शनिवार, 25 नवंबर 2023

👉 झूठा वैराग्य

कितने ऐसे मनुष्य हैं जो संसार के किसी पदार्थ से प्रेम नहीं करते, उनके भीतर किसी भी मौलिक वस्तु के प्रति सद्भाव नहीं होता। वे निर्दय, निर्भय, निष्ठुर होते हैं। निस्संदेह वे अनेक प्रकार की कठिनाइयों से, मुसीबतों से, बच जाते हैं, किन्तु वैसे तो निर्जीव पत्थर की चट्टान को भी कोई शोक नहीं होता, कोई वेदना नहीं होती, लेकिन क्या हम सजीव मनुष्य की तुलना पत्थर से कर सकते हैं? जो वज्र वत कठोर हृदय होते हैं, नितान्त एकाकी होते हैं, वे चाहे कष्ट न भोगें पर जीवन के बहुत से आनन्दों का उपभोग करने से वे वंचित रह जाते हैं। ऐसा जीवन भी भला कोई जीवन है? वैरागी वह है जो सब प्रकार से संसार में रह कर, सब तरह के कार्यक्रम को पूरा कर, सब की सेवा कर, सबसे प्रेम कर, फिर भी सबसे अलग रहता है।

हम लोगों को यह एक विचित्र आदत सी पड़ गई है कि जो भी दुष्परिणाम हमको भोगने पड़ते हैं, जो भी कठिनाइयाँ आपत्तियाँ हमारे सामने आती हैं, उनके लिए हम अपने को दोषी न समझ कर दूसरे के सर दोष मढ़ दिया करते हैं। संसार बुरा है, नारकीय है, भले लोगों के रहने की यह जगह नहीं है, यह हम लोग मुसीबत के समय कहा करते हैं। यदि संसार ही बुरा होता और हम अच्छे होते तो भला हमारा जन्म ही यहाँ क्यों होता? यदि थोड़ा सा भी आप विचार करो तो तुरन्त विदित हो जायेगा कि यदि हम स्वयं स्वार्थी न होते तो स्वार्थियों की दुनिया में आप का वास असंभव था। हम बुरे हैं तो संसार भी बुरा प्रतीत होगा लेकिन लोग वैराग्य का झूठा ढोल पीटकर अपने को अच्छा और संसार को बुरा बताने की आत्म वंदना किया करते हैं।

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड-ज्योति मार्च 1943 पृष्ठ 5

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शुक्रवार, 24 नवंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 23 Nov 2023

जब क्रोध का आवेग आता है तो उसका एक ही लक्ष्य होता है, जो अपनी कामनाओं में बाधक बना है उसे नुकसान पहुँचाना। मार-पीट कर, सामान को नष्ट कर, काम में रोड़ा अटकाकर जैसे भी बने क्रोध का लक्ष्य दूसरे को हानि पहुँचाना ही होता है। वह भले ही किसी भी रूप में पहुँचाई जाय। कभी-कभी लोग क्रोध से प्रेरित होकर अपना ही सिर फोड़ने लगते हैं। अंग भंग, आत्महत्या तक कर लेने को उद्यत हो जाते हैं, ऐसे लोग। किन्तु इसका आधार भी अपने कुटुम्बियों, स्नेह, सम्बन्धियों को वर्तमान या भविष्य में हानि पहुँचाना ही होता है। स्मरण रहे ऐसी हरकतें बेगानों के साथ कभी नहीं की जातीं। ऐसा मनुष्य तभी करता है जब दूसरों को इस प्रपंच की परवाह होती है वे इस क्रोध प्रदर्शन से प्रभावित होते हैं।

भय के लिये कारण निर्दिष्ट होना जरूरी नहीं है। मानसिक कमजोरी, दुःख या हानि की काल्पनिक आशंका से ही प्रायः लोग भयभीत रहते हैं। सही कारण तो बहुत थोड़े होते हैं। कोई सह-कर्मचारी इतना कह दे कि आप नौकरी से निकाल दिये जायेंगे, इतने ही से आप डरने लगते हैं। कोई मूर्ख पण्डित कह दे कि अमुक नक्षत्र में अति वृष्टि योग है बस फसल नष्ट होने की आशंका से किसानों का दम फूलने लगता है। नौकरी छूट ही जायेगी या जल गिरेगा ही यह बात यद्यपि निराधार है केवल अपनी कल्पना में ऐसा सत्य मान लिया है, इसी के कारण भयभीत होते हैं। इस अवास्तविक भय का कारण मनुष्य की मानसिक कमजोरी है, इसका निराकरण भी संभव है। मनुष्य इसे मिटा भी सकता है।

