मंगलवार, 19 नवंबर 2019

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग ४)

जीभ का चटोरापन अनावश्यक मात्रा में अभक्ष्य पेट पर लादता है और क्रमशः अपच, रक्त दूषण बढ़ाते-बढ़ाते समूची स्वास्थ्य सम्पदा को ही बर्बाद करके रख देता है। इसी प्रकार कामुक चिन्तन में निरत रहने वाले पाते तो कुछ नहीं, अपनी एकाग्रता और चिन्तन की शालीनता गिराते-गिराते, घटाते-घटाते खोखला बनाने वाली दुश्चरित्रता के मानसिक मरीज बन जाते हैं। ऐसे लोग बौद्धिक दृष्टि से तो दुर्बल होते ही जाते हैं। शरीरबल, मनोबल और चरित्र बल की दृष्टि से भी गई गुजरी स्थिति में जा पहुँचते हैं।

व्यक्तित्व को खोखला करने वाली दुष्प्रवृत्तियों को अपने चिन्तन, स्वभाव और व्यवहार में ढूँढ़ते रहा जाय, साथ ही उन्हें संक्रामक बीमारी मानकर समय रहते उन्मूलन का उपाय उपचार किया जाता रहे तो यह अपने आप से स्वयं लड़ते रहने की शूरता किसी सफल सेनापति को विजयश्री मिलने जैसी मानी जायेगी। जो अपने को जीतता है वह विश्व विजयी बनता है। इस उक्ति को सर्वथा सारगर्भित समझा जाना चाहिए। गीता में ऐसे ही धर्मक्षेत्र, कर्मक्षेत्र में अर्जुन को लड़ने का उपदेश भगवान ने दिया था। वह हर विचारशील के लिए सदा सर्वदा अनुकरणीय है।

वह व्यक्तिगत सुधार परिधि की गुण, कर्म, स्वभाव क्षेत्र की चर्चा हुई। अब एक कदम और आगे बढ़ना चाहिए। परिवार एवं समाज में प्रयुक्त होने वाले प्रचलनों को भी इसी दृष्टि से देखना चाहिए और खोजना चाहिए कि सर्वत्र न सही अपने निज के व्यवहार तथा सम्बद्ध परिवार में ऐसी क्या अवांछनीयताएँ हैं जो व्यक्तिगत क्षेत्र में पनपने पर भी समूचे समाज के लिए घातक सिद्ध होती हैं। हैजा प्लेग के विषाणु आरम्भ में किसी छोटे क्षेत्र में होते हैं पर छूत की बीमारी बनकर दूर-दूर तक फैलते और असंख्यों का प्राण हरण करते चले जाते हैं। मूढ़ मान्यताएँ, कुरीतियाँ और अनैतिकताएँ एक प्रकार से चरित्र एवं समाज क्षेत्र की बीमारियाँ हैं। यह जहाँ पनपती हैं उतने ही क्षेत्र में तबाही नहीं करती वरन् अपनी चपेट में सुविस्तृत क्षेत्र को जकड़ती और पतन पराभव का वातावरण बनाती चली जाती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 17 नवंबर 2019

👉 जीवन जीने की कला

जीवन-जीने की कला में है। जिस किसी भी तरह अनगढ़ तौर-तरीकों से जीते रहने का नाम जीवन नहीं है। दरअसल जो जीने की कला जानते हैं, केवल वही यथार्थ में जीवन जीते हैं। जीवन का क्या अर्थ है? क्या है हमारे होने का अभिप्राय? क्या है मकसद? हम क्या होना और क्या पाना चाहते हैं? इन सवालों के ठीक-ठीक उत्तर में ही जिन्दगी का रहस्य समाया है।
  
यदि जीवन में गन्तव्य का बोध न हो, तो भला गति सही कैसे हो सकती है और यदि कहीं पहुँचना ही न हो, तो संतुष्टि कैसे पायी जा सकती है? जिसके पास सम्पूर्ण जीवन के अर्थ का विचार नहीं है, उसकी दशा उस माली की तरह है, जिसके पास फूल तो हैं और वह उनकी माला भी बनाना चाहता है, लेकिन उसके पास ऐसा धागा नहीं है जो उन्हें जोड़ सके, एक कर सके। आखिरकार वह कभी भी अपने फूलों की माला नहीं बना पायेगा।
  
जो जीवन जीने की कला से वंचित है, समझना चाहिए कि उनके जीवन में न दिशा है और न कोई एकता है। उनके समस्त अनुभव निरे आणविक रह जाते हैं। उनसे कभी भी उस ऊर्जा का जन्म नहीं हो पाता, जो कि ज्ञान बनकर प्रकट होती है। जीने की कला से वंचित व्यक्ति जीवन के उस समग्र अनुभव से सदा के लिए वंचित रह जाता है, जिसके अभाव में जीना और न जीना बराबर ही हो जाता है।
  
ऐसे व्यक्ति का जीवन उस वृक्ष की भाँति है, जिसमें न तो कभी फूल लग सकते हैं और न कभी फल। ऐसा व्यक्ति सुख-दुःख तो जानता है, पर उसे कभी भी आनन्द की अनुभूति नहीं होती। क्योंकि आनन्द की अनुभूति तो जीवन को कलात्मक ढंग से जीने पर, उसे समग्रता में अनुभव करने पर होती है। जीवन में यदि आनन्द पाना है, तो जीवन को फूलों की माला बनना होगा। जीवन के समस्त अनुभवों को एक लक्ष्य के धागे में कलात्मक रीति से गूँथना होगा। जो जीने की इस कला को नहीं जानते हैं, वे सदा के लिए जिन्दगी की सार्थकता एवं कृतार्थता से वंचित रह जाते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२५

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग ३)

स्वभाव में कटुता, कर्कशता, उतावली, अधीरता, उत्तेजना की उद्दण्डता भी उतनी ही घातक है जितनी कि दीनता, भीरुता, निराशा, कायरता। यह दोनों ही असन्तुलन भिन्न प्रकार के होते हुए भी हाई ब्लड प्रेशर, लो ब्लड प्रेशर की तरह अपने-अपने ढंग से हानि पहुँचाते हैं। स्वभाव को सहिष्णु, धैर्यवान, गम्भीर, दूरदर्शी, सहनशील बनाने का प्रयत्न यदि निरन्तर जारी रखा जाय तो शिष्टता, सज्जनता के ढाँचे में प्रकृति ढलती जायेगी और हर किसी की दृष्टि में अपना मूल्य बढ़ेगा।

ईमानदारी, सच्चाई, सहकारिता, उदारता, मिल जुलकर रहना, मिल बाँटकर खाना, हँसने-हँसाने की हलकी-फुलकी जिन्दगी जीना जैसी आदतें यदि अपने चरित्र का अंग बन सके तो इसमें घाटा कुछ भी नहीं लाभ ही लाभ है। बेईमान, झूठे, ईर्ष्यालु, स्वार्थान्ध, विद्वेषी, मनहूस प्रकृति के लोग अपनी चतुरता और अहमन्यता का ढिंढोरा भर पीटते हैं। वस्तुतः वे कुछेक चापलूसों और अनाड़ियों को छोड़कर हर समझदार की दृष्टि से ओछे, बचकाने और घिनौने प्रतीत होते हैं। वस्तुतः ऐसे लोग जोकर भर समझे और अप्रामाणिक ठहराये जाते हैं। आमतौर से ऐसे लोग अविश्वस्त और चरित्रहीन समझे जाते हैं। फिजूलखर्ची, बड़प्पन, बेईमानी गरीबी के गर्त में गिरने की पूर्व सूचना है। ऐसी आदतें अपने में थोड़ी मात्रा में भी पनपी हो तो उन्हें छोटी दीखने वाली उस चिनगारी को लात से मसलकर बुझा ही देना चाहिए।

ऐसे-ऐसे और भी अनेकों दोष दुर्गुण हैं जो विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न प्रकार की अनुपयुक्त आदतों के रूप में प्रकट होते हैं। एक सभ्य सुसंस्कारी मनुष्य की प्रतीक प्रतिमा मन में बसानी चाहिए और उसकी तुलना में अपनी जो भी कमियाँ दीखती हों उन्हें संकल्प और साहस के सहारे उलटने का प्रयत्न करना चाहिए। उलटने का तरीका एक ही है कि अनौचित्य के स्थान पर उसका प्रतिपक्षी औचित्य अपनाया जाय। उसे अपने दैनिक जीवनक्रम में सम्मानित रखते हुए धीरे-धीरे स्वभाव को ही उस ढाँचे में ढाल लिया जाय। बुराई कोसते रहते से नहीं मिट जाती, उसकी प्रतिपक्षी भलाई को प्रयोग में लाने की नियमित कार्य पद्धति अपनानी होती है। काँटे को काँटे से निकालते हैं और दुष्प्रवृत्तियों को हटाने के लिए सत्प्रवृत्तियों को उनसे जूझने के लिए मोर्चे पर खड़े करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 16 नवंबर 2019

👉 सच्चा ज्ञान:-

एक संन्यासी ईश्वर की खोज में निकला और एक आश्रम में जाकर ठहरा। पंद्रह दिन तक उस आश्रम में रहा, फिर ऊब गया। उस आश्रम के जो बुढे गुरु थे वह कुछ थोड़ी सी बातें जानते थे, रोज उन्हीं को दोहरा देते थे।

फिर उस युवा संन्यासी ने सोचा, 'यह गुरु मेरे योग्य नहीं, मैं कहीं और जाऊं। यहां तो थोड़ी सी बातें हैं, उन्हीं का दोहराना है। कल सुबह छोड़ दूंगा इस आश्रम को, यह जगह मेरे लायक नहीं।'

लेकिन उसी रात एक ऐसी घटना घट गई कि फिर उस युवा संन्यासी ने जीवन भर वह आश्रम नहीं छोड़ा। क्या हो गया?

दरअसल रात एक और संन्यासी मेहमान हुआ। रात आश्रम के सारे मित्र इकट्ठे हुए, सारे संन्यासी इकट्ठे हुए, उस नये संन्यासी से बातचीत करने और उसकी बातें सुनने।

उस नये संन्यासी ने बड़ी ज्ञान की बातें कहीं, उपनिषद की बातें कहीं, वेदों की बातें कहीं। वह इतना जानता था, इतना सूक्ष्म उसका विश्लेषण था, ऐसा गहरा उसका ज्ञान था कि दो घंटे तक वह बोलता रहा। सबने मंत्रमुग्ध होकर सुना।

उस युवा संन्यासी के मन में हुआ; 'गुरु हो तो ऐसा हो। इससे कुछ सीखने को मिल सकता है। एक वह गुरु है, वह चुपचाप बैठे हैं, उन्हे कुछ भी पता नहीं। अभी सुन कर उस बूढ़े के मन में बड़ा दुख होता होगा, पश्चात्ताप होता होगा, ग्लानि होती होगी—कि मैंने कुछ न जाना और यह अजनबी संन्यासी बहुत कुछ जानता है।'

युवा संन्यासी ने यह सोचा कि 'आज वह बूढ़ा गुरु अपने दिल में बहुत—बहुत दुखी, हीन अनुभव करता होगा।'

तभी उस आए हुए संन्यासी ने बात बंद की और बूढ़े गुरु से पूछा कि- "आपको मेरी बातें कैसी लगीं?"

