रविवार, 11 अगस्त 2024

👉 विनम्रता गुण

🔹 विनम्रता आपके आंतरिक प्रेम की शक्ति से आती है। दूसरों को सहयोग व सहायता का भाव ही आपको विनम्र बनाता है। यह कहना गलत है कि यदि आप विनम्र बनेंगे तो दूसरे आपका अनुचित लाभ उठाएँगे। जबकि यथार्थ स्वरूप में विनम्रता आपमें गज़ब का धैर्य पैदा करती है। आपमे सोचने समझने की क्षमता का विकास करती है। विनम्र व्यक्तित्व का एक प्रचंड आभामण्डल होता है। धूर्तो के मनोबल उस आभा से निस्तेज हो स्वयं परास्त हो जाते है। उल्टे जो विमम्र नहीं होते वे आसानी से धूर्तों के प्रभाव में आ जाते है क्योंकि धूर्त को तो अहंकारी का मात्र चापलूसी से अहं सहलाना भर होता है। बस चापलूसी से अहंकार प्रभावित हो जाता है। किन्तु जहाँ विनम्रता होती है वहाँ तो व्यक्ति को सत्य की अथाह शक्ति प्राप्त होती है। सत्य की शक्ति, मनोबल प्रदान करती है।

🔸 विनम्रता के प्रति पूर्ण समर्पण युक्त आस्था जरूरी है। मात्र दिखावे की ओढी हुई विनम्रता, अक्सर असफ़ल ही होती है। सोचा जाता है-‘पहले विन्रमता से निवेदन करूंगा यदि काम न हुआ तो भृकुटि टेढी करूंगा’ यह चतुरता विनम्रता के प्रति अनास्था है, छिपा हुआ अहं भी है। कार्य पूर्व ही अविश्वास व अहं का मिश्रण असफलता ही न्योतता है। सम्यक् विनम्र व्यक्ति, विनम्रता को झुकने के भावार्थ में नहीं लेता। सच्चाई उसका पथप्रदर्शन करती है। निश्छलता उसे दृढ व्यक्तित्व प्रदान करती है।

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🔹 अहंकार सदैव आपसे दूसरों की आलोचना करवाता है। वह आपको आलोचना-प्रतिआलोचना के एक प्रतिशोध जाल में फंसाता है। अहंकार आपकी बुद्धि को कुंठित कर देता है। आपके जिम्मेदार व्यक्तित्व को संदेहयुक्त बना देता है। अहंकारी दूसरों की मुश्किलों के लिए उन्हें ही जिम्मेवार कहता है और उनकी गलतियों पर हंसता है। जबकि अपनी मुश्किलो के लिए सदैव दूसरों को जवाबदार ठहराता है। और लोगों से द्वेष रखता है।

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🔸 विनम्रता हृदय को विशाल, स्वच्छ और ईमानदार बनाती है। यह आपको सहज सम्बंध स्थापित करने के योग्य बनाती है। विनम्रता न केवल दूसरों का दिल जीतने में कामयाब होती है अपितु आपको अपना ही दिल जीतने के योग्य बना देती है। जो आपके आत्म-गौरव और आत्म-बल में उर्ज़ा का अनवरत संचार करती है। आपकी भावनाओं के द्वन्द समाप्त हो जाते है। साथ ही व्याकुलता और कठिनाइयां स्वतः दूर होती चली जाती है। एक मात्र विनम्रता से ही सन्तुष्टि, प्रेम और सकारात्मकता आपके व्यक्तित्व के स्थायी गुण बन जाते है।

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शनिवार, 10 अगस्त 2024

👉 आप निराश मत हूजिए (भाग २)

🔹 इसके विपरीत आशावाद मनुष्य के लिए अमृत तुल्य है। जैसे तृषित को शीतल जल, रोगी को औषधि से, अंधकार को प्रकाश से, वनस्पति को सूर्य से लाभ होता है, उसी भाँति आशावाद की संजीवनी बूटी से मृतप्राय मनुष्य में जीवन शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। आशावाद वह दिव्य प्रकाश है जो हमारे जीवन को उत्तरोत्तर परिपुष्ट, समृद्धिशाली और प्रगतिशील बनाता है। सुख, सौंदर्य एवं सफलता की अलौकिक छटा से उसे विभूषित कर उसका पूर्ण विकास करता है। उसमें माधुर्य का संचार कर विघ्न-बाधा, दुख, क्लेश और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कराने वाली गुप्त मनःशक्ति जागृत करता है। आत्मा की शक्ति से देदीप्यमान आशावादी उम्मीद का पल्ला पकड़े प्रलोभनों को रोंधता हुआ अग्रसर होता है। वह पथ-पथ पर विचलित नहीं होता, उसे कोई बात असंभव प्रतीत नहीं होती, उसे कोई कार्य असंभव प्रतीत नहीं होता, उसे कोई पराजित नहीं कर सकता, संसार की कोई शक्ति उसे नहीं दबा सकती क्योंकि सब शक्तियों का विकास करने वाली “आशा” की शक्ति सदैव उसकी आत्मा को तेजोमय करती है।

🔸 संसार के कितने ही व्यक्ति अपने जीवन को उचित, श्रेष्ठ और श्रेय के मार्ग पर नहीं लगाते। किसी एक उद्देश्य को स्थिर नहीं करते, न वे अपने मानसिक संकल्प को इतना दृढ़ ही बनाते है कि निज प्रयत्नों में सफल हो सकें। सोचते कुछ हैं करते कुछ और हैं। काम किसी एक पदार्थ के लिए करते हैं आशा किसी दूसरे की ही करते हैं। करील के वृक्ष बोकर आम खाने की अभिलाषा रखते हैं। हाथ में लिए हुए कार्य के विपरीत मानसिक भाव रखने से हमें अपनी निदिष्ट वस्तु कदापि प्राप्त नहीं हो सकती। बल्कि हम इच्छित वस्तु से और भी दूर जा पड़ते हैं। तभी हमें नाकामयाबी, लाचारी, तंगी, क्षुद्रता प्राप्त होती है। अपने को भाग्यहीन समझ लेना, बेबसी की बातों को लेकर झोंकना और दूसरों की सिद्धि पर कुढ़ना हमें सफलता से दूर ले जाता है। विरोधी भाव रखने से मनुष्य उन्नत अवस्था में कदापि नहीं पहुँच सकता। संसार के साथ अविरोधी रहो, क्योंकि विरोध संसार की सबसे उत्कृष्ट वस्तुओं को अपने निकट नहीं आने देता और अविरोध उत्कृष्ट वस्तुओं का एक आकर्षक बिन्दु है।

> 👉 गहरी नींद कैसे आए भाग 01 | Gehri Neend Kese Aaye Part 01  https://youtu.be/ILcWqIvvJMk?si=HYxy9GeiEXZ5V-Ce

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🔹 तुम्हारे भाग्य में आशावाद का स्वर्ग आया है न कि निराशावाद का नर्क। तुम अपनी जीवन यात्रा में मंदगति से घिसटते हुए पशुवत् पड़े रहने के लिए जगत में प्रविष्ट नहीं हुए हो। अपने को अशक्त असमर्थ मानने वाले डरपोक व्यक्तियों की श्रेणी में तुम नहीं हो। तुम दुर्बल अन्तःकरण वाले निराशावादियों की तरह निःसार वस्तुओं के कुत्सित चिंतन में निष्प्रयोजन अपनी शक्तियों का अपव्यय नहीं करते। संसार में तुम उस महान पद पर आसीन होगे जिस पर संसार के अन्य प्रतापी पुरुष होते आये हैं। अभी तुम इस स्थिति में पड़े हो तो क्या, शीघ्र ही उच्चतम विकास के दिव्य प्रदेश में तुम प्रविष्ट होने वाले हो। तुम सर्वेश्वर के पवित्र अंश हो और तुम्हें प्रकृति ने अपनी इष्ट-सिद्धि के लिए पर्याप्त साधन और सामर्थ्य प्रदान किए हैं। तुम एक बार प्रयत्न तो करो।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 12

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 10 Aug 2024


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शुक्रवार, 9 अगस्त 2024

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 08 Aug 2024


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👉 आज का सद्चिंतन 09 Aug 2024


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👉 प्रेम और कृतज्ञता का सौंदर्य

निस्वार्थ भाव से, बदला न पाने की इच्छा से और अहसान न जताने के विचार से जो उपकार दूसरों के साथ किया जाता है उसके फल की समता तीनों लोक मिलकर भी नहीं कर सकते। बदला पाने की इच्छा रहित जो भलाई की गई है, वह समुद्र की तरह महान है। कोई मनुष्य किसी आवश्यकता से व्याकुल हो रहा है, उस समय उसकी मदद करना कितना महत्वपूर्ण है, इसे उस व्याकुल मनुष्य का हृदय ही जानता है। जरूरतमंदों को एक राई के बराबर मदद देना उससे बढ़कर है कि बिना जरूरत वाले के पल्ले में एक पहाड़ बाँध दिया जावे।

जिसने तुम्हारे साथ भलाई की है उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट करो। सहायता का मूल्य वस्तु के मूल्य से मत नापो, वरन् उसका महत्व अपनी आवश्यकता को देखते हुए नापो कि उस समय यदि वह मदद तुम्हें न मिलती तो तुम्हारा क्या हाल होता। उनका अहसान मत भूलो जिन्होंने मुसीबत के समय तुम्हारी मदद की थी। उपकार को भूल जाना नीचता है, पर उन्हें क्या कहें जो भलाई के बदले बुराई करते हैं?