जो मनुष्य सामाजिक जीवन में रहकर मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं रखता वन में जीने या घर बार छोड़ देने से उसका मन भी बदल जायगा। वहाँ भी वह अपने पाप के नये-नये तरीके ढूंढ़ लेगा। और नहीं कुविचारों के रहते हुए भला उसे आत्म-शान्ति कैसे मिलेगी ? इधर घर वालों की कलपती हुई आत्माओं से निकली हुई दुर्भावनायें भी क्या उसे चैन से रहने देंगी। सामाजिक जीवन कर्त्तव्य के अनेकों रास्ते होते हैं जिनमें लगा रहकर मनुष्य मन और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर सकता है और आसानी से अपना पारमार्थिक लक्ष्य पूरा कर सकता है। अन्यत्र रह कर पाप के कीचड़ में फिसल जाने का भी खतरा हो सकता है किन्तु उपयुक्त गृहस्थ जीवन में ऐसी तो कोई भी आशंका नहीं होती।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 क्या कर्म क्या अकर्म?

जो बात एक देश में नीति की समझी जाती है, वही बात दूसरे देश में नीति की बिलकुल विघातक समझी जाती है। कुछ देशों में चचेरी बहिन से विवाह करना साधारण व्यवहार की बात है, किन्तु अन्य कई देशों में यही चाल नीति के बिलकुल विरुद्ध मानी जाती है। कई देशों में साली से विवाह करना पाप समझते हैं, कई में उसे ऐसा नहीं समझते। कई देशों में एक पुरुष के एक समय में एक ही पत्नी होना नीति की बात मानी जाती है- परन्तु दूसरे कई देशों में एक ही समय में चार पाँच अथवा सौ पचास स्त्रियों का होना भी एक साधारण चाल है।

इसी प्रकार नीति के अन्य सिद्धान्तों का भी अव्यवहार्य रूप प्रत्येक देश में भिन्न-भिन्न पाया जाता है, कर्त्तव्य का भी यही हाल है। कई जगह ऐसा समझा जाता है कि मनुष्य यदि कोई एक काम नहीं करता तो वह कर्त्तव्यच्युत हो जाता है। परन्तु अन्य देशों में वही कार्य करने वाला मूर्ख समझा जाता है। यद्यपि वास्तविक दशा ऐसी है, तथापि हम लोग सदैव यही समझते हैं कि साधारणतया नीति और कर्त्तव्य के विचार सम्पूर्ण मानव जाति में एक ही हैं। अब हमारे सामने प्रश्न खड़ा होता है कि, हम अपनी उपर्युक्त समझ और उपर्युक्त बातों के व्यवहार्थ स्वरूप की भिन्नता के अनुभव का मेल कैसे मिलावें। बस परस्पर विरोधी अनुभवों की एक वाक्यता करने के लिये दो मार्ग खुले हुए हैं।

एक मार्ग यह है कि यह समझा जाय कि “मैं जो कुछ कहता अथवा करता हूँ वही ठीक है और वैसा न करने वाले अन्य लोग मूर्ख तथा अनीतिवान है।” परन्तु यह मार्ग मूर्खों का है। चतुरों का मार्ग इससे भिन्न है। वे कहते हैं कि भिन्न-भिन्न देश काल और भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के कारण एक ही सिद्धाँत के व्यवहार में भेद दिखाई देते हैं। परन्तु वास्तविक में यह बाहर से दीख पड़ने वाले भेद भाव सच्चे नहीं है। इस सिद्धाँत की निरर्थकता न दिखला कर केवल परिस्थिति की भिन्नता मात्र दिखलाते हैं। पंडितों का मत यह है कि, सिद्धान्त चाहे एक ही हो तो भी उसका व्यावहारिक स्वरूप परिस्थिति के अनुसार बदलना संभव है, न सिर्फ संभव है वरन् आवश्यक भी है।

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 16

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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 24 Nov 2023

आत्म-ज्ञान का सम्पादन और आत्म केन्द्र में स्थिर रहना मनुष्य मात्र का पहला और प्रधान कर्तव्य है। आत्मा का ज्ञान चरित्र के विकास से मिलता है। अपनी बुराइयों को छोड़कर सन्मार्ग की ओर चलने की प्रेरणा इसी से दी जाती है कि आत्मा का आभास मिलने लगे। आत्म सिद्धि का एक मात्र उपाय पारमार्थिक भाव से जीव मात्र की सेवा करना है। इन सद्गुणों का विकास न हुआ तो आत्मा की विभूतियाँ मलिनताओं में दबी हुई पड़ी रहेंगी।

क्रोध अन्धा होता है। वह केवल उस ओर देखता है जिसे दुख का कारण समझता है, या अपनी कामनाओं का बाधक मानता है। और उसका नाश हो, उसे हानि, दुःख पहुँचे, क्रोधी का यही लक्ष्य होता है। क्रोधी व्यक्ति कभी अपने बारे में नहीं सोचता। मेरी भी कोई भूल है, कुछ मैंने भी किया है, या जो मैं करने जा रहा हूँ, उसके क्या परिणाम होंगे? इनके बारे में कुछ भी नहीं सोचता। इसके कारण बड़े-बड़े अनर्थ हो जाते हैं।