बूढे गुरु खिलखिला कर हंसने लगे और बोले- "तुम्हारी बातें? मैं दो घंटे से सुनने की कोशिश कर रहा हूँ तुम तो कुछ बोलते ही नहीं हो। तुम तो बिलकुल भी बोलते ही नहीं हो।"

वह संन्यासी बोला- "मै दो घंटे से मैं बोल रहा हूं आप पागल तो नहीं हैं! और मुझसे कहते हैं कि मैं बोलता नहीं हूँ।"

वृद्ध ने कहा- "हां, तुम्हारे भीतर से गीता बोलती है, उपनिषद बोलता है, वेद बोलता है, लेकिन तुम तो जरा भी नहीं बोलते हो। तुमने इतनी देर में एक शब्द भी नहीं बोला! एक शब्द तुम नहीं बोले, सब सीखा हुआ बोले, सब याद किया हुआ बोले, जाना हुआ एक शब्द तुमने नहीं बोला। इसलिए मैं कहता हूं कि तुम कुछ भी नहीं बोलते हो, तुम्हारे भीतर से किताबें बोलती हैं।"

'वास्तव में दोस्तों!! एक ज्ञान वह है जो उधार है, जो हम सीख लेते हैं। ऐसे ज्ञान से जीवन के सत्य को कभी नहीं जाना जा सकता। जीवन के सत्य को केवल वे जानते हैं जो उधार ज्ञान से मुक्त होते हैं।

हम सब उधार ज्ञान से भरे हुए हैं। हमें लगता है कि हमें ईश्वर के संबंध में पता है। पर भला ईश्वर के संबंध में हमें क्या पता होगा जब अपने संबंध में ही पता नहीं है? हमें मोक्ष के संबंध में पता है। हमें जीवन के सभी सत्यों के संबंध में पता है। और इस छोटे से सत्य के संबंध में पता नहीं है जो हम हैं! अपने ही संबंध में जिन्हें पता नहीं है, उनके ज्ञान का क्या मूल्य हो सकता है?

लेकिन हम ऐसा ही ज्ञान इकट्ठा किए हुए हैं। और इसी ज्ञान को जान समझ कर जी लेते हैं और नष्ट हो जाते हैं। आदमी अज्ञान में पैदा होता है और मिथ्या ज्ञान में मर जाता है, ज्ञान उपलब्ध ही नहीं हो पाता।

दुनिया में दो तरह के लोग हैं एक अज्ञानी और एक ऐसे अज्ञानी जिन्हें ज्ञानी होने का भ्रम है। तीसरी तरह का आदमी मुश्किल से कभी-कभी जन्मता है। लेकिन जब तक कोई तीसरी तरह का आदमी न बन जाए, तब तक उसकी जिंदगी में न सुख हो सकता है, न शांति हो सकती है।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 16 Nov 2019



👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग २)

दुर्व्यसनों, दुर्गुणों, उच्छृंखलताओं एवं बुरी आदतों से उत्पन्न होने वाली हानियाँ इतनी अधिक हैं कि उनकी आग में उपार्जन, स्वास्थ्य, सम्मान, सन्तुलन, भविष्य, परिवार सभी कुछ ईंधन की तरह जलते और समाप्त होते देखा जा सकता है। इसलिए प्रगति की योजनाएँ बनाते समय यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि दुष्प्रवृत्तियों ने कहाँ कहाँ डेरे तम्बू गाड़ रखे हैं। अनुपयुक्त आदतों की विष बेलें कितनी गहराई तक अपनी जड़ें जमाती जा रही है। इस उखाड़-पछाड़ के बिना सुखद सम्भावनाओं का बीजारोपण हो नहीं सकेगा।

प्रत्यक्ष शत्रुओं से निपटना आसान है। चोर उचक्कों की सुरक्षा चौकीदारी से हो सकती है, किन्तु उन दुष्प्रवृत्तियों से निपटना तो दूर उनको ढूँढ़ निकालना और होने वाली हानियों का अनुमान लगाना तक कठिन पड़ता है। अदृश्य को कैसे देखा जाय? अप्रत्यक्ष को कैसे पकड़ा जाय? सूक्ष्मदर्शी विवेक का माइक्रोस्कोप ही इन विषाणुओं का अता-पता बता सकता है जो दुर्गुणों के रूप में विषाणुओं की भूमिका निभाते और सर्वनाश का ताना-बाना बुनते रहते हैं।

अपने गुण, कर्म, स्वभाव में किस हेय स्तर की दुष्प्रवृत्तियाँ अधिकार जमाती हैं, इसका तीखा निष्पक्ष पर्यवेक्षण करना चाहिए। शरीर क्षेत्र का शत्रु नम्बर एक आलस्य है और मनःक्षेत्र का प्रमाद। आलसी और प्रमादी प्रकारान्तर से आत्म हत्यारे हैं, वे अपने इन बहुमूल्य यन्त्रों को जंग लगाकर भोंथरे, अनुपयोगी एवं अपंग बना देते हैं। पक्षाघात पीड़ित जीते तो हैं किन्तु अशक्त असमर्थ, अर्ध मृतक की तरह रहकर। जिनके शरीर पर आलस्य का शनिश्चर छाया है वे काम से जी चुराते और परिश्रम में बेइज्जती अनुभव करते देखे जाते हैं। प्रमादी मस्तिष्क पर जोर नहीं डालते। उचित-अनुचित के पक्ष विपक्ष पर माथा पच्ची नहीं करते। जो चल रहा है उसी ढर्रे पर बेपेंदी के लोटे की तरह लुढ़कते रहते हैं। न समय की परवाह होती है न हानि लाभ की। किसी तरह दिन काटते चलना ही अभीष्ट होता है। पराक्रम रहित शरीर अपंग है और उत्साह रहित मस्तिष्क मूढ़मति। ऐसी दीन दयनीय स्थिति मनुष्य की अपनी बनाई होती है। यदि दिनचर्या बनाकर समय के एक-एक क्षण का उपयोग करने के लिए दिन भर के भविष्य के कार्य निर्धारित कर लिये जाय और उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर श्रमशील तत्परता और रुचि रस से भरी पूरी तन्मयता का संयुक्त नियोजन किया जा सके तो सफलता चरण चूमेगी और प्रगति पथ पर सरपट दौड़ने वाली चाल चौगुनी सौगुनी बढ़ती दीखेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 विजय का महापर्व

विजय पथ पर केवल धर्मपरायण, साहसी ही अपने पाँव रखते हैं, जिनमें जिन्दगी की चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत है, वही इस राह पर चल पाते हैं। अनीति, अनाचार, अत्याचार और आतंक से लोहा यही लौहपुरुष लेते हैं। विजय दशमी के रहस्य इन्हीं के अन्तर्चेतना में उजागर होते हैं। विजय का महापर्व इनके ही अस्तित्त्व को आनन्दातिरेक से भरता है।
  
विजय के साथ संयोजित दशम् संख्या में कई सांकेतिक रहस्य संजोये हैं। दशम् का स्थान नवम के बाद है। जिसने नवरात्रियों में भगवती आदिशक्ति की उपासना की है, वही दशम् की पूर्णता का अधिकारी होता है। वही अपनी आत्मशक्ति के प्रभाव से दस इन्द्रियों का नियंत्रण करने में समर्थ होता है। धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य एवं अक्रोध के रूप में धर्म के दस लक्षण उसकी आत्म चेतना में प्रकाशित होते हैं।
  
प्रभु श्रीराम के जीवन में शक्ति आराधन एवं धर्म की यही पूर्णता विकसित हुई थी। तभी वह आतंक एवं अत्याचार के स्रोत दशकण्ठ रावण को मृत्युदण्ड देने में समर्थ हुए। मर्यादा पुरुषोत्तम की जीवन चेतना में अहिंसा, क्षमा, सत्य, नम्रता, श्रद्धा, इन्द्रिय संयम, दान, यज्ञ, तप तथा ध्यान-इन दस धर्म साधनों की पूर्ण प्रभा-प्रकीर्ण हुई थी। इस धर्म साधन के ही प्रभाव से उनकी सभी दस नाड़ियाँ-इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, गांधारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, कहू, अलंवुषा एवं शंखिनी पूर्ण जाग्रत् एवं ऊर्जस्विनी हुई थीं।
  
प्रभु श्रीराम की धर्म साधना में एक ओर तप की प्रखरता थी, तो दूसरी ओर संवेदना की सजलता। इस पूर्णता का ही प्रभाव था कि जब उन्होंने धर्म युद्ध के लिए अपने पग बढ़ाये तो काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मांतगी तथा कमला ये सभी दस महाविद्याएँ उनकी सहयोगिनी बनीं और ‘यतो धर्मस्ततोजयः’ के महा सत्य को प्रमाणित करते हुए विजय दशमी धर्म विजय का महापर्व बन गयी।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२४

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 6)

Q.8. Why is Gayatri known as Tripada- Trinity?
Ans. Gayatri is Tripada- a Trinity, since being the Primordial Divine Energy, it is the source of three cosmic qualities known as “Sat”, “Raj” and “Tam” represented in Indian spirituality by the deities “Saraswati” or “Hreem”.  “Lakhyami” or “Shreem” and “Kali” or “Durga” as “Kleem”. Incorporation of “Hreem” in the soul augments positive traits like wisdom, intelligence, discrimination between right and wrong, love, self-discipline and humility. Yogis, spiritual masters, philosophers, devotees and compassionate saints derive their strength from Saraswati.

The intellectuals, missionaries, reformists, traders, workers, industrialists, socialists, communists are engaged in management of equitable distribution of Shreem (Lakhyami) for human well-being. Shreem is the source of wealth, prosperity, status, social recognition, sensual enjoyment and resources.

“Kleem” (Kali or Durga) is the object of reverence and research by the physical scientists. The plethora of scientific research and development depends on the “Kleem” element of Gayatri.

The “Hreem”,  “Shreem” and  “Kleem” elements of Gayatri have eternally existed in the cosmos. The modern western civilisation has particularly devoted itself to the management of  “Kleem” (Heat, light, electricity, magnetism, gravity, matter, nuclear energy etc.) and Shreem; whereas the occultists and mystics of East have remained particularly engaged in research of “Hreem”. It is evident that the key to lasting global peace harmony and prosperity lies in integral devotion of Hreem, Shreem and Kleem. Gayatri Sadhana is the super-science for mastery of these three aspects of the Divine Mother.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 21

शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

Govinda Gopala Murli Manohar Nandlala | गोविंदा गोपाला मुरली मनोहर नंदलाला



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Govinda Gopala Murli Manohar Nandlala | गोविंदा गोपाला मुरली मनोहर नंदलाला



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Essence of Worship-Intercession | Pt Shriram Sharma Acharya



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Essence of Worship-Intercession | Pt Shriram Sharma Acharya



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बुधवार, 13 नवंबर 2019

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृजनात्मक कदम उठाने की सम्भावना बनती है। खेत में कंकड़, पत्थर, झाड़ झंखाड़ जड़ जमाये बैठे हो तो उपयुक्त बीज बोने पर भी फसल न उगेगी। इस प्रसंग में सर्वप्रथम जोतने, उखाड़ने, बीनने और साफ करने का काम हाथ में लेना होगा। पहलवान बनने से पूर्व बीमारियों से छुटकारा पाना आवश्यक है। बर्तन में पानी भरने का प्रयत्न करने से पूर्व उसके छेद बन्द करने चाहिए। उद्यान लगाने वालों को पौधे चर जाने वाले पशुओं और फल कुतरने वाले पक्षियों से रखवाली का प्रबन्ध भी करना होता हैं।

जीवन साधना में सर्वप्रथम यह देखना होता है कि चिन्तन और व्यवहार में अवांछनीयताओं ने कहाँ-कहाँ अपने घोंसले बना रखे हैं। इन मकड़ जंजालों को सफा करना ही चाहिए। भोजन बनाने से पूर्व रसोईघर की, पात्र-उपकरणों की सफाई आवश्यक होती है अन्यथा गन्दगी घुस पड़ने से खाद्य सामग्री विषैली हो जायेगी और पोषण के स्थान पर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करेगी।

मलीनता साफ करने के उपरान्त ही बात बनती है। प्रातः उठते ही शौच, स्नान, मंजन, कंघी, साबुन, बुहारी का काम निपटाना पड़ता है तब अगली गतिविधियाँ अपनाने का कदम उठता है। जन्मते ही बालक गन्दगी में लिपटा आता है, सर्वप्रथम उस जंजाल से मुक्त कराने की व्यवस्था बनानी पड़नी है, सुन्दर कपड़े पहनाना उसके बाद होता है। त्यौहार मनाने का पहला काम है साफ सफाई। पूजा उपचार का भी प्रथम चरण यही है। प्रगतिशील स्थापनाओं का एक पक्ष दुष्ट दुरभिसंधियों से निपटना भी है अन्यथा अन्धी पीसे कुत्ता खाय वाली उक्ति चरितार्थ होती रहेगी। पानी खींचने से पहले कुँआ खोदना पड़ता है। नींव खोदना पहला और दीवार चुनना दूसरा काम है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 साधना का सत्य

