा। कल्पना के किले बनाते रहने से कोई लाभ नहीं।

🔴 एल्फ्रेड एक बार फिर सहयोगियों से मिला। धन संग्रह किया, सेना एकत्र की और फिर दुश्मनों पर चढा़ई करके लंदन को फिर से जीत लिया। इस बार उसने सारे इंग्लैण्ड को एक सूत्र में बाँधकर नये उत्साह, सूझ-बूझ और एकाग्रता से काम किया, जिससे देश की उन्नति हुई।

🔵 एक दिन एल्फ्रेड़ फिर उस किसान स्त्री के घर गया और उसे बहुत-सा धन देकर कहा-माँ तूने उस दिन शिक्षा न दी होती तो मैं इस स्थिति पर नही पहुँचता। छोटे की भी अच्छी बात मानने के एल्फ्रेड के इस गुण की प्रशंसा की जाती है। स्त्री तो आश्चर्य में डूब गई कि मैंने उस दिन इतने महान आदमी को अनजान में यह शब्द कह दिये।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 62, 63

👉 वशीकरण विद्या

🔵 संत दादू के पास एक महिला आई। उसका पति रुष्ट रहता था। घर की अनबन से निरन्तर अशाँति बनी रहती थी। महिला ने अपनी दुःखी गाथा संत से कही और कष्ट निवारण के लिए वशीकरण कवच माँगा।

🔴 संत ने उसे समझाया कि पति के दोष दुर्गुणों का विचार न करते हुए तुम सच्चे मन से उसकी सेवा करो। प्रेम से पशु भी वश में हो जाते हैं, मनुष्य की तो बात ही क्या है?

🔵 महिला को इससे संतोष न हुआ। वह वशीकरण कवच की ही माँग करती रही। अन्त में दादू जी ने एक कागज पर दो लाइन उसे लिखकर दे दीं और कहा- यह कवच है इसे पहनना और मेरे कहे अनुसार पति की प्रेमपूर्वक सेवा करना।

🔴 एक वर्ष बाद वह महिला बहुत सी भेंट उपहार लेकर आई। उसका पति वश में हो चुका था ‘घर का नरक स्वर्ग में परिणत हो चुका था। श्रद्धापूर्वक उसने संत के चरणों में मस्तक नवाते हुए भेंट प्रस्तुत की और वशीकरण कवच की बड़ी प्रशंसा करने लगी।

🔵 दादू ने उपस्थित लोगों से कहा-आप लोग भी यह वशीकरण विद्या सीख लें। महिला से उन्होंने कवच वापिस लेकर उसे खोला और सबको दिखाया। उसमें एक दोहा लिखा था-

दोहा-दोष देख मत क्रोध कर, मन से शंका खोय।
प्रेम भरी सेवा लगन से, पति वश में होय॥


🌹 अखण्ड ज्योति जून 1964

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 27)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं

🔴 साधारण मनोरंजन, कार्यों तथा व्यवहारों में इस रहस्य को आये दिन देखा जा सकता है कि जो काम दूसरों को प्रसन्न करने वाले होते हैं अथवा जिन कामों में हम दूसरों को प्रसन्न कर पाते हैं वे ही काम हमें अधिक से अधिक प्रसन्न किया करते हैं। एक खिलाड़ी गेंद खेलता है और विपक्ष पर एक गोल कर देता है तो उसे अपनी सफलता पर प्रसन्नता होती है; किन्तु तभी जब उसके साथी भी प्रसन्न होते हैं। यदि किसी कारण से उसकी यह सफलता दर्शकों अथवा साथियों को प्रसन्न न कर पाये तो उसे स्वयं भी प्रसन्नता न होगी।

🔵 एक शिल्पी भवन अथवा मन्दिर बनाता है। यद्यपि वह उसका नहीं होता तथापि वह इसलिए प्रसन्न होता है कि उसका यह काम दूसरों को प्रसन्न कर सका है। इसी प्रकार कोई चित्रकार, कलाकार अथवा कवि कोई रचना करता है तो उसे प्रसन्नता होती है, उसे अपनी कृति अच्छी लगती है। किन्तु उसकी प्रसन्नता में वास्तविकता तभी आती है जब दूसरे भी प्रसन्न होते हैं। संयोगवश यदि उसका सृजन अन्य किसी की प्रसन्नता का सम्पादन न कर सके तो अपनी होते हुए भी कला में कोई रुचि न रहेगी वह उसे बेकार समझेगा और उसकी प्रसन्नता जाती रहेगी।

🔴 वास्तविक प्रसन्नता का मूल रहस्य दूसरों की प्रसन्नता में निहित है। जो परोपकारी व्यक्ति दूसरों के सुख के लिए जीते हैं उनके कार्य औरों की सेवा रूप होते हैं। वे अपने जीवन में साधन शून्य रहने पर भी प्रसन्न सन्तुष्ट एवं सुखी रहते हैं। जिसकी जीवन में वास्तविक प्रसन्नता की जिज्ञासा हो वह अपने जीवन को यज्ञमय बनाये, नित्य निरन्तर दूसरों का हित साधन करे जिससे कि वह अपनी वांछित वस्तु प्रसन्नता को नित्य निरन्तर पाता रहे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 5)

🌹 चेतना की सत्ता एवं उसका विस्तार

🔵 चतुरता के बलबूते अपने यहाँ तो अनेक अपराधी दंड पाने से बच जाते हैं, पर सर्वव्यापी और सर्वसाक्षी न्यायाधीश के न्याय में किसी को ऐसे अवसर नहीं मिलते । इस वास्तविकता से असहमत रहने के कारण ही लोग प्राय: नास्तिक बन जाते हैं— कर्मफल की मान्यता का उपहास उड़ाते हुए स्वेच्छाचार बरतते हैं। विवेक होने की समझ तभी आती है जब समयानुसार क्रिया की प्रतिक्रिया सामने आ खड़ी होती है।         

