बुधवार, 3 अप्रैल 2019

👉 अपनी कमजोरियों को दूर कीजिये (भाग 2)

(3) अपनी बुराई-भलाई के विषय में मत सोचा करिए। मनुष्य यदि अपने ही कष्टों और कठिनाइयों पर सोचता रहे तो वह उदासी से किसी प्रकार भी नहीं बच सकता। अन्य मनुष्यों की इच्छाओं एवं आवश्यकताओं पर सोचिए।

परिचित मनुष्यों के स्वभाव के विषय में लिख लीजिए। उनके अद्भुत आचरण और अवगुणों पर ध्यान दीजिए। यह मन बहलाने का बड़ा ही मनोरंजक ढंग है। यदि आप सच्चे मन से ऐसा करेंगे, तो आप अवश्य प्रफुल्लित दिखाई देंगे।

घर पर अथवा आफिस में अकेले मत बैठिए। दूसरे मनुष्यों से मेल बढ़ाइए और अपने विचार बदलिए। बातें अधिक करिए, और सोचिए कम।

आप पर जैसी भी बीते, उसी को सहर्ष स्वीकार कर लीजिये। अपनी असफलता, पराजय, एवं दुर्भाग्य पर अपना ध्यान मत जमाइये।

मनुष्य जैसा कार्य करता है, वैसे ही उसके मन में भाव उठते हैं। अतः कार्य करते समय अत्यन्त प्रसन्न चित्त दिखाई दीजिये, मुस्कुराइये और प्रफुलित रहिये। यदि आप ऐसा करेंगे तो शीघ्र ही प्रसन्नता का अनुभव करेंगे। इसके विपरीत आप यदि झुककर, लड़खड़ाते हुए, नीचे की ओर आँखें किये, त्यौरियाँ चढ़ाए, उदास भाव से चलेंगे तो आप अवश्य उदास हो जाएंगे। इधर-उधर की छोटी-छोटी सी बातों से असन्तुष्ट होने की अपेक्षा अपने भाग्य को सराहिए और अपने आपको धन्य समझिए। इस सिद्धान्त पर सोचिए कि ‘इससे भी बुरा हो सकता था।’ जो कुछ आपके पास नहीं है, उस पर ध्यान देने की अपेक्षा जो कुछ आपके पास है, उस पर ध्यान दीजिए। आपको अधिकतर यही सोचना चाहिए कि ‘जो कुछ मेरे पास है, उसके लिए भगवान को अनेकों बार धन्यवाद है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 26


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1956/February/v1.26

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 3)

WHO MAINTAINS RECORD OF SINS AND VIRTUES?

In Indian spirituality, karma stands for any physical, verbal, mental or social activity. It means that each karma produces an imprint (Rekha), which cannot be erased before creating a reaction (Karmaphal). There is a belief that the Creator (Lord Brahma) inscribes the destiny on the forehead of a human being and this Divine Inscription cannot be erased by anyone (Vidhi ke likhe ko metanhara). Let us examine this concept from a scientific point of view. Microscopic examination shows innumerable furrows in the grey matter all over the brain. Medical science has not so far come to know the biological implications of these indentations. Comparative microscopic research studies have shown that density of these crenulations in the grey matter of highly evolved persons and thinkers is much more, than in the case of common masses.

It shows that these microscopic lines in the grey matter of the brain are nothing but compact subtle impressions created by external activities, which we take as imprints of mental, vocal and physical actions. This record of activities (good and evil deeds) on the neurons of grey matter proves the existence of an intelligent mechanism, which Hindu Mythology refers to as the deity Chitragupta. In Sanskrit language too, the word “Chitragupta” means “a hidden picture”. It shows that there exists in the human mind a hidden chamber, an inner sentient mechanism (Antaha Chetana) or a subtle state of consciousness (Sookshma Man). (We may compare it with a back-up file of executable programmes in computer parlance).

It is well known that the subtle body (Sookshma Sharir) coexisting with the physical human body has four components “Man” (pronounced as Mun)- the source of desires, longings and aspirations; “Buddhi”- the discriminative faculty which deliberates, takes decisions and determines a course of action; “Chitta”- which stores traits, habits inclinations and temperament and “Ahamkar”- the overall personal sense of selfhood (Ego). It is also established that “Chitta” carries forward its record of good and bad impressions after dissolution of the body. It appears the expression “Chittagupta” of scriptures came to be known as “Chitragupta” in course of time. Hence the internal mechanism of mind, which creates the compact subtle recordings of human activities, could be taken as the deity “Chitragupta” of human mythology. No doubt, this intelligent mechanism (Chitragupta) is continuously engaged in  maintaining records of all living beings. Since each being has its own personal Chitragupta and, therefore, for the entire population of animate beings there is an equal number of Chitraguptas. Thus maintenance of records of innumerable beings does not seem to be an impossibility.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 7

👉 आत्मचिंतन के क्षण 3 April 2019

★ मनुष्य सामाजिक प्राणी है। सामाजिक जीवन का अर्थ है- मिल जुलकर स्नेह, सौहार्द्रपूर्वक रहना। स्वार्थ एवं संघर्ष सामाजिक जीवन के प्रतिकूल भाव हैं। सफल सामाजिक जीवन तभी संभव है, जब उसका प्रत्येक सदस्य सौम्य, सहनशील और शान्त स्वभाव वाला हो। इस स्थिति में सब मिल-जुलकर रह सकते हैं और पारस्परिक सद्भावना, सहयोग के बल पर व्यष्टि एवं समष्टिगत उन्नति भी कर सकते हैं। इसके विपरीत जिस समाज के सदस्य स्वार्थी, क्रोधी, असहिष्णु और असहयोगी होते हैं वे समाज में पारस्परिकता के अभाव में यथास्थान पड़े-पड़े कष्ट-क्लेशों के बीच एड़ियाँ रगड़ा करते हैं।

