(3) अपनी बुराई-भलाई के विषय में मत सोचा करिए। मनुष्य यदि अपने ही कष्टों और कठिनाइयों पर सोचता रहे तो वह उदासी से किसी प्रकार भी नहीं बच सकता। अन्य मनुष्यों की इच्छाओं एवं आवश्यकताओं पर सोचिए।
परिचित मनुष्यों के स्वभाव के विषय में लिख लीजिए। उनके अद्भुत आचरण और अवगुणों पर ध्यान दीजिए। यह मन बहलाने का बड़ा ही मनोरंजक ढंग है। यदि आप सच्चे मन से ऐसा करेंगे, तो आप अवश्य प्रफुल्लित दिखाई देंगे।
घर पर अथवा आफिस में अकेले मत बैठिए। दूसरे मनुष्यों से मेल बढ़ाइए और अपने विचार बदलिए। बातें अधिक करिए, और सोचिए कम।
आप पर जैसी भी बीते, उसी को सहर्ष स्वीकार कर लीजिये। अपनी असफलता, पराजय, एवं दुर्भाग्य पर अपना ध्यान मत जमाइये।
मनुष्य जैसा कार्य करता है, वैसे ही उसके मन में भाव उठते हैं। अतः कार्य करते समय अत्यन्त प्रसन्न चित्त दिखाई दीजिये, मुस्कुराइये और प्रफुलित रहिये। यदि आप ऐसा करेंगे तो शीघ्र ही प्रसन्नता का अनुभव करेंगे। इसके विपरीत आप यदि झुककर, लड़खड़ाते हुए, नीचे की ओर आँखें किये, त्यौरियाँ चढ़ाए, उदास भाव से चलेंगे तो आप अवश्य उदास हो जाएंगे। इधर-उधर की छोटी-छोटी सी बातों से असन्तुष्ट होने की अपेक्षा अपने भाग्य को सराहिए और अपने आपको धन्य समझिए। इस सिद्धान्त पर सोचिए कि ‘इससे भी बुरा हो सकता था।’ जो कुछ आपके पास नहीं है, उस पर ध्यान देने की अपेक्षा जो कुछ आपके पास है, उस पर ध्यान दीजिए। आपको अधिकतर यही सोचना चाहिए कि ‘जो कुछ मेरे पास है, उसके लिए भगवान को अनेकों बार धन्यवाद है।
.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1956/February/v1.26
परिचित मनुष्यों के स्वभाव के विषय में लिख लीजिए। उनके अद्भुत आचरण और अवगुणों पर ध्यान दीजिए। यह मन बहलाने का बड़ा ही मनोरंजक ढंग है। यदि आप सच्चे मन से ऐसा करेंगे, तो आप अवश्य प्रफुल्लित दिखाई देंगे।
घर पर अथवा आफिस में अकेले मत बैठिए। दूसरे मनुष्यों से मेल बढ़ाइए और अपने विचार बदलिए। बातें अधिक करिए, और सोचिए कम।
आप पर जैसी भी बीते, उसी को सहर्ष स्वीकार कर लीजिये। अपनी असफलता, पराजय, एवं दुर्भाग्य पर अपना ध्यान मत जमाइये।
मनुष्य जैसा कार्य करता है, वैसे ही उसके मन में भाव उठते हैं। अतः कार्य करते समय अत्यन्त प्रसन्न चित्त दिखाई दीजिये, मुस्कुराइये और प्रफुलित रहिये। यदि आप ऐसा करेंगे तो शीघ्र ही प्रसन्नता का अनुभव करेंगे। इसके विपरीत आप यदि झुककर, लड़खड़ाते हुए, नीचे की ओर आँखें किये, त्यौरियाँ चढ़ाए, उदास भाव से चलेंगे तो आप अवश्य उदास हो जाएंगे। इधर-उधर की छोटी-छोटी सी बातों से असन्तुष्ट होने की अपेक्षा अपने भाग्य को सराहिए और अपने आपको धन्य समझिए। इस सिद्धान्त पर सोचिए कि ‘इससे भी बुरा हो सकता था।’ जो कुछ आपके पास नहीं है, उस पर ध्यान देने की अपेक्षा जो कुछ आपके पास है, उस पर ध्यान दीजिए। आपको अधिकतर यही सोचना चाहिए कि ‘जो कुछ मेरे पास है, उसके लिए भगवान को अनेकों बार धन्यवाद है।
.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1956/February/v1.26



















