गुरुवार, 8 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 35)


🔵 एक वन्य पशु जैसे अपने शिकार की खोज करता है, इन्द्रिय- लोलुप व्यक्ति जिस प्रकार भोगों के लिये व्याकुल होता है, क्षुधा से पीड़ित व्यक्ति जिस प्रकार भोजन ढूँढता है, डूबता हुआ व्यक्ति जिस प्रकार रक्षा के लिये आर्तनाद करता है, उसी व्याकुलता और शक्ति से तुम सत्य की खोज करो। जिस प्रकार एक सिंह निर्भीक और मुक्त होता है तथा कोलाहल से नहीं काँपता, उसी प्रकार सत्य लाभ के लिये दृढ़संकल्प हो कर तुम भी इस संसार में विचरण करो। क्योंकि इसके लिये असीम शक्ति तथा निर्भयता की आवश्यकता है। यदि तुम अपनी आत्मा की शक्तियों को एकत्रित कर लो तथा साहस पूर्वक माया के आवरण को चीर डालो और आगे बढ़ो तो तुम्हारे लिए सभी सीमाएँ टूट जायेंगी तथा सभी टेढ़े मेढ़े रास्ते सीधे हो जायेंगे।  
🔵 क्या तुम ईश्वर की खोज कर रहे हो ? तब जान लो कि तुम्हें आत्मदर्शन होगा। तब स्वयं आत्मा ही तुम्हारे सम्मुख ईश्वर के रूप में प्रगट होगी।

🔴 ओम तत् सत्
और तब गुरुदेव की वाणी उस मौन में समा गई जो कि शांति है तथा उनका रूप उस ज्योति में विलीन हो गया जो कि स्वयं ईश्वर की ज्योति है।


🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

बुधवार, 7 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 34)

🔵 संसार के दु:ख सीधे इच्छाओं के अनुपात में ही है। इसलिए अंध आसक्ति न रखो। स्वयं को किसी से बाँध न लो। परिग्रह की इच्छा न करो वरन् स्वयं में अवस्थित होने की दृढ़ इच्छा करो। क्या कोई भी संग्रह तुम्हारे सत्यस्वरूप को संतुष्ट कर सकेगा ? क्या तुम वस्तुओं से बद्ध हो जाओगे? नग्न हो इस संसार में तुम आते हो तथा जब मृत्यु का बुलावा आता है तब नग्न ही -चेले जाते हो। तब फिर तुम किस बात का मिथ्या अभिमान करते हो? उन वस्तुओं का संग्रह करो जिनका कभी नाश नहीं होता। अन्तर्दृष्टि का विकास अपने आप में एक उपलब्धि है। अपने चरित्र को तुम जितना अधिक पूर्ण करोगे उतना ही अधिक तुम उन शाश्वत वस्तुओं का संग्रह कर पाओगे जिनके द्वारा यथासमय तुम आत्मा के राज्य के अधिकारी हो जाओगे।

🔵 अत: जाओ इसी क्षण से आंतरिक विकास में लगो, बाह्य नहीं। अनुभूति के क्रम को अन्तर्मुखी करो। इन्द्रियासक्त जीवन से विरत होओ। प्रत्येक वस्तु का आध्यात्मीकरण करो। शरीर को आत्मा का मंदिर बना लो तथा आत्मा को दिन दिन अधिकाधिक अभिव्यक्त होने दो। और तब अज्ञानरूपी अंधकार धीरे धीरे दूर हो जायेगा तथा आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाश धीरे धीरे फैल उठेगा। यदि तुम सत्य का सामना करो तो विश्व की सभी शक्तियाँ तुम्हारे पीछे रहेंगी तथा समन्वित रूप से तुम्हारी उन्नति के लिए कार्य करेंगी। जैसा कि भगवान बुद्ध ने कहा, 'तथागतगण केवल महान शिक्षक हैं प्रयत्न तो तुम्हें स्वयं करना होगा'।
शिक्षक केवल ज्ञान दे सकते हैं। शिष्य को उसे आत्मसात् करना होगा और इस आत्मसात् करने का तात्पर्य है चरित्र निर्माण। ज्ञान को अपना बना लेना। स्वयं अपने द्वारा ही अपना उद्धार होना है दूसरे किसी के द्वारा नहीं।

🔴 उपनिषदों का आदेश है, 'उठो, सचेष्ट हो जाओ! और जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो तब तक न रुको!!'

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 सत्य का प्रकाश

🔴 मैंने इस दुनियाँ में बहुत वस्तुएँ देखी हैं और बहुत अनुभव किया है, परंतु ऐसी कोई चीज मुझे नहीं मिली जो सत्य से बढ़ कर हो। दुनियाँ में बहुत तरह के प्रकाश हैं, परन्तु महान् पुरुष केवल सत्य के प्रकाश को ही प्रकाश कहते हैं। कदापि मिथ्या भाषण न करना, मनुष्य यदि इस धर्म का पालन करता रहे तो फिर उसे अन्य धर्म का पालन करता रहे तो फिर उसे अन्य धर्मों का पालन करने की क्या आवश्यकता है।

🔵 शरीर पानी से शुद्ध हो सकता है, पर मन की पवित्रता बिना सत्य भाषण के नहीं हो सकती। जिसका हृदय सत्य से पवित्र है, वह अन्य हृदयों पर शासन करेगा। वह श्रेष्ठ दानी और महान् तपस्वी है, जो सदैव सत्यपरायण है। सिद्धियाँ उसके चरणों में लोटती फिरेंगी। मनुष्य को इससे बढ़कर और क्या कीर्ति मिल सकती है कि उसे `सत्यवादी’ कहा जाए।

🔴 सचाई वह है जिसके साथ मृदुभाषण और हितकामना भी हो। ऐसी सचाई जिससे दूसरों को हानि पहुँचती हो, उससे तो वह झूठ अच्छा जिससे दूसरों का हित होता है। जिस बात को कहने में तुम्हारा मन झिझकता है, जिसका कहना अनावश्यक समझते हो या जिससे मिथ्यात्व का बोध होता है, उसे मत कहो, क्योंकि झूठ बोलने से तुम्हारी ही आत्मा तुम्हें शाप देगी।

🔵 सत्य पर डटे रहो, न्यायमुक्त काम को करते हुए कभी लज्जित मत होओ। जिस बात को तुम न्याययुक्त समझते हो, उसी का निश्चय करो और फिर उस पर जम जाओ।

🌹 -अखण्ड ज्योति -जनवरी 1942 पृष्ठ 19


👉 The Light of Truth

🔵 I have seen wonderful things in this world and have experienced a log, but I have not yet found any thing, which is greater than “Truth”. So many sparkling lights are there in this world but the great savants regard only the Light of Truth as the true Light. If one follows the religion of truthfulness then he is truly religious; he does not need to adopt any other religion then… The physical body can be cleansed by water but the cleanliness and sanctity of mind is possible only by truthfulness. The heart, which is purified by truth, can rule over all hearts. A truthful person is revered in the scriptures as the greatest ascetic devotee, supreme charitable person. Siddhis (supernatural successes) will lie under his feet. What else could be bigger glory for a person other than being known as “truthful”…

🔴 Speaking truth is not only the utterance of fact as it is, it should also be auspicious and should not hurt or insult anyone. It’s better to keep quite, rather than telling a truth that harms someone and does not help anybody’s welfare. Don’t tell a lie or anything, which is false, which is not acceptable to you from within or which is unwise or unnecessary. Remember that adoption of falsehood hurts your inner self and invites your soul’s anger and curse.

