जीवन में खिलाड़ी की तरह पार्ट अदा करिए और पल्ला झाड़ कर अलग हो जाइए। इस वैराग्य, निष्काम कर्म अनासक्ति की योग शास्त्र में बार-बार शिक्षा दी गयी है, यह कोई अव्यावहारिक या काल्पनिक विषय नहीं है, वरन् कर्म शील मनुष्यों का जीवन मन्त्र है। जिन लोगों पर अत्यन्त कठोर उत्तरदायित्व रहते हैं, जिनके ऊपर असंख्य जनता के भाग्य निर्माण का भार है, उनके सामने पग-पग पर बड़े-बड़े कठिनतम पेचीदा, दुरूह और घबरा देने वाले प्रश्न आते रहते हैं। कितनी पेचीदा गुत्थियाँ सुलझानी पड़ती हैं, कितने नित नये संघर्षों का सामना करना पड़ता है, पर वे अपने काम को भली प्रकार करते हैं, न तो बीमार पड़ते हैं, न बेचैन होते हैं, न घबराते हैं। रात को पूरी नींद लेते हैं, आमोद-प्रमोद में भाग लेते हैं, हँसते खेलते हैं।
एक हम हैं, जो मामूली सी दो चार कठिनाइयाँ सामने आने पर घबरा जाते हैं, चिन्ता के मारे बेचैन बने रहते हैं। वस्तुतः यह मानसिक कमजोरी है, आत्मबल का अभाव है, नास्तिकता का चिह्न है, इससे बचना चाहिए, क्योंकि बेचैन मस्तिष्क ठीक बात सोच नहीं सकता, उसमें उचित मार्ग ढूँढ़ने योग्य क्षमता नहीं रहती, आपत्ति से छुटकारा पाने के उपाय तलाश करने के लिए गंभीर, स्थिर और शांत चित्त रहने की आवश्यकता है पर उसे पहले ही खो दिया जाय, तो जल्दबाजी में सिर्फ ऐसे उथले और अनुचित उपाय सूझ पड़ते हैं, जो कठिनाई को और भी अधिक बढ़ाने वाले होते हैं।
कार्य की अधिकता, असुविधा या चिन्ता का कारण उपस्थित होने पर आप उसको सुलझाने का प्रयत्न कीजिए। इनमें सब से प्रथम प्रयत्न यह है कि मानसिक संतुलन को कायम रखिए, चित्त की स्थिरता और धैर्य को नष्ट न होने दीजिए। घबराहट तीन चौथाई शक्ति को बर्बाद कर देती है, फिर विपत्ति से लड़ने के लिए एक चौथाई भाग ही शेष बचता है, इतने स्वल्प साधन की सहायता से उस भारी बोझ को उठाना सरल नहीं रहता। कहते हैं कि विपत्ति अकेली नहीं आती। उसके पीछे और भी बहुत से झंझट बँधे चले आते हैं। कारण यह है कि चिन्ता से घबराया हुआ आदमी अपनी मानसिक स्वस्थता खो देता है और जल्दबाजी में इस प्रकार का रवैया अख्तियार करता है, जिसके कारण दूसरे काम भी बिगड़ते चले जाते हैं तथा एक के बाद दूसरे अनिष्ट उत्पन्न होते जाते हैं। यदि मानसिक स्थिति पर काबू रखा जाय, चिन्ता और बेचैनी से घबराया न जाया जाय, तो वह मूल कठिनाई भी हल हो सकती है और नई शाखा प्रशाखाओं से भी सुरक्षित रहा जा सकता है।
ईश्वर की इच्छा, प्रकृति की प्रेरणा, संचित संस्कारों के कर्मफल के अनुसार प्रिय अप्रिय प्रसंग हर किसी के सामने आते हैं, उनका आना रोका नहीं जा सकता। भगवान् श्रीरामचन्द्र, योगेश्वर श्रीकृष्ण तक को विपत्तियों से छुटकारा न मिला। भवितव्यता कभी-कभी ऐसी प्रबल होती है कि प्रयत्न करते हुए भी उनसे बचाव नहीं हो सकता। विवेकवान् अपने मस्तिष्क पर काबू करते हैं और खिलाड़ी की भाँति बड़ी से बड़ी कठिनाई को छोटी करके देखते हैं। चिंता और शोक की घबराहट में सिवाय बर्बादी के लाभ कुछ नहीं है, इसलिए इस मानसिक दुर्बलता को परास्त करने का शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए।
आप संसार के कर्मनिष्ठ महापुरुषों से शिक्षा ग्रहण कीजिए, अपने को धैर्यवान् बनाइये, काम को खेल की तरह कीजिए, कठिनाइयों को मनोरंजन का एक साधन बना लीजिए। अपने मन के स्वामी आप रहिए, अपने घर पर किसी दूसरे को मालिकी मत गाँठने दीजिए, चिन्ता, शोक, आदि शत्रु आप के घर पर कब्जा जमाकर, मस्तिष्क पर अपना काबू करके, आपको दीन-दरिद्र की भाँति दुःखी करना चाहते हैं और शांति तथा स्वास्थ्य का हरण करके व्यथा-वेदनाओं की चक्की में पीसना चाहते हैं, इनसे सावधान रहिए। यदि शत्रुओं को आपके मस्तिष्क पर कब्जा कर लेने में सफलता मिल गयी, तो आप कहीं के न रहेंगे।
