सोमवार, 16 मार्च 2020

👉 आत्मबोध

चार महीने बीत चुके थे, बल्कि 10 दिन ऊपर हो गए थे, किंतु बड़े भइया की ओर से अभी तक कोई ख़बर नहीं आई थी कि वह पापा को लेने कब आएंगे. यह कोई पहली बार नहीं था कि बड़े भइया ने ऐसा किया हो. हर बार उनका ऐसा ही रवैया रहता है. जब भी पापा को रखने की उनकी बारी आती है, वह समस्याओं से गुज़रने लगते हैं. कभी भाभी की तबीयत ख़राब हो जाती है, कभी ऑफिस का काम बढ़ जाता है और उनकी छुट्टी कैंसिल हो जाती है. विवश होकर मुझे ही पापा को छोड़ने मुंबई जाना पड़ता है. हमेशा की तरह इस बार भी पापा की जाने की इच्छा नहीं थी, किंतु मैंने इस ओर ध्यान नहीं दिया और उनका व अपना मुंबई का रिज़र्वेशन करवा लिया।

दिल्ली-मुंबई राजधानी एक्सप्रेस अपने टाइम पर थी. सेकंड एसी की निचली बर्थ पर पापा को बैठाकर सामने की बर्थ पर मैं भी बैठ गया. साथवाली सीट पर एक सज्जन पहले से विराजमान थे. बाकी बर्थ खाली थीं. कुछ ही देर में ट्रेन चल पड़ी. अपनी जेब से मोबाइल निकाल मैं देख रहा था, तभी कानों से पापा का स्वर टकराया, “मुन्ना, कुछ दिन तो तू भी रहेगा न मुंबई में. मेरा दिल लगा रहेगा और प्रतीक को भी अच्छा लगेगा.”

पापा के स्वर की आर्द्रता पर तो मेरा ध्यान गया नहीं, मन-ही-मन मैं खीझ उठा. कितनी बार समझाया है पापा को कि मुझे ‘मुन्ना’ न कहा करें. ‘रजत’ पुकारा करें. अब मैं इतनी ऊंची पोस्ट पर आसीन एक प्रशासनिक अधिकारी हूं. समाज में मेरा एक अलग रुतबा है. ऊंचा क़द है, मान-सम्मान है. बगल की सीट पर बैठा व्यक्ति मुन्ना शब्द सुनकर मुझे एक सामान्य-सा व्यक्ति समझ रहा होगा. मैं तनिक ज़ोर से बोला, “पापा, परसों मेरी गर्वनर के साथ मीटिंग है. मैं मुंबई में कैसे रुक सकता हूं?” पापा के चेहरे पर निराशा की बदलियां छा गईं. मैं उनसे कुछ कहता, तभी मेरा मोबाइल बज उठा. रितु का फोन था. भर्राए स्वर में वह कह रही थी, “पापा ठीक से बैठ गए न.”
“हां हां बैठ गए हैं. गाड़ी भी चल पड़ी है.”  “देखो, पापा का ख़्याल रखना. रात में मेडिसिन दे देना. भाभी को भी सब अच्छी तरह समझाकर आना. पापा को वहां कोई तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए.”

“नहीं होगी.” मैंने फोन काट दिया. “रितु का फोन था न. मेरी चिंता कर रही होगी.”
पापा के चेहरे पर वात्सल्य उमड़ आया था. रात में खाना खाकर पापा सो गए. थोड़ी देर में गाड़ी कोटा स्टेशन पर रुकी और यात्रियों के शोरगुल से हड़कंप-सा मच गया. तभी कंपार्टमेंट का दरवाज़ा खोलकर जो व्यक्ति अंदर आया, उसे देख मुझे बेहद आश्‍चर्य हुआ. मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि रमाशंकर से इस तरह ट्रेन में मुलाक़ात होगी.

एक समय रमाशंकर मेरा पड़ोसी और सहपाठी था. हम दोनों के बीच मित्रता कम और नंबरों को लेकर प्रतिस्पर्धा अधिक रहती थी. हम दोनों ही मेहनती और बुद्धिमान थे, किंतु न जाने क्या बात थी कि मैं चाहे कितना भी परिश्रम क्यों न कर लूं, बाज़ी सदैव रमाशंकर के हाथ लगती थी. शायद मेरी ही एकाग्रता में कमी थी. कुछ समय पश्‍चात् पापा ने शहर के पॉश एरिया में मकान बनवा लिया. मैंने कॉलेज चेंज कर लिया और इस तरह रमाशंकर और मेरा साथ छूट गया.

दो माह पूर्व एक सुबह मैं अपने ऑफिस पहुंचा. कॉरिडोर में मुझसे मिलने के लिए काफ़ी लोग बैठे हुए थे. बिना उनकी ओर नज़र उठाए मैं अपने केबिन की ओर बढ़ रहा था. यकायक एक व्यक्ति मेरे सम्मुख आया और प्रसन्नता के अतिरेक में मेरे गले लग गया, “रजत यार, तू कितना बड़ा आदमी बन गया. पहचाना मुझे? मैं रमाशंकर.” मैं सकपका गया. फीकी-सी मुस्कुराहट मेरे चेहरे पर आकर विलुप्त हो गई. इतने लोगों के सम्मुख़ उसका अनौपचारिक व्यवहार मुझे ख़ल रहा था. वह भी शायद मेरे मनोभावों को ताड़ गया था, तभी तो एक लंबी प्रतीक्षा के उपरांत जब वह मेरे केबिन में दाख़िल हुआ, तो समझ चुका था कि वह अपने सहपाठी से नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक अधिकारी से मिल रहा था. उसका मुझे ‘सर’ कहना मेरे अहं को संतुष्ट कर गया. यह जानकर कि वह बिजली विभाग में महज़ एक क्लर्क है, जो मेरे समक्ष अपना तबादला रुकवाने की गुज़ारिश लेकर आया है, मेरा सीना अभिमान से चौड़ा हो गया. कॉलेज के प्रिंसिपल और टीचर्स तो क्या, मेरे सभी कलीग्स भी यही कहते थे कि एक दिन रमाशंकर बहुत बड़ा आदमी बनेगा. हुंह, आज मैं कहां से कहां पहुंच गया और वह…

पिछली स्मृतियों को पीछे धकेल मैं वर्तमान में पहुंचा तो देखा, रमाशंकर ने अपनी वृद्ध मां को साइड की सीट पर लिटा दिया और स्वयं उनके क़रीब बैठ गया. एक उड़ती सी नज़र उस पर डाल मैंने अख़बार पर आंखें गड़ा दीं. तभी रमाशंकर बोला, “नमस्ते सर, मैंने तो देखा ही नहीं कि आप बैठे हैं.”  मैंने नम्र स्वर में पूछा, “कैसे हो रमाशंकर?”
“ठीक हूं सर.”
“कोटा कैसे आना हुआ?”
“छोटी बुआ की बेटी की शादी में आया था. अब मुंबई जा रहा हूं. शायद आपको याद हो, मेरा एक छोटा भाई था.”
“छोटा भाई, हां याद आया, क्या नाम था उसका?” मैंने स्मृति पर ज़ोर डालने का उपक्रम किया जबकि मुझे अच्छी तरह याद था कि उसका नाम देवेश था.
“सर, आप इतने ऊंचे पद पर हैं. आए दिन हज़ारों लोगों से मिलते हैं. आपको कहां याद होगा? देवेश नाम है उसका सर.”

पता नहीं उसने मुझ पर व्यंग्य किया था या साधारण रूप से कहा था, फिर भी मेरी गर्दन कुछ तन-सी गई.  उस पर एहसान-सा लादते हुए मैं बोला,“देखो रमाशंकर, यह मेरा ऑफिस नहीं है, इसलिए सर कहना बंद करो और मुझे मेरे नाम से पुकारो. हां तो तुम क्या बता रहे थे, देवेश मुंबई में है?”

“हां रजत, उसने वहां मकान ख़रीदा है. दो दिन पश्‍चात् उसका गृह प्रवेश है.
चार-पांच दिन वहां रहकर मैं और अम्मा दिल्ली लौट आएंगे.”
“इस उम्र में इन्हें इतना घुमा रहे हो?”  “अम्मा की आने की बहुत इच्छा थी. इंसान की उम्र भले ही बढ़ जाए, इच्छाएं तो नहीं मरतीं न.”
“हां, यह तो है. पिताजी कैसे हैं?”

“पिताजी का दो वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो गया था. अम्मा यह दुख झेल नहीं पाईं और उन्हें हार्टअटैक आ गया था, बस तभी से वह बीमार रहती हैं. अब तो अल्ज़ाइमर भी बढ़ गया है.”