🔵 Be truthful; don’t feel shy or scared in following the path of justice. Make sure that what you think as fair is truly so, then remain firm on it forever…

🌹 -Akhand Jyoti, Jan. 1942

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 33)


🔵 ध्यान की गहराइयों में जब सब कुछ शांत था तब श्री -गुरुदेव ने उपस्थित हो कर कहा: - वत्स! शक्ति जो कि जगन्माता का स्वरूप है उस पर ध्यान करो, और तब सभी भयों से ऊपर उठ कर, यह शक्ति प्रेरित करती है और तब तुम शक्ति से परे स्वयं जगन्माता की सत्ता में चले जाओगे जो कि मात्र शांति है। जीवन की अनिश्चितताओं से भयभीत न होओ यद्यपि भयंकर के सभी रूप अपने को सहस्र गुण करते प्रतीत होते हैं, किन्तु स्मरण रखो उनका प्रभाव केवल भौतिक जगत पर ही होता है, आध्यात्मिक आत्मा पर नहीं। ठीक ठीक यह जान कर कि आत्मा अविनाशी है, अटल एवं दृढ़ रहो।

🔵 आत्मा को ही अपना अवलंबन बनाओ। -सत्य जो कि सहज तथा सब में समान है उसके अतिरिक्त और किसी वस्तु में विश्वास न करो। तुम भौतिक जगत के विक्षोभ तथा प्रलोभनों में समान रूप से अविचल रह पाओगे। जो आता जाता है वह आत्मा नहीं है। स्वयं को आत्मा के साथ एक करो, शरीर के साथ नहीं। दृश्य जगत् की वस्तुओं में ही अस्थिरता का प्रभुत्व है। शाश्वत द्रष्टा के जगत में स्थिरता का अस्तित्व रु जहाँ विचारों तथा इन्द्रियों से मुक्त आत्मा का चैतन्य ही राज्य करता है।

🔴 जो सत्य है वह महासमुद्र के समान अपरिमेय है। उसे कोई भी वस्तु न तो बाँध सकती है और न ही सीमाबद्ध कर सकती है। आध्यात्मिकता का कूलरहित समुद्र  जो कि अनुभूति की ऊँचाइयों में आत्मा में आत्मा के रूप में ही भासता है उसे व्यक्त जगत के विधेयों से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

रविवार, 4 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 32)


🔵 तपस्या का एक प्रकार है जो मैं तुम्हारे लिए निर्दिष्ट करूँगा। भयंकर का ध्यान करो क्योंकि वह सर्वत्र है। एक सन्त ने ठीक ही कहा है, जिस किसी वस्तु का तुम स्पर्श करते हो वह दुःख ही है। इसे निराशा के अर्थ में न लो किन्तु एक विजयी के अर्थ में ग्रहण करो। सभी आध्यात्मिक अनुभवों में किसी न किसी रूप में तुम इस भयंकर की पूजा पाओगे। वस्तुतः  यह भयंकर की पूजा नहीं है। जो इन्द्रियों में बद्ध है उसी के लिये यह भयंकर है। सुखकर एवं भयंकर -शब्दों का अर्थ उसी व्यक्ति के लिए है जो कि देहबुद्धि का क्रीतदास है किन्तु तुम इससे ऊपर उठ चुके हो, कम से कम विचारों और आकांक्षाओं में, अनुभूति में न सही।

🔵 भयंकर का ध्यान करने से तुम निश्चित रूप से इन्द्रियजनित वासनाओं को जीत सकोगे। तुम आध्यात्मिक जीवन का आलिंगन करोगे। तुम शुद्ध और मुक्त हो जाओगे। तथा मैं, जो जीवन के छोर पर हूँ  उससे तुम अधिक एकत्व का अनुभव करते जाओगे। जीवन को शरीर मात के रूप में न देखो, मानसिक रूप में उसका अध्ययन करो। आध्यात्मिक रूप में उसकी अनुभूति करो तब आध्यात्मिक जीवन का समस्त तात्पर्य तुम्हारे सामने स्पष्ट हो जायेगा और तब तुम्हें ज्ञात होगा कि संतगण क्यों अपरिग्रह तथा पवित्रता से प्रेम करते हैं तथा युद्ध या पलायन द्वारा ऐसी सभी वस्तुओं से बचते हैं जिसमें काम कांचन का रस है।

🔴 इतना पर्याप्त है। जो मैंने कहा है उसका पालन करो। इस पर तब तक विचार करो जब तक कि तुम्हारा स्नायुजाल उसे ग्रहण न कर ले तथा इन विचारों का सौरभ एवं उसकी उदात्तता और दिव्यानन्द तुम्हारी नाड़ियों में बहने न लगे। अपने व्यक्तित्व का नवीनीकरण करो तथा स्वयं को पूर्ण कर लो।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

शनिवार, 3 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 31)

🔵 तुम्हारे लिए मेरा केवल एक ही -सन्देश है: - स्मरण रखो कि तुम आत्मा हो। तुम्हारे पीछे शक्ति है। निष्ठावान होना मुक्त होना है। अपने आध्यात्मिक उत्तराधिकार के प्रति प्रमाणिक रहो क्योंकि प्रमाणिक होना मुक्त होने के समान है। तुम्हारा प्रत्येक पद आगे बढ़ने की दिशा में ही हो तथा जैसे जैसे तुम जीवन के राजपथ में बढ़ते जाओगे वैसे वैसे ही तुम अधिकाधिक अपनी स्वतंत्रता का अनुभव करते जाओगे। यदि तुम्हारे पीछे प्रामाणिकता है तो तुम सभी व्यक्तियों का सामना कर सकते हो। स्वयं के प्रति ईमानदार बनो तब तुम्हारे शब्द सत्य की ध्वनि से गुंजित होंगे, तुम अनुभुति की भाषा बोलोगे तथा तुम वह शक्ति प्राप्त करोगे, जो दूसरों को भी पूर्ण बना देगी।

🔵 प्रत्येक व्यक्ति अपने चरित्र की शक्ति विकीर्ण करता है। स्वयं को छिपा नहीं सकता। यदि किसी व्यक्ति में कोई शारीरिक विकृत है तो सभी लोग उसे देख पाते हैं। उसी प्रकार यदि तुम में आध्यात्मिक विकृति होगी तो सभी लोग उसे अन्तःप्ररेणा से अपने आप जान लेंगे। क्योंकि जब तुम आत्मा की बात करोगे तब लोग यह अनुभव करेंगे कि तुम जो कह रहे हो वह तुम्हारे हृदय की बात नहीं है। तुम उन्हें आध्यात्मिक जीवन का कुछ भी नहीं दे पाओगे क्योंकि तुम स्वयं आध्यात्मिक जीवन में प्रतिष्ठित नहीं हो, न ही तुम्हारे पास आध्यात्मिकता ही है। अत: यदि तुम परमात्मा के सन्देशवाहक होना चाहते हो तो आत्मसुधार के प्रयत्न में लग जाओ।

🔴 अपनी मूल प्रवृत्तियों का अध्यात्मीकरण करो। निष्ठावान बनो। किन्तु मैं तुमसे कहूँगा कि अपनी अनुभूतियों को गोपन रखो। भैंस के आगे बीन न बजाओ। यदि तुम आत्मा की आश्चर्यजनक अवस्थाओं का अनुभव करते हो तो -मौन रखो जिससे कि तुम्हारी बातचीत से उस अनुभूति की तीव्रता कम न हो जाय। तुमने जो उपलब्ध किया है उस पर विचार करो। सभी चीजो के साथ आत्मा की शांति में प्रवेश करो। कृपण व्यक्ति जिस प्रकार अपने धन की रक्षा करता है उसी प्रकार अपनी अनुभूति और ज्ञान की रक्षा करो। स्वयं का संग्रह करो। और जब तुम कुछ समय तक मौन का अभ्यास कर चुकोगे तब जिस तत्त्व से तुम्हारा हृदय परिपूर्ण हो गया है वह छलकने लगेगा और तब तुम मनुष्य के लिए संपत्ति तथा शक्ति हो उठोगे। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 30)

