सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

👉 सुख-दुख में समभाव रखिए! (भाग १)

सुख और दुख जीवन के दो विशिष्ट पहलू हैं, जिस पर भारतीय मुनियों ने बहुत गंभीर चिन्तन किया है। विश्व का कोई भी प्राणी दुख नहीं चाहता, पर वह मिलता अवश्य है। इसी तरह सभी प्राणी सूख चाहते हैं और निरन्तर उसे पाने के लिए प्रयत्नशील नजर आते हैं, फिर भी सच्चे सुख की अनुभूति विरले महापुरुषों के अतिरिक्त किसी को हो नहीं पाती, यह विश्व का सबसे महान आश्चर्य है। हमारे विचारक महापुरुषों ने इसी पर तल स्पर्शी गवेषणा की कि सुख एवं दुख हैं क्या बला? और उसकी प्राप्ति का, अनुभूति का, कारण क्या है? उन्होंने इसी एक प्रश्न पर जीवन को समर्पित कर दिया कि समस्त दुखों के विनाश एवं आनन्द की अनुभूति का मार्ग क्या है?

उनकी विचारधारा में साँसारिक लोग जिन्हें दुख या सुख समझते हैं, यह मिथ्या कल्पना जन्य प्रतीत हुआ और उससे आगे बढ़कर उन्होंने ऐसे ऐसे मार्ग खोज निकाले जिनके द्वारा इन दोनों से अतीत अवस्था का अनुभव किया जा सके।

साधारणतया मनुष्य दुख-सुख का कारण बाहरी वस्तुओं का संयोग एवं वियोग मानता है और इसी गलत धारण के कारण अनुकूल वस्तुओं व परिस्थितियों को उत्पन्न करने व जुटाने में एवं प्रतिकूल वस्तुओं को दूर करने में ही वह लगा रहता है। पर विचारकों ने यह देखा कि एक ही वस्तु की प्राप्ति से एक को सुख होता है और दूसरे को दुख। इतना ही नहीं परिस्थिति की भिन्नता हो तो एक ही वस्तु या बात एक समय में सुखकर प्रतीत होती हैं और अन्य समय में वही दुःखकर अनुभूत होती है इससे वस्तुओं का संयोग वियोग ही सुख-दुःख का प्रधान कारण नहीं कहा जा सकता और इसी के अनुसंधान में बाहरी दुखों एवं सुखों का समभाव रखने को महत्व दिया गया है।

भौतिक विचारधारा से आध्यात्मिक विचारधारा की भिन्नता यहाँ अत्यंत स्पष्ट हो जाती है। भौतिक दृष्टिवाला बाहरी निमित्तों पर जोर देगा। तब आध्यात्मिक दृष्टिवाला अपनी आत्मनिष्ठा की ओर बढ़ता चला जायगा। उसकी दृष्टि इतनी सतेज हो जायेगी कि बाहरी पर्दे के भीतर क्या है? उसे भली भाँति देख सके और ऐसा होने पर वह मूल वस्तु को पकड़ने का प्रयत्न करेगा। दृष्टाँत के लिए दो व्यक्ति एक स्थान पर पास-पास ही बैठे हुए हैं। अचानक कहीं से उनके मस्तक पर पत्थर आ गिरे। इससे भ्रान्ति में पड़कर एक तो पत्थर को दोषी मानकर उसे हाथ में लेकर उसे पछाड़ा कि उसके खंड-खंड हो गए। दूसरे ने पत्थर पर रोष न कर वह कहाँ से आया, किसने फेंका, क्यों फेंका इत्यादि पर गंभीरता से विचार करके और मुख्यतः दोष जिसका हो, ज्ञात कर उसके शोधन में प्रगति की, दोनों व्यक्तियों के यद्यपि पत्थर लगने की क्रिया एक सी हुई, पर दृष्टि की गहराई के भेद-भावों में व फल में रात-दिन का अन्तर हो गया।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 16

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 3)

Q.3. What are the rules to be followed after taking Diksha?

Ans. After initiation, the devotee is expected to maintain  regularity in daily routine of worship (Upasana), a persistent endeavour for developing purity in thoughts words and deeds by studying scriptures and interacting with saintly persons (Sadhana) and by donating a part of one’s time and resources for welfare activities (Aradhana). Strict adherence to the routine of Upasana - Sadhana - Aradhana is essential. Nevertheless, if there are some momentary disruptions because of contingencies, one should not have any misgivings about divine displeasure, because God, like mother, is full of love, patience and forgiveness.

Though certain restrictions on diet (such as vegetarianism and abstention from hard drinks) are recommended for accelerating progress in Sadhana, these are not mandatory for the beginner. The devotee has free choice of time and period of Upasana to suit his / her routine.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 81

👉 वामन

वामन का मतलब होता है बौना, यानि कि छोटा। वामन वही नहीं होते जिनकी लम्बाई कम होती है। वामन वे भी होते हैं, जिनके व्यक्तित्व की ऊँचाई कम होती है। जिनके मन-अन्तःकरण छल-कपट से भरे होते हैं। जिनकी भावनाएँ दूषित-कलुषित होती हैं। ऐसे लोग भले कितने बुद्धिमान, तर्ककुशल व साधन सम्पन्न हों, भले ही उनके पास कितनी ही अलौकिक शक्तियाँ- सिद्धियाँ एवं ऋद्धियाँ-निधियाँ क्यों न हों? परन्तु अपने छल-कपट के कारण, भावों की अशुद्धि के कारण उन्हें सदा ही वामन कहा और समझा जाता है। इसके विपरीत शुद्ध अन्तःकरण, छल-प्रपंच से दूर, निष्कलुष हृदय वाले व्यक्ति अपने व्यक्तित्व से सदा विराट् होते हैं। तीनों लोकों में उनकी ख्याति होती है। स्वयं परमेश्वर भी उनकी सराहना करते हैं।
  
पुराणों में कथा है- जब स्वयं भगवान् अपने छल के कारण विराट् होने पर भी वामन कहे गये। इस रोचक कथा प्रसंग में वर्णन है कि स्वयं भगवान् विष्णु को परम धर्मात्मा बलि के पास याचक बनकर वामन के रूप में जाना पड़ा। धर्म परायण दैत्य राजा बलि ने भोग-विलास में डूबे रहने वाले स्वर्गाधिपति इन्द्र को पराजित कर देव व्यवस्था संभाल ली। स्वर्गाधिपति हो जाने के बाद भी बलि सदा तप एवं यज्ञ में निरत रहते थे। उनकी रुचि सुशासन, विष्णु भक्ति एवं तप-यज्ञ में थी न कि भोगों में। देवगणों ने इन्द्र के साथ मिलकर भगवान् विष्णु से प्रार्थना कि- कृपा कर उन्हें देवलोक वापस दिलाएँ। इस प्रार्थना पर भगवान् को भारी असमंजस हुआ, क्योंकि धर्मपरायण-परमभक्त बलि से युद्ध करना सम्भव नहीं था।
  
आखिर उन्हें वामन का रूप धरना पड़ा। पाँच वर्ष के तेजस्वी ब्राह्मण के रूप में उन्होंने महाराज बलि की यज्ञशाला में प्रवेश किया। महाराज बलि एक पल में ही अपने आराध्य को पहचान गए। उन्होंने भक्ति भरे मन से कहा आज्ञा करें भगवन्! उत्तर में वामन बने विष्णु ने तीन पग भूमि माँगी। बलि के हाँ कहते ही भगवान् वामन से विराट् हो गए। और उन्होंने दो पगों में स्वर्ग व धरती एवं तीसरे में स्वयं बलि को नाप लिया। देने वाले महाराज बलि अपना सर्वस्व देकर प्रसन्न थे। परन्तु भगवान् को अपने द्वारा किए छल पर क्षोभ था। उन्होंने बलि से कहा- वत्स इस अमिट दान के कारण तुम्हारी कीर्ति सदा अमर रहेगी। जबकि मेरे छल के कारण मुझ विराट को भी सदा याचक एवं वामन ही कहा जाएगा।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९१

शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 2)

Q.2. Is Diksha necessary for Sadhana?

Ans. Aspiration for salvation is the birth right of all human beings. Scriptures say that in the biological kingdom created by God three phenomena are extremely rare. One - to be born as a human amongst the innumerable species of living beings; Two - a strong aspiration for salvation from bondage and three - the patronage of a spiritual preceptor and guardian (Guru). Coming in contact with a true Guru and a desire to be initiated are the greatest blessings of life.

The credibility of Guru, is however, the most significant aspect of “Dikcha”. According to scriptures the Guru must have four basic qualifications:
He must be:
(1) “Shrotiya” - i.e. not only well-versed in scriptures but also the one who knows their subtle secrets and has realized their true import in his life.
(2) “Vrijino” - with a spotless reputation; sinless.
(3) “Akamahata” - i.e. he should have no other motive except that of purely doing good to others. He should be an ocean of compassion - without any ulterior motive of name,  fame or any material gain.
(4) “Brammavittam” - The one who has himself realized God.

The Guru is not only a teacher. He transmits spirituality, by personal example. Thus, a grave risk is involved if one falls in the clutches of a fake Guru. If, because of ignorance, someone has taken a Dikcha earlier from an unqualified person, prudence demands seeking a true Guru for spiritual growth,  Such Gurus are, of course, rare now-a-day.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 79

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 1)

Q.1. Why is Gayatri Mantra regarded as Guru Mantra?

Ans. Every body knows that one can learn very well under the direct guidance of a capable teacher. This, however, does not mean that a person devoid of knowledge and character be accepted as Guru. Instead of accepting an illiterate person as teacher and suffer the consequences it is better to regard the scriptures or any rishi  or devatma as one’s Guru and for this purpose even a picture or an idol of the person concerned can be used.

All human beings are born through the same biological process as other animals. Man is, therefore, in no way different from other species of animal kingdom, until he takes the first step towards his spiritual evolution by way of initiation in Sadhana. This ceremony of initiation amongst the Hindus is known as the Upnayan Sanskar.  The newly initiated person is called a Dwij (i.e. born-again) in spiritual parlance.