> 👉 मनुष्य जन्म का उद्देश्य | Manusay Janam Ka Uddesya 

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धरती माता से उस दिन मनुष्यों का भार न उठाया जायेगा जिस दिन वे प्रेम और कृतज्ञता छोड़कर निष्ठुर और कृतघ्न बन जायेंगे। आदमी की चमड़ी में क्या खूबसूरती है? सुन्दर तो उसका मन होता है। जिसके मन में दूसरों के प्रति प्रेम भावनाएं उठती रहती हैं, जो दूसरों के थोड़े से भी उपकार का सदा स्मरण करता रहता है और उसका बदला चुकाने का प्रयत्न करता है, वस्तुतः वही मनुष्य सुन्दर है और इसी सौंदर्य से मनुष्यता एवं इस वसुधा की सीमा बढ़ती है।

~ ऋषि तिरुवल्लुवर
📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर1964 पृष्ठ 1

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/September/v1.3

👉 आप निराश मत हूजिए (भाग १)

आनन्दकंद परमेश्वर की यह विशाल सृष्टि आनन्द मूलक है। सच्चिदानन्द भगवान ही सर्वत्र प्रकट हो रहे हैं उस आनंदघन का आनंदमय ज्ञान प्रत्येक वस्तु से विकसित हो रहा है। भगवान अपने आनन्दमय स्वरूप का सर्वत्र प्रसार कर रहे हैं। जब इस जगत के निर्माणकर्ता का प्रधान गुण आनंद का प्रसार करना है तो संसार में आनंद के अतिरिक्त अन्य क्या हो सकता है। प्रातःकाल हंसता हुआ सूर्य उदित होकर संसार को स्वर्ण रश्मियों से स्नान करा देता है। शीतल सुगंधित वायु मस्ती बिखेरती फिरती है, पक्षीवृन्द आनंद से सने गीत गा गा कर सृष्टिकर्त्ता की उत्कृष्ट कला का प्रकटीकरण करते हैं। विशाल नदियाँ कल कल शब्द कर आनंद बढ़ाती हैं। पुष्पों पर गुँजते हुए मदमाते भ्रमर आनंद के गीत सुना कर हृदय शान्त करते हैं। पृथ्वी का अणु-अणु सुख, ऐक्य, समृद्धि और प्रेम की शक्ति को प्रवाहित कर रहा है। प्रत्येक वस्तु जीवन को स्थायी सफलता और पूर्ण विजय से विभूषित करने को प्रस्तुत है। ऐसी सुँदर सृष्टि में जन्म पा लेना सचमुच बड़े भाग्य की बात है। सतत् तप, पुण्य इत्यादि के उपहार स्वरूप यह दुर्लभ मानव जीवन इसलिए प्राप्त होता है कि हम इसमें पूर्ण आनंद का उपभोग कर जन्म जन्म की थकान मिटा सकें, फिर बतलाइए आप निराश क्यों हैं?

निराशावाद उस महाभयंकर राक्षस के समान है जो मुँह फाड़े हमारे इस परम आनंद जीवन के सर्वनाश की ताक में रहता है, जो हमारी समस्त शक्तियों का हास किया करता है, जो हमें आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर नहीं होने देता और जीवन के अंधकारमय अंश हमारे सम्मुख प्रस्तुत करता है। हमें पग-पग पर असफलता ही असफलता दिखाता है और विजय द्वार में प्रविष्ट नहीं होने देता।

> 👉 *निराश विद्यर्थियो के लिए गायत्री मंत्र एक औषधि | Nirash Vidyarthiyon Ke Liye Gayatri Mantra*  https://youtu.be/Ofsf0Ozk08o?si=Xvx-4lRExjIZyONW

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इस बीमारी से ग्रस्त लोग उदास खिन्न मुद्रा लिए घरों के कोने में पड़े दिन रात मक्खियाँ मारने का काम करते हैं। ये व्यक्ति ऐसे चुम्बक है जो उदासीन विचारों को निरंतर अपनी ओर आकर्षित किया करते हैं और दुर्भाग्य की कुत्सित डरपोक विचारधारा में निमग्न रहा करते हैं। उन्हें चारों ओर कष्ट ही कष्ट दीखते हैं कभी यह, कभी वह, एक से एक भयंकर विपत्ति आती हुई दृष्टिगोचर होती हैं। वे जब बातें करते हैं तो अपनी यातनाओं, विपत्तियों और क्लेशपूर्ण अभद्र प्रसंग छेड़ा करते हैं। हर व्यक्ति से वह यही कहा करते हैं कि भाई हम क्या करें, हम कमनसीब हैं, हमारा भाग फूटा हुआ है, देव हमारे विपरीत है, हमारी किस्मत में विधि ने ठोकरों का ही विधान रखा है। तभी तो हमें थोड़ी-थोड़ी दूर पर लज्जित और परेशान होना, अशान्त, क्षुब्ध और विक्षिप्त होना पड़ता है।’ उनकी चिंतित मुख-मुद्रा देखने पर यही विदित होता है मानों उन्होंने उस पदार्थ से गहरा संबंध स्थिर कर लिया हो जो जीवन की सब मधुरता नष्ट कर रहा हो, उनके सोने जैसे जीवन का समस्त आनंद छीन रहा हो, उन्नति के मार्ग को कंटकाकीर्ण कर रहा हो। मानों समस्त संसार की दुःख विपत्ति उन्हीं के सर पर आ पड़ी हो और उदासी की अंधकारमय छाया उनके हृदय पटल को काला बना दिया है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 12

👉 व्यक्तित्व का विकास कैसे करें

(१) प्रातः उठने से लेकर सोने तक की व्यस्त दिनचर्या निर्धारित करें। उसमें उपार्जन, विश्राम, नित्य कर्म, अन्यान्य काम- काजों के अतिरिक्त आदर्शवादी परमार्थ प्रयोजनों के लिए एक भाग निश्चित करें। साधारणतया आठ घण्टा कमाने, सात घण्टा सोने, पाँच घण्टा नित्य कर्म एवं लोक व्यवहार के लिए निर्धारित रखने के उपरान्त चार घण्टे परमार्थ प्रयोजनों के लिए निकालना चाहिए। इसमें भी कटौती करनी हो, तो न्यूनतम दो घण्टे तो होने ही चाहिये। इससे कम में पुण्य परमार्थ के, सेवा साधना के सहारे बिना न सुसंस्कारिता स्वभाव का अंग बनती है और न व्यक्तित्व का उच्चस्तरीय विकास सम्भव होता है।

(२) आजीविका बढ़ानी हो तो अधिक योग्यता बढ़ायें। परिश्रम में तत्पर रहें और उसमें गहरा मनोयोग लगायें। साथ ही अपव्यय में कठोरता पूर्वक कटौती करें। सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त समझें। अपव्यय के कारण अहंकार, दुर्व्यसन, प्रमाद बढ़ने और निन्दा, ईर्ष्या, शत्रुता पल्ले बाँधने जैसी भयावह प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगायें। सादगी प्रकारान्तर से सज्जनता का ही दूसरा नाम है। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह ही अभीष्ट है। अधिक कमाने वाले भी ऐसी सादगी अपनायें जो सभी के लिए अनुकरणीय हो। ठाट- बाट प्रदर्शन का खर्चीला ढकोसला समाप्त करें।

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(३) अहर्निश पशु प्रवृत्तियों को भड़काने वाले विचार ही अन्तराल पर छाये रहते है। अभ्यास और समीपवर्ती प्रचलन मनुष्य को वासना, तृष्णा और अहंकार की पूर्ति में निरत रहने का ही दबाव डालता है। सम्बन्धी मित्र परिजनों के परामर्श प्रोत्साहन भी इसी स्तर के होते हैं। लोभ, मोह और विलास के कुसंस्कार निकृष्टता अपनाये रहने में ही लाभ तथा कौशल समझते हैं। ऐसी ही सफलताओं को सफलता मानते हैं। इसे एक चक्रव्यूह समझना चाहिये। भव- बन्धन के इसी घेरे से बाहर निकलने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना चाहिये। कुविचारों को परास्त करने का एक ही उपाय है- प्रज्ञा साहित्य का न्यूनतम एक घण्टा अध्ययन अध्यवसाय। इतना समय एक बार न निकले तो उसे जब भी अवकाश मिले, थोड़ा- थोड़ा करके पूरा करते रहना चाहिये।

(४) प्रतिदिन प्रज्ञायोग की साधना नियमित रूप से की जाय। उठते समय आत्मबोध, सोते समय तत्त्वबोध। नित्य कर्म से निवृत्त होकर जप, ध्यान। एकान्त सुविधा का चिन्तन- मनन में उपयोग। यही है त्रिविधि सोपानों वाला प्रज्ञायोग। यह संक्षिप्त होते हुए भी अति प्रभावशाली एवं समग्र है। अपने अस्त- व्यस्त बिखराव वाले साधना क्रम को समेटकर इसी केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित करना चाहिये। महान के साथ अपने क्षुद्र को जोड़ने के लिए योगाभ्यास का विधान है। प्रज्ञा परिजनों के लिए सर्वसुलभ एवं सर्वोत्तम योगाभ्यास ‘प्रज्ञा योग’ की साधना है। उसे भावनापूर्वक अपनाया और निष्ठा पूर्वक निभाया जाय।

(५) दृष्टिकोण को निषेधात्मक न रहने देकर विधेयात्मक बनाया जाय। अभावों की सूची फाड़ फेंकनी चाहिये और जो उपलब्धियाँ हस्तगत है, उन्हें असंख्य प्राणियों की अपेक्षा उच्चस्तरीय मानकर सन्तुष्ट भी रहना चाहिये और प्रसन्न भी। इसी मनःस्थिति में अधिक उन्नतिशील बनना और प्रस्तुत कठिनाइयों से निकलने वाला निर्धारण भी बन पड़ता है। असन्तुष्ट, खिन्न, उद्विग्न रहना तो प्रकारान्तर से एक उन्माद है, जिसके कारण समाधान और उत्थान के सारे द्वार ही बन्द हो जाते है।

कर्तृत्व पालन को सब कुछ मानें। असीम महत्त्वाकांक्षाओं के रंगीले महल न रचें। ईमानदारी से किये गये पराक्रम से ही परिपूर्ण सफलता मानें और उतने भर से सन्तुष्ट रहना सीखें। कुरूपता नहीं, सौन्दर्य निहारें। आशंकाग्रस्त, भयभीत, निराश न रहें। उज्ज्वल भविष्य के सपने देखें। याचक नहीं दानी बने। आत्मावलम्बन सीखें। अहंकार तो हटायें पर स्वाभिमान जीवित रखें। अपना समय, श्रम, मन और धन से दूसरों को ऊँचा उठायें। सहायता करे पर बदले की अपेक्षा न रखें। बड़प्पन की तृष्णाओं को छोड़े और उनके स्थान पर महानता अर्जित करने की महत्वाकांक्षा सँजोये। स्मरण रखें, हँसते- हँसाते रहना और हल्की- फुल्की जिन्दगी जीना ही सबसे बड़ी कलाकारिता है।

गुरुवार, 8 अगस्त 2024

👉 भगवान प्रेम स्वरूप हैं। (भाग 2)

🔹 मनुष्य अपने आपको नहीं पहचान पाता है वास्तव में जो कुछ वह किया करता है उसी से कार्यानुसार दंड व यश का भागी बनता है। अब सब कुछ मनुष्य मात्र पर ही रह जाता है। यदि मनुष्य स्वतः को सुधार लेता है तो वह सबको सुधार सकता है परन्तु जब वह स्वतः नहीं सुधरेगा तो दूसरों को कैसे सुधार सकता है। नियमों का विधान पालन करने के लिए ही बनाया जाता है। जब उन विचारों का उल्लंघन किया जाता है तब मनुष्य अपने कर्त्तव्य से च्युत हो जाता है तब उसे उस अवस्था में दंड प्राप्त होता है।

