सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

👉 असाधारण कभी साधारण की इच्छा नहीं करते !!

बाली वध तथा सुग्रीव के राज्याभिषेक पश्चात्  वर्षा ऋतु के आने के कारण श्रीराम जी भैया लक्ष्मण सहित प्रवर्षण पर्वत के गुफा में निवास करते हैं। इसी काल में श्रीराम जी भैया लक्ष्मण जी से भक्ति, वैराज्ञ,राजनीति और विवेक से संबंधित कई कथा कहते हैं।

कहत अनुज सन कथा अनेका।
भगति बिरति नृपनीति बिबेका।।

लेकिन लक्ष्मण जी के मन में प्रभु के विचित्र लीला से संबंधित जिज्ञासा है जिसे वे अनुकूल समय पर पूछते हैं।

लक्ष्मण जी कहते हैं कि-
हे प्रभु! आप कैसी विचित्र लीला करते हैं कि सुग्रीव के दुख देखकर बाली को एक ही वाण से मारने की प्रतिज्ञा करते हुए कहते हैं...

सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान।
ब्रह्म रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान।।

"हे सुग्रीव  सुनिए ! मैं बाली को एक ही वाण से मार डालूँगा । यदि वह ब्रह्मा जी या शंकर जी के शरण में भी चला जाए तो अब जीवित नहीं रहेगा।"

श्रीराम जी- हाँ भैया लक्ष्मण! मैंने ये प्रतिज्ञा की थी और उसे पूर्ण भी किया तो इसमें तूझे संदेह क्यों है??

लक्ष्मण जी- "प्रभु! संदेह का प्रश्न ये है कि जब आपने बिना किसी परिश्रम के दुंदुंभी राक्षस के विशाल अस्थि और सातों ताल वृक्षों को गिरा दिए तो सुग्रीव ने आपके बल पौरूष देखकर बाली से वैर भाव त्याग देने की इच्छा प्रकट की...

बाली परम हित जासु प्रसादा।
मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा।।

तो आपने सुग्रीव को अपनी प्रतिज्ञा याद दिलाई...

...सखा! बचन मम मृषा न होई"!!!

"हे मित्र सुग्रीव! मेरी वाणी असत्य नहीं हो सकती। मैंने बाली वध की प्रतिज्ञा की है। लेकिन आपके वाण के प्रहार से पृथ्वी पर गिरा बाली ज्यों ही आपके शरण आया कि आपने कहा कि...."

"अचल करौं तनु ! राखहु प्राना !!"

हे बाली! तुम्हारे शरीर को अचल कर देता हूँ, अतः तुम जीवित रहो।

👉👉तो क्या ये वचन आपके प्रतिज्ञा से मेल खा रहा है? और यदि वह जीवित रहना स्वीकार कर लेता तो क्या होता?? हे प्रभु! मैं आपकी लीला देखकर कभी कभी भारी उलझन में पड़ जाता हूँ!!!

अति बिचित्र रघुपति चरित !!

श्रीराम जी मुस्कुराते हुए कहते हैं कि -"देखो भैया! मैंने शरीर रखने के लिए,जीवित रहने के लिए केवल बाली को ही नहीं कहा है।बल्कि गीधराज जटायु से भी विनती की थी लेकिन क्या वे हमारे प्रस्ताव को स्वीकार किए ??जरा दोनों के वचन स्मरण करो...

राम कहा- तनु राखहु ताता!!

गीधराज जटायु असह्य पीड़ा में भी हँसते हुए कहते हैं -

जाकर नाम मरत मुख आवा।अधमउ मुकुत होइ श्रुति गावा।।
"सो" मम लोचन गोचर आगे।राखौं देह हेतु केहि खाँगें ??

बाली...

जन्म जन्म मुनि जतन कराहीं।अंत राम कहि आवत नाहीं।।
मम लोचन गोचर सोइ आवा।बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा??

बाली ने स्पष्ट कह दिया कि...

अस कवन सठ हठि काटि सुकतरु,बारि करिहि बबूरही?

ऐसा कौन मूर्ख होगा जो अपने खेत से सर्व इच्छित फल दाता कल्प वृक्ष काट कर कँटीले बबूर की खेती करेगा??

हे लक्ष्मण! बाली अपनी पत्नी तारा से कहकर आया था कि...

कह बाली-सुनु भीरु प्रिय! समदरसी रघुनाथ।
"जौं कदाच मोहि मारिहि तौ पुनि होउ सनाथ"!!!

हे लक्ष्मण! बाली उतना मूर्ख नहीं था जो मेरे धाम के बदले
(राम बाली निज धाम पठावा) पृथ्वी,जल ,अग्नि, आकाश और वायु से निर्मित अधम शरीर को रख लेता!!!

बाली कोई साधारण बंदर नहीं था! बाली  असाधारण  था!! और 👉 असाधारण कभी साधारण की इच्छा नहीं करते हैं।

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