🔴 यहाँ तो प्रसंग इस बात का चल रहा है कि ईश्वर और जीव आपस में अविच्छिन्न होकर रह रहे हैं-अत्यंत सघन भाव और अविच्छिन्न साथी-सहचर की तरह। स्थिति को देखते हुए इस बात की पूरी गुंजाइश है कि समर्थ बीज से उपजा समर्थ बालक अभीष्ट सहयोग प्राप्त कर सके और अभावग्रस्तता की दु:खदाई स्थिति से सरलतापूर्वक छूट सके। पर प्रचलित विडंबनाओं में से एक यह भी है कि नितांत निकट रहते हुए भी परिचय ऐसा बना लिया गया है, मानो एक दूसरे से नितांत अपरिचित हैं। कभी-कभी ऐसा देखा गया है कि विशालकाय नगरों में एक ही बड़े भवन की चारदीवारी में रहने वाले किरायेदार एक-दूसरे से परिचित तक नहीं होते।

🔵 हम अपने शरीर के भीतरी अवयवों को भी पूरी तरह कहाँ समझ पाते हैं! शरीर में समाये विषाणुओं का पता नहीं चलता और यह भी नहीं बन पड़ता कि उनके कारण उत्पन्न होने वाले खतरों को समझ सकें और समय रहते कुछ उपाय-उपचार कर सकें। समझदार कहे जाने वाले मनुष्य के इस भुलक्कड़पन को देखते हुए उसे नासमझ कहा जाए तो कुछ भी अनुचित न होगा। स्वस्थ दीखने वाले भी अस्वस्थता से जकड़े हुए हैं-घुन लगी लकड़ी की तरह भीतर ही भीतर पोले हो रहे हैं; स्थिति इतनी बदतर है कि अणु से लेकर विराट् विभु के कण-कण में एक अत्यंत सुव्यवस्था के संव्याप्त होने पर भी अपनी अकल यही धोखा देती रहती है कि इस खेत का कोई बोने वाला या रखवाला नहीं है-चाहे जो करने और चाहे जो पाने की मनमानी करते रहने में कोई हर्ज नहीं। आम प्रचलन में इन दिनों ऐसे ही सोच की भरमार है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 9)

🌹 दीक्षा क्या? किससे लें?

🔴 हम अपने अन्तरंग की पुकार को सुनें और संकल्प करें कि अपनी जीवात्मा को जो हमारा वास्तविक स्वरूप है, सुखी व समुन्नत बनाने के लिए अपनी बाह्य और भौतिक शक्तियों का इस्तेमाल करेंगे। हमारे पास शारीरिक शक्ति है, हम अपनी जीवात्मा को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए उस शारीरिक शक्ति को खर्च करेंगे। हमारे पास बुद्धि है, हम उस बुद्धि को अपने जीवात्मा को सुखी और समुन्नत बनाने में खर्च करेंगे। हमारे पास जो धन है, उसे हम अपनी जीवात्मा को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए खर्च करेंगे। हमारा जो प्रभाव, वर्चस् संसार में है, उससे अपनी जीवात्मा को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए खर्च करेंगे।

🔴 जीवात्मा को सुखी और समुन्नत कैसे बनाया जा सकता है? यह कई बार बताया जा चुका है और हजार बार बताया जाना चाहिए। उसके सिर्फ दो ही रास्ते हैं। एक रास्ता यह कि मनुष्य शुद्ध और निर्मल जीवन जिये। निर्मल जीवन जीने से आदमी की अपार शक्ति का उदय होता है। आदमी की सारी शक्ति का जो क्षय हो रहा है, वह नष्ट हो रही है, आदमी जो छोटा बना हुआ है, कमीना बना हुआ है, शक्तिहीन बना हुआ है दुर्बल बना हुआ है, इसका कारण एक ही है कि मनुष्य ने अपनी शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को छोटे किस्म का बनाया हुआ है।

🔵 अगर आदमी अपनी गतिविधियों को छोटे किस्म का बना कर न रखे, ऊँचे किस्म का बनाकर रखे, अपने आचरण ऊँचे रखे, अपनी इन्द्रियों के ऊपर संयम रखे, अपनी वाणी पर संयम रखे और अपने विचारों पर संयम रखे ; तब वह आदमी छोटा नहीं हो सकता। तब आदमी के अन्तरंग में दबी हुई शक्तियाँ दबी हुई नहीं रह सकतीं। मामूली- सा आदमी क्यों न हो, लेकिन उसकी भी वाणी इतनी प्रभावशाली हो सकती है कि मैं क्या कह सकता हूँ? उसका सोचने का तरीका कितना उत्कृष्ट हो सकता है कि मैं उससे क्या कहूँ? आदमी का प्रभाव इतना ज्यादा हो सकता है और आदमी के अन्तरंग में इतनी शान्ति हो सकती है कि उस शान्ति को वह चाहे, तो लाखों मनुष्यों पर बिखेर सकता है। उसकी वाणी में वह सामर्थ्य हो सकती है कि अपनी वाणी के प्रभाव से न केवल मनुष्यों को बल्कि दूसरे जीव- जन्तुओं को भी प्रभावित कर सकता है।     