🔵 हम शव को फूलों से ढकते हैं किन्तु शव तो शव ही है। अत: संसार जिसे महान् कहता है अमृतपुत्र को गहराई से उनका अध्ययन करने दो। क्योंकि अत्यन्त कायिक ओर भौतिक होने के कारण भीतर यह सड़ा हुआ दुर्गन्धयुक्त ही है। संसार के नाशवान पदार्थ तथा उनके आकर्षणों से कोई संबंध न रखो। शरीर जिन मुखौटों से अपने दोष ढकता है उन्हें झाडू डालो। उस अन्तर्ज्ञान मैं प्रवेश करो जहाँ तुम यह जान लेते हो कि तुम इन नाशवान वस्तुओं के बने नहीं हो। तुम आत्मा हो। जान लो, साम्राज्यों के उत्थान पतन, संस्कृति और सभ्यताओं की प्रवृत्तियों का, उच्च आध्यात्मिक चेतना के क्षेत्र में कोई विशेष महत्त्व नहीं है। समझ लो, वह जो अदृश्य हैं वही महान् है, वस्तुत: वही स्पृहणीय है।

🔵 अपरिग्रह की संतान बनो। पवित्रता की तीव्र इच्छा जागृत करो! काम कांचन ही सांसारिकता के ताने बाने हैं। इन्हें अपने स्वभाव से निर्मूल कर दो। इनकी सभी प्रवृत्तियों को विषवत् समझो। अपने स्वभाव से सभी मलीनताओं को निकाल फेंकी। अपनी आत्मा की सभी अपवित्रताओं को धोकर साफ कर डालो। जीवन जैसा है, उसे उसी रूप में देखो और तब तुम समझ पाओगे कि यह माया है।

🔴 यह न तो अच्छा है और न ही बुरा। किन्तु यह सर्वथा त्याज्य वस्तु है, क्योंकि यह शरीर तथा शरीरबोध से ही उत्पन्न होता है। अपने उच्च स्वभाव के प्रत्येक शब्द को ध्यान पूर्वक सुनो। अपनी आत्मा के प्रत्येक सन्देश को आग्रहपूर्वक पकड़ो। क्योंकि आध्यात्मिक अवसर एक अत्यन्त विरल सुयोग है तथा जब यह आध्यात्मिक वाणी मन के मौन में प्रवेश करती है उस समय यदि तुम इन्द्रिय- लिप्साओं में व्यस्त रही और इसे न सुनो तो तुम्हारा व्यक्तित्व उन आदतों के पंजे में पड़ जायेगा जो तुम्हारे विनाश के कारण होंगे।   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 दृष्टिकोण बदलो

🔴 अपनी कठिनाइयाँ हमें पर्वत के समान दुर्भेद्य, सिंह के समान भयंकर और अंधकार के समान डरावनी प्रतीत होती हैं, परंतु यह सब यथार्थ में कुछ नहीं, केवल भ्रम की भावना मात्र है, इनसे डरने का कोई कारण नहीं है। इस बात का शोक मत करो कि मुझे बार-बार असफल होना पड़ता है। परवाह मत करो, क्योंकि समय अनंत है। बार-बार प्रयत्न करो और आगे की ओर कदम बढ़ाओ। निरंतर कर्त्तव्य करते रहो, तुम्हारा एक-एक पग सफलता की ओर बढ़ रहा है, आज नहीं तो कल तुम सफल होकर रहोगे, क्योंकि कर्त्तव्य का निश्चित परिणाम सफलता है।

🔵 सहायता के लिए दूसरों के सामने मत गिड़गिड़ाओ, क्योंकि यथार्थ में किसी में भी इतनी शक्ति नहीं है, जो तुम्हारी सहायता कर सके। किसी कष्ट के लिए दूसरों पर दोषारोपण मत करो, क्योंकि यथार्थ में कोई भी दूसरा तुम्हें दु:ख नहीं पहुँचा सकता। तुम स्वयं ही अपने मित्र हो और तुम स्वयं ही अपने शत्रु हो। जो कुछ भली-बुरी स्थितियाँ सामनें हैं, वह तुम्हारी पैदा की हुई हैं। अपना दृष्टिकोण बदल दोगे तो दूसरे ही क्षण यह भय के भूत अंतरिक्ष में तिरोहित हो जाएँगे।

🔴 मित्रों किसी से मत डरो। क्योंकि तुम तुच्छ जीव नहीं हो। अपनी ओर देखे, अपनी आत्मा की ओर देखे। मिमियाना छोड़ो और दहाड़ते हुए कहो ‘सोSहम’ ‘मैं वह हूँ’ जिसकी सत्ता से यह सब कुछ हो रहा है।

🔵 ईश्वर चाहता है कि प्राणी इस जगत् में अच्छे-अच्छे कार्य करें और अंत में परम मोक्ष को प्राप्त हो।

🌹 -अखण्ड ज्योति -मार्च 1941


👉 Watch Your Attitude
🔵 To most of us the hardships, adversities and challenges of life seem to be intractable like gigantic mountains, dreadful like wild giants, and frightening like impenetrable darkness. But this is all subject to how we take them. In reality nothing is so hard or to tackle; it is mostly our delusion that regards it so and suffers the pains and fears.

🔴 Just change your attitude and you will find hope, courage and enthusiasm in all circumstances. Don’t lose your morale that you failed in your repeated attempts. Don’t worry. There are many other avenues. Look at them. There is no dead-end to trying harder again with better preparation. Move ahead. You just have to try your level best in transacting your duties. Every sincere effort is a step towards the goal; if not today, tomorrow you will succeed. This is the law of Nature. There is always certain consequence, some result of every action. Don’t feel helpless. Don’t count upon other’s support. No one really would have the capacity to help you if you can’t help yourself. Never blame anyone for anything wrong or harmful happening to you. Because no one can rule over you and make you suffer. You alone are the friend and the enemy of yourself. The circumstances around you are in fact your own creation. They are neither supportive nor obstructive in reality; this all depends upon your own attitude, how you accept and make use of them.

🔵 Refine your attitude, your thinking and your aspirations and let virtuous instincts awaken in yourself. It is the accumulation of the inscriptions of positive thinking and good actions over several lives that awaken devotion in the human self.
🌹 -Akhand Jyoti, March 1941

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

👉 कर्त्तव्य-पालन 👉 Transacting the Duties

🔴 जिन कार्यों को करने की हृदय स्वीकृति दे, वही मनुष्य का कर्त्तव्य अथवा धर्म है और हृदय जिन कार्यों को करने की सलाह न दे, उन्हें नहीं करना चाहिए क्योंकि वे अधर्म या अकर्त्तव्य हैं।

🔵 जो मनुष्य अपने कर्त्तव्यों का यथोचित रीति से पालन करता है, उस सदाचारी मनुष्य को कभी भी कोई दु:ख नहीं सहन करना पड़ता। क्योंकि वह ईश्वर की इच्छानुसार कार्य करता है, इसलिए ईश्वर सदैव उस पर दया दृष्टि रखते हैं। प्राय: ऊपर से देखने पर सदाचारी पुरुष निर्धन और दु:खी मालूम होते हैं, पर वास्तव में यह बात नहीं है। सदाचारी पुरुष में असाधारण दैवी शक्ति है, वह दु:खी कैसा। सदाचारी पुरुष निर्धन तो हो ही नहीं सकता।

🔴 सच पूछा जाए तो सच्चा खजाना सदाचारी के ही पास है। उसका वह खजाना कभी खाली नहीं होता, उसे खर्च करने पर बढ़ता ही जाता है। सदाचार के विचारों का चिंतन करने से ही आत्मा को अपार शांति और शीतलता प्राप्त होती है। दुष्टों को सदा अपने दुश्मनों का भय बना रहता है कि कहीं कोई हमारा अनिष्ट न कर दे, पर सदाचारी के पास ये सब बाते कहाँ? वहाँ न कोई दोस्त है न दुश्मन। उसके लिए तो सारा संसार एक-सा है।

🔵 ईश्वर चाहता है कि प्राणी इस जगत् में अच्छे-अच्छे कार्य करें और अंत में परम मोक्ष को प्राप्त हो।

🌹 -अखण्ड ज्योति -फरवरी 1941


👉 Transacting the Duties

🔵 That which is unambiguously permitted by your conscience is righteous, worth doing. That which is prevented or is doubted by your inner self should not be done. This is how duties and the ‘faux pas’ could be defined in simplest terms for those whose hearts are pure and minds are enlightened enough to grasp the impulse of the inner self.