“तब तो उन्हें संभालना मुश्किल होता होगा. क्या करते हो? छह-छह महीने दोनों भाई रखते होंगे.” ऐसा पूछकर मैं शायद अपने मन को तसल्ली दे रहा था. आशा के विपरीत रमाशंकर बोला,  “नहीं-नहीं, मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता. अम्मा शुरू से दिल्ली में रही हैं. उनका कहीं और मन लगना मुश्किल है. मैं नहीं चाहता, इस उम्र में उनकी स्थिति पेंडुलम जैसी हो जाए. कभी इधर, तो कभी उधर. कितनी पीड़ा होगी उन्हें यह देखकर कि पिताजी के जाते ही उनका कोई घर ही नहीं रहा. वह हम पर बोझ हैं.”
मैं मुस्कुराया, “रमाशंकर, इंसान को थोड़ा व्यावहारिक भी होना चाहिए. जीवन में स़िर्फ भावुकता से काम नहीं चलता है. अक्सर इंसान दायित्व उठाते-उठाते थक जाता है और तब ये विचार मन को उद्वेलित करने लगते हैं कि अकेले हम ही क्यों मां-बाप की सेवा करें, दूसरा क्यों न करे.”

“पता नहीं रजत, मैं ज़रा पुराने विचारों का इंसान हूं. मेरा तो यह मानना है कि हर इंसान की करनी उसके साथ है. कोई भी काम मुश्क़िल तभी लगता है, जब उसे बोझ समझकर किया जाए. मां-बाप क्या कभी अपने बच्चों को बोझ समझते हैं? आधे-अधूरे कर्त्तव्यों में कभी आस्था नहीं होती रजत, मात्र औपचारिकता होती है और सबसे बड़ी बात जाने-अनजाने हमारे कर्म ही तो संस्कार बनकर हमारे बच्चों के द्वारा हमारे सम्मुख आते हैं. समय रहते यह छोटी-सी बात इंसान की समझ में आ जाए, तो उसका बुढ़ापा भी संवर जाए.”

मुझे ऐसा लगा, मानो रमाशंकर ने मेरे मुख पर तमाचा जड़ दिया हो. मैं नि:शब्द, मौन सोने का उपक्रम करने लगा, किंतु नींद मेरी आंखों से अब कोसों दूर हो चुकी थी. रमाशंकर की बातें मेरे दिलोदिमाग़ में हथौड़े बरसा रही थीं. इतने वर्षों से संचित किया हुआ अभिमान पलभर में चूर-चूर हो गया था. प्रशासनिक परीक्षा की तैयारी के लिए इतनी मोटी-मोटी किताबें पढ़ता रहा, किंतु पापा के मन की संवेदनाओं को, उनके हृदय की पीड़ा को नहीं पढ़ सका. क्या इतना बड़ा मुक़ाम मैंने स़िर्फ अपनी मेहनत के बल पर पाया है. नहीं, इसके पीछे पापा-मम्मी की वर्षों की तपस्या निहित है.

आख़िर उन्होंने ही तो मेरी आंखों को सपने देखने सिखाए. जीवन में कुछ कर दिखाने की प्रेरणा दी. रात्रि में जब मैं देर तक पढ़ता था, तो पापा भी मेरे साथ जागते थे कि कहीं मुझे नींद न आ जाए. मेरे इस लक्ष्य को हासिल करने में पापा हर क़दम पर मेरे साथ रहे और आज जब पापा को मेरे साथ की ज़रूरत है, तो मैं व्यावहारिकता का सहारा ले रहा हूं. दो वर्ष पूर्व की स्मृति मन पर दस्तक दे रही थी. सीवियर हार्टअटैक आने के बाद मम्मी बीमार रहने लगी थीं.

एक शाम ऑफिस से लौटकर मैं पापा-मम्मी के बेडरूम में जा रहा था, तभी अंदर से आती आवाज़ से मेरे पांव ठिठक गए. मम्मी पापा से कह रही थीं, “इस दुनिया में जो आया है, वह जाएगा भी. कोई पहले, तो कोई बाद में. इतने इंटैलेक्चुअल होते हुए भी आप इस सच्चाई से मुंह मोड़ना चाह रहे हैं.”

“मैं क्या करूं पूजा? तुम्हारे बिना अपने अस्तित्व की कल्पना भी मेरे लिए कठिन है. कभी सोचा है तुमने कि तुम्हारे बाद मेरा क्या होगा?” पापा का कंठ अवरुद्ध हो गया था, किंतु मम्मी तनिक भी विचलित नहीं हुईं और शांत स्वर में बोलीं थीं, “आपकी तरफ़ से तो मैं पूरी तरह से निश्‍चिंत हूं. रजत और रितु आपका बहुत ख़्याल रखेंगे, यह एक मां के अंतर्मन की आवाज़ है, उसका विश्‍वास है जो कभी ग़लत नहीं हो सकता.”

इस घटना के पांच दिन बाद ही मम्मी चली गईं थीं. कितने टूट गए थे पापा. बिल्कुल अकेले पड़ गए थे. उनके अकेलेपन की पीड़ा को मुझसे अधिक मेरी पत्नी रितु ने समझा. यूं भी वह पापा के दोस्त की बेटी थी और बचपन से पापा से दिल से जुड़ी हुई थी. उसने कभी नहीं चाहा, पापा को अपने से दूर करना, किंतु मेरा मानना था कि कोरी भावुकता में लिए गए फैसले अक्सर ग़लत साबित होते हैं. इंसान को प्रैक्टिकल अप्रोच से काम लेना चाहिए. अकेले मैं ही क्यों पापा का दायित्व उठाऊं? दोनों बड़े भाई क्यों न उठाएं? जबकि पापा ने तीनों को बराबर का स्नेह दिया, पढ़ाया, लिखाया, तो दायित्व भी तीनों का बराबर है. छह माह बाद मम्मी की बरसी पर यह जानते हुए भी कि दोनों बड़े भाई पापा को अपने साथ रखना नहीं चाहते, मैंने यह फैसला किया था कि हम तीनों बेटे चार-चार माह पापा को रखेंगे. पापा को जब इस बात का पता चला, तो कितनी बेबसी उभर आई थी उनके चेहरे पर. चेहरे की झुर्रियां और गहरा गई थीं. उम्र मानो 10 वर्ष आगे सरक गई थी. सारी उम्र पापा की दिल्ली में गुज़री थी. सभी दोस्त और रिश्तेदार यहीं पर थे, जिनके सहारे उनका व़क्त कुछ अच्छा बीत सकता था, किंतु… सोचते-सोचते मैंने एक गहरी सांस ली.

आंखों से बह रहे पश्‍चाताप के आंसू पूरी रात मेरा तकिया भिगोते रहे. उफ्… यह क्या कर दिया मैंने. पापा को तो असहनीय पीड़ा पहुंचाई ही, मम्मी के विश्‍वास को भी खंडित कर दिया. आज वह जहां कहीं भी होंगी, पापा की स्थिति पर उनकी आत्मा कलप रही होगी. क्या वह कभी मुझे क्षमा कर पाएंगी? रात में कई बार अम्मा का रमाशंकर को आवाज़ देना और हर बार उसका चेहरे पर बिना शिकन लाए उठना, मुझे आत्मविश्‍लेषण के लिए बाध्य कर रहा था. उसे देख मुझे एहसास हो रहा था कि इंसानियत और बड़प्पन हैसियत की मोहताज नहीं होती. वह तो दिल में होती है. अचानक मुझे एहसास हुआ, मेरे और रमाशंकर के बीच आज भी प्रतिस्पर्धा जारी है. इंसानियत की प्रतिस्पर्धा, जिसमें आज भी वह मुझसे बाज़ी मार ले गया था. पद भले ही मेरा बड़ा था, किंतु रमाशंकर का क़द मुझसे बहुत ऊंचा था.

गाड़ी मुंबई सेंट्रल पर रुकी, तो मैं रमाशंकर के क़रीब पहुंचा. उसके दोनों हाथ थाम मैं भावुक स्वर में बोला, “रमाशंकर मेरे दोस्त, चलता हूं. यह सफ़र सारी ज़िंदगी मुझे याद रहेगा.” कहने के साथ ही मैंने उसे गले लगा लिया.

आश्‍चर्यमिश्रित ख़ुशी से वह मुझे देख रहा था. मैं बोला, “वादा करो, अपनी फैमिली को लेकर मेरे घर अवश्य आओगे.”

“आऊंगा क्यों नहीं, आखिऱ इतने वर्षों बाद मुझे मेरा दोस्त मिला है.” ख़ुशी से उसकी आवाज़ कांप रही थी. अटैची उठाए पापा के साथ मैं नीचे उतर गया. स्टेशन के बाहर मैंने टैक्सी पकड़ी और ड्राइवर से एयरपोर्ट चलने को कहा. पापा हैरत से बोले, “एयरपोर्ट क्यों?” भावुक होकर मैं पापा के गले लग गया और रुंधे कंठ से बोला, “पापा, मुझे माफ़ कर दीजिए. हम वापिस दिल्ली जा रहे हैं. अब आप हमेशा वहीं अपने घर में रहेंगे.” पापा की आंखें नम हो उठीं और चेहरा खुशी से खिल उठा.

“जुग जुग जिओ मेरे बच्चे.” वह बुदबुदाए. कुछ पल के लिए उन्होंन अपनी आंखें बंद कर लीं, फिर चेहरा उठाकर आकाश की ओर देखा. मुझे ऐसा लगा मानो वह मम्मी से कह रहे हों, देर से ही सही, तुम्हारा विश्‍वास सही निकला.