◆ बुरे विचारों से बचने के लिए अवांछनीय साहित्य का पढ़ना बंद कर देना अधूरा उपचार है। उपचार पूरा तब होता है, जब उसके स्थान पर सद्साहित्य का अध्ययन किया जाय। मानव मस्तिष्क कभी खाली नहीं रह सकता। उसमें किसी न किसी प्रकार के विचार आते ही रहते हैं। बार-बार निषेध करते रहने से किन्हीं गंदे विचारों का तारतम्य तो टूट सकता है, किन्तु उनसे सर्वथा मुक्ति नहीं मिल सकती। अवांछनीय विचारों से पूरी तरह बचने का सबसे सफल उपाय यह है कि मस्तिष्क में सद्विचारों को स्थान दिया जाये। असद्विचारों के  रहने से बुरे विचारों को प्रवेश पाने का अवसर ही मिलेगा।

◇ चिन्ता से मुक्ति का एकमात्र उपाय है-हर समय काम में लगे रहना। निठल्ले व्यक्ति को ही चिन्ता जैसी पिशाचिनी घेरती है। जो व्यक्ति कर्मरत है, प्रगतिशील है, चिन्ताएँ उसे किसी प्रकार भी नहीं घेर सकतीं। चिन्ता का जन्मस्थान एवं निवासस्थान दोनों ही में मनुष्य का चित्त होता है। यदि मनुष्य का चित्त किसी कार्य में व्यस्त रहे तो चिन्ता का जन्म ही न हो सके।

■ किसी भी व्यक्ति अथवा समाज की सभ्यता की गहराई का पता उनके उत्सवों, संस्कारों एवं समारोहों के समय ही चलता है। जिनके खुशी मनाने के तरीके सादे, सरल, शिष्ट एवं सुरुचिपूर्ण होते हैं, आज के युग में वे समाज ही सभ्य कहे जा सकते हैं।

★ उपासना का सार है- सर्वगुण संपन्न ईश्वर को अपना घनिष्ठतम जीवन सहचर अनुभव किया जाना और अपने शरीर, मन तथा अंतःकरण को ईश्वर अर्पण करके उस पर दिव्य सत्ता का अधिकार स्वीकार करना। जो इस स्तर की उपासना का अभ्यासी होगा, वह मस्तिष्क पर नियंत्रण रखेगा और ध्यान रखेगा कि जब कभी जो कुछ भी सोचा जाय वह ईश्वर स्तर का हो, जो किया जाय उसमें ईश्वरीय गौरव गरिमा की झाँकी मिलती हो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 संत की परीक्षा

सन्त पुरन्दर की निर्लोभिता एवं तपश्चर्या की चर्चा विजय नगर के महाराज कृष्णदेवराय ने बहुत सुनी थी- पर, उन्हें सहसा विश्वास नहीं होता था कि क्या ऐसा भी सम्भव है। क्या व्यक्ति स्वयं विद्वान होते हुए तथा साधनों के सहज उपलब्ध  रहते हुए भी उन्हें ठुकरा दे और लोकसेवी का जीवन जिए? गृहस्थ जीवन और लोक सेवा ऐसी गरीबी में कैसे साथ- साथ निभ सकते हैं?

''अपने मन्त्री व्यासराय की सहायता से उन्होंने सन्त की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने सन्त को परीक्षत: कहलवाया कि वे अपनी भिक्षा राजभवन से ले लिया करें। भिक्षा में दिये जाने वाले चावलों में उन्होंने रत्न- हीरे मिला दिये। नित्य उन्हें इसी प्रकार प्रसन्नभाव से आते देख उन्हें शंका हुई, अपने मन्त्री से बोले- ''आइये! जिन सन्त की निस्पृहता की बड़ी प्रशंसा सुनी थी, उसे उनके घर चलकर परखे। '' वहाँ पहुँचे तो बड़ा विचित्र दृश्य देखा। सादगी भरा जीवन जी रहे सन्त व उनकी पत्नी में परस्पर सम्वाद चल रहा था। पत्नी हीरे आदि बीनकर अलग रखती जाती थी व कहती जा रही थी-'' आजकल आप न जाने कहाँ से भिक्षा लाते हैं। इन चावलों में तो कंकड़- पत्थर भरे पड़े हैं। इतना कहकर छद्मवेशधारी राजा मन्त्री के सामने ही उसे वे कचरे के ढेर में फेंक आयीं।

राजा के आश्चर्य व्यक्त करने पर वे बोलीं- 'पहले हम भी यही सोचते थे कि ये हीरे- मोती हैं। पर जब से भक्ति का पथ अपनाया, लोक सेवा की ओर कदम बढ़ाया तो निर्वाह योग्य ब्राह्मणोचित आजीविका से ही काम चल जाता है। अब इस बाह्य सम्पदा का मूल्य हमारे लिए तो हीरो के नहीं, कंकड़- पत्थर के बराबर ही है।''

स्वतन्त्र विवेक बुद्धि ही है जो व्यक्ति को दो मार्गो- आत्मिक प्रगति तथा भौतिक समृद्धि के चयन, अनुपयोग, दुरुपयोग, सदुपयोग के माध्यम से स्वर्ग व नरक के दृश्य इसी जीवन में दिखाती है व उसका भविष्य निर्धारित करती है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 83 से 85


अध्यात्म दर्शन प्रकरण 

एकदा तु हिमाच्छन्ने ह्मत्तराखण्डमण्डने।
अभयारण्यके ताण्ड्यशमीकोद्दालकास्तथा॥१॥
ऋषय: ऐतरेयश्च ब्रह्मविद्या विचक्षणा:।
तत्वजिज्ञासवो ब्रह्मविद्याया: संगता: समे॥२॥
तत्वचर्चारतानां तु प्रश्न एक उपस्थित:।
महत्वपूर्ण स प्रश्न: सर्वेषां मन आहरत्॥३॥
पिप्पलादं पप्रच्छातो महाप्राज्ञमृषीश्वरम्।
अष्टावक्रो ब्रह्मज्ञानी लोककल्याणहेतवे॥४॥