🔴 अगर आदमी अपनी वासना और तृष्णा पर काबू कर ले, तब उसका मस्तिष्क तेज हो जाता है। वह एकान्त में बैठा है, तब भी उसके विचार सारी दुनिया में व्याप्त हो सकते हैं। अगर आदमी अपना जीवन निर्मल जिए। सारी दुनिया के विचारों से टक्कर लेने और उन्हें ऊँचा उठाने में समर्थ हो सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 67)


🌹 प्रवास का दूसरा चरण एवं कार्य क्षेत्र का निर्धारण
 
🔴 चर्चा एक से चल रही थी, पर निमंत्रण पहुँचते ही एक क्षण लगा और वे सभी एक-एक करके एकत्रित हो गए। निराशा गई, आशा बँधी और आगे का कार्यक्रम बना कि जो हम सब करते रहे हैं, उसका बीज एक खेत में बोया जाए और पौधशाला तैयार की जाए उसके पौधे सर्वत्र लगेंगे और उद्यान लहलहाने लगेगा।

🔵 यह शान्तिकुञ्ज बनाने की योजना थी, जो हमें मथुरा के निर्धारित निवास के बाद पूरी करनी थी। गायत्री नगर बसने और ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान का ढाँचा खड़ा किए जाने की योजना भी विस्तार से समझाई गई। पूरे ध्यान से उसका एक-एक अक्षर हृदय पटल पर लिख लिया और निश्चय किया कि 24 लक्ष का पुरश्चरण पूरा होते ही इस कार्यक्रम की रूपरेखा बनेगी और चलेगी। निश्चय ही, अवश्य ही और जिसे गुरुदेव का संरक्षण प्राप्त हो वह असफल रहे ऐसा हो ही नहीं सकता।

🔴 एक दिन और रुका। उसमें गुरुदेव ने पुरश्चरण की पूर्णाहुति का स्वरूप विस्तार से समझाया एवं कहा कि ‘‘पिछले वर्षों की स्थिति और घटनाक्रम को हम बारीकी से देखते रहे हैं और उसमें जहाँ कुछ अनुपयुक्त जँचा है, उसे ठीक करते रहे हैं। अब आगे क्या करना है, उसी का स्वरूप समझाने के लिए इस बार बुलाया गया है। पुरश्चरण पूरा होने में अब बहुत समय नहीं रहा है, जो रहा है उसे मथुरा जाकर पूरा करना चाहिए। अब तुम्हारे जीवन का दूसरा चरण मथुरा से आरम्भ होगा।

🔵 प्रयाग के बाद मथुरा ही देश का मध्य केन्द्र है। आवागमन की दृष्टि से वही सुविधाजनक भी है। स्वराज्य हो जाने के बाद तुम्हारा राजनैतिक उत्तरदायित्व तो पूरा हो जाएगा, पर वह कार्य अभी पूरा नहीं होगा। राजनैतिक क्रान्ति तो होगी, आर्थिक क्रान्ति तथा उससे सम्बन्धित कार्य भी सरकार करेगी, किन्तु इसके बाद तीन क्रान्तियाँ और शेष हैं-जिन्हें धर्म तंत्र के माध्यम से ही पूरा किया जाना है। उनके बिना पूर्णता न हो सकेगी। देश इसलिए पराधीन या जर्जर नहीं हुआ था कि यहाँ शूरवीर नहीं थे। आक्रमणकारियों को परास्त नहीं कर सकते थे। भीतरी दुर्बलताओं ने पतन पराभव के गर्त में धकेला। दूसरों ने तो उस दुर्बलता का लाभ भर उठाया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/prav.2

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 68)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू
🔴 बड़े- बड़े सत्संग, सम्मेलन होते तो, पर अपना जी किसी को देखने- सुनने के लिए न करता। प्रकाश मिला तो अपने भीतर। आत्मा ने ही हिम्मत की और चारों ओर जकड़े पड़े जंजाल को काटने की बहादुरी दिखाई, तो ही काम चला। दूसरों के सहारे बैठे रहते, तो ज्ञानी बनने वाले शायद अपने तरह हमें अज्ञानी बना देते। लगता है किसी को प्रकाश मिलना होगा, तो भीतर से ही मिलेगा। कम- से अपने सम्बन्ध में तो यही तथ्य सिद्ध हुआ है।

🔵 आत्मिक प्रगति में वाह्य अवरोधों के जो पहाड़ खड़े थे- उन्हें लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा रखे बिना, श्रेय पथ पर चलने का दुस्साहस संग्रह किये बिना निरस्त नहीं किया जा सकता था, सो अपनी हिम्मत ही काम आई। अब अड़ गये तो सहायकों की भी कमी नहीं। गुरुदेव से लेकर भगवान् तक सभी अपनी मंजिल को सरल बनाने में सहायता देने के लिए निरन्तर आते रहे और प्रगति पथ पर धीरे- धीरे किन्तु  सुदृढ़ कदम आगे ही बढ़ते चले गये। अब तक की मंजिल इसी क्रम से पूरी हुई है।

🔴 लोग कहते रहते हैं कि आध्यात्मिक जीवन कठिन है; पर अपनी अनुभूति इससे सर्वथा विपरीत है। वासनाओं और तृष्णाओं से घिरा और भरा जीवन ही वस्तुत: कठिन एवं जटिल है। इस स्तर का क्रिया- कलाप अपनाने वाला व्यक्ति जितना श्रम करता है, जितना चिन्तित रहता है, जितनी व्यर्थ वेदना सहता है, जितना उलझा रहता है, उसे देखते हुए आध्यात्मिक जीवन की असुविधा को तुलनात्मक दृष्टि से नगण्य ही कहा जा सकता है। इतना श्रम, इतना चिन्तन, इतना उद्वेग फिर भी क्षण भर भी चैन नहीं। कामना पूर्ति के लिए प्रथम प्रयास कर पूर्ति से पहले ही अभिलाषाओं का और सौ गुना हो जाना इतना बड़ा जंजाल है कि बड़ी- से सफलताएँ पाने के बाद भी व्यक्ति अतृप्त और असंतुष्ट ही बना रहता है। 