मनुष्य हर तरफ से शास्त्र और शब्दों से घिरा है। लेकिन संसार के सारे शास्त्र एवं शब्द मिलकर भी साधना के बिना अर्थहीन हैं। शास्त्रों और शब्दों से सत्य के बारे में तो जाना जा सकता है, पर इसे पाया नहीं जा सकता। सत्य की अनुभूति का मार्ग तो केवल साधना है। शब्द से सत्ता नहीं आती है। इसका द्वार तो शून्य है। शब्द से निःशब्द में छलांग लगाने का साहस ही साधना है।
  
विचारों से हमेशा दूसरों को जाना जाता है। इससे ‘स्व’ का ज्ञान नहीं होता। क्योंकि ‘स्व’ सभी विचारों से परे और पूर्व है। ‘स्व’ के सत्य को अनुभव करके ही हम परम सत्ता-परमात्मा से जुड़ते हैं। इस परम भाव दशा की अनुभूति विचारों की उलझन और उधेड़-बुन में नहीं निर्विचार में होती है। जहाँ विचारों की सत्ता नहीं है, जहाँ शास्त्र और शब्द की पहुँच नहीं है, वहीं अपने सत्य स्वरूप का बोध होता है, ब्रह्मचेतना की अनुभूति होती है।
  
इस परम भावदशा के पहले सामान्य जीवन क्रम में चेतना के दो रूप प्रकट होते हैंः १. बाह्य मूर्छित - अन्तः मूर्छित, २. बाह्य जाग्रत् - अन्तः जाग्रत् । इनमें से पहला रूप मूर्छा-अचेतना का है। यह जड़ता का है। यह विचार से पहले की स्थिति है। दूसरा रूप अर्धमूर्छा का है, अर्ध चेतना का है। यह जड़ और चेतन के बीच की स्थिति है। यहीं विचार तरंगित होते हैं। चेतना की इस स्थिति में जो साधना करने का साहस करते हैं, उनके लिए साधना के सत्य के रूप में चेतना का तीसरा रूप प्रकट होता है। यह तीसरा रूप अमूर्छा - पूर्ण चेतना का है। यह पूर्ण चैतन्य है, विचारों से परे है।
  
सत्य की इस अनुभूति के लिए मात्र विचारों का अभाव भर काफी नहीं है। क्योंकि विचारों का अभाव तो नशे और इन्द्रिय भोगों की चरम दशा में भी हो जाता है। लेकिन यहाँ जड़ता के सिवा कुछ भी नहीं है। यह स्थिति मूर्छा की है, जो केवल पलायन है, उपलब्धि नहीं। सत्य को पाने के लिए तो साधना करनी होती है। सत्य की साधना से ही साधना का सत्य प्रकट होता है। यह स्थिति ही समाधि है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२३

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 5)

Q.7. Why is Gayatri represented as a deity with five faces?

Ans. Descriptions of deities and characters in mythology showing many heads and arms are common and may appear odd and paganish to a person not familiar with the subtleties of Indian spiritual tradition.  Brahma and Vishnu have been described as having four faces,  Shiva with five, Kartikeya with six, Durga with eight and Ganesha with ten heads. It is said that the demon king  Ravana had ten heads and twenty arms; and sahastrabahu, another demon had a thousand hands.

Here, the numbers do not refer to the physiology, but to characteristics of the divine or evil  attributes of the deities or demons as the case may be.

Indian spirituality frequently mentions five-fold classifications - such as the five basic elements of the cosmos (Tatvas); the five sheaths (Koshas) covering the human soul; the five organs each of perception and action in the human body (Gyanendriyas and Karmendriyas), the five life-forces (Prans); the five types of energies operating in human bodies (Agnis); the five types of Yoga ....etc. The Gayatri Mantra, too is divisible in five parts namely (1) Om (2) Bhurbhuwaha Swaha  (3) Tatsaviturvareniyam (4) Bhargo Devasya Dheemahi (5) Dhiyo Yonaha Prachodayat. Each of these corresponds to the five primary emanation of the supreme spirit: Ganesh, Bhawani, Brahma, Vishnu and Mahesh respectively. The entire super-science of spirituality too is encapsuled in the four Vedas and one Yagya.

The five faces of Gayatri refer to these Divine attributes, which the Sadhak has to deal with in course of Sadhana.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 20

मंगलवार, 12 नवंबर 2019

Tumhare Divya Darshan Ki | तुम्हारे दिव्य-दर्शन की | Pragya Bhajan Sangeet



Title

Significance of Birthday | Pt Shriram Sharma Acharya



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👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (अन्तिम भाग)

सन्तुलित मस्तिष्क का तात्पर्य भावना रहित बन जाना नहीं है। भले-बुरे को एक दृष्टि से देखने जैसी समदर्शिता की दुहाई देना भी सन्तुलन नहीं है। बुरे के प्रति सुधार और भले के प्रति उदार रहकर ही सन्तुलन बना रह सकता है। आँखों के सामने तात्कालिक लाभ का पर्दा उठ जाने, शरीर को ही सब कुछ मानकर उसी के परिकर को पोषित करते रहने की मोह माया ही भ्रान्तियों के ऐसे भण्डार जमा करती है जिन्हें विकृतियों का रूप धारण करते देर नहीं लगती। यही वह आँधी और तूफान है जिसके कारण उठने वाले चक्रवात समस्वरता बिगाड़कर रख देते है और ऐसा कर गुजरते हैं जिनके कुचक्र में फँसने के उपरान्त मनुष्य न जीवितों में रहे न मृतकों में, न बुद्धिमानों में गिना जा सके और व विक्षिप्तों में।

मलीनताएँ हर कहीं कुरूपता उत्पन्न करती है। गन्दगी जहाँ भी जमा होगी वहीं सड़न उत्पन्न करेगी। इस तथ्य को समझने वालों को एक और भी जानकारी नोट करनी चाहिए कि मनःक्षेत्र पर चढ़ी हुई मलीनता जिसे मल, आवरण या कषाय कल्मष के नाम से जाना जाता है, अन्य सभी मलीनताओं की तुलना में अधिक भयावह है। अन्य क्षेत्रों की गन्दगी मात्र पदार्थों को ही प्रभावित करती है, पर मनःक्षेत्र की गन्दगी न केवल मनुष्य को स्वयं दीन दयनीय, पतित और घृणित बनाती है वरन् उसका सम्पर्क क्षेत्र भी विषाक्त होता है। छूत की संक्रामक बीमारियों की तरह चिन्तन की निकृष्टता भी ऐसी है, जो जहाँ उपजती है उसका विनाश करने के अतिरिक्त जहाँ तक उसकी पहुँच है वहाँ भी विनाशकारी वातावरण उत्पन्न करती है।

मानसिक स्वच्छता के लिए जागरूकता बरती जानी चाहिए और विचारणा को श्रेष्ठ कार्यों में, सदुद्देश्य में नियोजित करने की बात सोचनी चाहिए। इसी में दूरदर्शी और सराहनीय विवेकशीलता है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अन्तःलोक का आलोक

हवा के एक झोंके ने मिट्टी का दीया बुझा दिया। मिट्टी के दीयोंं का भरोसा भी क्या? कब टूटे और बिखरकर मिट्टी में मिल गए। उन ज्योतियों का साथ भी कितना, जिन्हें हवाएँ जब-तब बुझा सकती हैं। ज्योति के बिना जीवन अँधेरों में डूब जाता है। ये अँधेरे सदा ही भयावह होते हैं। जिन्हें अनुभव है, वे जानते हैं कि अँधेरे में प्राण कँप जाते हैं और साँसें लेना भी कठिन हो जाता है।
  
जीवन ही नहीं जगत् भी अँधेरे से घिरा है। ऐसी कोई भी ज्योति इस जगत् में नहीं है, जो अँधेरे को पूरी तरह मिटा दे। जो भी ज्येातियाँ हैं, उन्हें देर-सबेर हवाओं के झोंके अँधेरों में डुबा देते हैं। ये जलती है और बुझ जाती हैं, पर अँधेरे की सघनता जस की तस बनी रहती है। जगत् में फैला हुआ अँधेरा शाश्वत है। जो इस जगत् की ज्योतियों पर भरोसा करते हैं, वे नासमझ हैं, क्योंकि ये ज्योतियाँ सब की सब आखिरकार अँधेरे से हार जाती हंैं।
  
अंधकार से भरे इस जगत् से परे एक और लोक भी है। जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है। इस बाहरी जगत् में प्रकाश क्षणिक और सामयिक है एवं अँधेरा शाश्वत है, तो इस आन्तरिक जगत् में अंधकार क्षणिक व सामयिक है और प्रकाश शाश्वत है। अचरज की बात यह है कि यह प्रकाश लोक हमारे बहुत निकट है, क्योंकि अंधकार बाहर है और प्रकाश भीतर।
  
याद रहे, जब तक अन्तःलोक के आलोक में जागरण नहीं होता, तब तक कोई भी ज्योति अभय नहीं दे पाती। जरूरत इस बात की है कि मिट्टी के मृण्मय दीपों पर भरोसा छोड़ा जाय और चिन्मय ज्योति को खोजा जाय। क्योंकि यही अभय, आनन्द और आलोक का स्रोत है। अँधेरे से घबराहट और आलोक की चाहत यह जताती है कि हमारी वास्तविकता प्रकाश ही है। क्योंकि आलोक ही आलोक के लिए प्यासा हो सकता है। जहाँ से प्रकाश की चाहत पनप रही है, वहीं खोजो, अन्तःलोक का आलोक, चिन्मय ज्योति का स्रोत वहीं छिपा है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२२

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 4)

Q.6. Why is the Primordial Divine Energy (Gayatri) represented in so many forms (idols)?

Ans. God is omnipresent. The primordial Divine Energy symbolized as Gayatri take up numerous forms and functions in innumerable ways. The analogy of an actor will illustrate the point. An actor in a play has to wear different costumes on various occasions to portray different roles.  For each role, he is made to don specific garments with appropriate ornamentation and adopts suitable histrionics. The person chooses the deity according to one’s need. During Trikal Sandhya for instance, the trinity Brahmi - Vaishnavi - Shambhavi is invoked. Aspirants for strength and success in worldly pursuits worship Durga; for prosperity, Lakhyami; for scholarship and cultural excellence, Saraswati; and so on.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 19

Ram Janmabhoomi ( Ram Mandir ) शुभ कामना- सदभावना सन्देश :- प्रमुख - गाय...



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सोमवार, 11 नवंबर 2019

Building a Person, his Family and his Society | Pt Shriram Sharma Acharya



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Teen Ganthen | तीन गांठें | Motivational Story



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👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 11 Nov 2019



👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग ५)

उत्कृष्ट व्यक्तित्व का एक ही पक्ष है- भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं का दमन, न्यूनतम निर्वाह की अपरिग्रह परम्परा का वरण। जिनकी निजी महत्त्वाकांक्षाएँ अभिलाषाएँ, तृष्णा, लिप्साएँ असाधारण रूप से उभरी होती है, उनके लिए यह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता कि वे नीति-नियमों का व्यतिरेक न करें। इसी प्रकार यह भी नहीं बन पड़ता कि समय, श्रम या साधनों का उपार्जन से कम उपयोग अपने लिए करें और उस बचत को उच्च स्तरीय प्रयोजनों के लिए नियोजित करें। लिप्सा में भौतिक दोष यह है कि उसकी तृप्ति की कोई मर्यादा नियत नहीं रहती। कमी कभी दूर नहीं होती और अधिक कमाने, जोड़ने, उड़ाने की व्याकुलता उसी अनुपात से बढ़ती चली जाती है। फल यह होता है कि आदर्शवादिता की मात्र उथली चर्चा या खोखली विडम्बना ही बन पाती है। वैसा कोई ठोस प्रयत्न नहीं बन पड़ता जैसा कि उत्कृष्ट जीवन के लिए अपेक्षित है। अतएव निस्पृह जीवन के लिए यह अनिवार्य है कि भौतिक आकाँक्षाओं और आवश्यकताओं को उतना नियन्त्रित किया जाय कि वे लगभग औसत नागरिक स्तर की जा पहुँचे। आत्म-निर्माण का, आत्म-परिष्कार का सुनियोजन इससे कम में नहीं बन पड़ता।