🔴 One who is sincere in transacting his duties is worthy of God’s grace. He will never be helpless or sorry in any circumstance. He is a beloved disciple of God who bears the responsibilities selflessly as per thy will. Such morally refined, virtuous persons might be found lacking in wealth or in worldly (materialistic) possessions, but this would be only in the gross terms. In reality, such devotees possess immense spiritual power. How could they have any worry or scarcity? Austerity of life is their choice… Indeed the greatest treasure of the world lies with such saintly people only. This limitless treasure never empties; rather, it expands more and more with spending…

🔵 A vicious man always has a threat of being counter-attacked by the enemies; his own evils and negativity ruin all the peace and joy from his life. But the whole world is benevolent for a moral, duty-bond altruistic fellow. No one is his enemy; neither he has any attachment with anybody. Everything, everyone, is alike for him. His heart is full of love for everyone.

🔴 A thought of morality and saintly virtues itself inspires a unique feeling of peace, hope and enlightenment in the inner self. God wants each one of us to experience it and follow it towards sublime evolution of our lives…

🌹 -Akhand Jyoti, Feb. 1941

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 29)

जब मेरा मन ध्यान की शांति में पहुँचा तब श्री गुरुदेव की वाणी ने कहा-

🔴 वत्स! क्या मैं तुम्हारी दुर्बलताओं को नहीं जानता हूँ? फिर तुम चिन्ता क्यों करते हो ? क्या जीवन परीक्षा और क्लेशों से आक्रान्त नहीं हैं? पर तुम मनुष्य हो। मन में कापुरुषता न आने दो। स्मरण रखो तुम्हारे भीतर सर्वशक्तिमान आत्मा है। तुम जो होना चाहो वही हो सकते हो। इसमें केवल एक ही बाधा है और वह तुम स्वयं हो। शरीर विद्रोह करता है मन चंचल हो उठता उठता है, किन्तु लक्ष्य के संबंध में निश्चित रहो। क्योंकि अन्ततः आत्मा की शक्ति के आगे कोई नहीं टिक सकता। यदि तुम स्वयं वो प्रति निष्ठावान हो, यदि तुम्हारे हृदय की गहराइयों में समग्रता है तो सब कुछ ठीक हैं तुम पर कुछ भी पूर्णत: या आंशिक रूप में अधिकार नहीं कर सकता।

🔵 हृदय तथा मन के खुलेपन का विकास करो अपने संबंध में मुझसे कुछ न छिपाओ। अपने? मन का उसी प्रकार अध्ययन करो मानो वह तुमसे भिन्न कोई वस्तु है। जिससे हार्दिक संबंध है उससे अपनी मन की बातें अकफट भाव से कहो क्योंकि निष्ठावान व्यक्ति कसामने स्वयं नरक के द्वार भी नहीं टिक सकते। दृढ़ निष्ठा ही आवश्यक वस्तु है।

🔴 अन्ततः शरीरबोध के कारण ही तो तुम्हारी अधिकांश भूलें होती हैं। शरीर को मिट्टी के एक लोंदे के समान समझो। इसे अपनी इच्छाशक्ति के अधीन करलो। चरित्र ही सब कुछ है और चरित्र का बल इच्छाशक्ति ही है। यही आध्यात्मिक जीवन का संपूर्ण रहस्य है। यही धार्मिक- साधना का अर्थ है। सभ्यताओं को देखो, इन्द्रियशक्ति तथा इन्द्रियजन्य यथार्थताओं की तड़क भड़क पर मनुष्य कितना गौरवान्वित होता है, किन्तु उसके मूल में कामवासना और भोजनलिप्सा के अतिरिक्त और क्या है ? अधिकांश लोगों के मन इन दोनों सर्वग्राही वृत्तियों से ही तो बने हैं।


🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 28) (In The Hours Of Meditation)


और मेरी आत्मा में ये शब्द आये:-

🔴 मैं सर्वदा तुम्हारे पास हूँ। जब तुम्हारे पापों के जाल कसने लगें तथा गहन अंधकार में कष्ट पा रहे होओ तब यह जान रखो कि वहाँ मैं भी तुम्हारे साथ तुम्हारे महापराधों के कष्टों को भोगने में सहभागी हूँ। तुम्हारी अन्तरात्मा के कार्यों को भली भाँति जानने के कारण मैं तुम्हारी अन्तरात्मा के संबंध में सजग हूँ। मैं, जो सर्वव्यापी हूँ उससे तुम कुछ भी नहीं छिपा सकते, अपने गोपन विचारों का अत्यल्प अंश भी नहीं। मैं तुम में हूँ। मैं तुम्हें भली भाँति जानता हूँ। मेरे बिना न तो तुम हिल ही सकते हो, न ही साँस ले सकते हो। स्मरण रखो मैं तुम्हारी आत्मा हूँ। तुम जहाँ जाते हो वहाँ मैं जाता हूँ तुम जहाँ रुकते हो वहाँ मैं रुकता हूँ। आओ मेरे हृदय से अपना हृदय मिला लो, उसे अपना बना लो, तब सब ठीक हो जायेगा। हारी हृदय- गुहा की छाया और शांति में मेरा निवास है।

🔵 अब जाओ संसार में निकल पड़ो और मेरी वाणी का इतना व्यापक प्रचार करो जितना व्यापक कि आत्मा है, क्योंकि वही उसका जीवन है। मेरा सर्वसमन्वित प्रेम तथा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है। तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम माँ के प्रेम के समान है। जैसा एक कबूतरी का प्रेम अपने नवजात बच्वों के लिए होता है, वैसा ही प्रेम मेरा तुम्हारे प्रति है। जब कष्ट आते हैं या विपत्तियाँ तुम्हें भयभीत करती हैं तब स्मरण रखना कि मैं तुम्हारा सहायक हूँ। तुम्हारी आत्मा का प्रेमी हूँ।  

🔴 जब ये शब्द समाप्त हुए तब मैंने समझ लिया कि यह गुरुदेव की वाणी थी जिसने मेरे सभी पापों को धो दिया था और तब मैं कह उठा- मेरे प्रभु के सान्निध्य में, उनसे ऐक्यबोध में ध्यानानन्द की कितनी तीव्रता होती है यह मेरा हृदय जानता हैं। अहो! उन दिव्य ईश्वरीय विचारों का प्रवाह कितना मधुर है! और ऋषियों के साथ मैं भी स्वयं से कह उठा! सच्चिदानन्द - सागर में कूदपड़ो! ओ मूर्ख, ईश्वर- सागर में कूद पडो!

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 सच्चा धर्मात्मा कौन? 👉 Who is Religious?