टीका- हिमाच्छादित उत्तराखण्ड के अंभयारण्यक में एक बार ताण्ड्य, शमीक, उद्दालक तथा ऐतरेय आदि ऋषि ब्रह्म-विद्या के गहन तत्व पर विचार करने के उद्देश्य से एकत्र हुए। तत्व-दर्शन के अनेकानेक प्रसंगों पर विचार करते-करते एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आया। उसकी महत्ता ने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। महाप्राज्ञ ऋषि पिप्पलाद से लोक-कल्याण की दृष्टि से ब्रह्मज्ञानी अष्टाज्ञानी ने पूछा ॥१-४॥

व्याख्या- ऋषि धर्मतन्त्र के प्रहरी माने जाते हैं, सदैव जागरुक एवं सामयिक मानवी समस्याओं का समाधान ढूँढ़ने व उन्हें जन-जन तक पहुँचाने वाले।

ब्रह्मज्ञान को जन-मानस तक पहुँचाने के उद्देश्य से ही कुम्भ मेलों एवं अन्य पर्वों पर ऋषिगण एकत्र होते व परस्पर परामर्श द्वारा दैनन्दिन समस्याओं का हल निकालते थे। सूत-शौनक, शिवजी-काकभुशुण्डि, जनक-याज्ञवल्क्य भरद्वाज-याज्ञवल्क्य सम्वाद इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय हैं।

ऐसे समागम, सत्संग, ज्ञान गोष्ठियों में सदा-सदा से महामानवों के कृत्यों-आचरणों को आधार बनाकर जीवन-क्रम की रूपरेखा बनाई जाती रही है। परस्मर चर्चा में मात्र ब्रह्म विद्या के गूढ़ तात्विक विवेचन को ही स्थान न देकर ऋषिगण हर ऐसी जिज्ञासा में रुचि लेते थे जो उस समय की परिस्थितियों की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो, भले ही वह साधारण जन-मानस से सम्बन्धित चर्चा क्यों न हो। हर मनीषी उसमें उतनी ही रुचि रखता था, जितनी कि मुक्ति, योग, साधना जैसे विषयों में।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 37

मंगलवार, 2 अप्रैल 2019

👉 दया और सौम्यता

एक नगर में एक जुलाहा रहता था। वह स्वाभाव से अत्यंत शांत, नम्र तथा वफादार था।उसे क्रोध तो कभी आता ही नहीं था। एक बार कुछ लड़कों को शरारत सूझी। वे सब उस जुलाहे के पास यह सोचकर पहुँचे कि देखें इसे गुस्सा कैसे नहीं आता ?

उन में एक लड़का धनवान माता-पिता का पुत्र था। वहाँ पहुँचकर वह बोला यह साड़ी कितने की दोगे? जुलाहे ने कहा - दस रुपये की।

तब लडके ने उसे चिढ़ाने के उद्देश्य से साड़ी के दो टुकड़े कर दिये और एक टुकड़ा हाथ में लेकर बोला - मुझे पूरी साड़ी नहीं चाहिए, आधी चाहिए। इसका क्या दाम लोगे?

जुलाहे ने बड़ी शान्ति से कहा पाँच रुपये। लडके ने उस टुकड़े के भी दो भाग किये और दाम पूछा? जुलाहे अब भी शांत था। उसने बताया - ढाई रुपये। लड़का इसी प्रकार साड़ी के टुकड़े करता गया। अंत में बोला - अब मुझे यह साड़ी नहीं चाहिए। यह टुकड़े मेरे किस काम के?

जुलाहे ने शांत भाव से कहा - बेटे! अब यह टुकड़े तुम्हारे ही क्या, किसी के भी काम के नहीं रहे। अब लडके को शर्म आई और कहने लगा - मैंने आपका नुकसान किया है। अंतः मैं आपकी साड़ी का दाम दे देता हूँ।

संत जुलाहे ने कहा कि जब आपने साड़ी ली ही नहीं तब मैं आपसे पैसे कैसे ले सकता हूँ? लडके का अभिमान जागा और वह कहने लगा कि, मैं बहुत अमीर आदमी हूँ। तुम गरीब हो। मैं रुपये दे दूँगा तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा,पर तुम यह घाटा कैसे सहोगे? और नुकसान मैंने किया है तो घाटा भी मुझे ही पूरा करना चाहिए।

संत जुलाहे मुस्कुराते हुए कहने लगे - तुम यह घाटा पूरा नहीं कर सकते। सोचो, किसान का कितना श्रम लगा तब कपास पैदा हुई। फिर मेरी स्त्री ने अपनी मेहनत से उस कपास को बीना और सूत काता। फिर मैंने उसे रंगा और बुना। इतनी मेहनत तभी सफल हो जब इसे कोई पहनता, इससे लाभ उठाता, इसका उपयोग करता। पर तुमने उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। रुपये से यह घाटा कैसे पूरा होगा? जुलाहे की आवाज़ में आक्रोश के स्थान पर अत्यंत दया और सौम्यता थी।

लड़का शर्म से पानी-पानी हो गया। उसकी आँखे भर आई और वह संत के पैरो में गिर गया।

जुलाहे ने बड़े प्यार से उसे उठाकर उसकी पीठ पर हाथ फिराते हुए कहा - बेटा, यदि मैं तुम्हारे रुपये ले लेता तो है उस में मेरा काम चल जाता। पर तुम्हारी ज़िन्दगी का वही हाल होता जो उस साड़ी का हुआ। कोई भी उससे लाभ नहीं होता।साड़ी एक गई, मैं दूसरी बना दूँगा। पर तुम्हारी ज़िन्दगी एक बार अहंकार में नष्ट हो गई तो दूसरी कहाँ से लाओगे तुम? तुम्हारा पश्चाताप ही मेरे लिए बहुत कीमती है।