परिस्थितियों पर विचार करने के लिये मनुष्य को सदैव गंभीरता से काम लेना चाहिये। आज जैसी स्थिति कल भी रहेगी यह सोचना अबुद्धिमत्तापूर्ण है। हम साहस, शौर्य और कर्मठता से काम करें तो असफलता को सफलता में, निर्धनता को धन प्राप्ति में, अस्वस्थता को उत्तम स्वास्थ्य में क्यों नहीं बदल सकते? थोड़ा समय ही तो लगेगा। एक दिन में किसी को सफलता मिली भी हैं? फिर आप ही उतावले क्यों होते है। धैर्य रखिये और कठिनाइयों से लड़ पड़िये। आपका खराब समय जरूर टल जायेगा। गरीबी दूर होगी। जरूर आपके स्वास्थ्य में परिवर्तन होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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बुधवार, 22 नवंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 22 Nov 2023

🔶 उत्कृष्ट या निकृष्ट जीवन यथार्थतः मनुष्य के विचारों पर निर्भर है। कर्म हमारे विचारों के रूप हैं। जिस बात की मन में प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है, वह अपनी पसन्द या दृढ़ इच्छा के कारण गहरी नींव पकड़ लेती है, उसी के अनुसार बाह्य जीवन का निर्माण होने लगता है।

🔷 संसार में कोई भी वस्तु ऐसी दुर्लभ नहीं है जिसे आप प्राप्त न कर सकते हों, पर इसके लिये आपका हृदय परमात्मा जितना विशाल होना चाहिये। आपको अपनी आत्म-स्थिति घुलाकर परमात्मा के साथ तादात्म्य की अवस्था बनाने में देर है। इतना उदार दृष्टिकोण आप का हुआ कि सारी धरती पर आपका अधिकार हुआ। सबको प्यार कीजिये, सब आपके हैं, जी चाहे जहाँ विचरण कीजिये, सारी धरती आपके पिता परमात्मा की है। सबको अपना समझने, सबको पवित्र दृष्टि से देखने, जीव मात्र के प्रति प्रेम और आत्मीयता का व्यवहार करने से आप यह उत्तराधिकार पा सकेंगे।

🔶 कमजोरी और कायरता का कारण लोगों में सही दृष्टिकोण का अभाव है। मनुष्य शरीर के अभिमान में पड़कर आत्मा के वास्तविक स्वरूप को भूल जाने के कारण ही व्यवहार में इतना संकीर्ण हो रहा है। जाति-पाँति, भाषा-भाव के भेद के कारण हमने पारस्परिक विलगाव पैदा कर लिया है, इसी से हम छोटे हैं, हमारी शक्तियाँ अल्प हैं। किन्तु जब आत्म-ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं तो संसार का स्वरूप ही बदल जाता है। भेदभाव की नासमझी निजत्व के ज्ञान के प्रकाश में मिट जाती हैं। सब अपने ही समान, अपने ही भाई और एक ही परमात्मा के अंश होंगे तो फिर किसी के साथ धृष्टता करने का साहस किस तरह पैदा होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 एक से अनेक बनने की इच्छा और आवश्यकता

एक से अनेक बनने की इच्छा और आवश्यकता ने ही इस संसार का सृजन किया । ब्रह्म ने सोचा एकाकी जीवन नीरस और निरर्थक है, उसे विकसित और विस्तृत होना चाहिए । इच्छा-संकल्प के रूप में बदली और उसने क्रिया बनकर सृष्टि का मूर्तरूप धारण कर लिया । ब्रह्म की इस वंश परम्परा को साथ लेकर ही जीव जन्मा है । एक ही आकांक्षा और ज्योति वह भी जलाये बैठा है - विकसित होना - विस्तार करना । यार-दोस्तों की मंडली, मेला-ठेला देखने की प्रवृति, बस्तियों में रहने की इच्छा, परिवार बनाने की आकांक्षा, नेता बनने की उमंग, आदि लगभग सभी क्रिया-कलापों के पीछे मूलभूत अन्त:प्रेरणा यही रहती है कि उसे एकाकी नहीं विस्तृत होकर रहना चाहिए । वृक्ष-वनस्पतियों तक में यही परम्परा है । एक से अनेक होने की वृति ने ही उन्हें फलने-फूलने का अवसर दिया है । काम-कौतुक, प्रजनन, दम्पत्ति, साहचर्य, परिवार प्रेम के पीछे वही ब्रह्म परम्परा सन्नहित है जिसने इस सृष्टि का सृजन कराया । उससे छुटकारा किसी को नहीं ।