🔴 सच्चे आध्यात्मिक व्यक्ति के हृदय में प्रेम, ईमानदारी, सत्यता, उदारता, दया श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के भाव उत्पन्न होते हैं। ये सब आत्मा के स्वाभाविक गुण हैं। ये ही मनुष्य की स्थायी शक्तियाँ हैं। इनको प्राप्त करने का उस समय तक प्रयत्न करते रहना चाहिए, जब तक कि समस्त जीवन पूरी तरह इनमें रॅग न जाए। जिस आदमी में ये सब गुण मौजूद हैं, वास्तव में वही आध्यात्मिक व्यक्ति है। इसी सत्य के आधार पर वह परमात्मा से मिल सकता है।
🔵 ईश्वर-भक्ति का मार्ग किसी धर्म विशेष या किसी कर्मकांड में सीमित नहीं है, यह तो आत्मा की गंभीरता में विद्यमान है।

🔴 केवल ईश्वर-ईश्वर रटने वाले धर्मात्मा नहीं होते, वरन् वे ही व्यक्ति धर्मात्मा होते हैं, जो परमात्मा के आदेशों पर अथवा उनके बताये हुए मार्ग पर चलते हैं। आत्मा की परमात्मा से एकता कर देना ही सब धर्मों का मूल है। धन्य हैं वे आदमी जो परमात्मा का उपदेश सुनते हैं और उसके अनुसार आचरण करते हैं
🔵 जो आत्मा इस सुंदर जीवन में पदार्पण कर चुकी, उसके लिए अंर्तज्ञान का दरवाजा खुला हुआ है। शुद्ध हृदय वाले आदमी धन्य हैं, क्योंकि वे ही परमात्मा का दर्शन करेंगे। इस दर्शन में जो आनंद है, उसका वर्णन कौन कर सकता है। परमेश्वर का अस्तित्व अपने आप में अनुभव करने से ही आपका काम बन जाएगा।

🌹 -अखण्ड ज्योति-जनवरी 1941

👉 Who is Religious?

🔵 Love, compassion, generosity, kindness, devotion, zeal, honesty, truthfulness, unflinching faith in divine values, etc – are the natural virtues of the soul. Their presence in a person is the sign of his/her spirituality. These alone are the source of spiritual elevation. These are also the perennial means of inner strength. Your endeavors for cultivating these qualities in your character must continue with greater intensity till your personality is fully imbibed with them. One who achieves this, he/she alone is truly spiritual and religious; he/she alone is worthy of meeting God – being beatified by thy grace.

🔴 Devotion of God is not confined to a specific religious cult or rituals. It lies in the deepest core of the inner emotions. Those who chant God’s name need not be religious; truly religious are those who follow the divine disciplines, adopt divine values in their conduct. Guiding the path to unification of the soul with God – inculcation of divinity in the human-self, is the foundational purpose of religion. Blessed are those who grasp this noble truth of religion and devotion.

🔵 Those who have reached this state of devotion would deserve attaining the eternal light of ultimate knowledge. They can realize God in their pure hearts and experience the absolute bliss forever…

🌹 -Akhand Jyoti, Jan. 1941

👉 समाधि के सोपान (भाग 27) (In The Hours Of Meditation)


ध्यान के क्षणों में पुन: यह कहते हुए गुरुदेव उपस्थित हुए-

🔴 सभी शब्दों के पार मौन में, शाश्वत शांति में तुम्हारी आत्मा का निवास है। इन्द्रियों के तुमुल कोलाहल से दूर, जीवन की यातना और दु:खों से दूर, पाप और संताप की भावना से दूर तथापि उन सभी के मध्य दिव्यता का निवास है जो कि अस्तिमात्र है। संसारस्वप्न के ताने बाने कितने आश्चर्यजनक है! किन्तु स्वप्नद्रष्टा उससे भी अधिक आश्चर्यजनक है। हे आत्मन! तुम अमर, मृत्यु की सीमा के पार, जघन्य कलुषों के मध्य भी निष्कलंक हो। तुम्हारी जड़ें दिव्यता में समायी हुई हैं। शुभ और अशुभ- ये विचारों के मापदण्ड हैं। तुम विचारों के परे सर्वोपरि ज्योति:स्वरूप हो। तुम्हारे स्वरूप का प्रताप सभी वस्तुओं के पार पहुँचा हुआ है। तुम अतुलनीय, शब्दातीत हो।

🔵  हे स्वर्गीय दिव्यज्योति! हे देव, ध्यान और अनुभूति के शीर्ष मुकुट! कौन तुम्हें पापी कहेगा! या महात्मा कहेगा। कौन तुम्हारा वर्णन कर सकेगा या तुम्हारे विषय में सोच भी सकेगा। सभी में एक, सभी में समान, तुम वही अमर आत्मा हो। मर्त्यजीवन के शब्दो में कौन तुम्हें व्यक्त कर सकता है ? तुम उन सभी के परे अमर्त्य हो। और यह जान रखो कि तूफानी विचारों के उपद्रवों के बीच भी उन सबको देखने वाला एक मौन द्रष्टा है। उसके प्रकाश को इन्द्रियों का तुच्छ कच्छ- प्रकाश कभी मंद नहीं कर सकता न ही उसकी शांति को जीवन के सभी कलह दबा सकते हैं। वह चन्द्र, सूर्य, तारों से परे कूटस्थ तथा विचारों की सीमा के बाहर है। वही आत्मा है! आत्मा वही है!! इन्द्रियों के युद्ध में विजयी वही है।

🔴 अज्ञान के पहाड़ कितने भी क्यों न दीख पड़ते हों, पाप और संताप की गहराइयों कितनी भी गहरी क्यों न हों, उसमें सभी ऊँचाई और गहराइयाँ समा जाती हैं। उन सभी विविधताओं को जानो और मुक्त हो जाओ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

सोमवार, 29 अगस्त 2016

क्यों दे रहे हैं तलाक???*।


🔵 कल रात करीब 7 बजे शाम को  मोबाइल बजा। उठाया तो उधर से रोने की आवाज... मैंने शांत कराया और पूछा कि भाभीजी आखिर हुआ क्या?

🔴 उधर से आवाज़ आई.. आप कहाँ हैं??? और कितनी देर में आ सकते हैं?

🔵 मैंने कहा:- "आप परेशानी बताइये"। और "भाई साहब कहाँ हैं...? माताजी किधर हैं..?" "आखिर हुआ क्या...?"
लेकिन

🔴 उधर से केवल एक रट कि "आप आ जाइए"*, मैंने आश्वाशन दिया कि *कम से कम एक घंटा पहुंचने में लगेगा*. जैसे तैसे पूरी घबड़ाहट में पहुँचा;

🔵 देखा तो भाई साहब [हमारे मित्र जो जज हैं] सामने बैठे हुए हैं;

🔴 भाभीजी रोना चीखना कर रही हैं* 12 साल का बेटा भी परेशान है; 9 साल की बेटी भी कुछ नहीं कह पा रही है।

🔵 मैंने भाई साहब से पूछा कि *""आखिर क्या बात है""*???

🔴 ""भाई साहब कोई जवाब नहीं दे रहे थे ""*.

🔵 फिर भाभी जी ने कहा ये देखिये *तलाक के पेपर, ये कोर्ट से तैयार करा के लाये हैं*, मुझे तलाक देना चाहते हैं, मैंने पूछा - *ये कैसे हो सकता है???. इतनी अच्छी फैमिली है. 2 बच्चे हैं. सब कुछ सेटल्ड है. ""प्रथम दृष्टि में मुझे लगा ये मजाक है""*.

🔴 लेकिन मैंने बच्चों से पूछा *दादी किधर है*,

🔵 बच्चों ने बताया पापा ने उन्हें 3 दिन पहले *नोएडा के वृद्धाश्रम में शिफ्ट* कर दिया है।

🔴 मैंने घर के नौकर से कहा। मुझे और भाई साहब को चाय पिलाओ; कुछ देर में चाय आई. भाई साहब को *बहुत कोशिशें कीं चाय पिलाने की*.

🔵 लेकिन उन्होंने नहीं पी और कुछ ही देर में वो एक *"मासूम बच्चे की तरह फूटफूट कर रोने लगे "*बोले मैंने 3 दिन से कुछ भी नहीं खाया है. मैं अपनी 61 साल की माँ को कुछ लोगों के हवाले करके आया हूँ.