अध्यात्म जीवन जीने की एक शैली है। पूजा उपचार उसके लिए भावनात्मक पृष्ठभूमि बनाने वाले उपचार हैं। उपासनात्मक क्रिया-कृत्यों को याचना, रिश्वत, जेबकटी, बाजीगरी के रूप में जो अपनाते हैं, वे भूल करते हैं। देवताओं को मन्त्रबल से वशवर्ती बनाकर उनसे उचित अनुचित कुछ करा लेने की दुरभिसन्धि में नियत व्यक्ति जब अपनी दुरभिसन्धियों को भक्ति भावना, योग साधना आदि का नाम देते हैं, तब हँसी रोके नहीं रुकती। बाल क्रीड़ाओं से यदि ऊँचा उठा जा सके, तो अध्यात्म का एक मात्र यही स्वरूप रहा जाता है कि व्यक्तित्व को अधिकतम पवित्र, प्रखर एवं उदात्त बनाया जाय। जो क्षमता विभूतियाँ उपलब्ध हैं उन्हें सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए लगाया जाय। वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श हर घड़ी सामने रखकर अपनेपन का दायरा इतना बड़ा बना दिया जाय कि आत्मवत् सर्वभूतेषु की प्रतीति होने लगे। दूसरों के दुःख को बँटा लेने और अपने सुख को बाँट देने की उमंग इतनी उमगे कि उसे रोक सकने में संकीर्ण स्वार्थपरता कोई व्यवधान प्रस्तुत न कर सकें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 साधना से सिद्धि

साधना की गयी पर सिद्धि नहीं मिली। तप तो किया गया, पर तृप्ति नहीं मिली। अनेकों साधकों की विकलता यही है। लगातार सालों-साल साधना करने के बाद वे सोचने लगते हैं, क्या साधना का विज्ञान मिथ्या है? क्या इसकी तकनीकों में कोई त्रुटि है? ऐसे अनेकों प्रश्न कंटक उनके अन्तःकरण में हर पल चुभते रहते हैं। निरन्तर की चुभन से उनकी अन्तरात्मा में घाव हो जाता है। जिससे वेदना रिसती रहती है। बड़ी ही असह्य होती है चुभन और रिसन की यह पीड़ा। बड़ा ही दारुण होता है यह दर्द।
  
महायोगी गोरखनाथ का एक युवा शिष्य भी एक दिन ऐसी ही पीड़ा से ग्रसित था। वेदना की विकलता की स्पष्ट छाप उसके चेहरे पर थी। एक छोटे से नाले को पार करके वह एक खेत की मेड़ पर हताश बैठा था। रात प्रायः बीत गयी थी। खेतों पर सुबह का सूरज फैलने लगा था। पास से गुजरती बैलगाड़ी की आवाज सुनकर चाँदनी के फूलों-सी बगुलों की पात सूरज की ओर उड़ गयी। इनकी ओर उसने बड़ी ही निराश नजरों से देखा। तभी उसे पास के खेत से ही गोरखनाथ आते दिखाई दिये।
  
उनके चरणों पर सिर रखकर प्रणाम करते हुए उसने पूछा- गुरुदेव! मेरी वर्षों की साधना निष्फल क्यों हुई? भगवान् मुझसे इतना रूठे क्यों हैं? महायोगी हँसे और कहने लगे-पुत्र! कल मैं एक बगीचे में गया था। वहाँ कुछ दूसरे युवक भी थे। उनमें से एक को प्यास लगी थी। उसने बाल्टी कुएँ में डाली, कुआँ गहरा था। बाल्टी खींचने में भारी श्रम पड़ा। लेकिन जब बाल्टी लौटी तो खाली थी। उस युवक के सभी साथी हँसने लगे।
  
मैंने देखा-यह बाल्टी तो ठीक मनुष्य के अन्तःकरण जैसी है, इसमें छेद ही छेद हैं। बस यह कहने भर को बाल्टी थी, उसमें छेद ही छेद थे। बाल्टी कुएँ में गयी, पानी भी भरा, पर सब बह गया। वत्स! साधक के मन की यही दशा है। इस छेद वाले मन से कितनी ही साधना करो, पर छेदों के कारण सिद्धि नहीं मिलती। इससे कितना ही तप करो पर तृप्ति नहीं मिलती। सिद्धि और तृप्ति चाहिए तो पहले मन के छेदों को मिटाओ। अपने दोष, दुर्गुणों को दूर करो।
  
पहले संयम-तब साधना -फिर सिद्धि। यही साधना से सिद्धि का मर्म है। अपने मन की बाल्टी ठीक हो तो साधना सिद्धिदायी होती है। मन की बाल्टी में छेद हो तो तप तो खूब होता है, पर तृप्ति नहीं मिलती। भगवान् कभी भी किसी से रूठे नहीं रहते। बस साधक के मन की बाल्टी ठीक होनी चाहिए। कुआँ तो सदा ही पानी देने के लिए तैयार है। उसकी ओर से कभी भी इन्कार नहीं है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ ११९

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 3)

👉 In what way the twenty-four emanations of Divine Mother (Matrikas) represent Gayatri?

★  As various organs perform specific functions in the human body, the primary divine energies inherent in the Primordial Supreme Power (Adyashakti) of God have been  conceived as twenty-four motherly emanations or nine Devis (female deities) - since, amongst the living beings in the world, only the female of the species is capable of creation.

👉 Are Gayatri and Savitri different?

★ Not exactly. They are different expressions of the Supreme Power of God. As such they are opposite faces of the same coin. Gayatri (idolised with nine faces) and Savitri (idolised with five faces) in fact identify the extra-sensory and sensory excellence in human life which are known as Riddhis and Siddhis in yogic parlance. Gayatri and Savitri are inseparable - inherent like heat and light in fire.

👉  What are the specific divine emanations associated with Gayatri and Savitri?

★ As mentioned in the answers to Q.No. 4, Gayatri and Savitri are two sides of the same coin. Gayatri has been referred to by innumerable names. Amongst its significant twenty-four thousand aliases, 24 represent its principal emanations. Twelve of these have been idolized for practical spiritual growth and the remaining twelve for material gains. These are enumerated as:

A) Emanations worshipped for spiritual growth (Adhyatmik pragati)
1) Adyashakti  2) Brahmi  3) Vaishnavi  4) Shambhavi     5) Vedmata   6)Devmata  7) Vishwamata  8) Ritambhara    9) Mandakini  10) Ajapa  11) Riddhi  12) Siddhi
  
B) Emanations worshipped for material gains
1) Savitri 2) Saraswati 3) Lakhyami 4) Durga 5) Kundalini 6) Pranagni 7) Bhawani 8) Bhuwaneshwari 9) Annapurna 10) Mahamaya 11) Payaswani 12)  Tripura    (For details please refer to the publication ‘Gayatri  ki Chaubis Shakti Dharaein’ in Hindi- Published by this mission.)

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 17-18

रविवार, 10 नवंबर 2019

👉 ख़ोज परमात्मा की: -

सुना है कि कोलरेडो में जब सबसे पहली दफा सोने की खदानें मिलीं, तो सारा अमेरिका दौड़ पड़ा कोलरेडो की तरफ। खबरें आईं कि जरा सा खेत खरीद लो और सोना मिल जाए। लोगों ने जमीनें खरीद डालीं।

एक करोड़पति ने अपनी सारी संपत्ति लगाकर एक पूरी पहाड़ी ही खरीद ली।

बड़े यंत्र लगाए। छोटे—छोटे लोग छोटे—छोटे खेतों में सोना खोद रहे थे, तो पहाड़ी खरीदी थी, बड़े यंत्र लाया था, बड़ी खुदाई की, बड़ी खुदाई की। लेकिन सोने का कोई पता न चला।

फिर घबड़ाहट फैलनी शुरू हो गई। सारा दांव पर लगा दिया था। फिर वह बहुत घबड़ा गया। फिर उसने घर के लोगों से कहा कि यह तो हम मर गए, सारी संपत्ति दांव पर लगा दी है और सोने की कोई खबर नहीं है!

फिर उसने इश्तहार निकाला कि मैं पूरी पहाड़ी बेचना चाहता हूं मय यंत्रों के, खुदाई का सारा सामान साथ है।

घर के लोगों ने कहा, कौन खरीदेगा? सबमें खबर हो गई है कि वह पहाड़ बिलकुल खाली है, और उसमें लाखों रुपए खराब हो गए हैं, अब कौन पागल होगा?

लेकिन उस आदमी ने कहा कि कोई न कोई हो भी सकता है।

एक खरीददार मिल गया। बेचनेवाले को बेचते वक्त भी मन में हुआ कि उससे कह दें कि पागलपन मत करो; क्योंकि मैं मर गया हूं। लेकिन हिम्मत भी न जुटा पाया कहने की, क्योंकि अगर वह चूक जाए, न खरीदे, तो फिर क्या होगा? बेच दिया।

बेचने के बाद कहा कि आप भी अजीब पागल मालूम होते हैं; हम बरबाद होकर बेच रहे हैं! पर उस आदमी ने कहा, जिंदगी का कोई भरोसा नहीं; जहां तक तुमने खोदा है वहां तक सोना न हो, लेकिन आगे हो सकता है। और जहां तुमने नहीं खोदा है, वहां नहीं होगा, यह तो तुम भी नहीं कह सकते। उसने कहा, यह तो मैं भी नहीं कह सकता।

और आश्चर्य—कभी—कभी ऐसे आश्चर्य घटते हैं— पहले दिन ही, सिर्फ एक फीट की गहराई पर सोने की खदान शुरू हो गई। वह आदमी जिसने पहले खरीदी थी पहाड़ी, छाती पीटकर पहले भी रोता रहा और फिर बाद में तो और भी ज्यादा छाती पीटकर रोया, क्योंकि पूरे पहाड़ पर सोना ही सोना था। वह उस आदमी से मिलने भी गया। और उसने कहा, देखो भाग्य!

उस आदमी ने कहा, "भाग्य नहीं, तुमने दांव पूरा न लगाया, तुम पूरा खोदने के पहले ही लौट गए। एक फीट और खोद लेते!"

हमारी जिंदगी में ऐसा रोज होता है। न मालूम कितने लोग हैं जो खोजते हैं परमात्मा को, लेकिन पूरा नहीं खोजते, अधूरा खोजते हैं; ऊपर—ऊपर खोजते हैं और लौटे जाते हैं। कई बार तो इंच भर पहले से लौट जाते हैं, बस इंच भर का फासला रह जाता है और वे वापस लौटने लगते हैं। और कई बार तो  साफ दिखाई पड़ता है कि यह आदमी वापस लौट चला, यह तो अब करीब पहुंचा था, अभी बात घट जाती; यह तो वापस लौट पड़ा।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 10 Nov 2019


👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग ४)

स्वर्ग में देवता रहते हैं। उनके पास दैत्यों की तुलना में वैभव की कमी होती है। आक्रमण के क्षेत्र में भी पहल उन्हीं की होती है। फिर भी गौरव देवत्व के हिस्से में ही रहा है। वन्दन, अभिनन्दन और अनुकरण भी उन्हीं का होता रहा है। इस क्षेत्र में प्रवेश करने में किसी को कठिनाई नहीं, अड़चन इतनी भर है कि कुसंस्कारिता के चक्रव्यूह से निकलने का प्रयत्न सच्चे मन से किया जाय। इसके लिए आदर्शों की गरिमा समझने की आवश्यकता है। यदि हनुमानों और अर्जुनों का उदाहरण सामने न रहा, कठिनाइयों की कीमत पर गौरव खरीदने का साहस न उभरा तो क्षणिक आवेश की बबूले जैसी दुर्गति होती फिरेगी।

संतुलित मस्तिष्क का प्रधान गुण है दूरदर्शी विवेकशीलता। इसके प्रकट होते ही मनुष्य तत्काल की सीमा को तोड़कर भविष्य पर दृष्टि डालता है। किसान, विद्यार्थी, व्यवसायी की तरह पूँजी लगाकर समयानुसार अधिक लाभ उपार्जन का लाभ दीख सकता है। बीज गलता तो है पर इसमें वह कुछ खोता नहीं। भूमि के साथ आत्मसात् होकर उसे देखते-देखते अंकुरित पल्लवित और फलित होने वाले विशाल वृक्ष का सुयोग मिलता है। दूरदर्शिता इससे कम में सन्तुष्ट नहीं होती। उसका अनादिकाल से एक ही परामर्श रहा है, महान के लिए तुच्छ को त्यागा जाय। कामना का भावना पर उत्सर्ग किया जाय। क्षुद्रता का महानता के पक्ष में विसर्जन किया जाय। भक्त को भगवान की प्राप्ति के लिए यही करना पड़ता है। महानता इससे कम में सधती नहीं।