प्रकृति ने विषयानन्द के आकर्षण से समस्त प्राणियों को इसलिये बॉंधा है कि वे विकास-विस्तार के लिए प्रयत्नशील रहें । माता के हृदय में वात्सल्य का सृजन इसीलिए हुआ है । दाम्पत्य जीवन में एक-दूसरे के बंधन में बँधना इसलिए स्वीकार किया जाता है -उसमें उल्लास इसलिए रहता है कि अनेक झंझटों और उत्तरदायित्वों के बढ़ते हुए भी एक से दो और दो से अधिक बनने की आन्तरिक अभिलाषा की पूर्ति होती है ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (३.२६)


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मंगलवार, 21 नवंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 21 Nov 2023

🔶 चोट खाया हुआ साँप आक्रमणकारी पर ऐसी फुँकार मार कर दौड़ता है कि उसके होश छूट जाते हैं, बचाव के लिए भागना ही पड़ता है। साँसारिक व्यथाओं से विक्षुब्ध मनुष्य की भी ऐसी ही स्थिति होती है जब मनुष्य को पीड़ायें चारों ओर से घेर लेती हैं और कोई सहारा नहीं सूझता तो वह निष्ठापूर्वक अपने परमेश्वर को पुकारता है। हार खाये हुए मनुष्य की कातर-पुकार से परमात्मा का आसन हिल जाता है और उन्हें सारी व्यवस्था छोड़कर भक्त की सेवा के लिए भागना पड़ता है।

🔷 सफलता-असफलता, उन्नति और अवनति हानि और लाभ, सुख और दुःख आदि मानव-जीवन के जो भी संयोग हैं, वे उसके व्यक्तित्व की क्षमता पर निर्भर करते हैं। जिसने जिस अनुपात से अनुकूल और जिसने अपने व्यक्तित्व को जितना निकृष्ट, निर्बल और निस्तेज बनाया हुआ है वह उसकी प्रतिकूल सम्भावनाओं का भागी बनता है।

🔶 जीवन में अभ्युदय पाने, ऊँचे उठने और सौभाग्यपूर्ण सफलताओं का वरण करने के लिए मनुष्य को अपना व्यक्तित्व पूर्ण, परिष्कृत एवं प्रतिभावान बनाना ही होगा! मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण बाह्य परिस्थितियों पर उतना निर्भर नहीं करता, जितना कि अपने प्रति उसके निजी दृष्टिकोण पर। जो व्यक्ति अपने प्रति जिस प्रकार की धारणा रखता है, वह उसी प्रकार का बन जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 धुलाई और रंगाई

मित्रों ! धुलाई के बिना रंगाई निखरती कहाँ है? गलाई के बिना ढलाई किसने कर दिखाई है? मल- मूत्र से सने बच्चे को माता तब ही गोद में उठाती है, जब उसे नहला- धुला कर साफ- सुथरा बना देती है। मैला- गंदला पानी पीने के काम कहाँ आता है? मैले दर्पण में छवि कहाँ दीख पड़ती है? जलते अंगारे पर यदि राख की परत जम जाए, तो न उसमें गर्मी का आभास होता है, न चमक का। बादलों से ढक जाने पर सूर्य- चन्द्र तक अपना प्रकाश धरती तक नहीं पहुँचा पाते। कुहासा छा जाने पर दिन में भी लगभग रात जैसा अंधेरा छा जाता है और कुछ दूरी की वस्तुएँ तक सूझ नहीं पड़तीं।

इन्हीं सब उदाहरणों को देखते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि मनुष्य यदि लोभ की हथकड़ियों, मोह की बेड़ियों और अहंकार की जंजीरों में जकड़ा हुआ रहे, तो उसकी समस्त क्षमताएँ नाकारा बन कर रह जाएँगी। बँधुआ मजदूर रस्सी में बँधे पशुओं की तरह बाधित और विवश बने रहते हैं। वे अपना मौलिक पराक्रम गवाँ बैठते हैं और उसी प्रकार चलने- करने के लिए विवश होते हैं, जैसा कि बाँधने वाला उन्हें चलने के लिए दबाता- धमकाता है। कठपुतलियाँ अपनी मर्जी से न उठ सकती हैं, न चल सकती हैं। मात्र मदारी ही उन्हें नचाता- कुदाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र- पेज 05


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सोमवार, 20 नवंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 20 Nov 2023

🔷 ईश्वर उपासना का अर्थ है- अपने आपको विकसित करना। चील की तरह ऊपर उठकर अपनी निरीक्षण वृत्ति को चौड़ा करना। जो जितनी ऊँचाई पर उठकर देखता है उसे उतना ही दूरदर्शी, विवेकवान समझा जाता है। जब सारी वस्तुओं की स्थिति का सही पता चल जाता है तो फिर यह कठिनाई नहीं रहती कि किसे चुनें, किसे न चुनें। इस प्रकार का ज्ञान पैदा हुये बिना मनुष्य अपनी जिन्दगी सुख पूर्वक बिता नहीं सकता।