जय श्री राम

👉 आत्मचिंतन के क्षण 16 March 2020

■ भगवान् को लाभ करना हो तो संसार से तीव्र-वैराग्य चाहिये। जो कुछ ईश्वर के मार्ग के विरोधी मालूम हो, उसे तत्क्षण त्यागना चाहिये। पीछे होगा यह सोच कर छोड़ रखना ठीक नहीं है। काम-काँचन ईश्वर-मार्ग के विरोधी हैं। उनसे मन हटा लेना चाहिये। दीर्घसूत्री होने से परमार्थ का लाभ नहीं होगा। कोई एक अंगोछा लेकर स्नान करने को जा रहा था। उसकी औरत ने उससे कहा कि- तुम किसी भी काम के नहीं हो, उम्र बढ़ रही है, अब भी यह सब (व्यवहार) छोड़ नहीं सके। मुझको छोड़कर तुम एक दिन भी नहीं रह सकते। किन्तु देखो, वह रामदेव कैसा त्यागी है। पति ने कहा-क्यों उसने क्या किया? औरत ने कहा- उसकी सोलह औरतें हैं। वह एक-एक करके उनको त्याग रहा है। तुम कभी त्याग कर नहीं सकोगे। जो त्याग करता है वह क्या थोड़ा-थोड़ा करके त्याग करता है? औरत से मुस्कराकर कहा-पगली, तू नहीं समझती है त्याग करना उसका काम नहीं है। अर्थात् उसके कहने से त्याग नहीं होगा, मैं ही त्यागकर सकूँगा। यह देख, मैं चल देता हूँ।’

□  इसी का नाम तीव्र वैराग्य है। उस आदमी को ज्यों वैराग्य आ गया त्यों−ही उसने त्याग किया। अंगोछा कन्धे में ही रहा कि वह चल दिया। वह संसार का कुछ ठीक-ठाक नहीं कर पाया। घर की ओर एक बार पीछे लौट कर देखा भी नहीं। जो त्याग करेगा उसको मनोबल चाहिए। लुटेरों का भाव! लूटने से पहले जैसे डाकू लोग कहते हैं, ऐ मारो! लूटो! काटो! अर्थात् पीछे क्या होगा, इसका ख्याल न कर खूब मनोबल के साथ आगे बढ़ना चाहिये।

◆ तुम और क्या करोगे? उनके (ईश्वर के) प्रति भक्ति और प्रेम लाभ कर दिन बिताना है। श्रीकृष्ण के अदर्शन से यशोदा पगली जैसी बनकर श्रीमती (राधा) के पास गई। श्रीमती ने उनका शोक देखकर आद्या शक्ति के रूप से उनको दर्शन दिया और उनसे कहा-‘माँ’ वर फिर क्या लूँ? तो इतना ही कहा कि-मैं तन, मन, वचन से कृष्ण की ही सेवा कर सकूँ, इन्हीं आँखों से उनके भक्तों का दर्शन हो। जहाँ-जहाँ उनकी लीलाएं हों इन पैरों से वहीं जा सकूँ। इन हाथों से उनके ही प्रेमी भक्तों की सेवा करूं। सब इन्द्रियाँ उन्हीं के दर्शन श्रवणादि में लगें।

✍🏻 रामकृष्ण परमहंस के उपदेश

👉 Renunciation of Karma is Self-Deception

Often people misinterpret the preaching of the holy Gita and Vedanta and regard the state of inaction as that of detachment and soul-realization. But this is mere delusion, idleness and escapism. Making the body inactive or renouncing the family and duties does not serve any purpose of spiritual ascent. What is important is the liberation of the mind from all ego, expectations and selfish attachments. You should perform all your duties, do all your work at your level best but be detached from the end-results.

Don’t expect the results of your actions to be as per your will or imagination. But don’t leave your actions (karmas) thinking that every thing will happen as per your destiny. You can’t live even for a single moment without any karma – be that physical or mental. You are born do transact your duties. This is what is implied in the following hymn:

“NaKaschitksanamapi Jatu Tisthtyakarma-Krat । Karyate Hyavasah Karma Sarvah Prakratijairgunaih ।।”

The system of Nature is such that it triggers every being, every particle, to act as per its natural tendencies. We might prevent the actions of our body or the sense organs for sometime; but what about the flow of thoughts and the impulses of unconscious mind? Those who attempt such superficial renouncement and try to evade from duties, actions suffer more agility and turbulence of desires and intrinsic tendencies in the mind… They are fake and self-cheaters.

📖 Akhand Jyoti, Aug 1940

👉 पारिवारिक कलह और मनमुटाव कारण तथा निवारण (भाग १)

सास बहू के झगड़े -

बहुसंख्यक परिवारों में सास बहू के झगड़े चल रहे हैं। इसके अनेक कारण है। सास बहू को अपने नियंत्रण में रखकर अनुशासन करना चाहती है। अपनी आशानुसार उससे कार्य कराना चाहती है। कभी-कभी वह अपने पुत्र को बहका कर बहू की मरम्मत कराती है। प्रायः देखा गया है कि जहाँ कोई पुरुष स्त्री को कष्ट देता है, तो उसके मध्य में अवश्य किसी स्त्री-सास, ननद या जिठानी रहती है। स्त्रियों में ईर्ष्या भाव अत्यधिक होता है। बहू का व्यक्तित्व प्रायः लुप्त हो जाता है तथा उसे रौरव नर्क की यन्त्रणाएं सहन करनी पड़ती हैं।कहीं पर पति बहू के इंगित पर नृत्य करता है और उसके भड़कायें से वृद्धा सास पर अत्याचार करता है। वृद्धा से कठिन कार्य कराया जाता है वह धुएं में परिवार के निमित्त भोजन व्यवस्था करती है जबकि बहू सिनेमा देखने या टहलने के लिए जाती है।

ये दोनों ही सीमाएं नियं हैं। सास बहू के सम्बन्ध पवित्र हैं। सास स्वयं बहू को देखने के लिए लालायित रहती है। उसके लिए वह दिन बड़े गौरव का होता है जब घर बहू रानी के पदार्पण से पवित्र होता है। उसे उदार, स्नेही, बड़प्पन से परिपूर्ण होना चाहिए। बहू की सहायता तथा पथ प्रदर्शन के लिए कार्य करना चाहिए। छोटी-मोटी भूलों को सहृदयता से माफ कर देना चाहिए इसी प्रकार बहू को सास में अपनी माता के दर्शन करने चाहिए और उसकी वही प्रतिष्ठा करनी चाहिए जो वह अपनी माता की करती रही है। यदि पुरुष माता को माता के स्थान पर पूज्य माने, और पत्नी को पत्नी के स्थान पर जीवन सहचरी, मिष्ठभाषणी प्रियतमा माने तो ऐसे संकुचित झगड़े बहुत कम उत्पन्न होंगे।

ऐसे झगड़ों में पुत्र का कर्त्तव्य बड़ा कठिन है। उसे माता की मान-प्रतिष्ठा का ध्यान रखना और पत्नी के गर्व तथा प्रेम की रक्षा करनी है। अतः उसे पूर्ण शान्ति और सुहृदयता से कर्त्तव्य भावना को ऊपर रखकर ऐसे झगड़ों को शाँत करना उचित है। किसी को भी अनुचित रीति से दबा कर मानहानि न करनी चाहिए। यदि पति कठोर, उग्र, लड़ने वाले स्वभाव का है, तो पारिवारिक शाँति और समृद्धि भंग हो जायेगी। प्रेम और सहानुभूति से दूसरों के दृष्टिकोण को समझकर बुद्धिमत्ता से अग्रसर होना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1951 पृष्ठ 22
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1951/January/v1.22

👉 श्रद्धा

श्रद्धा- भावों का उच्छृंखल आवेग न होकर भावऊर्जा का सकारात्मक एवं समर्थ स्रोत है। एक ऐसा ऊर्जा स्रोत जो जीवन के विविध आयामों को अनूठी चैतन्य ऊर्जा से सदा ऊर्जावान् बनाए रखती है। इतना ही नहीं श्रद्धा से श्रद्धावान् की जिन्दगी के सभी पहलुओं को स्वयं ही समर्थ एवं सक्षम सुरक्षा मिलती रहती है। उसके सद्गुरु, उसके आराध्य जिनके प्रति वह श्रद्धा पूर्ण है, उसके जीवन में हमेशा सक्षम प्रहरी की भाँति डटे रहते हैं।
  
इस सम्बन्ध में बड़ी हृदयस्पर्शी घटना है। कुछ सदी पहले जब नादिरशाह ने हिन्दुस्तान पर हमला किया, उस समय दिल्ली से कुछ दूर ग्रामीण इलाके में सूफी फकीर सलीम दरवेश अपनी आत्मसाधना में लीन थे। निरन्तर तप करते हुए परवरदिगार की सच्चे हृदय से इबादत और गाँव के लोगों में श्रद्धा एवं सद्विचार का संचार यही उनका नित्य का क्रम था। नादिरशाह के हमले की खबर, उसकी क्रूरता के कारनामें इन भोले-भाले ग्रामीण जनों तक पहुँची और उनमें घबराहट फैल गयी।
  
अब क्या होगा? यही सवाल सबके होठों पर था। वे सबके सब मिल-जुलकर फकीर की झोपड़ी पर पहुँचे। इन पहुँचने वालों में एक युवा शायर भी था। उसके मन की बेचैनी औरों से ज्यादा थी। उसने दर्द भरी लरजती आवाज में कहा-
अंधेरी राज तूफाने तलातुम नाखुदा गाफिल
यह आलम है तो फिर किश्ती, सरे मौजरवां कब तक?
  