जीवन का एक रूप है जिसमें ललक लिप्सा के लिए आदर्शों को गँवाना पड़ता है और महानता की ओर से मुँह मोड़ना पड़ता है। इतने पर भी यह निश्चित नहीं कि वाँछित कामनाओं की पूर्ति भी हो सकेगी या नहीं जीवन का दूसरा रूप है महानता का, जिसमें महामानवों ने श्रद्धापूर्वक प्रवेश किया है और देवोपम गौरव और स्वर्ग जैसा सन्तोष सौजन्य का भरपूर रसास्वादन किया है। दोनों में से किसे चयन किया जाय। इसी के निर्धारण में उस सूझ-बूझ का परिचय मिलता है, जिसे मनोजयी, धीर-वीर अपनाते और असंख्यों के लिए अनुगमन की पथ रेखा विनिर्मित करते है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन का संदेश -वासना नहीं विवेक

वासना या विवेक दो में से एक का चुनाव करना ही पड़ता है। जिन्दगी या तो वासना के पीछे भागती है अथवा फिर विवेक का अनुसरण करती है। वासना तृप्ति का भरोसा दिलाती है, लेकिन अतृप्ति को और अधिक गहरा करती है। इसलिए वासना के पीछे भागने के लिए आँखों का बन्द होना जरूरी है। जो आँखें खोलकर चलने का साहस करते हैं, वे अपने ही आप विवेक को पा जाते हैं और विवेक की आग में सारी अतृप्ति वैसे ही भाप बनकर उड़ जाती है, जैसे सूरज की तपन में ओस कण।
  
प्राणिविज्ञानी लिबमैन ने एक खास तरह के कीड़ों का जिक्र किया है। ये कीड़े हमेशा ही अपने नेता कीड़े के पीछे चलते हैं। लिबमैन ने एक बार इन कीड़ों को एक गोल थाली में रख दिया। उन सबने चलना शुरू किया और फिर चलते गये। इस गोल रास्ते का कोई अन्त तो था नहीं, लेकिन उन्हें भला इसका क्या पता था? वे तो बस चल रहे थे, चलते जा रहे थे। आखिरकार वे उस समय तक चलते रहे, जब तक कि थक कर गिर नहीं गये और गिर कर मर नहीं गये।
  
वासनाओं के पीछे भागते हुए व्यक्तियों की दशा भी कुछ इसी तरह की है। मौत से पहले वे कभी नहीं जान पाते कि जिस मार्ग पर वे हैं, वह मार्ग नहीं, चक्कर है। मार्ग की कोई मञ्जिल होती है। यह कहीं पहुँचाता है। लेकिन चक्कर तो बस गोल-गोल घुमाता है, पहुँचाता कहीं भी नहीं। जो वासनाओं के पीछे दौड़ रहे हैं, वे भी बस चलते जाते हैं। वे यह भी विचार नहीं कर पाते कि जिस राह पर वे हैं, वह कहीं कोल्हू का चक्कर तो नहीं? वासनाओं की राह गोल है। घूम-फिर कर हम वहीं उन्हीं वासनाओं पर अटक जाते हैं।
  
दुष्पूर वासनाओं के पीछे चलकर भला कब, कौन, कहाँ पहुँचा है? इस राह पर न तो तृप्ति है, न तुष्टि और न ही शान्ति। कम ही ऐसे भाग्यशाली होते हैं जो अपनी मौत से पहले इस अज्ञानपूर्ण अन्ध भटकन से उबर कर विवेक का अनुसरण करने लगते हैं। विवेक उन्हें एक साथ सब कुछ दे देता है। महर्षि रमण कहते थे, जो वासनाओं के अन्धकार में जी रहे हैं, उनके लिए मेरे हृदय में आँसू भर आते हैं, क्योंकि उन्हें अतृप्ति, असंतुष्टि और अशान्ति के सिवाय कुछ नहीं मिलेगा। उस आदमी से बढ़कर रास्ते से भटका हुआ कौन है, जो कि वासनाओं के पीछे चलता है। इसलिए जीवन का यही एक संदेश है- वासना नहीं, केवल विवेक।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ ११७

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions Q.2

Q.2. Why is Gayatri visualized as a young woman with its peculiar ornaments?

One should not be under the illusion that Gayatri is a living being with one mouth and two arms or five mouths and ten arms. Woman has intrinsic superiority over man and so Gayatri is given mother’s form. Having Kamandal and a book in Gayatri Mata’s hands are symbolic of knowledge and science. There is no living being in the world having five mouths and ten arms. This is just a symbolic representation. Five mouths signify Panch-kosh  as the five, sheaths of  human existence and ten arms represent ten characteristic features of religion.
          
The symbolism of Mother Gayatri sitting on a swan is that the Sadhak should keep discriminative wisdom like a royal swan or Paramhans. It is said about the mythological Rajhans (royal swan) that it has the power to discriminate the good from the bad, to separate milk from water, to pick up only pearls and leave pebbles. It never eats worms and insects. This is an example of the soul status  of a Param-hansa. Ordinarily swans live on insects, neither consume  milk nor dive to the depths of the ocean to find pearls. The representation of God and powers of Divinity as female deities is a unique feature of Indian spirituality.

There are compelling reasons for this insight. Nature has exclusively equipped the female of the species with powers of reproduction and sustenance of the infant. The expression of selfless love of a mother can only be the true representation of love of God for human beings. Hence, Gayatri has been conceived as Mother. Since, Divinity never grows old and is eternally young and beautiful, Mother Gayatri is shown as young attractive maiden. Besides, meditating on a beautiful woman as symbolic of Divinity also helps one develop a platonic - pious attitude towards women in general. The lotus as Her seat means the presence of Divinity in an environment which  is fragrant, pleasant and blossomingly cheerful.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions

शुक्रवार, 8 नवंबर 2019

👉 करुणा से खिलता है प्रेम

एक फूल को मैं प्रेम करता हूँ, इतना प्रेम करता हूँ कि मुझे डर लगता है कि कहीं सूरज की रोशनी में कुम्हला न जाये और मुझे डर लगता है कि कहीं जोर की हवा आये, इसकी पंखुड़ियाँ न गिर जायें और मुझे डर लगता है कि कोई जानवर आ कर इसे चर न जाये और मुझे डर लगता है कि पड़ोसी के बच्चे इसको उखाड़ न लें, तो मैं फूल के पौधे को मय गमले के तिजोरी में बंद करके ताला लगा देता हूँ। प्रेम तो मेरा बहुत है, लेकिन करुणा मेरे पास नहीं है।
  
मैंने पौधे को बचाने के सब उपाय किये। धूप से बचा लिया, हवा से, जानवरों से। मजबूत तिजोरी खरीदी, इसको भी मेहनत करके बनाया, ताला लगा कर पौधे को बंद कर दिया, लेकिन अब यह पौधा मर जायेगा। मेरा प्रेम इसे बचा नहीं सकेगा और जल्दी मर जायेगा। हो सकता था बाहर हवाएँ थोड़ी देर लगातीं और पड़ोसी के बच्चे हो सकता था, इतनी जल्दी न भी आते और सूरज की किरणें फूल को इतनी जल्दी न मुर्झा देतीं, लेकिन तिजोरी में बंद पौधा जल्दी ही मर जायेगा। प्रेम तो पूरा था, लेकिन करुणा जरा भी न थी।
  
जगत् में प्रेम भी रहा है, दया भी रही है, लेकिन करुणा नहीं। करुणा का अनुभव ही नहीं रहा है। और करुणा का अनुभव आये, तो ही हम जीवन को बदलेंगे और करुणा से अगर दया निकले तो वह दया नकारात्मक न रह जायेगी। उसमें अहंकार की तृप्ति न होगी। और करुणा से अगर अहिंसा निकले तो वह निषेधात्मक न रह जायेगी। वह सिर्फ इतना न कहेगी कि दुःख मत दो, वह यह भी कहेगी दुःख मिटाओ भी, दुःख बचाओ भी, दुःख से मुक्त भी करो, सुख भी लाओ। और अगर करुणा से प्रेम निकले तो प्रेम मुक्तिदायी हो जायेगा, बंधनकारी नहीं रह जायेगा।
  
सद्गुरु का प्रेम ऐसा ही है। इन वासन्ती क्षणों में करुणा की यह महक बह रही है। यह महक है सद्गुरु की करुणा की। शिष्यवत्सल गुरुवर का प्रेम करुणा से आपूरित है। यह हमारे सामान्य मानवीय दोष-दुर्बलताओं से मुक्त है। प्रेम की सम्पूर्ण उर्वरता इसमें मौजूद है। इसमें संघर्ष है तो सृजन भी है। प्रगति व विकास के चहुँमुखी छोर इसमें है। व्यक्तित्व के बहुआयामी विकास की चमक इसमें है। गुरु स्मरण से मिलने वाला करुणा से आपूरित गुरुप्रेम वसन्त पर्व के इन पावन क्षणों में हम सबको सहज सुलभ है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ ११६

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

विचार ही कर्म के बीज हैं | Vichar Hi Karm Ke Beej Hai | Pt Shriram Sharm...



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👉 मेरा कुछ नहीं

मेरे पास एक मकान है, जिसे मैंने खरीदा है और इधर-उधर से सुधारकर खूबसूरत शिष्ट व्यक्तियों के रहने योग्य बना लिया है। मैं इस पर खूब व्यय करता हूँ। प्रति वर्ष पुताई और रोगन सफाई चित्रों में व्यय करता हूँ।

पर क्या यह वास्तव में मेरा है? नहीं, कदापि नहीं। मेरे इसमें आने से पूर्व न जाने वह जमीन जिस पर यह खड़ा है, कितने व्यक्तियों के अधिकार में आकर निकली होगी? इस घर में कितने ही व्यक्ति आते जाते रहे होंगे? कोई मर कर, कोई गरीबी के कारण, कोई प्रकृति के किसी आक्रमण द्वारा बिखर गये होंगे, और तब मेरे पास आया होगा, यह मकान। मेरे जन्म से पूर्व यह मकान किसी और का था, मेरी मृत्यु के पश्चात न जाने इसका वासी कौन कहे, कौन होगा? पर यह निश्चय है, यह मेरा नहीं है। मैं जब तक जिन्दा हूँ इसमें आश्रय भर लेता हूँ, बस। केवल मेरा इससे इतना ही सरोकार है।

कृषक का खेत उसका सर्वत्व है। वह उसे रखने के लिए असंख्य आफतें मोल लेता है। सम्पूर्ण आयु पर्यन्त उसे अच्छा बनाने, उपज की वृद्धि में प्रयत्नशील रहता है, पर मूर्ख यह नहीं सोचता कि उसका वास्तव में कुछ नहीं! न जाने वह खेत कितने व्यक्तियों के पास से गुजर चुका है। भविष्य में न जाने कितने उसके मालिक बनेंगे।

मेरे हाथ में एक रुपया आ जाता है। मैं इसे अपना कहता हूँ। प्यार करता हूँ। प्यार से बटुए में छिपा कर रखता हूँ। थोड़ी देर के लिए मैं भूल जाता हूँ कि यह रुपया आवारा है। एक जगह नहीं टिकता इसकी गति बड़ी तीव्र है। एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे, तीसरे से चौथे, पाँचवें, पचासों, हजारों हाथों में यह चलता फिरता रहता है। किसी एक का नहीं बनता। किसी एक का होकर नहीं रहता। फिर, मैं भी कैसा मूर्ख हूँ जो इसे अपना अपना कहकर घमण्ड में फूल उठता हूँ। मैं क्यों यह ध्रुव सत्य विस्मृत कर बैठता हूँ कि इससे मेरा क्षणिक सम्बन्ध है। न जाने कल यह किसके पास होगा। इसका भावी कार्यक्रम गतिविधि क्या है?