🔸 यहाँ प्रधानता मनुष्य के कर्मों की ही है वह कर्मानुसार ही फल को प्राप्त होता है। भगवान सबसे प्रेम करते हैं। भगवान की मान्यता ही मानवता का आधार है। चाहे कितनी ही बाधाएं सामने क्यों न खड़ी हों, यदि मनुष्य प्रेमपूर्वक उनका अभिनन्दन कर, प्रेम स्वरूप प्रभु का मंगल विधान समझ अपने पथ पर दृढ़ होकर डटा रहता है तो उसका विकास सदैव सही मार्ग से ही होता है। मनुष्य के लिए कर्त्तव्य की जो सीमा निर्धारित की गई है उसके पालन के लिए न तो कोई विशेष प्रयत्न ही आवश्यक है और न कोई साधना की, सीधा पथ है-उस प्रभु का आधार।

🔹 सब कठिनाइयों का प्रेमपूर्वक स्वागत करें तो आप उन्हें अवश्य जीत सकेंगे। भारी से भारी विपत्ति क्यों न हो हमें उसका प्रेमपूर्वक अभिनन्दन करना चाहिए। भगवान के प्रत्येक विधान में हमारा मंगल भरा है। आज जो विपत्ति व बाधाएं हमारे सामने हैं उनसे मुँह मोड़ने व भागने की आवश्यकता नहीं है। उनका आविर्भाव तो हमारे कल्याण के लिए ही हुआ है। हो सकता है हमारे पूर्व जन्म के कर्मों के कारण उपलक्ष के ही वे हमें प्राप्त हो रही हों। हमें कब और किस समय कौन सी वस्तु की आवश्यकता होती है यह वे अंतर्यामी परम प्रभु स्वतः जानते हैं।

> 👉 अमृतवाणी:- हर दिन नया जन्म हर दिन नई मौत | Har Din Naya Janam Aur Mout  https://youtu.be/6fG_dfbXPEk?si=a9yD3uhFvoaCvl5B

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🔸 परम पिता हमें कितना अपार स्नेह देते हैं यदि वह रहस्य हम समझ जाए तो सुख और दुख, शाँति अशाँति दोनों ही हमारे लिए समान हो जाएंगे। तथा यश व दंड का भेद ही न रह जायगा। अपने परम शुभ चिंतक मंगलमय भगवान के प्रत्येक विधान में हमें सदा प्रसन्न रहना चाहिए तथा सबसे प्रेम का व्यवहार कर प्रेम स्वरूप प्रभु को समझने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रेम ही परमात्मा है और परमात्मा ही प्रेम है।

..... समाप्त
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

👉 परिस्थितियों के अनुकूल बनिये

🔹 परिस्थितियों की अनुकूलता की प्रतिज्ञा करते-2 मूल उद्देश्य दूर पड़ा रह जाता है। हमें जीवन में जो कष्ट है, जो हमारा लक्ष्य है, उसे हम परिस्थिति के प्रपंच में पड़ कर विस्मृत कर रहे हैं।

🔸 यदि आपके पास कीमती फाउन्टेन पेन नहीं है, बढ़िया कागज और फर्नीचर नहीं है, तो क्या आप कुछ न लिखेंगे? यदि उत्तम वस्त्र नहीं हैं, तो क्या उन्नति नहीं करेंगे? यदि घर में बच्चों ने चीजें अस्त-व्यस्त कर दी हैं, या झाडू नहीं लगा है, तो क्या आप क्रोध में अपनी शक्तियों का अपव्यय करेंगे? यदि आपकी पत्नी के पास उत्तम आभूषण नहीं हैं, तो क्या वे असुन्दर कहलायेंगी या घरेलू शान्ति भंग करेंगी? यदि आपके घर के इर्द-गिर्द शोर होता है, तो क्या आप कुछ भी न करेंगे? यदि सब्जी, भोजन, दूध इत्यादि ऊंचे स्टैन्डर्ड का नहीं बना है, तो क्या आप बच्चों की तरह आवेश में भर जायेंगे? नहीं, आपको ऐसा कदापि न करना चाहिए।

🔹 परिस्थितियाँ मनुष्य के अपने हाथ की बात है। मन के सामर्थ्य एवं आन्तरिक स्वावलम्बन द्वारा हम उन्हें विनिर्मित करने वाले हैं। हम जैसा चाहें जब चाहें सदैव कर सकते हैं। कोई भी अड़चन हमारे मार्ग में नहीं आ सकती। मन की आन्तरिक सामर्थ्य के सम्मुख प्रतिकूलता बाधक नहीं हो सकती।

🔸 सदा जीतने वाला पुरुषार्थी वह है जो सामर्थ्य के अनुसार परिस्थितियों को बदलता है। किन्तु यदि वे बदलती नहीं, तो स्वयं अपने आपको उन्हीं के अनुसार बदल लेता है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में उसकी मनः शान्ति और संतुलन स्थिर रहता है। विषम परिस्थितियों के साथ वह अपने आपको फिट करता चलता है।

👉 अमृतवाणी:- खुश रहने के लिए अपने को बदलिये https://youtu.be/gkDv7D1pHFk?si=m_aueBFkz8nqJFYX

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🔹 निराश न होइए यदि आपके पास बढ़िया मकान, उत्तम वस्त्र, टीपटाप, ऐश्वर्य इत्यादि वस्तुएँ नहीं हैं। ये आपकी उन्नति में बाधक नहीं हैं। उन्नति की मूल वस्तु-महत्वाकाँक्षा है। न जाने मन के किस अतल गह्वर में यह अमूल्य सम्पदा लिपटी पड़ी हो किन्तु आप गह्वर में है अवश्य। आत्म-परीक्षा कीजिये और इसे खोजकर निकालिये।

🔸 प्रतिकूल परिस्थितियों से परेशान न होकर उनके अनुकूल बनिये और फिर धीरे-2 उन्हें बदल डालिये।

📖 अखण्ड ज्योति- मई 1949

बुधवार, 7 अगस्त 2024

👉 मानसिक आरोग्य का आधार

शरीर रोगी होने से देह दुख पाती है; मन रोगी होने पर हमारा अन्तःकरण नरक की आग में झुलसता रहता है। कई व्यक्ति देह से तो निरोग दीखते हैं पर भीतर ही भीतर इतने अशान्त और उद्विग्न रहते हैं कि उनका कष्ट रोगग्रस्तों से भी कहीं अधिक दिखाई पड़ता है। ईर्ष्या द्वेष, क्रोध, प्रतिशोध की आग में जो लोग जलते रहते हैं उन्हें आग से जलने पर छाले पड़े हुए रोगी की अपेक्षा अधिक अशान्ति और उद्विग्नता रहती है। घाटा, अपमान, भय, आशंका, चिन्ता, शोक, असफलता, निराशा आदि कारणों से खिन्न बने हुए मन में इतनी गहरी व्यथा होती है कि उससे छूटने के लिए कई तो आत्म-हत्या तक कर बैठते हैं और कइयों से उसी उद्वेग में ऐसे कुकृत्य बन पड़ते हैं जिनके लिए उन्हें जीवन भर पश्चात्ताप करना पड़ता है। ओछी तबियत के कुछ आदमी हर किसी को बुरा समझने, हर किसी में बुराई ढूँढ़ने के आदी होते हैं, उन्हें बुराई के अतिरिक्त और कुछ कहीं भी-दीख नहीं पड़ता। ऐसे लोगों को यह दुनिया काली डरावनी रात की तरह और हर आदमी प्रेत-पिशाच की तरह भयंकर आकृति धारण किये चलता-फिरता नजर आता है। इस प्रकार की मनोभूमि के लोगों की दयनीय दशा का अनुमान लगाने में भी व्यथा होती है।

क्रूर, निर्दयी, अहंकारी, उद्दंड, दस्यु, तस्कर, ढीठ, अशिष्ट, गुंडा प्रकृति के लोगों के शिर पर एक प्रकार का शैतान हर घड़ी चढ़ा रहता है। नशे में मदहोश उन्मत्त की तरह उनकी वाणी, क्रिया एवं चेष्टाएँ होती हैं। कुछ भी आततायीपन वे कर गुजर सकते हैं। तिल को ताड़ समझ सकते हैं, खटका मात्र सुनकर क्रुद्ध विषधर सर्प की तरह वे किसी पर भी हमला कर सकते हैं। ऐसी पैशाचिक मनोभूमि के लोगों के भीतर श्मशान जैसी प्रतिहिंसा और दर्प की आग जलती हुई प्रत्यक्ष देखी जा सकती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 जीवन ईश्वर का स्वरूप एवं वरदान

जीवन ईश्वर है या ईश्वर जीवन, इस प्रश्न पर ताओ धर्म के दार्शनिक बहुत समय तक विचार करते रहे और अन्ततः वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि जीवन मनुष्य के लिए ईश्वर का सर्वोपरि उपहार है। इसकी गरिमा इतनी बड़ी है जितनी इस संसार में अन्य किसी सत्ता की नहीं। इसलिए उसे ईश्वर के समतुल्य माना जाय तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।
ईश्वर की झाँकी जीवन सत्ता की संरचना और संभावना को देखकर की जा सकती है। यदि उसकी ठीक तरह उपासना की जा सके तो वे सभी वरदान उपलब्ध हो सकते हैं जो ईश्वर के अनुग्रह से किसी को कभी मिल सके हैं। यह प्रत्यक्ष देवता है। हमारे इतना समीप है कि मिलन से उत्पन्न असीम आनन्द की अनुभूति अहर्निशि की जा सके।

जीवन का उद्देश्य है, अपने अन्तराल में छिपे दिव्य का, अद्भुत का, सुन्दर का, दर्शन कराना। उस ईश्वरीय जीवन के साथ जोड़ देना जो इस ब्रह्माण्ड की आत्मा है। पूर्ण है और वह सब है जिसमें मानवी कल्पना से भी कहीं अधिक सौन्दर्य का- सुखद का- सागर लहराता है।

ईश्वर को समझना हो तो जीवन को समझो। ईश्वर को पाना हो तो जीवन को प्राप्त करो। हम जीवन रहित जिन्दगी जीते हैं। इससे आगे बढ़ें, गहरे घुसें, निर्मल करें और उस महान अवतरण को प्रतिबिम्बित करें जो प्रेम के रूप में आत्म सत्ता के अन्तराल में आलोक की एक किस्म जैसा विद्यमान है। आत्मा को दिव्य से ओत-प्रोत करने की साधना से ही वह सब प्राप्त हो सकता है, जिसे जीवन का लक्ष्य और वरदान कहा गया है।

सन्त टी. एल. वास्वानी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1978 पृष्ठ 1

👉 भगवान प्रेम स्वरूप हैं। (भाग 1)