अँधेरी रात, खतरनाक तूफान और नाखुदा के रूप में हिन्दुस्तान का बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला जो हमेशा शराब में डूबा रहता है, तो फिर हमारी कश्ती का भविष्य क्या? यह सुनकर फकीर कुछ देर चुप रहे फिर बोले-
अच्छा यकीं नहीं है तो उसे कश्ती डुबोने दे,
एक वही नाखुदा नहीं बुजदिल! खुदा भी है।
और इतिहास गवाह है, उस फकीर की श्रद्धा काम आयी। खुदा के इस नेक बन्दे के समझाने पर नादिरशाह कत्लोगारद छोड़कर वापस लौट गया।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०५

रविवार, 15 मार्च 2020

👉 दो स्वर्णिम सूत्र

इस स्थिति पर विजय प्राप्त करने के दो मार्ग हैं - प्रथम वह है जो दाम्पत्य जीवन का सच्चा सार है अर्थात यह दृढ़ प्रतिज्ञा और उसका निर्वाह कि हम दोनों पति-पत्नी एकदूसरे का परित्याग नहीं करेंगे, हम, प्रेम, सहानुभूति, त्याग, शील, आदान-प्रदान, सहायता के टूटे हुए प्रत्येक तार को गाँठ लेंगे । हम विश्वास, आशा, सहिष्णुता, अवलंब, उपयोगिता की गिरी हुई दीवार के प्रत्येक भाग की निरंतर प्रयत्न और भक्ति से मरम्मत करेंगे; हम एकदूसरे से माफी माँगने, सुलह और समझौता करने को सदैव प्रस्तुत रहेंगे ।

दूसरा उपाय है- पति-पत्नी की एकदूसरे के प्रति अनन्य भावना । पति-पत्नी एकदूसरे में लीन हो जाएँ, समा जाएँ, लय हो जाएँ, अधीनता की भावना छोड़ स्वभाव की पूजा करें । विवाह का आध्यात्मिक अभिप्राय दो आत्माओं का शारीरिक, मानसिक और आत्मिक संबंध है । इसमें दो आत्माएँ ऐसी मिल जाती हैं कि इस पार्थिव जीवन तथा उच्च देवलोक में भी मिली रहती हैं । यह दो मस्तिष्कों, दो हृदयों, दो आत्माओं तथा साथ ही साथ दो शरीरों का एकदूसरे में लय हो जाना है । जब तक यह स्वरैक्य नहीं होता विवाह का आनंद प्राप्त नहीं हो सकता । विवाहित जोड़े में परस्पर वह विश्वास और प्रतीति होना आवश्यक है, जो दो हृदयों को जोड़कर एक करता है । जब दो हृदय एकदूसरे के लिए आत्मसमर्पण करते हैं, तो एक या दूसरे को कोई तीसरा व्यक्ति बिगाड़ने नहीं पाता है । केवल इस प्रकार ही वह आध्यात्मिक दाम्पत्य अनुराग संभव हो सकता है, जिसका समझना उन व्यक्तियों के लिए कठिन है, जो अपने अनुभव से इस प्रेम और समझौते के, इस पारस्परिक उत्तरादायित्व तथा सम्मान के आसक्ति और आत्मसंतोष के, मानव तथा दिव्य प्रेरणाओं के विस्मयोत्पादक संयोग को जिसका नाम सच्चा विवाह है, नहीं जानते ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 गृहलक्ष्मी की प्रतिष्ठा

शनिवार, 14 मार्च 2020

👉 त्याग और प्रेम

एक दिन नारद जी भगवान के लोक को जा रहे थे। रास्ते में एक संतानहीन दुखी मनुष्य मिला। उसने कहा-नाराज मुझे आशीर्वाद दे दो तो मेरे सन्तान हो जाय। नारद जी ने कहा-भगवान के पास जा रहा हूँ। उनकी जैसी इच्छा होगी लौटते हुए बताऊँगा।

नारद ने भगवान से उस संतानहीन व्यक्ति की बात पूछी तो उनने उत्तर दिया कि उसके पूर्व कर्म ऐसे हैं कि अभी सात जन्म उसके सन्तान और भी नहीं होगी। नारद जी चुप हो गये।

इतने में एक दूसरे महात्मा उधर से निकले, उस व्यक्ति ने उनसे भी प्रार्थना की। उनने आशीर्वाद दिया और दसवें महीने उसके पुत्र उत्पन्न हो गया। एक दो साल बाद जब नारद जी उधर से लौटे तो उनने कहा- भगवान ने कहा है-तुम्हारे अभी सात जन्म संतान होने का योग नहीं है।

इस पर वह व्यक्ति हँस पड़ा। उसने अपने पुत्र को बुलाकर नारद जी के चरणों में डाला और कहा-एक महात्मा के आशीर्वाद से यह पुत्र उत्पन्न हुआ है। नारद को भगवान पर बड़ा क्रोध आया कि व्यर्थ ही वे झूठ बोले। मुझे आशीर्वाद देने की आज्ञा कर देते तो मेरी प्रशंसा हो जाती सो तो किया नहीं, उलटे मुझे झूठा और उस दूसरे महात्मा से भी तुच्छ सिद्ध कराया। नारद कुपित होते हुए विष्णु लोक में पहुँचे और कटु शब्दों में भगवान की भर्त्सना की।

भगवान ने नारद को सान्त्वना दी और इसका उत्तर कुछ दिन में देने का वायदा किया। नारद वहीं ठहर गये। एक दिन भगवान ने कहा-नारद लक्ष्मी बीमार हैं- उसकी दवा के लिए किसी भक्त का कलेजा चाहिए। तुम जाकर माँग लाओ। नारद कटोरा लिये जगह-जगह घूमते फिरे पर किसी ने न दिया। अन्त में उस महात्मा के पास पहुँचे जिसके आशीर्वाद से पुत्र उत्पन्न हुआ था। उसने भगवान की आवश्यकता सुनते ही तुरन्त अपना कलेजा निकालकर दे किया। नारद ने उसे ले जाकर भगवान के सामने रख दिया।

भगवान ने उत्तर दिया- नारद! यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। जो भक्त मेरे लिए कलेजा दे सकता है उसके लिए मैं भी अपना विधान बदल सकता हूँ। तुम्हारी अपेक्षा उसे श्रेय देने का भी क्या कारण है सो तुम समझो। जब कलेजे की जरूरत पड़ी तब तुमसे यह न बन पड़ा कि अपना ही कलेजा निकाल कर दे देते। तुम भी तो भक्त थे। तुम दूसरों से माँगते फिरे और उसने बिना आगा पीछे सोचे तुरन्त अपना कलेजा दे दिया। त्याग और प्रेम के आधार पर ही मैं अपने भक्तों पर कृपा करता हूँ और उसी अनुपात से उन्हें श्रेय देता हूँ।” नारद चुपचाप सुनते रहे। उनका क्रोध शान्त हो गया और लज्जा से सिर झुका लिया।

👉 अपने बाल-बच्चे मत बेचिए! (अन्तिम भाग)

तिलक-दहेज में विशेष रुपये-पैसे खर्च करके आज के दिन धनी-मानी कहलाने वाले लोगों की जो दुर्दशा होती है, वह वे बिचारी जानती हैं या भगवान् ही जानता है। यदि वे कन्याएं किसी कन्यार्थी एवं सीधे-सादे श्रमजीवी के घर भी ब्याही गयी होतीं, तो भी, मेरी समझ से, उन्हें उतना कष्ट नहीं होता। तिकल-दहेज ही एक ऐसा प्रतिबन्ध है, जिससे किसी पूँजीपति, जमींदार और धनी कहलाने वाले मनुष्य की कन्या किसी किसान या मजदूर के घर नहीं ब्याही जाती और ऐसा होने से समाज में जो समानता और भ्रातृत्व उत्पन्न होता, वह आज नहीं हो पाता सामाजिक अभिन्नता और मैत्री के ख्याल से भी इस कुप्रथा को समाज से निर्वासित करने की निताँत आवश्यकता है।

लड़का बेचने वालों को अपनी व्यर्थ को मान-प्रतिष्ठ आदि खोजने के लिये नीच-तमाशे आदि में बहुत से रुपये लगाने पड़ते हैं नशीली चीजों का भी व्यवहार करना पड़ता है। इस तरह जिस कुप्रथा के कारण कुकर्म में पानी की तरह रुपये बहाने पड़ते हैं, उसके कायम रहते वर-वधू की सुख और शाँति ही कब नसीब हो सकती है। कितनी ही जगहों में बहुत से लोग तिलक-दहेज के लिए इस तरह गुटबंदी किये रहते हैं कि किसी लड़की वाले के सम्मुख एक दूसरे का गुण गान करते और उसको बहुत ही धनी तथा प्रतिष्ठित बना देते हैं, जिससे कन्या वालों को पूर्ण विश्वास हो जाता है और उस लड़के वाले को तिलक-दहेज में मुँह माँगे रुपये आदि देकर अपनी कन्या का विवाह उस लड़के के साथ कर देते हैं। उस तरह अनेक स्थानों में तिलक-दहेज के नाम पर प्रायः धोखा और विश्वासघात हो रहा है। कितने ही लोग लड़के वाले से इस तरह मिले रहते हैं कि विवाह होने पर दान-दहेज में कमीशन पाते हैं।