🔶 दुःख का एक कारण है अज्ञान। अज्ञान-अर्थात् किसी वस्तु के वास्तविक स्वरूप को न जानना। वास्तविक का ज्ञान न होने से ही मनुष्य गलती करता है और दंड पाता है। यही दुःख का स्वरूप है अन्यथा परमात्मा न किसी को दुःख देता है न सुख। वह निर्विकार है, उसकी किसी से शत्रुता नहीं जो किसी को कष्ट दे, दंड दे।

🔷 जो बेचैन है, अशान्त है, पीड़ित है, वह सम्पन्नता उपार्जित करने के साधन जुटा ही नहीं सकता। उसे यातनाओं से संघर्ष करने से अवकाश ही नहीं मिलेगा। फिर भला वह सम्पन्नता का स्वप्न किस प्रकार पूर्ण कर सकता है। जो शान्त है, स्थिर है, निर्द्वन्द्व है वही कुछ कर सकने में समर्थ हो सकता है। यदि परिस्थितिवश अथवा संयोगवश किसी को सम्पन्नता प्राप्त भी हो जाये तो अशान्त एवं व्यग्र व्यक्ति के लिये उसका कोई उपयोग नहीं। जिस वस्तु का जीवन में कोई उपयोग नहीं, जो वस्तु किसी के काम नहीं आती, उसका होना भी उसके लिये न होने के समान ही है! अस्तु, सम्पन्नता प्राप्त करने के लिये शान्तिपूर्ण परिस्थितियों की आवश्यकता है और सुख-शान्ति के लिये सम्पन्नता की अपेक्षा है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 साँचा बनें

मित्रो ! तुम्हीं को कुम्हार व तुम्हीं को चाक बनना है। हमने तो अनगढ़ सोना, चाँदी ढेरों लगाकर रखा है, तुम्हीं को साँचा बनकर सही सिक्के ढालना है। साँचा सही होगा तो सिक्के भी ठीक आकार के बनेंगे। आज दुनिया में पार्टियाँ तो बहुत हैं, पर किसी के पास कार्यकर्ता नहीं हैं। ‘लेबर’ सबके पास है, पर समर्पित कार्यकर्ता जो साँचा बनता है व कई को बना देता है अपने जैसा, कहीं भी नहीं है। हमारी यह दिली ख्वाहिश है कि हम अपने पीछे छोड़कर जाएँ। इन सभी को सही अर्थों में ‘डाई’ एक साँचा बनना पड़ेगा  तथा वही सबसे मुश्किल काम है। रॉ मेटेरियल तो ढेरों कहीं भी मिल सकता है। पर ‘डाई’ कहीं- कहीं मिल पाती है। श्रेष्ठ कार्यकर्ता श्रेष्ठ ‘डाई’ बनता है। तुम सबसे अपेक्षा है कि अपने गुरु की तरह एक श्रेष्ठ साँचा बनोगे।

तुमसे दो और अपेक्षाएँ हैं- एक श्रम का सम्मान। यह भौतिक जगत का देवता है। मोती- हीरे श्रम से ही निकलते हैं। दूसरी अपेक्षा यह कि सेवा- बुद्धि के विकास के लिए सहकारिता का अभ्यास। संगठन शक्ति सहकारिता से ही पहले भी बढ़ी है, आगे भी इसी से बढ़ेगी।

हमारे राष्ट्र का दुर्भाग्य यह है कि श्रम की महत्ता हमने समझी नहीं। श्रम का माद्दा इस सबमें असीम है। हमने कभी उसका मूल्यांकन किया ही नहीं। हमारा जीवन निरन्तर श्रम का ही परिणाम है। बीस- बीस घण्टे तन्मयतापूर्वक श्रम हमने किया है। तुम भी कभी श्रम की उपेक्षा मत करना। मालिक बारह घण्टे काम करता है, नौकर आठ घण्टे तथा चोर चार घण्टे काम करता है। तुम सब अपने आपसे पूछो कि हम तीनों में से क्या हैं? जीभ चलाने के साथ कठोर परिश्रम करो, अपनी योग्यताएँ बढ़ाओ व निरंतर प्रगति पथ पर बढ़ते जाओ।

दूसरी बात सहकारिता की है। इसी को पुण्य परमार्थ, सेवा, उदारता कहते हैं। अपना मन सभी से मिलाओ। मिल- जुलकर रहना, अपना सुख बाँटना, दुःख बँटाना सीखो। यही सही अर्थों में ब्राह्मणत्व की साधना है। साधु तुम अभी बने नहीं हो। मन से ब्राह्मणत्व की साधना करोगे तो पहले ब्राह्मण बनो। साधु अपने आप बन जाओगे। पीले  कपड़े पहनते हो कि नहीं, पर मन को पीला कर लो। सेवाबुद्धि का, दूसरों के प्रति पीड़ा का, भाव- सम्वेदना का विकास करना ही साधुता को जगाना है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय- नं 68 पेज 1.15


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रविवार, 19 नवंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 19 Nov 2023