🔴 पिछले साल से मेरे घर में उनके लिए इतनी मुसीबतें हो गईं कि पत्नी (भाभीजी) ने कसम खा ली*. कि *""मैं माँ जी का ध्यान नहीं रख सकती""*ना तो ये उनसे बात करती थी और ना ही मेरे बच्चे बात करते थे. *रोज़ मेरे कोर्ट से आने के बाद माँ खूब रोती थी*. नौकर तक भी *अपनी मनमानी से व्यवहार करते थे*

🔵 माँ ने 10 दिन पहले बोल दिया.. बेटा तू मुझे *ओल्ड ऐज होम* में शिफ्ट कर दे.

🔴 मैंने बहुत *कोशिशें कीं पूरी फैमिली को समझाने की*, लेकिन किसी ने माँ से सीधे मुँह बात नहीं की*.

🔵 जब मैं 2 साल का था तब पापा की मृत्यु हो गई थी दूसरों के घरों में काम करके *""मुझे पढ़ाया. मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं जज हूँ""*. लोग बताते हैं माँ कभी दूसरों के घरों में काम करते वक़्त भी मुझे अकेला नहीं छोड़ती थीं.

🔴 उस माँ को मैं ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट करके आया हूँ*. पिछले 3 दिनों से मैं *अपनी माँ के एक-एक दुःख को याद करके तड़प रहा हूँ,*जो उसने केवल मेरे लिए उठाये।

🔵 मुझे आज भी याद है जब..
*""मैं 10th की परीक्षा में अपीयर होने वाला था. माँ मेरे साथ रात रात भर बैठी रहती""*.


🔴 एक बार *माँ को बहुत फीवर हुआ मैं तभी स्कूल से आया था*. उसका *शरीर गर्म था, तप रहा था*. मैंने कहा *माँ तुझे फीवर है हँसते हुए बोली अभी खाना बना रही थी इसलिए गर्म है*.

🔵 लोगों से *उधार माँग कर मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी तक पढ़ाया*. मुझे *ट्यूशन तक नहीं पढ़ाने देती थीं*कि कहीं मेरा टाइम ख़राब ना हो जाए.

🔴 कहते-कहते रोने लगे..और बोले--""जब ऐसी माँ के हम नहीं हो सके तो हम अपने बीबी और बच्चों के क्या होंगे""*.

🔵 हम जिनके *शरीर के टुकड़े हैं*,आज हम उनको *ऐसे लोगों के हवाले कर आये, ""जो उनकी आदत, उनकी बीमारी, उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते""*, जब मैं ऐसी माँ के लिए कुछ नहीं कर सकता तो *"मैं किसी और के लिए भला क्या कर सकता हूँ".*

🔴 आज़ादी अगर इतनी प्यारी है और *माँ इतनी बोझ लग रही हैं, तो मैं पूरी आज़ादी देना चाहता हूँ*

🔵 जब *मैं बिना बाप के पल गया तो ये बच्चे भी पल जाएंगे*. इसीलिए मैं तलाक देना चाहता हूँ।

🔴 सारी प्रॉपर्टी इन लोगों के हवाले* करके उस *ओल्ड ऐज होम* में रहूँगा. कम से कम मैं माँ के साथ रह तो सकता हूँ।


🔵 और अगर *इतना सब कुछ कर के ""माँ आश्रम में रहने के लिए मजबूर है"", तो एक दिन मुझे भी आखिर जाना ही पड़ेगा*.

🔴 माँ के साथ रहते-रहते आदत भी हो जायेगी. *माँ की तरह तकलीफ* तो नहीं होगी.

🔵 जितना बोलते उससे भी ज्यादा रो रहे थे*.

🔴 बातें करते करते रात के 12:30 हो गए।

🔵 मैंने भाभीजी के चेहरे को देखा. उनके *भाव भी प्रायश्चित्त और ग्लानि* से भरे हुए थे; मैंने ड्राईवर से कहा अभी हम लोग नोएडा जाएंगे।

🔴 भाभीजी और बच्चे हम सारे लोग नोएडा पहुँचे.

🔵 बहुत ज़्यादा रिक्वेस्ट करने पर गेट खुला*. भाई साहब ने उस गेटकीपर के पैर पकड़ लिए*, बोले मेरी माँ है, मैं उसको लेने आया हूँ, चौकीदार ने कहा क्या करते हो साहब, भाई साहब ने कहा *मैं जज हूँ,*

उस चौकीदार ने कहा:-

🔴 ""जहाँ सारे सबूत सामने हैं तब तो आप अपनी माँ के साथ न्याय नहीं कर पाये, औरों के साथ क्या न्याय करते होंगे साहब"*।

🔵 इतना कहकर हम लोगों को वहीं रोककर वह अन्दर चला गया. अन्दर से एक महिला आई जो *वार्डन* थी. उसने *बड़े कातर शब्दों में कहा*:- "2 बजे रात को आप लोग ले जाके कहीं मार दें, तो *मैं अपने ईश्वर को क्या जबाब दूंगी..*?"

🔴 मैंने सिस्टर से कहा *आप विश्वास करिये*. ये लोग *बहुत बड़े पश्चाताप में जी रहे हैं*.

🔵 अंत में किसी तरह उनके कमरे में ले गईं. *कमरे में जो दृश्य था, उसको कहने की स्थिति में मैं नहीं हूँ.*

🔴 केवल एक फ़ोटो जिसमें *पूरी फैमिली* है और वो भी माँ जी के बगल में, जैसे किसी बच्चे को सुला रखा है. मुझे देखीं तो उनको लगा कि बात न खुल जाए लेकिन जब मैंने कहा *हम लोग आप को लेने आये हैं, तो पूरी फैमिली एक दूसरे को पकड़ कर रोने लगी*

🔵 आसपास के कमरों में और भी बुजुर्ग थे सब लोग जाग कर बाहर तक ही आ गए. *उनकी भी आँखें नम थीं*

🔴 कुछ समय के बाद चलने की तैयारी हुई. पूरे आश्रम के लोग बाहर तक आये. किसी तरह हम लोग आश्रम के लोगों को छोड़ पाये.

🔵 सब लोग इस आशा से देख रहे थे कि *शायद उनको भी कोई लेने आए, रास्ते भर बच्चे और भाभी जी तो शान्त रहे*.......

🔴 लेकिन भाई साहब और माताजी एक दूसरे की *भावनाओं को अपने पुराने रिश्ते पर बिठा रहे थे*.घर आते-आते करीब 3:45 हो गया.

🔵  💐 *भाभीजी भी अपनी ख़ुशी की चाबी कहाँ है; ये समझ गई थी मैं भी चल दिया. लेकिन *रास्ते भर वो सारी बातें और दृश्य घूमते रहे*.