मेरे पास असंख्य पुस्तकें हैं, घर की सैकड़ों छोटी बड़ी वस्तुएं हैं, आराम की वस्तुएँ हैं, गाय और भैंसें हैं, साइकिल मोटर है, अच्छे वस्त्र हैं, क्या इनसे मेरा सच्चा रिश्ता है, क्या ये सदा मेरी होकर रहने वाली हैं।

मैं फिर भूलता हूँ। क्षुद्र साँसारिक वस्तुओं के लोभ में इन्हें ‘अपना’ कहने की मूर्खता करता हूँ। मैं प्रमाद एवं अज्ञानवश यह समझने लगता हूँ कि ये मेरे व्यक्तित्व, मेरी आत्मा के अंग हैं। यही मेरी बड़ी गलती है। ये नाना वस्तुएँ भला क्योंकर मेरी हो सकती हैं। न जाने किस किस का इन पर कब कब अधिकार रहा होगा। थोड़ी देर के लिये ये मेरे पास एकत्रित हो गई हैं। फिर न जाने कौन कहाँ बिखर जायेगी।

मैं बाल बच्चों का पिता हूँ। मेरी पत्नी बच्चों से अपने को पृथक नहीं कर पाती। ‘हमारे बच्चे बड़े होंगे, हमें न जाने किस किस प्रकार से सहायता प्रदान करेंगे, हमारे दुःख दूर करेंगे।’ मैं भी कभी कभी यही समझने की मूर्खता कर बैठता हूँ। पर क्या वास्तव में ये बच्चे हमारे हैं? क्या हम ही इनके सब कुछ हैं? क्या इनका कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व, आशा अभिलाषा, इच्छाएँ नहीं हैं? नहीं, ये हमारे नहीं हैं? हमारा इनसे क्षणिक सम्बन्ध है जिस प्रकार पक्षियों के बच्चे समर्थ हो जाने पर उड़ जाते हैं, लौटकर फिर माँ-बाप के पास आकर नहीं रहते, उसी प्रकार ये मानव परिन्दे न जाने कब, कहाँ, किस ओर, किस अभिलाषा से उड़ जाने वाले हैं। फिर मैं इन्हें क्योंकर अपना कह सकता हूँ?

मैं अपने शरीर को ‘अपना’ ‘अपना’ कहता हूँ। साज शृंगार में यथेष्ट समय व्यय करता हूँ। शीशे में शक्ल देख कर फूला नहीं समाता। अपने नेत्र, कपोल नासिका, मुखमुद्रा को सर्वश्रेष्ठ समझता हूँ। अपने शरीर के प्रत्येक अवयव पर मुझे गर्व है। पर क्या वास्तव में यह शरीर मेरा है?

शरीर मेरा नहीं। वह तो हाड़, माँस, रक्त, मज्जा, तन्तु, वीर्य इत्यादि का पुतला मात्र है। क्या मैं उदर, मुख, पाँव, सिर इत्यादि हूँ? क्या मैं रक्त हूँ, माँस हूँ? अस्थियों का पिंजर हूँ? क्या मैं श्वांस हूँ, वाणी हूँ? क्या हूँ?

वास्तव में उपरोक्त वस्तुओं में से मेरा कुछ भी नहीं है। इन सब साँसारिक पदार्थों से मेरा सम्बन्ध क्षणिक, अस्थायी और झूठा है। अज्ञान तिमिर में मुझे इन वस्तुओं से अपना साहचर्य प्रतीत होता है। मैं तो आत्मा हूँ। इस शरीर रूपी पिंजरे में अल्पकाल के लिये आ बँधा हूँ। मैं ईश्वर का दिव्य अंश हूँ। संसार से निर्लिप्त हूँ। साँसारिक वस्तुओं से मेरा संबंध क्षणिक है। यदि मैं अल्प लोभ के वश स्वार्थ और तृष्णा में लिप्त होता हूँ, तो यह मेरा अज्ञान है, मूढ़ता है।

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1953/May/v1.14

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 7 Nov 2019




👉 Gayatri Sadhna truth and distortions Q.1

Q.1. Why is an idol or picture used for worship of God, who is formless? Are there more then one Gayatri?
Ans. It is an oft-repeated question. It should be understood that basic purpose of worship is meditation and contemplation; and name and form are essential for meditation. Everywhere people coordinate feelings and symbols in order to refine their sentiments. Every nation has its own national flag. Its citizens pay reverence to the national flag and get infuriated  when it is insulted. Even communists, who consider themselves atheists offer salutation to the red flag and when they go to Russia they pay a visit to Leningrad to have a glimpse of the place where Lenin’s embalmed body has been kept. Muslims who do not believe in idol worship offer their prayers  facing Kaba. They kiss the symbolic stone ‘Sang Asavad’ of Syah Moosa in Mecca.

Arya Samajists express divine faith in the letter ‘Om’ and in performing Agnihotra. The obvious reason is that it is convenient to concentrate the mind with the help of symbols. The work of teaching the alphabet to children becomes easy when it is done through pictorial symbols as Ka- Kabutar, Kha-Khargosh, Ga- Gamla, Gha- Ghadi, and so on in Hindi. The same principle applies to installation of idols of gods and goddesses. The Gayatri mahamantra does not have any other form or variant. Its authentic classical form comprises a syntax of just twenty-four letters encompassing three verses of eight letters each, three Vyahritis and one Onkar (o-o-o-m).

It is this ancient Mantra which is used during the traditional Sandhyavandan and for Gurudeekcha during Yagyopaveet ceremony. It is also known as the Guru Mantra. It appears that the other variants of Gayatri had been fabricated during the dark Middle Ages by founders of various sects to propagate their own pre-eminence.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions

👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग ३)

सन्तुलित मस्तिष्क की पहचान यह नहीं है कि वह शिथिलता, निष्क्रियता अपनाये और संसार को माया मिथ्या बताकर बे सिर-पैर उड़ाने उड़ने लगें। विवेकवान उद्विग्नता छोड़ने पर पलायन नहीं करते। वे कर्तव्य क्षेत्र में अंगद की तरह अपना पैर इतनी मजबूती से जमाते हैं कि असुर समुदाय पूरी शक्ति लगाकर भी उखाड़ने में सफल न हो सके। प्रलोभनों और दबावों से जो उबर सकता है, उसी के लिये यह सम्भव है कि उत्कृष्टता को वरण करे और आँधी तूफानों के बीच भी अपने निश्चय पर चट्टान की तरह अडिग रहे। इसके लिए उदाहरण, प्रमाण ढ़ूँढ़ने हों, साथी, सहचर, समर्थक ढ़ूँढ़ने हों तो इर्द-गिर्द नजर न डालकर महामानवों के इतिहास तलाशने पड़ेंगे। अपने समय में या क्षेत्र में यदि वे दीख न पड़ते हो तो भी निराश होने की आवश्यकता नहीं। इतिहास में उनके अस्तित्व और वर्चस्व को देखकर अभीष्ट प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है और विश्वास किया जा सकता है कि महानता का मार्ग ऐसा नहीं है, जिस पर चलने से यदि लालची सहमत न हो तो छोड़ देने की बात सोची जाने लगे।

वैभववानों की एक अपनी दुनिया हैं। किन्तु सोचना यह नहीं चाहिए कि संसार इतना ही छोटा है। इसमें एक क्षेत्र ऐसा भी है जिसे स्वर्ग कहते हैं। उसमें सत्प्रवृत्तियों का वर्चस्व है और अपनाने वाले जो भी उसमें बसते है, देवोपम स्तर का वरण करते हैं। दैत्यों के संसार में सोने की लंका बनाने और दस सिर जितनी चतुरता और बीस भुजाओं जैसी बलिष्ठता हो सकती है, किन्तु उतना ही सब कुछ नहीं हैं। भागीरथों, हरिश्चन्द्रों, प्रह्लादों और दधीचियों जैसी भी एक बिरादरी है। बुद्ध, चैतन्य, नानक, कबीर, रैदास, गाँधी, विनोबा जैसे अनेकों ने उसमें प्रवेश पाया है। दयानन्दों और विवेकानन्दों का भी अस्तित्व रहा है। संख्या की दृष्टि से कमी पड़ते देखकर किसी को भी मन छोटा नहीं करना चाहिए। समूचे आकाश में सूर्य और चन्द्र जैसी प्रतिभाएँ अपने पराक्रम से संव्याप्त अन्धकार से निरन्तर लड़ती रहती हैं। हार मानने का नाम नहीं लेती। समुद्र में मणि मुक्तक तो जहाँ तहाँ ही होते हैं, सीपों और घोंघों से ही उसके तट पटे पड़े रहते हैं। बहुसंख्यकों को बुद्धिमान अथवा अनुकरणीय मानना हो तो फिर उद्भिजों की बिरादरी को वरिष्ठता देनी पड़ेगी। यह बहुमत वाला सिद्धान्त मनुष्य समाज पर लागू नहीं हो सकता। श्रेष्ठता ही सदैव जीतती रही है, श्रेय पाती रही है। हमें अपनी दृष्टि नाव के मस्तूल पर, प्रकाश स्तम्भ पर रखनी चाहिए। इस संसार में निकृष्टता है तो श्रेष्ठता भी अनुपलब्ध नहीं है। मात्र दृष्टिकोण ही है, जो हमें उसके दर्शन नहीं करा पाता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 साधना का रहस्य

मनुष्य का अन्तःकरण दर्पण की भाँति है। सुबह से साँझ तक इस पर धूल जमती रहती है। लगातार इस धूल के जमते रहने से अन्तःकरण का दर्पण अपने स्वाभाविक गुणों को गँवा देता है। और यह सच्चाई सर्वविदित है कि अन्तःकरण की अवस्था के अनुरूप ही मनुष्य को ज्ञान होता है। अन्तःकरण का दर्पण जिस मात्रा में स्वच्छ है, उस मात्रा में ही सत्य उसमें प्रतिबिम्बित होता है।

सूफी सन्त जलालुद्दीन रूमी से किसी व्यक्ति ने अपनी मानसिक चंचलता का दुखड़ा रोया। उसकी परेशानी थी कि साधना में उसका मन एकाग्र नहीं होता। किसी भी तरह से उसका ध्यान नहीं जमता। रूमी ने मुस्कराते हुए उसे अपने एक मित्र साधु के पास यह कहकर भेजा- जाओ और उनकी समग्र दिनचर्या को बड़े ध्यान से देखो। वहीं तुम्हें साधना का रहस्य ज्ञात होगा।

निर्देश के अनुसार वह व्यक्ति उस साधु के पास गया। वहाँ जाकर उसे भारी निराशा हुई, क्योंकि वह साधु एक साधारण सी सराय का रखवाला था। साथ ही वह स्वयं भी बहुत साधारण था। उसमें कोई ज्ञान के लक्षण भी दिखाई नहीं देते थे। हाँ, वह बहुत सरल और शिशुओं की भाँति निर्दोष मालूम पड़ता था। उसकी दिनचर्या भी सामान्य सी थी। उस साधु की दिनचर्या की छान-बीन करने पर बस इतना भर पता चला कि वह रात्रि को सोने से पहले और सुबह जगने के बाद अपनी सराय के बर्तनों को अच्छी तरह से धोता-माँजता है।

इस साधु के पास से काफी निराश होकर वह व्यक्ति जलालुद्दीन रूमी के पास लौटा। उसने साधु की दिनचर्या उन्हें बतायी। सूफी सन्त रूमी हँसते हुए बोले, जो जानने योग्य था, वह तुम देख आये हो, लेकिन उसे ठीक से समझ नहीं सके। रात्रि में तुम भी अपने मन को माँजो और सुबह उसे पुनः धो डालो। धीरे-धीरे मन-अन्तःकरण निर्मल हो जाएगा। अन्तःकरण के निर्मल दर्पण में परमात्मा अपने आप ही प्रतिबिम्बित होता है। अन्तःकरण की नित्य सफाई ही साधना का रहस्य है। क्योंकि इस स्वच्छता पर ही साधना की सभी विधियों की सफलता निर्भर है। जो इसे विस्मरण कर देते हैं, वे साधना पथ से भटक जाते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ ११४

बुधवार, 6 नवंबर 2019

👉 प्रतिस्पर्धा :-

राजा ने मंत्री से कहा- मेरा मन प्रजाजनों में से जो वरिष्ठ हैं उन्हें कुछ बड़ा उपहार देने का हैं। बताओ ऐसे अधिकारी व्यक्ति कहाँ से और किस प्रकार ढूंढ़ें जाय?