🔹 कुछ लोगों की धारणा है कि भगवान ही दंड दिया करते हैं परन्तु वास्तव में भगवान किसी को दंड नहीं देते। मनुष्य स्वयं ही कर्मवश अपने आपको दंड देता है। जब कभी यह कोई बुरा कार्य अपनी इन्द्रियों के वशीभूत होकर बिना विचारे किया करता है तब उसे उसका फल मिला करता है। यदि कार्य बुरा होता है तो फल भी दंड रूप में मिलता है और यदि कर्म अच्छा होता है तो फल यश रूप में प्राप्त होता है।

🔸 भगवान प्रेम स्वरूप है। सारा संसार उन प्रभु की रचित माया ही है। जब भगवान प्रेम स्वरूप हैं तब दंड कैसे दे सकते हैं? भगवान कदापि दंड नहीं देते। विश्व-कल्याण के लिए विश्व का शासन कुछ सनातन नियमों द्वारा होता है जिन्हें हम धर्म का रूप देते हैं तथा धर्म के नाम से पुकारते हैं। धर्म किसे कहते हैं?-”जो धारण करे” यानी जिसके धारण करने से किसी वस्तु का अस्तित्व बना रहे वही धर्म है।

🔹 अग्नि का धर्म प्रकाश व उष्णता देना है। परन्तु यदि वह प्रकाश व उष्णता नहीं दे तो वह तो राख अथवा कोयले का ढेर मात्र ही रह सकता है क्योंकि वह अपने को छोड़ चुकी है। ठीक यही दशा मानव की है। वह भी धर्म रजु द्वारा बंधा रहता है। जब कभी वह अपना धर्म त्यागता है उसे अवश्य ही हानि उठानी पड़ती है और वह दंड विधान बन कर उसे आगाह करती है। मनुष्य मार्ग की मानवता का आधार धर्म ही है। जब जानबूझकर अथवा असावधानी वश सनातन नियमों का उल्लंघन किया जाता है। तब अवश्य ही दंड का भागी बनना पड़ता है। भगवान को व्यर्थ ही दोषी ठहराना अनुचित है।

> 👉 अध्यात्म के सूत्र | Adhyatam Ke Sutra | Dr Chinmay Pandya* 

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🔸 भगवान कल्याणमय हैं तथा उनके नियम भी कल्याणमय हैं। जब उन नियमों का उचित प्रकार पालन नहीं किया जाता तब ही दंड चेतावनी के रूप में मिला करते हैं परन्तु मूर्खता व अज्ञानवश मनुष्य इतने पर भी नहीं संभलता और एक के बाद दूसरा नियम भी खंडित करता जाता है।

*.....क्रमशः जारी
*परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी* 

मंगलवार, 6 अगस्त 2024

👉 उपासना, साधना व आराधना (अन्तिम भाग)

🔹 हमारे दूसरे आध्यात्मिक गुरु, जो हिमालयवासी हैं और जो सूक्ष्म-शरीरधारी हैं, उन्होंने हमारे घर में प्रकाश के रूप में आकर दीक्षा दी। उन्होंने हमें पूर्व जन्म की बातें दिखलाईं। उसके बाद उन्होंने हमें गायत्री मंत्र की दीक्षा दी। हमने कहा कि गायत्री मंत्र की दीक्षा तो हम पहले से लिए हुए हैं, फिर दोबारा देने का क्या अर्थ है? उन्होंने कहा कि आपके पहले गुरु ने यह कहा था कि यह ब्राह्मणों की गायत्री है। अब हम यह बतलाते हैं कि बोओ और काटो। इस मंत्र के अनुसार हमने अपने पिता की सम्पत्ति को भी लोकमंगल में लगा दिया। हमने बोया और पाया है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि इसके अलावा अन्य चार चीजों को भगवान् के खेत में लगाना चाहिए। समय, श्रम, बुद्धि-जो भगवान् से मिली है। धन वह है, जो संसार में कमाया जाता है। ये चारों चीजें हमने समाज में लगा दीं। इसके द्वारा हमारी पूजा, उपासना एवं साधना हो गयी। हमारे ब्राह्मण-जीवन का यही चमत्कार है। यही मेरी पूजा है।

🔸 समय के बारे में आप देखना चाहें, तो इन पचहत्तर वर्षों में हमने क्या किया है, कितना किया है, वह आप देख सकते हैं। हमने भगवान् यानी जो अच्छाइयों का समुच्चय है, उसे समर्पण करके यह सब किया है। हमारी उपासना और साधना ऐसी है कि हमने सारी जिन्दगी भर धोबी के तरीके से अपने जीवन को धोया है और अपनी कमियों को चुन-चुनकर निकालने का प्रयत्न किया है। आराधना हमने समाज को ऊँचा उठाने के लिए की है। आप यहाँ आइये और देखिये, अपने मुख से अपने बारे में कहना ठीक बात नहीं है। आप यहाँ आइये और दूसरों के मुख से सुनिये। हम सामान्य व्यक्ति नहीं हैं, असामान्य व्यक्ति हैं। यह हमें उपासना, साधना और आराधना के द्वारा मिला है। आप अगर इन तीनों चीजों का समन्वय अपने जीवन में करेंगे, तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपको साधना से सिद्धि अवश्य मिलेगी।

👉 अमृतवाणी - उपासना, साधना, आराधना | Upasna, Sadhna, Aradhna 

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🔹 हमारे जो भी सहयोगी, सखा, सहचर एवं मित्र हैं, उनसे हम यही कहना चाहते हैं कि आप केवल अपने तथा अपने परिवार के लिए ही खर्च मत कीजिए, वरन् कुछ हिस्सा भगवान् के लिए भी खर्च कीजिए। साथ ही हम यह भी कहते हैं कि बोइये और काटिये। फिर देखिये कि जीवन में क्या-क्या चमत्कार होते हैं। आप जनहित में, लोकमंगल में, पिछड़ों को ऊँचा उठाने में अपना श्रम, समय, साधन लगाएँ। अगर आप इतना करेंगे, तो विश्वास रखिये आपको साधना से सिद्धि मिल सकती है। हमने इसी आधार पर पाया है और आप भी पा सकेंगे, परन्तु आपको सही रूप से इन तीनों को पूरा करना होगा। आपकी साधना तब तक सफल नहीं होगी, जब तक आप हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलेंगे। यदि आप हमारे कंधे से कंधा मिलाकर और कदम से कदम मिलाकर चल सकें, तो हम आपको यकीन दिलाते हैं कि आपका जीवन धन्य हो जाएगा, पीढ़ियाँ आपको श्रद्धापूर्वक याद रखेंगी।

.....आज की बात समाप्त। ॐ शान्तिः
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी 

सोमवार, 5 अगस्त 2024

👉 उपासना, साधना व आराधना (भाग 10)

🔹 आध्यात्मिक क्षेत्र में सिद्धि पाने के लिए अनेक लोग प्रयास करते हैं, पर उन्हें सिद्धि क्यों नहीं मिलती है? साधना से सिद्धि पाने का क्या रहस्य है? इस रहस्य को न जानने के कारण ही प्रायः लोग खाली हाथ रह जाते हैं। मित्रो, साधना की सिद्धि होना निश्चित है। साधना सामान्य चीज नहीं है। यह असामान्य चीज है। परन्तु साधना को साधना की तरह किया जाना परम आवश्यक है। साधना कैसी होनी चाहिए इस सम्बन्ध में हम आपको पुस्तकों का हवाला देने की अपेक्षा एक बात बताना चाहते हैं, जिसकी आप जाँच-पड़ताल कभी भी कर सकते हैं।

🔸 हम पचहत्तर साल के हो गये हैं। कहने का मतलब यह है कि हमारे पूरे ७५ साल साधना में व्यतीत हुए हैं। यह हमारा जीवन एक खुली पुस्तक के रूप में है। हमने साधना की है। उसका परिणाम मिला है और जो कोई भी साधना करेगा, उसे भी परिणाम अवश्य मिलेगा। हमें कैसे मिला, इसके संदर्भ में हम दो घटनाएँ सुनाना चाहते हैं।

🔹 पहली बार हमारे पिताजी हमें महामना मदनमोहन मालवीय जी के पास यज्ञोपवीत एवं दीक्षा दिलाने के लिए बनारस ले गये थे। मालवीय जी ने काशी में हमें यज्ञोपवीत भी पहनाया और दीक्षा भी दी। उस समय उन्होंने हमें बहुत-सी बातें बतलायीं। उस समय हमारी उम्र बहुत कम यानी ९ वर्ष की थी, परन्तु दो बातें हमें अभी भी ज्ञात हैं। पहली बात उन्होंने कहा कि हमने जो गायत्री मंत्र की दीक्षा दी है, वह ब्राह्मणों की कामधेनु है। हमने पूछा कि क्या यह अन्य लोगों की नहीं है? उन्होंने कहा कि नहीं, ब्राह्मण जन्म से नहीं, कर्म से होता है।

👉 *अमृतवाणी:- उज्जवल भविष्य की संभावनों का आश्वासन* https://youtu.be/e2-g9ceLrfM?si=jpR_zHybAWwmyxl0

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🔸 जो ईमानदार, नेक, शरीफ है तथा जो समाज के लिए, देश के लिए, लोकहित के लिए जीता है, उसे ब्राह्मण कहते हैं। एक औसत भारतीय की तरह जो जिए तथा अधिक से अधिक समाज के लिए लगा दे, उसे ब्राह्मण कहते हैं। गाँधीजी ने भी राजा हरिश्चन्द्र का नाटक देखकर यह वचन दिया था कि हम हरिश्चन्द्र होकर जियेंगे। वे इस तरह का जीवन जिए भी। हमने भी मालवीय जी के सामने यह संकल्प लिया था कि हम ब्राह्मण का जीवन जियेंगे। हमने वैसा ही जीवन प्रारम्भ से जिया है।

..... क्रमशः जारी
✍🏻 पूज्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Lectures/112.2

👉 असाधारण कभी साधारण की इच्छा नहीं करते !!

बाली वध तथा सुग्रीव के राज्याभिषेक पश्चात्  वर्षा ऋतु के आने के कारण श्रीराम जी भैया लक्ष्मण सहित प्रवर्षण पर्वत के गुफा में निवास करते हैं। इसी काल में श्रीराम जी भैया लक्ष्मण जी से भक्ति, वैराज्ञ,राजनीति और विवेक से संबंधित कई कथा कहते हैं।

कहत अनुज सन कथा अनेका।
भगति बिरति नृपनीति बिबेका।।

लेकिन लक्ष्मण जी के मन में प्रभु के विचित्र लीला से संबंधित जिज्ञासा है जिसे वे अनुकूल समय पर पूछते हैं।

लक्ष्मण जी कहते हैं कि-
हे प्रभु! आप कैसी विचित्र लीला करते हैं कि सुग्रीव के दुख देखकर बाली को एक ही वाण से मारने की प्रतिज्ञा करते हुए कहते हैं...

सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान।
ब्रह्म रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान।।

"हे सुग्रीव  सुनिए ! मैं बाली को एक ही वाण से मार डालूँगा । यदि वह ब्रह्मा जी या शंकर जी के शरण में भी चला जाए तो अब जीवित नहीं रहेगा।"

श्रीराम जी- हाँ भैया लक्ष्मण! मैंने ये प्रतिज्ञा की थी और उसे पूर्ण भी किया तो इसमें तूझे संदेह क्यों है??

लक्ष्मण जी- "प्रभु! संदेह का प्रश्न ये है कि जब आपने बिना किसी परिश्रम के दुंदुंभी राक्षस के विशाल अस्थि और सातों ताल वृक्षों को गिरा दिए तो सुग्रीव ने आपके बल पौरूष देखकर बाली से वैर भाव त्याग देने की इच्छा प्रकट की...

बाली परम हित जासु प्रसादा।
मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा।।

तो आपने सुग्रीव को अपनी प्रतिज्ञा याद दिलाई...

...सखा! बचन मम मृषा न होई"!!!

"हे मित्र सुग्रीव! मेरी वाणी असत्य नहीं हो सकती। मैंने बाली वध की प्रतिज्ञा की है। लेकिन आपके वाण के प्रहार से पृथ्वी पर गिरा बाली ज्यों ही आपके शरण आया कि आपने कहा कि...."

"अचल करौं तनु ! राखहु प्राना !!"

हे बाली! तुम्हारे शरीर को अचल कर देता हूँ, अतः तुम जीवित रहो।

👉👉तो क्या ये वचन आपके प्रतिज्ञा से मेल खा रहा है? और यदि वह जीवित रहना स्वीकार कर लेता तो क्या होता?? हे प्रभु! मैं आपकी लीला देखकर कभी कभी भारी उलझन में पड़ जाता हूँ!!!

अति बिचित्र रघुपति चरित !!

श्रीराम जी मुस्कुराते हुए कहते हैं कि -"देखो भैया! मैंने शरीर रखने के लिए,जीवित रहने के लिए केवल बाली को ही नहीं कहा है।बल्कि गीधराज जटायु से भी विनती की थी लेकिन क्या वे हमारे प्रस्ताव को स्वीकार किए ??जरा दोनों के वचन स्मरण करो...

राम कहा- तनु राखहु ताता!!

गीधराज जटायु असह्य पीड़ा में भी हँसते हुए कहते हैं -

जाकर नाम मरत मुख आवा।अधमउ मुकुत होइ श्रुति गावा।।
"सो" मम लोचन गोचर आगे।राखौं देह हेतु केहि खाँगें ??

बाली...

जन्म जन्म मुनि जतन कराहीं।अंत राम कहि आवत नाहीं।।
मम लोचन गोचर सोइ आवा।बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा??

बाली ने स्पष्ट कह दिया कि...

अस कवन सठ हठि काटि सुकतरु,बारि करिहि बबूरही?

ऐसा कौन मूर्ख होगा जो अपने खेत से सर्व इच्छित फल दाता कल्प वृक्ष काट कर कँटीले बबूर की खेती करेगा??

हे लक्ष्मण! बाली अपनी पत्नी तारा से कहकर आया था कि...

कह बाली-सुनु भीरु प्रिय! समदरसी रघुनाथ।
"जौं कदाच मोहि मारिहि तौ पुनि होउ सनाथ"!!!

हे लक्ष्मण! बाली उतना मूर्ख नहीं था जो मेरे धाम के बदले
(राम बाली निज धाम पठावा) पृथ्वी,जल ,अग्नि, आकाश और वायु से निर्मित अधम शरीर को रख लेता!!!

बाली कोई साधारण बंदर नहीं था! बाली  असाधारण  था!! और 👉 असाधारण कभी साधारण की इच्छा नहीं करते हैं।

रविवार, 4 अगस्त 2024

👉 उपासना, साधना व आराधना (भाग 9)

🔸 हमारा भगवान् भी उसी तरह का है। उन्होंने कहा था कि जो कुछ भी करना भगवान् के लिए करना, समाज के लिए करना। हमने सारी जिन्दगी इसी तरह का काम किया है और जितना किया है, उतना पा लिया है। आगे जो हम करेंगे, उसके एवज में भी हम पाते रहेंगे। आपका तो हमेशा दिल धड़कता रहता है। आपको तो भगवान् का नाम लेना सहज मालूम पड़ता है, पर भगवान् का काम करना मुश्किल पड़ता है तथा उसके लिए पैसा लगाना तो और भी मुश्किल मालूम पड़ता है। यह आपके लिए मुश्किल हो सकता है, परन्तु हमारे लिए तो यह एकदम सरल है। हमारे दिमाग, शरीर, साहित्य, हमारी प्लानिंग को देख लीजिए, यह हमारी सिद्धियाँ हैं। ज्ञान की थाह आप ले लीजिए, हमारे धन की जानकारी ले लीजिए, हमारी भावना को देख लीजिए, कितने लोग हमारे दर्शन को लालायित रहते हैं।

🔹 यह सारी हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ हैं। ऋद्धियाँ तो हमारी दिखलाई नहीं पड़ती। हमें खूब आराम से नींद आ जाती है, पास में नगाड़ा भी बजता रहे, तो भी कोई परवाह नहीं। चिन्ता हमारे पास नहीं है। हम निर्भीक हैं। आत्मसंतोष हमारी ऋद्धि है। हमारा लोकसम्मान बहुत है। लोकसम्मान उसे कहते हैं- जिसमें जनता का सहयोग मिलता है। भगवान् का अनुग्रह भी हमें मिला है। अनुग्रह कैसा होता है, कहते हैं कि देवता ऊपर से फूल बरसाते हैं। हमारे ऊपर हमेशा फूल बरसते रहते हैं, जिसे हम प्रोत्साहन, साहस, हिम्मत, प्रेरणा, उत्साह, उम्मीद कह सकते हैं। देवता इसे हमारे ऊपर बरसाते रहते हैं।

🔸 मित्रो, हम अपने पिता के वफादार बेटे हैं। हमने उनके धन को पाया है, क्योंकि हमने उनके नाम को बदनाम नहीं किया है। हमने अपने पिता की लाज रखी है। हमने अपने पिता के व्यवसाय को जिंदा रखा है हमने उनके बगीचे को हमेशा हरा-भरा तथा अच्छा बनाने का प्रयास किया है। मनुष्यों को सुसंस्कारी तथा समुन्नत बनाने के लिए जो भी संभव था, उसे हमने पूरा किया है। हमारे पिता हमसे हमेशा प्रसन्न रहते हैं। युवराज वह होता है, जो अपने पिता के समान हो जाता है। हम अपने पिता के युवराज हैं। हम अपने पिता के समकक्ष हो गये हैं। हमने पिता को गुम्बज की आवाज-प्रतिध्वनि के रूप में देखा है। जो शब्द हमने कहा-वैसा ही सुनने को मिला। हमने कहा कि जो कुछ भी हमारे पास है, वह आपका है। उसने भी ऐसा ही कहा कि जो कुछ हमारे पास है, वह तुम्हारा है। हमने कहा कि हमें नहीं चाहिए आपका, उसने भी वैसा ही कहा।

👉अमृतवाणी:- श्रद्धा और लगन | Shraddha Aur Lagan https://youtu.be/w3JEfbCuz0k?si=7eNKHCtTrTBDIlzE

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🔹 भगवान् हमेशा हमारे बॉडीगार्ड के रूप में फिरता रहता है। वह कहता है कि कभी भी हिम्मत मत हारना, साहस मत खोना, किसी से डरना मत। जो तुम्हें तंग करेगा, उसे हम ठीक कर देंगे। उसकी नाक में दम कर देंगे। वह परेशान एवं हैरान हो जाएगा। उसे हम धूल में मिला देंगे। हमारा बॉडीगार्ड आगे-आगे चलता है। हम उसके पीछे चलते हैं। हमारा पायलट आगे चलता है, बॉडीगार्ड पीछे चलता है। हम सुरक्षित होकर मिनिस्टर के तरीके से शानदार ढंग से चलते हैं। यह हमारा प्रत्यक्ष चमत्कार है, जो आप देख रहे हैं।

..... क्रमशः जारी
✍🏻 पूज्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Lectures/112.2

शनिवार, 3 अगस्त 2024

👉 उपासना, साधना व आराधना (भाग 8)

🔹 और क्या था हमारे पास? हमारे पास थी भावना-संवेदना यह भी हमने अपने कुटुम्बियों के लिए, बेटे-बेटी के लिए नहीं लगाई। हमने अपनी भावना एवं संवेदना के माध्यम से इस संसार में रहने वाले व्यक्तियों के दुःखों के निवारण के लिए हमेशा उपयोग किया। हमने हमेशा यह सोचा कि हमारे पास कुछ है, तो उसे किस तरह से बाँट सकते हैं? अगर किसी के पास दुःख है, तो उसे किस तरह से दूर कर सकते हैं। यही हमने अपने पूरे जीवनकाल में किया है। इसके अलावा जो भी धन था, उसे भी भगवान् के कार्य में खर्च कर दिया। इससे हमें बहुत मिला, इतना अधिक मिला कि हम आपको बतला नहीं सकते। हमें लोग कितना प्यार करते हैं, यह आपको नहीं मालूम।

🔸 लोग यहाँ आते हैं, तो यह कहते हैं कि हमें गुरुजी का दर्शन मिल जाता, तो कितना अच्छा होता। यह क्या है? यह है हमारा प्यार, मोहब्बत, जो हमने उन्हें दी है तथा उनसे हमने पायी है। गाँधी जी ने भी दिया था एवं उन्होंने भी पाया है। हमने तो कहीं अधिक पाया है। मरने के बाद तो कितने ही व्यक्तियों की लोग पूजा करते हैं। भगवान् बुद्ध की पूजा करते हैं। मरने के बाद भगवान् श्रीकृष्ण की जय बोलते हैं, जबकि उस समय लोगों ने उन्हें गालियाँ दी थीं। हमारे मरने के बाद कोई आरती उतारेगा कि नहीं, मैं यह नहीं कह सकता, परन्तु आज कितने लोगों ने आरती उतारी है, प्यार किया है, इसे हम बतला नहीं सकते। यह क्या हो गया? यह है हमारा ‘बोया एवं काटा’ का सिद्धान्त। यह है हमारी आराधना-समाज के लिए, भगवान् के लिए।