🔴  💐*""माँ केवल माँ है""* 💐 उसको मरने से पहले ना मारें.*

🔵 माँ हमारी ताकत है उसे बेसहारा न होने दें, अगर वह कमज़ोर हो गई तो हमारी संस्कृति की ""रीढ़ कमज़ोर"" हो जाएगी*, बिना रीढ़ का समाज कैसा होता है किसी से छुपा नहीं

🔴 अगर आपकी परिचित परिवार में ऐसी कोई समस्या हो तो उसको ये जरूर पढ़ायें, *बात को प्रभावी ढंग से समझायें , कुछ भी करें लेकिन हमारी जननी को बेसहारा बेघर न होने दें*, अगर *माँ की आँख से आँसू गिर गए तो *"ये क़र्ज़ कई जन्मों तक रहेगा"*, यकीन मानना सब होगा तुम्हारे पास पर *""सुकून नहीं होगा""* , सुकून सिर्फ *माँ के आँचल* में होता है उस *आँचल को बिखरने मत देना*।

👉 समाधि के सोपान (भाग 26) (In The Hours Of Meditation)


🔴 तब मैंने सुना वाणी मानो प्रार्थना के स्वर में कह रही है- हे इन्द्रिय और विचारों के निर्माता! जिसका तुमने निर्माण किया है उसे नष्ट कर दो। भय-, काग, आहार, निद्रा तथा उससे उठने वाले किचारों के पिंजरे में बद्ध मानो तुमने इच्छापूर्वक स्वयं को अज्ञान के घनत्व से ढक लिया ह है और स्वप्न देखे जा रहे हो। तुम्हारे स्वयं का अज्ञान ही तुम्हारा अभिशाप है। सभी स्वप्नों को भंग कर दो। सुख तथा दुःख की धारणाओं को नष्ट कर दो और तब देहात्म- बुद्धि की यह लौह अर्गला छिटक कर एक ओर गिर जायेगी। इसलिये हमारे सामने जो कार्य है वह विलक्षण है। माया का जाल मकड़ी के जाले के समान पतला है किन्तु वह वज्र के समान कठोर भी है।

🔵 हे जीव, स्वयं का उद्धार करो। इस घर को तुम्हीं ने बनाया है, तुम्हीं उसे तोड़ो और इस घर को तोड़ने की प्रक्रिया है आत्मसाक्षात्कार। यह एकत्व की दैवी चेतना से संबंधित है। क्या सूर्य, तारे, नहीं! आकाश स्वयं भी तुम्हारे स्वरूप को निगल सकेगा ? आत्मा का तुम्हारे साथ एकत्व है। अज्ञान से, अंधकार से, बाहर आ जाओ। हे जीव! यह अज्ञान तुम्हारा स्व- आवृत है। सुख से पीड़ा अच्छी है, आनंद से दु:ख अच्छा है, क्योंकि ये हमारे विचारों तथा बुद्धि को वह रूप देते हैं जो कि आत्म- साक्षात्कार का उपयुक्त साधन बन जाता है। भीषण के प्रेमी बनो। यद्यपि भीषण के दर्शन में तुम मृत्यु को देखोगे किन्तु तुम अमरत्व का भी दर्शन करोगे। जीवन अधिक से अधिक स्वप्न। परम तत्त्व तो जीवन के परे है। अन्त में सभी जगह एकत्व है! दिव्य सर्वव्यापी एकत्व ! रश्मियाँ भिन्न भिन्न हो सकती है किन्तु सूर्य वही एक है तथा सूर्य ही और रश्मि है रश्मि ही सूर्य है। तुम हो तथा अंधकार भी आलोक है।  

🔴 यह सुन कर मेरी आत्मा ध्यान और भी' गहन से गहनतर स्तर में पहुँच गई और मैं सचमुच जान गया कि किरण ही सूर्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

शनिवार, 27 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 25) (In The Hours Of Meditation)



🔴 जब आत्मा अन्तरतम की शांति मे उठी तब उस वाणी ने कहा, अच्छाई, पाप तथा दोष से अधिक गहरी है। विश्व का ताना बाना, उसका सारतत्व उच्छाई ही है। असीम अतुलनीय अच्छाई। जहाँ ईश्वर है वहाँ अशुभ मिट जाता है। अशुभ आभास मात्र है, सत्यं नहीं। आत्मसमुद्र की गहराइयों में ज्ञान और सत्य की अटल चट्टानें हैं। इन चट्टानों के सामने सभी भूल, सभी अंधकार तथा सभी दोष निश्चय नष्ट हो जाते हैं। यह ठीक है कि सतह पर इच्छाओं की आँधी के तुमुल शब्द हो सकते हैं उत्तेजित वासनाओं के तूफान हो सकते है, दोष तथा अंधकार की घड़ियाँ हो सकती हैं, किन्तु अनुभूति!

🔵 अनुभूति का एक क्षण! सर्व शक्तिमान है। वह सभी प्रकार के दोषों को दूर कर देता है। वह सूर्य के प्रकाश के समान है। वह सभी अंधकार को छिन्न भिन्न कर देता है। अत: अंधकार के क्षणों में भी इस ज्योति का स्मरण करो। यहाँ तक कि दोष होने पर भी प्रभु का नाम स्मरण करो! प्रभु तुम्हारी प्रार्थना सुनेंगे । वे तुम्हारी सहायता के लिए दूत भेजेंगे। आत्मा की शक्ति से बड़ी और कोई शक्ति नहीं है। हमारे अन्तरतम में एकीभूत दिव्यता का अनंत प्रवाह है। उस दिव्यता की एक झलक से ही यह विविधताबोध जो दोषों तथा अज्ञान का निवास स्थान है तिरोहित हो जायेगा। मौलिक रूप में तुम मुक्त हो, शुद्ध हो, दिव्य हो। विश्व की सभी शक्तियाँ तुम्हारे अधीन हैं।

🔴 जब तुम मुक्त ही तो भी क्या तुम मुक्ति के लिए संघर्ष करोगे ? तुम्हारा लक्ष्य आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना होना चाहिये। उस सौंदर्य शिखा की एक किरण मात्र का दर्शन दोष की सूक्ष्मतम रेखा को भी नष्ट कर देता है, मिटा देता है। जान लो कि शक्ति तथा शाश्वत ज्योति के ही बने हुए हो। तुम्हारा जीवन न इहलोक में है न परलोक में, वह तो अनंत में अवस्थित है। गहरे अर्थ में यह पाप की धारणा अज्ञान ही तो है। यह एक स्वप्न है। पाप का स्वभाव दुर्बलता है। तुम शक्तिशाली बनो। वह, जो तुम हो, उसकी एक झलक और तुम वही ज्योति: स्वरूप सर्वशक्तिमान हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 समाधि के सोपान (भाग 24) (In The Hours Of Meditation)


🔴 उस वाणी ने और भी कहा-

🔵 आत्मा में जीवात्मा से भिन्न बोध नहीं है। वह असीम शाश्वत तथा पूर्ण मुक्त है। वह विविधता रहित ऐक्य है। आत्मा के राज्य में मैं, तुम, वह आदि भेद के लिए कोई स्थान नहीं है। वह तत् मात्र है। ओम् तत् सत्। अतुलनीय, अनिर्वचनीय। उस आत्मा को कौन जानता है! वास्तव में वही तुम्हें जानता है। असीम में समाहित हो जाने की आकांक्षा, मुक्ति की इच्छा ही वास्तविक प्रेम है। उस महत् शांति की इच्छा ही सच्चा प्रेम है।

🔴 यह विचलित नहीं होगा। यह शांति पूर्कक किन्तु समग्ररूप में बढ़ता है। यह अजेय है। यह लक्ष्य पर पहुँच कर ही रहता है। जिसमें सभी देवी देवता विलीन हो जाते हैं जहाँ ध्वनि समाप्त हो जाती है, जिसमें सभी रूप समा जाते हैं जहाँ विचार अविचा रहो जाते हैं जहाँ जन्म और मृत्यु का अस्तित्व नहीं रहता उसे ही आत्मा जानो। जहाँ सघर्ष समाप्त हो जाते हैं जहाँ अनुभूति है, जहाँ सभी सापेक्ष विचार मिट जाते हैं जहाँ सौंदर्य, पवित्रता, पाप, आतंक, शुभ, अशुभ सभी का भेद समाप्त हो जाता है, जहाँ ध्यान में मन सर्वज्ञ हो जाता है, उसे ही आत्मा जानो।

🔵 वत्स ! सभी ऊँचाइयों के परे एक ऊँचाई है, महान देवताओं के परे भी एक दिव्यता है। अविनाशी ही सब का आधार है। सभी तिरोहित हो जाते हैं। सभी मिट जाते हैं, केवल आत्मा ही सर्वदा रहता है।

🔴 और जब वह वाणी शांत हुई तब मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि मेरी आत्मा विशालता में उठ गई। तब मैं नहीं था वहाँ केवल ज्योति थी! ज्योति!!