मंत्री ने कहा - सत्पात्रों की तो कोई कमी नहीं, पर उनमें एक ही कमी है कि परस्पर सहयोग करने की अपेक्षा वे एक दूसरे की टाँग पकड़कर खींचते हैं। न खुद कुछ पाते हैं और न दूसरों को कुछ हाथ लगने देते हैं। ऐसी दशा में आपकी उदारता को फलित होने का अवसर ही न मिलेगा।

राजा के गले वह उत्तर उतरा नहीं। बोले! तुम्हारी मान्यता सच है यह कैसे माना जाय? यदि कुछ प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हो तो करो।

मंत्री ने बात स्वीकार करली और प्रत्यक्ष कर दिखाने की एक योजना बना ली। उसे कार्यान्वित करने की स्वीकृति भी मिल गई।

एक छः फुट गहरा गड्ढा बनाया गया। उसमें बीस व्यक्तियों के खड़े होने की जगह थी। घोषणा की गई कि जो इस गड्ढे से ऊपर चढ़ आवेगा उसे आधा राज्य पुरस्कार में मिलेगा।

बीसों प्रथम चढ़ने का प्रयत्न करने लगे। जो थोड़ा सफल होता दीखता उसकी टाँगें पकड़कर शेष उन्नीस नीचे घसीट लेते। वह औंधे मुँह गिर पड़ता। इसी प्रकार सबेरे आरम्भ की गई प्रतियोगिता शाम को समाप्त हो गयी। बीसों को असफल ही किया गया और रात्रि होते-होते उन्हें सीढ़ी लगाकर ऊपर खींच लिया गया। पुरस्कार किसी को भी नहीं मिला।

मंत्री ने अपने मत को प्रकट करते हुए कहा - यदि यह एकता कर लेते तो सहारा देकर किसी एक को ऊपर चढ़ा सकते थे। पर वे ईर्ष्यावश वैसा नहीं कर सकें। एक दूसरे की टाँग खींचते रहे और सभी खाली हाथ रहे।

संसार में प्रतिभावानों के बीच भी ऐसी ही प्रतिस्पर्धा चलती हैं और वे खींचतान में ही सारी शक्ति गँवा देते है। अस्तु उन्हें निराश हाथ मलते ही रहना पड़ता है।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 6 Nov 2019


👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग २)

यह मान्यता अनगढ़ों की है कि वैभव के आधार पर ही समुन्नत बना जा सकता है, इसलिए उसे हर काम छोड़कर हर कीमत पर अर्जित करने में अहर्निश संलग्न रहना चाहिए। सम्पन्नता से मात्र सुविधाएँ खरीदी जा सकती है और वे मात्र मनुष्य के विलास, अहंकार का ही राई रत्ती समाधान कर पाती है। राई रत्ती का तात्पर्य है, क्षणिक तुष्टि। उतना जितना कि आग पर ईंधन डालते समय प्रतीत होता है कि वह बुझ चली। किन्तु वह स्थिति कुछ ही समय में बदल जाती है और पहले से भी अधिक ऊँची ज्वालाएँ लहराने लगती हैं। दूसरों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करने में वैभव काम आ सकता है। दर्प दिखाने, विक्षोभ उभारने के अतिरिक्त उससे और कोई बड़ा प्रयोजन सधता नहीं है। अनावश्यक संचय के ईर्ष्या द्वेष से लेकर दुर्व्यसनों तक के अनेकानेक ऐसे विग्रह खड़े होते है, जिन्हें देखते हुए कई बार तो निर्धनों की तुलना में सम्पन्नों को अपनी हीनता अनुभव करते देखा गया है।

उत्कृष्टता के आलोक की आभा यदि अन्तराल तक पहुँचे तो व्यक्ति को नए सिरे से सोचना पड़ता है और अपनी दिशाधारा का निर्धारण स्वतन्त्र चिन्तन एवं एकाकी विवेक के आधार पर करना पड़ता है। प्रस्तुत जन समुदाय द्वारा अपनायी गयी मान्यताओं और गतिविधियों से इस प्रयोजन के लिए तनिक भी सहायता नहीं मिलती। वासना, तृष्णा के लिए मरने खपने वाले नर पामरों की तुलना में अपना स्तर ऊँचा होने की अनुभूति होते ही परमार्थ के लिए मात्र दो ही मनीषियों का आश्रय लेना पड़ता है, इनमें से एक को आत्मा दूसरे को परमात्मा कहते हैं। इन्हीं को ईमान और भावना भी कहा जा सकता है। उच्चस्तरीय निर्धारणों में इन्हीं का परामर्श प्राप्त होता है। व्यामोह ग्रस्त तो ‘कोढ़ी और संघाती चाहे’ वाली बात ही कर सकते हैं। नरक में रहने वालों को भी साथी चाहिए। अस्तु वे संकीर्ण स्वार्थपरता की सड़ी कीचड़ में उन्हीं की तरह बुलबुलाते रहने में ही सरलता, स्वाभाविकता देखते हैं। तदनुसार परामर्श भी वैसा ही देते हैं, आग्रह भी वैसा ही करते हैं।

इस रस्साकशी में विवेक का कर्तव्य है कि औचित्य का समर्थन करें। अनुचित के लिए मचलने वालों की बालबुद्धि को हँसकर टाल दें। गुड़ दे सकना सम्भव न हो तो, गुड़ जैसी बात कहकर भी सामयिक संकट को टाला जा सकता है। लेकिन बहुधा ऐसा होता नहीं। निकृष्टता का अभाव सहज ही मानव को अपनी ओर खींचता है। इसका निर्धारण स्वयं औचित्य, विवेक के आधार पर करना होता है। निषेधात्मक परामर्शों को इस कान सुनकर दूसरे कान से निकाल देना अथवा ऐसा परामर्श देने वाले व्यक्ति के चिन्तन का परिष्कार करना भी एक ऐसा प्रबल पुरुषार्थ है, जो बिरलों से ही बन पड़ता है। लेकिन यह संभव है क्योंकि मानवी गरिमा उसे सदा ऊँचा उठने, ऊँचा ही सोचने का संकेत करती है। कौन, कितना इस पुकार को सुन पाता है, यह उस पर, उसकी मन की संरचना, अन्तश्चेतना पर निर्भर है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (अंतिम भाग)

👉 पंचशीलों को अपनाएँ, आध्यात्मिक चिकित्सा की ओर कदम बढ़ाएँ

५. उदार बनने से चूके नहीं- आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति उदारता से कभी नहीं चूकता। कृपणता व विलासिता दोनों ही आध्यात्मिक रोगी होने के चिह्न हैं। उदारता तो स्वयं के अस्तित्व का विस्तार है। अपने परम प्रिय प्रभु से साझेदारी है। उनके इस विश्व उद्यान को सजाने- संवारने का भावभरा साहस है। जो भक्त हैं, वे उदार हुए बिना रह नहीं सकते। इसी तरह जो शिष्ट हैं, वे अपना समय- श्रम सद्गुरू को सौंपे बिना नहीं रह सकते। हमारे भण्डार भरे रहे और गुरुदेव की योजनाएँ श्रम और अर्थ के अभाव में अधूरी ही रहे, यह भला किन्हीं सुयोग्य शिष्यों के रहते किस तरह सम्भव है। यह न केवल सेवा की दृष्टि से बल्कि स्वयं की आध्यात्मिक चिकित्सा के लिए भी उपयोगी है। उदार भावनाएँ, उदार कर्म स्वयं ही हमारी मनोग्रन्थियों को खोल देते हैं। मनोग्रन्थियों से छुटकारे के लिए भावभरी उदारता एक समर्थ चिकित्सा विधि का काम करती है।

आध्यात्मिक चिकित्सा के इन पंचशीलों को अपनी जीवन साधना में आज और अभी से समाविष्ट कर लेना चाहिए। यदि इन्हें अपने जीवन में सतत उतारने के लिए सतत कोशिश की जाती रहे तो आध्यात्मिक दृष्टि से असामान्य व असाधारण बना जा सकता है। हम सबके आराध्य परम पूज्य गुरुदेव सदा ही इसी पथ पर चलते हुए आध्यात्मिक चिकित्सा के विशेषज्ञ बने थे। उनके द्वारा निर्देशित यही पथ अब हमारे लिए है। ऐसा करके हम अपने आध्यात्मिक स्वास्थ्य को सदा के लिए प्राप्त कर सकते हैं। और भविष्य में एक समर्थ आध्यात्मिक चिकित्सक की भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं। विश्वास है अपने भावनाशील परिजन इससे चूकेंगे नहीं। वे स्वयं तो इस पथ पर आगे बढ़ेंगे ही, दूसरों में भी आन्तरिक उत्साह जगाने में सहयोगी- सहायक बनेंगे। ऐसा होने पर अपने भारत देश की आध्यात्मिक चिकित्सा की परम्परा को नवजीवन मिल सकता है।

.... समाप्त
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १२४

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 Nov 2019

★ "मेरे मन! दुर्गानाम जपो। जो दुर्गानाम जपता हुआ रास्ते में  चला जाता है, शूलपाणि शूल लेकर उसकी रक्षा करते है। तुम दिवा हो, तुम सन्ध्या हो, तुम्ही रात्रि हो; कभी तो तुम पुरुष का रूप धारण करती हो, कभी कामिनी बन जाती हो। तुम तो कहती हो कि मुझे छोड़ दो, परन्तु  मैं कदापि न छोडूँगा, - मैं तुम्हारे चरणों में नूपुर होकर बजता रहूँगा, - जय दुर्गा, श्रीदुर्गा कहता हुआ! माँ, जब शंकरी होकर तुम आकाश में उड़ती रहोगी तब मैं मीन बनकर पानी में रहूँगा तुम अपने नखों पर मुझे उठा लेना। हे ब्रह्ममयीं, नखों के आघात से यदि मेरे प्राण निकल जायें, तो कृपा करके अपने अरुण चरणों का स्पर्श मुझे कर देना।"

◆ भोग की शान्ति हुए बिना वैराग्य नहीं होता। छोटे बच्चे  को खाना और खिलौना देकर अच्छी तरह से भुलाया जा सकता है, परन्तु जब खाना हो गया और खिलौने के साथ खेल भी समाप्त हो गया तब वह कहता है, 'माँ के पास जाऊँगा।' माँ के पास न ले जाने पर खिलौना पटक देता है और चिल्लाकर रोता है। "मनुष्य उनकी माया में पड़कर अपने स्वरूप को भूल जाता है। इस बात को भूल जाता है कि वह अपने पिता के अनन्त ऐश्वर्य का अधिकारी है। उनकी माया त्रिगुणमयी है। ये तीनों ही गुण डाकू हैं। सब कुछ हर लेते हैं, हमारे स्वरूप को भुला देते हैं। सत्त्व, रज, तम तीन गुण हैं। इनमें से केवल सत्त्वगुण ही ईश्वर का रास्ता बताता है; परन्तु ईश्वर के पास सत्त्वगुण भी नहीं ले जा सकता।

रामकृष्ण परमहंस

मंगलवार, 5 नवंबर 2019

गुरु मंत्र गायत्री | Guru Mantra Gayatri



Title

दानवीर राजा रंतिदेव | Daanveer Raja Rantidev | Dr Chinmay Pandya



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👉 लोभ और भय

मैंने सुना है, राजा भोज के दरबार में बड़े पंडित थे, बड़े ज्ञानी थे और कभी कभी वह उनकी परीक्षा भी लिया करता था। एक दिन वह अपना तोता राजमहल से ले आया दरबार में। तोता एक ही रट लगाता था, एक ही बात दोहराता था बार बार : 'बस एक ही भूल है, बस एक ही भूल है, बस एक ही भूल है।'

राजा ने अपने दरबारियों से पूछा, "यह कौन सी भूल की बात कर रहा है तोता?" पंडित बड़ी मुश्किल में पड़ गए। और राजा ने कहा, "अगर ठीक जवाब न दिया तो फांसी, ठीक जबाब दिया तो लाखों के पुरस्कार और सम्मान।"