Each Hindu is traditionally required to undergo Upnayan Sanskar. In course of this ritual, the subject is made to wear a Janeu (sacred thread) across the body on the left shoulder as a constant reminder to follow the disciplines of Gayatri in life, (The Christians wear the crucifix for a similar purpose). During the Upnayan ceremony, the Guru initiates the person concerned exclusively in Gayatri Mantra. This is why it is known as the Guru Mantra.          
Literally too, the word ‘Guru’ in Sanskrit means ‘Heavy’, ‘powerful’ or ‘significant’. Since, this Mantra has been  referred to in the scriptures as the very manifestation of omnipotence and omniscience of God it is justifiably called as Guru Mantra.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 79

👉 दीया

दीया- जड़ और चेतन का मिलन है। दीया की देह मिट्टी की है, परन्तु उसकी ज्योति में चैतन्यता का प्रकाश है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय परिसर में भी एक दीया जलाया गया है। उसकी लौ सतत्-निरन्तर ऊपर उठ रही है। दीया की संरचना और संसाधन तो सांसारिक भूमि का भाग है। परन्तु उसकी लौ अनगिन जनों को प्रेरणा, प्रकाश व ऊर्जा देने के लिए लगातार ऊर्ध्वगामी बनी हुई है।
  
यह लौ विश्वविद्यालय के युवा छात्र-छात्राओं की चेतना की भाँति है। जिन्होंने अपने प्राणों का स्नेह डाल यह दीया जलाया है। डिवाइन इण्डिया यूथ एसोशिएशन- (ष्ठढ्ढङ्घ्न) यही नाम है इस दीया का। इसकी देह मातृभूमि की मिट्टी से बनी है। युवाओं का प्राणबल-मनोबल एवं आत्मबल ही वह तेल है, जिसके बल यह दीया जला है। युवाओं का संकल्प ही इस दीये की बाती है। और इसकी ज्योति, वह तो युवाओं-युवतियों की आत्मचेतना है। जो अपने साहस, पराक्रम, सद्ज्ञान व सद्कर्म की प्रकाश किरणें बिखेर कर देश व विश्व के युवाओं का सत्पथ-सन्मार्ग प्रकाशित कर रही है।
  
संरचना और साधन की दृष्टि से आज यह दीया छोटा लग सकता है; परन्तु इसके अतिरिक्त भी इसमें बहुत कुछ है। और वह है विश्वविद्यालय की युवा चेतना। यह अग्नि शिखा ही इसका प्राण है। इसके निरन्तर ऊपर उठने की उत्सुकता ही इसकी आत्मा है। यह लौ है इसीलिए तो दीया- दीया है, अन्यथा तो सब मिट्टी है। यह लौ पूरी तरह से जल उठेगी तो युवा भारत में क्रान्ति घटित होना सुनिश्चित है। जिनका ध्यान अभी तक इसकी संरचना और साधनों पर है, वे इसके सत्य को न समझ सकेंगे। परन्तु जिन्हें इसकी ज्योति दिखाई दे रही है, वे अवश्य इसके द्वारा होने वाले क्रांतिकारी परिवर्तनों को निहार सकेंगे। क्योंकि ज्योति पर ध्यान जाते ही सब कुछ परिवर्तित हो जाएगा। क्योंकि तब युवाओं के इस संकल्प में युग देवता भगवान् महाकाल के संकल्प के दर्शन अवश्य होंगे।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९०

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

👉 सज्जनता का सौन्दर्य

👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 6)

Q.13. What  is the ideal ‘Bramhabhoj’ after completion of the ‘Anusthan’?

Ans. In an Anusthan the last ritual is ‘Brahmbhoj’ after Poornahuti in the Havan. Traditionally it requires feeding Brahmans or young maidens. Qualified, deserving Brahmans are not easily available, these days. Alternatively, maidens (who being symbolic of mother power of God the Matri Shakti, are fed to augment faith) are offered food, but at times they are not permitted by self-respecting parents to take food in a stranger’s house. Brahmbhoj has, thus, ceased to have relevance in the contemporary society.

Under these circumstances, Brahmdan i.e. ‘Dissemination of spiritual wisdom’ (Sadgyan) can truly serve the purpose of Brahmbhoj. For each Ahuti, one is recommended to donate one paisa (one hundredth of local currency) for Brahmdan and with this amount procure literature pertaining to ‘Yug Nirman’ (resurrection of moral values in the society) and distribute it to deserving persons. In this manner, one can sow seeds of spiritual wisdom in many hearts, the fruits of which are reaped by the readers and motivators alike.

Q.14. What should one do if some unfavourable unforeseen events occur during an Anusthan?


Ans. Under such circumstances one may discontinue the Sadhana, Jap etc. for the period and resume it later from the count of disruption. However, a mental recitation, without a rosary, is permissible in all circumstances.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 77

👉 विश्वविद्यालय

आँखें खुली हों तो पूरा जीवन ही विश्वविद्यालय है। जीवन का हर क्षण स्वयं में विश्व की कोई न कोई विद्या समेटे है। और फिर जिसे सीखने की ललक है, वह प्रत्येक व्यक्ति व प्रत्येक घटना से सीख लेता है। प्रकृति के आँगन में हो रही हर हलचल उसे कोई न कोई नयी सीख देती है। याद रहे कि जो इस तरह नहीं सीखता है, वह जीवन में कभी कुछ नहीं सीख पाता। महान् वैज्ञानिक आइन्स्टीन कहा करते थे, हर व्यक्ति जिससे मैं मिलता हूँ, किसी न किसी बात में मुझसे श्रेष्ठ है। वही मैं उससे सीखने की कोशिश करता हूँ।
  
उन्हीं के जीवन का एक प्रसंग है। वह किसी दूसरे देश में एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में गए हुए थे। इस विश्वविद्यालय ने उनके लिए एक व्याख्यान माला का आयोजन किया था। उन्हें सुनने के लिए विभिन्न विषयों के विद्वान, राजनेता, उच्च पदाधिकारी सभी पधारे थे। एक दिन सायं वह अपने व्याख्यान को समाप्त कर घूमने के लिए निकले। राह में उन्होंने देखा, एक कुम्हार मिट्टी के बर्तन बना रहा था। उस कुम्हार की कारीगरी उन्हें विलक्षण लगी। जीवन और जगत् के स्रष्टा की भाँति, वह भी एक नवीन सृष्टि गढ़ रहा था। आइन्स्टीन काफी देर तक खड़े रहकर उसका यह कौशल देखते रहे।
  
फिर उन्होंने उससे कहा- ईश्वर की खातिर मुझे भी अपना बनाया हुआ बर्तन देंगे क्या? उनके मुख से ईश्वर का नाम सुनकर वह कुम्हार चौंका। फिर उसके होंठो पर एक हल्की सी मुस्कान उभरी। उसने अपने हाथ में लिया हुआ काम छोड़ दिया और अपने बनाए हुए बर्तनों में से एक सबसे सुन्दर बर्तन उठाया। उसे साफ करके बड़े ही सुन्दर ढंग से उसने आइन्स्टीन के हाथों में थमाया। कुम्हार का दिया बर्तन अपने हाथों में लेने के बाद उन महान् वैज्ञानिक ने उसे देने के लिए पैसे निकाले। परन्तु उस कुम्हार ने उन पैसों को लेने से इन्कार करते हुए कहा- महोदय! आपने तो ईश्वर की खातिर बर्तन देने को कहा था, पैसों की खातिर नहीं। आइन्स्टीन, अपनी मित्र मण्डली में हमेशा इस घटना का जिक्र करते हुए कहते थे, जो मैं कभी किसी विश्वविद्यालय में नहीं सीख सका, वह मुझे उस कुम्हार ने सिखा दिया। मैंने उससे निष्काम ईश्वर भक्ति सीखी। भला जीवन से बड़ा विश्वविद्यालय और कहाँ?

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८९

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

Bhav Sarita- Album of Spiritual songs by Shraddey Shailbala Pandya (Jiji)



Title

👉 मन

भर्तृहरि सम्राट् थे। उन्होंने सब छोड़ दिया, छोड़-छाड़ जंगल चले गए। मन को यह बात जंची न होगी। मन को यह बात कभी नहीं जंचती। जंगल में बैठे हैं, वर्षों बीत गए हैं। धीरे-धीरे धीरे-धीरे तरंगें शांत होती जा रही हैं। एक दिन सुबह ही आंख खोली, सुबह का सूरज निकला है, सामने ही राह जाती है--जिस चट्टान पर बैठे हैं, उसी के सामने से राह जाती है। उस राह पर एक बड़ा हीरा पड़ा है! बांध-बूंध के वर्षों में मन को किसी तरह बिठाया था--और मन दौड़ गया! और मन जब दौड़ता है तो कोई सूचना भी नहीं देता कि सावधान कि अब जाता हूं। वह तो चला ही जाता है तब पता चलता है। वह तो इतनी त्वरा से जाता है, इतनी तीव्रता से जाता है कि दुनिया में किसी और चीज की इतनी गति नहीं है जितनी मन की गति है। तुम्हें पता चले, चले, चले, तब तक तो वह काफी दूर निकल गया होता है।

शरीर तो वहीं बैठा रहा, लेकिन मन पहुंच गया हीरे के पास। मन ने तो हीरा उठा भी लिया। मन तो हीरे के साथ खेलने भी लगा। तुमने कहानियां तो पढ़ी हैं न शेखचिल्लियों की, वे सब कहानियां मन की कहानियां हैं। मन शेखचिल्ली है। और इस के पहले कि मन शरीर को भी उठा दे, दो घुड़सवार दोनों तरफ से आए, उन्होंने तलवारें खींच लीं। दोनों को हीरा दिखाई पड़ा, दोनों ने तलवारें हीरे के पास टेक दीं और कहा, हीरा पहले मुझे दिखाई पड़ा। भर्तृहरि का मन तो कहने लगा कि यह बात गलत है, हीरा पहले मुझे दिखाई पड़ा। मगर यह अभी मन में ही चल रहा है। और इसके पहले भर्तृहरि कुछ बोलें, वे तो तलवारें खिंच गईं। राजपूत थे। तलवारें एक-दूसरे की छाती में घुस गईं। दोनों लाशें गिर पड़ीं। हीरा अपनी जगह पड़ा है सो अपनी जगह पड़ा है।

लोग आते हैं और चले जाते हैं, हीरे अपनी जगह पड़े हैं अपनी ही जगह पड़े रह जाते हैं। लाशों का गिर जाना, लहू के फव्वारे फूट जाना, चारों तरफ खून बिखर जाना, हीरे का अपनी जगह ही पड़े रहना--होश आया भर्तृहरि को कि मैं यह क्या कर रहा था! वर्षों की साधना मिट्टी हो गई? मेरा मन तो भाग ही गया था, मैं तो खुद भी दावेदार हो गया था। मैं तो कहने ही जानेवाला था कि चुप, हीरे को पहले मैंने देखा है! तुम दोनों पीछे आए हो। हीरा मेरा है!

मगर इसके पहले कि कुछ कहते, उसके पहले ही यह घटना घट गई--दो लाशें गिर गईं। भर्तृहरि ने आंखें बंद कर लीं। सोचा कि हद हो गई, कितने हीरे घर छोड़ आया हूं जो इससे बड़े-बड़े थे! इस साधारण-से हीरे के लिए फिर लालच में आ गया। कुछ हुआ नहीं, बाहर कोई कृत्य नहीं उठा, लेकिन मन के भीतर तो सब यात्रा हो गई।

जरूरी नहीं है कि तुम बाहर कुछ करो, मन तो भीतर ही सब कर लेता है। यह हो भी सकता है कि बाहर से कोई हिमालय गुफा में बैठा हो और मन सारे संसार की यात्राएं करता रहे। बाहर की गुफाओं से धोखे में मत पड़ जाना। असली सवाल मन का है। और यह भी हो सकता है कि कोई राजमहल में बैठा हो और मन कहीं न जाता हो।

बात बाहर की नहीं है; बात भीतर की है, बात मन की है। और मन बड़ा लोभी है। मन हर चीज में लोभ लगा लेता है। मन कहता है सब मेरा हो जाए। और यह लोभ उसका ऐसा है कि ज़रा-ज़रा से स्वाद के पीछे जहर भी गटक जाता है।

👉 आत्मोपदेश सरल है


👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 5)

Q.10. What is the significance of Havan (Yagya) in an Anusthan?

Ans. Jap and Havan are basic ingredients of an Anusthan. After initiation (Dikcha) the worshipper (Sadhak) makes a total surrender to Gayatri and Yagya (his spiritual parents), which are inseparable. Invocation of both is done through specified procedures during the Anusthan.

Q.11. What are the number of ‘Ahutis’ prescribed for various types of Anusthans?