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

👉 तुम ईश्वर को पूजते हो या शैतान को

🔴 मनुष्य, शरीर को `मैं’ समझता है। उसने एक जनश्रुति ऐसी अवश्य सुन रखी होती है कि आत्मा शरीर से भिन्न है, परंतु इस पर उसका विश्वास नहीं होता। हम सब शरीर को ही यदि आत्मा न मानते होते, तो यह भारतभूमि दुराचारों का केंद्र न बन गई होती। गीता में भगवान कृष्ण ने अपना उपदेश आरंभ करते हुए अर्जुन को यही दिव्य ज्ञान दिया है, ``तू देह नहीं है।’’ आत्मस्वरूप को जिस प्रकार विस्मण कर दिया गया है, उसी प्रकार ईश्वर को भी दृष्टि से ओझल कर दिया गया है।

🔵 हमारे चारों ओर जो घोर अज्ञाननांधकार छाया हुआ है, उसके तम में कुछ और ही वस्तुएँ हमारे हाथ लगी हैं और उन्हें ईश्वर मान लिया है। रस्सी को साँप मान लेने का उदाहरण प्रसिद्ध है। रस्सी का स्वरूप कुछ-कुछ सर्प से मिलता जुलता है। अंधेरे के कारण ज्ञान ठीक प्रकार काम नहीं करता, फलस्वरूप भ्रम सच्चा मालूम होता है। रस्सी सर्प का प्रतिनिधित्व भली प्रकार करती है। इस गड़बड़ी के समय में ईश्वर के स्थान पर शैतान विराजमान हो गया है और उसी को हम लोग पूजते हैं। आत्मा पंच तत्त्वों से सूक्ष्म है। पंच तत्त्व के रसों को इन्हीं तत्त्वों से बना हुआ शरीर भोग सकता है।

🔴 आत्मा तक कडुआ मीठा कुछ नहीं पहुँचता। यह तो केवल इंद्रियों की तृप्ति-अतृप्ति को अपनी तृप्ति मानना भर है।

🌹 अखण्ड ज्योति- मई 1940

👉 Who Do You Worship – The Divine or the Devil?

🔵 Man misidentifies himself as the physical body. Although he has herd something like ‘he has a soul that is different from the body’ but does not quite believe it or is not even able to imagine it. If most of us were not living under this illusion about unity of the self with the living body, this land (India) of great rishis would not have become home to vast spread corruption and confusion. It was this sacred land where Lord Krishna had preached Bhagvad Gita to Arjuna and reminded him that he is not the body. As we have totally forgotten this fact and never bother to know about our own “self”, how could we know the
Omnipresent Self, the God?

🔴  We are living in a state of utter ignorance and darkness. Whatever suits our deluded convictions or convinces our selfish intellect, that has become the definition of God for us. It is like considering a rope to be a snake because of lack of light. Indeed the rope resembles the shape of a snake and both would look
alike if kept at a dark place. But, as we all know they are not the same. It is only our illusion because of which we might confuse one with the other. It is a pity that this is what we the ‘intelligent beings’ have done today by regarding the devil as the divine.

🔵 Its time we awaken and ponder over our reality. We should attempt to realize that – the soul is sublime; it is not perceivable by the body or the materialistic means.

🌹 -Akhand Jyoti, May 1940

बुधवार, 24 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 23) (In The Hours Of Meditation)


🔴 वह वाणी जिसका निवास मौन में है, ध्यान के क्षणों में उसने मेरी आत्मा से कहा: -

🔵 वत्स! गंभीर! गहन गम्भीर शांति में आओ। व्यक्तित्व के कोलाहल के परे, उसके विविध अनुभवों के परे महान् शांति में आओ। वासनाओं या इच्छाओं की आँधी से सतह पर ही विक्षुब्ध न होओ! यद्यपि घने के बादल छा जाते हैं किन्तु उनके ऊपर सूर्य चमकता ही रहता है । शांति के क्षणों में ही हमारा हृदय दिव्यानन्द में सर्वोत्तम स्पन्दित होता है। सर्वव्यापी प्रेम के सम्मुख स्वयं को अनावृत कर दो। वह स्थिरता कितना संगीतमय है। वह कैसी शांति प्रदान करता है। ओ! वह अनन्त स्थिरता! अनन्त शांति!!

🔴 एक भी सत् विचार, आध्यात्मिक विचार, कभी नष्ट नहीं होता। इसलिए तुम समय की सीमा के बाहर चले जाओ। वहाँ महत् विचारों पर मनन करो तथा उसमें तुम्हारी आत्मा अनंत को पाने की इच्छा करे। तुम्हारे मन में ही तुम्हारे संसार का अस्तित्व है। तथा तुम समय के प्रवाह के भीतर भी अनन्त को प्रगट कर सकते हो । अपने विचारों के द्वारा तुम आकाश की सीमा को लांध सकते हो।

🔵 आत्मा मुक्त है उसे कोई बाँध नहीं सकता। तुम आओ या जाओ, तुम कुछ करो या न करो, यह सब क्या है? ये सब जीवन स्वप्न की घटनाएँ मात्र हैं । ये सब काल प्रवाह में बहती धारायें मात्र हैं जब कि आला शाश्वत है। ओह् ! इस ज्ञान के साथ कितनी शक्ति, कितनी उच्चता, कितनी अपरिमेय विशालता का बोध जागता है।

🔴 शांति गहरी है! अतल गहरी!! वह अपरिमेय है!! द्धन्द्रिय तथा विचारों की सभी कल्पनाओं को मिटा दो। वे प्रकाश के प्रत्यावर्तन मात्र हैं। तुम स्वयं प्रकाश में लीन हो जाओ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 समाधि के सोपान (भाग 22) (In The Hours Of Meditation)


🔴 मेरी आत्मा ने गुरुदेव से निवेदन किया- महाभाग, कितना अद्भुत है! वहाँ मृत्यु नहीं!

🔵
और तब गुरुदेव ने कहा-वत्स! वहाँ वासनासंभूत जीवन भी नहीं है। क्योंकि लोग जिसके भूखे हैं वह संसार कीच ही तो है। दूषित वासनाओं में आनंद लेने वाले लोग कीचड़ में सने शरीर में आनंद से लोटने वाले बैल के समान ही तौ हैं उनके लिए यह पथ बहुत लम्बा है क्योंकि इच्छाओं के ताने बाने से बनी माया उनके पथ में आड़े आती है। तुम उसके परे जाओ। तुम्हारा समय आयेगा। ऊपर की ओर देखो। वहाँ अनन्त ज्योति है। ऊपर देखो और वह ज्योति तुम्हारे मन की अपारदर्शिता को अवश्य भेद जायेगी।

🔴 इन शब्दों को सुनकर मुझे स्मरण हो आया कि चैतन्य ही आत्मा का स्वरूप है तथा मुक्ति ही लक्ष्य है। और वह लक्ष्य यहाँ और अभी है, मरणोपरान्त नहीं, तथा जीवात्मा का भाग्य निश्चित है और वह है आत्म- साक्षात्कार, जहाँ समय मिट जाता है। जहाँ भौतिक और मर्त्य चेतना विलुप्त हो जाती है। जहाँ ज्योति जो कि जीवन है, सत्य है, शांति है, वह प्रकाशित होती हैं। जहाँ सभी स्वप्न समाप्त हो जाते हैं वासनायें असीम अनुभूति में विलीन हो जाती हैं। जो कि महत् विस्तार का क्षेत्र है। उस अनन्त की अनुभूति के लिए, समय का अवसान कर देने के लिए इन्द्रिय प्रभूत कल्पनाओं की समाप्ति के लिए अनंत की मुक्ति के लिए ही यह अनुभूति है।

हरि ओम् तत् सत्

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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