मंगलवार, 21 नवंबर 2023

👉 धुलाई और रंगाई

मित्रों ! धुलाई के बिना रंगाई निखरती कहाँ है? गलाई के बिना ढलाई किसने कर दिखाई है? मल- मूत्र से सने बच्चे को माता तब ही गोद में उठाती है, जब उसे नहला- धुला कर साफ- सुथरा बना देती है। मैला- गंदला पानी पीने के काम कहाँ आता है? मैले दर्पण में छवि कहाँ दीख पड़ती है? जलते अंगारे पर यदि राख की परत जम जाए, तो न उसमें गर्मी का आभास होता है, न चमक का। बादलों से ढक जाने पर सूर्य- चन्द्र तक अपना प्रकाश धरती तक नहीं पहुँचा पाते। कुहासा छा जाने पर दिन में भी लगभग रात जैसा अंधेरा छा जाता है और कुछ दूरी की वस्तुएँ तक सूझ नहीं पड़तीं।

इन्हीं सब उदाहरणों को देखते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि मनुष्य यदि लोभ की हथकड़ियों, मोह की बेड़ियों और अहंकार की जंजीरों में जकड़ा हुआ रहे, तो उसकी समस्त क्षमताएँ नाकारा बन कर रह जाएँगी। बँधुआ मजदूर रस्सी में बँधे पशुओं की तरह बाधित और विवश बने रहते हैं। वे अपना मौलिक पराक्रम गवाँ बैठते हैं और उसी प्रकार चलने- करने के लिए विवश होते हैं, जैसा कि बाँधने वाला उन्हें चलने के लिए दबाता- धमकाता है। कठपुतलियाँ अपनी मर्जी से न उठ सकती हैं, न चल सकती हैं। मात्र मदारी ही उन्हें नचाता- कुदाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र- पेज 05


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