अब अटकलबाजी नहीं चल सकती थी, खतरनाक मामला था। ठीक जवाब क्या हो? तोते से तो पूछा भी नहीं जा सकता। तोता कुछ और जानता भी नहीं। तोता इतना ही कहता है, तुम लाख पूछो, वह इतना ही कहता है : 'बस एक ही भूल है।'

सोच विचार में पड़ गए पंडित। उन्होंने मोहलत मांगी, खोजबीन में निकल गए। जो राजा का सब से बड़ा पंडित था दरबार में, वह भी घूमने लगा कि कहीं कोई ज्ञानी मिल जाए। अब तो ज्ञानी से पूछे बिना न चलेगा। शास्त्रों में देखने से अब कुछ अर्थ नहीं है। अनुमान से भी अब काम नहीं होगा। जहां जीवन खतरे में हो, वहां अनुमान से काम नहीं चलता। तर्क इत्यादि भी काम नहीं देते। तोते से कुछ राज़ निकलवाया नहीं जा सकता। वह अनेकों के पास गया लेकिन कहीं कोई जवाब न दे सका कि तोते के प्रश्न का उत्तर क्या होगा।

बड़ा उदास लौटता था राजमहल की तरफ कि एक चरवाहा मिल गया। उसने पूछा, "पंडित जी, बहुत उदास हैं? जैसे पहाड़ टूट पड़ा हो आप के ऊपर, कि मौत आनेवाली हो, इतने उदास! बात क्या है?" तो उसने अपनी अड़चन कही, दुविधा कही। उस चरवाहे ने कहा, "फिक्र न करें, मैं हल कर दूंगा। मुझे पता है। लेकिन एक ही उलझन है। मैं चल तो सकता हूँ लेकिन मैं बहुत दुर्बल हूँ और मेरा यह जो कुत्ता है इसको मैं अपने कंधे पर रखकर नहीं ले जा सकता। इसको पीछे भी नहीं छोड़ सकता। इससे मेरा बड़ा लगाव है।" पंडित ने कहा, "तुम फिक्र छोड़ो। मैं इसे कंधे पर रख लेता हूँ।"

उन ब्राह्मण महाराज ने कुत्ते को कंधे पर रख लिया। दोनों राजमहल में पहुंचे। तोते ने वही रट लगा रखी थी कि एक ही भूल है, बस एक ही भूल है। चरवाहा हंसा उसने कहा, "महाराज, देखें भूल यह खड़ी है।" वह पंडित कुत्ते को कंधे पर लिए खड़ा था। राजा ने कहा, "मैं समझा नहीं।" उसने कहा कि "शास्त्रों में लिखा है कि कुत्ते को पंडित न छुए और अगर छुए तो स्नान करे और आपका महापंडित कुत्ते को कंधे पर लिए खड़ा है। लोभ जो न करवाए सो थोड़ा है। बस, एक ही भूल है : लोभ और भय लोभ का ही दूसरा हिस्सा है, नकारात्मक हिस्सा। यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक तरफ भय, एक तरफ लोभ।

ये दोनों बहुत अलग अलग नहीं हैं। जो भय से धार्मिक है वह डरा है दंड से, नर्क से, वह धार्मिक नहीं है। और जो लोभ से धार्मिक है, जो लोलुप हो रहा है वह वासनाग्रस्त है स्वर्ग से, वह धार्मिक नहीं है।

फिर धार्मिक कौन है? धार्मिक वही है जिसे न लोभ है, न भय। जिसे कोई चीज लुभाती नहीं और कोई चीज डराती भी नहीं। जो भय और प्रलोभन के पार उठा है वही सत्य को देखने में समर्थ हो पाता है।

सत्य को देखने के लिए लोभ और भय से मुक्ति चाहिए। सत्य की पहली शर्त है अभय क्योंकि जब तक भय तुम्हें डांवाडोल कर रहा है तब तक तुम्हारा चित्त ठहरेगा ही नहीं। भय कंपाता है, भय के कारण कंपन होता है। तुम्हारी भीतर की ज्योति कंपती रहती है। तुम्हारे भीतर हजार तरंगें उठती हैं लोभ की, भय की।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 5 Nov 2019




👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग १)

समुद्र में जब तक बड़े ज्वार-भाटे उठते रहते हैं तब तक उस पर जलयानों का ठीक तरह चल सकना सम्भव नहीं होता। रास्ता चलने में खाइयाँ भी बाधक होती हैं और टीले भी। समतल भूमि पर ही यात्रा ठीक प्रकार चल पाती है। शरीर न आलसी, अवसाद ग्रस्त होना चाहिए और न उस पर चंचलता, उत्तेजना चढ़ी रहनी चाहिए। मनःक्षेत्र के सम्बन्ध में भी यही बात है, न उसे निराशा में डूबा रहना चाहिए और न उन्मत्त, विक्षिप्तों की तरह उद्वेग से ग्रसित होना चाहिये। सौम्य सन्तुलन ही श्रेयस्कर है। दूरदर्शी विवेकशीलता के पैर उसी स्थिति में टिकते हैं। उच्चस्तरीय निर्धारण इसी स्तर की मनोभूमि में उगते-बढ़ते और फलते फूलते है। पटरी औंधी तिरछी हो तो रेलगाड़ी गिर पड़ेगी। वह गति तभी पकड़ती है, जब पटरी की चौड़ाई-ऊँचाई का नाप सही रहे।

जीवन-क्रम में सन्तुलन भी आवश्यक है। उसकी महत्ता पुरुषार्थ, अनुभव, कौशल आदि से किसी भी प्रकार कम नहीं है। आतुर, अस्त-व्यस्त, चंचल, उद्धत प्रकृति के लोग सामर्थ्य गँवाते रहते हैं। वे उस लाभ से लाभान्वित नहीं हो पाते जो स्थिर चित्त, संकल्पवान्, परिश्रमी, दूरदर्शी और सही दिशाधारा अपना कर उपलब्ध करते हैं। स्थिरता एक बड़ी विभूति है। दृढ़ निश्चयी धीर-वीर कहलाते हैं। वे हर अनुकूल प्रतिकूल परिस्थिति में अपना संतुलन बनाये रहते है। महत्त्वपूर्ण निर्धारणों के कार्यान्वित करने और सफलता के स्तर तक पहुँचने के लिए मनःक्षेत्र को ऐसा ही सुसन्तुलित होना चाहिए।

निराशा स्तर के अवसाद और क्रोध जैसे उन्माद आवेशों से यदि बचा जा सके तो उस बुद्धिमानी का उदय हो सकता है, जिसे अध्यात्म की भाषा में प्रज्ञा कहते और जिसे भाग्योदय का सुनिश्चित आधार माना जाता है। ऐसे लोगों का प्रिय विषय होता है उत्कृष्ट आदर्शवादिता। उन्हें ऐसे कामों में रस आता है, जिनमें मानवी गरिमा को चरितार्थ एवं गौरवान्वित होने का अवसर मिलता हो। भविष्य उज्ज्वल होता हो और महामानवों की पंक्ति में बैठने का सुयोग बनता हो। इस स्तर के विभूतिवान बनने का एक ही उपाय है कि चिन्तन को उत्कृष्ट और चरित्र, कर्तृत्व से आदर्श बनाया जाय। इसके लिए दो प्रयास करने होते है, एक संचित कुसंस्कारिता का परिशोधन उन्मूलन। दूसरा अनुकरणीय अभिनन्दनीय दिशाधारा का वरण, चयन। व्यक्तित्वों में उन सत्प्रवृत्तियों का समावेश करना होता हैं जिनके आधार पर ऊँचा उठने और आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। कहना न होगा कि गुण, कर्म, स्वभाव की विशिष्टता ही किसी को सामान्य परिस्थितियों के बीच रहने पर भी असामान्य स्तर का वरिष्ठ अभिनन्दनीय बनाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८९)

👉 पंचशीलों को अपनाएँ, आध्यात्मिक चिकित्सा की ओर कदम बढ़ाएँ

४. बर्बादी से बचें- गलत कामों में अपनी सामर्थ्य को बरबाद करने के दुष्परिणाम सभी जानते हैं। ऐसे लोगों को कुकर्मी, दुष्ट, दुराचारी कहा जाता है। इन्हें बदनामी मिलती है, घृणित, तिरस्कृत बनते हैं, आत्म प्रताड़ना सहते हुए सहयोग से वंचित होते हैं और पतन के गर्त में जा गिरते हैं। यह सब केवल अपनी सामर्थ्य के गलत नियोजन से होता है। इस महापाप से थोड़े कम दर्जे का पाप है- व्यर्थ में अपनी शक्तियों को गंवाते रहने की मूर्खता। यूं देखने में यह कोई बड़ी बुराई नहीं लगती पर इसके परिणाम लगभग उसी स्तर के होते हैं। आमतौर पर बर्बादी के चार तरीके देखने को मिलते हैं- १. शारीरिक श्रम शक्ति को व्यर्थ में गंवाना- आलस्य, २. मन को अभीष्ट प्रयोजनों में न लगाकर उसे इधर- उधर भटकने देना- प्रमाद, ३. समय का, धन का, वस्तुओं का, क्षमता का बेसिलसिले उपयोग करना, उन्हें बर्बाद करना- अपव्यय, ४. तत्परता, जागरूकता, साहसिकता, उत्साह का अभाव, अन्यमनस्क मन से बेगार भुगतने की तरह कुछ उलटा- सुलटा करते रहना- अवसाद।

इन चार दुर्गुणों की चतुरंगिणी से हम हर समय सजग सैन्य प्रहरी की तरह मुकाबला करें। कभी किन्हीं क्षणों में इन्हें स्वयं पर हावी न होने दें। आलस्य, प्रमाद, अपव्यय व अवसाद के असुरों से हमें पूरी क्षमता से निबटना चाहिए। श्रम निष्ठा, कर्म परायणता, उत्साह, स्फूर्ति, सजगता, विनम्रता, व्यवस्था, स्वच्छता, अपने स्वभाव के अंग होने चाहिए। भीरूता, आत्महीनता, दीनता, निराशा, चिन्ता जैसे किसी दुष्प्रवृत्ति को अपनी सामर्थ्य को बरबाद करने की इजाजत हमें नहीं देनी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १२३

👉 पाप का सौदा

एक बार घूमते-घूमते कालिदास बाजार गये। वहाँ एक महिला बैठी मिली। उसके पास एक मटका था और कुछ प्यालियाँ पड़ी थी। कालिदास ने उस महिला से पूछा: ” क्या बेच रही हो?

“महिला ने जवाब दिया: ” महाराज! मैं पाप बेचती हूँ। “ कालिदास ने आश्चर्यचकित होकर पूछा: ” पाप और मटके में? “महिला बोली: ” हाँ , महाराज! मटके में पाप है।
“ कालिदास : ” कौन-सा पाप है?

“ महिला : ” आठ पाप इस मटके में है। मैं चिल्लाकर कहती हूँ की मैं पाप बेचती हूँ पाप… और लोग पैसे देकर पाप ले जाते है।” अब महाकवि कालिदास को और आश्चर्य हुआ: ” पैसे देकर लोग पाप ले जाते है? “ महिला : ”हाँ, महाराज! पैसे से खरीदकर लोग पाप ले जाते है। “ कालिदास: ” इस मटके में आठ पाप कौन-कौन से है?

“महिला: ” क्रोध, बुद्धिनाश, यश का नाश, स्त्री एवं बच्चों के साथ अत्याचार और अन्याय, चोरी, असत्य आदि दुराचार, पुण्य का नाश, और स्वास्थ्य का नाश … ऐसे आठ प्रकार के पाप इस घड़े में है।

“कालिदास को कौतुहल हुआ की यह तो बड़ी विचित्र बात है। किसी भी शास्त्र में नहीं आया है की मटके में आठ प्रकार के पाप होते है।

वे बोले: ”आखिरकार इसमें क्या है?”

महिला : ”महाराज! इसमें शराब है शराब! “कालिदास महिला की कुशलता पर प्रसन्न होकर बोले:” तुझे धन्यवाद है! शराब में आठ प्रकार के पाप है यह तू जानती है और ‘मैं पाप बेचती हूँ ‘ ऐसा कहकर बेचती है फिर भी लोग ले जाते है। धिक्कार है ऐसे लोगों के जीवन पर।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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