इस प्रकार कन्या-विक्रय में दलाली और अनेक धोखेबाजियाँ हुआ करती हैं। वर-विक्रय और कन्या-विक्रय की इस कुप्रथा के कारण बहुत-सी अव्यक्त-वेदना एवं निर्णाक-कुण्ठिता नव-वधुओं के ऊपर जितने अत्याचार हो रहे हैं, उन्हें सुनकर पाषाण हृदय भी कम्पित हो जाता है। जिसका पिता दहेज में अधिक रुपये न दे सके, उस वधू विचारी को तरह-तरह से कोसा जाता है। कहते हैं कि कितने ही घरों में तो बहुएं इसलिए भी जलाकर मार डाली जाती हैं कि नये विवाह में तिलक-दहेज में और भी अधिक रुपये आदि मिलेंगे। वधू कैसे ही गुणवती हो, गृह-कार्य में कैसी ही प्रवीण हो, पर उसकी नितान्त उपेक्षा की जाती है। रुपये पैसे के लिए उसके रूप-लावण्य आदि के गुणों पर पानी फेर दिया जाता है। परिवार के स्त्री-पुरुष सभी उससे घृणा करते हैं। कितनी ही कन्याएं पिता के घर इसलिए छोड़ दी जाती हैं और पति के घर उन्हें नहीं ले जाया जाता, क्योंकि उनके पिता किसी निष्ठुर एवं लोभी लड़के वाले को दहेज में विशेष द्रव्यादि नहीं दे सके। जबकि समाज में कन्याओं का पुनर्विवाह निषिद्ध है तो यह कैसा अन्याय है और हमारे समाज का यह कैसा बड़ा अत्याचार है?

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 21

👉 On The Karma-Yoga of Gita

Every human being, each one of us, is born in human form to play a specific role, transact some specific duty. This duty and one’s ability to fulfill it depends upon one’s intrinsic character since birth. Honest efforts to do the karmas towards these duties are what could be termed as the gist of Karma Yoga. It was essentially this duty that Arjun was reminded by Lord Krishna in the holy   Bhagvad Gita. Lord Krishna made him aware of the majestic purpose for which Arjun was born on the earth. God has given us the freedom of karma and hence of creating our own future destiny; but we can’t escape transacting the destined duties.

God lives within every living being and triggers the direction of one’s life as per the accumulated effects of one’s past karmas. The molecular or cellular components or the RBCs in our blood are bound to be at the assigned positions and be engaged in specific functions as per their biological nature. They are the parts of our body and hence should be governed by us. But we can’t change their natural properties in any case. Thus, they are independent too… This is how we are also independent in God’s creation.

We have the freedom in choosing our (new) karma despite having to live as per certain destined circumstances, but the results of these would be according to our intentions, aim and nature of our karma as per the absolute law of the Supreme Creator. That is why God says – “Karmanyeva Adhikarste, Ma Phalesu Kadachan”. Those who understand and follow it are karma-yogis. Those who do not, and always expect desired outputs in return of their actions, are, on the contrary, often found complaining their destiny or the world and remain desperate and dismayed most of the time…

📖 Akhand Jyoti, July 1940

👉 संयम

परमात्मा के मार्ग पर चलने के लिए जो उत्सुक होते हैं, वे प्रायः आत्मपीड़न को साधना समझ लेते हैं। उनकी यही भूल उनके जीवन को विषाक्त कर देती है। प्रभु प्राप्ति संसार के निषेध का रूप ले लेती है। इस निषेध के कारण आत्मा की साधना शरीर को नष्ट करने का सरंजाम जुटाने लगती है। इस नकार दृष्टि से उनका जीवन नष्ट होने लगता है। और उन्हें होश भी नहीं आ पाता कि जीवन का विरोध परमात्मा के साक्षात्कार का पर्यायवाची नहीं है।
  
सच्चाई तो यह है कि देह के उत्पीड़क भी देहवादी ही होते हैं। उन्हें आत्मचिन्तन सूझता ही नहीं है। संसार के विरोधी कहीं न कहीं सूक्ष्म रूप से संसार से ही बँधे होते हैं। अनुभव यही कहता है कि संसार के प्रति भोग दृष्टि जितना संसार से बाँधती है, संसार से विरोध दृष्टि भी उससे कुछ कम नहीं, बल्कि उससे कहीं ज्यादा बाँधती है।
  
साधना-संसार व शरीर का विरोध नहीं, बल्कि इनका अतिक्रमण एवं उत्क्रान्ति है। यह दिशा न तो भोग की है और न दमन की है। यह तो इन दोनों दिशाओं से भिन्न एक तीसरी ही दिशा है। यह दिशा आत्मसंयम की है। दोनों बिन्दुओं के बीच मध्य बिन्दु खोज लेना संयम है। पूरी तरह से जो मध्य में है, वही अतिक्रमण या उपरामता है। इन दोनों के पार चले जाना है।
  
भोग या दमन की अति असंयम है, मध्य संयम है। अति विनाश है, मध्य जीवन है। जो अति को पकड़ता है, वह नष्ट हो जाता है। भोग हो या दमन दोनों ही जीवन को नष्ट कर देते हैं। अति ही अज्ञान है, यही अन्धकार है, यही विनाश है। जो इस सच को जान जाता है वह भोग और दमन दोनों को ही छोड़ देता है। ऐसा करते ही उसके सब तनाव स्वाभाविक ही विलीन हो जाते हैं। उसे अनायास ही मिल जाता है- स्वाभाविक, सहज एवं स्वस्थ जीवन। संयम को उपलब्ध होते ही जीवन शान्त व निर्भार हो जाता है। उसकी मुस्कराहट कभी मुरझाती नहीं। जिसने स्वयं में संयम की समझ पैदा कर ली वह खुशियों की खिलखिलाहट से भर उठता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०४

👉 दांपत्य जीवन में कलह से बचिए (अन्तिम भाग)

इस झगड़े का एकमात्र हल यह है कि स्त्री, पुरुष को और पुरुष, स्त्री को अपने मन की अधिकाधिक उदार भावना से बरतें। जैसे किसी व्यक्ति का एक हाथ या एक पैर कुछ कमजोर, रोगी या दोषपूर्ण हो तो वह उसे न तो काटकर फेंक देता है, न कूट डालता है और न उससे घृणा, असंतोष, विद्वेष आदि करता है, अपितु उस विकृत अंग को अपेक्षाकृत अधिक सुविधा देने और उसके सुधारने के लिए स्वस्थ भाग को भी थोड़ी उपेक्षा कर देता है। यही नीति अपने कमजोर साथी के प्रति बरती जाए तो झगड़े का एक भारी कारण दूर हो जाता है।

झगड़ा करने से पहले आपसी विचार-विनिमय के सब प्रयोगों को अनेक बार कर लेना चाहिए। कोई वज्र मूर्ख और घोर दुष्ट प्रकृति के मनुष्य तो ऐसे हो सकते हैं जो दंड के अतिरिक्त और किसी वस्तु से नहीं समझते, पर अधिकांश मनुष्य ऐसे होते हैं, जो प्रेमभावना के साथ, एकांत स्थान में सब ऊँच-नीच समझाने से बहुत कुछ समझ और सुधर जाते हैं। जो थोड़ा-बहुत मतभेद रह जाए उसकी उपेक्षा करके उन बातों को ही विचार क्षेत्र में आने देना चाहिए जिनमें मतैक्य है। संसार में रहने का यही तरीका है कि एकदूसरे के सामने थोड़ा-थोड़ा झुका जाए और समझौते की नीति से काम लिया जाए। महात्मा गांधी, उच्चकोटि के आदर्शवादी और संत थे, पर उनके ऐसे भी अनेकों सच्चे मित्र थे जो उनके विचार और कार्यों से मतभेद् ही नहीं विरोध भी रखते थे। यह मतभेद उनकी मित्रता में बाधक न होते थे। ऐसे ही उदार समझौतावादी नीति के आधार पर आपसी सहयोग-संबंधों को कायम रखा जा सकता है।

इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि साथी में दोष-दुर्गुण हों उनकी उपेक्षा की जाए और उन बुराइयों को अबाध रीति से बढ़ने दिया जाए। ऐसा करना तो एक भारी अनर्थ होगा। जो पक्ष अधिक बुद्धिमान, विचारशील एवं अनुभवी है उसे अपने साथी को सुसंस्कृत, समुन्नत, सद्गुणी बनाने के लिए भरसक प्रयत्न करना चाहिए। साथ ही अपने आप को भी ऐसा मधुरभाषी, उदार, सहनशील एवं निर्दोष बनाने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए कि साथी पर अपना समुचित प्रभाव पड़ सके। जो स्वयं अनेक बुराइयों में फँसा हुआ है, वह अपने साथी को सुधारने में सफल कैसे हो सकता है? सती सीता परमसाध्वी उच्चकोटि की पतिव्रता थीं, पर उनके पतिव्रता होने का एक कारण यह भी था कि एकपत्नी व्रतधारी अनेक सद्गुणों से संपन्न राम की धर्मपत्नी थीं। रावण स्वयं दुराचारी था उसकी स्त्री मन्दोदरी सर्वगुणसंपन्न एवं परम बुद्धिमान होते हुए भी पतिव्रता न रह सकी। रावण के मरते ही उसने विभीषण से पुनर्विवाह कर लिया।