🔹 मित्रो, हमने पत्थर की मूर्ति के लिए नहीं, वरन् समाज के लिए काम किया है। पत्थर की मूर्ति को भगवान् नहीं कहते हैं। समाज को ही भगवान् कहते हैं। हमने ऐसा ही किया है। हमें दो मालियों की कहानी हमेशा याद रहती है। एक राजा ने एक बगीचा एक माली को दिया तथा दूसरा बगीचा दूसरे माली को। एक ने तो बगीचे में राजा का चित्र लगा दिया और नित्य चन्दन लगाता, आरती उतारता तथा एक सौ आठ परिक्रमा करता रहा। इसके कारण बगीचे का कार्य उपेक्षित पड़ा रहा। बगीचा सूखने लगा।

> 👉 *अमृतवाणी:- चिंतन का महत्त्व और स्वरूप | Chintan Ka Mhatav Aur Swaroop* 

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🔸 दूसरा माली तो राजा का नाम भी भूल गया, परन्तु वह निरन्तर बगीचे में खाद-पानी डालने, निराई करने का काम करता रहा। इससे उसका बगीचा हरियाली से भरा-पूरा होता चला गया। राजा एक वर्ष बाद बगीचा देखने आया, तो पहले वाले माली को उसने हटा दिया, जो एक सौ आठ परिक्रमा करता और आरती उतारता था। दूसरे उस माली का अभिनन्दन किया, उसे ऊँचा उठा दिया, जिसने वास्तव में बगीचे को सुन्दर बनाने का प्रयास किया था।

..... क्रमशः जारी
✍🏻 पूज्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

👉 उपासना, साधना व आराधना (भाग 7)

🔸 शरीर, बुद्धि और भावना- ये तीन चीजें जो भगवान् ने दी हैं। यह तीन शरीर-स्थूल सूक्ष्म और कारण के प्रतीक हैं। इसमें तीन चीजें भरी रहती हैं- स्थूल में श्रम, समय। सूक्ष्म में मन, बुद्धि। कारण में भावना। इसके अलावा जो चौथी चीज है, वह है धन-सम्पदा जो मनुष्य कमाता है। इसे भगवान् नहीं देता है। भगवान् न किसी को गरीब बनाता है, न अमीर। भगवान् न किसी को धनवान बनाता है, न कंगाल बनाता है। यह तेरा बनाया हुआ है, इसे तू बोना शुरू कर। हमने कहा कि कहाँ बोया जाए? उन्होंने कहा कि भगवान् के खेत में। हमने पूछा कि भगवान् कहाँ है और उनका खेत कहाँ है?

🔹 उन्होंने हमें इशारा करके बतलाया कि यह सारा विश्व ही भगवान् का खेत है। यह भगवान् विराट् है। इसे ही विराट् ब्रह्म कहते हैं। अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण ने इसी विराट् ब्रह्म का दर्शन कराया था। उन्होंने दिव्यचक्षु से उनका दर्शन कराया था। यही उन्होंने कौशल्या जी को दिखाया था। हमारे गुरु ने कहा कि जो कुछ भी करना हो, इसी समग्र सृष्टि के लिए करना चाहिए। यही भगवान् की वास्तविक पूजा कहलाती है। इसे ही आराधना कहते हैं।

> 👉 *अमृतवाणी - जप और ध्यान | Jap Aur Dhyan* https://youtu.be/OJfKI0mqbhI?si=mJyZgH_vGF6X2prm

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🔸 उन्होंने हमें आदेश दिया कि तू इसी विराट् ब्रह्म के खेत में बो। अर्थात् जनसमाज की सेवा कर। जनसमाज का कल्याण करने, उसे ऊँचा उठाने, समुन्नत और सुसंस्कृत बनाने में अपनी समस्त शक्तियाँ एवं सम्पदा लगा, फिर आगे देखना कि यह सौ गुनी हो जाएँगी। जो भी तीन-चार चीजें तेरे पास हैं, उसे लगा दे, तुझे ऋद्धि-सिद्धियाँ मिल जाएँगी। यह सब तेरे पीछे घूमेंगी। तू मालदार हो जाएगा। अब हम तैयार हो गये। हमने विचार दृढ़ बना लिया। उन्होंने पूछा कि क्या चीजें हैं तेरे पास? हमने कहा कि हमारा शरीर है। हमने सूर्योदय से पहले भगवान् का नाम लिया है अर्थात् भजन किया है, बाकी समय हमने भगवान् का काम किया है। सूर्य निकलने से लेकर सूर्य डूबने तक सारा समय भगवान् के लिए लगाया, समाज के लिए लगाया है।

🔹 दूसरी, बुद्धि है हमारे पास। आज लोगों की बुद्धि न जाने किस-किस गलत काम में लग रही है। आज लोग अपनी बुद्धि को मिलावट करने, तस्करी करने, गलत काम करने में खर्च कर रहे हैं। हमने निश्चय किया कि हम अपनी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर ले जाएँगे तथा इससे समाज, देश को ऊँचा उठाने का प्रयास करेंगे। हमने अपनी अक्ल एवं बुद्धि को यानी अपने सारे-के-सारे मन को भगवान् के कार्य में लगाया।

..... क्रमशः जारी
✍🏻 पूज्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

👉 उपासना, साधना व आराधना (भाग 6)

🔹 सादा जीवन के माने है- कसा हुआ जीवन। आपको अपना जीवन सादा बनाना होगा। माल- मजा उड़ाते हुए, लालची और लोभी रहते हुए आप चाहें कि राम नाम सार्थक हो जाएगा? नहीं कभी सार्थक नहीं होगा। हमारे गुरु ने, हमारे महापुरुषों ने हमें यही सिखाया है कि जो आदमी महान बने, ऊँचे उठे हैं, उन सभी ने अपने आपको तपाया है। आप किसी भी महापुरुष का इतिहास उठाकर पढ़कर देखें, तो पायेंगे कि अपने को तपाने के बाद ही उन्होंने वर्चस्व प्राप्त किया और फिर जहाँ भी वे गये चमत्कार करते चले गये।

🔸 तलवार से सिर काटने के लिए उसे तेज करना पड़ता है, पत्थर पर घिसना पड़ता है। आपको भी प्रगति करने के लिए अपने आपको तपाना होगा, घिसना होगा। हमने एक ही चीज सीखी है कि अपने आपको अधिक से अधिक तपाएँ, अधिक से अधिक घिसें, ताकि हम ज्यादा- से समाज के काम आ सकें। समाज की सेवा करना ही हमारा लक्ष्य है। अगर आप भी ऐसा कर सकें, तो बहुत फायदा होगा, जैसा कि हमें हुआ है।

🔹 साधना के पश्चात् आराधना की बात बताता हूँ आपको कि आराधना क्या है और किसकी की जानी चाहिए? आराधना कहते हैं- समाजसेवा को, जन कल्याण को। सेवाधर्म वह नकद धर्म है, जो हाथों हाथ फल देता है। इसमें पहले बोना पड़ता है। आज से साठ वर्ष पूर्व हमारे पूज्य गुरुदेव ने हमारे घर पर आकर दीक्षा दी और यह कहा कि तुम बोने और काटने की बात मत भूलना। कहीं से भी कोई चीज फोकट में नहीं मिलती है, चाहे वे गुरु हों या भगवान् हों। हाँ, यह हो सकता है कि बोया जाए और काटा जाए। हम मक्के का एक बीज बोते हैं, तो न जाने कितने हजार हो जाते हैं। वही बाजरे के साथ भी होता है।

🔸 उन्होंने हमसे कहा कि बेटे, फोकट में खाने की विद्या एवं माँगने की विद्या छोड़कर बोने और काटने की विद्या सीख, इससे ही तुम्हें फायदा होगा। उन्होंने इसके लिए विधान भी बतलाया कि तुम्हें चौबीस साल तक गायत्री के महापुरश्चरण करने होंगे। इस समय जौ की रोटी एवं छाछ पर रहना होगा। उन्होंने जो भी विधि हमें बतायी, उसे हमने नोट कर लिया था। इसमें उन्होंने हमें एक नयी विधि बतलायी। वह विधि बोने और काटने की थी। उन्होंने कहा कि जो कुछ भी तेरे पास है, उसे भगवान् के खेत में बो दो। उन्होंने यह भी कहा कि तीन चीजें भगवान् की दी हुई हैं और एक चीज तुम्हारी कमाई हुई है।

..... क्रमशः जारी
✍🏻 पूज्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Lectures/112

शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

👉 समुद्र मंथन के तीन दिव्य रत्न

🔸 जीवन समुद्र का मंथन करने पर हमारे हाथ तीन रत्न ही लगते हैं (1) प्रेम की साध (2) ज्ञान की खोज और (3) पीड़ित मानवता के प्रति असह्य करुणा। इन तीनों के जितने अमृत कण हमारे हाथ लगते हैं हम उतने ही धन्य बनते हैं।

🔹 एकाकीपन की ऊब— कठोर परिश्रम की थकान और उतार−चढ़ावों के विक्षोभों से भरी इस जिन्दगी में सरसता केवल प्रेम में है। समस्त सुख सम्वेदनाओं की अनुभूति एकदम एक ही केंद्र पर एकत्रित है। प्रेम की पुलकन ही आनन्द भरे उल्लास में परिणत होती है। प्रेमी बनकर भले ही हमें कुछ खोना पड़े पर जो पाते हैं वह खोने से लाख करोड़ गुना अधिक होता है।

🔸 सत्य महान् है। मनुष्य क्रमशः उसके उच्च शिखर पर चढ़ता जाता है। जो अब तक जाना जा सका वह अद्भुत है, पर इससे क्या जो जानने को शेष पड़ा है वह अनन्त है। सत्य को जानने खोजने और पाने के प्रयासों में ही अब तक की विविध उपलब्धियां प्राप्त हुई हैं। आगे इसी प्रयास में खुले मस्तिष्क से लगे रहेंगे तो उसे भी प्राप्त कर सकेंगे जो अब तक प्राप्त नहीं किया जा सका।

👉 *विश्वास की परीक्षा संकट में होती है | Vishwas Ki Pariksha Sankat Me Hoti Hai* 

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🔹 संसार में सुख न हो सो बात नहीं, पर पीड़ाएँ भी बहुत हैं। अज्ञान और पतन की भटकन कितनी कष्टकर है इस पर जो सहृदयतापूर्वक विचार करेगा उसकी करुणा उमड़े बिना न रहेगी। आत्मा स्वर्ग से उतर कर इस पृथ्वी पर रहने के लिए इसीलिए तो आया है कि वह करुणार्द्र होकर कष्ट पीड़ितों की सेवा करते हुए मानव जीवन का आनन्द ले सके।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1974 पृष्ठ 1