Ans. In ancient times, it was convenient to oblate one tenth of the total number of Japs in the Havan in an  Anusthan. In the present circumstances, it is sufficient to offer one hundredth number of ‘Ahutis’. The number thus amounts to :-
  
(a) Small Anusthan - 240 Ahutis.  
(b) Medium Anusthan - 1250 Ahutis.
(c) Big Anusthan - 24000 Ahutis.    The number may however, be varied depending on circumstances.

Q.12. How are the number of Ahutis distributed during the Yagya (Havan) in course of Anusthans?  
Ans. Havan may either be performed each day or on the last day of the Anusthan. Oblations required each day are equal to the number of ‘malas’, (cycles of rosary) whereas on the last day the number of ‘Ahutis’ should be equal to one hundredth of the total number of Japs (recitation of Mantras).
                          
When more than one person participates in the Havan, the cumulative number (number of persons multiplied by number of Ahutis) is counted. (e.g. 100 Ahutis by 5 persons will be considered as 500 Ahutis; for 240 Ahutis 6 persons may offer together 40 ‘Ahutis’ each etc.).

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 76

👉 सहनशक्ति

आज लोगों में सहनशक्ति बहुत कम होती जा रही है। आप भी ऐसा अनुभव करते होंगे, कि आज से 25/30 वर्ष पहले लोगों में जितनी सहनशक्ति, आपस में प्रेम, सहानुभूति,  सेवा, आदर सम्मान की भावना, त्याग तपस्या आदि थी, आज ये सब गुण उतने नहीं रहे। सबसे अधिक तो सहनशक्ति कम हुई है, जिसके बहुत से दुष्परिणाम लोगों को भोगने पड़ रहे हैं। छोटी-छोटी बात पर लोग गुस्सा करते हैं, लड़ाई झगड़ा करते हैं, अभिमान करते हैं, नाराज हो जाते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि आपसी संबंध टूट जाते हैं। यह सब क्यों हो रहा है? संबंधों को ठीक से निभाना नहीं जानते।

और यह नहीं जानते कि कोई भी संबंध अच्छा तभी चल पाएगा, जब संबंध रखने वालों में परस्पर एक दूसरे के प्रति सद्भावना सहानुभूति तथा सहनशक्ति हो।

लोगों को देखिए, उनको समझिए, उनसे मिलिए, उनके गुण कर्म को जानने का प्रयास कीजिए, और सहानुभूति प्रेम सद्भावना पूर्वक उनके साथ संबंध निभाने की सहनशक्ति भी रखिए। तभी आप संबंधों की रक्षा कर पाएंगे और आपके जीवन की भी सुरक्षा हो पाएगी। 

👉 राष्ट्र धर्म

राष्ट्र हममें से हर एक के सम्मिलित अस्तित्त्व का नाम है। इसमें जो कुछ आज हम हैं, कल थे और आने वाले कल में होंगे, सभी कुछ शामिल है। हम और हममे से हर एक के हमारेपन की सीमाएँ चाहे जितनी भी विस्तृत क्यों न हों? राष्ट्र की व्यापकता में स्वयं ही समा जाती हैं। इसकी असीम व्यापकता में देश की धरती, गगन, नदियाँ, पर्वत, झर-झर कर बहते निर्झर, विशालतम सागर और लघुतम सरोवर, सघन वन, सुरभित उद्यान, इनमें विचरण करने वाले पशु, आकाश विहार करने वाले पक्षी सभी तरह के वृक्ष व वनस्पतियाँ समाहित हैं। प्रान्त, शहर, जातियाँ, बोलियाँ, भाषाएँ यहाँ तक कि रीति, रिवाज, धर्म, मजहब, आस्थाएँ, परम्पराएँ, राष्ट्र के ही अंग अवयव हैं।
  
राष्ट्र से बड़ा अन्य कुछ भी नहीं है। भारतवासियों की एक ही पहचान है भारत देश, भारत मातरम्। हममें से हर एक का एक ही परिचय है- राष्ट्र ध्वज, अपना प्यारा तिरंगा। इस तिरंगे की शान में ही अपनी शान है। इसके गुणगान में ही अपने गुणों का गान है। हमारी अपनी निजी मान्यताएँ, आस्थाएँ, परम्पराएँ, यहाँ तक कि धर्म, मजहब की बातें वहीं तक सार्थक और औचित्यपूर्ण हैं, जहाँ तक कि इनसे राष्ट्रीय भावनाएँ पोषित होती हैं। जहाँ तक कि ये राष्ट्र धर्म का पालन करने में, राष्ट्र के उत्थान में सहायक हैं। राष्ट्र की अखण्डता, एकजुटता और स्वाभिमान के लिए अपनी निजता को न्यौछावर कर देना प्रत्येक राष्ट्रवासी का कर्त्तव्य है।
  
राष्ट्रधर्म का पालन प्रत्येक राष्ट्रवासी के लिए सर्वोपरि है। यह हिन्दू के लिए भी उतना ही अनिवार्य है जितना कि सिख, मुस्लिम या ईसाई के लिए। यह गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब या तमिल, तैलंगाना की सीमाओं से कहीं अधिक है। इसका क्षेत्र तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक सर्वत्र व्याप्त है। राष्ट्र धर्म के पालन का अर्थ है, राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति, वस्तु व परिस्थिति के लिए संवेदनशील होना, सजग होना, कर्त्तव्यनिष्ठ होना, राष्ट्रीय हितों के लिए, सुरक्षा व स्वाभिमान के लिए अपनी निजता, अपने सर्वस्व का सतत् बलिदान करते रहना।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८८

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

👉 सच्चा सद्भाव

पुत्र की उम्र पचास को छूने लगी। पिता पुत्र को व्यापार में स्वतन्त्रता नहीं देता था, तिजोरी की चाबी भी नहीं। पुत्र के मन में यह बात खटकती रहती थी। वह सोचता था कि यदि मेरा पिता पन्द्रह-बीस वर्ष तक और रहेगा तो मुझे स्वतन्त्र व्यापार करने का कोई अवसर नहीं मिलेगा। स्वतन्त्रता सबको चाहिये। मन में चिढ़ थी, कुढ़न थी। एक दिन वह फूट पड़ी। पिता-पुत्र में काफी बकझक हुई। सम्पदा का बँटवारा हुआ। पिता अलग रहने लगा। पुत्र अपने बहू-बच्चोंक साथ अलग रहने लगा।

पिता अकेले थे। उनकी पत्नी का देहान्त हो चुका था। किसी दूसरे को सेवा के लिए नहीं रखा; क्योंकि उनके स्वभावमें किसी के प्रति विश्वास नहीं था, यहाँ तक कि पुत्र के प्रति भी नहीं था। वे स्वयं ही अपने हाथ से रुखा-सूखा भोजन बनाकर कर लेते, कभी भूखे सो जाते। जब उनकी पुत्रवधू को यह बात मालूम पड़ी तो उसे बहुत दु:ख हुआ। आत्मग्लानि भी हुई। उसे बाल्यकाल से ही धर्म का संस्कार था- बड़ों के प्रति आदर एवं सेवा का भाव था। उसने अपने पति को मनाने का प्रयास किया, परंतु वे नहीं माने। पिता के प्रति पुत्र के मन में कोई सद्भाव नहीं था। अब बहू ने एक विचार अपने मन में दृढ़ कर लिया और कार्यान्वित किया। वह पहले रोटी बनाकर अपने पति-पुत्र को खिलाकर दूकान और स्कूल भेज देती। स्वयं श्वसुर के गृह चली जाती। वहाँ भोजन बनाकर श्वसुर को खिला देती और सायंकाल के लिए पराठे बनाकर रख देती।

कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। जब पति को मालूम पड़ा तो उन्होंने रोका- ‘ऐसा क्यों करती हो? बीमार पड़ जाओगी। आखिर शरीर ही तो है, कितना परिश्रम सहेगा!’ बहू बोली- ‘मेरे ईश्वर के समान आदरणीय श्वसुर भूखे रहें’; इसके बिना मुझे कुछ संतोष नहीं है, बड़ी ग्लानि है। मैं उन्हें खिलाये बिना खा नहीं सकती। भोजन के समय उनकी याद आने पर मुझे आँसू आने लगते हैं। उन्होंने ही तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया है, तब तुम मुझे पति के रुप में मिले हो। तुम्हारे मन में कृतज्ञता का भाव नहीं है तो क्या हुआ; मैं उनके प्रति कैसे कृतघ्न हो सकती हूँ?

पत्नी के सद्भाव ने पतिकी निष्ठुरता पर विजय प्राप्त कर ली। उसने जाकर पिता के चरण छुये, क्षमा माँगी, घर ले आये- पति-पत्नी दोनों पिताकी सेवा करने लगे। पिता ने व्यापार का सारा भार पुत्र पर छोड़ दिया। वे अब पुत्रके किसी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करते थे।

परिवार के किसी भी व्यक्ति में यदि सच्चा सद्भाव हो तो वह सबके मन को जोड़ सकता है। मन का मेल ही सच्चा पारिवारिक सुख है।

👉 सब कुछ आपके अंदर ही है।


👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 4)

Q. 6. Does one himself benefit by doing Jap-Anusthan for others?

Ans. It is true that like helping the needy through one’s own resources, a person reaps spiritual benefits while performing Upasana-Tap for others (“Distant therapy”). The only condition is that it should be carried out to support a deserving cause. On the contrary, if divine powers are sought to further some misdeed, it becomes a sinful act. Purity of motive is, therefore, a pre-requisite for an Anusthan.

Q.7. Is acceptance of a donation or gift in cash or kind is permissible in lieu of an Anusthan done for others?
Ans. It is sanctioned to the extent of minimum amount for bare sustenance. Very little benefit accrues when an Anusthan is performed for others with an eye on deriving maximum personal benefit.

Q.8. What is the time of the day recommended for Jap during an Anusthan? Is it necessary to complete  Jap at a stretch?

Ans. Mornings are best suited. Otherwise, one may complete the count in instalments at different periods of the day.

Q.9. What to do if there is some irregularity during the Anusthan?