सीख - संत की उँची सोच-समझ ने लडके का जीवन बदल दिया।

ये कोई और नहीं ये सन्त थे कबीर दास जी

👉 अपनी कमजोरियों को दूर कीजिये (भाग 1)

आप कितनी भी कठिन परिस्थितियों में क्यों न हों, आप अपनी खिन्नता, अपनी मानसिक दशा परिवर्तित करके दूर कर सकते हैं। मस्तिष्क के एक भाग (Cerebrum) से, जहाँ विचार उत्पन्न होते हैं, मस्तिष्क के दूसरे भाग (Thalamus) में जहाँ प्रसन्नता अथवा अप्रसन्नता का अनुभव करते हैं, दूसरे प्रकार के विचार भेज कर खिन्नता तथा उदासीनता दूर की जा सकती है।

निम्नलिखित नाना प्रकार की मानसिक दशाओं में भिन्न-भिन्न विचारों को अपनाइये—

(1) आप अपनी त्रुटियों एवं अवगुणों के विषय में मनन करना बन्द कर दीजिये। अन्य मनुष्यों के अवगुणों की सूची बना लीजिए और उनमें से किसी मुख्य पर ध्यान दीजिए और मनन कीजिए। अपने गुणों को बढ़ाने का प्रयत्न करिए। देखिए कि आप किन-किन बातों में दूसरे मनुष्यों से बढ़कर हैं और उन बातों पर विचार कीजिए। अपने विषय में सोचने के स्थान में दूसरों के विषय में सोचिए। किसी भी काली लड़की का अत्यन्त सुन्दर महिलाओं की संगति में अपने आपको हीन अथवा निकृष्ट नहीं समझना चाहिए। उसे संगीतज्ञ और शिक्षित हो जाने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए। अपने गुणों को बढ़ाने के विषय में सोचते रहना चाहिए और दूसरी महिलाओं से अपनी समानता करनी छोड़ देनी चाहिए। अन्य क्षेत्रों में भी जहाँ आपने समानता करने में अपने को दूसरों से कम पाया है, इसी प्रकार अपने विचारों को बदल देना चाहिए।

(2) अन्य मनुष्यों के कार्य और क्रियाओं को उनके दृष्टिकोण से भी देखिए। किसी भी विषय पर केवल अपने ही दृष्टिकोण से विचार करने और दूसरों के विचारों की प्रशंसा न कर सकने के कारण ही क्रोध उत्पन्न होता है। दूसरे मनुष्यों को सुधारने अथवा बदलने की चेष्टा मत करिए।

उपस्थित परिस्थितियों के अनुसार अपने कार्यों और योजनाओं को बदलने का संकल्प कर लीजिए। दूसरे मनुष्यों को अपनी इच्छानुसार बदलने की अपेक्षा स्वयं प्रस्तुत परिस्थिति के अनुसार अपनी योजनायें बदल दीजिए।

क्रोध से बचे रहने का मन में दृढ़ संकल्प कर लीजिए। शान्ति और प्रसन्नता अमूल्य वस्तुयें हैं। आप यदि एक बार भूखे भी रह जायं तो उसकी परवाह मत करिये और शान्त रहिए, किन्तु परेशान, एवं दुखी मत होइए।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 25


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1956/February/v1.25

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 2)


WHO MAINTAINS RECORD OF SINS AND VIRTUES?

A verse in the scriptures states that a suppressed conscience takes one to hell and an awakened conscience leads to heaven. This statement explains the enigma of Heaven and Hell i.e. an individual himself is responsible for creating heaven and hell in his life. Scriptures (Garura Purana) describes this phenomenon metaphorically. It is deity named Chitragupta, who maintains the record of
good and evil deeds of a sentient being. When a living being dies and its soul enters the astral world, this deity presents the record of its good and evil deeds and, based on this account, the soul is assigned to live in heaven or hell.Common sense would not accept existence of a deity like Chitragupta.

The number of human beings inhabiting this earth itself is in billions. If we take into account the other living beings of millions of non-human species, the total number would be beyond mathematical calculation. It would be an impossible task for an individual to work day and night without rest for millions of years maintaining records of each moment of life of innumerable beings of the cosmos. Impracticability of maintenance of such a stupendous record puts a question mark on the very existence of Chitragupta.

Modern science, however, substantiates the reality underlying the metaphorical descriptions given in the scriptures. Science has now established that all mental, verbal and physical activities carried out by an individual having a discriminative mind leave subtle impressions on the deeper levels of the psyche. In this way, like the compressed audio-visual recordings of events on a
microchip of the computer or compact disc, all good and evil deeds are being recorded in the secret chambers of the sub-conscious mind. This record, like a C.D., remains in storage till it is required to be played at a desired moment through an appropriate mechanism. Since time immemorial, enlightened persons in India have wondered about the role of fate in human life. Sanskrit and Hindi literature has abundant references to the “footprints of Karma” (Karma Rekha), which it is said, cannot be erased by any degree of intellectual endeavour.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 5

👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 April 2019

★ विचार मनुष्य जीवन के बनाने अथवा बिगाड़ने में बहुत बड़ा योगदान किया करते हैं। मानव जीवन और उसकी क्रियाओं पर विचारों का आधिपत्य रहने से उन्हीं के अनुसार जीवन का निर्माण होता है। असद्विचार रखकर यदि कोई चाहे कि वह अपने जीवन को आत्मोन्नति की ओर ले जाएगा तो वह अपने इस मंतव्य में कदापि सफल नहीं हो सकता। मानव जीवन का संचालन विचारों द्वारा ही होता है। बुरे विचार उसे पतन की ओर ही ले जाएँगे। यह एक धु्रव सत्य है। इसमें किसी प्रकार भी अपवाद का समावेश नहीं किया जा सकता।