🔵 छोटी सफलता पाने के लिए कितने थकान वाला श्रम करना पड़ा था, यह जानते हुए भी उससे बड़ी सफलता पाने के लिए चौगुने, दस गुने उत्तरदायित्व और ओढ़ लेता है। गति जितनी तीव्र होती जाती है उतनी ही समस्याएँ उठती और उलझती हैं। उन्हें सुलझाने में देह, मन और आत्मा का कचूमर निकलता है। सामान्य शारीरिक और मानसिक श्रम सुरसा जैसी अभिलाषाओं को पूर्ण करने में समर्थ नहीं होता, अस्तु अनीति और अनाचार का मार्ग अपनाना पड़ता है। जघन्य पाप कर्म करते रहने पर अभिलाषाएँ पूर्ण नहीं होती हैं। निरन्तर की उव्दिग्नता और भविष्य की अंध तमिस्रा दोनों को मिलाकर जितनी क्षति है उसे देखते हुए उपलब्धियों को अति तुच्छ ही कहा जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamari_jivan_saadhna.2

गुरुवार, 2 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 03 March 2017


👉 निर्मूल सिद्ध हुई डॉक्टरों की आशंका

🔵 उन दिनों मैं जमालपुर शक्तिपीठ में समयदान कर रहा था। दो- तीन महीने के अन्तराल में घर भी हो आता था। इसी दौरान एक दिन मेरी पीठ पर छोटा- सा फोड़ा निकल आया। मैंने सोचा कि यह तो साधारण सी बात है। राई भर का फोड़ा है, ठीक हो जायेगा अपने आप। लेकिन फोड़ा था कि दिन- प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था। कुछ दिनों बाद जब घर पहुँचा, तो पत्नी को दिखाया। उसने फोड़े का मवाद निकालकर घर में रखा मरहम लगा दिया। लेकिन वह फोड़ा ठीक होने के बजाय और बड़ा हो गया। कार्य की व्यस्तताओं के कारण फोड़े की उपेक्षा होती रही। डॉक्टर को दिखाने के बजाय पत्नी का इलाज ही चलता रहा। साल बीतते- बीतते उसका आकार काफी बड़ा हो गया था। हमेशा असहनीय दर्द रहता। अब तो फोड़े से दुर्गन्ध भी आने लगी थी।

🔴 अन्ततः डॉक्टर अशोक मुखर्जी के क्लीनिक में दिखाया, तो उन्होंने चिन्तित स्वर में कहा- इतने दिन डिले नहीं करना चाहिए था। ऐसी देर से साधारण फोड़ा भी कैन्सर में बदल जाता है। आप अच्छी तरह से चेकअप करवाइये। कैन्सर टेस्ट भी अवश्य करा लें। कम- से निश्चिंत तो हो जाएँगे।

🔵 डॉ. मुखर्जी की बातों से मन चिंतित हो गया। किसी दूसरे डॉक्टर की राय भी ले ली जाए, यह सोचकर धनबाद के एक सर्जन डॉ. ए.के. सहाय से मिला। उन्होंने भी फोड़े को देखकर यही संदेह जताया कि कैन्सर हो सकता है। उन्होंने कई प्रकार की दवाएँ दीं, लेकिन बीमारी घटने के बजाय बढ़ती ही गई। मवाद का निकलना इस कदर बढ़ गया था कि एक दिन के अन्तराल पर ड्रेसिंग कराना अनिवार्य हो गया।

🔴 कैन्सर के अन्देशे के कारण कोई भी डॉक्टर ऑपरेशन करने के लिए तैयार नहीं था। जब फोड़ा बढ़ते- बढ़ते नीबू के आकार का हो गया तो बनारस के कैन्सर के विशेषज्ञ डॉ. एस.पी. सिंह के पास पहुँचा। वे भी खतरे की आशंका से ऑपरेशन के लिए तैयार नहीं हुए।

🔵 मेरे इस कष्ट के निवारण के लिए मेरी पत्नी ने शांतिकुंज जाकर विशेष अनुष्ठान किया। वापस आकर उसने बताया- पूज्य गुरुदेव ने कहा है, कुछ नहीं होगा। साधारण सा फोड़ा है, काटकर हटा दे।

🔴 पूज्य गुरुदेव का आश्वासन मिल जाने के बाद मैंने एक बार फिर अपने पुराने डॉ. ए.के. सहाय से बात की। वे बड़ी मुश्किल से ऑपरेशन के लिए राजी हुए। उन्होंने फोड़ा काट कर हटा दिया। गुरुकृपा से बड़े- बड़े डॉक्टरों द्वारा व्यक्त की गई कैन्सर की आशंका निर्मूल सिद्ध हुई। 

🌹 त्रिवेणी प्रसाद अग्रवाल, गिरीडीह  (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/doc

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 10)

🌹 प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं    
🔴 जापान के गाँधी ‘कागावा’ ने उस देश के पिछड़े समुदाय को सभ्य एवं समर्थों की श्रेणी में ला खड़ा किया था।            