Ans. There should not be any apprehension about incurring any divine displeasure as a consequence of an unavoidable irregularity during the Anusthan. Nevertheless, it is advisable to seek protection of a competent Guru toward off possible disturbances and to take care of advertent or inadvertent errors. This service is also provided free from Shantikunj, Hardwar, Uttar Pradesh, India. One is advised to send details of personal introduction and time proposed for the Anusthan for receiving spiritual protection and rectification of errors through the power of Guru. It will doubly ensure success of the Anusthan.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 75

👉 जीवन सन्देश

मनुष्य की शक्ति अनन्त है। परन्तु यह अचरज भरे दुःख की बात है कि उसकी ये ज्यादातर शक्तियाँ सोई हुई हैं। यहाँ तक कि हमारे जीवन के सोने की अन्तिम रात्रि आ जाती है, परन्तु इन शक्तियों का जागरण नहीं हो पाता। यदि कहीं कुछ होता भी है, तो बहुत थोड़ा। ज्यादातर लोग तो अपनी अनन्त शक्तियों एवं असीमित सम्भावनाओं के बारे में सोचते भी नहीं। मानव जीवन का यथार्थ यही है कि हममें से ज्यादातर लोग तो आधा-चौथाई ही जी पाते हैं। कोई-कोई तो अपने जीवन का केवल सौवाँ, हजारवाँ या फिर लाखवाँ हिस्सा ही जी पाते हैं। इस तरह हमारी बहुतेरी शारीरिक, मानसिक शक्तियों का उपयोग आधा-अधूरा ही हो पाता है। आध्यात्मिक शक्तियों का तो उपयोग होता ही नहीं। जीवन का सच यही है कि मनुष्य की अग्नि बुझी-बुझी सी जलती है और इसीलिए वह स्वयं की आत्मा के समक्ष भी हीनता में जीता है।
  
इससे उबरने के लिए जरूरी है कि हमारा जीवन सक्रिय और सृजनात्मक हो। अपने ही हाथों दीन-हीन बने रहने से बड़ा पाप और कुछ भी नहीं। जमीन को खोदने से जलस्रोत मिलते हैं, ऐसे ही जीवन को खोदने से अनन्त-अनन्त शक्ति स्रोत उपलब्ध होते हैं। इसलिए जिन्हें अपने आप की पूर्णता अनुभव करनी है, वे सदा-सर्वदा सकारात्मक रूप से सक्रिय रहते हैं। जबकि दूसरे केवल सोच-विचार, तर्क-वितर्क में ही उलझे-फँसे रहते हैं। सकारात्मक सक्रियता के साधक हमेशा ही अपने विचारों को क्रिया रूप में परिणत करते रहते हैं। वे जो थोड़ा सा जानते हैं, उसका क्रियान्वयन करते हैं। बहुत ज्यादा जानने के लिए वे नहीं रुके रहते।
  
इस विधि से एक-एक कुदाली चलाकर वह स्वयं में अनन्त-अनन्त शक्ति का कुआँ खोद लेते हैं। जबकि तर्क-वितर्क और बहुत सारा सोच-विचार करने वाले बैठे ही रहते हैं। सकारात्मक सक्रियता और सृजनात्मकता ही अपनी अनन्त शक्तियों की अनुभूति का सूत्र है। इसे अपनाकर ही व्यक्ति अधिक से अधिक जीवित बनता है। और उसकी अपनी पूर्ण सम्भावित शक्तियों को सक्रिय कर लेता है। अपनी आत्म शक्ति की अनन्तता को अनुभव कर पाता है। इसलिए जीवन सन्देश के स्वर यही कहते हैं- कि विचार पर ही मत रुके रहो। चलो और कुछ करो। लाखों-लाख मील चलने के विचार से एक कदम आगे बढ़ चलना ज्यादा मूल्यवान् है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८३

👉 मधुमक्खी बनाम मक्खी-मच्छर प्रकृति

मधुमक्खी से उम्मीद करो कि वह पुष्प पर बैठेगी और उसका चयन करेगी। लेकिन मक्खी से से उम्मीद मत करो कि कचड़ा छोड़कर वह पुष्प चुनेगी, वह तो कचड़े पर ही बैठेगी। गाय व घोड़े साफ स्थान पर चारा चरेंगे व बैठेंगे। सुअर और भैंस से उम्मीद मत करो कि वह कीचड़ में नहीं लौटेंगे।

तुम्हारे भाषण व ज्ञान देने से मक्खी, सुअर व भैस कचड़ा व कीचड़ नहीं छोड़ेंगे। जैसे भगवान कृष्ण के ज्ञान देने से दुर्योधन ने अधर्म नहीं छोड़ा।

अतः इसीप्रकार अपने मक्खी, सुअर, भैंस की प्रवृत्ति के पड़ोसी, रिश्तेदार से यह उम्मीद मत करो कि वह तुम्हारी निंदा, चुगली नहीं करेंगे और तुम पर अपशब्दों व तानों के कीचड़ नहीं फेंकेंगे। अतः उन्हें इग्नोर करें और अपने लक्ष्य की ओर बढ़े।

साथ ही स्वयं पर भी चेकलिस्ट लगाएं कि हम स्वयं मख्खी है या मधुमक्खी?  निंदा-चुगली का कचड़ा पसन्द है? या ध्यान-स्वाध्याय-भजन-सत्संग का पुष्प?

मक्खी रोग उत्तपन्न करती है और मधुमक्खी मीठा शहद उतपन्न करती है। स्वयं के व्यवहार व स्वभाव की चेकलिस्ट चेक कीजिये कि आपका शहद से मीठा व्यवहार है या  कड़वा, दुःख-विषाद व रोग उतपन्न करने वाला मक्खी-मच्छर सा व्यवहार है?

यदि परिवर्तन चाहते तो परिवर्तन का हिस्सा बनो...स्वयं का सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है...

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

👉 कस्तूरी कुण्डल बसे, मृग ढूँढे बन माँहि!!

एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए। लोगों की बढ़ती साधना वृत्ति से वह प्रसन्न तो थे पर इससे उन्हें व्यावहारिक मुश्किलें आ रही थीं। कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता,तो भगवान के पास भागा-भागा आता और उन्हें अपनी परेशानियां बताता। उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता। भगवान इससे दुखी हो गए थे।

अंतत: उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले- देवताओं !! मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता है, जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं,न ही तपस्या कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।

प्रभू के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए।

गणेश जी बोले- आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं।

भगवान ने कहा- यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में है। उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा।

इंद्रदेव ने सलाह दी कि वह किसी महासागर में चले जाएं।"

वरुण देव बोले आप अंतरिक्ष में चले जाइए।

भगवान ने कहा- एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा।

भगवान निराश होने लगे थे। वह मन ही मन सोचने लगे- क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं है, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं ?

अंत में सूर्य देव बोले- प्रभू !! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं। मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा। पर वह यहाँ आपको कदापि न तलाश करेगा।

ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई। उन्होंने ऐसा ही किया। वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए। उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को ऊपर, नीचे, दाएं,बाएं,आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहे। मनुष्य अपने भीतर बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पा रहा है।

👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 3)

Q.5. Is it possible to have an Anusthan performed by someone else?

Ans. To get Jap performed by others on payment on one’s behalf amounts to purchasing labour and deriving advantage out of it. This earns no merit. There are some important tasks which require to be carried out by one’s own self. It becomes ridiculous if they are got done by others. Can a servant be appointed to study on one’s own behalf ? Can one entrust his sleep to someone else? Nobody appoints someone else to procreate children on his behalf. How can a disease be cured if a person other than the patient is paid and asked to take treatment on behalf of the patient? In the same way devotional worship of God has to be done in His proximity, attained by  the devotee in person. Self-discipline , penance or endurance are required to be practised and friendship is nurtured by a person himself. Physical exercise is also done by a person himself. The same norm applies to Sadhana.

As for as practicable, one should perform his or her own Anusthan, In specific cases of contingency it can be entrusted to a qualified Brahman. The term Brahman here needs an elaboration. In ancient times individuals considered Brahmans were scholars of the science of Brahma. They possessed a high level of upright character, lived a virtuous life with minimum means of sustenance  and comfort.

Now-a-days, it is difficult to find such Brahmans, who besides having been born in a Brahman family (by caste and heredity) and wearing traditional costumes of Brahmans of yore also have the credibility of Brahmanism in their character, behaviour and thoughts. It is very difficult to find a true Brahman from amongst hordes of hypocrites masquerading as Brahmans.

It is, therefore, recommended that if at all necessary, irrespective of caste and creed, Anusthan may be entrusted to such an individual of high character who has an infallible faith in God and is not desirous of any worldly gains of name, fame or material gain.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 73

👉 जीवन में सुख दुख

जीवन में सुख भी आते हैं, दुख भी आते हैं। सुख आने पर व्यक्ति प्रसन्न हो जाता है, उछलता कूदता नाचता है। और जब दुख आता है, तो दहाड़ें मार-मार कर रोता भी है। ये सुख दुख भी अनेक स्तर के होते हैं।

पढ़ाई-लिखाई करने में, धन कमाने में, परिवार के पालन में, देश विदेश की यात्रा आदि कार्यों में अनेक प्रकार के कष्ट आते हैं। व्यक्ति इन सारे कष्टों को अच्छी प्रकार से सह लेता है, क्योंकि उसके सामने कुछ लक्ष्य होता है। अपनी उन्नति, परिवार का पालन करना, समाज को सुख देना, धर्म की रक्षा करना, देश की रक्षा करना इत्यादि कारणों से वह इन सारे दुखों को सह लेता है।

परंतु कभी-कभी जब जीवन में उसे धोखा खाना पड़ता है, विश्वासघात का सामना करना पड़ता है, और वह भी कोई अपना निकट का व्यक्ति ही उसे धोखा दे, तब जो उसको दुख होता है, उसे सहन करना बहुत कठिन पड़ता है।

कोई बात नहीं। यह संसार है। यहाँ सब कुछ होता है। अपने पराए सब लोग सुख भी देते  हैं, दुख भी देते हैं। जब भी कोई अपना निकट का व्यक्ति दुख देवे, धोखा देवे, विश्वासघात करे, तब भी आप विचलित न होवें, यही आपकी वीरता है।

उस समय कैसे उस दुख को सहन करें? कैसे धैर्य रखें? इस प्रश्न का उत्तर है, कि तब ऐसा सोचें, यह संसार अनित्य है। यहां सुख आता है, वह चला जाता है। दुख आता है, वह भी चला जाएगा।

इस प्रकार से सोचने से वह दुख आपको हल्का लगेगा। और फिर भी वह दुख  पूरा दूर न हो, तो उस दुख को, उस अन्याय को ईश्वर के न्याय पर, आप छोड़ देवें। और अपने मन में तीन शब्द बोलें, "ईश्वर न्याय करेगा। ऐसा सोचने से आपका दुख हल्का हो  जाएगा। आपका मन बुद्धि विचलित नहीं होगा। आप अपना जीवन ठीक प्रकार से चला पाएंगे।

👉 शान्ति

शान्ति में स्वतः ही समस्त सुखों का अनुभव होता है, जबकि अशान्ति के क्षणों में समूचा जीवन दुःखमय हो जाता है। अन्तर्मन में शान्ति प्रगाढ़ हो तो दुःखमय परिस्थितियाँ, बाहरी जीवन के सारे आघात मिलकर भी अन्तस में दुःख को अंकुरित नहीं कर पाते। लेकिन यदि अपना अन्तःकरण अशान्त हो, तो सुख साधन, बाह्य जगत् का सुखद व्यवहार सिमटकर भी मन को सुख का अनुभव नहीं दे पाते। यह सच निरन्तर अनुभव होने के बावजूद भी प्रायः सभी का मन इस बोध से वीरान रहता है। सत्य यही है कि अन्तरात्मा शान्ति चाहती है, परन्तु जो हम करते हैं, उससे अशान्ति ही बढ़ती है। याद रहे कि अशान्ति की जड़ महत्त्वाकांक्षा है, जिसे शान्ति की चाहत है, उसे महत्त्वाकांक्षा छोड़नी पड़ेगी। क्योंकि शान्ति का प्रारम्भ वहाँ से होता है, जहाँ से महत्त्वाकांक्षा समाप्त होती है।
  
सन्त इमर्सन ने लिखा है- ‘युवावस्था में मेरे अनेकों सपने थे। उन्हीं दिनों मैंने एक सूची बनायी थी कि जीवन में मुझे क्या-क्या पाना है। इस सूची में वे सारी चीजें थीं, जिन्हें पाकर मैं धन्य होना चाहता था। स्वास्थ्य, सौन्दर्य, सुयश, सम्पत्ति, सुख इसमें सभी कुछ था। इस सूची को लेकर मैं बुजुर्ग सन्त थॉरो के पास गया। और उनसे कहा क्या मेरी इस सूची में जीवन की सभी उपलब्धियाँ नहीं आ जाती हैं? उन्होंने मेरी बातों को ध्यान से सुना और उनकी आँखों में हँसी की चमक गहरी हो उठी। उनके होंठ मुस्करा उठे और वे बोले- मेरे बेटे! तुम्हारी यह सूची बड़ी सुन्दर है। बहुत विचारपूर्वक तुमने इसे बनाया है। फिर भी तुमने इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात छोड़ दी है, जिसके बिना सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। मैंने पूछा- वह क्या है? उत्तर में उन वृद्ध अनुभवी सन्त ने मेरी सम्पूर्ण सूची को बुरी तरह से काट दिया। और उसकी जगह उन्होंने केवल एक शब्द लिखा- शान्ति।

यह शान्ति कोई बाहरी वस्तु नहीं है, यह तो स्वयं का ही एक ऐसा निर्माण है कि हर परिस्थिति में अन्तःकरण में शान्ति की मधुर सरगम प्रवाहित होती रहे। यह विचार की नहीं अनुभव की अवस्था है। यह कोई रिक्त, खाली, खोखली मनःस्थिति नहीं है, बल्कि अन्तर्मन के सकारात्मक संगीत की मुधरता है

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८२

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

👉 श्रेष्ठ शासक की कसौटी


👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 2)

Q.4. What are the basic rules of an Anusthan?