◆ स्वार्थ वृत्ति एक जहरीले साँप की तरह होती है। यह जब अपना फन फैलाती है तो शत्रु-मित्र का विचार किए बिना समान रूप से सबको डस लेती है। एक स्वार्थ वृत्ति से ही मनुष्य में न जाने और कितनी दूषित वृत्तियाँ आ जाती हैं। ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ और मोह आदि के अनर्थकारी विकार एक स्वार्थ की ही संतति समझनी चाहिए। लौकिक और पारलौकिक, भौतिक तथा आध्यात्मिक, वैयक्तिक तथा सामाजिक किसी भी कल्याण के लिए मनुष्य की स्वार्थ वृत्ति बड़ी भयानक पिशाचिनी है। अपने प्रभाव में लेकर यह मनुष्य को अपने अनुरूप पिशाच ही बना लेती है।

◇ विचारों का परिष्कार एवं प्रसार करके आप मनुष्य से महामनुष्य, दिव्य मनुष्य और यहाँ तक ईश्वरत्त्व तक प्राप्त कर सकते हैं। इस उपलब्धि में आड़े आने के लिए कोई अवरोध संसार में नहीं। यदि कोई अवरोध हो सकता है, तो वह स्वयं ेका आलस्य, प्रमाद, असंमय अथवा आत्म अवज्ञा का भाव। इस अनंत शक्ति का द्वार सबके लिए समान रूप से खुला है और यह परमार्थ का पुण्य पथ सबके लिए प्रशस्त है। अब कोई उस पर चले या न चले यह उसकी अपनी इच्छा पर निर्भर है।

■ आशा, विश्वास और परिवर्तन के अटल विधान में आस्था रखने के साथ समय रूपी महान् चिकित्सक में विश्वास रखिए। समय बड़ा बलवान् और उपचारक होता है। वह धैर्य रखने पर मनुष्य के बड़े-बड़े संकटों को ऐसे टाल देता है जैसे वह आये ही न थे। संकट तथा दुःख  देखकर भयभीत होना कापुरुषता है। आप ईश्वर के अंश हैं-आनंद स्वरूप हैं। आपको तो धैर्य, साहस, आत्म-विश्वास और पुरुषार्थ के आधार पर संकट और विपत्तियों की अवहेलना करते हुए सिंह पुरुषों की तरह ही जीवन व्यतीत करना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गुरु गोविन्दसिंह के बच्चे

गुरुगोविन्दसिंह ने अपने १६ वर्षीय बड़े पुत्र अजीतसिंह को आज्ञा दी कि 'तलवार लो और युद्ध में जाओ। पिता की आज्ञा पाकर अजीत सिंह युद्ध में कूद पड़ा और वहीं काम आया। इसके बाद गुरु ने अपने द्वितीय पुत्र जोझारसिंह को वही आज्ञा दी। पुत्र ने इतना ही कहा- 'पिताजी प्यास लगी है, पानी पी लूँ। '  इस पर पिता ने कहा-'तुम्हारे भाई के पास खून की नदियाँ बह रही हैं। वहीं प्यास बुझा लेना। ' जोझारसिंह उसी समय युद्ध क्षेत्र को चल दिया और वह अपने भाई का बदला लेते हुए मारा गया।

इन बच्चों के बलिदान से सिखों में ऐसी आग पैदा हुई कि दुश्मनों को अपना खेमा उखाड़ते ही बना। आदर्शो से जुड़ने वाले नरपुंगव दैवी अनुग्रह के पात्र किस प्रकार बनते हैं इसका प्रत्यक्ष उदाहरण आद्य शंकराचार्य, स्वामी दयानन्द, मीरा, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ एवं तुलसीदास हैं। इन्होंने प्रतिकूलताओं से संघर्ष हेतु साहस दिखाया-यह दैवी अनुग्रह ही था जो उनके अन्त: में प्रेरणा के रूप में उभरा एवं आदर्शवादी उत्कृष्टता से जुड़कर बदले में उन्हें यश-सम्मान भी दे गया।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 83 से 85

भगवन्तं ततो नत्वा वांछा साम्यं विचार्य च।
प्रज्ञापुराणसन्देशमुपदेष्टं जनं जनमू ॥८३॥
जागृतात्मन प्रज्ञाभियान मार्गे नियोजितुम्।
संकल्प्य धरणीमायात् प्रसन्नहृदयस्तदा ॥८४॥
सप्तर्षीणां तपोभूमौ विरम्याथ गतक्लम:।
युगान्तरचिते रूपे विश्वव्यापी बभूव च ॥८५॥

टीका:- नारद ने भगवान् को नमन किया और उनकी इच्छा में अपनी इच्छा मिलाते हुए जन-जन को 'प्रज्ञा पुराण' का सन्देश सुनाने, जागृत-आत्माओं को प्रज्ञा-अभियान प्रयासों में लगाने कौ संकल्प लेकर, प्रसन्न हृदय धरती पर उतरे। सप्त ऋषियों की तपोभूमि मे थोड़ा विराम-विश्राम करके वे युगान्तरीय-चेतना के रूप में विश्वव्यापी बन गये ॥८३-८५॥

व्याख्या"- भक्त की स्वयं की कोई इच्छा नहीं होती। वह भगवान का काम करने का संकल्प लेकर जन्मता है व अपने 'स्व' को चेतन शक्ति में घुला देता है। देवर्षि नारद ने अपनी इच्छा को भगवान की प्रेरणा के साथ मिलाया। एक बार नारद स्वयं मोह में पड़े थे और अपने अहंकार के मद में प्रभु प्रेरणा को समझने में असफल रहे। भगवान ने उनका मोह भंग किया, उन्हें वास्तविकता से अवगत कराया। तब से उन्होंने संकल्प ले लिया कि अब आगे से कभी भी अपनी इच्छा को प्रभु से अलग नहीं रखेंगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 35-36