एक हम हैं, जो मामूली सी दो चार कठिनाइयाँ सामने आने पर घबरा जाते हैं, चिन्ता के मारे बेचैन बने रहते हैं। वस्तुतः यह मानसिक कमजोरी है, आत्मबल का अभाव है, नास्तिकता का चिह्न है, इससे बचना चाहिए, क्योंकि बेचैन मस्तिष्क ठीक बात सोच नहीं सकता, उसमें उचित मार्ग ढूँढ़ने योग्य क्षमता नहीं रहती, आपत्ति से छुटकारा पाने के उपाय तलाश करने के लिए गंभीर, स्थिर और शांत चित्त रहने की आवश्यकता है पर उसे पहले ही खो दिया जाय, तो जल्दबाजी में सिर्फ ऐसे उथले और अनुचित उपाय सूझ पड़ते हैं, जो कठिनाई को और भी अधिक बढ़ाने वाले होते हैं।
कार्य की अधिकता, असुविधा या चिन्ता का कारण उपस्थित होने पर आप उसको सुलझाने का प्रयत्न कीजिए। इनमें सब से प्रथम प्रयत्न यह है कि मानसिक संतुलन को कायम रखिए, चित्त की स्थिरता और धैर्य को नष्ट न होने दीजिए। घबराहट तीन चौथाई शक्ति को बर्बाद कर देती है, फिर विपत्ति से लड़ने के लिए एक चौथाई भाग ही शेष बचता है, इतने स्वल्प साधन की सहायता से उस भारी बोझ को उठाना सरल नहीं रहता। कहते हैं कि विपत्ति अकेली नहीं आती। उसके पीछे और भी बहुत से झंझट बँधे चले आते हैं। कारण यह है कि चिन्ता से घबराया हुआ आदमी अपनी मानसिक स्वस्थता खो देता है और जल्दबाजी में इस प्रकार का रवैया अख्तियार करता है, जिसके कारण दूसरे काम भी बिगड़ते चले जाते हैं तथा एक के बाद दूसरे अनिष्ट उत्पन्न होते जाते हैं। यदि मानसिक स्थिति पर काबू रखा जाय, चिन्ता और बेचैनी से घबराया न जाया जाय, तो वह मूल कठिनाई भी हल हो सकती है और नई शाखा प्रशाखाओं से भी सुरक्षित रहा जा सकता है।
ईश्वर की इच्छा, प्रकृति की प्रेरणा, संचित संस्कारों के कर्मफल के अनुसार प्रिय अप्रिय प्रसंग हर किसी के सामने आते हैं, उनका आना रोका नहीं जा सकता। भगवान् श्रीरामचन्द्र, योगेश्वर श्रीकृष्ण तक को विपत्तियों से छुटकारा न मिला। भवितव्यता कभी-कभी ऐसी प्रबल होती है कि प्रयत्न करते हुए भी उनसे बचाव नहीं हो सकता। विवेकवान् अपने मस्तिष्क पर काबू करते हैं और खिलाड़ी की भाँति बड़ी से बड़ी कठिनाई को छोटी करके देखते हैं। चिंता और शोक की घबराहट में सिवाय बर्बादी के लाभ कुछ नहीं है, इसलिए इस मानसिक दुर्बलता को परास्त करने का शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए।
आप संसार के कर्मनिष्ठ महापुरुषों से शिक्षा ग्रहण कीजिए, अपने को धैर्यवान् बनाइये, काम को खेल की तरह कीजिए, कठिनाइयों को मनोरंजन का एक साधन बना लीजिए। अपने मन के स्वामी आप रहिए, अपने घर पर किसी दूसरे को मालिकी मत गाँठने दीजिए, चिन्ता, शोक, आदि शत्रु आप के घर पर कब्जा जमाकर, मस्तिष्क पर अपना काबू करके, आपको दीन-दरिद्र की भाँति दुःखी करना चाहते हैं और शांति तथा स्वास्थ्य का हरण करके व्यथा-वेदनाओं की चक्की में पीसना चाहते हैं, इनसे सावधान रहिए। यदि शत्रुओं को आपके मस्तिष्क पर कब्जा कर लेने में सफलता मिल गयी, तो आप कहीं के न रहेंगे।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
All World Gayatri Pariwar Official Social Media Platform
Shantikunj WhatsApp
8439014110
( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें )
Official Facebook Page
Official Twitter
Official Instagram
Youtube Channel Rishi Chintan
Youtube Channel Shantikunjvideo
Official Telegram