जीवन की सफलता, शांति, सुव्यवस्था इस बात पर निर्भर है कि हमारा दाम्पत्य जीवन सुखी और संतुष्ट हो। इसके लिए आरंभ में ही बहुत सावधानी बरती जानी चाहिए और गुण-कर्म की समानता के आधार पर लड़के-लड़कियों के जोड़े चुने जाने चाहिए। अच्छा चुनाव होने पर भी पूर्ण समता तो हो नहीं सकती, इसलिए हर एक स्त्री-पुरुष के लिए इस नीति को अपनाना आवश्यक है कि अपनी बुराइयों को कम करे साथी के साथ मधुरता, उदारता और सहनशीलता का आत्मीयतामय व्यवहार करे, साथ ही उसकी बुराइयों को कम करने के लिए धैर्य, दृढ़ता और चतुरता के साथ प्रयत्नशील रहे। इस मार्ग परं चलने से असंतुष्ट दाम्पत्य-जीवन में संतोष की मात्रा बढ़ेगी और संतुष्ट दंपती स्वर्गीय जीवन का आनंद उपलब्ध करेंगे।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 गृहलक्ष्मी की प्रतिष्ठा

शुक्रवार, 13 मार्च 2020

👉 जीवन का सत्य


जीवन की नश्वरता को जो जान लेते हैं, वे सत्य को समझ लेते हैं। जिन्हें भी सत्य की अनुभूति हुई है, उन सबने यही कहा है कि जीवन झाग का बुलबुला है। जो इस घड़ी है, अगली घड़ी मिट जाएगा। जो इस नश्वर को शाश्वत मान लेते हैं, वे इसी में डूबते और नष्ट हो जाते हैं। लेकिन जो इसके सत्य के प्रति सजग होते हैं, वे एक ऐसे जीवन को पा लेने की शुरुआत करते हैं, जिसका कोई अन्त नहीं है।
  
जीवन के इस सत्य का अनुभव करने वाले एक फकीर को किसी बादशाह ने कैद कर लिया। कैद की वजह यह थी कि उसने बादशाद के सामने सत्य बातें कह दी थीं। बादशाह को फकीर का कहा हुआ सच अप्रिय लगा, सो उसने उसे कैद कर लिया। उस फकीर के एक मित्र ने उससे कहा- आखिर यह बैठे-बिठाये मुसीबत क्यों मोल ले ली। न कहते वे सब बातें, तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता। अपने मित्र की बातें सुनकर फकीर हँस पड़ा और बोला- मैं करूँ भी तो क्या? जब से खुदा का दीदार हुआ है, तब से झूठ बेमानी हो गया है। कोशिश करने पर भी झूठ बोला ही नहीं जाता।
  
परमात्मा की सत्ता ही कुछ ऐसी है कि उसे अनुभव करने के बाद असत्य का ख्याल ही नहीं आता। सत्य के अतिरिक्त अब जीवन में कोई विकल्प नहीं है। फिर-इस कैद का क्या? यह कैद तो बस घड़ी भर की है। फकीर की कही हुई यह बात  जेल के किसी सिपाही ने सुन ली और बादशाह को बता भी दी। इसे सुनकर उस बादशाह ने कहा- उस पागल फकीर से कहना कि यह कैद घड़ी भर की नहीं, बल्कि जीवन भर की है। फकीर ने जब बादशाह के इस कथन को सुना तो जोर से हँस पड़ा और बोला- अरे भाई! उस बादशाह से कहना कि उस पागल फकीर ने कहा है कि क्या जिन्दगी घड़ी भर से ज्यादा की है? सचमुच ही जो जीवन का सत्य पाना चाहते हैं उन्हें जीवन की यह सच्चाई जाननी ही पड़ती है। इसे समझकर वे अनुभव कर पाते हैं कि एक स्वप्न से अधिक न तो जीवन की कोई सत्ता है और न ही जीवन का सत्य।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०३

👉 दांपत्य जीवन में कलह से बचिए (भाग १)

नेक परिवारों में स्त्री-पुरुषों के मध्य जैसे मधुर संबंध नहीं देखे जाते जैसे कि होने चाहिए । अनेक घरों में आएदिन संघर्ष, मनोमालिन्य और अविश्वास के चिन्ह परिलक्षित होते रहते हैं । कारण यह है कि पति-पत्नी में से एक या दोनों ही केवल अपनी-अपनी इच्छा, आवश्यकता और रुचि को प्रधानता देते हैं । दूसरे पक्ष की भावना और परिस्थितियों को न समझना ही प्रायः कलह का कारण होता है ।

जब एक पक्ष दूसरे पक्ष की इच्छानुसार आचरण नहीं करता है तो उसे यह बात अपना अपमान, उपेक्षा या तिरस्कार प्रतीत होती है, जिससे चिढ़कर वह दूसरे पक्ष पर कटु वाक्यों का प्रहार या दुर्भावनाओं का आरोपण करता है । उत्तर-प्रत्युत्तर आक्रमण-प्रत्याक्रमण, आक्षेप-प्रत्याक्षेप का सिलसिला चल पड़ता है तो उससे कलह बढ़ता ही जाता है । दोनों में से कोई अपनी गलती नहीं मानता, वरन दूसरे को अधिक दोषी सिद्ध करने के लिए अपनी जिद को आगे बढ़ाते रहते हैं । इस रीति से कभी भी झगड़े का अंत नहीं हो सकता । अग्नि में ईंधन डालते जाने से तो और भी अधिक प्रज्वलित होती है ।

जो पति-पत्नी अपने संबंधों को मधुर रखना चाहते हैं उन्हें चाहिए कि दूसरे पक्ष की योग्यता, मनोभूमि, भावना, इच्छा, संस्कार, परिस्थिति एवं आवश्यकता को समझने का प्रयत्न करें और उस स्थिति के मनुष्य के लिए जो उपयुक्त हो सके ऐसा उदार व्यवहार करने की चेष्टा करें, तो झगड़े के अनेक अवसर उत्पन्न होने से पहले ही दूर हो जाएँगे । हमें भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि सब मनुष्य एक समान नहीं हैं, सबकी रुचि एक समान नहीं है, सबकी बुद्धि, भावना और इच्छा एक जैसी नहीं होती । भिन्न वातावरण भिन्न परिस्थिति और भिन्न कारणों से लोगों की मनोभूमि में भिन्नता हो जाती है । यह भिन्नता पूर्णतया मिटकर दूसरे पक्ष के बिलकुल समान हो जावे यह हो नहीं सकता । कोई स्त्री-पुरुष आपस में कितने ही सच्चे क्यों न हों, उनके विचार और कार्यों में कुछ न कुछ भिन्नता रह ही जाएगी ।

अनुदार स्वभाव के स्त्री-पुरुष कट्टर एवं संकीर्ण मनोवृत्ति के होने के कारण यह चाहते हैं कि हमारा साथी हमारी किसी भी बात में तनिक भी मतभेद न रखे । पति अपनी पत्नी को पतिव्रत का पाठ पढ़ाता है और उपदेश करता है कि तुम्हें पूर्ण पतिव्रता, इतनी उग्र पतिव्रता होना चाहिए कि पति की किसी भी भली-बुरी विचारधारा, आदत कार्य प्रणाली में हस्तक्षेप न हो । इसके विपरीत स्त्री अपने पति से आशा करती है कि पति के लिए भी उचित है कि स्त्री को अपना जीवनसंगी, आधा अंग समझकर उसके सहयोग एवं अधिकार की उपेक्षा न करे । ये भावनाएँ जब संकीर्णता और अनुदारता से सम्मिश्रित होती हैं तो एक पक्ष सोचता है कि मेरे अधिकार को दूसरा पक्ष पूर्ण नहीं करता । बस यहीं से झगड़े की जड़ आरंभ हो जाती है ।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 गृहलक्ष्मी की प्रतिष्ठा

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 13 March 2020



👉 अपने बाल-बच्चे मत बेचिए! (भाग २)

जिस परिवार में तिलक-दहेज की विशेष चाहत हैं, वहाँ कन्याओं का समुचित सत्कार नहीं हो सकता, बल्कि वे आरम्भ से ही उपेक्षा की दृष्टि से देखी जाती हैं। उन्हें सुयोग्य बनाने का भी प्रयत्न प्रायः नहीं किया जाता। ऊँची शिक्षा देने-दिलाने की बात तो दूर रही, सूत कातने, कपड़ा बुनने, भात-रोटी आदि भोजन की सामग्री प्रस्तुत करने, तथा सीना-पिरोना आदि उपयोगी कार्यों के ज्ञान से भी वे वंचित रहती हैं, जिससे उन्हें पति-गृह में और भी अधिक कष्ट भोगने पड़ते हैं। कन्याओं के प्रति सभी का यह भाव रहता है कि कन्या ऐसी महाजन है जो हम लोगों से अपना ऋण अदा कराने आयी है, अतएव उसका आदर ही क्या? लोग उनकी उपेक्षा करते हैं। बेचारी कन्याओं के बीमार पड़ने पर प्रायः लोग उनकी चिकित्सा आदि की व्यवस्था भी उस समय नहीं करते, जैसे लड़के के लिये करते हैं। जनसाधारण में ऐसी कहावत प्रसिद्ध है कि ‘बिन ब्याहे बेटी मरे, खड़ी उख बिकाय। बिन मारे बैरी मरे, दोनों कुल तर जाय।”