👉 बाहर नहीं, भीतर देखते हैं।

तारापीठ (बंगाल) में द्वारका नदी के सुरम्य तट पर भगवती तारादेवी का मन्दिर है। उस दिन उसका मेला या कोई विशेष पूजन-पर्व था। पास के ही गाँव का जमींदार भी तारादेवी के दर्शनों के लिये आया। दर्शन करने से पूर्व, उसने सोचा-स्नान करके यहीं पूजा-पाठ भी समाप्त कर लिया जाय, सो उसने द्वारका के तट पर ही अपना सामान रख दिया।

वस्त्र उतार कर जमींदार ने स्नान किया। अनन्तर आसन बिछाकर पूर्वाभिमुख पूजा-पाठ के लिये बैठकर ध्यान करने लगे। एक सन्त भी स्नान के लिये उसी समय वहाँ आये। उन्हें बड़ी प्रसन्नता थी कि भारतीय जीवन में अभी आस्तिकता का अभाव नहीं हैं। तभी तो लोग न जाने कहाँ-कहाँ से देव-दर्शन और तीर्थ-यात्राओं के लिये आते-जाते रहते हैं। इस आस्तिकता का ही असर है कि भारतीय जीवन में अभी भी शान्ति, सन्तोष और पवित्रता की पर्याप्त मात्रा बची हुई है, जबकि शेष विश्व इससे सर्वथा विपरीत है। भले ही वे कितने ही सुखी और समृद्ध क्यों न हों।

यह महात्मा बंगाल के असाधारण ताँत्रिक वामक्षेप थे। उधर वे स्नान कर रहे थे, इधर जमींदार भगवान् के ध्यान में निमग्न। जो सन्त अभी थोड़ी देर पहले इतनी प्रसन्नता अनुभव कर रहे थे, सुन्दर विचारों में डूबे हुए थे, न जाने क्या कौतुक सूझा कि एकाएक जमींदार पर पानी के छींटे मारने लगे। जमींदार ने आँखें खोलीं-आँखों में गुस्सा भरा स्पष्ट दिखाई दिया। सन्त वामक्षेप शरीर रगड़ने लगे, ठीक बालकों जैसी मुद्रा-मानों उन्होंने जल के छींटे मारे ही न हों और उन्हें पता तक न हो कि अभी कुछ हुआ भी है।

जमींदार ने दुबारा आँखें मूँद लीं और फिर ध्यान में मग्न दिखाई दिये। उधर उन्होंने आँख मींची, इधर वामक्षेप फिर जल उलीचने लगे और जमींदार के दुबारा आँख खोल देने के बाद भी जल उलीचते ही गये जैसे उनके मन में भय नाम की कोई वस्तु ही न हो।

जमींदार गरजे- ओरे! साधु, अन्धा हो गया है। दिखाई नहीं देता, मेरे ऊपर पानी उलीच रहा है? मेरा ध्यान टूट गया, साधु होकर भी उपासना में विघ्न डालते तुझे लाज नहीं आती?

वामक्षेप को हँसी आ गई। बोले- उपासना को कलंकित न करो महाराज। भगवान् का ध्यान कर रहे हो या ‘मूर एण्ड कम्पनी’ कलकत्ता की दुकान से चमड़े के जूते खरीद रहे हो?

> 👉 *अमृतवाणी:- हर दिन नया जन्म हर दिन नई मौत | Har Din Naya Janam Aur Mout*  

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जमींदार का उबलता हुआ क्रोध जहाँ-का-तहाँ ऐसे बैठ गया जैसे उफनते दूध में जल के छींटे मारने से उफान रुक जाता है। उनके आश्चर्य का ठिकाना न था। यह उठे और साधु के चरण पकड़कर बोले- ‘महाराज! सचमुच मैं ध्यान में यही सोच रहा था। मूर एण्ड कम्पनी से जूते पहनने हैं, वही सोच रहा था, कौन-सा जूता ठीक रहेगा। मुझे आश्चर्य है आपने मेरे मन की बात कैसे जान ली?

स्वामी रामदास कथामृत से उद्भूत यह घटना बताती है कि योगाभ्यासी साधु हो या कोई और वह अपनी अन्तरंग को पहचानने वाली क्षमताओं को जागृत कर सकता है। चमत्कार भले ही न दिखा सके, पर उससे आत्मकल्याण का मार्ग तो प्रशस्त किया ही जा सकता है।

📖 अखण्ड ज्योति, अक्टूबर १९७० पृष्ठ १६

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/July/v1.16

गुरुवार, 1 अगस्त 2024

👉 विष को अमृत बना लीजिए।

🔹 *शायद तुम्हारा मन अपने दुस्स्वभावों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता।* काम क्रोध लोभ मोह के चंगुल में तुम जकड़े हुए हो और जकड़े ही रहना चाहते हो। अच्छा तो एक काम करो। इन चारों का ठीक ठीक स्वरूप समझ लो। *इनको ठीक तरह प्रयोग में लाना सीख लो। तो तुम्हारा काम चल जायेगा।*

🔸 *कामना करना कोई बुरी बात नहीं है। अब तक तुम गुड़ की कामना करते थे अब मिठाई की इच्छा करो।* स्त्री, पुत्र, धन, यश आदि के लाभ छोटे, थोड़े नश्वर और अस्थिर हैं, तुम्हें एक कदम आगे बढ़कर ऐसे लाभ की कामना करनी होगी जो सदा स्थिर रहे और बहुत सुखकर सिद्ध हो। *धन ऐश्वर्य को तलाश करने के लिए तुम्हें बाहर ढूँढ़ खोज करनी पड़ती है पर अनन्त सुख का स्थान तो बिल्कुल पास अपने अन्तःकरण में ही है।* आओ, हृदय को साफ कर डालो, कूड़े कचरे को हटाकर दूर फेंक दो और फिर देखो कि तुम्हारे अपने खजाने में ही कितना ऐश्वर्य दबा पड़ा है।

🔹 *अपने विरोधियों पर तुम्हें क्रोध आ जाता है सो ठीक ही है। देखो, तुम्हारे सबसे बड़े शत्रु कुविचार हैं, ये तेजाब की तरह तुम्हें गलाये डाल रहे हैं और घुन की तरह पीला कर रहे हैं।* उठो, इन पर क्रोध करो। इन्हें जी भरकर गालियाँ दो और जहाँ देख पाओ वहीं उनपर बसर पड़ो। खबरदार कर दो कि कोई कुविचार मेरे घर न आवें, अपना काला मुँह मुझे न दिखावें वरना उसके हक में अच्छा न होगा।

> 👉 *अमृतवाणी:- खुश रहने के लिए अपने को बदलिये* https://youtu.be/gkDv7D1pHFk?si=dXW_CuUdU8xD9kHm

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🔸 *लोभ- अरे लोभ में क्या दोष? यह तो बहुत अच्छी बात है। अपने लिए जमा करना ही चाहिए इसमें हर्ज क्या है?* तुम्हें सुकर्मों की बड़ी सी पूँजी संग्रह करना उचित है, जिसके मधुर फल बहुत काल तक चखते रहो। *दूसरे लोग जिन्होंने अपना बीज कुटक लिया और फसल के वक्त हाथ हिलाते फिरेंगे, तब उनसे कहना कि ऐ उड़ाने वालो, तुम हो जो टुकड़े टुकड़े को तरसते हो* और मैं हूँ जो लोभ के कारण इकट्ठी की हुई अपनी पूँजी का आनन्द ले रहा हूँ।

🔹 *मोह अपनी आत्मा से करो। अब भूख लगती है तो घर में रखी हुई सामग्री खर्च करके भूख बुझाते हैं।* सर्दी गर्मी से बचने के लिए कपड़ों को पहनते हैं और उनके फटने की परवाह नहीं करते। शरीर को सुखी बनाने के लिए दूसरी चीजों की परवाह कौन करता है? *फिर तुम्हें चाहिए कि आत्मा की रक्षा के लिए सारी संपदा और शरीर की भी परवाह न करो। जब मोह ही करना है तो कल नष्ट हो जाने वाली चीजों से क्यों करना? अपनी वस्तु आत्मा है।* उससे मोह करो, उसको प्रसन्न बनाने के लिए उद्योग करो।

📖 *अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1943 पृष्ठ 32*

बुधवार, 31 जुलाई 2024

👉 उपासना, साधना व आराधना (भाग 5)

🔸 अगर आपका मन संसार की ओर अधिक लगा हुआ है, तो आप आध्यात्मिकता की ओर कैसे बढ़ पाएँगे? फिर आपका मन पूजा- उपासना में कैसे लगेगा? आप इस दिशा में आगे कैसे बढ़ेंगे? गोली चलाने वाला अगर निशाना न साधे, तो उसका काम कैसे चलेगा? वह कभी इधर को भटके, कभी उधर को भटके, तो उससे निशाना कैसे साधा जाएगा? बीस जगह ध्यान रहा, तो आप विजेता नहीं बन सकते हैं। भगवान् आपको अपनाने के लिए हाथ बढ़ा रहा है, परन्तु ये तीन हथकड़ियाँ वासना, तृष्णा एवं अहंता आपको भगवान् तक पहुँचने में रुकावट पैदा कर रही हैं। आपको इनसे लोहा लेना होगा। आप अगर अपने हाथों को नहीं खोलेंगे, तो भगवान् की गोद में आप कैसे जाएँगे?