🔵 महामना मालवीय, स्वामी श्रद्धानन्द, योगी अरविन्द, राजा महेन्द्र प्रताप, रवीन्द्रनाथ टैगोर की स्थापित शिक्षा संस्थाओं ने कितनी उच्चस्तरीय प्रतिभाएँ विनिर्मित करके राष्ट्र को समर्पित कीं। इन घटनाक्रमों को भुलाया नहीं जा सकता। विवेकानन्द, दयानन्द आदि के द्वारा जो जन-कल्याण बन पड़ा, उसे असाधारण ही कहा जाएगा। प्रतिभाएँ सदा ऐसे ही कार्यक्रम हाथ में लेतीं और उसे पूरी करती हैं।   

🔴 रियासतों को भारत-गणतन्त्र में मिलाया जाना था। कुछ राजा सहमत नहीं हो रहे थे और अपनी शक्ति का परिचय देते हुए तलवार हिला रहे थे। सरदार पटेल ने कड़ककर कहा-इस तलवार से तो मेहतरों की झाडू अधिक सशक्त है, जो कुछ कर तो दिखाती है।’ राजाओं को पटेल के आगे समर्पण करना पड़ा है।   

🔵 राणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, राजा छत्रशाल आदि के पराक्रम प्रसिद्ध हैं, जिन्होंने स्वल्प-साधनों से जो लड़ाइयाँ लड़ीं, उन्हें असाधारण पराक्रम का प्रतीक ही माना जा सकता है। लक्ष्मीबाई ने तो महिलाओं की एक पूरी सेना खड़ी कर ली थी और समर्थ अँग्रेजों के छक्के ही छुड़ा दिए थे।

🔴 चाणक्य की जीवनी जिन्होंने पढ़ी है, वे जानते हैं कि परिस्थितियाँ एवं साधन नहीं, वरन् मनोबल के आधार पर क्या कुछ नहीं किया जा सकता है। शंकर दिग्विजय की गाथा बताती है कि मानवी प्रतिभा कितने साधन जुटा सकती और कितने बड़े काम करा सकती है? परशुराम ने समूचे विश्व के आततायियों का मानस किस प्रकार उलट दिया था, यह किसी से छिपा नहीं है। कुमारजीव ने एशिया के एक बड़े भाग को बौद्ध धर्म के अन्तर्गत लेकर कुछ ही समय में धार्मिक क्षेत्र की महाक्रान्ति कर दिखाई थी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रधान मंत्री की सादगी

🔴 यूनान के एक राजदूत ने भारत के प्रधान मंत्री चाणक्य की विद्वता, कूटनीतिज्ञता तथा सादगी की बात सुनी तो उनसे भेंट करने चल पडा। चाणक्य की कुटिया गंगा किनारे थी। वह राजदूत तलाश करता हुआ गंगा तट पर पहुँचा, उसने देखा कि एक बलिष्ठ व्यक्ति गंगा में नहा रहा है। थोडी ही देर में वह निकला, उसने पानी का एक घडा अपने कंधे पर रखा और चल दिया।

🔵 राजदूत ने पूछा- 'क्यों भाइ! मुझे चाणक्य के निवास स्थान का पता बताओगे।' उसने घास-फूस से निर्मित कुटी की ओर हाथ का संकेत कर दिया। राजदूत को बडा आश्चर्य हुआ कि मैंने तो प्रधान मंत्री का निवास पूछा और इसने तो कुटिया की ओर इशारा कर दिया। क्या इतने बड़े देश का प्रधानमंत्री इस कुटिया में रहता है। ऐसे विचार उसके मन में आते रहे।

🔴 पहले उस राजदूत ने गंगा स्नान करना उचित समझा, फि वह उसी कुटी पर पहुँचा। कुटी के बाहर से उसने देखा कि थोडे़ से बरतन रखे हैं। एक किनारे पर जल का वही घडा जो गंगा में से अभी भरकर आया था। एक खाट और मोटे-मोटे ग्रंथों का छोटा संग्रह।

🔵 "मैं प्रधान मंत्री चाणक्य से भेंट करना चाहता हूँ।" राजूदत ने कहा- "स्वागत है अतिथि आपका, मुझे ही चाणक्य कहते हैं।''

🔴 राजदूत के नेत्र आश्वर्य से खुले ही रह गए। इस व्यक्ति से तो अभी भेंट हो ही चुकी थी। लंबी-सी चोटी साधारण-सी धोती पहने सीधा मेरुदंड किये पुस्तक के पृष्ठ पलटने वाला यह किसी देश का प्रधान मंत्री हो सकता है?  आश्चर्य! स्वावलंबन का यह अनोखा जीवन कि पानी तक स्वयं भरकर लाता है। यहां तो कोई नौकर चाकर भी दिखाई नहीं देते। फर्नीचर अलमारियाँ तथा उपयोग एवं दिखावे की अन्य वस्तुओं का एकदम अभाव।

🔵 वह कुटिया में एक आसन पर बैठकर चाणक्य से चर्चा करता रहा। जब वह अपने देश को लौटा तो उसने वहाँ के लोगों को बताया कि भारत एक महान् देश है और उसे महान बनाने का श्रेय वहाँ के महापुरुषों को है, जो त्याग और संयम का जीवन व्यतीत करते हैं। जो सादा जीवन को ही अपना गौरव मानते हैं। वहाँ के प्रधानमंत्री तक निर्धन व्यक्ति जैसा जीवन व्यतीत करते हैं। जिस देश का प्रधानमंत्री अपने देशवासियों की इतनी चिंता करता है और धन के सदुपयोग पर ध्यान रखता है, फिर उसे कौन विदेशी परास्त करने की हिम्मत कर सकता है ?