सोमवार, 1 अप्रैल 2019

👉 ममता और महानता:-

एक बालक नित्य विद्यालय पढ़ने जाता था। घर में उसकी माता थी। माँ अपने बेटे पर प्राण न्योछावर किए रहती थी, उसकी हर माँग पूरी करने में आनंद का अनुभव करती। बालक भी पढ़ने-लिखने में बड़ा तेज़ और परिश्रमी था। खेल के समय खेलता, लेकिन पढ़ने के समय पढने का ध्यान रखता।

एक दिन दरवाज़े पर किसी ने- “माई! ओ माई!” पुकारते हुए आवाज़ लगाई तो बालक हाथ में पुस्तक पकड़े हुए द्वार पर गया, देखा कि एक फटेहाल बुढ़िया काँपते हाथ फैलाए खड़ी थी।

उसने कहा- “बेटा! कुछ भीख दे दे।“

बुढ़िया के मुँह से बेटा सुनकर वह भावुक हो गया और माँ से आकर कहने लगा- “माँ! एक बेचारी गरीब माँ मुझे ‘बेटा’  कहकर कुछ माँग रही है।“

उस समय घर में कुछ खाने की चीज़ थी नहीं, इसलिए माँ ने कहा- “बेटा! रोटी-भात तो कुछ बचा नहीं है, चाहे तो चावल दे दो।“

इसपर बालक ने हठ करते हुए कहा- “माँ! चावल से क्या होगा? तुम जो अपने हाथ में सोने का कंगन पहने हो, वही दे दो न उस बेचारी को। मैं जब बड़ा होकर कमाऊँगा तो तुम्हें दो कंगन बनवा दूँगा।“

माँ ने बालक का मन रखने के लिए सच में ही सोने का अपना वह कंगन कलाई से उतारा और कहा- “लो, दे दो।“

बालक खुशी-खुशी वह कंगन उस भिखारिन को दे आया। भिखारिन को तो मानो ख़ज़ाना ही मिल गया। उसका पति अंधा था। कंगन बेचकर उसने परिवार के बच्चों के लिए अनाज, कपड़े आदि जुटा लिए। उधर वह बालक पढ़-लिखकर बड़ा विद्वान हुआ, काफ़ी नाम कमाया।

उसे बचपन का अपना वचन याद था। एक दिन वह माँ से बोला- “माँ! तुम अपने हाथ का नाप दे दो, मैं कंगन बनवा दूँ।“

पर माता ने कहा- “उसकी चिंता छोड़। मैं इतनी बूढ़ी हो गई हूँ कि अब मुझे कंगन शोभा नहीं देंगे। हाँ, कलकत्ते के तमाम ग़रीब बालक विद्यालय और चिकित्सा के लिए मारे-मारे फिरते हैं, उनके लिए तू एक विद्यालय और एक चिकित्सालय खुलवा दे जहाँ निशुल्क पढ़ाई और चिकित्सा की व्यवस्था हो।“

पुत्र ने ऐसा ही किया। माँ के उस पुत्र का नाम ईश्वरचंद्र विद्यासागर है।

👉 आज का सद्चिंतन 1 April 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 April 2019


👉 सद्भावना ही श्रेष्ठ है। (अंतिम भाग)

जो व्यवहार हम चाहते हैं कि लोग हमसे करें, वैसा व्यवहार हमें स्वयं भी औरों से करना चाहिए। कोई नहीं चाहता कि उससे छल हो तो वह स्वयं किसी को क्यों छले? प्रायः लोग अपने से तो भला व्यवहार चाहते हैं पर दूसरों से सरल सीधा व्यवहार नहीं करना चाहते। यही कारण आपस के सन्देह का होता है। क्या एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की राष्ट्रीयता को भंग करके वहाँ के लोगों को पददलित करके अपना स्वार्थ पूरा करे? पर इतिहास साक्षी है कि सबल राष्ट्रों ने ऐसा किया है। लूट-खसोट ही नहीं मानवता के नाते भी भुला दिये गये और विजित देख के लोग दास बनाये गये उनके उद्योग धंधे नष्ट किये गये और उन्हें बुरी तरह दबाया गया और यह सब विजित लोगों के ही हितों के नाम पर किया गया। यह क्यों हो सका? कारण स्पष्ट है विजित देशों में जब सहानुभूति नहीं रहती, सम्वेदना नहीं रहती, तो आपस का सहयोग भी नहीं रहा करता।

यह अनुभूति जैसी देशों की जनता के विषय में सत्य हुई वैसी ही व्यक्तियों में भी देखी गई। जिन लोगों में आपस की सद्भावना नहीं रहती उनमें सहानुभूति भी नहीं रहती और वे मिलकर एक उद्देश्य से कार्य भी नहीं कर सकते। इन्हीं दुर्बलताओं को आक्रमणकारी राष्ट्र भांप लेता है और अपनी स्वार्थ पूर्ति करता है। विजित लोगों के हृदय आपस में तो मिले हुए होते ही नहीं उनमें और चौड़ी खाई बनादी जाती है, और विजेता लोगों को हर प्रकार से वृद्धि तथा विजित लोगों का ह्रास आरम्भ हो जाता है। दुःख की अनुभूति भी पुनरुत्थान के लिये मनुष्य को उत्तेजित करने में सहायक होती है और विजित लोग जिन्हें अपनी दासता असह्य हो जाती है वे विजेताओं से उकता कर आपस में मिलकर आपस में एक उद्देश्य के लिए संगठित होकर तत्परता और पूरी लगन से कार्य करना सीख लेते हैं।