🔹 मित्रो, साधना में आपको अपने मन को समझाना होगा। अगर मन नहीं मानता है, तो आपको उसकी पिटाई करनी होगी। बैल जब खेतों में हल नहीं खींचता है तथा घोड़ा जब रास्ते पर चलने अथवा दौड़ने को तैयार नहीं होता है, तो उसकी पिटाई करनी पड़ती है। हमने अपने आपको इतना पीटा है कि उसका कहना नहीं। हमने अपने आपको इतना धुलने का प्रयास किया है कि उसे हम कह नहीं सकते। इस प्रकार धुलाने के कारण हम फकाफक कपड़े के तरीके से आज धुले हुए उज्ज्वल हो गये। हमने अपने आपको रूई की तरह से धुनने का प्रयास किया है, जो धुनने के पश्चात् फूलकर इतनी स्वच्छ और मोटी हो जाती है कि उससे नयी चीज का निर्माण होता है।

🔸 भगवान् का भजन करने एवं नाम लेने के लिए अपना सुधार करना परम आवश्यक है। वाल्मीकि ने जब यह काम किया, तो भगवान् के परमप्रिय भक्त हो गये। उनकी वाणी में एक ताकत आ गयी। उसने डकैती छोड़ दी, उसके बाद भगवान् का नाम लिया, तो काम बन गया। कहने का मतलब यह है कि आप अपने आपको धोकर इतना निर्मल बना लें कि भगवान् आपको मजबूर होकर प्यार करने लग जाए। राम नाम के महत्त्व से ज्यादा आपकी जीभ का महत्त्व है। आप जीभ पर कंट्रोल रखिए, तब ही काम बनेगा। जीभ पर काबू रखें, आप ईमानदारी की कमाई खाएँ, बेईमानी की कमाई न खाएँ।

> 👉 अमृतवाणी:- पूजा उपासना के मर्म | Puja Upashan Ke Marm https://youtu.be/6npDP9lYPGo?si=zY7vwCwdh-xByz2u

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🔹 हमने अपनी जीभ को साफ किया है। उसे इस लायक बनाया है कि गुरु का नाम लेकर जो भी वरदान देते हैं, वह सफल हो जाता है। आप भी जीभ को ठीक कीजिए न! आप अपने आपको सही करें। अपने जीवन में सादा जीवन उच्च विचार लाएँ। इस सिद्धान्त को जीवन का अंग बनाने से ही काम बनेगा। आपको खाने के लिए दो मुट्ठी अनाज और तन ढँकने के लिए थोड़ा- सा कपड़ा चाहिए, जो इस शरीर के द्वारा आप सहज ही पूरा कर सकते हैं। फिर आप अपने जीवन को शुद्ध एवं पवित्र क्यों नहीं बनाते। अगर यह काम करेंगे, तो आप भगवान् की गोदी के हकदार हो जाएँगे। ऐसा बनकर आदमी बहुत कुछ काम कर सकता है।

..... क्रमशः जारी
✍🏻 पूज्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Lectures/112

👉 साधक के समक्ष पाँच महा बाधायें

एक नगर मे एक महान सन्त साधकों को अतिसुन्दर कथा-अमृत पिला रहे थे वो साधना के सन्दर्भ मे अति महत्तवपूर्ण जानकारी दे रहे थे। सन्त श्री कह रहे थे की साधना-पथ पर साधक के सामने पंच महाबाधाये आती है और साधक वही जो हर पल सावधानी से साधना-पथ पर चले!

1. पहली बाधा - नियमभंग की बाधा:-

जब भी आप ईष्ट के प्रति कोई नियम लोगे तो संसार आपके उस नियम को येनकेन प्रकारेण खंडित करने का प्रयास करेगा!
जैसे किसी ने नियम लिया की वो एकादशी को कुछ भी नही खायेगा तो फिर कई व्यक्ति कहेंगे की अरे इतना सा तो खालो, फल तो खालो फिर उसके सामने कुछ न कुछ लाकर जरूर रखेंगे और उसे खाने पर विवश कर देंगे!

इसलिये इससे बचने के लिये आप गोपनीयता रखो मूरखों की तरह व्यर्थ प्रदर्शन न करो माला को गोमुखी मे जपो साधना का प्रदर्शन मत करो की मैंने इतना जप किया! जब कोई अपना जीवन नियम से जीता है और जिस दिन उसका नियम टूटता है तो व्याकुलता बढ़ती है और यही व्याकुलता हमें ईश्वर की और ले जाती है!

2. दुसरी बाधा है बाह्यय लोगो से विरोध:-

इससे बचने के लिये मदमस्त हाथी की तरह चलना सब की भली बुरी सुनते हुये चलना कोई कटाक्ष करे तो इस कान से सुनकर उस कान से निकाल देना व्यर्थ के प्रपंच से बचते हुये बिल्कुल अर्जुन की तरह एकाग्रचित्त होकर चलना!

3. तीसरी बाधा है साधु सन्तों द्वारा कसौटी परख:-

आपके सामने नाना प्रकार के प्रलोभन आयेंगे सिद्धियों का प्रलोभन आयेगा पर आप वैभव और सुख सुविधा का त्याग करते हुये आगे बढ़ना! जैसे आपने एक वर्ष का एक व्रत रखा और कहा की एक वर्ष तक अमुख दिन नमकीन और मीठा न खाऊंगा तो उस दिन तुम्हारे सामने नमकीन और मीठा जरूर आयेगा अब वहा जिह्वा की परीक्षा होगी इस प्रकार कई तरह की परीक्षाओ से गुजरना पड़ेगा!
इससे बचने के लिये आप त्यागी बन जाना!

4. चौथी बाधा है देवताओं द्वारा राह अवरोधन:-

जब भी किसी की साधना बढ़ती है उसका प्रभाव बढ़ता है तो देवता उसकी राह मे बड़ी बाधा उत्पन्न करते है!
कामदेव की पुरी सैना पुरी शक्ति लगा देती है जैसे विशवामित्र जी का तप भंग नारद जी को अहंकार से घायल करना इससे बचने के लिये अपनी सम्पुर्ण आसक्ति और प्रीति ईष्ट के चरणों मे रखना जब ईष्ट के चरणों मे प्रीति होगी तो देवताओं की प्रतिकूलता भी अनुकुलता मे बदल जायेगी!

सद्गुरु का सानिध्य, समर्थ सच्चे सन्त का माथे पर हाथ, ईष्ट मे एकनिष्ठ एवं सच्ची प्रीति और अविरल निष्काम सात्विक साधना से देवताओं की प्रतिकूलताओं को अनुकुलता मे बदला जा सकता है!

> 👉 *अमृतवाणी:- साधक कैसे बनें? | Amritvanni Sadhak Kaise Banen* 

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5. पाँचवी बाधा है अपनो का विरोध:-

गैरों की तो छोड़ो अपने भी विरोधी हो जाते है अपने ही शत्रु बन जाते है और इससे बचने के लिये आप इस सत्य को सदा याद रखना की हरी के सिवा यहाँ हमारा कोई नही है! सारा जगत है एक झूठा सपना और केवल हरी ही है हमारा अपना! और जब इस पाँचवी बाधा को भी साधक पार कर लेता है तो फिर साधक अपने ईष्ट मे समा जाता है फिर उसे संसार की नही केवल सार की परवाह रहती है!

इन बाधाओं से जब सामना हो तो घबराना मत बस अटूट प्रीति रखना ईष्ट मे और बुद्धि की रक्षा करना!

बुद्धि कई प्रकार की है पर जो बुद्धि परमतत्व से मिला दे वही सार्थक है बुद्धि ऊपर की ओर ले जाती है और श्रद्धा भीतर की ओर, इसलिये बुद्धि से श्रद्धा की ओर बढ़ो!

इष्टदेव के प्रति अटूट सार्थक नियम से प्रेम का जन्म होगा प्रेम से ईष्टदेव के श्री चरणों मे प्रीति बढेगी और जब प्रीति बढेगी तो श्रद्धा का जन्म होगा और जब श्रद्धा का जन्म होगा तो जीवन मे सच्चे सन्त का आगमन होगा और जब जीवन मे सच्चे सन्त सद्गुरु का आगमन होगा तो फिर ईश्वर के मिलने मे समय न लगेगा!

मंगलवार, 30 जुलाई 2024

👉 उपासना, साधना व आराधना (भाग 4)

🔹 साधना में भी यही होता है। मनुष्य के, साधक के मन के ऊपर चाबुक मारने से, हण्टर मारने से, गरम करने से, तपाने से वह काबू में आ जाता है। इसीलिए तपस्वी तपस्या करते हैं। हिन्दी में इसे ‘साधना’ कहते हैं और संस्कृत में ‘तपस्या’ कहते हैं। यह दोनों एक ही हैं। अतः साधना का मतलब है- अपने आपको तपाना। खेत की जोताई अगर ठीक ढंग से नहीं होगी, तो उसमें बोवाई भी ठीक ढंग से नहीं की जा सकेगी। अतः अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए पहले खेत की जोताई करना आवश्यक है, ताकि उसमें से कंकड़- पत्थर आदि निकाल दिए जाएँ। उसके बाद बोवाई की जाती है। कपड़ों की धुलाई पहले करनी पड़ती है, तब उसकी रँगाई होती है। बिना धुलाये कपड़ों की रँगाई नहीं हो सकती है। काले, मैले- कुचैले कपड़े नहीं रँगे जा सकते हैं।

🔸 मित्रो, उसी प्रकार से राम का नाम लेना एक तरह से रँगाई है। राम की भक्ति के लिए साफ- सुथरे कपड़ों की आवश्यकता है। माँ अपने बच्चों को गोद में लेती है, परन्तु जब बच्चा टट्टी कर देता है, तो वह उसे गोद में नहीं उठाती है। पहले उसकी सफाई करती है, उसके बाद उसके कपड़े बदलती है, तब गोद में लेती है। भगवान् भी ठीक उसी तरह के हैं। वे मैले- कुचैले प्रवृत्ति के लोगों को पसन्द नहीं करते हैं। यहाँ साफ- सुथरा से मतलब कपड़े से नहीं है, बल्कि भीतर से है- अंतरंग से है। इसी को स्वच्छ रखना, परिष्कृत करना पड़ता है।

🔹 तपस्या एवं साधना इसी का नाम है। अपने अन्दर जो बुराइयाँ हैं, भूले हैं, कमियाँ हैं, दोष- दुर्गुण हैं, कषाय- कल्मष हैं, उसे दूर करना व उनके लिए कठिनाइयाँ उठाना ही साधना या तपस्या कहलाती है। इसी का दूसरा नाम पात्रता का विकास है। कहने का तात्पर्य यह है कि वर्षा के समय आप बाहर जो भी पात्र रखेंगे- कटोरी गिलास जो कुछ भी रखेंगे, उसी के अनुरूप उसमें जल भर जाएगा। इसी तरह आपकी पात्रता जितनी होगी, उतना ही भगवान् का प्यार, अनुकम्पा आप पर बरसती चली जाएगी।

> 👉 *अमृतवाणी:- पूजा-उपासना के लाभ | Pooja Upasna Ke Labh* 

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🔸 घोड़ा जितना तेजी से दौड़ सकता है, उसी के अनुसार उसका मूल्य मिलता है। गाय जितना दूध देती है, उसी के अनुसार उसका मूल्यांकन होता है। अगर आपके कमण्डलु में सुराख है, तो उसमें डाला गया पदार्थ बह जाएगा। नाव में अगर सुराख है, तो नाव पार नहीं हो सकती है। वह डूब जाएगी। अतः आप अपने बर्तन को बिना सुराख के बनाने का प्रयत्न करें। हमने सारी जिन्दगी भर इसी सुराख को बन्द करने में अपना श्रम लगाया है। वासना, तृष्णा और अहंता- यही तीन सुराख हैं, जो मनुष्य को आगे नहीं बढ़ने देते हैं। इन्हें ही भवबन्धन कहा गया है।

..... क्रमशः जारी
✍🏻 पूज्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Lectures/112

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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