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 60, 61

👉 झूठी प्रशंसा

🔵 फ्रेडरिक महान शासक होने के साथ-साथ कुछ नाटक लिखने का भी शौक रखता था। वह अपने लिखे नाटक अपने दरबारियों को सुनाया करता था। दरबारी नाटक अच्छा न होने पर उसकी तारीफ के पुल बाँध दिया करते थे। इससे फ्रेडरिक को अपने बहुत बड़े नाटककार होने का भ्रम हो गया।

🔴 उसी के समय में “व्हाल्टायर” नाम का एक बहुत ही जाना-माना प्रसिद्ध नाटककार था। फ्रेडरिक-द-ग्रेट ने एक बार उक्त नाटककार को आमंत्रित कर बड़े गर्व से अपना नाटक सुनाया। उसे आशा थी ‘व्हाल्टायर’ भी अन्य दरबारियों की तरह राज-रचना होने के कारण प्रभावित हो प्रशंसा करेगा।

🔵 किन्तु उस नाटक-मर्मज्ञ व्हाल्टायर ने उसका नाटक सुनकर बड़ी ही स्पष्टता से असफल और रद्दी कह दिया। इस पर फ्रेडरिक को बहुत बुरा लगा और उसने व्हाल्टायर को जेल भिजवा दिया।

🔴 कुछ समय बाद फ्रेडरिक ने एक और नाटक लिखा, और उसने व्हाल्टायर को बन्दीगृह से बुलवाकर अपना नया नाटक सुनाया। उसे विश्वास था कि व्हाल्टायर का दिमाग जेल की यातनाओं से बदल गया होगा और अब वह अवश्य नाटक की तारीफ करेगा।

🔵 किन्तु व्हाल्टायर नाटक सुनते-सुनते बीच में ही उठ कर चल दिया। फ्रेडरिक ने पूछा—”कहाँ जा रहे हो?” इस पर उस नाटककार ने उत्तर दिया कि—”आपका यह नाटक सुनने से तो जेल की यातना अच्छी है।”

🔴 उसकी इस प्रकार निर्भीक स्पष्टोक्ति से फ्रेडरिक महान बहुत प्रभावित हुआ और व्हाल्टायर को जेल से मुक्त करके उसे अपना साहित्यिक गुरु मान लिया।

🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1965

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 26)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं

🔴 इस प्रकार विचार करने से पता चलता है कि वास्तविक प्रसन्नता कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसकी किसी शक्ति अथवा साधन के बल पर प्राप्त किया जा सके। साधनों की झोली फैलाकर प्रसन्नता की तलाश में दौड़ने वाले कभी भी प्राप्त नहीं कर सकते, और वास्तविक बात तो यह है कि जो जितना अधिक प्रसन्नता के पीछे दौड़ते हैं वे उतने ही अधिक निराश होते हैं। उनका यह निरर्थक श्रम उस अबोध हरिण की तरह सोचनीय होता है जो पानी के भ्रम में मरुमरीचिका के पीछे दौड़ते हैं अथवा बालक की तरह कौतुकपूर्ण हैं जो आगे पड़ी हुई अपनी छाया को पकड़ने के लिए दौड़ता है। प्रसन्नता कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसका पीछा करने की जरूरत है। वह तो अवसर आने पर स्वयं ही आकर मनोमन्दिर में हंसने लगती है। उसके आने का एक अवसर तो यही होता है जब हम उसको पाने के लिए कम से कम लालायित, व्यग्र और चिन्तित होते हैं।

🔵 प्रसन्नता प्राप्ति का मुख्य रहस्य यह है कि मनुष्य अपने लिए सुख की कामना छोड़कर अपना जीवन दूसरों की प्रसन्नता में नियोजित करे। दूसरों को प्रसन्न करने के प्रयत्न में जो कष्ट प्राप्त होता है वह भी प्रसन्नता ही देता है। छोटा-मोटा कष्ट तो दूर, देश भक्त तथा अनेकों परोपकारियों ने अपने प्राण देने पर भी अनिवर्जनीय प्रसन्नता प्राप्त की है। इतिहास ऐसे बलिदानियों से भरा पड़ा है कि जिस समय उनको मृत्यु वेदी पर प्राण हरण के लिए लाया गया उस समय उनके मुख पर जो आह्लाद, जो तेज, जो मुस्कान और जो प्रसन्नता देखी गई, वह काल के अनन्त पृष्ठ पर स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गई है।

🔴 एक साधारण से साधारण व्यक्ति भी अपने जीवन की किसी न किसी ऐसी घटना का स्मरण करके समझ सकता है कि जब उसने कोई परोपकार का काम किया तब उसके हृदय में प्रसन्नता की कितनी गहरी अनुभूति हुई थी। जिस दिन यह सोचने के बजाय कि आज हम अपने लिए अधिक से अधिक प्रसन्नता संचय करेंगे। यदि यह सोचकर दिन का काम प्रारम्भ किया जाये कि आज हम दूसरों के लिए अधिक प्रसन्नता संचय करेंगे तो वह दिन आपके लिए बहुत अधिक प्रसन्नता का दिन होगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 4)