एक ही घर में लड़कों को सुन्दर चीजें खिलायी-पिलायी जाती हैं और कन्याओं को उन चीजों से यत्नपूर्वक वंचित रखा जाता है। तिलक-देहज के कारण जब कन्याओं के लिए वर-घर उपयुक्त नहीं मिलते, तो लोग उन्हें अभागिनी और बुरे लक्षणों वाली कह कर अपमानित किया करते हैं विशेष तिलक-देहज के भय से कुछ लोग अपनी कन्या का विवाह बूढ़े, रोगी एवं भारी अयोग्य पुरुष के साथ करने में भी संकोच नहीं करते, क्योंकि ऐसा करने में उन्हें कम खर्च करना पड़ता है। कहीं-कहीं तिलक-देहज की परेशानी के कारण कन्या के उपयुक्त घर और वर नहीं मिलते, तो उनके अभिभावक व्यर्थ के मोह में पड़ कर मरते हुए भी देखे जाते हैं। कन्या खरीद कर जो विवाह करने वाले हैं, उनमें अधिकाँश से लोग ऐसे होते हैं, जिनका विवाह करना निर्धनता आदि कई कारणों से उनके परिवार वाले पसंद नहीं करते। जिस दिन से नव-वधू पति गृह में जाती है, उस दिन से वहाँ अनेकों लड़ाई-झगड़े खड़े हो जाते हैं। वह परिवार नरक से भी भयानक हो जाता है। उस विवाहिता रमणी को तरह-तरह के दुखों का सामना करना पड़ता है और उसकी संतानें भी दुखों से बची नहीं रहतीं।

तिलक-दहेज देकर जो कन्याओं का विवाह करते हैं, उनके यहाँ यदि कोई दूसरी लड़की है, तो उसी अनुपात से उन्हें उसके विवाह में रुपये आदि भी खर्च करने पड़ते हैं, यदि उनके भाई या परिवार के और किसी आदमी के कोई लड़की है और उसके तिलक-दहेज में बुरा कुछ भी कम हुआ, तो उसका फल बहुत बुरा होता है। उनके घर में शीघ्र ही वैमनस्य फैल जाता है। तरह-तरह के लड़ाई-झगड़े खड़े होकर उस परिवार का नाश करके ही छोड़ते हैं। कितने ही लोगों को तो कन्या-विक्रय और वर-विक्रय की कुप्रथा के कारण इतना अधिक खर्च करना पड़ता है कि वे बहुत जल्द राह के भिखारी बन जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 20

👉 The Roots of Fulfillment

Most thinkers, philosophers of the world opine that self-evolution is a natural desire, and tendency of every living being. In fact this is what lies behind one’s quest for progress and joy… All efforts, all competitions and struggles for worldly possessions, sensual pleasures, ego-satisfaction emanate from this rootcause in the deepest depth, though we don’t realize it because of our extrovert
attitude and illusions of letting the worldly substances and circumstances as the keys to a treasure of joy.

One earns money with hard work and keeps saving it to get more and more. Why? Because, he ‘feels’ it like a source of joy. But the same fellow might spend his savings in gorgeous arrangements of his child’s marriage? Why? Because that might give him a ‘feeling’ of greater pleasure of making his child happy or gaining prestige in the society or what not…! A dacoit risks his life in bringing huge wealth in loot, but what does he do of it? He might just throw it in drinking liquor; because for him that might appear to be a greater source of pleasure than saving the money or using it some other ways.

If the savings are consumed in religious alms or treatment of a disease, one does not feel as bad as one would, if the same amount was lost due to burglary. So what we see common in all these examples and perhaps in every action of our life is that one opts for what he or she feels or thinks as more satisfying, although this satisfaction or joy might be just circumstantial, illusory and short-lived. Deeper thinking would indicate that the root of this quest for joy or fulfillment lies beneath the sublime core of eternal quest of the self for ascent, for betterment, for unbounded evolution… Then we would then attempt for the absolute unalloyed bliss, ultimate fulfillment.

📖 Akhand Jyoti, June 1940

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 March 2020

■ जो हीन बुद्धि हैं, वे ही सिद्धाई चाहते हैं। बीमारी को अच्छा करना, मुकदमा जिता देना, जल के ऊपर से चलना-ये सब (सिद्धाई हैं)। जो भगवान् के भक्त हैं, वे ईश्वर के पादपद्मों को छोड़ कर और कुछ भी नहीं चाहते हैं। जिनकी थोड़ी बहुत सिद्धाई हो, उनकी प्रतिष्ठा-लोकमान्य होती है। व्याकुल होकर भगवान् की प्रार्थना करो। विवेक के लिए प्रार्थना करो। ईश्वर ही लक्ष्य है, और सब अनित्य है, इसी का नाम विवेक है। जल-छादन (जल छानने के महीन कपड़े) से जल छान लेना होता है। मेला-कूड़ा कर्कट एक तरफ रहता है, और अच्छा जल दूसरे तरफ पड़ता है। तुम उनको (ईश्वर को) जान कर संसार को छोड़ो इसी का नाम विद्या का संसार है।

□  नाना मत हैं। ‘मत का पन्थ’ अर्थात् जितने मत हैं उतने ही पन्थ हैं। किन्तु सभी मानते हैं कि-‘मेरा मत ही ठीक है - मेरी ही घड़ी ठीक चल रही है।’ सत्य कथा - सत्य बोलना कलि की तपस्या है। कलियुग में अन्य तपस्या कठिन है। सत्य मार्ग पर रहने से भगवान् पाया जाता है। अवतार या अवतार के अंश को ईश्वर कोटि कहते हैं, और साधारण लोगों का जीवन या जीव-कोटि। जो जीव कोटी के हैं, वे साधनाएं कर ईश्वर का लाभ कर सकते हैं। वे (निर्विकल्प) समाधि से फिर लौटते नहीं हैं।

◆ जो ईश्वर कोटी हैं, वे मानो राजा के बेटे हैं, और मानों सात मंजिल वाले मकान की चाबी उनके हाथ में है। वे सातों मंजिलों तक चढ़ जाते हैं, फिर इच्छानुसार उतर भी आ सकते हैं। जीव कोटी मानो छोटे कर्मचारी (नौकर) हैं वे सात मंजिल के कुछ दूर तक पहुँच सकते हैं।जनक ज्ञानी थे। साधनाएं कर उन्होंने ज्ञान लाभ किया था। शुकदेव थे ज्ञान की मूर्ति। शुकदेव का साधनाएं कर ज्ञान लाभ करना नहीं हुआ था। नारद में भी शुकदेव के जैसा ब्रह्मज्ञान था। किन्तु वह भक्ति लेकर था। लोकशिक्षा के लिए प्रहलाद कभी ‘सोऽहं’ भाव में रहते, फिर कभी दास भाव में और कभी सन्तान भाव में रहते थे। हनुमान की भी वैसी अवस्था थी।
✍🏻 रामकृष्ण परमहंस के उपदेश

सोमवार, 9 मार्च 2020

👉 हमारी होली

ऐसी होली जले ज्ञान की ज्योति जगत मे भरदे।
कलुषित कल्मष जले, नाश पापों तापों का कर दे ।।


आप अपने जीवन में कितनी होलियाँ मना चुके, कितने दिवालियाँ बिता चुके, सावन, सनुने, दौज, दशहरे अबतक कितने बिता दिये, जरा उँगलियों पर गिन कर बताइये तो कितनी बार आपने धूम- धाम से तैयारियाँ  की और कितनी बार आनन्द सामग्री को विसर्जित किया। आपने उनमें खोजा, कुछ क्षण पाया भी, परन्तु ओस की बूँदें ठहरीं कब? वे दूसरे ही क्षण जमीन पर गिर पड़ीं और धूलि में समा गईं। इस बार की होली भी ऐसी ही होनी है। चैत बदी प्रतिपदा, दौज, तीज के बाद त्योहार की एक धुँधली सी स्मृति रह जायगी। और चौथ, पाँचें को ही कोई कष्ट आ गया तो भूल जायेंगे कि इसी सप्ताह हमने किसी त्योहार का आनंद भी उठाया था। ऐसे अस्थिर आनंद पर मेरी बधाई कुछ ज्यादा उपयुक्त न होती पर यह छाया दर्शन भी कोई दुख की बात नहीं है।

मैं चाहता हूँ कि आप इस होली पर खूब आनंद मनायें और साथ ही यह भी चिन्तन करें कि जिसकी यह छाया है उस अखण्ड आनन्द को मैं कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरी युग- युग की प्यास कैसे बुझ सकती है? इस अँधेरे में कहाँ से प्रकाश पा सकता हूँ जिससे अपना स्वरूप और लक्ष्य की ओर बढ़ने का मार्ग भली प्रकार देख सकूँ ?? सच्चे अमृत को मैं कैसे और कहाँ से प्राप्त कर सकता हूँ ??