सहानुभूति का उदय होता है, स्वार्थ नहीं उभरने पाता और आपस के सहयोग तथा विजेताओं से पूर्ण असहयोग करके वे शक्ति संपन्न हो जाते हैं। सहयोग में अनुपम शक्ति है। जो कार्य व्यक्ति से नहीं हो पाता वही कार्य मिलकर करने में सुगम हो जाता है और सहर्ष सम्पन्न होता है। सहयोग से इस प्रकार पुनः चक्र बदलने लगता है और वही जनता जो पहले पददलित और तिरस्कृत थी वश प्राप्त करती है और विश्व में उसकी कीर्ति फैलती है सहयोग महान अद्भुत शक्ति है। भारतीय जनता इसी प्रकार अपना खोया हुआ गौरव पा सकी है और अब हमारा जनतंत्र विश्व भर में आदर पा रहा है। सहयोग से सफलता और कीर्ति निहित है।

सद्भावना से एक दूसरे को ठीक-ठीक जानना और आपस में एका उत्पन्न करना, सहानुभूति से आपस में एक दूसरे के हृदय में प्रवेश करना और हृदयों का समन्वय करना तथा सहयोग से सामर्थ्य प्राप्त करना यह क्रम है महत्वाकांक्षी की पूर्ति का सहयोग ही यज्ञ है। यज्ञ कभी विफल नहीं हुआ। सभी शक्तियों में सहयोग होने से एक अत्यंत महान शक्ति का उदय होता है जिससे सभी में नया उत्साह साहस और वस्तुतः कार्यक्षमता युक्त नवजीवन उदय होता है।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 16

👉 THE ABSOLUTE LAW OF KARMA (Part 1)

PREFACE

The law of divine justice follows a mysterious course. In the world we come across many instances of virtuous persons undergoing endless suffering and pain; sinners perpetually enjoying pleasurable lives; indolents achieving success; hardworking persons meeting repeated failures; the wise suffering adversity; fools living in prosperity; egoists held in high esteem; and the righteous held in contempt. We find some persons born with silver spoon in their mouths and others facing one misfortune after another throughout life. The well-known human norms for achieving happiness and success do not always appear to hold good in practical terms.Such phenomena raise many questions and doubts about the role of fate in life, the will of God and the relationship of virtuous and evil deeds with happiness and unhappiness in life.

The rationale given in the ancient literature in this respect does not adequately satisfy the inquisitiveness of modern minds. Consequently, the new generation is becoming more inclined to accept the atheistic ideologies of the West, which regard God and the religion as phantoms creations of sick and fearful minds; the human body merely a chemical combination of inert elements; and denies the very existence of an immortal soul. The new generation is made to believe that there is no Supreme Being or God; that destiny has no role to play in life; and that only arbitrary man-made state machinery has the powers to dispense punishments and rewards.

In the present book an attempt has been made to give rational and logical explanations of relationship between human deeds and
destiny. It explains how events of good fortune and misfortune, happiness and suffering in human life are results of one’s own
deeds.It is hoped that this booklet will provide satisfactory answers to the queries relating to the role played by the consequences of an individual’s deeds in the making of his destiny.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मचिंतन के क्षण

★ इस दानशील देश में हमें पहले प्रकार के दान के लिए अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान के विस्तार के लिए साहसपूर्वक अग्रसर होना होगा! और यह ज्ञान-विस्तार भारत की सीमा में ही आबद्ध नहीं रहेगा, इसका विस्तार तो सारे संसार में करना होगा! और अभी तक यही होता भी रहा है! जो लोग कहते हैं कि भारत के विचार कभी भारत से बाहर नहीं गये, जो सोचते हैं कि मैं ही पहला सन्यासी हूँ जो भारत के बाहर धर्म-प्रचार करने गया, वे अपने देश के इतिहास को नहीं जानते! यह कई बार घटित हो चुका है! जब कभी भी संसार को इसकी आवश्यकता हुई, उसी समय इस निरन्तर बहनेवाले आध्यात्मिक ज्ञानश्रोत ने संसार को प्लावित कर दिया!

◆ वस्तुयें बुरी नहीं होती, उनका उपयोग बुरा होता है। विवेकवान पुरुष जिस वस्तु का उपयोग अच्छे कार्य के लिए करते हैं वहीँ विवेकहीन पुरुष उसी वस्तु का उपयोग बुरे कार्य के लिए करते हैं।

◇ इस दुनिया में वुद्धि के तीन स्तर पर आदमी जीवन जीता है। उसी के अनुसार कर्म करता है। माचिस की एक तीली से एक विवेकवान जहाँ मन्दिर में दीप जलाकर पूजा करता है, वहीँ अँधेरे में दीया जलाकर लोगों को गिरने से भी बचाता है। एक सामान्य वुद्धि वाला मनुष्य धूम्रपान के लिए उसका उपयोग करता है। एक कुबुद्धि किसी का घर जलाने के लिए माचिस जलाता है।

■ माचिस की तीली का कोई दोष नहीं है। दोष हमारी समझ, हमारी वुद्धि का है। अतः कोई भी वस्तु उपयोगी- अनुपयोगी नहीं है, हम अपनी समझ द्वारा उसे ऐसा बना देते है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 याचक ने पारस फेंक दिया