🌹 चेतना की सत्ता एवं उसका विस्तार

🔵 यह व्यंग्य-उपहास मनुष्य के अचिंत्य चिंतन का है। इसी के कारण उसके चरित्र और व्यवहार में भ्रष्टता घुस पड़ती है और तरह-तरह के आक्षेप-उलाहना लगने शुरू होते हैं। दुष्ट चिंतन ही भ्रष्ट आचरण का निमित्त बनता है और इसी के कारण अनेक अवांछनीयताएँ उसके सिर पर लद लेती हैं। कहना न होगा कि कर्मफल भोग बिना किसी को छुटकारा नहीं; भले ही वह भटकाव के कारण ही क्यों न बन पड़ी हो। चारे के लोभ में चिड़ियाँ और मछलियाँ बहेलियों के हाथ पड़ती और अपनी जान गँवाती देखी गई हैं। जो बोया है वही तो काटना पड़ेगा; भले ही पीछे सतर्कता बरती गई हो या समझदारी से काम लिया गया हो।        

🔴 यही है भ्रांति, विकृति और विपत्ति का केंद्र। इसके भँवर में फँसकर अधिकांश लोग गर्हित गतिविधियाँ अपनाते और दुर्गति के भाजन बनते हैं। यदि इस भूल से बचा जा सके तो मनुष्य को ईश्वर का उत्तराधिकारी ज्येष्ठ राजकुमार कहने में किसी को क्यों आपत्ति हो? फिर उसकी प्रवृत्ति स्वार्थी बनकर आनंद का रसास्वादन करते रहने में क्यों किसी प्रकार बाधक बने? क्यों उसे वासना, तृष्णा और अहंता के लौहपाशों में जकड़ जाने पर बंदीगृह के कैदी जैसी विडंबनाएँ सहनी पड़ें? क्यों मरघट में रहने वाले व्यक्तियों जैसा नीरस, निष्ठुर और हेय जीवन जीना पड़े? क्यों डरती-डराती और रोती-रुलाती जिंदगी जीनी पड़े?      

🔵 इस संसार में अंधकार भी है और प्रकाश भी; स्वर्ग भी है और नरक भी; पतन भी है और उत्थान भी; त्रास भी है और आनंद भी। इन दोनों में से जिसे चाहे, मनुष्य इच्छानुसार चुन सकता है। कुछ भी करने की सभी को छूट है, पर प्रतिबंध इतना ही है कि कृत्य के प्रतिफल से बचा नहीं जा सकता। स्रष्टा के निर्धारित क्रम को तोड़ा नहीं जा सकता। करने की छूट होते हुए भी उसे परिणाम भुगतने के लिये सर्वथा बाध्य रहना पड़ता है। यह दूसरी बात है कि इस प्रक्रिया के पकने में कुछ विलंब लगता है। मुकदमा दायर होने और सजा मिलने में अपने न्यायाधीश भी तो ढेरों समय लगा लेते हैं। ईश्वर का कार्यक्षेत्र तो और भी अधिक विस्तृत है। उसके न्याय करने में यदि देर लग जाती है तो मनुष्य को धैर्य खोने की आवश्यकता नहीं है और न यह अनुमान लगाने की कि वहाँ अंधेरगर्दी चलती है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 8)

🌹 दीक्षा क्या? किससे लें?

🔴 मैं समझता हूँ कि अभी फिलहाल की जो परिस्थितियाँ हैं , उनमें किसी आदमी को किसी व्यक्ति से दीक्षा नहीं लेनी चाहिए। बल्कि सिर्फ भगवान् के साथ, आत्मा के साथ, परमात्मा के साथ ब्याह करना चाहिए और अपनी जीवात्मा को भगवान् के साथ भगवान् के कार्यों में करने के लिए एक संकल्प और प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। विवाह के समय भी यों ऐसे ही स्त्री-पुरुष साथ रहने लगें, तो कोई हर्ज नहीं है। लेकिन विवाह होता है, सामाजिक रूप में होता है, उत्सव के साथ में होता है, तो दोनों की- स्त्री-पुरुष के मन पर एक छाप पड़ जाती है कि हमारा नियमित और विधिवत् विवाह हुआ था।

🔴 इसी तरह किसी आदमी ने अपने जीवन में कोई प्रतिज्ञा ली है, उसके ऊपर कोई उसकी मनोवैज्ञानिक छाप हमेशा के लिए पड़ जाती है। शपथ लेने की याद बनी रहती है। दीक्षा लेना एक शपथ लेने के बराबर है। हमने क्या ली शपथ? दीक्षा के दिन हमने ये शपथ लीकि हम मनुष्य का जीवन जियेंगे और मनुष्य के सिद्घान्त और मनुष्य के आदर्शों को ध्यान में रखेंगे।

🔵 जो मनुष्य का जीवन मिला है, उसको हम भूलेंगे नहीं। अब हम हिम्मत के साथ उसके सामने कदम बढ़ायेंगे। जैसे पहली बार अन्न खाया जाता है, उस दिन अन्नप्राशन का उत्सव मनाया जाता है। उसी प्रकार से जिस दिन प्रतिज्ञामय जीवन जीने की कसम खाई जाती है, शपथ खाई जाती है कि हमारा मुख इस ओर मुड़ गया और हम अपने कर्तव्यों की ओर अग्रसर होने को कटिबद्ध हो गये हैं ; उसकी जो प्रतिज्ञा की जाती है, उसकी जो शपथ ली जाती है, उस शपथ का नाम दीक्षा समारोह है, दीक्षा उत्सव है, दीक्षा संस्कार है।    

🔴 शपथ ली जाती है कि हम अपने आपको उससे यह प्रकृति के साथ नहीं, वासना के साथ नहीं, तृष्णा के साथ नहीं, बल्कि अपने को अपनी जीवात्मा के साथ जोड़ते हैं और अपने मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को अपनी आत्मा के साथ जोड़ते हैं। अपनी क्रियाशीलता और सम्पदा को अपनी आत्मा के साथ जोड़ते हैं। आत्मा का अर्थ परमात्मा जो कि शुद्ध और परिष्कृत रूप से हमारे अंतःकरण में बैठा हुआ है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 66)