Ans. The set of rules to be followed are :-

(1) As far as practicable, regularity of time and number in the Jap should be maintained in the routine with minimum possible deviations.

(2) The five basic principles i.e. (i) fasting (ii) abstention from sex (iii) self-service (iv) sleeping on ground (v) refraining from leather-ware like shoes etc., are to be followed. (One may instead use synthetics, rubber etc.) If sleeping on ground is not safe because of dampness, insects etc., a hard wooden bed may be used. Self service is essential in making shaves, (avoid the barber) cleaning of clothes (don’t send them to the laundry) personal and for other physical requirements. In case it is inconvenient to cook one’s own food, help of a close family member- wife, mother, sister etc. may be taken. Prepared food items from market (restaurants, dhabas etc.) are strictly forbidden. Sex is taboo during an Anusthan. Not only one should avoid physical sex, stimulation of sex impulse through even casual thoughts and sight should also be checked. Ladies coming in contact should be treated as mother, sister or daughter. The same is applicable to the behaviour of women towards men.

Fasting can be done in one of the following ways:        (a) Only liquid food like buttermilk, milk, fruit juice etc.(b) Subsisting on fruits and vegetables only (c) taking tasteless food items devoid of salt, sugar and spices (d) partaking only one meal a day (e) choosing only two food items during the period of Anusthan.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 72

👉 "एक ले दूजी डाल"

चींटी चावल ले चली, बीच में मिल गई दाल।
कहत कबीर दो ना मिले, एक ले दूजी डाल।।

एक चींटी अपने मुंह में चावल लेकर जा रही थी, चलते चलते उसको रास्ते में दाल मिल गई, उसे भी लेने की उसकी इच्छा हुई लेकिन चावल मुंह में रखने पर दाल कैसे मिलेगी। दाल लेने को जाती है तो चावल नहीं मिलता । चींटी का दोनों को लेने का प्रयास था।
कबीर कहते हैं-- "दो ना मिले इक ले " चावल हो या दाल।

कबीर दास जी के इस दोहे का भाव यह है कि हमारी स्थिति भी उसी चींटी -जैसी है। हम भी संसार के विषय भोगों में फंस कर अतृप्त  ही रहते हैं, एक चीज मिलती है तो चाहते हैं कि दूसरी भी मिल जाए, दूसरी मिलती है तो चाहते हैं कि तीसरी मिल जाए। यह परंपरा बंद नहीं होती और हमारे जाने का समय आ जाता है।

यह हमारा मोह है, लोभ है। हमको लोहा मिलता है, किंतु हम सोने के पीछे लगते हैं। पारस की खोज करते हैं ताकि लोहे को सोना बना सकें। काम, क्रोध, लोभ यह तीनों प्रकार के नरक के द्वार हैं। यह आत्मा का नाश करने वाले हैं अर्थात अधोगति में ले जाने वाले हैं। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

"दो ना मिले एक ले दूजी डाल "इस कथन में मुख्य रूप से संतोष की शिक्षा है जो लोभ, मोह आदि से बचने का संदेश है।

वस्तुतः प्रारब्ध से जो कुछ प्राप्त है, उसी में संतोष करना चाहिए। क्योंकि जो प्राप्त होने वाला है उसके लिए श्रम करना व्यर्थ है, और जो प्राप्त होने वाला नहीं है उसके लिए भी श्रम करना व्यर्थ है। अपने समय की हानि करनी है। यह समझना चाहिए कि हमारे कल्याण के लिए प्रभु ने जैसी स्थिति में हमको रखा है। वही हमारे लिए सर्वोत्तम है, उसी में हमारी भलाई है, मन के अनुसार न किसी को कभी वस्तु मिली है, और न मिलने वाली है। क्योंकि तृष्णा  का, कामना का,  कोई अंत नहीं है।
हम भगवान को पसंद करते हैं, तो क्या मांगते हैं। इस पर विचार करना चाहिए, कबीर जी कहते हैं --- "एक ले दूजी डाल"।

हमारा मन भी चींटी सरीखा है। बुद्धि हमारा सारथी है, किंतु उस पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। हम मन के हिसाब से चलते हैं और दुखी होते हैं। अतः "एक ले दूजी डाल" अर्थात जो मिल जाए उसे प्रभु प्रसाद मानकर ग्रहण करें और अधिक की लालसा कदापि न करें।

👉 खुशियों का खजाना

खुशियाँ चाहते हो? तो सबसे पहले अन्तस् में खोजो। इन्हें बाह्य परिस्थिति में नहीं आन्तरिक मनःस्थिति में ढूँढो। जो खुशियों की खोज अन्तस् में करता है, उसे फिर इन्हें कहीं अन्यत्र नहीं खोजना पड़ता। और जो यहाँ खोजने की कोशिश न करके बाहर खोजता है, वह सदा खोजता ही रहता है, किन्तु पाता कुछ भी नहीं है।
  
एक भिखारी था, वह जिन्दगी भर एक ही जगह पर बैठकर भीख माँगता रहा। उसकी ख्वाहिश थी कि वह भी धनवान् बने। इसलिए वह दिन में ही नहीं रात में भी भीख मांगता। जो कुछ उसे भीख में मिलता उसे खर्च करने की बजाय जोड़ता रहता। अपनी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए उसने दिन-रात भरपूर कोशिश की। लेकिन वह कभी भी धनवान न हो सका। वह भिखारी की ही तरह जिया और भिखारी की ही तरह मरा। जब वह मरा तो उसके कफन के लायक भी पूरे पैसे उसके पास नहीं थे। उसके मर जाने के बाद आस-पास के लोगों ने उसका झोपड़ा तोड़ दिया। फिर सबने मिलकर वहाँ की जमीन साफ की। सफाई करने वाले इन सभी को तब भारी अचरज हुआ, जब उन्हें उस जगह पर बड़ा भारी खजाना गड़ा हुआ मिला। यह ठीक वही जगह थी, जिस जगह पर बैठकर वह भिखारी जिन्दगी भर भीख माँगा करता था। जहाँ पर वह बैठता था, उसके ठीक नीचे यह भारी खजाना गड़ा हुआ था।
  
जो खुशियों की तलाश में बाहर भटकते हैं, उनकी हालत भी कुछ ऐसी ही है। क्या हममें से हर एक के भीतर ही वह खुशियों का खजाना नहीं छुपा हुआ है, जिसे कि हम सब उम्र भर बाहर खोजते रहते हैं। इसके पहले कि खुशियों के खजाने की तलाश में, आनन्द और आलोक की खोज में, शान्ति और समृद्धि की चाहत में तुम यात्रा की शुरुआत करो, सबसे पहले तो उस जगह को खोज लेना, वहीं पर खोद लेना, जहाँ कि तुम खड़े हो। क्योंकि बड़े से बड़े खोजियों ने, यात्रियों ने सारी दुनियां में, सारी उम्र भटक कर अन्ततः यह खुशियों का खजाना अपने ही अन्तस् में पाया है। इसलिए अन्यत्र इसकी खोज व्यर्थ ही है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८२

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

👉 सम्मान

एक  वृद्ध माँ रात को 11:30 बजे रसोई में बर्तन साफ कर रही है, घर में दो बहुएँ हैं, जो बर्तनों की आवाज से परेशान होकर अपने पतियों को सास को उल्हाना देने को कहती हैं

वो कहती है आपकी माँ को मना करो इतनी रात को बर्तन धोने के लिये हमारी नींद खराब होती है साथ ही सुबह 4 बजे उठकर फिर खट्टर पट्टर शुरू कर देती है सुबह 5 बजे पूजा

आरती करके हमे सोने नही देती ना रात को ना ही सुबह जाओ सोच क्या रहे हो जाकर माँ को मना करो

बड़ा बेटा खड़ा होता है और रसोई की तरफ जाता है रास्ते मे छोटे भाई के कमरे में से भी वो ही बाते सुनाई पड़ती जो उसके कमरे हो रही थी वो छोटे भाई के कमरे को खटखटा देता है छोटा भाई बाहर आता है।

दोनो भाई रसोई में जाते हैं, और माँ को बर्तन साफ करने में मदद करने लगते है, माँ मना करती पर वो नही मानते, बर्तन साफ हो जाने के बाद दोनों भाई माँ को बड़े प्यार से उसके कमरे में ले जाते है, तो देखते हैं पिताजी भी जागे हुए हैं

दोनो भाई माँ को बिस्तर पर बैठा कर कहते हैं, माँ सुबह जल्दी उठा देना, हमें भी पूजा करनी है, और सुबह पिताजी के साथ योगा भी करेंगे

माँ बोली ठीक है बच्चों, दोनो बेटे सुबह जल्दी उठने लगे, रात को 9:30 पर ही बर्तन मांजने लगे, तो पत्नियां बोलीं माता जी करती तो हैं आप क्यों कर रहे हो बर्तन साफ, तो बेटे बोले हम लोगो की शादी करने के पीछे एक कारण यह भी था कि माँ की सहायता हो जायेगी पर तुम लोग ये कार्य नही कर रही हो कोई बात नही हम अपनी माँ की सहायता कर देते है

हमारी तो माँ है इसमें क्या बुराई है, अगले तीन दिनों में घर मे पूरा बदलाव आ गया बहुएँ जल्दी बर्तन इसलिये साफ करने लगी की नही तो उनके पति  बर्तन साफ करने लगेंगे साथ ही सुबह भी वो भी पतियों के साथ ही उठने लगी और पूजा आरती में शामिल होने लगी

कुछ दिनों में पूरे घर के वातावरण में पूरा बदलाव आ गया बहुएँ सास ससुर को पूरा सम्मान देने लगी ।

कहानी का सार।
माँ का सम्मान तब कम नही होता जब बहुवे उनका सम्मान नही करती, माँ का सम्मान तब कम होता है जब बेटे माँ का सम्मान नही करे या माँ के कार्य मे सहयोग ना करे ।

जन्म का रिश्ता हैं।
माता पिता पहले आपके हैं।  

👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 1)

Q.1. What is the difference between daily Upasana, Anusthan and Purascharan?

