👉 भक्ति के अपूर्व सोपान हैं-श्रवण और कीर्तन
देवर्षि भी बिना क्षण गवाएँ कहने लगे- ‘‘आज मेरी स्मृतियों में जिस भक्त का बिम्ब उभरा है, उनकी कहीं कोई चर्चा नहीं है। न शास्त्रों ने उनके बारे में कुछ कहा है और न ही कोई पुराणकथाएँ उनकी कोई बात करती हैं। विशेषताओं के किन्हीं विशेषणों से उनका कोई भी वास्ता नहीं है। बस उनकी विशेषता अगर कहीं थी तो वह उनके हृदय में थी। मैं यहाँ जिन भक्त की चर्चा कर रहा हूँ, वह एक सामान्य से गांव में सामान्य से कृषक थे। उन दिनों उनके परिवार में अनगिन परेशानियाँ थीं। वह स्वयं भी बिस्तर पर बीमार लेटे थे। राह चलते मेरी दृष्टि उन पर और उनके परिवार पर गयी। मैंने सहज स्वभाववश उनके द्वार पर पहुँच कर नारायण नाम का नामोच्चार किया। मेरी वाणी को सुनकर उनकी पत्नी द्वार पर आयी। उसके मुख पर दुर्भाग्य की कालिमा के साथ पीड़ा की कड़वाहट घुली थी।
मेरी ओर उसने विचित्र दृष्टि से देखा। उसकी इस दृष्टि में कई सकारात्मक-नकारात्मक भाव एक साथ घुले थे। पर मैंने इस सबकी परवाह किए बिना उससे कहा- देवी! मैं तुम्हारे पति से मिलता चाहता हूँ। वह बिना कुछ बोले द्वार से एक तरफ हट गयी। मैं भीतर गया। उसका पति आंगन में लेटा था। दीर्घकालीन बीमारी ने उसे असमय बूढ़ा कर दिया था। उसने एक क्षीण-सी दृष्टि मेरी ओर डाली। पीड़ा से उसकी आँखें तो छलकीं पर कण्ठ से एक भी शब्द न निकला। मैंने ही उससे पूछा- भद्र! मैं तो बस तुम्हें नारायण का नाम सुनाने आया हूँ। अगर हो सके तो इस नाम का सतत उच्चार करो। ऐसा करके मैं वहाँ से चल दिया। पर उस व्यक्ति ने न जाने किन शुभ संस्कारोंवश मेरी बात मान ली। इस घटना को गुजरे कई साल गुजर गए। एक बार पुनः मेरा उधर से जाना हुआ। संयोगवश या भगवत्कृपावश, मैं पुनः उसके द्वार पर पहुँचा। उसके द्वार पर कुछ उत्सव जैसा था। कई लोग एकत्रित होकर भगवन्नाम संकीर्तन कर रहे थे। पूछने पर पता चला कि यहाँ पर प्रत्येक एकादशी को ऐसा होता है और आज एकादशी जो है।
तब की और उस दिन की परिस्थितियों में भारी अन्तर था। वह किसान और उसकी पत्नी मुझे घर के अन्दर ले गये। उन्होंने मुझे बिठाकर जलपान कराया। और अपने आपबीती सुनाने लगे और बोले- जब पिछली बार आपने मुझे नारायण नाम का स्मरण करने के लिए था तो मैंने पता नहीं किन संस्कारोंवश आपकी बात मान ली। जब तक मुझे होश रहता मैं भावभरे मन से प्रभुनाम लेता रहता। इस नामरटन ने मेरे देह-मन एवं प्राणों का शोधन शुरू कर दिया। बीमारी पता नहीं कहाँ गयी। पत्नी के स्वभाव में भी परिवर्तन आ गया। स्वस्थ होने पर मैं काम-काज करने लगा, तो घर की स्थिति भी बदल गयी। फिर तो मैंने नारायण नाम का नुस्खा औरों को भी देना प्रारम्भ कर दिया। इस तरह कीर्तन की शुरूआत हो गयी।
इस श्रवण एवं कीर्तन भक्ति ने मेरे साथ न जाने कितनों के जीवन बदल दिए। यह ऐसा सच है कि जिसे मेरे साथ बहुतों से अनुभव किया। और अब तो बस मेरा जीवन श्रवण एवं कीर्तन भक्ति का पर्याय बन गया। घर-परिवार में रहकर भगवान की भक्ति का इससे अच्छा उपाय भला और क्या है? इससे सब कुछ स्वतः मिल जाता है, घर-परिवार का सुख एवं मन की शान्ति। भगवत्कृपा से जीवन के दुःख कब सुखों में बदल जाते हैं पता ही नहीं चलता।’’
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १५३