🌹 प्रवास का दूसरा चरण एवं कार्य क्षेत्र का निर्धारण

🔴 गुरुदेव के आदेश पर तो मैं यह भी कह सकता था। जलती आग में जल मरूँगा। जो होना होगा, सो होता रहेगा। प्रतिज्ञा करने और उसे निभाने में प्राण की साक्षी देकर प्रण तो किया ही जा सकता है। यह विचार मन में उठ रहे थे। गुरुदेव उन्हें पढ़ रहे थे। अब की बार मैंने देखा कि उनका चेहरा ब्रह्मकमल जैसा खिल गया है।

🔵 दोनों स्तब्ध थे और प्रसन्न भी। पीछे लौट चलने और उन सभी ऋषियों से दुबारा मिलने का निश्चय हुआ, जिनसे कि अभी-अभी विगत रात्रि ही मिलकर आए थे। दुबारा हम लोगों को वापस आया हुआ देखकर उनमें से प्रत्येक बारी-बारी से प्रसन्न होता गया और आश्चर्यान्वित भी।

🔴 मैं तो हाथ जोड़े सिर नवाए मंत्र-मुग्ध की तरह खड़ा रहा। गुरुदेव ने मेरी कामना, इच्छा और उमंग उन्हें परोक्षतः परावाणी में कह सुनाई। और कहा-‘‘यह निर्जीव नहीं है। जो कहता है उसे करेगा भी। आप यह बताइए कि आपका जो कार्य छूटा हुआ है, उसका नए सिरे से बीजारोपण किस तरह हो? खाद पानी आप-हम लोग लगाते रहेंगे, तो इसका उठाया हुआ कदम खाली नहीं जाएगा।’’

🔵 इसके बाद उनने गायत्री पुरश्चरण की पूर्ति पर मथुरा में होने वाले सहस्रकुण्डीय पूर्णाहुति में इसी छाया रूप में पधारने का आमंत्रण दिया और कहा ‘‘यह बंदर तो है, पर है हनुमान। यह रीछ तो है, पर है जामवंत। यह गिद्ध तो है, पर है जटायु। आप इसे निर्देश दीजिए और आशा कीजिए कि जो छूट गया है, वह फिर से विनिर्मित होगा और अंकुर वृक्ष बनेगा। हम लोग निराश क्यों हों? इससे आशा क्यों न बाँधें, जबकि यह गत तीन जन्मों में दिए गए दायित्वों को निष्ठापूर्वक निभाता चला आ रहा है।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/prav.2

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 67)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔴 शरीर को जीवित भर रखने और परिवार की, देह की परिस्थिति जितने साधनों से संतुष्ट रहने की शिक्षा देकर लोभ- लिप्सा की जड़ काट दी। मन उधर  से भटकना बंद कर दे, तो कितनी अपार शक्ति मिलती है और जी कितना प्रफुल्लित रहता है। यह तथ्य कोई अनुभव करके देख सकता है; पर लोग तो ठहरे, तेल से आग बुझाना चाहते हैं। तृष्णा को दौलत से और वासना को भोग- साधना से तृप्त करना चाहते हैं। इन्हें कौन समझाये कि यह प्रयास केवल दावानल ही भड़का सकते हैं।

🔵 इस पथ पर चलने वाला मृग- तृष्णा में ही भटक सकता है। मरघट के प्रेत- पिशाच की तरह उद्विग्न ही रह सकता है- कुकर्म ही कर सकता है। इसे कौन कैसे समझाये? समझने और समझाने वाले दोनों विडम्बना मात्र करते हैं। सत्संग और प्रवचन बहुत सुने, पर ऐसे ज्ञानी न मिले जो अध्यात्म के अन्तरंग में उतर कर अनुकरण की प्रेरणा देते। प्रवचन देने वाले के जीवनक्रम को उघाड़ा, तो वहाँ सुनने वाले से भी अधिक गन्दगी पाई। सो जी खट्टा हो गया।

🔴 बड़े- बड़े सत्संग, सम्मेलन होते तो, पर अपना जी किसी को देखने- सुनने के लिए न करता। प्रकाश मिला तो अपने भीतर। आत्मा ने ही हिम्मत की और चारों ओर जकड़े पड़े जंजाल को काटने की बहादुरी दिखाई, तो ही काम चला। दूसरों के सहारे बैठे रहते, तो ज्ञानी बनने वाले शायद अपने तरह हमें अज्ञानी बना देते। लगता है किसी को प्रकाश मिलना होगा, तो भीतर से ही मिलेगा। कम- से अपने सम्बन्ध में तो यही तथ्य सिद्ध हुआ है।

🔵 आत्मिक प्रगति में वाह्य अवरोधों के जो पहाड़ खड़े थे- उन्हें लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा रखे बिना, श्रेय पथ पर चलने का दुस्साहस संग्रह किये बिना निरस्त नहीं किया जा सकता था, सो अपनी हिम्मत ही काम आई। अब अड़ गये तो सहायकों की भी कमी नहीं। गुरुदेव से लेकर भगवान् तक सभी अपनी मंजिल को सरल बनाने में सहायता देने के लिए निरन्तर आते रहे और प्रगति पथ पर धीरे- धीरे किन्तु  सुदृढ़ कदम आगे ही बढ़ते चले गये। अब तक की मंजिल इसी क्रम से पूरी हुई है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamari_jivan_saadhna.2

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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