उपासना में इष्ट की अदला-बदली का अर्थ है कि आप उसकी गरिमा को कोई महत्व न देते हुये दैवी शक्तियों के साथ खिलौनों की तरह खेलते हैं। उनका महत्व आपकी रुचि पर निर्भर है। साथ ही इष्ट की अदला-बदली से यह भाव भी प्रकट होता है कि आप किसी एक दैवी विभूति को किसी दूसरी से कम या ज्यादा समझते हैं। उपासना के क्षेत्र में विषमता का यह भाव सबसे अधिक घातक है। इस प्रकार की चेष्टा से मानसिक चाँचल्य की वृद्धि होती है, जिसके कारण न उपासना में मन स्थिर हो पाता है और न उसका कोई फल होता है।

संसार में जितने भी महापुरुष हुये हैं, महापुरुष होने से पहले उनमें से कोई भी यह नहीं जानता था कि उनमें इतनी अपार शक्ति भरी हुई है। अपनी इस शक्ति की पहचान उन्हें तब ही हुई, जब उन्होंने कर्म क्षेत्र में पदार्पण किया। कर्म में प्रवृत्त होते ही मनुष्य के शक्ति कोष खुल जाते हैं। ज्यों-ज्यों मनुष्य कर्म-मार्ग पर बढ़ता जाता है, ज्यों-ज्यों उसकी शक्ति सामर्थ्य के स्तर एक के बाद दूसरे खुलते जाते हैं। कर्म-शक्ति रूपी अग्नि का ईंधन है मनुष्य ज्यों-ज्यों कर्म करता जाता है, उसकी शक्ति प्रज्वलित होती जाती है। कर्म से शक्ति और शक्ति से कर्म का संवर्धन हुआ करता है।

हम जो कुछ जैसा चाहें, वैसा ही हमारे सामने आये, ऐसा सोचना हमारी दम्भपूर्ण मूर्खता तथा स्वार्थपूर्ण भावना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। परिस्थितियाँ किसी की गुलाम नहीं, सम्भावनाएँ किसी की अनुचरी नहीं। संयोग किसी के हाथ बिके नहीं हैं। और आकस्मिकतायें किसी के पास बन्धक नहीं हैं। फिर भला हमारा यह सोचना, कि हम जिस प्रकार की परिस्थितियाँ चाहें, वैसी ही हमारे सामने आवें, उपहासास्पद मूर्खता के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 चरित्र निर्माण

सही कहा गया है कि हर आदमी अपने-2 विचारों का पुतला है, पहले विचार उठता है, तब उस पर अमल होता है। बार-बार अमल करने से आदत बनती है और आदतों से आचरण निर्माण होता है।

बाज लोग सच्चरित्रता से यही मतलब निकालते हैं, कि ‘आदमी दूसरे की बहू-बेटियों को अपनी ही माँ-बहिन के समान देखता है, अथवा दूसरे की सम्पत्ति पर उसके मुँह में पानी नहीं आ जाता।’ यह बातें चरित्र में खास गुण होती हैं। मगर केवल इन्हीं दो एक बात से चरित्र नहीं ढलता। दुनिया की सभी अच्छी बातों के (जिनमें अपना, अपने समाज का, अपनी जाति और देश का मंगल हो) संग्रह को चरित्र कहते हैं। चीजों का सही ढंग से रखना, कपड़े कायदे से पहनना, दर्जा बदर्जा अपने छोटे-बड़ों की आवभगत करना, वक्त की पाबन्दी, मान-मर्यादा का हर दम विचार, उठना, बैठना, चलना, फिरना सभी चरित्र निर्माण की सामग्री हैं।

कुछ लोग छिप कर काम करते हैं। छिपकर काम करने से उनमें और भी खराब बान पड़ती है और उसके द्वारा चरित्र दूषित होता है। अगर उन चोरों और डाकुओं से जो अपने पेशे की घोषणा करने में जरा भी नहीं शर्माते पूछा जाए तो ये बतावेंगे, कि उनकी यह कुटेव चुपके-चुपके और छिप कर काम करने से पड़ी।

हर मनुष्य को चाहिए कि वह हर बात को सोचे और उस पर अमल करे, बात भी ऐसी हो जिससे सच्चरित्र निर्माण हो। चरित्र वही है, जिसके द्वारा अच्छे विचारों की और अच्छे काम करने की आदत पड़ जाए।

अखण्ड ज्योति मार्च 1943 पृष्ठ 14

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शनिवार, 18 नवंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 18 Nov 2023

मनोरंजन प्रधान उपन्यास, नाटक एवं शृंगार रस पूर्ण पुस्तक को पढ़ना स्वाध्याय नहीं है। इस प्रकार का साहित्य पढ़ना तो वास्तव में समय का दुरुपयोग एवं अपनी आत्मा को कलुषित करना है। सच्चा स्वाध्याय वही है, जिससे हमारी चिन्ताएँ दूर हों, हमारी शंका-कुशंकाओं का समाधान हो, मन में सद्भाव और शुभ संकल्पों का उदय हो तथा आत्मा को शान्ति की अनुभूति हो।