Ans. Daily worship is a part of routine day to day living. Anusthan is a worship of a higher order in which the devotee is bound by many restrictions and has to follow specified rules and regulations. Consequently, in the latter case, special benefits accrue. Purascharan, however, is a still higher specialised form of Sadhana. For Purascharan a number of specific Mantras and rituals are to be followed. Thus, only an individual with an advance of training is capable of performing a Purascharan. For a layman, therefore, Anusthans are recommended, which are easy to perform.

Q.2. What are the types of Anusthans? How much time is required for each?

Ans. There are three types of Anusthans small (Laghu) medium (madhyam) and Big (Uchch). The counts are as follows :
1) Small Anusthan: 24000 Japs to be completed in 9 days at the rate of 27 cycles of rosary per day. Time taken: on an average, 3 hours per day (with about 10 to 11 Malas per hour).
2) Medium Anusthan: 1,25000 Japs to be completed in 40 days at the rate of 33 Malas per day. Time taken: 3-4 hours per day.
3) Major Anusthan: 24,00,000 Japs to be completed in a year at the rate of 66 Malas per day. Time taken: about 6 hours per day.

Q.3. What are the pre-requisites for an Anusthan?

Ans. Cleansing of body, clothes and implements of worship; the six rituals; ‘Panchopchar’; Jap; Meditation ; ‘Suryarghdan’; (A small Kalash with water and incense are kept along with a photograph or idol of the deity.) Oblations of : water, ‘Akchat’, ‘Chandan’, ‘Flowers’ and ‘Naivedya’. ‘Avahan’ and ‘Visarjan’ at the beginning and end are associated with Gayatri Mantra; Yagya and Brahmbhoj.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 71

👉 सहनशीलता

सहनशीलता में अद्भुत शक्ति है। इसमें आत्मचेतना की अजेयता है, अमरत्व है। जिसमें सहनशीलता नहीं है, वह जल्दी टूट जाता है। जबकि जिसने सहनशीलता के अभेद्य सुरक्षाकवच को ओढ़ लिया है, उसे जीवन में प्रतिक्षण पड़ती चोटें और भी मजबूत और दृढ़ करती है।
  
सन्त तिलोपा अपने शिष्यों को एक सच्ची घटना सुनाते थे; एक युवक किसी लुहार के घर के पास से गुजरता था। उसने निहाई पर पड़ते हथौड़ों की चोटों की आवाज सुनी। कौतुकवश उसने लुहार के घर के भीतर झाँक कर देखा। उसे दिखाई दिया कि एक कोने में बहुत से हथौड़े टूटकर विकृत होकर पड़े हैं। उसे थोड़ा अचरज तो हुआ, फिर भी उसने सोचा कि समय और उपयोग ने उनकी ऐसी गति बनायी होगी। उस युवक ने जिज्ञासावश लुहार से पूछा; इतने सारे हथौड़ों को इस दशा तक पहुँचाने के लिए आपको कितनी निहाइयों की जरूरत पड़ी?
  
इस सवाल के जवाब में लुहार जोर से हँस पड़ा और बोला; अरे भाई, एक ही निहाई केवल एक ही। अब तो वह युवक और भी गहरे अचरज में डूब गया। उसके गणितीय मन में सवालों के अनेकों समीकरण उभरे। निहाई एक और वह भी सर्वथा अविजित और सुरक्षित। जबकि हथौड़े अनेक और वे सबके सब टूटे हुए। आखिर इस अचरज भरे सच का रहस्यात्मक आधार क्या है? युवक अभी कुछ और सोच पाता इतने में वह लुहार बोल पड़ा, ऐसा इसलिए है मित्र क्योंकि हथौड़े चोट करते हैं और निहाई धैर्य से, सर्वथा अविचलित भाव से सभी चोटों को सहती है। इसीलिए एक ही निहाई सैकड़ों हथौड़ों को तोड़ डालती है।
  
इस कथा का समापन करते हुए सन्त तिलोपा ने अपने शिष्यों से कहा; जीवन का सत्य सहनशीलता है। अन्त में वही जीतता है जो चोटों को धैर्यपूर्वक सहता और स्वीकार करता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८१

बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

👉 QUERIES ABOUT GAYATRI YAGYA (Part 5)

Q.9. Is Akhand Yagya permissible?

Ans. Scriptures do not permit Akhand Yagya.  Yagya should
be completed in a fixed time during the day only. The reason being the possibility of insects, worms etc. getting killed in the sacred fire, which makes it a violent and profane act.

Q.10. How are ‘Tantrik Mukhs’ different from Vedic Yagyas?

Ans. As opposed to Vedic Yagya performed during the day, Tantrik Mukhs are executed at night. ‘Holika Dahan’, burning of ‘funeral pyre’ etc. fall in the category of Mukh.
Mukhs are performed during night for various reasons. The oblations consist of non-eatable and untouchable objects. The sight too is not pleasant. The associated rituals are predominantly full of Tamogun. There is also no consideration for violence or non-violence during the performance. For all these considerations and to avoid interference from prying, Mukhs are organized at solitary, unknown places in utmost privacy.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 69

👉 दुखी नहीं प्रसन्न होवें

बहुत बार लोग इस बात से दुखी रहते हैं, कि हमारे कई मित्र संबंधी रिश्तेदार हमें सिर्फ उसी दिन याद करते हैं, जिस दिन उनको हमारी आवश्यकता होती है। साल भर हमें पूछते भी नहीं। जिस दिन काम पड़ता है, उस दिन खूब आगे पीछे घूमते हैं।

तो इस बात से वे लोग दुखी, परेशान रहते हैं। मेरा आप सब से निवेदन है कि इस बात से परेशान न होवें। जरा सोचिए, अगर एक व्यक्ति मुसीबत में है, और वह आपको याद करता है, तो इसका अर्थ हुआ, कि वह आपको अपनी समस्या के समाधान के रूप में देखता है। अर्थात आपके पास उसकी समस्या का समाधान है। तो इसमें बुरा क्या है?
वह आपको याद करता है, यह तो आप के लिए सौभाग्य की बात है।

जरा सोचिए, क्या कोई व्यक्ति हर रोज मोमबत्ती को याद करता है? नहीं न! वह उसी दिन याद करता है, जिस दिन लाइट चली जाती है। तो इसी प्रकार से समस्या उत्पन्न होने पर,कोई आपको समाधान के रूप में याद करता है, तो आपके लिए तो खुशी की बात है। आप उससे ऊंचे हैं। इसलिए दुखी न हों, बल्कि ऐसा सोचकर प्रसन्न होवें,  कि किसी को मेरी जरुरत है। मैं भी किसी से ऊंची स्थिति में हूँ, जिस को मेरी जरुरत है।

👉 पूर्णता का प्रत्यावर्तन

गुरु पूर्णिमा- पूर्णता के प्रत्यावर्तन का महोत्सव है। इन पुण्य-पलों में सद्गुरु अपनी पूर्णता सुपात्र-सत्शिष्य में उड़ेलते हैं। परन्तु यह विरल सौभाग्य मिलता उन्हीं को है, जो अपने अस्तित्त्व को पूर्ण रूप से सद्गुरु के श्री चरणों में अर्पित करने का साहस जुटाते हैं। शिष्य का सम्पूर्ण समर्पण ही सद्गुरु द्वारा प्रत्यावर्तित की जाने वाली पूर्णता का आधार बनता है।
  
समर्पण ही पूर्णता के प्रत्यावर्तन की साधना है। हालांकि साधना की यह डगर कठिन है। जो शिष्य इस पर चलने का साहस कर रहे हैं, वे जानते हैं कि अपने ही अस्तित्त्व में छुपे हुए जड़ता-वासना और अहंता के दुर्गम शैल शिखरों को पार करना आसान नहीं है। और इन्हें पार किए बिना समर्पण सम्भव नहीं है। समर्पण की डगर पर चलने पर अपना ही मन अनेक मायावी खेल रचता है।
  
प्रारम्भिक क्षणों में तो कई बार शिष्य साधक अपनी जड़ता व निष्क्रियता को ही समर्पण समझ लेते हैं। परन्तु जब गुरु कृपा से विवेक की किरणें झिलमिलाती हैं तो बोध होता है कि समर्पण जड़-निष्क्रियता में नहीं बल्कि सद्गुरु के लिए निरन्तर कर्मरत रहने में है। इस अवरोध को पार कर लेने पर वासना अगला अवरोध बनती है। लेकिन जब गुरु कृपा शिष्य में बोध बनकर प्रकट होती है, तो शिष्य की चेतना में यह रहस्य उजागर होता है कि वासना के दुर्गम शैल शिखर को लांघने का रहस्य भक्तिपूर्ण तप में है।
  
इसके बाद अहंता का अन्तिम अवरोध बचा रहता है। समर्पण की डगर पर सतत् चलते रहने वाले शिष्य सद्गुरु कृपा से यह जान लेते हैं कि निष्काम सेवा की निरन्तरता से यह अन्तिम अवरोध भी विलीन हो जाता है। इस विलीनता के साथ ही पूर्णता की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८१

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020

👉 जीवन मृत्यु

जो जीवन के रहस्य को जान लेते हैं- वे मृत्यु के रहस्य को भी जान लेते हैं। इस जीवन का प्रत्येक क्षण बोध का एक अवसर है। जिन्दगी का हर पल किसी नए रहस्य को अनावृत्त करने के लिए, उसे जानने के लिए है। जो इस सच से अनजान रहकर जिन्दगी के क्षण-पल को, दिवस-रात्रि को यूँ ही चुका देते हैं, वे दरअसल जीवन से चूक जाते हैं। मृत्यु भी उनके लिए केवल रहस्यमय भयावह अँधेरा बनकर रह जाती है।
  
चीनी सन्त लाओत्से के जीवन का एक प्रसंग है। साँझ के समय उसके पास एक युवक ची-लु एक उलझन लेकर आया। लाओत्से ने साँझ के झुरपुटे में उसके चेहरे की ओर ताकते हुए कहा- अपनी बात कहो? इस पर उस युवक ने पूछा मृत्यु क्या है? लाओत्से ने अपने उत्तर में थोड़ा हैरानी व्यक्त करते हुए कहा- अरे समस्या तो जीवन की होती है, मृत्यु की कैसी समस्या? फिर थोड़ी देर रुक कर लाओत्से ने धीमे से कहा- मृत्यु उनके लिए समस्या बनी रहती है, जो जीवन की समस्या का समाधान नहीं जान लेते।
  
ची-लु, लाओत्से के कथन को ध्यान से सुन रहा था। वृद्ध लाओत्से उससे कह रहा था- अपनी शक्तियों को केवल जीवन जी लेने में नहीं, बल्कि उसे ज्ञात करने में लगाओ। मृत्यु एवं मृतात्माओं की चिन्ता करने की बजाय जीवन एवं जीवित मनुष्यों की समस्याओं के समाधान की खोज करो। अरे जब तुम अभी जीवन से ही परिचित नहीं हो, तब तुम मृत्यु से भला कैसे परिचित हो सकते हो।
  
लाओत्से के कथन की गहराई का अहसास ची-लु को होने लगा। उसने अनुभव किया कि जो जीवन को जान लेते हैं, केवल वे ही मृत्यु को जान पाते हैं। जीवन का रहस्य जिन्हें ज्ञात हो जाता है, उन्हें मृत्यु भी रहस्य नहीं रह जाती है। क्योंकि वह तो उसी सच का दूसरा पहलू है।
  