आइये, उस अखण्ड आनन्द को प्राप्त करने के लिए हृदयों में होली जलावें। सच्चे ज्ञान की ऐसी उज्ज्वल ज्वाला हमारे अन्तरों में जल उठे जिसकी लपटें आकाश तक पहुँच। अन्तर के कपट खुल जावें और उस दीप्त प्रकाश में अपना स्वरूप परख सकें। दूसरे पड़ोसी भी उस प्रकाश का लाभ प्राप्त करें। चिरकाल के जमा हुए झाड़ झंखाड़ इस होलिका की ज्वाला में जल जावें। विकारों के राक्षस जो अँधेरी कोठरी में छिपे बैठे हैं और हमें भीतर ही भीतर खोंट खोंप कर खा रहे हैं इसी होलिका में भस्म हो जावें। अपने सब पाप तापों को जला कर हम लोग शुद्ध स्वर्ण की तरह चमकने लगें। उसी निर्मल शरीर से वास्तविक आनन्द प्राप्त किया जा सकेगा।
अखण्ड- ज्योति परिवार के हृदयों में ईश्वर ऐसी ही होली जला दें।
यही आज मेरी प्रार्थना है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 8 मार्च 2020

👉 सच्चा भक्त

एक राजा था जो एक आश्रम को संरक्षण दे रहा था। यह आश्रम एक जंगल में था। इसके आकार और इसमें रहने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होती जा रही थी और इसलिए राजा उस आश्रम के लोगों के लिए भोजन और वहां यज्ञ की इमारत आदि के लिए आर्थिक सहायता दे रहा था। यह आश्रम बड़ी तेजी से विकास कर रहा था। जो योगी इस आश्रम का सर्वेसर्वा था वह मशहूर होता गया और राजा के साथ भी उसकी अच्छी नजदीकी हो गई। ज्यादातर मौकों पर राजा उसकी सलाह लेने लगा। ऐसे में राजा के मंत्रियों को ईर्ष्या होने लगी और वे असुरक्षित महसूस करने लगे। एक दिन उन्होंने राजा से बात की – ‘हे राजन, राजकोष से आप इस आश्रम के लिए इतना पैसा दे रहे हैं। आप जरा वहां जाकर देखिए तो सही। वे सब लोग अच्छे खासे, खाते-पीते नजर आते हैं। वे आध्यात्मिक लगते ही नहीं।’ राजा को भी लगा कि वह अपना पैसा बर्बाद तो नहीं कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर योगी के प्रति उसके मन में बहुत सम्मान भी था। उसने योगी को बुलवाया और उससे कहा- ‘मुझे आपके आश्रम के बारे में कई उल्टी-सीधी बातें सुनने को मिली हैं। ऐसा लगता है कि वहां अध्यात्म से संबंधित कोई काम नहीं हो रहा है। वहां के सभी लोग अच्छे-खासे मस्तमौला नजर आते हैं। ऐसे में मुझे आपके आश्रम को पैसा क्यों देना चाहिए?’

योगी बोला- ‘हे राजन, आज शाम को अंधेरा हो जाने के बाद आप मेरे साथ चलें। मैं आपको कुछ दिखाना चाहता हूं।’

रात होते ही योगी राजा को आश्रम की तरफ लेकर चला। राजा ने भेष बदला हुआ था। सबसे पहले वे राज्य के मुख्यमंत्री के घर पहुंचे। दोनों चोरी-छिपे उसके शयनकक्ष के पास पहुंचे। उन्होंने एक बाल्टी पानी उठाया और उस पर फेंक दिया। मंत्री चौंककर उठा और गालियां बकने लगा। वे दोनों वहां से भाग निकले। फिर वे दोनों एक और ऐसे शख्स के यहां गए जो आश्रम को पैसा न देने की वकालत कर रहा था। वह राज्य का सेनापति था। दोनों ने उसके भी शयनकक्ष में झांका और एक बाल्टी पानी उस पर भी उड़ेल दिया। वह व्यक्ति और भी गंदी भाषा का प्रयोग करने लगा। इसके बाद योगी राजा को आश्रम ले कर गया। बहुत से संन्यासी सो रहे थे।उन्होंने एक संन्यासी पर पानी फेंका। वह चौंककर उठा और उसके मुंह से निकला – शिव-शिव। फिर उन्होंने एक दूसरे संन्यासी पर इसी तरह से पानी फेंका। उसके मुंह से भी निकला – हे शंभो। योगी ने राजा को समझाया – ‘महाराज, अंतर देखिए। ये लोग चाहे जागे हों या सोए हों, इनके मन में हमेशा भक्ति रहती है। आप खुद फर्क देख सकते हैं।’ तो भक्त ऐसे होते हैं।भक्त होने का मतलब यह कतई नहीं है कि दिन और रात आप पूजा ही करते रहें। भक्त वह है जो बस हमेशा लगा हुआ है, अपने मार्ग से एक पल के लिए भी विचलित नहीं होता। वह ऐसा शख्स नहीं होता जो हर स्टेशन पर उतरता-चढ़ता रहे। वह हमेशा अपने मार्ग पर होता है, वहां से डिगता नहीं है। अगर ऐसा नहीं है तो यात्रा बेवजह लंबी हो जाती है।

भक्ति की शक्ति कुछ ऐसी है कि वह सृष्टा का सृजन कर सकती है। जिसे मैं भक्ति कहता हूं उसकी गहराई ऐसी है कि यदि ईश्वर नहीं भी हो, तो भी वह उसका सृजन कर सकती है, उसको उतार सकती है। जब भक्ति आती है तभी जीवन में गहराई आती है। भक्ति का अर्थ मंदिर जा कर राम-राम कहना नहीं है। वो इन्सान जो अपने एकमात्र लक्ष्य के प्रति एकाग्रचित है, वह जो भी काम कर रहा है उसमें वह पूरी तरह से समर्पित है, वही सच्चा भक्त है। उसे भक्ति के लिए किसी देवता की आवश्यकता नहीं होती और वहां ईश्वर मौजूद रहेंगे। भक्ति इसलिए नहीं आई, क्योंकि भगवान हैं। चूंकि भक्ति है इसीलिए भगवान हैं।

👉 प्रवाह

प्रवाह इसीलिए है, ताकि पूर्णता पायी जा सके। इस जगत् में जड़ हो या फिर चेतन सभी जाने-अनजाने प्रवाहित हो रहे हैं। काल के किनारों के सहारे सब के सब बहे जा रहे हैं। सृजन, स्थिति, विलय के पड़ावों को पार करता हुआ जड़ जगत् प्रवाहित है। जन्म, बचपन, यौवन, व जरावस्था के पड़ावों को पार करते हुए चेतन जगत् की चैतन्यता भी प्रवाहमान है। गहराई से देखा जाय तो ठहराव व स्थिरता कहीं दिखाई ही नहीं देती। बाबा फरीद शेख यही सोचते हुए सुबह घूम कर लौट रहे थे।
  
लौटते समय उन्होंने नदी तट पर छोटे से झरने का मिलना देखा। राह के सूखे पत्तों को हटाकर वह छोटा सा झरना भागकर नदी से मिल रहा था। उसकी दौड़ फिर नदी में उसका आनन्दपूर्ण मिलन। फिर उन्होंने देखा अरे यह नदी भी तो भाग रही है, सागर से मिलने के लिए, असीम में खोने के लिए। पूर्ण को पाने के लिए यह समस्त जीवन और जगत् राह के सूखे और मृत पत्तों को हटाता हुआ, भागा जा रहा है।
  
क्योंकि सीमा में संताप है, अपूर्णता में अतृप्ति है। बूँद में दुःख है, सुख तो सागर की सम्पूर्णता में है। मनुष्य के सभी दुःखों का कारण उसका अहं की बूंद पर अटक जाना है। इस अटकन के कारण ही वह जीवन के अनन्त प्रवाह से खण्डित हो गया है। इस भाँति वह अपने ही हाथों सूरज को खोकर दीये की धुँधली लौ में तृप्ति खोजने के चक्कर में परेशान है। यहाँ न तो उसे तृप्ति मिल सकती है, और न ही परेशानी मिट सकती है। क्योंकि बूंद- बूंद बनी रहकर कैसे तृप्त हो सकती है। तृप्ति के लिए तो उसे सागर की सम्पूर्णता की ओर बहना होगा।
  
प्रवाहित हुए बिना न तो प्रसन्नता है और न पूर्णता। प्रसन्नता और पूर्णता की अनुभूति पाने के लिए बूंद को मिटना होगा- बहना होगा। उसे सागर की ओर प्रवाहित होकर सागर में मिलना होगा। अहं में अटके-भटके मनुष्य को भी जीवन की धारा में प्रवाहित होकर अनन्त ब्रह्म बनना होगा। अहं प्रवाह में विलीन हो ब्रह्म बने, तभी संतृप्ति व सम्पूर्णता सम्भव है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०२

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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