शब्द की शक्ति अल्प, निष्प्राण, कुंठित होने का एक प्रमुख कारण है उसका दुरुपयोग करना। बिना आवश्यकता के बिना प्रसंग बोलना, जरूरत से अधिक बोलना, हर समय उलटे सीधे बकते रहना, शब्द की शक्ति को नष्ट करना है। असंयम से कोई भी शक्ति क्षीण हो जाती है।  वाणी का असंयम ही शब्द शक्ति के कुंठित होने का एक बड़ा कारण है।

गायत्री को इष्ट मानने का अर्थ है-सत्प्रवृत्ति की सर्वोत्कृष्टता पर आस्था। गायत्री उपासना का अर्थ है-सत्प्रेरणा को इतनी प्रबल बनाना, जिसके कारण सन्मार्ग पर चले बिना रहा ही न जा सके। गायत्री उपासना का लक्ष्य यही है। यह प्रयोजन जिसका जितनी मात्रा में जब सफल हो रहा हो समझना चाहिए कि हमें उतनी ही मात्रा में सिद्धि प्राप्त हो गई।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 जीवन का कायाकल्प

🔷 गायत्री मन्त्र से आत्मिक कायाकल्प हो जाता है। इस महामन्त्र की उपासना आरम्भ करते ही साधक को ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे आन्तरिक क्षेत्र में एक नई हलचल आरम्भ हो गई है। सतोगुणी तत्वों की अभिवृद्धि होने से दुर्गुण, कुविचार, दु:ख स्वभाव एवं दुर्भाव घटने आरम्भ हो जाते हैं और संयम, नम्रता, श्रमशीलता, मधुरता, ईमानदारी, सत्यनिष्ठ, सन्तोष, शान्ति, सेवाभाव आदि सद्ïगुणों की मात्रा दिन-दिन बड़ी तेजी से बढ़ती जाती है। फलस्वरूप लोग उसके स्वभाव एवं आचरण से सन्तुष्टï होकर बदले में प्रशंसा, कृतज्ञता, श्रद्धा एवं सम्मान के भाव रखते हैं और समय-समय पर उसकी अनेक प्रकार से सहायता करते रहते हैं।

🔶 गायत्री साधना से साधक के मन: क्षेत्र में असाधारण परिवर्तन हो जाता है। विवेक, दूरदर्शिता, तत्त्वज्ञान और ऋतम्भरा बुद्धि की अभिवृद्धि हो जाने के कारण अनेक अज्ञानजन्य दु:खों का निवारण हो जाता है। प्रारब्धवश अनिवार्य कर्मफल के कारण कष्ट साध्य परिस्थितियाँ हरेक के जीवन में आती रहती हैं। संसार का सबसे बड़ा लाभ ‘आत्मबल’ गायत्री साधक को प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के सांसारिक लाभ भी होते हैं।

🔷 कारण यह है कि हर एक कठिनाई के पीछे जड़ में निश्चय ही कुछ न कुछ अपनी त्रुटियाँ, अयोग्यतायें एवं खराबियाँ रहती हैं। सतोगुण की वृद्धि के साथ अपने आहार-विहार, विचार, दिनचर्या, दृष्टिïकोण, स्वभाव एवं कार्यक्रम में परिवर्तन होता है। यह परिवर्तन की आपत्तियों के निवारण का, सुख-शांति की स्थापना का राजमार्ग बन जाता है। कई बार हमारी इच्छाएँ, तृष्णाएँ, लालसाएँ, कामनाएँ ऐसी होती हैं जो अपनी योग्यता एवं परिस्थितियों से मेल नहीं खातीं, मस्तिष्क शुद्ध होने पर बुद्धिमान व्यक्ति उन तृष्णाओं को त्यागकर अकारण दु:खी रहने व भ्रम-जंजाल से छूट जाता है। अवश्यम्भावी न टलने वाले प्रारब्ध का भोग जब सामने आता है तो साधारण व्यक्ति बुरी तरह रोते-चिल्लाते हैं।
निरोगता, सौन्दर्य, दीर्घजीवन, कठोर परिश्रम करने की क्षमता, दाम्पत्य सुख, सुसन्तति, अधिक कमाना, शत्रुओं से निर्भयता आदि कितने ही लाभ ऐसे हैं जो कुश्ती पछाडऩे से कम महत्त्वपूर्ण नहीं। साधना से यदि कोई विशेष प्रयोजन प्रारब्धवश पूरा भी न हो, तो भी इतना तो निश्चय है कि किसी न किसी प्रकार साधना की अपेक्षा कई गुना लाभ अवश्य मिलकर रहेगा।