मृत्यु का भय केवल उन्हें सताता है, जो कि जीवन को नहीं जानते। मृत्यु के भय से जो मुक्त हो सका- समझना कि उसने जीवन का बोध पा लिया। किसी की मृत्यु के समय ही यह पता चलता है कि वह व्यक्ति जीवन को सही ढंग से जानता था या नहीं। अब तनिक स्वयं में झाँको- वहाँ यदि मृत्यु का भय हो, तो समझो कि तुम्हें अभी जीवन को जानना शेष है। ऐसा कहते हुए लाओत्से ने साँझ समय का दीपक जला दिया, जिसके उजाले में जीवन व मृत्यु के सच झिलमिला उठे।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८०

सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

👉 धन नहीं धन का संग्रह पाप:-

गोपाल्लव हजार गायों का स्वामी नगर-सेठ। धन की अथाह राशि थी उसके पास। किन्तु तो भी गोपाल्लव के जीवन में कोई रस नहीं था, शान्ति नहीं थी, कभी उसने सन्तोष का अनुभव किया हो ऐसा कभी भी नहीं हुआ। वैभव विलास से परिपूर्ण जीवन का एक क्षण भी तो उसे ऐसा याद नहीं आ रहा था जब उसने निर्द्वंदता प्राप्त की हो।

विषय-भोगी गोपाल्लव को यह सब भली प्रकार सोचने का अवसर तब मिला जब राजयक्ष्मा से पीड़ित होकर वह रोग शैया से जा लगा। गोपाल्लव सोच रहे- 'धन की आसक्ति, विषयों के सुख का आकर्षण कितना प्रबल है कि मनुष्य यह भी नहीं सोच पाता कि इस संसार से परे भी कुछ है क्या ? शरीर कृश और जराजीर्ण हो गया तब कहीं मृत्यु याद आती है और मनुष्य सोचता है कि जीवन व्यर्थ गया,पाया कुछ नहीं, गांठ में था सो भी खो दिया।'

गोपाल्लव पड़े यही सोच रहे थे तभी उसके कर्ण-कुहरों पर टकराई एक ध्वनि-बहुत मीठी, भक्ति की भावनाओं से ओत-प्रोत। ऐसा लगा द्वार पर ही बैठा हुआ कोई व्यक्ति भक्ति-गीत गा रहा है। मन को सच्चा सुख भावनाओं में मिलता है। जीवन भर के भूले भटके राही को परमपिता परमात्मा की क्षणिक अनुभूति भी कितना सुख कितना विश्राम देती है यह उस गोपाल्लव को देखता तो सहज ही पता चल जाता। भजन सुनने से ऐसा आराम मिला मानो जलते घावों पर किसी ने शीतल मरहम लगा दिया हो। गोपाल्लव को नींद आ गई आज वे पूर्ण-प्रगाढ़ नींद भर सोये।

नींद टूटी तो वह स्वर-अन्तर्धान हो चुका था। गोपाल्लव ने परिचारक से पूछा- "अभी थोड़ी देर पूर्व बाहर कौन गा रहा था उसे भीतर तो बुलाना, बड़ा ही कर्ण प्रिय स्वर था। उसने मुझे जो शान्ति प्रदान की वह अब तक कभी भी नहीं मिली।"

परिचारक ने हंसकर कहा- "वह कोई संगीतज्ञ नहीं था आर्य! वह तो नगर का मोची है यहीं बैठकर जूते गांठता है और दिन भर के निर्वाह योग्य धन मिलते ही उठकर चला जाता है। सुना है वह अपने ही बनाये पद गाता है, बड़ा ईश्वर भक्त है। तभी तो उसके हर शब्द से रस टपकता है।"

प्रातःकाल वही स्वर फिर सुनाई दिया। गोपाल्लव ने मोची को बुलाकर उसे एक स्वर्ण मुद्रा देते हुए कहा- "तात! यह लो स्वर्ण मुद्रा तुम्हारे कल के गीत ने मुझे अपूर्व शान्ति प्रदान की।"

स्वर्ण मुद्रा पाकर मोची बड़ा प्रसन्न हुआ। खुशी-खुशी घर लौट आया किन्तु उसके बाद कई दिन तक उसका स्वर सुनाई न दिया। सप्ताहान्त मोची आया और सीधे गोपाल्लव के पास जाकर बोला- ”अर्थ कामेष्वसक्तानाँ धर्म ज्ञानं विधीयते” तात! धन और इंद्रियों के वशवर्ती नहीं है जो वहीं धर्म और ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। आत्म-कल्याण के मार्ग में यह दोनों वस्तुयें बाधक हैं।"

यह कहकर उसने स्वर्ण मुद्रा लौटा दी। गोपाल्लव ने पूछा- "कई दिन से आये नहीं।"

मोची ने उत्तर दिया- "आर्य! धन की तृष्णा बुरी होती है आपकी दी इस स्वर्ण मुद्रा की रक्षा और उसके उपयोग का चिन्तन करने के आगे मुझे अपना मार्ग ही भूल गया था इसीलिए तो इसे लौटाने आया हूँ।"

गोपाल्लव ने अनुभव किया धन का जीवनोपयोगी उपभोग ही पर्याप्त है परिग्रह से कभी शान्ति नहीं मिल सकती अपना धर्म धर्मार्थ व्यय कर उसने भी मोची की तरह परम शान्ति पाई।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1971 पृष्ठ

👉 QUERIES ABOUT GAYATRI YAGYA (Part 4)

Q.6. What is the necessity of collective-Yagyas?

Ans. Yagyas at a larger scale are required to be performed to purify the subtle environment and destroy pollution permeating the atmosphere. It infuses religious sentiments and enthusiasm in persons who are present and those who participate in it get an opportunity to take a vow to abandon one vice by way of offering Dev-dakshina and adopt one virtue or righteous tendency. In this way big Yagyas help in uplifting the moral and ethical levels of the participants.  

The meaning of the word Yagya is to do sacrifice, to give money in charity and do worship. Its practical meaning is that one ought not to spend his entire earnings on himself and his family, but should also contribute a part of it  for the welfare of others. It also implies that divinity and gentlemanliness should be respected and people should live together in mutual cooperation.


Q.7. Is ‘Agnihotra’ during the nights justified for matrimonial functions?
Ans. In fact scriptures advise performance of marriages and associated Agnihotra (Yagya) during the day only. However, it has become customary in India to perform marriages during the night because of the convenience and leisure of participants. Agnihotra associated with matrimonial functions performed during the night are, therefore, exceptions. Although marriages during the night  have become a norm for this reason, the best period for the ceremony is considered as the dusk time.

Q.8. What type of clothes are recommended during performance of  Yagya?

Ans. During a Yagya, the purifying energy emanating from the Agnihotra stimulates the outer skin and permeates the body through the physical perforations, bringing out sweat and other impurities from within. It is therefore, advisable to wear loose clothes to permit an easy intake of ‘ Pran’- the life-force and excretion of impure elements (Kalmash). For this reason, in ancient times a two-piece wear of Dhoti and Dupatta was recommended which permitted a free circulation of air in and around the body. Course, heavy and tight clothing is not advisable for this very reason, Dhoti and Kurta are cheap and convenient wears, which, besides meeting the above objectives, also serve the purpose of religious and cultural integrity. Dhoti and Kurta are also easily washable. In those regions where Dhoti-Kurta are not traditional wears, clean-washed Pyjama may be used. Socks should never be worn during the Sadhana. These are considered as dirty as shoes. (However, to ward off extreme cold, one may wear clean socks reserved exclusively, for this purpose).

Though traditionally a yellow Dupatta (Angavastra) on shoulders is recommended, it is not mandatory. Ladies may wear yellow Saree  or a loose traditional wear.
  
For Group performance, it is advisable to keep stock of spare clothes for the visiting participants. Continuance of a Yagya in the night is not justifiable.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 67

👉 बोध

बोध का परिणाम है त्याग। जो अन्तस में बोध के घटित हुए बिना त्याग करते हैं, उनका जीवन केवल आडम्बर बन कर रह जाता है। अन्तर्भावों की घुटन, बेचैनी उन्हें निरन्तर सालती रहती है। एक युवक भगवान् तथागत के पास पहुँचा। उसके चेहरे पर विजय का भाव था। अपने भावों को व्यक्त करते हुए उसने शास्ता से कहा- उसने गृह त्याग करने की सारी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं। अब वह भिक्षु बनने के योग्य हो गया है। उस युवक के इस दर्प भरे कथन पर भगवान् हँस दिए।
  
महात्मा बुद्ध की इस हँसी को वहाँ पास बैठे सारिपुत्र ने देखा। युवक के चले जाने के बाद उन्होंने भगवान् से हँसी का रहस्य जानना चाहा। उत्तर में सारिपुत्र की ओर देखते हुए बुद्ध बोले, संसार की तैयारियों की बात तो सुनी थी, पर संन्यास की तैयारियाँ क्या है? यह कथन समझ में नहीं आया। संसार से संन्यास में परिवर्तन, चित्त में बोध क्रान्ति के बिना घटित नहीं हो सकता। त्याग करना, संन्यास लेना, भिक्षु होना, न तो वेष परिवर्तन है, न नाम परिवर्तन और न गृह परिवर्तन है। यह तो विशुद्ध दृष्टि परिवर्तन है।
  
त्याग के लिए तो चित्त का समग्र परिवर्तन होना चाहिए। इस क्रान्ति के लिए बौद्धिक गणितीय जोड़-तोड़, विभाजन गुणन फल के समीकरण काम नहीं देते। संसार में सफल होने की सारणियाँ भी यहाँ काम नहीं आती। सांसारिकता का सम्पूर्ण गणित इस बोध के लिए न केवल व्यर्थ है, बल्कि विघ्न भी है। स्वप्न की नियमावलियाँ, जैसे जागरण में काम नहीं आती हैं, वैसे ही संसार के सत्य संन्यास में काम नहीं आते। आखिर वैराग्य और संन्यास संसार के स्वप्न से जागरण ही तो है।
  
शास्ता के इन शाश्वत वचनों ने सारिपुत्र के अन्तःकरण को छुआ। पर इनसे अछूता वह युवक फिर से एक दिन बुद्ध के पास आया और थोड़ा चिन्तित स्वर में बोला, त्याग की सारी तैयारियों में एक कसर बाकी रह गयी है। अभी चीवर की व्यवस्था जुटानी है। उसके इस कथन पर बुद्ध विहंस कर बोले, युवक सारा सामान छोड़ने के लिए ही कोई भिक्षु होता है, तू उसी को जुटाने के लिए परेशान है। जा अपनी दुनियाँ में लौट जा, तू अभी भिक्षु होने योग्य नहीं है। इसके लिए तो बोध की सम्पदा चाहिए जो विवेक-वैराग्य के बिना नहीं मिलती

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १७९

रविवार, 2 फ़रवरी 2020

👉 वासन्ती हूक, उमंग और उल्लास यदि आ जाए जीवन में (अंतिम भाग)