एक व्यक्ति एक संत के पास आया व उनसे याचना करने लगा कि वह निर्धन है। वे उसे कुछ धन आदि दे दें, ताकि वह जीविका चला सके। सन्त ने कहा- 'हमारे पास तो वस्त्र के नाम पर यह लंगोटी व उत्तरीय है। लंगोटी तो आवश्यक है पर उत्तरीय तुम ले जा सकते हो। इसके अलावा और कोई ऐसी निधि हमारे पास है नहीं।'' वह व्यक्ति बराबर गिड़गिड़ाता ही रहा, तो वे बोले- 'अच्छा, झोपड़ी के पीछे एक पत्थर पड़ा होगा। कहते हैं, उससे लोहे को छूकर सोना बनाया जा सकता है। तुम उसे ले जाओ। ''प्रसन्नचित्त वह व्यक्ति भागा व उसे लेकर आया, खुशी से चिल्ला पड़ा- 'महात्मन्! यह तो पारस मणि है। आपने इसे ऐसे ही फेंक दी। ''सन्त बोले' हाँ बेटा! मैं जानता हूँ और यह भी कि यह नरक की खान है। मेरे पास प्रभु कृपा से आत्म सन्तोष रूपी धन है जो मुझे निरन्तर आत्म ज्ञान, और अधिक यान प्राप्त करने को प्रेरित करता है। मेरे लिए इस क्षणिक उपयोग की वस्तु का क्या मूल्य?' वह व्यक्ति एकटक देखता रह गया।

फेंक दी उसने भी पारस मणि। बोला- ' भगवन्। जो आत्म सन्तोष आपको है व जो कृपा आप पर बरसी है उससे मैं इस '' पत्थर '' के कारण वंचित नहीं होना चाहता। आप मुझे भी उस दिशा में बढ़ने की प्रेरणा दें जो सीधे प्रभु प्राप्ति की ओर ले जाती है। '' सन्त ने उसे शिष्य के रूप में स्वीकार किया। वे दोनों मोक्ष सुख पा गए।

विवेकवान के समक्ष हर वैभव, हर सम्पदा तुच्छ है। वह सतत् अपने चरम लक्ष्य, परम पद की प्राप्ति की ओर बढ़ता रहता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 81 से 82

साहसादर्शरूपा ये चेतनामुच्चभूमिकाम्।
निजेन बलिदानेन त्यागेनोद्भावयन्ति ये ॥८१॥
आत्मसन्तोषमासाद्य लोकसम्मानमेव च।
दैवानुग्रहलाभं च कृतकृत्या भवन्ति ते ॥८२॥

टीका- आदर्श और साहस के धनी अपने त्याग-बलिदान से उच्चस्तरीय चेतना उत्पन्न करते हैं और आत्म-सन्तोष लोक-सम्मान तथा दैवी-अनुग्रह के तीन लाभ एक साथ प्राप्त करते तथा धन्य बनते है ॥८१-८२॥

व्याख्या- नव-सृजन में अपना सब कुछ लुटा देने वाले कभी घाटे में नहीं रहते। भगवान के काम में लग जाने वाले तीन असामान्य लाभ सहज पा लेते हैं जो एक दूसरे की प्रतिक्रियाएँ ही हैं। जागृत आत्माएँ आदर्शवादिता अपनाकर सत्साहस दिखाती हैं और अन्त: में सन्तोष, बहिरंग में सम्मान-सहयोग पाती हैं और ऐसों पर ही दैवी अनुदान बरसते हैं, जो उन्हें कृतकृत्य कर जाते हैं। पेड़ अपने पत्ते गिराते, जमीन को खाद देते और बदले में जड़ों के लिए उपयुक्त खुराक उपलब्ध करते हैं। फल-फूलों से दूसरों को लाभानित करते हैं। यह परमार्थ व्रत आज की चिन्तन धारा के अनुसार तो मूर्खता ही ठहराया जायगा और व्यंग्य-उपहास का ही कारण बनेगा। किन्तु पर्यवेक्षकों को इस निष्कर्ष पर पहुँचने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि विश्व-व्यवस्था में ऐसी परिपूर्ण गुंजायश है कि परमार्थ परायणों को लोक सम्मान ही नहीं दैवी अनुदान भी अजस्र परिमाण में मिलते रहें। पेड़ों को बार-बार नये पल्लव और नये फल-फूल देते रहने में प्रकृति कोताही नहीं बरतती। उदारमना घाटा उठाते लगते भर हैं। वस्तुत: वे जो देते हैं उसे ब्याज समेत वसूल कर लेते हैं।

इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित महामानवों में से प्रत्येक ने परमार्थ-परायणता की दूरदर्शितापूर्ण नीति अपनाई है। वे बीज की तरह गले और वृक्ष की तरह बढ़े हैं, इस मार्ग पर चलने के लिए उन्हें प्राथमिक पराक्रम यह करना पड़ा कि संचित कुसंस्कारों की पशु-प्रवृत्तियों से जूझे और उन्हें सुसंस्कारी बनने के लिए पूरी तरह दबाया-दबोचा और तब छोड़ा जब वे ची बोल गईं और संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊँचे उठकर आदर्शवादी परमार्थ प्रवृत्ति को अंगीकार करने के लिए सहमत हो गईं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 34

शनिवार, 30 मार्च 2019

👉 Nari Abhuydha

Nari Abhuydha is 5th Annual Women Empowerment program by All World Gayatri Parivar Women Circle Mumbai. There is need for intellectual training, Scientific Education and Character Building Education. We have paid heavily for blindly imitating western ideals.There is a need for harmony of ideals between school & home. Ikkisvi Sadi is Nari Sadi and indian women needs to travel as much as to study for playing a larger role in national life. Education through Indian vernaculars and developing arts,culture, crafts and allied occupations needs to take centre stage.DIYA gives an awakening call for empowering women for a prosperous future. Come join us on 30th March Saturday 2019

Venue: Suraj Hanuman Mandir Ground,Anand Nagar Nr Mudraneshwar Temple, Dahisar East, Mumbai

Timings : Evening 5.00 pm onwards

Contact:
09821393345
09892722773
09892583224
09320922220

Email: mumbai@diya.net.in

Entry is free and open to all.
Pls pass message to all in your circle of influence

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...