🔶 आत्मा स्वयं अनेक ऋद्धि-सिद्धियों का केन्द्र है। जो शक्तियाँ परमात्मा में हैं वे ही उसके अमर युवराज आत्मा में हैं। समस्त ऋद्धि-सिद्धियों का केन्द्र आत्मा है में हैं। परन्तु जिस प्रकार राख से ढँका हुआ अंगार मन्द हो जाता है, वैसे ही आन्तरिक मलीनताओं के कारण आत्म-तेज कुंठित हो जाता है। गायत्री साधना से वह मलीनता का पर्दा हटता है और राख हटा देने से जैसे अंगार अपने प्रज्वलित स्वरूप में दिखाई पड़े लगता है वैसे ही साधक की आत्मा भी अपने ऋद्धि-सिद्धि समन्वित ब्रह्मï तेज के साथ प्रकट होती है। योगिायें को जो लाभ दीर्घकाल तक कष्टïसाध्य तपस्यायें करने से प्राप्त होता है वही लाभ गायत्री साधकों को स्वल्प प्रयास से प्राप्त हो जाता है।

🔷 प्राचीन काल में महर्षियों ने बड़ी-बड़ी तपस्याएँ और योग साधनाएँ करके अणिमा, महिमा आदि ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। उनकी चमत्कारी शक्तियों के वर्णन से इतिहास पुराण भरे पड़े हैं, वह तपस्या और योग साधना गायत्री के आधार पर ही की थी। अब अनेक महात्मा ऐसे मौजूद हैं जिनके पास दैवी शक्तियाँ और सिद्धियों का भण्डार मार्ग में सुगमतापूर्वक सफलता प्राप्त करने का दूसरा मार्ग नहीं है। सिद्ध पुरुषों के अतिरिक्त  सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी सभी चक्रवर्ती राजा गायत्री के उपासक रहे हैं। ब्राह्मïण लोग गायत्री की ब्रह्मïशक्ति के बल पर जगद्ïगुरु थे, क्षत्रिय गायत्री के मर्म, तेज को धारण करके चक्रवर्ती शासक थे। यह सनानत सत्य आज भी वैसा ही है। गायत्री माता का अंचल श्रद्धापूर्वक पकडऩे वाला मनुष्य कभी भी निराश नहीं रहता।  

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शुक्रवार, 17 नवंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 17 Nov 2023

🔷 प्रेम का तत्व सृष्टि में सर्वत्र व्याप्त है किन्तु कही अधिक और कही कम। अपनत्व सभी में स्थित है पशु पक्षी मानव आदि सभी अपने का प्यार कतरे है। डाकू दूसरों की हत्या करता है किन्तु अपनी तथा अपने बाल बच्चों की सुरक्षा का ध्यान रखता है। हिंसक सिंह भी पशुओं का भक्षण करता है। किन्तु अपनी सिंहनी के प्रति प्रेम का ही व्यवहार करता है विकराल सर्प दूसरों के लिए काल है किन्तु अपनी नागिन के लिये प्रेम विह्वल है। यदि प्रेम या निजत्व न हो तो सृष्टि ही नष्ट हो जावे।

🔶 जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के लिए प्रति अपने “मैं” को छोड़ देता है तो उसे प्रेम कहते हैं जब कोई ‘सर्व’ के प्रति अपने ‘मैं’ को छोड़ देता है तो वह भक्ति कहलाती है। मानव में प्रभु के मिलन के लिए प्रेम आवश्यक है। श्री रामानुजाचार्य के पास एक व्यक्ति दीक्षित होने आया और बोला प्रभु के पाने के लिए आप मुझे दीक्षा दीजिए। श्री रामानुजाचार्य बोले तुमने किसी से प्रेम किया है उसने कहा कि नहीं हम तो प्रभु से मिलना चाहते हैं। तब रामानुजाचार्य बोले मैं दीक्षा देने में असमर्थ हूँ क्योंकि यदि तुम्हारे पा सप्रेम होता तो मैं उसे परिशुद्ध कर ईश्वर की ओर ले जाता लेकिन तुम में प्रेम ही नहीं है।

🔷 आज कल प्रेम के विषय में गलत भ्रान्ति है। काम को ही प्रेम समझा जाता है। इस भ्रम के फैलाने में सिनेमा गन्दे उपन्यास तथा कहानियों का प्रधान हाथ है। जो दर्शकों और पाठकों को गलत दिशा दे रहे हैं। काम प्रेम का आभास तथा भ्रम है। जैसे कोई व्यक्ति कोहरे का धुँआ समझ लेता है मृग मरुभूमि में प्रकाश के झिलमिलाने से उसे पानी समझ लेता है। और प्यास बुझाते को दौड़ता है। जिसे मृग तृष्णा कहते हैं। जैसे उसे आभास और भ्रम हो जाता है। वैसे ही मान को भी काम में प्रेम का आभास या भ्रम दिखाई देता है। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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