आज के दिन हमने अपने ब्रह्मवर्चस का उद्घाटन कराया था। ब्रह्मवर्चस एक सिद्धान्त है कि मनुष्य के भीतर अनन्त शक्तियों का जखीरा सोया हुआ है जिसे जगाना है। जगाने के लिए तप करना पड़ता है। तप करके हम अपने भीतर सोए हुए स्रोतों को जगा सकते हैं, उभार सकते हैं। तप करने का सिद्धान्त यह है, जिससे खाने-पीने से लेकर ब्रह्मवर्चस के नियम पालने तक के बहिरंग तप आते है और भीतर वाले तप में हम अपनी अन्तरात्मा और चेतना को तपा डालते हैं। तप करने से शक्तियाँ आती हैं, मनुष्य में देवत्व का उदय होता है। मनुष्य में देवत्व का उदय करने के लिए सामान्य जीवन में आस्तिकता अपनानी और बहिरंग जीवन में तपश्चर्या करनी पड़ती है। आस्तिकता का अर्थ नेक जीवन और तपश्चर्या का अर्थ लोकहित के लिए, सिद्धान्तों के लिए मुसीबतें सहने से है। तप करने की शिक्षा ब्रह्मवर्चस द्वारा सिखाते हैं। यह एक प्रतीक है, सिम्बल है, एक स्थान है। मनुष्य के भीतर देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण—यही हमारे दो सपने हैं। हमारी कुण्डलिनी और शक्तिपात इन्हीं दो प्रयोजनों में काम आती हैं, तीसरे किसी प्रयोजन में नहीं। तपपरायण और लोकोपयोगी जीवन यही मनुष्य में देवत्व का उदय है।

धरती पर स्वर्ग के वातावरण का क्या मतलब है? अच्छे वातावरण को स्वर्ग बैकुण्ठ में ही नहीं वरन् जमीन पर भी हो सकता है। जहाँ अच्छे आदमी, शरीफ आदमी, अच्छी नीयत के आदमी ठीक परम्परा को अपनाकर भले आदमियों के तरीके से रहते हैं वहीं स्वर्ग पैदा हो जाता है। हम चाहते थे कि धरती पर स्वर्ग बनाने के लिए कोई एक ऐसा मोहल्ला बना दें, एक ऐसा ग्राम बसा दें, जिसमें त्याग करने वाले, सेवा करने वाले लोग आएँ और वहाँ पर सिद्धान्तों के आधार पर जिएँ, हल्की-फुल्की, हँसती-हँसाती शान्ति की जिन्दगी जिएँ, मोहब्बत की जिन्दगी जिएँ और यह दिखा सकें कि लोकोपयोगी जिन्दगी भी जी जा सकती है क्या? धरती पर इसका एक नमूना बनाने के लिए हमने गायत्री नगर बसाया है। और आपको दावत देते हैं कि आप अपने बच्चे को संस्कारवान नहीं बना सकते तो उसको हमारे सुपुर्द कर दीजिए। आप कौन हैं? हम वाल्मीकि ऋषि हैं और वाल्मीकि ऋषि के तरीके से आपके बच्चों को लव-कुश बना सकते हैं। आपकी औरत को तपस्विनी सीता बना सकते हैं। दोनों संस्थाओं की वसन्त पंचमी के दिन इसीलिए स्थापना की गई है। आस्तिकता के लिए, ज्ञानयज्ञ के लिए, विचार-क्रान्ति के लिए यह एक नमूना है।

तपश्चर्या के सिद्धान्तों को प्राणवान बनाने के लिए, ज्ञान-विज्ञान के लिए, ब्रह्मवर्चस और आस्तिकता को जीवित करने के लिए, धरती पर स्वर्ग पैदा करने के लिए, हिल-मिलकर रहने और त्याग, बलिदान, सेवा की जिन्दगी जीने के लिए गायत्री नगर बसाया गया है। लोग यहाँ हमारा प्यार पाने के लिए, संस्कार पाने के लिए, आदर्श पाने के लिए, प्रेरणा पाने के लिए, प्रकाश पाने के लिए आते हैं। नैमिषारण्य क्षेत्र में शौनक और सूत का संवाद होता था। सारे ब्राह्मण बैठते थे, ज्ञान-ध्यान की बातें करते थे और लोकोपयोगी जीवन जीते थे। मेरा भी मन था कि ‘एकदा नैमिषारण्ये’ के तरीके से स्नेहवश लोग यहाँ आएँ और हिल-मिलकर काम करें, समाज सेवा की बातें करें, दूसरों को उठाने की बातें करें। हम एक ऐसी दुनिया बसाना चाहते हैं, ऐसा नगर बसाना चाहते हैं, जिससे दुनिया को दिखा सकें कि भावी जीवन, भावी संसार अगर होगा तो स्वर्ग जैसा कैसे बनाया जा सकेगा? स्वर्ग में शान्ति का, परमार्थ का जीवन जीने के लिए क्या-क्या तकलीफें आ सकती हैं? ऐसा हम गायत्री नगर का उद्घाटन करते हैं। चूँकि हमारे गुरु ने यही दिया और उसके लिए वायदा किया कि तेरा ऊँचा उद्देश्य है, तो तेरे लिए कमी नहीं पड़ेगी। मैं भी आपको विश्वास दिलाता हूँ कि अगर आपके जीवन में उद्देश्य ऊँचे हों तो आपको कमी नहीं रहेगी, कोई अभाव नहीं रहेगा। मेरी एक ही इच्छा और एक ही कामना रही है कि वसन्त पर्व के दिन आपको बुलाऊँ और अपने भीतर जो पक्ष है, उस पिटारी को खोलकर दिखाऊँ कि मेरे अन्दर कितना दर्द है? कितनी करुणा है? जीवन को पवित्र बनाने की कितनी संवेदना है? कितना देवत्व है? यही खोलकर आपको दिखाना चाहता था। अगर आपको ये चीजें पसन्द हों तो मैं चाहता हूँ कि आप इन चीजों को देखें, इनको परखें, छुएँ और अगर हिम्मत हो तो इनको खरीद ही ले जाएँ।
ॐ शान्ति।

.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 कर्म फल

एक बार शंकर जी पार्वती जी भ्रमण पर निकले। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक तालाब में कई बच्चे तैर रहे थे, लेकिन एक बच्चा उदास मुद्रा में बैठा था। पार्वती जी ने शंकर जी से पूछा, यह बच्चा उदास क्यों है? शंकर जी ने कहा, बच्चे को ध्यान से देखो। पार्वती जी ने देखा, बच्चे के दोनों हाथ नही थे, जिस कारण वो तैर नही पा रहा था। पार्वती जी ने शंकर जी से कहा कि आप शक्ति से इस बच्चे को हाथ दे दो ताकि वो भी तैर सके।

शंकर जी ने कहा, हम किसी के कर्म में हस्तक्षेप नही कर सकते हैं क्योंकि हर आत्मा अपने कर्मो के फल द्वारा ही अपना काम अदा करती है। पार्वती जी ने बार बार विनती की। आखिरकर शंकर जी ने उसे हाथ दे दिए। वह बच्चा भी पानी में तैरने लगा।

एक सप्ताह बाद शंकर जी पार्वती जी फिर वहाँ से गुज़रे। इस बार मामला उल्टा था, सिर्फ वही बच्चा तैर रहा था और बाकी सब बच्चे बाहर थे। पार्वती जी ने पूछा यह क्या है ? शंकर जी ने कहा, ध्यान से देखो। देखा तो वह बच्चा दूसरे बच्चों को पानी में डुबो रहा था इसलिए सब बच्चे भाग रहे थे। शंकर जी ने जवाब दिया : हर व्यक्ति अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है। भगवान किसी के कर्मो के फेर में नही पड़ते है। उसने पिछले जन्मो में हाथों द्वारा यही कार्य किया था इसलिए उसके हाथ नही थे। हाथ देने से पुनः वह दूसरों की हानि करने लगा है।

प्रकृति नियम के अनुसार चलती है, किसी के साथ कोई पक्षपात नही। आत्माएँ जब ऊपर से नीचे आती हैं तो अच्छी ही होती हैं, कर्मो अनुसार कोई अपाहिज है तो कोई भिखारी, तो कोई गरीब तो कोई अमीर लेकिन सब परिवर्तन शील है। अगर महलों में रहकर या पैसे के नशे में आज कोई बुरा काम करता है तो कल उसका भुगतान तो सबको करना ही पड़ेगा।

👉 प्रत्याहार - क्या है ?

प्रत्याहार - (आष्‍टांग योग का पाँचवा अंग)  क्या है ?

ऋषिजन कहते है कि इंद्रियों के व्यर्थ स्खलन को रोकें और उसे उस दिशा में लगाएँ जिससे आपका जीवन सुख और शांतिमय व्यतीत हो।

अष्टांगयोग का पाँचवाँ अंग प्रत्याहार है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार यह पाँच योग के बाहरी अंग हैं अर्थात योग में प्रवेश करने की भूमिका मात्र।

जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है उसी प्रकार इंद्रियों को इन घातक वासनाओं से विमुख कर अपनी आंतरिकता की ओर मोड़ देने का प्रयास करना ही प्रत्याहार है।

क्या है वासनाएँ : काम, क्रोध, लोभ, मोह यह तो मोटे-मोटे नाम हैं, लेकिन व्यक्ति उन कई बाहरी बातों में रत रहता है जो आज के आधुनिक समाज की उपज हैं जैसे शराबखोरी, सिनेमाई दर्शन और चार्चाएँ, अत्यधिक शोरपूर्ण संगीत, अति भोजन जिसमें माँस भक्षण के प्रति आसक्ति, महत्वाकांक्षाओं की अंधी दौड़ और ऐसी अनेक बातें जिससे क‍ि पाँचों इंद्रियों पर अधिक भार पड़ता है और अंतत: वह समयपूर्व निढाल हो बीमारियों की चपेट में आ जाती है।

नुकसान : आँख रूप को, नाक गंध को, जीभ स्वाद को, कान शब्द को और त्वचा स्पर्श को भोगती है। भोगने की इस वृत्ति की जब अति होती है तो इस सबसे मन में विकार की वृद्धि होती है। ये भोग जैसे-जैसे बढ़ते हैं, इंद्रियाँ सक्रिय होकर मन को विक्षिप्त करती रहती हैं। मन ज्यादा व्यग्र तथा व्याकुल होने लगता है, जिससे शक्ति का क्षय होता है।

उपाय : इंद्रियों को भोगों से दूर करने तथा इंद्रियों के रुख को भीतर की ओर मोड़कर स्थिर रखने के लिए प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। प्राणायाम के अभ्यास से इंद्रियाँ स्थिर हो जाती हैं। सभी विषय समाप्त हो जाते हैं। अतः प्राणायाम के अभ्यास से प्रत्याहार की स्थिति अपने आप बनने लगती है। दूसरा उपाय है रोज सुबह और शाम पाँच से तीस मिनट का ध्यान। इस सबके बावजूद अदि आपके भीतर संकल्प है तो आप संकल्प मात्र से ही प्रत्याहार की स्थिति में हो सकते हैं। हालाँकि प्रत्याहार को साधने के हठयोग में कई तरीके बताए गए हैं।

लाभ : यम, नियम, आसन और प्राणायम को साधने से प्रत्याहार स्वत: ही सध जाता है। इसके सधने से व्यक्ति का एनर्जी लेवल बढ़ता है। पवित्रता के कारण ओज में निखार आता है। किसी भी प्रकार के रोग शरीर और मन के पास फटकते तक नहीं हैं। आत्मविश्‍वास और विचार क्षमता बढ़ जाती है, जिससे धारणा सिद्धि में सहयोग मिलता है। खासकर यह अनंत में छलाँग लगाने के लिए स्वयं के तैयार होने की स्थिति है।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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